प्राइवेट सेक्टर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
प्राइवेट सेक्टर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

8.11.10

प्राइवेट स्कूलों का कारोबार 5000 करोड़ रुपये के पार



प्राथमिक शिक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद मुंबई और उपनगरीय इलाकों में बच्चे बीएमसी स्कूलों से मुंह मोड़कर निजी स्कूलों की तरफ जा रहे हैं.

बीएमसी स्कूल में जहां मुफ्त में शिक्षा दी जाती है वहीं निजी स्कूलों में औसतन साल भर में एक बच्चे पर तकरीबन 25-30 हजार रुपये खर्च आता हैं. लाख कोशिशों के बावजूद निजी स्कूलों में डोनेशन प्रथा खत्म होने के बजाए और मजबूत होती जा रही है.

बच्चे को स्कूल में प्रवेश दिलाने के लिए औसतन 25 हजार रुपये बतौर डोनेशन देने पड़ते हैं. समाज सेवा के नाम पर चलाए जा रहे निजी स्कूलों का कारोबार हर साल करीबन 20 फीसदी की दर से बढ़ रहा है. आज शिक्षा कारोबार सालाना लगभग 5000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा का हो चुका है जिसकी सही-सही जानकारी किसी के पास नहीं है.

सरकार साल दर साल बीएमसी स्कूलों में बच्चों को अच्छी शिक्षा और सुविधा देने के लिए बजट बढ़ाती जा रही है, लेकिन बच्चों की संख्या हर साल कम होती जा रही है. बीएमसी ने स्कूल शिक्षा को मजबूत बनाने के लिए 2007-08 में 1,051 करोड़ रुपये और 2008-09 में 1,350 करोड़ रुपये का प्रवाधान किया था, जबकि इस साल (2009-10) बीएमसी शिक्षा पर 1,651 करोड़ रुपये खर्च करेगी.

बीएमसी के अलावा केन्द्र और राज्य सरकार भी स्कूली शिक्षा में भारी भरकम रकम खर्च करती है. बीएमसी स्कूलों में शिक्षा पूरी तरह से मुफ्त दी जाती है. बच्चों की फीस, कॉपी-किताबें, स्कूल यूनिफॉर्म के साथ मिड-डे मिल के तहत खिचड़ी और दोपहर में दूध भी बच्चों को मुफ्त में मिलता है. इसके बावजूद हर साल तकरीबन 30 हजार बच्चे बीएमसी स्कूलों से तौबा कर रहे हैं.

इन स्कूलों में बच्चों का आंकड़ा वर्ष 1999 में 7.5 लाख था, जबकि बीते शिक्षण सत्र में बीएमसी के कुल 1,144 स्कूल में 4.50 लाख ही बच्चों ने दाखिला लिया. इस सप्ताह से शुरू हो रहे नए शिक्षण सत्र में यह संख्या और कम होने की आशंका जताई जा रही है.

बृहन्मुंबई महानगरपालिका शिक्षक सभा के महासचिव एवं ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ टीचर्स ऑर्गनाइजेशन के निदेशक रमेश जोशी का का कहना है, 'बीएमसी स्कूलों में साल दर साल बच्चों की कम होती संख्या की मुख्य वजह लोगों की बदलती सोच है.'

उनके मुताबिक आज लोग सोचते हैं कि सिर्फ अंग्रेजी माध्यम में उनका बच्चा जाएगा तो ही उसका भविष्य संवर सकेगा. बीएमसी स्कूल तो गरीबों का स्कूल है, वहां बच्चा जाएगा तो समाज के लोग क्या कहेंगे? जबकि हमारे सरकारी स्कूलों में जो शिक्षक है वह निजी स्कूल के शिक्षकों के मुकाबले अधिक शिक्षित और प्रशिक्षित हैं.

मुंबई और आसपास के इलाकों में करीबन 2,000 निजी स्कूल हैं. जिनमें करीब-करीब 20 लाख बच्चे पढ़ते हैं और यह आंकड़ा सालाना करीबन 15 फीसदी की रफ्तार से बढ़ता जा रहा है. स्कूली शिक्षा आज सबसे सफल कारोबार बन गया है। निजी स्कूलों में फीस और दूसरे खर्च तय नहीं है.

सभी निजी स्कूलों की दरें अलग-अलग हैं. प्रवेश के समय इमारत या स्कूल के विकास के नाम पर लिये जाने वाली डोनेशन फीस इन स्कूल की आय का एकमुश्त सबसे बड़ा साधन है. तीन-चार साल के बच्चे के एडमिशन के लिए स्कूल प्रबंधन की ओर से मुंबई में 5 हजार रुपये से एक लाख रुपये तक बतौर डोनेशन फीस वसूली जाती है, जिसकी कोई लिखित जानकारी नहीं दी जाती है.

इसके अलावा प्रवेश शुल्क, साल में होने वाली दो परीक्षाओं के अलावा हर महीने टेस्ट फीस, टर्म फीस (पिकनिक और कल्चरल्स प्रोग्राम) को मिलाकर सालभर में एक छात्र से औसतन सालभर में 30 हजार रुपये तक ले लिये जाते हैं. ड्रेस और किताबें स्कूल की बताई हुई दुकानों से ही लेनी पड़ती हैं जो अपेक्षाकृत 20 फीसदी तक महंगी ही होती हैं.

मंहगी होती शिक्षा के बावजूद निजी स्कूलों की तरफ बढ़ते रुझान पर राहुल ग्रुप ऐंड स्कूल कॉलेज के चेयरमैन लल्लन तिवारी कहते हैं, 'लोग अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना चाहते हैं इसीलिए वह अच्छे स्कूल में बच्चे को भेजना चाहते हैं, जिसके लिए पैसा मायने नहीं रखता है.'

महंगे से महंगे स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे को भी कोचिंग का सहारा लेना पड़ रहा है. इस पर महेश टयूटोरियल कोचिंग के प्रबंध निदेशक महेश शेट्टी कहते हैं कि स्कूल में क्या पढ़ाया जाता है, हमे इससे कोई मतलब नहीं है। हमारा लक्ष्य होता है कि बच्चे परीक्षा में अधिक से अधिक नंबर ला पाए.

इसके लिए कोचिंग में नई तकनीक और रिसर्च के आधार पर बच्चों को शिक्षा दी जाती है. यही वजह है कि हर साल बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है, जबकि मंदी के बावजूद कोचिंग फीस में करीबन 15-20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.

लगातार हो रहे शिक्षा के निजीकरण को लेकर बच्चों की शिक्षा पर काम करने वाले स्वयंसेवी संस्था क्राई की निदेशक योगिता वर्मा का कहना है, 'संविधान में शिक्षा को मूलभूत आवश्यकता बताया गया है. इसलिए सबको शिक्षा देना सरकार का कर्तव्य बनता है. शिक्षा के निजीकरण को बंद करना चाहिए. अमेरिका और इंगलैड में सरकारी शिक्षा ही सही मानी जाती है.'

क्राई का मानना है कि सबको मुफ्त और एक जैसी शिक्षा दी जानी चाहिए. वैसे भी सरकारी स्कूलों के अध्यापक निजी स्कूल के अध्यापकों के मुकाबले ज्यादा योग्य होते हैं.

20.10.10

सूरत बदलने की बदसूरत कवायद

शिरीष खरे

सूरत/ एक जमाने में विकास के लिए 'गरीबी हटाओ' एक घोषित नारा था. मगर आज आलम यह है कि विकास के रास्ते से 'गरीबों को हटाना' एक अघोषित एंजेडा बन चुका है. गुजरात के सूरत को देख कर यह समझा जा सकता है कि 'गरीबी की बजाय गरीबों को हटाने' का जो व्यंग्यात्मक मुहावरा था, वह आज किस तरह से गंभीर हकीकत में तब्दील हो चुका है.

सैकड़ों झोपड़ियों को तोड़ जाने के क्रम में जब झोपड़पट्टी तोड़ने वाले जलाराम नगर के 40 वर्षीय लक्ष्मण चंद्राकार उर्फ संतोष की झोपड़ी को तोड़ने लगे तो उसने केरोसिन डालकर अपने आप को मौत के हवाले करना चाहा था. उसके बाद उसे एक एम्बुलेंस से न्यू सिविल हास्पिटल भेजा गया. वहां पहुंचते-पहुंचते उसके शरीर का 75 प्रतिशत हिस्सा जल गया. उधर डाक्टरों ने संतोष की हालत को बेहद गंभीर बताया और इधर सूरत महानगर पालिका ने शाम होते-होते ताप्ती नदी के किनारे से तीन बस्तियों के हजारों बच्चों, बूढ़ों और औरतों को खुली सड़क पर ला दिया था.

फिलहाल सूरत के गरीबों को न तो साम्प्रदायिक दंगों का सामना करना पड़ रहा है और न ही बाढ़ या भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं का ही. अब उनके साथ जो कुछ घट रहा है, वह सूरत को जीरो स्लम बनाने की सरकारी कवायद का हिस्सा है.

सूरत को जीरो स्लम बनाने के लिए सूरत की कुल 1 लाख से ज्यादा झोपड़ियों को तोड़ा जा रहा है. मगर सरकारी दस्तावेजों पर पुनर्वास के लिए केवल 42000 घर बनाए जाने का उल्लेख है. जाहिर है 58000 से ज्यादा झोपड़ियों का सवाल हवा में है. एक तरफ सालों से घरों को तोड़े जाने का सिलसिला थम नहीं रहा है और दूसरी तरफ इतना तक तय नहीं हो पा रहा है कि घर मिलेंगे भी तो किन्हें, कैसे, कहां और कब तक ?

जबकि 2009 के पहले-पहले सूरत की सभी झोपड़ियों के परिवारों को नए घरों में स्थानांतरित करने का लक्ष्य रखा गया था. मगर उजाड़े गए लाखों रहवासियों के हिस्से में आज तक शहर की सीमारेखा से कोसों दूर कोसाठ या अन्य इलाकों में बसाए जाने का आश्वासन भर है. उनके लिए अगर कुछ और भी है तो प्रशासन द्वारा बमरोली और बेस्तान जैसे इलाकों में चले जाने जैसा सुझाव.

यकीकन इनदिनों शहर की सूरत तेजी से बदल रही है और उसी के सामानांतर तबाही, कार्यवाही, जवाबदारी और राहत से जुड़े कई किस्से भी पनप रहे हैं.


ऐसे बनेगा जीरो स्लम
यह किस्सा बरसात से थोड़े पहले का है. जब सूरत महापालिका ने अपने लक्ष्य का पीछा करते हुए सुभाषनगर, मैनानगर और उदना इलाके से 1650 झोपड़ियों को तोड़ा था. उस समय सूरत को झोपड़पट्टी रहित बनाने के मिशन ने 8500 से भी ज्यादा लोगों के सिरों से उनका छत छीना था. उसी के साथ क्योंकि तुलसीनगर और कल्याणनगर की एक सड़क व्यवस्था को भी ठिकाने पर लाना था, इसीलिए 5000 से ज्यादा गरीबों को ठिकाने लगाया गया था. इसके आगे सेंट्रल जोन की सड़क को भी 80 फीट चौड़ा करने के लिए 2500 से ज्यादा लोगों को शहर की खूबसूरती के नाम पर उजाड़ा गया था.

उजाड़ने के बाद प्रशासन का दावा था कि शुरू में तो रहवासियों ने डेमोलेशन का बहुत विरोध किया मगर बाद में कोसाठ में बसाने की बात पर सब मान गए. जबकि यहां से उजाड़े गए रहवासियों का कहना था कि उन्हें डेमोलेशन की सूचना तक नहीं दी गई थी. डेमोलेशन की कार्रवाई को बड़ी निर्दयतापूर्वक पूरा किया गया और जिसके चलते उन्होंने प्रशासन का विरोध भी किया था.

इसके बाद प्रशासन की तरफ से यह साफ हुआ है कि उसके अगले निशाने पर कौन-कौन सी बस्तियां रहेंगी. उसने स्लम डेमोलेशन का अपना लक्ष्य सामने रखा और उसे कुछ दिनों के भीतर पूरा कर लेने का ऐलान भी किया. कुछ दिनों के भीतर बापूनगर कालोनी के तकरीबन 2700 घरों में 15000 से भी ज्यादा लोगों को भी उजाड़ दिया गया.

दूसरा किस्सा सर्दी के समय का है. जब सूरत महापालिका ने कार्यालय के समय यानी 10 से 6 बजे तक जेपी नगर, जलाराम नगर और इकबाल नगर से कुल 502 झोपड़ियों को तोड़ने का रिकार्ड दर्ज किया. पुलिस के भारी बंदोबस्त के बीचोंबीच तनावपूर्ण स्थिति को नियंत्रण में बनाए रखते हुए 4000 से ज्यादा रहवासियों से उनका पता-ठिकाना छीन लिया गया. कुल मिलाकर ताप्ती नदी के आजू-बाजू कई दशक पुरानी इन बस्तियों से 1700 से ज्यादा झोपड़ियों को साफ किया जाना था. अर्थात् 14000 से ज्यादा रहवासियों से उनका पता-ठिकाना छीना जाना था.

जैसा कि महापालिका के बस्ती उन्नयन विभाग से सी वाय भट्ट ने भी जताया कि "नदी और खाड़ी के इर्द-गिर्द जमा झोपड़ियों को साफ करने के लिए डेमोलेशन की कार्रवाई जारी रहेगी." डेमोलेशन की यह कार्रवाई अगले रोज भी जारी रही. मगर सूरत के बाकी इलाकों को तोड़े जाने के अगले चरणों और उनकी तारीखों के सवालों पर एक बार फिर से खामोशी औड़ ली गई. आगे-आगे डेमोलेशन, उसके पीछे-पीछे महापालिका वाले नल, गटर के पाईप और बिजली के तार काटते रहे थे.

सुबह-सुबह, कोई सूचना दिए बगैर, यकायक और पूरे दल-बल के साथ झुग्गी बस्तियों को नेस्तानाबूत करने की प्रशासनिक रणनीति को अब सूरत के रहवासी खूब जानते हैं. इन झोपड़ियों को साफ किए जाने के पहले पुलिस रात को ही उन सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं को हिरासत में ले लेती है, जो महानगर पालिका द्वारा गरीबों को शहर से हटाए जाने वाली मुहिम के विरोधी होते हैं.

उस रोज भी जेपी नगर, जलाराम नगर और इकबाल नगर के रहवासी यह कहने लगे कि घर के बदले घर दिए बगैर हमारे घरों को कैसे उजाड़ा जा रहा है? मगर प्रशासन के लिए यह कोई नया सवाल नहीं था. उनका ध्यान तो झोपड़पट्टी तोड़ने के दौरान 'अधिकतम नुकसान पहुंचाने' के सिद्धांत पर टिका था.

