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27.1.10

सूरत में जीरो स्लम आपदा

शिरीष खरे/सूरत से




एक जमाने में विकास के लिए ‘गरीबी हटाओ’ एक घोषित नारा था। मगर आज आलम यह है कि विकास के रास्ते से ‘गरीबों को हटाना’ एक अघोषित एंजेडा बन चुका है। बतौर एक शहर, सूरत के उदाहरणों से यह समझा जा सकता है कि ‘गरीबी की बजाय गरीबों को हटाने’ का यह व्यंग्यात्मक मुहावरा किस तरह से गंभीर हकीकत में तब्दील हुआ है।






सैकड़ों झोपड़ियों की तरह, झोपड़पट्टी तोड़ने वाले जब जलाराम नगर के 40 वर्षीय लक्ष्मण चंद्राकार उर्फ संतोष की झोपड़ी को तोड़ने लगे तो उसने केरोसिन डालकर अपनेआप को मौत के हवाले करना चाहा। इसके बाद उसे एक एम्बुलेंस से न्यू सिविल हास्पिटल भेजा गया। वहां पहुंचते-पहुंचते उसके शरीर का 75 प्रतिशत हिस्सा जल गया। उधर डाक्टरों ने संतोष की हालत को बेहद गंभीर बताया। इधर सूरत महानगर पालिका ने शाम होते-होते ताप्ती नदी के किनारे से तीन बस्तियों के कई बच्चे, बूढ़े और औरतों को खुली सड़क पर ला खड़ा किया। यह एक नजारा अब का है जब सूरत के गरीबों को न तो साम्प्रदायिक दंगों का सामना करना पड़ रहा है, न ही बाढ़ या भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं को ही सहना पड़ रहा है। इतना सब तो उन्हें सूरत को 0 स्लम बनाने वाली आपदा के चलते झेलना पड़ रहा है।

2 दिसम्बर, 2009 को सूरत महानगर पालिका ने सुबह 10 से शाम के 6 तक : सूरत को 0 स्लम बनाने के लक्ष्य का पीछा करते हुए जेपी नगर, जलाराम नगर और इकबाल नगर से कुल 502 झोपड़ियों को तोड़ने का रिकार्ड दर्ज किया। दोपहर होते-होते अगर स्थिति तनावपूर्ण न हो जाती तो महानगर पालिका के कुल स्कोर में और अधिक बढ़ोतरी हो जाती। वैसे पुलिस के भारी बंदोबस्त के बीचोंबीच, तनावपूर्ण स्थिति को नियंत्रण में बनाए रखते हुए- 4000 से अधिक रहवासियों से उनका पता ठिकाना छीन लिया गया। कुल मिलाकर ताप्ती नदी के आजू-बाजू कई दशक पुरानी इन तीन बस्तियों से 1700 से अधिक झोपड़ियों को साफ किया जाना है। अर्थात्- 14000 से अधिक रहवासियों से उनका पता ठिकाना छीना जाना है। जैसा कि महानगर पालिका के बस्ती उन्नयन विभाग से सी वाय भट्ट कहते भी हैं कि ‘‘नदी और खाड़ी के इर्द-गिर्द जमा झोपड़ियों को साफ करने के लिए डेमोलेशन की कार्रवाई जारी रहेगी।’’ डेमोलेशन की यह कार्रवाई अगले रोज भी जारी रही। मगर सूरत के बाकी इलाकों को तोड़े जाने के अगले चरणों और उनकी तारीखों के सवालों पर खामोशी का आलम है।


सुबह-सुबह, कोई सूचना दिए बगैर, एकाएक और अपने पूरे दल-बल के साथ झुग्गी बस्तियों को नेस्तानाबूत करने की प्रशासनिक रणनीति को सूरतवासी अब बाखूबी जानते हैं। रविवार की ठण्डी सुबह में भी प्रशासन की तरफ से इसी रणनीति को दोहराया जाने लगा। पुलिस ने शनिवार रात को ही उन सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं को हिरासत में ले लिया था जो महानगर पालिका की गरीबों को शहर से हटाए जाने वाली मुहिम के विरोधी हैं। इधर जेपी नगर, जलाराम नगर और इकबाल नगर के रहवासी यह कहने लगे कि घर के बदले घर दिए बगैर हमारे घरों को कैसे उजाड़ा जा रहा है ? उधर प्रशासन के लिए यह कोई नया सवाल नहीं था। उनका ध्यान तो झोपड़पट्टी तोड़ने के दौरान ‘अधिकतम नुकसान पहुंचाने’ के सिद्धांत पर टिका था। अंधियारा छाने के बहुत पहले ही बस्ती वालों के असंतोष ने आग पकड़ ली। देखते ही देखते एक भारी भीड़ पथराव करते हुए आगे बढ़ने लगी। हर एक के हाथों में उनके दुख, दर्द, उनकी आशंकाओं और हताशाओं से भरी भावनाओं में डूबे जनसैलाब के सिवाय कुछ न था। इसके बाद मुस्तैद पुलिस वाले आगे आएं और उन्होंने बस्तियों की तरह उनके जनसैलाब को भी लाठीचार्ज के जरिए कुचल डाला। उसके ऊपर आंसू गैस के दो गोले भी छोड़े गए।

सूरत में कुल 1 लाख से अधिक झोपड़ियों को तोड़ा जाना है। सरकारी कागजों पर पुनर्वास के लिए केवल 42 हजार घर बनाए जाने की बात है। जाहिर है करीब 56 हजार झोपड़ों का सवाल हवा में झूल रहा है। एक तरफ झोपड़ियों को तोड़े जाने का सिलसिला थम नहीं रहा है और दूसरी तरफ इतना भी सुनिश्चित नहीं हो पा रहा है कि घर मिलेंगे भी तो किन्हें, कैसे और कब तक। जबकि 2009 के पहले-पहले सूरत के सभी झोपड़पट्टी के परिवारों को नए घरों में स्थानांतरित करने का लक्ष्य रखा गया था। जबकि समय के छोटे-छोटे अन्तराल से शहर की बाकी झोपड़ियों की तरह रेलवे मेनलाइन की झोपड़ियों को तोड़कर गिराया जा रहा है और इस बात की जिम्मेवारी कोई नहीं ले रहा है कि किसने झोपड़ियां तोड़ी हैं ? इस सवाल का जवाब सब जगह से एक-सा आता है- ‘हमने नहीं उसने’. महापालिका के पास भी यही जवाब है और रेलवे के पास भी। जबकि आमतौर पर ऐसी बस्तियों के लोग नहीं जानते कि एक दिन उनके घर टूटेंगे। एक दिन उनसे यहां रहने के सबूत मांगे जाएंगे। इसलिए वह कागजों को इकट्ठा नहीं कर पाते। ऐसी बस्तियों के लोग किस कागज के टुकड़े का क्या मतलब है, यह भी नहीं जानते। सभी बस्तियों में रहने वाले लोगों का भी यही हाल है। अफसरों को जो कागज चाहिए उनमें से कुछ कागज यहां के ज्यादातर रहवासियों के पास नहीं हैं। यह रहवासी अफसरों को अपनी झुग्गी दिखाना चाहते हैं। लेकिन अफसरों को तो झुग्गी में रहने का कागज ही देखना है। फिलहाल लोगों के घर का हक सरकारी फाइलों से काफी दूर है। इस तरह पूरी कार्यप्रणाली आफिस-आफिस के खेल में उलझ चुकी है। जबकि सरकार लोगों से तो शहर में रहने के सबूत मांग रही है और खुद डेमोलेशन के लिए गैरकानूनी तरीके अपना रही है। जैसे कि डेमोलेशन के दौरान यूनाईटेड नेशन’ की गाईडलाईन निभानी जरूरी थी। जिन्हें उखाड़ना था, उनके साथ बैठकर पुनर्वास और राहत की बातें की जानी थी। गाईडलाईन कहती है कि विकलांग, बुजुर्ग और एसटी-एससी को उनके रोजगार के मुताबिक और पुराने झोपड़े के पास ही बसाया जाए। पीड़ित आदमी को पहले पुनर्वास वाली जगह दिखाई जाए, इसके बाद अगर वह मांग करता है तो उसे कोर्ट में जाने का हक भी है। इसके लिए कम से कम 90 दिनों का समय भी दिया जाए। लेकिन महानगर पालिका ने तो एक भी कायदा नहीं निभाया। जबकि महानगर पालिका के भीतर अनियमितताओं की कई हैरतंगेज कहानियां हैं। जैसे कि 1992 को टीना बेन 14 साल की थी, तब उन्हें घर के सामने खड़ा करके एक स्लेट पर उनका नाम, एनके परिवार वालों का नाम लिखवाकर फोटो ले लिया गया। 2005 को याने ठीक 12 साल बाद जब वह दो बच्चों की मां बनी तो भी उन्हें 1992 की फोटो के हिसाब से घर का मुआवजा मिला। समय के इतने बड़े अंतराल में घर तो क्या बस्ती की पूरी दुनिया ही बदल जाती है, लेकिन नहीं बदलती है तो मगनगर पालिका की मानसिकता।

माटी में मिली बस्तियों से जो ज्वंलत सवाल उठे हैं वो ‘रहने’ के अलावा ‘रोजीरोटी’ और ‘बुनियादी जरूरतों’ से भी जुड़े हैं। जैसे कि अगर यहां के कुछ विस्थापितों का पुनर्वास हुआ भी तो वह कोसाठ जैसी जगह में होगा, जो विस्थापितों की जगह से ‘12-15 किलोमीटर दूर’ और शहर की हदों को छूता ‘बाढ़ प्रभावित इलाका’ है। ऐसे में जो विस्थापित कोसाठ जैसी जगहों पर आएंगे भी है तो अपने साथ बेकारी भी लाएंगे। क्योंकि उन्हें शहर के भीतर 150 रूपए दिन की दिहाड़ी मजदूरी मिलती रही है। मगर शहर के बाहर तो कोई काम नहीं मिलेगा और काम ढ़ूढ़ने के लिए उन्हें रोजाना 40 रूपए तक खर्च करके शहर जाना पड़ेगा। इसके साथ-साथ जो औरतें चाय की दुकानें चलाती हैं या फिर घरेलू काम के लिए आसपास की सोसाइटी में जाती हैं, उन्हें कोसाठ जैसी जगहों में आकर हाथ पर हाथ रखे बैठना होगा। इन सबसे ऊपर यह सवाल भी है कि शहर के बाहर का यह हिस्सा जब बरसात के मौसम में बाढ़ के पानी से भरेगा तो यहां के रहवासी कहां जाएंगे ?

22.11.09

रेल के लिए ज़िंदगी रोक दी

शिरीष खरे



सूरत/ मीराबेन को अब नींद नहीं आती. क्यों? उनके पास इसका सीधा जवाब है, 'अगर आदमी को फांसी पर लटकाना तय हो, पर तारीख तय न हो तो उसे नींद कैसे आएगी?'




मीरा बेन और उनके जैसे सूरत शहर के हजारों लोग इन दिनों परेशान हैं. परेशानी का सबब है उनका आशियाना, जिसे कभी भी, कोई भी सरकारी अमला तोड़ कर चल देता है.

समय के छोटे-छोटे अन्तराल से शहर की बाकी झोपड़ियों की तरह मुंबई-अहमदाबाद मेनलाइन की झोपड़ियों को तोड़कर गिराया जाना आम बात है लेकिन इस बात की जिम्मेदारी कोई नहीं लेना चाहता कि उसने झोपड़ियां तोड़ी हैं. शहर की झोपड़ियों के तोड़े जाने पर पुनर्वास और राहत जैसे मुद्दे जुड़ जाते हैं और इस बार झोपड़ियों को गिरानेवालों ने नया तरीका निकाला. झोपड़ी किसने तोड़ी, इस सवाल का जवाब सब जगह से एक-सा आता है, ‘हमने नहीं उसने’. महापालिका के पास भी यही जवाब है और रेलवे के पास भी.