अंधियारा छाने के बहुत पहले ही बस्ती वालों के असंतोष ने आग पकड़ ली थी. देखते ही देखते एक भारी भीड़ पथराव करते हुए आगे बढ़ने लगी. हर एक के हाथों में उनके दुख, दर्द, उनकी आशंकाओं और हताशाओं से भरी भावनाओं में डूबे जनसैलाब के अलावा कुछ न था. इसके बाद मुस्तैद पुलिस वाले आगे आएं और उन्होंने बस्तियों की तरह उनके जनसैलाब को भी लाठीचार्ज के जरिए माटी में मिला दिया. उसके ऊपर से आंसू गैस के दो गोले भी छोड़े गए. ऐसे में जिनकी झोपड़ियां टूटी थीं, उनके लिए कम से कम 2000 रुपये का किराया चुका कर भाड़े का मकान लेना आसान नहीं था. उससे भी बड़ा सवाल तो यही था कि झोपड़पट्टी में रहने वालों को किराये पर मकान देगा कौन?

सामाजिक कार्यकर्ता भरत भाई कंथारिया ने बताया "डेमोलेशन की ज्यादातर कार्यवाहियों मौसम के मिजाज को बिगड़ते हुए देखकर की जाती हैं. सारे झोपड़े एक साथ न तोड़कर, कभी 200 तो कभी 400 की संख्या में तोड़े जाते हैं, जिससे लोग संगठित न हो सकें. ऐसे हमले अचानक और बहुत जल्दी-जल्दी होते हैं. दीवाली का त्यौहार जब सिर पर होगा तो सरकारी नजरिए से वह डेमोलेशन के लिए आदर्श समय होगा."


कारपोरेट की वल्ले-वल्ले
टेम्स नदी से लगे लंदन वाली तस्वीर के हू-ब-हू सूरत को लंदन जैसा बनाने की गति अपने चरम पर है. इसलिए ताप्ती के किनारे से हजारों झापड़ियों को साफ किए जाने की गति अपने चरम पर है. सूरत में स्लम एरिया हटाने के लिए केन्द्र की यूपीए और राज्य की भाजपा सरकार ने मिलकर 2157 करोड़ की रणनीति बना ली है. वहीं सूरत महापालिका का काम जमीनें खाली करवाना और बिल्डरों को सस्ते दामों में बेचना रह गया है.

कतारगाम इलाके का यह वाकया शहर के नक्शे से न केवल गायब हो जाने का बल्कि व्यवस्था के गायब हो जाने का वाकया भी है.

चंद्रकांत भाई रोज की तरह शाम को काम पर लौटे तो पूरी बस्ती को ही लापता देखा. जब उन्होंने पता किया कि पता चला कि बस्ती के बहुत सारे लोग शहर से बाहर कोसाठ नाम की एक जगह पर पहुंच गए हैं. तब अपने घरवालों से मिलने के लिए उन्हें रिक्शा करके फौरन कोसाठ जाना पड़ा.

जून 2004 में बस्ती के 155 घरवाले कारपोरेट के मुनाफे की भेट चढ़ाए गए थे. यहां की 2 एकड़ जमीन पर कभी 250 घरों की 2000 आबादी बसती थी. 90 साल पुरानी इस बस्ती की जमीन ने करोड़ों का भाव पार किया तो यहां के असली मालिकों को सस्ते घरों समेत उखाड़ फेंका गया. गायत्री बेन ने बताया "न सूचना दी, न सुनवाई की. वैसे भनक लग गई थी कि वहां सुन्दर तालाब बनेगा. हमारी जगह पिकनिक वाली जगह में बदलेगी. पार्किंग और गार्डन को जगह मिलेगी. सुबह-शाम टहलने वालों का 'स्पेशल रुट' बनेगा. बिल्डरों की दुकानें खुलेंगी. बस्ती की बजाय बाजार खुलेगा. आप तो वहीं से आ रहे हैं तो आप ही देखिए हमारी बातें कितनी सच साबित हुईं."

शहरों में विकास के नाम पर झोपड़ियां टूटने की खबर अब नई नहीं लगती. मगर कारपोरेट के नाम पर झोपड़ियां टूटने का किस्सा शायद आप पहली बार सुन रहे होंगे. सूरत में जगमगाता मिलेनियम मार्केट एक उदाहरण भर है. मिलेनियम मार्केट, साऊथ-वेस्ट में कोहली खाड़ी से लगा है. वैसे 2 एकड़ से ज्यादा जमीन पर फैले इस टेक्स्टाईल मार्केट का पता कोई भी बता देगा. मगर उनमें से कुछेक ही यह जानते हैं कि 1999 के पहले तक यहां कोई 800 झोपड़ियों का वजूद था.अब तो लगता भी नहीं कि यहां कभी 5000 से ज्यादा की बस्ती थी.5000 आबादी को यहां से साफ करके शहर से 25 कलोमीटर दूर बेस्तान में ठिकाने लगा दिया गया था.

मालम भाई बंजारा बताते हैं कि "हमारा बीता कल कोई सोने जैसा नहीं था. मगर इतना काला भी नहीं था. तब हमारे सस्ते झोपड़े चांदी की जमीन पर जो खड़े थे." उन्होंने चका भाई को देखते हुए कहा "आज मेलेनियम मार्केट की जमीन 100 करोड़ रूपए की तो होगी चका भाई?"

चका भाई फूट पड़े "हम झोपड़पट्टी के करोड़पतियों को 1 रूपए दिए बगैर वहां से खदेड़ा गया था. ऊपर से घर-सामान टूटने का जो नुकसान झेला, उसका हिसाब तो जोड़ा भी नहीं कभी." अन्याय की ईबारत इसके बाद भी नहीं रूकी- लंबे इंतजार के बाद मकान दिए भी तो 55000 के लोन पर. और मकानों का साईज निकला- 10 गुणा 12 वर्ग फीट.


राहत के सवाल पर
21 फरवरी 2009 को नरेन्द्र मोदी सूरत के कोसाठ आने वाले थे. मकसद था कि कोसाठ में जो 30000 मकान बन रहे हैं उनमें से 3700 परिवारों को मकान सौंपे जाए. मगर 20 फरवरी तक यह तय नहीं हो पाया कि किस झोपड़े को यहां शिफ्ट किया जाए. कार्यक्रम तो फेल होना ही था. मगर अहम बात यह है कि आज की तारीख तक उन हजारों झोपड़ों के नाम तक तय नहीं हो सके हैं.

सूरत महापालिका के कायदे में झोपड़पट्टी में कुल बजट का 10 प्रतिशत खर्च करना लिखा है. मगर सामाजिक कार्यकर्ता भरत भाई कंथारिया ने बताया कि "इस बार यह हिस्सा पुनर्वास के खाते में डाल देने से बुनियादी चीजों में कटौती हुई है. मतलब पुनर्वास पर अलग से पैसा खर्च करने की बजाय गरीबों के हिस्से का पैसा गरीबों को ही बांट दिया गया है."

2005-06 में सूरत की 407 झोपड़पट्टियों को हटाने के लिए बायोमेट्रिक सर्वे हुआ. उसके मुताबिक पुनर्वास के लिए जो मकान बनेगा उसमें से कुल खर्च का 50 प्रतिशत केन्द्र सरकार, 25 प्रतिशत राज्य सरकार, बाकी के 25 प्रतिशत में से जिसको मकान मिलेगा वह और सूरत महापालिका आपस में डील करेगी. अगर यह डील कामयाब रही तो भी मकान के मालिक को 5 साल तक मकान के दस्तावेज नहीं मिलेंगे. मतलब यह कि किसी के हिस्से में मकान आया भी तो वह मुफ्त में और बाईज्जत तो नहीं आने वाला.

2007 को ताप्ती नदी की धार को रोकने के लिए जब एक दीवार बनी तो इसके घेरे में सुभाषनगर की तकरीबन 800 झोपड़ियां भी आ गईं. यह दीवार सिंचाई विभाग ने खड़ी की थी इसलिए झोपड़ियां भी उसी ने तोड़ी. मगर तोड़ने का नोटिस कलेक्ट्रर ने भेजा. सूरत महापालिका के बड़े गेट पर मौजूद कन्हैया भाई बंजारा ने बताया "जब हम पुनर्वास की मांग लेकर सिंचाई-विभाग के पास गए तो बाबू लोग बोले पुनर्वास का काम हमारे दायरे में नहीं आता, कलेक्ट्रर साब शायद कुछ बता पाएं. कलेक्ट्रर साब के पास गए तो वह बोले कि मैं तो केवल मोनीटिरिंग करता हूं, सूरत महापालिका कुछ बताएगा. सूरत महापालिका ने कहा कि तोड़-फोड़ तो सिंचाई विभाग और कलेक्ट्रर की तरफ से हुआ, हम क्या बताएं? मगर जब जनता के स्वर ऊंचे हुए तो बायोमेट्रिक सर्वे करा लिया गया. इसमें भी गजब पालिटिक्स हुई. नतीजा यह है कि दर्जनों नए नाम जुड़ गए और पुराने नाम छूट गए." कन्हैया भाई बंजारा उन्हीं में से अब एक छूटा हुआ नाम बन चुके है.

सूरत के लोगों में बहु-विस्थापन की दहशत भी बढ़ रही है. जैसे कि आज मीठी खाड़ी की जिन झोपड़ियों को उखाड़ा जा रहा है, उनमें से कई ऐसी हैं जिन्हें 25 साल पहले उमरबाड़ा से उखाड़ा गया था. अन्तर बस इतना भर है कि पहले सड़क चौड़ी करने के नाम पर उखाड़ा गया था और अब फ्लाईओवर बनाने के नाम पर उखाड़ा जा रहा है.

कोसाठ, विस्थापितों की जगह से 15 से 25 किलोमीटर दूर, शहर के उत्तरी तरफ का आऊटसाइडेड और नक्शे के हिसाब से बाढ़ प्रभावित इलाका है. कौशिक भाई ने बताया "यहां बसाए जाने का विरोध सुनकर महापालिका का अफसर बड़े ठण्डे दिमाग से बोला कि तुम्हें बस्ती बनाने की बजाय ऊंची मंजिलों में रहना चाहिए. बारिश का पानी भरे भी तो दूसरी, नहीं तो तीसरी मंजिल में चढ़ जाना."

तारीखें गवाह हैं कि 2004 की बाढ़ से सूरत के 30000 लोग प्रभावित हुए थे. तब उन्हें न मंजिल नसीब हुई, न जमीन. एक साल बाद महापालिका से जगह यानी 12 गुणा 35 वर्ग फीट प्रति 2 लाख के बदले जगह माटी के दाम जैसी तो मिली लेकिन घर के बदले घर नहीं. न ही तोड़े गए लाखों के घरों और हजारों की गृहस्थियों का मुआवजा. एक साथ इनसे बिजली, पानी, नालियां, टायलेट, रास्ते, मैदान, बाजार, आंगनबाड़ी, स्कूल, राशनकार्ड, वोटरलिस्ट के नाम ऐसे छूटे कि अभी तक नहीं लौटे. उनके बगैर भी काम चल जाता, जब काम की छूट गए तो जिंदगी कैसे चले?


काम और कर्ज का रोना है
"जमीन, घर, गृहस्थी का नुकसान तो सबने देखा. मगर सबसे ज्यादा नुकसान तो बेकारी से हुआ." सूरज महापात्र यह सब बोलते हुये उदासी में डूब जाते हैं.

कोसाठ में उनकी तरह ही दर्जन भर औरत-मर्द अपने-अपने ठिकानों के बाहर खाली बैठते हैं. बातों ही बातों में मालूम पड़ा कि पहले इन्हें कतारगाम इण्डस्ट्रियल एरिया के पावरलूम्स में दिहाड़ी मजदूरी मिल जाती थी. एक दिन में 150 और महीने भर में 3500 से 4000 रूपए तो बनते ही थे. कुछ लोग मजदूरों की छोटी-छोटी जरूरतों जैसे चाय, नाश्ता या खाने-पीने के धंधों से जुड़े थे. औरतें घरेलू काम के लिए आसपास की सोसाइटियों में जातीं और महीने भर में 600 रूपए कमाती थीं. इस तरह हर घर का हाल-चाल बहुत अच्छा तो नहीं था मगर फिर भी चल तो रहा था. यहां आकर तो इनकी दुनिया ठहर ही चुकी है.

अज्जू मियां ने कहा "कतारगाम आओ-जाओ तो 40 रूपए अकेले आटो के. इसके बाद मजदूरी न मिले तो आफत. तब कारखानों के आसपास थे तो मजदूरी मिलती ही थी. अब आसपास के दूसरे लोगों को ही रख लेते हैं." यही हाल औरतों का है. घरों में काम करने से 600 रूपए मिलेगा उससे दोगुना 1200 रूपए तो अब भाड़े में जाएगा.

रक्षा बेन कहती हैं "मालकिनों से जरूरत की चीजें और उधार के पैसे तो मिलते थे. यहां तो ऊंचे ब्याज-दर पर पैसे उठाने पड़ते हैं." महीना भर पहले ही हेमंत भाई की बीबी टीबी के चलते खत्म हुईं. उन्होंने ईलाज के लिए 12 रूपए/महीने के हिसाब से 10,000 उठाए थे. एक तो आमदनी नहीं और ऊपर से कर्ज का बढ़ता बोझ. यहां हर एक कम से कम 25,000 रूपए का कर्जदार तो बना ही रहता है. इनमें से ज्यादातर ने घर बनाने के लिए कर्ज लिया था. जिसका ब्याज अब तक नहीं छूट रहा है.

राजेश भाई रिक्शा चलाते हैं. उन्होंने अधूरे खड़े घरों का इतिहास बताने के लिए 4 साल पुरानी बात छेड़ी "तब 29 दिनों तक तो ऐसे ही पड़े रहे. बीच में जोर की बारिश हुई तो सबने चंदा करके यहां एक टेंट लगवाया. कईयों ने अपने टूटे घरों की लकड़ी, पन्नी और बांस से अस्थायी घर बनाए, जो भारी बाढ़ में बह गए. मेरी 90 साल की नानी और एक पैर से कमजोर मौसी ने जो तकलीफ झेली उसे कैसे सुनाऊं और बीबी टीबी की मरीज थी, उसे बच्ची को लेकर मायके जाना पड़ा."

यहां कच्चे-पक्के आशियाने एक बार बनने के बाद खड़े नहीं रहते. हर साल की बाढ़ से टूटते, फूटते, गिरते या बहते ही हैं. इस तरह मानसून के साथ आशियाने बनाने और सामान खरीदने की जद्दोजहद जारी रहती है. इस साल भी भारी बूंदों के साथ तबाही के बादल बरसने लगे हैं.


यह एसएमसी का राज है भाई
सूरत महापालिका प्रशासन तरीके को टीना बेन के किस्से से समझते हैं. 1992 को टीना बेन 14 साल की थी, तब उन्हें घर के सामने खड़ा करके एक स्लेट पर उनका नाम और उनके परिवार वालों का नाम लिखवाकर फोटो ले लिया गया. 2005 को यानी ठीक 12 साल बाद जब वह दो बच्चों की मां बनी तो भी उन्हें 1992 की फोटो के हिसाब से घर का मुआवजा दिया गया. समय के इतने बड़े अंतराल में घर तो क्या शहर की पूरी दुनिया ही बदल जाती है. मगर नहीं बदलती है तो सूरत महापालिका की मानसिकता.

कतारगाम में किसी का घर 30 तो किसी का 60 फीट की जगह पर था. मगर कोसाठ में सभी को 12 गुणा 35 वर्ग फीट के फार्मूले से जगह बांटी गई. अब आप ही बताइए 12 गुणा 35 वर्ग फीट में कोई क्या बनाएगा, जो बनेगा उसे चाहे तो किचन कह लीजिएगा, नहीं तो टायलेट, बाथरूम, बेडरूम, हाल या गेलरी, कुछ भी कह लीजिए.

ऐसी बस्तियों में लम्बे समय से काम करने वाले अल्फ्रेड भाई ने बताया "महापालिका जिन मकानों को तोड़ने की ठान लेती है उनसे टैक्स वसूलना बंद कर देती है. जिससे टैक्स नहीं लिया जाता वह डर जाता है कि अगला नम्बर उसका भी हो सकता है."


कायदे, वायदे और हकीकत
सामाजिक कार्यकर्ता भरत भाई कंथारिया से यह मालूम हुआ कि इस दौरान संयुक्त राष्ट्र की गाईडलाईन निभानी जरूरी थी. मगर सूरत में डेमोलेशन के पहले और बाद में मानव-अधिकारों का खुला उल्लंघन आम बात हो चुकी है. जिन्हें उखाड़ना था, उनके साथ बैठकर पुनर्वास और राहत की बातें की जानी थीं.

गाईडलाईन कहती है कि विकलांग, बुजुर्ग और एसटी-एससी को उनके रोजगार के मुताबिक और पुराने झोपड़े के पास ही बसाया जाए. पीड़ित आदमी को पहले पुनर्वास वाली जगह दिखाई जाए. इसके बाद अगर वह मांग करता है तो उसे अदालत में जाने का हक भी है. इसके लिए कम से कम 90 दिनों का समय भी दिया जाए. मगर सूरत महापालिका ने तो एक भी कायदा नहीं निभाया.

जैसा कि सब जानते हैं महात्मा गांधी को 'कालेपन' की वजह से एक रात दक्षिण-अफ्रीका में चलती ट्रेन से फेंका गया था. उन्हीं महात्मा को अपना बताने वाले गुजरात के सूरत में हजारों भारतीयों को 'झोपड़पट्टी वाला' होने की वजह से 25 किलोमीटर दूर फेंका गया है. 120 साल पहले हुए अन्याय का किस्सा यहां का इतिहास नहीं वर्तमान और शायद भविष्य भी है.


कैसी पहेली जिंदगानी
राजीवनगर झोपड़पट्टी के लोग कहते हैं कि सूरत महापालिका के अफसरों की जिद के आगे सभी नतमस्तक हैं. असल में महापालिका ने इनके लिए फ्लेट बनवाएं और अब यही लोग कागजों की भूल-भुलैया में गोते खा रहे हैं. आमतौर पर ऐसी बस्तियों के लोग नहीं जानते कि एक दिन उनके घर टूटेंगे. एक दिन उनसे यहां रहने के सबूत मांगे जाएंगे. इसलिए वह कागजों को इकट्ठा नहीं कर पाते. ऐसी बस्तियों के लोग किस कागज के टुकड़े का मतलब नहीं जानते. अफसरों को जो कागज चाहिए उनमें से कुछ कागज यहां के ज्यादातर रहवासियों के पास नहीं हैं. यह रहवासी अफसरों को अपनी झुग्गी दिखाना चाहते हैं. इसके बावजूद कई लोगों को अपने झोपड़ियों का हक नहीं मिल पा रहा है. कुलमिलाकर पूरी योजना आफिस-आफिस के खेल में उलझ चुकी है.

राजीवनगर के 1200 में से सिर्फ 94 परिवार ही रहने के सबूत दिखा सकते हैं. इसलिए 1106 परिवार कोसाठ में बने फ्लेट का सपना नहीं देख सकते. यहां के रहवासियों का आरोप है कि फ्लेट आंवटन से जुड़े सर्वेक्षणों में भारी अनियमितताएं हुई हैं. कुछ बस्तियों में तीन-तीन बार सर्वेक्षण हुए हैं. कुछ बस्तियों में मुश्किल से एक बार. राजीवनगर में ज्यादातर बाहर से आए मजदूर हैं. यह सूरत में 6-8 महीनों के लिए काम करते हैं. इसके बाद यह अपने गांवों को लौट जाते हैं. इनमें से कई 15-20 सालों से यही रहते हैं. बस्ती के ऐसे ही रहवासी संतोष ठाकुर ने बताया ‘‘बिजली, पानी और संपत्ति के बिल तो मकान-मालिक के पास होते हैं. हमें स्थानीय निकायों से एक सर्टिफिकेट मिलता है. मगर अफसर उसे सबूत ही नहीं मानते. कहते हैं कोई दूसरा कागज लाओ." इसी बस्ती के रहवासी रंजन तिवारी ने बताया "हमें हमेशा काम नहीं मिलता. इसलिए काम की तलाश में सुबह जल्दी निकलना होता है. सर्वे ऐसे समय हुआ जब हम बस्ती से दूर थे. हमें कुछ मालूम ही नहीं था. इसलिए हमारे नाम सर्वे से नहीं जुड़ सके."

नगर-निगम के डिप्टी कमिशनर महेश सिंह के अनुसार "झुग्गीवासियों को फ्लेट आवंटित करने के लिए एक कमेटी बनी हुई है. अगर किसी को लगता है कि उसके सबूत जायज हैं तो कमेटी के पास जाए."

नगर-निगम में स्लम अप-ग्रेडेशन सेल के मुखिया मानते रहे हैं कि सर्वें में कई किरायेदारों के नाम छूट गए हैं. उनकी जगह मकान-मालिकों के नाम जुड़ गए हैं. मगर यह मुद्दा तो उसी समय उठाना चाहिए था.

स्लम अप-ग्रेडेशन सेल किसी भी गड़बड़ी को रोकने के लिए दो तरह से सर्वे करता है. पहला सर्वे लोकेशेन के आधार पर होता है और दूसरा नामांकन के आधार पर. इसलिए स्लम अप-ग्रेडेशन सेल यह मानता है कि अगर लोकेशन वाली सूची से किराएदार का नाम है. साथ ही उसके पास 2005 के पहले से रहने का सबूत भी है तो उसे फ्लेट मिल जाएगा. अब यह किराएदार की जिम्मेदारी है कि वह कहीं से सबूत लाए.

बस्ती के सेवाजी केवट ने कहा "मैंने 8 महीने पहले फ्लेट के लिए आवेदन भरा था. मगर अफसरों ने अभी तक चुप्पी साध रखी है. उन्होंने यह नहीं बताया कि मैं फ्लेट के योग्य हूं या नहीं हूं और नहीं हूं तो क्यों ? मैंने पार्षद को भी अपने निवास का सर्टिफिकेट और एप्लीकेशन दिया है. लेकिन मुझसे और कागजातों की मांग की जा रही है. वैसे मेरा नाम बायोमेट्रिक सर्वे से भी जुड़ा है. मगर सरकार के ही अलग-अलग सर्वे एक-दूसरे से मेल नहीं खा रहे हैं."

सवाल महज घर का नहीं है
यूं तो घर का मतलब रहने की एक जगह से होना चाहिए. मगर बाजार में बदलते शहरों के लिए वह प्रापर्टी भर है. सूरत भी इसी दौर से गुजर रहा है. यहां भी 40 प्रतिशत आबादी के विकास के लिए 60 प्रतिशत आबादी को नजरअंदाज किया जा रहा है. यहां भी पहले घर तोड़ो, फिर घर बनाओ की बात हो रही है. जबकि पहले घर बनाओ फिर घर तोड़ो की बात होनी चाहिए. दूसरी बात बस्ती के बदले बस्ती देने की है. घर के आजू-बाजू रास्ते, बत्ती, बालबाड़ी, नल और नालियों से जुड़कर एक बस्ती बनती है. उन्हें खोकर सिर्फ घर पाना नुकसानदायक है. इसलिए घर के आसपास की सुविधाओं का हक भी देना होगा.

सूरत की तरह हर शहर को जीरो स्लम बनाने का मतलब भी समझना होगा. सरकार मजदूरों से उनकी बस्तियां उजाड़ कर उन्हें बहुमंजिला इमारतों में भेजना चाहती है. इसका मतलब यह हुआ कि वह उन्हें घर के बदले घर दे रही है. मगर जमीन के बदले जमीन नहीं. वह गरीबों से छीनी इन सारी जमीनों को बिल्डरों में बांट देगी. मतलब यह कि गरीबों को फ्लेट उनकी जमीनों के बदले मिल सकता है. मतलब यह कि गरीबों को मिलने वाला फ्लेट मुफ्त का नहीं होगा. मगर बिल्डरों को तो मुफ्त में जमीन मिल जाएगी. यही वजह है कि बिल्डर केवल फ्लेट बनाने पर जोर ही देते हैं. उनके दिल और दिमाग में बालबाड़ी या स्कूल बनाने का ख्याल नहीं आता. जाहिर है खेल केवल मुनाफा कमाने भर का रह गया है.

शहर के विकास में शहरवासियों को बराबरी का हिस्सा मिलना जरूरी है. इससे नगर-निगम को शहर की समस्याएं सुलझाने में मदद मिलेगी. मगर ऐसा नहीं चलता. दूसरी तरफ शहरी इलाकों में नागरिक संगठनों का सीमित दायरा है. शहर के गरीबों की भागीदारी को उनकी आर्थिक स्थिति के कारण रोका जा रहा है. विकास में सबका हिस्सा नहीं मिलने से गरीबी का फासला बढ़ेगा. एक तरफ गरीबी हटाने की बजाय गरीबों की बस्तियां तोड़ी जा रही हैं. दूसरी तरफ उन्हें नुकसान के अनुपात में बहुत कम राहत मिल पा रही है. तीसरी तरफ मिलने वाली ऐसी राहतों को कागजी औपचारिकताओं में उलझाया जा रहा है. कुल मिलाकर चौतरफा उलझे सूरतवासियों को उम्मीद की कोई सूरत नजर नहीं आती है. आज यह घर से निकलकर काम पर जाते है. कल यह काम से लौटकर कहां जाएंगे?

क्या बदलेगी शहर की सूरत
एक सूरत को दो सूरतों में बांटा जा रहा है. शहर के भीतरी हिस्से में अमीरी के लिए साफ-सुथरा, व्यवस्थित और महंगी कारों से दौड़ता सूरत होगा. शहर के बाहरी हिस्से में अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए रात-दिन लड़ने वाले गरीबों का सूरत. जहां न लोग सुरक्षित हैं और न ही उनके काम या रहने के स्थान वगैरह. जाहिर है एक सूरत में अमीरी और गरीबी के फासले को कम करने की बात तो दूर दोनों को एक-दूसरे से बहुत दूर-दूर किया जा रहा है. पहला हिस्सा दूसरी हिस्से की मेहनत के जरिए शहर के बाजार से मुनाफा तो चाहता है. मगर बदले में उसका श्रेय और जायज पैसा नहीं देना चाहता है.

अब तक तो एक शहर का मतलब उसकी पूरी आबादी से लगाया जाता रहा है. मगर सूरत में एक छोटे तबके की तरक्की को शहर की तरक्की माना जाने लगा है और शहर का बड़ा तबका ऐसी तरक्की से तबाह हो रहा है. दरअसल इस तबके से भी तरक्की के मायने जानने थे. एक शहर को लंदन बनाने जैसी बातों की बजाय तरक्की में सबका और सबको हिस्सा देने और अमीरी-गरीबी के बीच बढ़ती खाई को भरे जाने जैसे प्रयास होने थे. मगर नागरिक सुविधाएं मुहैया कराने की जवाबदारी लेने वाली सरकार खुद को पीछे और निजी ताकतों को आगे कर रही है.

जबकि कई तजुर्बों से यह साफ हो रहा है कि निजी ताकतों का काम व्यवस्था में सुधार की आड़ में बाजार तैयार करना है. बाजार नागरिकों से नहीं उपभोक्ताओं से चलता है. जबकि गरीबों के पास अपनी उलझनों को सुलझाने के लिए न तो अधिक पैसा होता है और न ही कागजी औपचारिकताओं को निपटाने की समझ.

शहर के लिए तरक्की की संरचनाएं आम आदमी की भागीदारी से नहीं बन रही हैं और नागरिकों के संवाद और विरोध को रोका जा रहा है. 74वें संविधान संशोधन में विकेन्द्रीकरण और जनभागीदारिता का जिक्र हुआ है. इसके लिए वार्ड-सभा और क्षेत्रीय-सभाओं का उल्लेख भी मिलता है. लेकिन इसका सच देखना हो तो सूरत की सूरत देख लें.