सवाल सिर्फ एक सूरत का नहीं है, देशभर में रेलवे पट्टियों के दाएं-बाएं बसी असंख्य झोपड़ियों का यही हाल है. इन्हें भी पुनर्वास की वाजिब व्यवस्था चाहिए, जो कि न रेलवे की नीति में दर्ज है और न राष्ट्रीय पुनर्वास की नीति में.

यहां कतारगांव से लगे 18 से ज्यादा झोपड़पट्टियों के 12 हजार से ज्यादा रहवासी जब माटी में मिले झोपड़े का सवाल उठाकर महापालिका और रेलवे के पास पहुंचते हैं तो दोनों पहले तो डेमोलेशन की जानकारी नहीं होने की बात कहते हैं. पर जब मालूम चलता है तो एक-दूसरे को कसूरवार ठहराते हैं. इस तरह, डेमोलेशन के दौरान दोनों आफिस वालों के आपसी कोर्डिनेशन' जैसे अगले सवाल लोगों की जवाब पर ही अटके रह जाते हैं.

जाहिर है, अगर दोनों ने ही डेमोलेशन नहीं किया तो उनमें से एक भी मुआवजा क्यों देगा? और यह कोई प्राकृतिक आपदा भी नहीं कि उम्मीदों को 'सरकारी पंख' ही लग जाए?


सवाल दर सवाल हैं
यहां रेलवे और महापालिका की जमीन के बीच में कम से कम 150 झोपड़ियां ऐसी भी हैं जिन्हें रेलवे का दावा है कि वह महापालिका की जमीन पर हैं, महापालिका का दावा  है कि वह रेलवे की जमीन पर हैं.यानी जब तक साबित नहीं होता तब तक के लिए सारे 'भगवान भरोसे' हैं. और साबित होने की कोई तारीख तय नहीं है.

हालांकि अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए रेलवे और महापालिका दोनों ही इस कोशिश में हैं कि अपने को इससे कितना अधिक दूर रखा जाए. महापालिका का कहना है कि झोपड़पट्टी वाला हिस्सा रेलवे की जमीन पर है इसलिए हम  बिजली और पानी भी नहीं दे सकते. लेकिन थोड़े से फासले पर मफतनगर और संगम टेकरी के लिए महापालिका बिजली-पानी पहुंचाता है. और जब मफतनगर और संगम टेकरी से शौचालय, आंगनबाड़ी, स्कूल के सवाल उठते हैं तो फिर वही जवाब होता है, 'आप रेलवे की जमीन पर हो'.

यह और बात है कि महापालिका के चुनाव में वोट लेने का जब सवाल आता है तो इस तरह के सारे जवाब  गायब हो जाते हैं. दिलचस्प यह भी है कि यहां के ज्यादातर रहवासी बुनियादी सहूलियतों की लालसा में टैक्स देना चाहते हैं लेकिन महापालिका लेना नहीं चाहता. यानी केवल वोट के सवाल पर इन झोपड़पट्टी के लोग ‘महापालिका के लोग’ हैं, अन्यथा ‘रेलवे के लोग’. देखा जाए तो झोपड़ियों तक रोशनी पहुंचाना, कायदे से महापालिका का फर्ज है मगर फायदे के मद्देनजर यह काम प्राइवेट कंपनी संभाले हुए हैं. इसी प्रकार, इन इलाकों में सरकार के बजाय स्वैच्छिक संस्थाएं आंगनबाड़ियां चलाती हैं.

11 फरवरी 2009 को, सरकारी कामकाज के समय यानी सुबह 10 से 1 और दोपहर 2 से 5 तक, रेलवेपट्टी के दोनों तरफ की 400 झोपड़ियां तोड़ी गईं. अंबेडकरनगर के ठाकुरभाई बताते हैं, 'डेमोलेशन दस्ते में 3 बुल्डोजर, 125 के आसपास पुलिस के जवान, 50 के आसपास रेलवे सुरक्षा गार्ड, बहुत सारे रेलवे के अधिकारी, कर्मचारी थे. आगे-आगे डेमोलेशन, उसके पीछे-पीछे महापालिका वाले नल, गटर के पाईप और बिजली के तार काटते जाते थे.'

लोग इस बात को लेकर उत्सुक थे कि अगले दिन झोपड़ियां कहां तोड़ी जाएंगी. लेकिन यह सवाल अनुत्तरित रह गया. अंबेडकरनगर जैसी झोपड़पट्टी के तमाम रहवासियों की तरह अंजू बेन भी इस उम्मीद में थीं कि कोई-न-कोई आएगा, तोड़-फोड़ रोक ही देगा. हर साल वोट लेने वालों से यह उम्मीद तो थी ही. लेकिन अगले दिन की सुबह के साथ तमाम उम्मीदों की भी उम्र टूटी और अंबेडकरनगर का ठिकाना उखाड़ फेका गया. सैकड़ों सिर के ऊपर से दुनिया, दुनिया की चाहरदीवारी में रखी मामूली सुख देने वाली सुविधाएं एक झटके में मिट्टी में मिल गईं.

कोई हमदम ना रहा
अंजू बेन के घर-गृहस्थी के तार तो टूटे ही, घरवाला भी टूट गया. अंजू बेन का पति सूरज यादव अच्छा खासा आटो चालक था, सप्ताह भर पहले ही उसने कोई 1500 रुपये लगाकर आटो की मरम्मत भी करवाई थी. लेकिन उस रोज झोपड़पट्टी तोड़ने वालों ने उसके साथ मारपीट की और आटो भी ले उड़े. सूरज ने अगली सुबह पुलिस की टेबल पर अपने आटो का सवाल रखा, जबाव मिला- अब वह एक सरकारी संपत्ति है. सूरज तब से अब तक लापता है.