13.5.10

शहर के भीतर कितने शहर

शिरीष खरे

आपने अली बाबा और चालीस चोर की कहानी तो देखी, पढ़ी या सुनी ही होगी। उसमें एक चोर जब अलीबाबा का घर पहचान लेता है तो उसके बाहर क्रॉस का निशान लगाकर चल देता है। अगली सुबह चालीस चोर आते हैं। मगर हर घर के आगे क्रॉस का निशान लगा रहता है। इसलिए चालीस चोर मिलकर भी एक अली बाबा का घर नहीं खोज पाते। ठीक यही कहानी इस देश के शहरों की होने वाली है। हो सकता है कि जब हम अपने शहर वापिस लौटे तो अपना ही चौराहा, मोहल्ला, या उनकी गलियां, दुकानें खोजते फिरें और हमें अपने ही यारों की महफ़िलें ना मिलें।




चाहे मुंबई हो या अहमदाबाद, सूरत हो या भोपाल। सबके मास्टर प्लॉन एक जैसे जो बन रहे हैं। इसलिए अब शहर के भीतर शहर है कि पहचान में नहीं आ रहे हैं। सबके सब शहर एक जैसे लगने लगे हैं। और आप माने चाहे ना माने मगर शहरों के रहवासियों की दशा अब दुर्दशा में बदल रही है। देश की तरक्की के केन्द्र में बड़े शहर हैं। यह शहर उत्पादन, बाजार और सम्पत्ति के केन्द्र भी हैं। यहां गांव के गरीब बेहतर काम और आमदनी की उम्मीद से आते हैं। इसलिए पूंजी की फितरत और आबादी के बोझ से शहर की सहभागी व्यवस्था के बहुत नीचे दब जाते हैं। एक शहर भी तो कई तरह की असमानताओं से भरा होता है। तो सवाल है कि क्या शहरों को बदलने के किसी मास्टर प्लॉन में भूख, गरीबी और बेकारी जैसी असमानताओं को मिटाने की कोई योजना भी शामिल है या नहीं ? अगर है तो शहरों के बदलने के साथ-साथ उसके कई हिस्सों में बड़ी तेजी से भूख, गरीबी और बेकारी क्यों जमा हो रही है ? इस तरह शहर का बड़ा भूगोल निरक्षर और बीमार क्यों दिखाई दे रहा है ? समझ क्यों नहीं आता है कि गांव की गरीबी ज्यादा उलझी है या शहर की ?

दरअसल, एक शहर के भीतर कई शहर बनते जा रहे हैं। पहले दृश्य में हमारे साफ-सुथरा, व्यवस्थित और महंगी कारों से दौड़ता शहर है। वहां के लोगों की सुरक्षित और अधिक आमदनी है। इसलिए उन्हें बेहतर सुविधाएं मिलती हैं। इसलिए उन्हें शहरी तरक्की में मददगार माना जाता है। दूसरे दृश्य में झोपड़पट्टी है। यह गंदा, तंग और भीड़ भरा शहर है। यहां न लोग ही सुरक्षित हैं, और न ही उनके काम या घर। झोपड़पट्टियों को तरक्की राह में रोड़ा समझा जाता है। सार्वजनिक जगहों पर ऐसी झोपड़पट्टियां बनती हैं इसलिए शहर के कई जगहों पर अलग-अलग कानून और विकास योजनाएं चलती हैं। यहां के रहवासियों की मेहनत से शहर का बाजार मुनाफा लेता है। बदले में उसका श्रेय और जायज पैसा नहीं देता। इससे शहरी गरीबी सुधरने की बजाय बिगड़ती है। एक शहर में शोषण के कई दृश्य उभरते हैं। शहरी गरीबी के पीछे- 1. गरीबों की समस्याएं और 2. सरकारी विफलताएं घुली-मिली हैं। गरीबों को 'काम' और 'घर' की तलाश रहती है। देश में असंगठित क्षेत्र से 93 फीसदी मजदूर जुड़े हैं। दूसरी तरफ औपचारिक अर्थव्यवस्था में कम हिस्सेदारी से गरीबी, योग्यता और रचनात्मकता पर बुरा असर पड़ता है। इससे औपचारिक अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी नहीं होती और बेकारी बढ़ती है। इसलिए देश के 5 करोड़ से भी अधिक लोग झोपड़पट्टी में रहते हैं। यह आर्थिक, कानूनी और सामाजिक सुरक्षाओं से दूर हैं। नतीजतन, पूरा भार शासन पर पड़ता है। क्योंकि ऐसी झोपड़पट्टियां गैरकानूनी कहलाती हैं इसलिए यहां नल और गटर की व्यवस्थाएं नहीं होतीं। यहां तक सार्वजनिक संसाधन और सेवाएं भी नहीं पहुंचतीं। इससे गरीब और अधिक असहाय तथा बीमार होते हैं। आखिरकार, गरीबों की बड़ी तादाद गरीबी के दायरे से बाहर नहीं आ पाती। शहरी गरीब शहर में रहकर भी उससे दूर रहता है। यह छोटी झुग्गी, फुटपाथ या रेल्वे पटरियों के किनारे होता है। शहरी ताकतों का गठजोड़ उसे एक तरफ धकेलता है। इस ढंग से उसका स्थान, काम और हक नजरअंदाज बनाया जाता है। यहां तक कि उसकी गतिविधियां भी संदेह के घेरे में रहती हैं। शहरी गरीबी मिटाने वाले भी कभी शहरी विकास तो कभी खूबसूरती के नाम पर चुप्पी को गहरा बनाया जाता है। इस तरह गरीबी की बजाय गरीबों को उखाड़ने की कार्रवाई सहज और शांतिपूर्ण ढंग से चलती है।

सरकार की विफलता को तीन तरह से उजागर होती है। 1-जमीन की कमी 2-सब्सिडी में कमी और 3- संसाधनों में कमी। मुंबई के उदहारण से अगर हम देखें  तो जैसा कि सब जानते हैं कि मुंबई में जमीन बहुत कम और महंगी हैं। यहां कुल बस्ती का 60 फीसदी हिस्सा झोपड़पट्टी का है। मगर यह शहर की सिर्फ 14 फीसदी जमीन पर बसा है। सरकार के मुताबिक हर आदमी के लिए 5 वर्ग मीटर और हर परिवार के लिए 25 वर्ग मीटर जमीन होनी चाहिए। मतलब शहर के गरीब कम जमीन और ढेर सारी परेशानियों के साथ रहता है। इससे उनका काम या धंधा प्रभावित होता है। नागरिक सुविधाएं मुहैया कराने के लिए सरकार चुनी जाती है। मगर इस लिहाज से कई तजुर्बों से अब यह साफ हो गया है कि वह खुद को पीछे और निजी ताकतों को आगे कर रही है। दुनिया भर के कई तजुर्बों से यह साफ हुआ है कि निजी ताकतों का काम व्यवस्था में सुधार की आड़ में बाजार तैयार करना होता है। बाजार नागरिकों से नहीं उपभोक्ताओं से चलता है। गरीबों के पास अपनी उलझनों को सुलझाने के लिए न तो अधिक पैसा होता है और न ही तकनीकी सूझ या समझ। तकनीकी सूझ या समझ का मतलब यहां खास तौर से कागजी औपचारिकताओं से है। शहर के लिए तरक्की के मॉडल आम आदमी की भागीदारी से नहीं बनते। इन दिनों वैश्विक ताकतों की सलाह को अहम् माना जा रहा है, लेकिन नागरिकों के 'संवाद' और 'विरोध' को रोका जा रहा है। गरीबी कम करने के लिए सभी लोगों को आजादी और बराबरी से जीने का मौका देना चाहिए। 74 वें संविधान संशोधन में विकेन्द्रीकरण और जनभागीदारिता का जिक्र हुआ है। इसके लिए वार्ड-सभा और क्षेत्रीय-सभाओं के उल्लेख भी हुए हैं। मगर असलियत में शहरी विकास की मौजूदा योजनाओं में जनता की सीधी भागीदारिता न के बराबर है।

किसी शहर को 'लंदन', 'न्यूयॉर्क' या 'संघाई' बनाने की बातों भर से वहां का नजारा नहीं बदल जाएगा। इसके लिए तरक्की में सबका और सबको हिस्सा देना होगा। इसके बिना अमीरी-गरीबी के बीच की खाई नहीं भरी जा सकती। एक शहर का मतलब उसकी पूरी आबादी से है। इसमें एक छोटे तबके की तरक्की को शहर की तरक्की मान लिया जाता है। लेकिन शहर का बड़ा तबका ऐसी तरक्की से बर्बाद होता है। इस तबके से भी तरक्की की धारणाएं जाननी होगी। यह केवल घर बचाने और बनाने की बात नहीं हैं बल्कि बजट, कारोबार और प्रावधानों में शामिल होने की बात भी है।

- - - -

संपर्क : shirish2410@gmail.com

22.4.10

विश्व बैंक को इधर से देखिए

शिरीष खरे

विश्व बैंक की शर्तो के तहत गरीबी हटाने के नाम पर किए गए ढांचागत समायोजन कार्यक्रमों के परिणाम अब सर्वत्र दिखाई देने लगे हैं। भारत विश्व बैंक के 4 सर्वाधिक बड़े कर्जदारों में शामिल है। नव-उपनिवेशवादी नीतियों के कारण देश की 65 प्रतिशत आबादी का भरण-पोषण करने वाला कृषि क्षेत्र आज दयनीय हालत में है। हरित क्रांति की आत्ममुग्धता के बावजूद खाद्यान्न आत्मनिर्भरता लगातार कम हो रही है। विदेशी मुद्रा भण्डार का बड़ी मात्रा में उपयोग अनाज, दलहन और खाद्य तेलों के आयात में हो रहा है। निजी कंपनियों को खुली छूट देने से किसानों के लिए कृषि क्षेत्र घाटे का सौदा बनता जा रहा है। फुटकर बाजार में निजी क्षेत्र के प्रवेश ने छोटे-मोटे धंधों से रोजी कमाने वालों को बेकार कर दिया है। रियल एस्टेट में पैदा की गई बूम से आम आदमी के सिर पर छत भी सपना बन कर रह गई है। कुल मिलाकर, बड़े पैमाने पर लोगों को जमीन और रोजगार से बेदखल किया जा रहा है। एक लाख से अधिक अरबपतियों वाले देश में 30 करोड़ लोग दिन में 20 रूपये भी नहीं कमा पाते हैं।

वैसे तो विश्व बैंक का घोषित लक्ष्य दूसरे विश्व युद्ध से जर्जर देशों में ढांचागत सुविधाएं उपलब्ध करवाकर वहां का जीवन स्तर सुधारना था, लेकिन अब यह अपने बड़े निवेशक देशों जैसे अमेरिका, इंग्लैंड, जापान, जर्मनी और फ्रांस की निजी कंपनियों का हितसाधक बन गया है। ढांचागत समायोजन कार्यक्रम ने विश्व बैंक का काम बढ़ा दिया है। इसलिए उसने तीसरी दुनिया के देशों को अपने बाहुपाश में जकड़ने के लिए अंतर्राष्ट्रीय विकास संगठन, अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगमक, बहुपक्षीय निवेश गारंटी एजेंसी जैसी संस्थाएं गठित कर ली है। केवल इतना ही नहीं, उसने `अंतर्राष्ट्रीय निवेश विवाद निराकरण' नाम से अपना अलग न्यायालय भी बना लिया है, जहां देशों और कंपनियों के मध्य गुप्त् रूप से विवाद सुलझाए जाते हैं। जानकारी के मुताबिक, इन दिनों विश्व बैंक लगभग 90 देशों की अर्थव्यवस्थाओं को वहां के राजनीतिक और व्यावसायिक संपन्न वर्ग के सहयोग से काबू में करने में जुटा हुआ है।

अनुभव बताते हैं कि एक बार कोई गरीब देश विश्व बैंक समूह के जाल में फंस जाता है तो उसकी हालत बद से बदतर होती जाती है। मेक्सिको, अर्जेटाईना जैसे लातिनी अमेरिकी देश इसके उदाहरण है, जो अब इससे छुटकारा पाने के लिए कोशिशें कर रहे हैं । विश्व बैंक देश की नीति निर्धारण प्रक्रिया में अंदर तक घुस चुका है। भारत और विश्व बैंक के अधिकारियों की आपस में अदलाबदली आम है। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के अनुसार, विश्व बैंक में नौकरी कर चुके लोगों को देश में अत्यंत संवेदनशील और उच्च् पदों पर बैठाया जाता रहा है। पिछले वर्ष तो योजना आयोग में भी विदेशी फर्मो को अधिकृत रूप से सलाहकार बना दिया गया था। कहने के लिए तो विश्व बैंक खुलेपन का हिमायती है लेकिन व्यवहार में उसका चेहरा ऐसा नहीं है। सारे देश में लागू `सूचना का अधिकार कानून' भी विश्व बैंक की मजबूत चारदिवारी के सामने बेदम है। सामाजिक सरोकारों से उसका कोई इत्तेफाक नहीं रहा है। अपनी नीतियों के नकारात्मक परिणामों पर वह जनमत की उपेक्षा करता है। सन् 2002 में प्रकाशित `विश्व बांध आयोग' की रिपोर्ट को खारिज करते हुए उसने बड़े बांधो के लिए कर्ज देना जारी रखा है। भारत में निर्माणाधीन और प्रस्तावित कुछ बांधों में तो विश्व बैंक का वित्तपोषण है। लेकिन उसने आगे भी समर्थन का संकेत दिया है।

विश्व बैंक जिस तरह से देश की नीतियों को प्रभावित कर रहा है उससे आम आदमी का जीवन कष्टमय होता जा रहा है। विश्व बैंक की नीतियों से पीड़ित समाज के विभिन्न वर्गो ने विश्व बैंक को उसकी जनविरोधी नीतियों के प्रति खबरदार किया है। सितंबर 2007 को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर में विश्व बैंक के कामकाज को लेकर स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण (आईपीटी) की सुनवाई हुई थी। इसमें देश के विभिन्न स्थानों से आये प्रभावित समुदायों, लोक संगठनों के प्रतिनिधियों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों आदि ने हिस्सा लिया। इस दौरान विश्व बैंक की कार्यशैली पर प्रकाश डालते हुए 100 से अधिक वक्ताओं ने इसका इतिहास, मान्यता, एजेन्डा, भूमिका, अर्थव्यवस्था और राष्ट्र की संप्रभुता में हस्तक्षेप आदि के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, ऊर्जा, कृषि, वन, खनन, पर्यावरण, आवास, खाद्य-सुरक्षा, गरीबी और मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर अपने विश्लेषण प्रस्तुत किए। इस स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण का आयोजन विश्व बैंक समूह द्वारा वित्तपोषित परियोजनाओं पर निगरानी रखने के लिए किया गया था। इसे विश्व बैंक की नीतियों के प्रति बढ़ने प्रतिरोध के रूप में देखा जाना चाहिए। विश्व बैंक द्वारा न्यायाधिकरण के निष्कर्मो पर जवाब देना यह सिद्ध करता है कि जनआक्रोश की अवहेलना अब उसके लिए आसान नहीं है। उम्मीद करते हैं कि अब देश के प्रभावित समुदाय और बुद्धिजीवी विश्व बैंक की नीतियों पर लगाम लगाने की दिशा में लगातार प्रयासरत रहेंगे।