मुसलमान परिवार की अंजू बेन ने 20 नंवबर, 1991 को सूरज यादव के साथ नई दुनिया बसायी थी. अंजू बेन 10 की उम्र में भारूच जिले के भाखोदरा से पिता की पान की टपरी के साथ सूरत चली आई थी, 10वीं पढ़ने के बाद वह सेठों के घरों में काम पर लगी. नई दुनिया बसाते ही उसे भाड़े के अलग-अलग मकानों को बदलना पड़ता था. बदलते हुए मकानों के बीच ही काजल हुई, और जब वह बड़ी होने लगी तो 1995 में अंजू बेन ने बराछा-कापुदरा पुलिस-स्टेशन के पीछे 30000 रूपए में झोपड़ा खरीदा. 2001 में उसने वह झोपड़ा डेढ़ लाख में इन उम्मीदों के साथ बेचा कि सस्ता झोपड़ा मिलेगा, बचे हुए पैसे से मजूरी की जगह कोई धंधा-पानी शुरू होगा.

इसी साल आटो तो आया लेकिन बाकी का पैसा चोरी हो गया. हादसे के 4 रोज बाद दिमागी असंतुलन बिगड़ने के चलते अंजू बेन को नवी सिविल अस्पताल लाया गया, सारी दवाईयां सदमे के सामने बेअसर-सी ही रहीं. ऐसी नाजुक घड़ी में अगला ठिकाना कोसाठ के भाड़े का झोपड़ा बना. 2006 की बाढ़ में वह भी साथ छोड़ गया.

दर-दर की ठोकर खाने के बाद आखिरी आशियाना अंबेडकरनगर रहा, यहां कुछेक महीने बीतते ही डेमोलेशन का पहला कहर झेला. लंबी खामोशी के बाद डेमोलेशन का दूसरा कहर अब ऐसा बरपा है कि घरबार तो दूर, घरवाला ही अलग हो चुका है.

इस बच्चे का हत्यारा कौन है ?
11 फरवरी को ही संगम टेकरी की मीरा बेन सहित कुल 168 रहवासियों की झोपड़ियां भी देखते-देखते जमींदोज कर दी गईं. मीरा बेन की झोपड़ी महापालिका की जमीन पर थी और पड़ोस की गोटी बेन की रेलवेकी जमीन पर. अभी भी मीरा बेन-गोटी बेन के सवाल जवाब मांगते हैं कि ‘झोपड़ियां तोड़ी किसने’, ‘मुआवजा देगा कौन’? जबाव में महापालिका ने रेलवे आफिस का पता बताया है, रेलवे के आफीसर ने महापालिका का ठिकाना.

मीरा बेन कहती हैं, 'अगर आदमी को फांसी पर लटकाना तय हो, मगर तारीख तय न हो तो उसे नींद कैसे आएगी? ऐसे ही है हमारी जिंदगी. बार-बार हमें हमारी झोपडियों सहित उजाड़ना है, बार-बार नुकसान सहना है, मगर कब- तारीख कोई नहीं जानता. इसलिए इधर कोई चाहकर भी न तो अपना झोपड़ा सजाता है, न ही झोपड़े का सामान बढ़ाता है. हमारे भीतर से तो बड़ी बिल्डिंग और कारों वाली तस्वीर चिपकाने की चाहत उड़ चुकी है. ‘कल भी आबाद रहेंगे’- इसी चाहत में राहत भरी नींद आ जाए, अब यही बहुत है.'

संगम टेकरी बांस के खूबसूरत फर्नीचर और माटी की मूर्तियां बनाने वाले भील, बसावा और मुसलमानों की बस्ती है. डेमोलेशन की मार से श्रीराम का पक्का मंदिर भी टूट चुका था. यहां के हिन्दू-मुसलमान कलाकारों ने बांस-लकड़ी की शानदार कलाकारी से मंदिर को तो दोबारा खड़ा कर लिया है लेकिन मंजू बेन के 2 दिन के लड़के को कौन लौटाएगा?

वह खाना बनाने-खाने का समय था, अचानक बुल्डोजर चलते ही पूरा समय हर तरफ अफरा-तफरी के माहौल में बदल गया. मंजू बेन को 5 किलो आटा बचाने के लिए 5 मिनट का भी समय नहीं मिला. वह हड़बड़ाहट में उसी खटिया पर गिरीं, जिस पर उनका 2 दिनों का बच्चा सो रहा था. 2 दिन पहले इस दुनिया में आया बच्चा दबा और हमेशा के लिए उसने आंखें मूंद ली. मगर बुल्डोजर न रूका.

बंटे हुए लोग
सामाजिक कार्यकर्ता भरत भाई कंथारिया कहते हैं, 'डेमोलेशन की ज्यादातर कार्यवाहियों मौसम के मिजाज को बिगड़ते हुए देखकर की जाती हैं. सारे झोपड़े एक साथ न तोड़कर, कभी 200 तो कभी 400 की संख्या में तोड़े जाते हैं, जिससे लोग संगठित न हो सकें. ऐसे हमले अचानक और बहुत जल्दी-जल्दी होते हैं.’

ऐसा नहीं है रेलवे पट्टी के लोगों का पुनर्वास महापालिका नहीं कर सकती. मुंबई में जब रेलवे पट्टी के लोगों को हटाया गया तो स्थानीय महापालिका ने बाशी और उससे लगे एक बड़े इलाके में पुनर्वास करवाए. जो बीते 2-3 सालों से लगातार चल भी रहे हैं. लेकिन देश भर की रेलवे पट्टियों के आसपास मौजूद बसाहटों के पुनर्वास की कोई ठोस रूपरेखा नहीं है. इससे जुड़े तमाम तथ्यों, उम्मीदों, संवेदनाओं और हकों से जुड़े सवाल भी फिलहाल रूके हुए हैं.

पचासों सालों से अपनी जगहों पर रूके लोगों के दिलों-दिमाग में ‘अस्थायी’ और ‘पराया’ होने का एहसास बरकरार है. रेलवे पट्टी की जनता कहीं अलग-अलग राज्य, जुबान, तो कहीं अलग-अलग जाति, धर्म, पार्टी जैसे धड़ों में बिखरी है, भटकी है. कुल मिला कर रेलवे पट्टी की बड़ी तादाद एक साथ होकर भी ‘एक’ नहीं है. उनके हिस्से में वोट भी हैं, उलझने भी. उनकी जिंदगी में पुनर्वास और बुनियादी सहूलियतों की उम्मीदें रेलवे की दो पटरियों की तरह हो चुकी हैं. जो सामानांतर चलती तो हैं, लेकिन मिलती कभी नहीं.

4.11.09

शिव के राज में विस्थापितों पर गिरी गाज

शिरीष खरे

खण्डवा। नर्मदा बचाओ आंदोलन के गैरकानूनी दमन के विरोध में अनिश्चितकालीन धरना और क्रमिक अनशन को देशव्यापी समर्थन मिलते देख पुलिस ने अचानक भारतीय दण्ड विधान की धारा 333 के तहत एक और केस दर्ज किया है। इसके बाद आंदोलन की तरफ से जारी प्रेस रिलीज में कहा गया है कि न्यायालय के आदेशों का पालन करने की मांग करने वालों के साथ-साथ संघर्षरत किसान-आदिवासियों पर प्रशासनिक कहर दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। पुलिस नए-नए केसों में उन्हें इस तरह से उलझा रही है कि न्यायालय के आदेशों की मांग करने वाले घबराकर दब जाएं। पुलिस और प्रशासन का यह कृत्य कानून का शासन स्थापित करने में बाधक है। इससे न केवल लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है बल्कि लोकत्रांतिक मूल्यों में आम जनता की आस्था को भी क्षरित करने का दुष्प्रयास किया जा रहा है। प्रशासन की इस मनोवृति के खिलाफ आंदोलन अपना झण्डा बुलंद करेगा।


दूसरी तरफ प्रशासन के इस गैरकानूनी रवैए के विरोध में कई और जगहों से लगातार प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं। जनपहल की तरफ से भोपाल में कई कार्यकर्ताओं ने ‘राज्य मानवाधिकार आयोग’ से दोबारा मुलाकात की और प्रशासन के गैरकानूनी दमन से जुड़े ताजा सबूत पेश किए। आयोग ने इसे गंभीर मानते हुए कहा है कि जिला प्रशासन बुधवार को दी जाने वाली रिपोर्ट में अपनी स्थिति साफ करने वाला है, इसके बाद ही कार्यवाही तय की जाएगी। इंदौर में 50 से अधिक आंदोलन सर्मथकों के एक प्रतिनिधिमण्डल ने कमिशनर से मिलकर खण्डवा जिला प्रशासन की इस दमनकारी नीति का विरोध किया है। प्रतिनिधिमण्डल में वरिष्ठ शिक्षाविद प्रोफेसर आर डी प्रसाद, साहित्यकार सरोज कुमार, संस्कृतिकर्मी चिन्मय मिश्र, शिल्पी केन्द्र के अमूल्य निधि, झुग्गी बस्ती संघर्ष मोर्चा के राकेश चांदोरे ने इस घटना को प्रभावितों के नीतिगत अधिकारों का हनन बताया है। उधर छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा ने दुर्ग में मशाल रैली करने का फैसला लिया है।


हरदा में नारायण टाकीज चौक पर समाजवादी जन परिषद और क्रांति हम्माल जन यूनियन ने आंदोलन के समर्थन में धरनाप्रदर्शन किया। इस दौरान सजप के महामंत्री सुनील ने उच्च न्यायालय के आदेशों के पालन की मांग करने वाले आंदोलनकारियों को हिरासत में लिए जाने को न्यायालय की अवमानना बताया है। बड़वानी में जागृत दलित आदिवासी संगठन ने जिला कलेक्टर को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन देकर आंदोलन का समर्थन किया। इधर खण्डवा में धरनास्थल पर मेधा पाटकर सहित आंदोलन के हजारों कार्यकर्ताओं और समर्थकों की मौजूदगी में कार्यक्रम जारी हैं।

2.11.09

सरकार जो गैरकानूनी हथकण्डे अपना रही है

शिरीष खरे

खण्डवा। यहां से दो खबरें हैं, पहली वो जो यहां की नहीं है और यहां सबको पता है कि सरकार ने हिंसक-गैरकानूनी हथकण्डे अपनाने वाली माओवादी ताकतों को कुचलने की ठानी है। दूसरी खबर वो जो यहां की है और यहां से बाहर अभी बहुत कम लोगों को पता है कि सरकार खुद हिंसक-गैरकानूनी हथकण्डे अपना रही है, इस तरह वह शांतिपूर्ण तरीके से विरोध जताने वाले नर्मदा घाटी के डूब प्रभावितों के विरोध को दबा देना चाहती है। यह और बात है कि पुलिस द्वारा नर्मदा बचाओ आंदोलन कार्यालय पर गैरकानूनी कब्जा किये जाने और दर्जनों बड़े कार्यकताओं को बगैर वारंट हिरासत में लिए जाने के बाद उठे विरोध को अब देश भर से समर्थन मिलने लगा है।

एक नजर में :

  • पिछली 30 अक्टूबर को पुलिस ने नर्मदा बचाओ आंदोलन, खण्डवा कार्यालय पर गैरकानूनी तरीके से कब्जा किया और आलोक अग्रवाल सहित कई बड़े कार्यकर्ताओं को बगैर वारण्ट हिरासत में लिया।


  • अगले रोज विद्युत विभाग की जांच के नाम पर आंदोलन के कार्यालय को फिर से निशाना बनाया गया। विद्युत विभाग के कर्मचारियों की बजाय पुलिस वाले बिल लेकर पहुंचे।


  • चित्तरुपा पालित और रामकुंवर ने कार्यालय पर गैरकानूनी कब्जे के खिलाफ जेल के भीतर अनिश्चितकालीन अनशन शुरू कर दिया। इसके समर्थन में महेश्वर, अपरवेदा और ओंकारेश्वर बांध के हजारों प्रभावितों का भी अनिश्चितकालीन धरना और क्रमिक अनशन शुरू हो गया।


  • बरगी बांध से प्रभावित धरने में शामिल हुए। इसके अलावा बड़वानी, हरदा, भोपाल, इंदौर, जबलपुर आदि जगहों पर आंदोलन के समर्थन में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए।