- - - -

संपर्क : shirish2410@gmail.com

6.4.10

पानी की कालाबाजारी में अतराई मुम्बई

शिरीष खरे

मुंबई/ मुम्बईकरों को पानी की परेशानी के बीच सूचना के अधिकार से एक हैरतअंगेज सूचना निकली है कि बृहन्मुम्बई महानगर पालिका द्वारा कम से कम 18 पानी कंपनियों को उनकी मुनाफाखोरी के लिए लाखों लीटर पानी दिया जा रहा है। एक तरफ जहां शहर के रहवासियों के सामने पानी का घनघोर संकट छाया हुआ है वहीं दूसरी तरफ इन 18 कंपनियों को हर रोज 8,10,000 लीटर पानी दिया जा रहा है और बदले में उनसे पूरे साल भर के लिए सिर्फ 1 करोड़ 55 लाख रूपए लिए जा रहे हैं। जबकि इतने पानी में करीब 8,000 से ज्यादा रहवासियों की पानी की जरूरत पूरी की जा सकती है। मगर ऐसा न करते हुए पानी कंपनियों को 1,000 लीटर पानी सिर्फ 40 रूपए के हिसाब से दिया जा रहा है। इसके बाद यह कंपनियां 1 लीटर पानी को 40 रूपए तक बेचकर भारी मुनाफा कमा रही हैं।

'घर बचाओ घर बनाओ आन्दोलन ' ने सूचना के अधिकार के मार्फत जो दूसरी सूचना निकाली है वह यह कि मुंबई में ऐसे कई पानी उपभोक्ता है जो पानी का इस्तेमाल तो कर रहे हैं मगर बिल जमा नहीं कर रहे हैं। ऐसे पेण्डिंग बिल का जोड़ 700 करोड़ रूपए से ज्यादा बन रहा है।

'घर बचाओ घर बनाओ आन्दोलन ' के सिम्प्रीत सिंह ने बताया है कि "बीएमसी कानून 1988 की कलम 61बी के मुताबिक सभी नागरिकों के लिए पानी का इन्तजाम करना महापालिका की जिम्मेदारी है मगर यह बड़े खेद ही बात है कि वह खुद ही हजारों नागरिकों को पीने का पानी देने की बजाय कंपनियों को मुनाफाखोरी के लिए पानी सप्लाई करता है।" बातचीत के दौरान सिम्प्रीत सिंह ने बताया कि "इस देश का संविधान और सुप्रीम कोर्ट तक यह कह रहा है कि हर नागरिक को जीने के अधिकार के भीतर स्वच्छ पानी का अधिकार भी दिया गया है। इसके बावजूद बीएमसी ने 01.01.1995 की कट आफ डेट लगाते हुए कई नागरिकों को पानी से वंचित रखा है। भला अमीर और गरीब के बीच ऐसे दोहरे मापदण्ड क्यों अपनाए जा रहे हैं ?"

देखा जाए तो खासतौर से मुम्बई की झोपड़ियों में रहने वाली महिलाओं को पानी हासिल करना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है। यह महिलाएं पानी के लिए हर रोज 2 से 3 घण्टे बिताती हैं और कई बार तो वह 2 से 3 किलोमीटर पैदल भी चलती हैं। फिर भी बीएमसी द्वारा एक तो कंपनियों के फायदे के लिए पानी देना और दूसरा करोड़ों रूपए बकाया होते हुए भी पानी की सप्लाई बन्द न करना बताता है मुंबई का पानी कालाबाजार में किस हद तक डूबा है।

- - - -

संपर्क : shirish2410@gmail.com  

4.11.09

शिव के राज में विस्थापितों पर गिरी गाज

शिरीष खरे

खण्डवा। नर्मदा बचाओ आंदोलन के गैरकानूनी दमन के विरोध में अनिश्चितकालीन धरना और क्रमिक अनशन को देशव्यापी समर्थन मिलते देख पुलिस ने अचानक भारतीय दण्ड विधान की धारा 333 के तहत एक और केस दर्ज किया है। इसके बाद आंदोलन की तरफ से जारी प्रेस रिलीज में कहा गया है कि न्यायालय के आदेशों का पालन करने की मांग करने वालों के साथ-साथ संघर्षरत किसान-आदिवासियों पर प्रशासनिक कहर दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। पुलिस नए-नए केसों में उन्हें इस तरह से उलझा रही है कि न्यायालय के आदेशों की मांग करने वाले घबराकर दब जाएं। पुलिस और प्रशासन का यह कृत्य कानून का शासन स्थापित करने में बाधक है। इससे न केवल लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है बल्कि लोकत्रांतिक मूल्यों में आम जनता की आस्था को भी क्षरित करने का दुष्प्रयास किया जा रहा है। प्रशासन की इस मनोवृति के खिलाफ आंदोलन अपना झण्डा बुलंद करेगा।


दूसरी तरफ प्रशासन के इस गैरकानूनी रवैए के विरोध में कई और जगहों से लगातार प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं। जनपहल की तरफ से भोपाल में कई कार्यकर्ताओं ने ‘राज्य मानवाधिकार आयोग’ से दोबारा मुलाकात की और प्रशासन के गैरकानूनी दमन से जुड़े ताजा सबूत पेश किए। आयोग ने इसे गंभीर मानते हुए कहा है कि जिला प्रशासन बुधवार को दी जाने वाली रिपोर्ट में अपनी स्थिति साफ करने वाला है, इसके बाद ही कार्यवाही तय की जाएगी। इंदौर में 50 से अधिक आंदोलन सर्मथकों के एक प्रतिनिधिमण्डल ने कमिशनर से मिलकर खण्डवा जिला प्रशासन की इस दमनकारी नीति का विरोध किया है। प्रतिनिधिमण्डल में वरिष्ठ शिक्षाविद प्रोफेसर आर डी प्रसाद, साहित्यकार सरोज कुमार, संस्कृतिकर्मी चिन्मय मिश्र, शिल्पी केन्द्र के अमूल्य निधि, झुग्गी बस्ती संघर्ष मोर्चा के राकेश चांदोरे ने इस घटना को प्रभावितों के नीतिगत अधिकारों का हनन बताया है। उधर छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा ने दुर्ग में मशाल रैली करने का फैसला लिया है।


हरदा में नारायण टाकीज चौक पर समाजवादी जन परिषद और क्रांति हम्माल जन यूनियन ने आंदोलन के समर्थन में धरनाप्रदर्शन किया। इस दौरान सजप के महामंत्री सुनील ने उच्च न्यायालय के आदेशों के पालन की मांग करने वाले आंदोलनकारियों को हिरासत में लिए जाने को न्यायालय की अवमानना बताया है। बड़वानी में जागृत दलित आदिवासी संगठन ने जिला कलेक्टर को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन देकर आंदोलन का समर्थन किया। इधर खण्डवा में धरनास्थल पर मेधा पाटकर सहित आंदोलन के हजारों कार्यकर्ताओं और समर्थकों की मौजूदगी में कार्यक्रम जारी हैं।

2.11.09

सरकार जो गैरकानूनी हथकण्डे अपना रही है

शिरीष खरे

खण्डवा। यहां से दो खबरें हैं, पहली वो जो यहां की नहीं है और यहां सबको पता है कि सरकार ने हिंसक-गैरकानूनी हथकण्डे अपनाने वाली माओवादी ताकतों को कुचलने की ठानी है। दूसरी खबर वो जो यहां की है और यहां से बाहर अभी बहुत कम लोगों को पता है कि सरकार खुद हिंसक-गैरकानूनी हथकण्डे अपना रही है, इस तरह वह शांतिपूर्ण तरीके से विरोध जताने वाले नर्मदा घाटी के डूब प्रभावितों के विरोध को दबा देना चाहती है। यह और बात है कि पुलिस द्वारा नर्मदा बचाओ आंदोलन कार्यालय पर गैरकानूनी कब्जा किये जाने और दर्जनों बड़े कार्यकताओं को बगैर वारंट हिरासत में लिए जाने के बाद उठे विरोध को अब देश भर से समर्थन मिलने लगा है।

एक नजर में :

  • पिछली 30 अक्टूबर को पुलिस ने नर्मदा बचाओ आंदोलन, खण्डवा कार्यालय पर गैरकानूनी तरीके से कब्जा किया और आलोक अग्रवाल सहित कई बड़े कार्यकर्ताओं को बगैर वारण्ट हिरासत में लिया।


  • अगले रोज विद्युत विभाग की जांच के नाम पर आंदोलन के कार्यालय को फिर से निशाना बनाया गया। विद्युत विभाग के कर्मचारियों की बजाय पुलिस वाले बिल लेकर पहुंचे।


  • चित्तरुपा पालित और रामकुंवर ने कार्यालय पर गैरकानूनी कब्जे के खिलाफ जेल के भीतर अनिश्चितकालीन अनशन शुरू कर दिया। इसके समर्थन में महेश्वर, अपरवेदा और ओंकारेश्वर बांध के हजारों प्रभावितों का भी अनिश्चितकालीन धरना और क्रमिक अनशन शुरू हो गया।


  • बरगी बांध से प्रभावित धरने में शामिल हुए। इसके अलावा बड़वानी, हरदा, भोपाल, इंदौर, जबलपुर आदि जगहों पर आंदोलन के समर्थन में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए।


  • मेधा पाटकर के नेतृव्य में एक प्रतिनिधि मण्डल कलेक्टर से मिला। उन्होंने आंदोलनकारियों में लगाये गए झूठे मामलों को तुरंत वापिस लेने की मांग की।


  • राज्य मानवाधिकार आयोग ने जिला कलेक्ट्रर और पुलिस अधीक्षक को नोटिस भेजकर 3 दिनों में घटना की रिपोर्ट मांगी।

मामला यही थमता नजर नहीं आ रहा है बल्कि आंदोलन के समर्थन में अब शहर से लेकर देशभर के कई जन संगठन और नागरिक समूह भी सामने आ रहे हैं। रिटायर कर्नल वोम्बेटकेरे ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर पुलिस की असंवैधानिक कार्यवाही के बारे में बताया है। दूसरी जगहों से कई समुदायों ने सरकार से उच्च न्यायालय के आदेशों के तहत विस्थापितों को खेती की जमीन और अन्य पुनर्वास लाभ दिए जाने की वकालत की है।

इस सबंध में वरिष्ठ गांधीवादी विचारक सुश्री राधा भट्ट और उत्तराखण्ड नदी बचाओ अभियान के बसंत पाण्डे ने भी मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कार्यकताओं की रिहाई के लिए मांग की है। पीपुल्स यूनियन आफ डेमोक्रेटिक राईटस ने अपनी प्रेस रिलीज में आंदोलन के प्रति एकजुटता जाहिर की है। साथ ही एक आनलाइन पेटिशन में दुनियाभर से अबतक 500 से ज्यादा लोगों और समूहों ने दस्तखत करके बांध प्रभावितों के दमन पर आपत्ति दर्ज की है। वहीं एशियन मानवाधिकार आयोग ने भी घटना की निंदा करते हुए एक्शन एलर्ट जारी किया है।

खंडवा में धरनास्थल पर बैठे कई आंदोलनकारी यह मानते हैं कि सरकारी मशीनरी अभी भी अपनी सारी ताकत उच्च न्यायालय के आदेशों को मानने की बजाय विस्थापितों के संघर्ष को दबाने में खर्च कर रही है। आंदोलन कार्यालय को निशाना बनाया जाना प्रशासन का एक नया और गैरकानूनी हथकण्डा है। इसी के चलते पुलिस ने आंदोलन कार्यालय को गैरकानूनी ढ़ंग से अपने नियंत्रण में लिया और वरिष्ठ कार्यकर्ता आलोक अग्रवाल को बगैर वारण्ट गिरफ्तार भी किया। पुलिस ने आलोक अग्रवाल की गिरफ्तार को लेकर गुमराह भी किया। एक तरफ लोगों को बताया गया कि उन्हें पूछताछ के लिए लाया गया है दूसरी तरफ वकील से कहा गया कि उन्हें पुराने मामले में गिरफ्तार किया गया है।
जिला प्रशासन के इशारे पर विद्युत विभाग ने जिस तरीके से कार्यालय की जांच की उसे लेकर भी आंदोलनकारी गुस्से में हैं। जांच के बाद विद्युत विभाग ने आंदोलन कार्यालय को व्यवसायिक स्थल बताते हुए 15149 रुपए का अतिरिक्त बिल जारी कर दिया। बिल पहुंचाने विद्युत विभाग के कर्मचारियों की बजाय पुलिसकर्मी आए। आंदोलनकारी बताते हैं कि कार्यालय में बांध प्रभावितों के संवैधानिक अधिकार, कानूनी और लोकत्रांतिक तरीकों के संरक्षण से जुड़ा दस्तावेजीकरण होता है। यह तो किसी तरह की व्यवसायिक गतिविधि नहीं है। विद्युत विभाग तो पहले भी परेशान करता रहा है। वह तो कई बार ताला लगा होने की झूठी बात लिखकर ज्यादा बिल वसूलता रहा है जबकि विद्युत मीटर तो खुले वराण्डे में ही लगा हुआ है। आंदोलन अब इसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की भी सोच रहा है।
विस्थापितों के साथ धोखे पर धोखा

नर्मदा घाटी में बन रहे इंदिरा सागर और ओंकारेश्वर बांध के हज़ारों विस्थापितों को जमीन के बदले जमीन, वयस्क पुत्रों को जमीन और सभी को पुनर्वास की अन्य सुविधाएं देकर बसाना था। मगर इस नीति का खुला उल्लंघन करते हुए विस्थापितों को धोखे एवं दमन के आधार पर ही उज़ाडा गया है। इतना ही नहीं विस्थापितों के हक में दिये गये सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय के फैसलों पर भी अमल नही किया जा रहा है। प्रदेश और देश के विकास के नाम पर त्याग करने वाले लाखों विस्थापित आज दर दर की ठोकरें खाने पर मजबूर है जबकि दूसरी तरफ बांध बनाने वाली कम्पनी एनएचडीसी ने बीते 4 सालों में 1200 करोड़ रूपए से ज्यादा शुद्ध मुनाफा कमाया है।

इंदिरा सागर और ओंकारेश्वर बांध के हजारों विस्थापितों की माँग हैं कि :

इंदिरा सागर परियोजना में :

1. मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने नर्मदा बचाओ आंदोलन द्वारा दायर याचिका में पहले 8 सितम्बर 2006 और फिर 2 सितम्बर 2009 को यह आदेश दिया है कि किसानों के सभी वयस्क पुत्र और अविवाहित पुत्रियों को 5.5 एकड़ कृषि जमीन दी जाए। इसका पालन किया जाए।