  • मेधा पाटकर के नेतृव्य में एक प्रतिनिधि मण्डल कलेक्टर से मिला। उन्होंने आंदोलनकारियों में लगाये गए झूठे मामलों को तुरंत वापिस लेने की मांग की।


  • राज्य मानवाधिकार आयोग ने जिला कलेक्ट्रर और पुलिस अधीक्षक को नोटिस भेजकर 3 दिनों में घटना की रिपोर्ट मांगी।

मामला यही थमता नजर नहीं आ रहा है बल्कि आंदोलन के समर्थन में अब शहर से लेकर देशभर के कई जन संगठन और नागरिक समूह भी सामने आ रहे हैं। रिटायर कर्नल वोम्बेटकेरे ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर पुलिस की असंवैधानिक कार्यवाही के बारे में बताया है। दूसरी जगहों से कई समुदायों ने सरकार से उच्च न्यायालय के आदेशों के तहत विस्थापितों को खेती की जमीन और अन्य पुनर्वास लाभ दिए जाने की वकालत की है।

इस सबंध में वरिष्ठ गांधीवादी विचारक सुश्री राधा भट्ट और उत्तराखण्ड नदी बचाओ अभियान के बसंत पाण्डे ने भी मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कार्यकताओं की रिहाई के लिए मांग की है। पीपुल्स यूनियन आफ डेमोक्रेटिक राईटस ने अपनी प्रेस रिलीज में आंदोलन के प्रति एकजुटता जाहिर की है। साथ ही एक आनलाइन पेटिशन में दुनियाभर से अबतक 500 से ज्यादा लोगों और समूहों ने दस्तखत करके बांध प्रभावितों के दमन पर आपत्ति दर्ज की है। वहीं एशियन मानवाधिकार आयोग ने भी घटना की निंदा करते हुए एक्शन एलर्ट जारी किया है।

खंडवा में धरनास्थल पर बैठे कई आंदोलनकारी यह मानते हैं कि सरकारी मशीनरी अभी भी अपनी सारी ताकत उच्च न्यायालय के आदेशों को मानने की बजाय विस्थापितों के संघर्ष को दबाने में खर्च कर रही है। आंदोलन कार्यालय को निशाना बनाया जाना प्रशासन का एक नया और गैरकानूनी हथकण्डा है। इसी के चलते पुलिस ने आंदोलन कार्यालय को गैरकानूनी ढ़ंग से अपने नियंत्रण में लिया और वरिष्ठ कार्यकर्ता आलोक अग्रवाल को बगैर वारण्ट गिरफ्तार भी किया। पुलिस ने आलोक अग्रवाल की गिरफ्तार को लेकर गुमराह भी किया। एक तरफ लोगों को बताया गया कि उन्हें पूछताछ के लिए लाया गया है दूसरी तरफ वकील से कहा गया कि उन्हें पुराने मामले में गिरफ्तार किया गया है।
जिला प्रशासन के इशारे पर विद्युत विभाग ने जिस तरीके से कार्यालय की जांच की उसे लेकर भी आंदोलनकारी गुस्से में हैं। जांच के बाद विद्युत विभाग ने आंदोलन कार्यालय को व्यवसायिक स्थल बताते हुए 15149 रुपए का अतिरिक्त बिल जारी कर दिया। बिल पहुंचाने विद्युत विभाग के कर्मचारियों की बजाय पुलिसकर्मी आए। आंदोलनकारी बताते हैं कि कार्यालय में बांध प्रभावितों के संवैधानिक अधिकार, कानूनी और लोकत्रांतिक तरीकों के संरक्षण से जुड़ा दस्तावेजीकरण होता है। यह तो किसी तरह की व्यवसायिक गतिविधि नहीं है। विद्युत विभाग तो पहले भी परेशान करता रहा है। वह तो कई बार ताला लगा होने की झूठी बात लिखकर ज्यादा बिल वसूलता रहा है जबकि विद्युत मीटर तो खुले वराण्डे में ही लगा हुआ है। आंदोलन अब इसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की भी सोच रहा है।
विस्थापितों के साथ धोखे पर धोखा

नर्मदा घाटी में बन रहे इंदिरा सागर और ओंकारेश्वर बांध के हज़ारों विस्थापितों को जमीन के बदले जमीन, वयस्क पुत्रों को जमीन और सभी को पुनर्वास की अन्य सुविधाएं देकर बसाना था। मगर इस नीति का खुला उल्लंघन करते हुए विस्थापितों को धोखे एवं दमन के आधार पर ही उज़ाडा गया है। इतना ही नहीं विस्थापितों के हक में दिये गये सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय के फैसलों पर भी अमल नही किया जा रहा है। प्रदेश और देश के विकास के नाम पर त्याग करने वाले लाखों विस्थापित आज दर दर की ठोकरें खाने पर मजबूर है जबकि दूसरी तरफ बांध बनाने वाली कम्पनी एनएचडीसी ने बीते 4 सालों में 1200 करोड़ रूपए से ज्यादा शुद्ध मुनाफा कमाया है।

इंदिरा सागर और ओंकारेश्वर बांध के हजारों विस्थापितों की माँग हैं कि :

इंदिरा सागर परियोजना में :

1. मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने नर्मदा बचाओ आंदोलन द्वारा दायर याचिका में पहले 8 सितम्बर 2006 और फिर 2 सितम्बर 2009 को यह आदेश दिया है कि किसानों के सभी वयस्क पुत्र और अविवाहित पुत्रियों को 5.5 एकड़ कृषि जमीन दी जाए। इसका पालन किया जाए।

2. विस्थापित मज़दूर परिवारों को डूब से खुलने वाली जमीन बांटी जाए और उन्हें सिंचाई की सुविधा दी जाए। जिससे वह पानी खुलने पर हर साल गेहूं और गर्मी की फसल ले सकें। इस तरह विस्थापित मजदूर परिवार भी इज्जत से रोजगार पा सकें।

3. इंदिरा सागर डूब क्षेत्र में विस्थापित मछुआरों के साथ गुंडागर्दी एवं मारपीट की जा रही हैं। इसे तत्काल रोका जाए और इंदिरा सागर में मछली मारने का अधिकार ठेकेदार को नहीं, विस्थापित को दिया जाए।

4. खेतीयोग्य जमीनों पर एनएचडीसी ने मामूली मुआवजा देकर कब्जा कर लिया है। इससे प्रभावित किसान दोबारा जमीन नहीं खरीद सके हैं। इसलिए जमीन के लिए दी जाने वाले विशेष पुनर्वास अनुदान (बढ़त राशि) को हरदा कमाण्ड के अच्छी दर 1.5 से 2 लाख रूपए एकड़ के हिसाब से दिया जाए।

5. अभी भी डूब क्षेत्र में छूटे हुए हजारों घर, जो मुआवजे से छूटे हैं, उनका भू-अर्जन करके मुआवजा दिया जाए।

6. जहां जमीन डूब चुकी है और अब जीने का कोई जरिया बचा ही नही है, उन गांवों के सभी घरों का भू-अर्जन करके विस्थापितों को मुआवजा और पुनर्वास दिया जाए।

7. इंदिरा सागर डूब क्षेत्र खासकर हरदा जिले में भयावह भ्रष्टाचार फैला है। प्रभावितों के अनुदान दलालों द्वारा अधिकारियों की मिलीभगत से निकाले जा रहे हैं। इस पर रोक लगाई जाए और स्वतंत्र जांच कर दोषियो को दण्डित किया जाए।

8. सभी पुनर्वास स्थलों पर विस्थापितों के लिए पूर्ण रोज़गार दिया जाए। उनके लिए बीपीएल राशन कार्ड बनाए जाएं और पुनर्वास स्थल पर स्कूल, अस्पताल, पेयजल आदि सभी सुविधाएं दी जाएं।

9. बहुत से गांवों में अभी तक परिवार सूची ही नही बनी है और वह पुनर्वास के समस्त लाभों से वंचित हैं, उन गांवों की परिवार सूचियां बनाकर, सभी विस्थापितों को पुनर्वास के लाभ दिये जाएं।

10. इंदिरा सागर के डूब में आने वाले छूटे हुए गांव का सर्वे करके परिवारों को मुआवजा और पुनर्वास दिया जाए।

11. 25 प्रातिशत से कम बची जमीन के भू-अर्जन के साथ परिसम्पत्तियों का भी अर्जन किया जाए।

12. जहां घर डूब हैं और जमीने बची हैं वहां 1 किलोमीटर के अंदर पुनर्वास स्थल का निमार्ण किया जाएं।

13. इंदिरा सागर बांध स्थल पर जल स्तर सूचित करने वाला स्केल मिटा दिया गया है, जो कि अत्यंत गंभीर है। बांध का जल स्तर बताने वाला सार्वजनिक स्केल फिर से लिखा जाए।

ओंकारेश्वर परियोजना में :

1. उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुसार विस्थापितों को सिंचित एवं उपजाऊ जमीन देकर बसाया जाए।

2. विस्थापितों को जमीन आवंटन के लिये अतिक्रमित जमीनों को न दिया जाए, जिससे अन्य गरीब परिवारों की रोटी न छिने और विस्थापित की सुरक्षित बसाहट हो सके।

3. उच्च न्यायालय की तारीख 23 सितम्बर 2009 और अन्य सभी आदेशों का तत्काल पालन किया जाए।

4. न्यायालयीन आदेश तथा पुनर्वास नीति के अनुसार कमाण्ड एरिया में विस्थापितों की इच्छा अनुसार घर प्लाट दिये जाएं।

5. छूटे हुए मकानों का भू-अर्जन किया जाए।

6. किसानों को अपर्याप्त मुट्ठी भर मुआवजा दिया गया है। कृषि जमीन का विशेष पुनर्वास अनुदान (बढ़त राशि) कम से कम 1.5 से 2 लाख रूपए एकड़ दिया जाए।

7. तालाब में मछली ठेकेदार को नहीं दी जाए। मछली मारने का सम्पूर्ण अधिकार विस्थापित को दिया जाए।

8. पुनर्वास के लाभों से वंचित सभी परिवारों को घर प्लाॅट, अनुदान व समस्त लाभ दिया जाए।

9. सन् 2004 में धाराजी प्रकरण में सैकड़ो लोगों को एनएचडीसी द्वारा पानी छोड़ने से बह जाना तथा पिछले महीने ग्राम कामनखेड़ा में नन्ही हरिजन बालिका का एनएचडीसी द्वारा पानी बढ़ाने से मौत के लिए जिम्मेदार एनएचडीसी को दण्डित किया जाए।

10.8.09

ऐसे सूरत की कैसी सूरत?