2. विस्थापित मज़दूर परिवारों को डूब से खुलने वाली जमीन बांटी जाए और उन्हें सिंचाई की सुविधा दी जाए। जिससे वह पानी खुलने पर हर साल गेहूं और गर्मी की फसल ले सकें। इस तरह विस्थापित मजदूर परिवार भी इज्जत से रोजगार पा सकें।

3. इंदिरा सागर डूब क्षेत्र में विस्थापित मछुआरों के साथ गुंडागर्दी एवं मारपीट की जा रही हैं। इसे तत्काल रोका जाए और इंदिरा सागर में मछली मारने का अधिकार ठेकेदार को नहीं, विस्थापित को दिया जाए।

4. खेतीयोग्य जमीनों पर एनएचडीसी ने मामूली मुआवजा देकर कब्जा कर लिया है। इससे प्रभावित किसान दोबारा जमीन नहीं खरीद सके हैं। इसलिए जमीन के लिए दी जाने वाले विशेष पुनर्वास अनुदान (बढ़त राशि) को हरदा कमाण्ड के अच्छी दर 1.5 से 2 लाख रूपए एकड़ के हिसाब से दिया जाए।

5. अभी भी डूब क्षेत्र में छूटे हुए हजारों घर, जो मुआवजे से छूटे हैं, उनका भू-अर्जन करके मुआवजा दिया जाए।

6. जहां जमीन डूब चुकी है और अब जीने का कोई जरिया बचा ही नही है, उन गांवों के सभी घरों का भू-अर्जन करके विस्थापितों को मुआवजा और पुनर्वास दिया जाए।

7. इंदिरा सागर डूब क्षेत्र खासकर हरदा जिले में भयावह भ्रष्टाचार फैला है। प्रभावितों के अनुदान दलालों द्वारा अधिकारियों की मिलीभगत से निकाले जा रहे हैं। इस पर रोक लगाई जाए और स्वतंत्र जांच कर दोषियो को दण्डित किया जाए।

8. सभी पुनर्वास स्थलों पर विस्थापितों के लिए पूर्ण रोज़गार दिया जाए। उनके लिए बीपीएल राशन कार्ड बनाए जाएं और पुनर्वास स्थल पर स्कूल, अस्पताल, पेयजल आदि सभी सुविधाएं दी जाएं।

9. बहुत से गांवों में अभी तक परिवार सूची ही नही बनी है और वह पुनर्वास के समस्त लाभों से वंचित हैं, उन गांवों की परिवार सूचियां बनाकर, सभी विस्थापितों को पुनर्वास के लाभ दिये जाएं।

10. इंदिरा सागर के डूब में आने वाले छूटे हुए गांव का सर्वे करके परिवारों को मुआवजा और पुनर्वास दिया जाए।

11. 25 प्रातिशत से कम बची जमीन के भू-अर्जन के साथ परिसम्पत्तियों का भी अर्जन किया जाए।

12. जहां घर डूब हैं और जमीने बची हैं वहां 1 किलोमीटर के अंदर पुनर्वास स्थल का निमार्ण किया जाएं।

13. इंदिरा सागर बांध स्थल पर जल स्तर सूचित करने वाला स्केल मिटा दिया गया है, जो कि अत्यंत गंभीर है। बांध का जल स्तर बताने वाला सार्वजनिक स्केल फिर से लिखा जाए।

ओंकारेश्वर परियोजना में :

1. उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुसार विस्थापितों को सिंचित एवं उपजाऊ जमीन देकर बसाया जाए।

2. विस्थापितों को जमीन आवंटन के लिये अतिक्रमित जमीनों को न दिया जाए, जिससे अन्य गरीब परिवारों की रोटी न छिने और विस्थापित की सुरक्षित बसाहट हो सके।

3. उच्च न्यायालय की तारीख 23 सितम्बर 2009 और अन्य सभी आदेशों का तत्काल पालन किया जाए।

4. न्यायालयीन आदेश तथा पुनर्वास नीति के अनुसार कमाण्ड एरिया में विस्थापितों की इच्छा अनुसार घर प्लाट दिये जाएं।

5. छूटे हुए मकानों का भू-अर्जन किया जाए।

6. किसानों को अपर्याप्त मुट्ठी भर मुआवजा दिया गया है। कृषि जमीन का विशेष पुनर्वास अनुदान (बढ़त राशि) कम से कम 1.5 से 2 लाख रूपए एकड़ दिया जाए।

7. तालाब में मछली ठेकेदार को नहीं दी जाए। मछली मारने का सम्पूर्ण अधिकार विस्थापित को दिया जाए।

8. पुनर्वास के लाभों से वंचित सभी परिवारों को घर प्लाॅट, अनुदान व समस्त लाभ दिया जाए।

9. सन् 2004 में धाराजी प्रकरण में सैकड़ो लोगों को एनएचडीसी द्वारा पानी छोड़ने से बह जाना तथा पिछले महीने ग्राम कामनखेड़ा में नन्ही हरिजन बालिका का एनएचडीसी द्वारा पानी बढ़ाने से मौत के लिए जिम्मेदार एनएचडीसी को दण्डित किया जाए।

26.9.09

हीरे की मण्डी में हारती जिन्दगी

शिरीष खरे, सूरत से लौटकर


मंदी की उठा-पटक के बीच सूरत का चेहरा भले कई लोगों के लिए अब भी चमकदार लग रहा हो लेकिन इस चमक के पीछे एक ऐसा अंधेरा फैलता जा रहा है, जिसमें जिंदगी हारती जा रही है. मंदी के तूफान ने हीरे की मण्डी सूरत की सूरत कुछ ऐसी बिगाड़ी कि पिछली दीवाली से इस जुलाई के पहले हफ्ते तक हीरा-कारखाने के 39 मजदूरों ने अपनी जान दे दी. हालांकि गैरसरकारी आकड़ों में यह संख्या 90 के पार ठहरती है.

मंदी के तूफान ने हीरे की मण्डी सूरत की सूरत कुछ ऐसी बिगाड़ी कि दीवाली से जुलाई के पहले हफ्ते तक हीरा-कारखाने के 39 मजदूरों ने अपनी जान दे दी. हालांकि गैरसरकारी आकड़ों में यह संख्या 90 के पार ठहरती है.

पिछले कुछ समय में गुजरात के सबसे चमकदार शहर सूरत में हीरे की 10,000 से ज्यादा यूनिट बंद हुई, जिससे आठ लाख से ज्यादा मजदूर बेकार हो गए. पिछले साल नंवबर-दिसम्बर के दो महीनों में ही कम से कम एक लाख मजदूर शहर छोड़ चुके थे. आज की तारीख में यह आंकड़ा चार लाख के बाहर पहुंच चुका है और मज़दूरों के पलायन का यह सिलसिला अब तक जारी है. जनवरी के पहले हफ्ते में ही 5 इलाकों से स्कूलों के 4,500 बच्चों को फीस न भरने के चलते निकाला जा चुका था.

कायदे से सूरत का यह हाल एक 'राष्ट्रीय मुद्दा' होना चाहिए लेकिन राज्य के सारे राजनैतिक दल इन दिनों खामोश हैं. लोकसभा-चुनाव की लहर जा चुकी है, अब सिर पर सूरत-कारर्पोरेशन का चुनाव है. फिर भी हीरा-कारखाने के मजदूरों को राहत देने के सवाल पर हर तरफ सन्नाटा है.

एक नजर सूरत की सूरत पर

सूरत में हीरे की छोटी-बड़ी कुल 14,310 यूनिट हैं, जिसमें से 10,017 याने 70 फीसदी बंद हो चुकी हैं. सभी 14,310 यूनिट में 9,70,000 मजदूर काम करते थे, जिसमें से करीब 8,000000 याने 80 फीसदी से भी ज्यादा बेकार हो चुके हैं. बाकी बचे मजदूरों को अगर काम मिलता भी है तो उनके महीने की आमदनी (12,000) से आधी से आधी से आधी (15,00) हो गई है.


जमीनी पड़ताल के लिए एक छोटे-सा सर्वे देखते हैं. शहर के वारछा रोड़ पर हीरे की 2,59 यूनिट में से 80 के दरवाजे बंद हो चुके हैं. यहां की 1 यूनिट में औसतन 63 मजदूर थे, इस लिहाज से जोड़े तो 5,040 से ज्यादा मजदूरों के हाथों से मजदूरी निकली है. इसी तरह कापोदरा विस्तार की 5,97 यूनिट में से 2,43 में काम बंद है. यहां की 1 यूनिट से औसतन 75 मजदूर थे, यहां भी 18,225 से ज्यादा मजदूर बेकार हुए. यह ऐसी छोटी-छोटी यूनिट थीं जिनके पास अब कच्चा हीरा खरीदने के लिए पैसा नहीं बचा है.


श्यामधाम चौकड़ी, देवीकृपा सोसायटी के सूरज पटेरिया का यह 36 वां साल चल रहा था. गए साल तक उन्होंने खुदखुशी करने के बारे में सोचा भी नहीं होगा. लेकिन दीवाली के बाद सूरज ने दो बार जहर पीकर मरना चाहा. दोनों बार उन्हें पड़ोसियों ने बचा लिया.

एक तो भूख, ऊपर से अपने ही इलाज के खर्च ने उन्हें दिमागी तौर से भी लाचार बना दिया. तीसरी बार उन्होंने अपने को जलाकर खुदखुशी कर ली. अब उनके पीछे उनकी पत्नी अंजू बेन और चौथी में पढ़ने वाला लड़का राहुल है. इन दोनों को अपने आने वाले कल के बारे में कुछ खबर नहीं. अंजू बेन और राहुल केवल नाम भर हैं, सूरज में तो ऐसे परिवारों की एक लंबी सूची हैं, जिसमें नए-नए नाम जुड़ते जा रहे हैं.

सूरत-ए-हाल

देश के हीरा निर्यात में सूरत की हिस्सेदारी 24 अरब डालर के आसपास है. दीवाली के पहले अफ्रीका के एटेन्पर्व से काले पत्थर सूरत के कारखानों में आते थे. ऐसे पत्थरों को सूरत के 'रत्न कलाकार' कहे जाने वाले मजदूर तरासते और चमकदार हीरे में बदल देते.

लेकिन मंदी के मारे बीते अक्टूबर से एटेन्पर्व के काले पत्थरों का आयात बंद हो गया. यही कारण है कि पिछले 9 महीनों से हज़ारों हीरा कारखानों में ताले लटक गये हैं और मज़दूरों के सामने दो जून की रोटी के लाले पड़ गये हैं. शहर की सूरत में कभी चार चांद लगाने वालों की दुनिया फिलहाल घुप्प अंधियारे में है, जहां उजाले की कोई किरण नज़र नहीं आ रही.

सूरत में जब मंदी का शोर कुछ और बढ़ा तो बड़े-बड़े साहूकार मौके की नजाकत भांप गए और छोटी-छोटी यूनिट चलाने वालों का करोड़ो रूपए लेकर भाग गए. जैसे कतारगाम के हर्षद महाजन और घनश्याम पटेल को ही लें. यह दोनों ब्याज के 7 करोड़ रूपए लेकर लापता हैं. इसी तरह साजन तालुका का एक और महाजन जो मिनी बाजार और राजहंस टावर में 1,00-1,50 लोगों के साथ लेन-देन करता था; कोई साढ़े 5 करोड़ रूपए के साथ रफू-चक्कर है. इसलिए छोटी-छोटी यूनिट चलाने वालों के कारोबार ठप्प हुए और फिर बड़ी संख्या में मज़दूर सड़कों पर आ गये.

हीरा-व्यापारियों का हाल सुने तो पालिश्ड हीरे नहीं बिकने से उन्हें नकद नहीं मिल रहा है. इसलिए वह कच्चा हीरा खरीद ही नहीं सकते. तभी तो मिनी बाजार में हीरे के हजारों व्यापारियों का एक साथ जमा होना जैसे बीते कल की बात लगती है.

एक पहेली जिंदगानी

लेकिन सारे आकड़ों के बीच ऐसा पहलू भी छिपा है जो आज नहीं तो कल हालात को और उलझा सकता है. सूरत में 'फेक्ट्री एक्ट' के मद्देनजर हीरे की केवल 4,27 फैक्ट्रियां ही निबंधित हैं. लेकिन यहां चलने वाली फैक्ट्रियों की संख्या 14,310 है. मतलब ये कि सूरत की 13,883 फैक्ट्रियां निबंधित ही नहीं हैं.

असल में ज्यादातर मालिक 'टैक्स' से बचने, मजदूरों को 'पीएफ' और 'ईएसआई' जैसी सुविधाएं न देने के लिए 'फेक्ट्री एक्ट' को अनदेखा करते हैं. इसलिए 13,883 यूनिट से जुड़े करीब 9,40,000 मजदूर 'फेक्ट्री एक्ट' के दायरे से बाहर हैं. अभी तो यहां के एक भी हीरा-मजदूर को मुआवजा नहीं मिला है, लेकिन कल अगर मुआवजे की बात उठती है तो 'अन-रजिस्टर्ड' कही जाने वाली 13,883 फैक्ट्रियों के कोई 9 लाख 40 हज़ार मज़दूरों का क्या होगा ? क्या उन्हें मुआवजे का पात्र समझा जाएगा ?

हार गई जिंदगी

आकार अपार्टमेंट, कुबेरनगर की 'संदवी डायमण्ड' जैसी बड़ी कंपनी से जुड़े 40 साल के कल्पेश जादव की घर-गृहस्थी ठीक-ठाक चल रही थी. लेकिन 6 महीने तक काम न मिलने से वह खाली हाथ घर लौटते थे. एक रात जब वह लौटे तो खाने का एक दाना न होने पर पत्नी से जमकर झगड़ा हुआ. इसके बाद वह कहीं से 5 किलो चावल, 5 किलो आटा और 1 किलो तेल तो लाए लेकिन किसी को अनुमान नहीं था कि कल्पेश के मन में किस तरह का द्वंद्व चल रहा है. कल्पेश उस रोज ताप्ती नदी में ऐसे डूबे कि वापिस नहीं आए. कल्पेश ने मुक्ति पा ली, उनकी पत्नी अब अकेली है, बच्चे अभी से संघर्ष के दिन देखने के लिए रह गए हैं.

पुणागांव, विक्रम सोसायटी के अशोक भाई घाट ने 30 वें साल में कदम रखा था. उनकी बिटिया उन्नति 1 साल की होने वाली थी. अशोक भाई 'शिवजी डायमंड' कंपनी में थे. जब बेरोजगारी की नौबत आई तो उसका सामना करना उन्हें मुश्किल लगा और उन्होंने जहर पी कर अपनी जान दे दी.

उवली रोड़, मोहनदास सोसायटी के भरत ठुमरे ने 35 साल देख लिए थे. फांसी की रस्सी उन्हें जिंदगी की तंगी से कही ढ़ीली लगी होगी. इसलिए तो पत्नी और 10 साल से भी कम उम्र के दो बच्चों को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़कर चले गए.

कतारगाम में 60 साल की जीबी बेन अपने 34 साल के बेटे सूर्य की बेकारी देख न सकी, उन्होंने केरोसिन डालकर खुदखुशी कर ली. सूर्य 'शीतल डायमंड' कंपनी में काम करता था.

वह औरतें सबसे ज्यादा प्रभावित हुई हैं जो जैसे-तैसे अपने घर संभाल रही थीं. पति की लम्बी बेकारी ने उन्हें मायके जाने पर मजबूर किया. इन दिनों सौराष्ट्र से कुछ औरतों की खुदखुशी के मामले जोर पकड़ने लगे हैं. सबसे ज्यादा मजदूर सौराष्ट्र से ही आए थे. दूसरी तरफ कई मजदूरों की शादियां भी टूट रही हैं.

जो जिंदा हैं

19 जनवरी को 'सूरत डायमण्ड एसोसिएशन' की तरफ से बच्चों की स्कूल-फीस माफ करने के लिए फार्म बंटने वाले थे. तब 12,000 की भीड़ जमा हुई. लेकिन अफरा-तफरी के माहौल में पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा.

पुलिस की लाठी से 35 साल की बसंती बेन बगाणी बुरी तरह घायल हो गई. नवी शक्ति, विजय सोसायटी की बसंती बेन से जाना कि वह अपने 3 बच्चों, 4 साल के शिवम, 5 साल के जेनल और 7 साल के सावंत के लिए रात 2 बजे से ही लाइन में लगी थी. जैसे ही उनका नंबर आने को हुआ, लाठी चार्ज हुआ और उनका माथा फूट गया. जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है जनवरी के पहले हफ्ते में ही 5 इलाकों से स्कूलों के 4,500 बच्चों को फीस न भरने के चलते निकाला जा चुका था.

ठक्करनगर की कोकिला बेन से मालूम हुआ कि उनके पति 9 महीने से खाली हैं. उनके सिर पर अब तक 25,000 का कर्ज चढ़ चुका है. चिंटू कहकर बुलाने वाले बड़े लड़के ने 12 वीं 67 प्रतिशत के साथ पास की थी. लेकिन पैसे की मजबूरी से कालेज की पढ़ाई रूकी हुई है. कोकिला बेन कहती हैं- “पहले औरतों को घर में हीरे के पैकेट बनाने का काम मिल जाता था. इससे वह अपने खर्च-पानी के लिए महीने भर में 12,000 से 15,000 रूपए कमा लेती थीं. हीरे के कारखानों के बंद होते ही उनके खर्च-पानी का पैसा भी चला गया.”

आपके पति दूसरा काम तलाश सकते हैं ? जबाव में कोकिला बेन ने बताया कि जो आदमी अपनी कलाकारी से 12,000 रूपए महीना कमाता हो, जिसकी आमदनी के मुताबिक ही घर की जरूरतें बन गई हो, ऐसे में बिल्कुल आमदनी नहीं होने पर जरूरतें पहाड़-सी लगेगी ही. रही बात दूसरे काम की, तो कोई भी हीरा-मजदूर ऐसा चाहकर भी नहीं कर पाएगा. जो मजदूर 15-20 साल से हीरा तराशने जैसा काम करता हो, उससे मेहनत वाली मजदूरी बनेगी भी नहीं. उसे रात-दिन मेहनत से महीने भर में 15,00 ही मिलेंगे, अगर वह मेहनत वाले काम करना भी चाहे तो उसे मेहनत वाले काम देने से पहले हर कोई हिचकिचाएगा.

जबाव के इंतजार में...

24 जनवरी को ठक्कर नगर, डायमंड पार्क में राधा बोरसे जैसी 1,000 औरतों ने राज्य के मुखिया नरेन्द्र भाई (मोदी) को 1,000 पोस्ट-कार्ड भेजे. इन औरतों ने लिखा था कि घर में न अनाज है, न केरोसिन. दो टाइम खाने को तरस गए हैं. एक महीने से कोई सब्जी नहीं आई है. बच्चों की पढ़ाई भी रोक दी है. जल्दी मदद भेजिए वरना हमको भी सुसाइड करना पड़ेगा.

उन्होंने राज्य के मुखिया को यह पोस्ट-कार्ड इसलिए लिखा क्योंकि गुजरे विधान-सभा चुनाव के वक्त महिला-सम्मेलन में नरेन्द्र भाई गरजे थे- “तुम्हें कभी कोई परेशानी हो, भाई जानकर एक पोस्ट-कार्ड भर भेजा देना.” अब रक्षाबंधन आने को है, लेकिन सूरत की बहनों को गांधीनगर के भाई का जवाब नहीं मिला.

14 फरवरी को लोक-सभा चुनाव में राहुल भैया (गांधी) भी पधारे थे. उन्होंने अपने ही अंदाज में हीरा-मजदूरों से सीधी बात साधी थी. लोगों ने उनसे पूछा कि चलिए गुजरात सरकार ने हमारे लिए कुछ नहीं किया, केन्द्र सरकार क्या करने वाली है ?

जनता में एक ने उन्हें याद दिलाया कि जब केन्द्र सरकार 'सत्यम' जैसी (7,000 करोड़ का घोटाला करने वाली) कंपनी को बचाने के लिए राहत पैकेज दे सकती है तो देश के जो आम लोग अपनी मौत मर रहे हैं, उन्हें बचाने में इतनी देर क्यों ? राहुल कोई जबाव नहीं दे पाए. कांग्रेस ने दिल्ली में झण्डा फहराते ही जीत की पगड़ी राहुल गांधी के सिर पर बांधी है. इसके बाद तो वह ‘लाजबाव’ हो चुके हैं.

लोकसभा-चुनाव में भाजपा ने कहा- “दिल्ली वाले जाग रहे होते तो ऐसे हालात नहीं होते.” कांग्रेस ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को नया विशेषण दिया- “ कुंभकरण न जाने कब जागेंगे.” कांग्रेस के कार्यकर्ता यह तर्क देते भी घूमते रहे कि- “मामला सेंटर से नहीं, गांधीनगर से सुलझेगा.” इस तरह चुनाव के साथ यह आरोप-प्रत्यारोप भी गुजर गये, नहीं गुजरे तो आत्महत्याओं के हादसे. सांसद चुने गए, नहीं चुनी गई तो मजदूरों की मजबूरियां. सरकार भी बनी, नहीं बंधी तो पहले जैसे हालात बनने की उम्मीदें. वैसे मजदूरों के पास उम्मीद के अलावा और कुछ है भी नही.

लेकिन शहर के कुछ लोग, यहां तक की मीडिया का एक हिस्सा हीरा-कारखाने के सेठ लोगों से खफा है. उनके नजरिए से जब तक मुनाफे का धंधा चल रहा था तब तक तो मजदूरों की मेहनत और कलाकारी से सेठ लाखो से करोड़ो, करोड़ो से अरबो कमाते रहे. लेकिन जैसे ही मंदी ने मुंह दिखाया, सेठ लोगों ने मुंह मोड़ लिया. मजदूरों की उम्मीदें या जरूरतें लाखों-करोड़ों की नहीं हैं. ऐसे में सेठ लोगों को मजदूरों की मामूली जरूरतों में मददगार बनना ही चाहिए था. लेकिन उनकी तरफ से मदद की हवा तो दूर, मदद का एक पत्ता भी नहीं हिलता.

आत्महत्याएं ठण्डे बस्ते में

सूरत में हीरे की चमक नहीं लौट रही है. दो-एक महीने से आत्महत्याओं के मामले में कमी जरूर देखी गई है. यह किसी के विशेष प्रयासों का नतीजा नहीं हैं, यह तो हर दिन करीब तीन सौ मजदूर परिवारों के सूरत छोड़ने का नतीजा है. ऐसे में आत्महत्याओं के किस्से सूरत के आसपास फैल गए हैं. शहर से जाने वाले एक परिवार के जमेश और महेश (भाई-भाई) ने हाथ हिलाते हुए कहा- “दोबारा सूरत ही लौटेंगे.”

लेकिन सूरत में छाये संकट के बादल बरसने भर से खत्म नही होने वाले.

30.7.09

मुंबई मेट्रो क्या करेगा ?

शिरीष खरे, मुंबई से
“हमारे शहर रहने लायक होने चाहिए, जहाँ आम आदमी गुज़र-बसर कर सके." ये शब्द प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के थे.
21 जून 2006 को मुंबई मेट्रो रेल का शिलान्यास करते हुए जब मनमोहन सिंह ने ये बातें कही थीं तो लगा था कि मुंबई में मेट्रो रेल सच में मुंबई की नई जीवन-रेखा होगी. लेकिन यह सिक्के का एक पहलू था. आज तीन साल बाद भी इसका दूसरा पहलू सवाल बन कर खड़ा है कि आखिर मेट्रो से किन ताकतों का कैसा हित जुड़ा है ? इस मेट्रो रेल से तरक्की के मुकाबले कितनी तबाही होगी ? आखिर मेट्रो से शहर की यातायात व्यवस्था किस हद तक बेहतर होगी ? और ये भी कि मुंबई मेट्रो क्या करेगा ?
सवाल यूं ही नहीं हैं. हर सवाल के साथ कई तरह की आशंकाएं और उलझनें जुड़ी हुई हैं और इन सब से बढ़ कर भ्रष्टाचार के नमूने, जिसने मेट्रो रेलवे को संदिग्ध बना दिया है.
प्रोजेक्ट के नोटिफिकेशन को ही देखें तो इसमें डेवेलपर्स को यह छूट दी गई है कि वह “कंस्ट्रक्शन खत्म होने के बाद बची हुई जमीनों को अपने मुनाफे के लिए बेच ” सकते हैं. इसके अलावा उन्हें “सेंट्रल लाइन के दोनो तरफ आरक्षित 50 मीटर जमीनों को दोबारा विकसित” करने की भी छूट मिलेगी. इससे कारर्पोरेट ताकतों को शहर की “सबसे कीमती जमीनों को हथियाने और यहां से व्यापारिक गतिविधियां चलाने” की छूट खुद-ब-खुद मिल जाएगी.
पैसा-पैसा और पैसा
मुंबई मेट्रो पूरी तरह से सरकारी प्रोजेक्ट नहीं है. इसमें प्राइवेट कंपनी सबसे ज्यादा निवेश करेगी. जाहिर है सबसे ज्यादा मुनाफा भी कंपनी ही कमाएगी, न कि सरकार. दूसरा, नोटिफिकेशन के हिसाब से शहर का खास भू-भाग कंपनी की पकड़ में आ जाएगा. यहां से उसे अपना कारोबारी एजेण्डा पूरा करने में सहूलियत होगी. याने मेट्रो से मुनाफा भी कमाओ, मेट्रो से निकलने वाली जमीन से कारोबार भी फैलाओ. इसे कहते है एक तीर से दो शिकार!!
इन दिनों कई कंपनियां रियल इस्टेट, आईटी और रेल के विकास के नाम पर शहर की जमीनों को हथियाना चाहती हैं. हाल ही में बदनाम हुई 'सत्यम' और उसकी सहयोगी कंपनी 'मेटास' ने हैदराबाद के आसपास की हजारों एकड़ जमीन हथिया ली थी.
‘मेटास’ तो 1,200 करोड़ रूपए की हैदराबाद मेट्रो रेल में भी शामिल थी. लेकिन ‘सत्यम’ में 7,800 करोड़ रूपए के घोटाले के बाद ‘मेटास’ को जांच एजेंसियों के हवाले कर दिया गया. ‘मेटास’ के आऊट होने के बाद अनिल अंबानी की ‘रिलायंस- इंफ्रास्ट्रक्चर' अब हैदराबाद मेट्रो में भी बोली लगाने को बेताब है. वैसे भी ‘रिलायंस- इंफ्रास्ट्रक्चर' मुंबई के साथ-साथ दिल्ली मेट्रो का काम तो कर ही रही है.
अगर दाल में कुछ भी काला नहीं है तो सरकार मेट्रो से जुड़े अहम तथ्यों से पर्दा हटाए। लेकिन धरातल पर ऐसा करना शायद सरकार के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है. यही कारण है कि “सूचना के अधिकार” के तहत कुछ सामान्य-सी सूचनाएं मांगने पर उसने तुरूप का इक्का फेंका- “इस किस्म की सूचनाएं साझा करने से राष्ट्र को खतरा हो सकता है.”
कगार की आग
पिछले महीने 11 मई को शहर की झोपड़ियों से हजारों लोग निकले और यशवंत राव चौहान सेंटर पहुंचे. यहां ‘शहरी विकास विभाग’ ने मेट्रो फेस-2 के लिए दो दिनों की जनसुनवाई रखी थी. लोगों की भारी संख्या को देखकर बड़े अधिकारी चौंक खड़े हुए. न केवल संख्या बल्कि लोगों के कई सवालों ने भी उन्हें घेर लिया. जनसुनवाई में 19 बातों का पालन करना होता है, लेकिन प्रशासन ने चुप्पी साधी, फिर थोड़ी-सी जगह निकाली और निकल भागा.
इसी तरह नवंबर, 2008 में भी प्रदेश सरकार ने प्रोजेक्ट से जुड़ी आपत्तियां मांगी थीं. इसके बाद उसे आपत्तियों से भरे 15,000 पत्र मिले. 8,000 लोग मेट्रो के विरोध में सड़क पर उतरे. तब भी सरकार ने लोगों के विरोध को नजरअंदाज कर दिया था. ऐसे में शहर के बीचों बीच विरोध का एक नारा सुनाई देने लगा- “मेट्रो रेल क्या करेगा, सबका सत्यानाश करेगा !!”
आंकड़ों की मानें तो मेट्रो से 15,000 से ज्यादा परिवार उजड़ेंगे. इससे लाखों लोग बेकार हो जाएंगे. अकेले ‘कार सेड डिपो’ बनाने में ही 140 एकड़ से भी ज्यादा जमीन जाएगी. इससे जनता कालोनी, संजय नगर, एकता नगर, आजाद कम्पाउण्ड, गांधी नगर, केडी कम्पाउण्ड और लालजीपाड़ा जैसी बस्तियों के नाम नए नक्शे से मिट जाएंगे. तब यहां के हर मोड़ से गुजरने वाले सुस्त कदम रस्ते और तेज कदम राहें हमेशा के लिए रुक जाएंगे.
आज इन इलाकों से हजारों हाथों को काम मिलता है. कल इन हाथों के थम जाने से रोजगार का संकट गहरा जाएगा. कई रहवासी तो 40-45 साल से यही रहते आ रहे हैं. इन्होंने रोजमर्रा के मामूली धंधों से एक बड़ा बाजार तैयार किया है. उत्पादन के नजरिए से देखा जाए तो धारावी के मुकाबले यहां का बाजार काफी बड़ा है. इस बाजार से 10,000 लोगों की घर-गृहस्थियां आबाद हैं. यह इलाका कई सुंदर आभूषण और सजावटी चीजों को बनाने के लिए मशहूर है. यहां से कई चीजों को दुनिया भर में भेजा जाता है. इन चीजों को बनाने और भेजने में 15,000 महिलाएं शामिल हैं.
इस इलाके में बड़ी संख्या में लोग बेकरी और फुटकर सामान बेचने से भी जुड़े हैं. कुल मिलाकर शहर का यह हिस्सा सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों का मजबूत ताना-बाना है. अगर यह टूटा तो रहने और जीने के कई तार टूट जाएंगे. शहर की रफ्तार बढ़ाने वाले बहुत सारे पंख बिखर जाएंगे.
‘कार सेड डिपो’ बनने से पोईसर नदी भी अपना वजूद खो देगी. साथ ही इससे लगा नेशनल पार्क प्रभावित होगा. अभी तक “पर्यावरण पर होने वाले असर का मूल्यांकन ” भी नहीं हो सका है. ‘पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986’ के तहत ऐसा होना जरूरी है. यह कब होगा, तारीख कोई नहीं जानता.
ऐसी है योजना
मुंबई में मेट्रो रेल का पहला चरण 62.68 किलोमीटर का है जिसमें वरसोवा-अंधेरी-घाटकोपर, कोलाबा-बांद्रा-चारकोप और भांडुप-कुर्ला-मानखुर्द को जोड़ा जाएगा. इसके लिए 2011 की समय सीमा तय की गई है. दूसरे चरण को 2011-2016 के बीच खत्म करने का लक्ष्य रख कर 19.5 किलोमीटर तक मेट्रो की रेलवे पटरियों और अन्य सुविधाओं का विस्तार किया जाएगा. तीसरे चरण में 40 किलोमीटर तक निर्माण लक्ष्य रखा गया है, जिसे 2016 से 2021 के बीच पूरा करना है.
शहर का ट्रांसपोर्ट सिस्टम
कुछ ऐसी रिपोर्ट जारी हुई हैं, जो ट्रांसपोर्ट के नजरिए से मेट्रो को ठीक नहीं मानतीं. आईआईटी, दिल्ली के ट्रांसपोर्ट जानकारों ने एक अध्ययन में पाया कि मुंबई में 47 प्रतिशत रहवासी या तो पैदल चलते हैं, या साइकिल से.
इसी तरह 11 प्रतिशत रहवासी कार या मोटर साइकिल चलाते हैं. इसके बाद बस और रिक्शा से चलने वाले लोगों का प्रतिशत घटा दें तो ट्रेन से चलने वाले कुल 21 प्रतिशत ही बचते हैं. लेकिन ट्रांसपोर्ट के बजट का आधे से ज्यादा हिस्सा मेट्रो के लिए खर्च किया जा रहा है. जहां तक लंबी दूरी की बात है तो मेट्रो बेहद मंहगा प्रोजेक्ट हैं. इसमें घनी आबादी वाली बस्तियों के विस्थापन से होने वाले नुकसान को भी जोड़ दिया जाए तो पूरा प्रोजेक्ट बेहद खर्चीला हो जाता है.
ट्रांसपोर्ट के जानकार सुधीर बदानी के मुताबिक-“ मुंबई में ट्रेन के पुराने सिस्टम को दुरूस्त बनाने और बस-ट्रांसपोर्ट को विकसित करने से राहत मिलेगी. जहां मेट्रो के पूरे प्रोजेक्ट में 65,000 करोड़ रूपए खर्च होंगे, वहीं 2,00 किलोमीटर बस-ट्रांसपोर्ट तैयार करने में सिर्फ 3,000 करोड़. इसलिए बस का रास्ता सस्ता, बेहतर और व्यवहारिक है. यह पर्यावरण और रहवासियों के अनुकूल भी है.”
स्लमडाग मिलेनियेर को ‘गोल्डन ग्लोब’ और ‘आस्कर’ आवार्ड मिलने के बाद मुंबई को तीसरी दुनिया के सबसे दिलचस्प शहरों में से एक कहा जा रहा है. यहां एक तरफ ‘अंधेरी’ की उमंग में डूबी रातें हैं तो दूसरी तरफ 'धारावी' जैसा कस्बाई इलाका है. एक तरफ बेहतरीन रेस्टोरेंट, बार और नाइट-क्लब हैं तो दूसरी तरफ खुली झोपड़ियां, कच्ची-पक्की गलियां और टूटी-फूटी नालियां हैं.
इतनी विविधता वाले शहर की योजनाएं जितनी ज्यादा असंतुलित होगी, नुकसान भी उसी अनुपात में होगा. मुंबई मेट्रो में एक हिस्से को फायदा पहुंचाने के लिए दूसरे हिस्से से कीमत वसूली जाएगी. इस मेट्रो से कुछ लोगों के लिए सफर आसान हो जाएगा लेकिन यह कोई नहीं कहना चाहता कि इसी मेट्रो के कारण हज़ारों परिवार की घर-गृहस्थी की गाड़ी रुक जाएगी.

2.7.09

सरकारी स्कूलों की वकालत जरूरी है

'चाईल्ड राईट्स एण्ड यू’ में ‘विकास सहयोग’ विभाग के महाप्रबंधक कुमार नीलेन्दु से शिरीष खरे की बातचीत।

इस बार भी बोर्ड के नतीजे सबके सामने हैं। इस बार भी प्राइवेट स्कूलों के बच्चे आगे रहे। फिर भी ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ जैसी संस्थाए सरकारी स्कूलों की वकालत करती हैं। क्यों ?
प्राइवेट स्कूलों के लिए बोर्ड के नतीजे बढ़िया रहे क्योंकि वहाँ बच्चों को एडमिशन देने के पहले चुना जाता है। अब कठिन परीक्षाओं को पास करके आने वाले बच्चे तो बढ़िया नतीजे ही देंगे। फिर प्राइवेट स्कूल में अमीर बच्चों को ही लिया जाता है। उनके माँ-बाप को जरूरी लगा तो ट्यूशन भी लगवा लेते हैं। अगर इन सारी चीजों को हटा लिया जाए तो प्राइवेट स्कूलों के नतीजे भी दूसरे स्कूलों जैसे रहेंगे। एक बात यह भी है कि स्कूल की गुणवत्ता का मतलब महंगी बिल्डिंग, अंगेजी माध्यम और पढ़ाई के लिए काम आने वाली चीजों से लगाया जाता है। लेकिन बहुत कम सरकारी स्कूलों में ऐसी व्यवस्थाएँ मौजूद हैं। इसलिए प्राइवेट स्कूलों से मुकाबले की बातों का कोई मतलब नही।
सरकारी शिक्षक सही ढ़ंग से अपनी डयूटी निभा पाते तो नजीते इतने बुरे नहीं आते।
उनके हिस्से में बच्चों को पढ़ाने के अलावा भी बहुत-सी ‘नेशनल डयूटी’ हैं। प्राइवेट के शिक्षक चुनाव, जनगणना, पशुओं की गणना या ऐसे ही दूसरे कामों से बचे रहते हैं। यह कहने में कैसी झिझक कि एक सरकारी शिक्षक के ऊपर काम का बोझ बढ़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि स्कूल की पढ़ाई के दिनों में सरकारी शिक्षकों को चुनाव की डयूटी में न लगाया जाए। लेकिन अभी भी उन्हें लगाया जाता है। बुरे नतीजों के पीछे सरकारी शिक्षक और बच्चों के बीच का असंतुलित अनुपात भी जिम्मेदार है। आप सरकारी स्कूलों में बच्चों की भारी संख्या को देखिए, उसके मुकाबले आपको शिक्षकों की संख्या कुछ भी नहीं लगेगी।
एक ऐसा परिवार जो अपने बच्चों की मंहगी पढ़ाई का बोझ उठा सकता है, उसके सामने ‘सबकी शिक्षा एक समान’ जैसी बातों का क्या मतलब ? उसे तो ऐसी बातें स्कूल चुनने की आजादी को रोकने जैसी लगेगी ?
यही सवाल थोड़ा यूं भी तो देखिए कि अमीर को स्कूल चुनने की आजादी है, गरीब को नहीं। आजादी का अर्थ तो गरीब से गरीब को शिक्षा पाने का हक देता है। एक गरीब का बच्चा अपनी गरीबी की वजह से बराबरी और बेहतर शिक्षा से बेदखल क्यों रहे ? खासतौर पर प्राइमरी स्कूल से। अब तो प्राइमरी तक की पढ़ाई को मौलिक हक के रुप में अपना लिया गया है। फिर भी देश के 100 में से 60 बच्चे प्राइमरी स्कूल नहीं जाते। सीधी बात है, शिक्षा में असमानताएँ हैं। एक तरफ शिक्षा में असमानताएँ हैं, दूसरी तरफ निजीकरण की रफ़्तार के साथ सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक दूरियां बढ़ रही हैं। ऐसे में अलग-अलग तबको के बच्चों के हितों को देखना होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो प्राइवेट सेक्टर का कारोबार तो फलेगा-फूलेगा लेकिन सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक असमानताएँ दिन-ब-दिन बढ़ती जाएगी।
जब सभी बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे तो उनके बीच की असमानताओं के चलते दिक्कते नहीं आएँगी ?
यह बात लोकतंत्र के नजरिए से फिट नहीं बैठती। अब तो दुनिया भर की किताबों में समाज और स्कूल की विविधताओं को न केवल स्वीकार किया जा रहा है, उनका सम्मान भी किया जा रहा है। कई देशों जैसे अमेरिका या इंग्लैण्ड में अलग-अलग तबको से आने वाले बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। वहाँ अलग-अलग योग्यता रखने वाले बच्चे एक साथ बैठते-उठते हैं, सभी बराबरी के साथ बेहतर मौके तलाशते हैं। वहाँ की शिक्षा पब्लिक के हाथों में है। वहाँ के स्कूलों से ऊंच-नीच की सारी असमानताओं को हटा दिया गया है। वहाँ के स्कूलों में प्रवेश के पहले चुना जाना जरूरी नहीं है।
...और भारत में ?
यहाँ प्राइवेट स्कूलों पर ज्यादा भरोसा किया जाता है। इससे प्राइवेट सेक्टर से जुड़े लोगों को मनमाने तरीके से मुनाफा कमाने का मौका मिलता है। दूसरी तरफ कहने को सरकार की कई योजनाएँ हैं। लेकिन सबके अर्थ अलग-अलग हैं। जैसे कुछ योजनाएँ शिक्षा के लिए तो कुछ महज साक्षरता को बढ़ाने के लिए चल रही हैं। इसकी जगह सरकार को एक ऐसे स्कूल की योजना बनानी चाहिए जो सारे अंतरों का लिहाज किए बगैर सारे बच्चों के लिए खुली हो।
इसी तरह सरकारी स्कूलों में भी तो असमानताएँ हैं ?
बिल्कुल, जैसे केन्द्रीय कर्मचारियों के बच्चों के लिए केन्द्रीय स्कूल, सैनिकों के बच्चों के लिए सैनिक स्कूल, मेरिट लिस्ट के बच्चों के लिए नवोदय स्कूल। बात साफ है कि सभी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ताएँ अलग-अलग हैं। इसी तरह शिक्षक को चुने जाने के लिए भी अलग-अलग स्कूलों में योग्यता के अलग-अलग पैमाने रखे गए हैं।
लेकिन समाज की असमानता का क्या किया जाए ?
समाज में जो भेदभाव है, वही तो स्कूल की चारदीवारी में हैं। इसलिए समाज से स्कूल में घुसने वाले उन कारणों को तलाशना होगा जो ऊंच-नीच की भावना बढ़ाते हैं। अगर समाज में समानता लानी ही है तो सबसे अच्छा तो यही रहेगा कि इसकी शुरूआत शिक्षा और बच्चों से ही की जाए।
सबके लिए एक समान स्कूल की बात इतनी सीधी है ?
जब पानी से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य तक की चीजों को बाजार में घसीटा जा रहा हो तो यह बात बेतुकी लग सकती है। लेकिन शिक्षा की जर्जर हालत को देखते हुए तो यह बात बड़े तुक की लगती है। कोठारी आयोग (1964-66) ऐसा पहला आयोग था जिसने सामाजिक बदलावों के लिए बहुत अच्छे सुझाव दिए। उसने देश भर के लिए एक ऐसी व्यवस्था बनाने की बात कही जिसमें हर तबके के बच्चे एक साथ पढ़े-बढ़े। उसने यह भी कहा था कि सबके लिए एक समान शिक्षा नहीं रही तो समाज के ताकतवर लोग सरकारी स्कूलों को छोड देंगे और प्राइवेट की शरण में जाएँगे। इसके बाद हम देखते हैं कि 1970 के बाद से सरकारी स्कूलों की हालात बद से बदत्तर होतक चले गए। सरकार का ध्यान इस तरफ कभी नहीं गया ? वह 1968, 1986 और 1992 की शिक्षा नीतियों में समान स्कूल व्यवस्था की बात तो करती है लेकिन उसे लागू नहीं करती। 2001 में संसद ने शिक्षा का मौलिक हक तो दिया लेकिन देश में शिक्षा की दोहरी नीति को भी जारी रखा।
विकलांग बच्चों के एडमिशन को लेकर प्राइवेट स्कूल कानून से बंधे नहीं होते। जबकि पीडब्ल्यूडी एक्ट के तहत सरकारी स्कूलों में ऐसे बच्चों को लेना जरूरी है। यह भी तो शिक्षा की दोहरी नीति ही है।
हाँ, वैसे इस किस्म के सभी बच्चों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समावेशी शिक्षा आंदोलन चल रहा है। यह शिक्षा या स्कूलों में फैली छोटी-बड़ी गड़बड़ियों को ढ़ूढ़ने और उनसे निजात पाने का शुरूआती कदम है। दूसरा, यह आंदोलन हमारे आसपास की ऐसी कई विविधताओं का पता लगा रहा है जो असमानताएँ फैलाती है। यहाँ समावेशी शिक्षा का मतलब केवल विकलांग बच्चों की शिक्षा से ही नहीं है। इसका मतलब तो सभी किस्म की विविधताओं को सभी पहलुओं से देखने, समझने और उसे शामिल करना भी है।