शिरीष खरे, सूरत से लौटकर
थेम्स नदी से लगे लंदन वाली तस्वीर के हू-ब-हू सूरत को लंदन जैसा बनाने की कवायद जोर पकड़ चुकी है। इसलिए ताप्ती के किनारे से हजारों झापड़ियों को साफ किया जा रहा है। सरकार के मुताबिक इसके बाद सूरत आबाद हो जाएगा। क्या सचमुच सूरत आबाद हो पाएगा? सूरत में स्लम एरिया हटाने के लिए केन्द्र (यूपीए) और राज्य (बीजेपी) सरकारों ने मिलकर 2,157 करोड़ की रणनीति बना ली है। दोनों (यूपीए-भाजपा) इन दिनों एक साथ 1 लाख से ज्यादा झोपड़ियां तोड़ रहे हैं। सूरत महापालिका का काम जमीने खाली करवाना और बिल्डरों को सस्ते दामों में बेचना है।
हालांकि शहर में ‘रहने’ और ‘रोजी-रोटी’ के कई सवाल गहरा गए हैं, जबाव हैं कि मिलतें नहीं। मिलतें हैं तो उन टूटी बस्तियों के बेरहम किस्से, जो सूरत के नए नक्शे से गायब हैं। आपके सामने है कतारगाम इलाके से गायब एक ऐसी ही बस्ती का किस्सा, वैसे यह व्यवस्था के गायब होने का किस्सा भी है : चंद्रकांत भाई रोज की तरह काम पर गए थे, शाम को लौटे तो पूरी बस्ती ही लापता थी। फिर उन्होंने पता किया कि बाकी लोग शहर से बाहर कोसाठ नाम की जगह पर गए हैं। घरवालों से मिलने के लिए उन्हें रिक्शा करके फौरन कोसाठ जाना पड़ा।
15 जून 04’ का यह किस्सा अकेले चंद्रकांत भाई का नहीं है, तब सूरत के बीचो बीच कतारगाम बस्ती के 155 घर शहर की खूबसूरती की भेंट चढे़ थे। बाकी के 55 कच्चे घरों का टूटना भी पक्का है, बस तारीख फाईनल नहीं हुई है। यहां की 2 एकड़ जमीन पर कभी 2,50 घरों की 2,000 आबादी बसती थी। 90 साल पुरानी इस बस्ती की जमीन ने करोड़ों का भाव पार किया तो यहां के असली मालिकों को सस्ते घरों समेत उखाड़ फेंका गया। गायत्री बेन बताती हैं- ‘‘न सूचना दी, न सुनवाई की। वैसे भनक लग गई थी कि खूबसूरती के लिए तालाब फैलेगा, हमारी जगह पिकनिक स्पाट में बदलेगी, पार्किंग और गार्डन को जगह मिलेगी, सुबह-शाम टहलने वालों का ‘स्पेशल-रुट’ बनेगा, बिल्डरों की दुकाने खुलेगी, बस्ती की बजाय मार्केट होगा।...आप तो वहीं से आ रहे हैं, हमारी बातें सच साबित हुईं ना!’’
कोसाठ, जहां हम खड़े हैं, यह कतारगाम से उजड़े रहवासियों का अगला ठिकाना बना। यह कतारगाम से ‘12 किलोमीटर’ दूर, शहर के उत्तरी तरफ का ‘आऊटसाइड’ और नक्शे के हिसाब से ‘बाढ़ प्रभावित’ इलाका है। कौशिक भाई बताते हैं- ‘‘यहां बसाए जाने का विरोध सुनकर महापालिका का अफसर बड़े ठण्डे दिमाग से बोला कि तुम्हें बस्ती बनाने की बजाय ऊंची मंजिलों में रहना चाहिए। बारिश का पानी भरे भी तो दूसरी, नहीं तो तीसरी मंजिल में चढ़ जाना।’’ तारीखे गवाह हैं कि 2004 की बाढ़ से सूरत के 30,000 लोग प्रभावित हुए थे। तब इन्हें न मंजिल नसीब हुई, न जमीन। एक साल बाद महापालिका से जगह (12 गुणा 35 वर्ग फीट/2 लाख) के बदले जगह (माटी के दाम जैसी) तो मिली लेकिन घर के बदले घर नहीं। न ही तोड़े गए लाखों के घरों और हजारों की गृहस्थियों का मुआवजा। एक साथ इनसे बिजली, पानी, नालियां, टायलेट, रास्ते, मैदान, बाजार, आंगनबाड़ी, स्कूल, राशनकार्ड, वोटरलिस्ट के नाम ऐसे छूटे कि अभी तक नहीं लौटे। इनके बगैर भी काम चल जाता, जब काम की छूट गए तो जिंदगी कैसे चले ?
काम छूट गए
‘‘जमीन, घर, गृहस्थी का नुकसान तो सबने देखा। लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान तो बेकारी से हुआ।’’ ऐसा कहना है नरोत्तम महापात्र का, कोसाठ में उनकी तरह ही दर्जन भर औरत-मर्द अपने-अपने ठिकानों के बाहर बैठे हैं। बातों ही बातों में मालूम पड़ता है कि पहले इन्हें ‘कतारगाम इण्डस्ट्रियल एरिया’ के ‘पावरलूम्स’ में दिहाड़ी मजदूरी मिल जाती थी। एक दिन में 1,50 और महीने भर में 3,500 से 4,000 रूपए तो बनते ही थे। कुछ लोग मजदूरों की छोटी-छोटी जरूरतों जैसे चाय, नाश्ता या खाने-पीने के धंधों से जुड़े थे। औरते, घरेलू काम के लिए आसपास की सोसाइटियों में जातीं और महीने भर में 6,00 रूपए कमाती थीं। इस तरह हर घर का हाल-चाल बहुत अच्छा तो नहीं, फिर भी चल रहा था। यहां आकर तो इनकी दुनिया ठहर ही गई है।
अज्जू मियां बताते हैं- ‘‘कतारगाम आओ-जाओ तो 40 रूपए अकेले आटो के। इसके बाद मजदूरी न मिले तो आफत। तब कारखानों के आसपास थे, मजदूरी मिलती ही थी। अब आसपास के दूसरे लोगों को ही रख लेते हैं।’’ यही हाल औरतों का है, घरों में काम करने से जितना (6,00 रूपए) मिलेगा उससे दोगुना तो अब भाड़े (12,00 रूपए) में जाएगा। रक्षा बेन बोली- ‘‘मालकिनों से जरूरत की चीजे और उधार के पैसे तो मिलते थे। यहां तो ऊंचे ब्याज-दर पर पैसे उठाने पड़ते हैं।’’ महीना भर पहले ही हेमंत भाई की बीबी टीबी के चलते खत्म हुईं हैं, उन्होंने ईलाज के लिए 12 रूपए/महीने के हिसाब से 10,000 उठाए थे। एक तो आमदनी नहीं, ऊपर से कर्ज का बढ़ता बोझ। यहां हरके कम से कम 25,000 रूपए का कर्जदार तो बना ही रहता है। इनमें से ज्यादातर ने घर बनाने के लिए कर्ज लिया था, जिसका ब्याज अब तक नहीं छूट रहा है।
राजेश भाई रिक्शा चलाते हैं। उन्होंने अधूरे खड़े घरों का इतिहास बताने के लिए 4 साल पुरानी बात छेड़ी- ‘‘तब 29 दिनों तक तो ऐसे ही पड़े रहे। बीच में जोर की बारिश हुई तो सबने चंदा करके यहां एक टेंट लगवाया। कईयों ने अपने टूटे घरों की लकड़ी, पनी और बांस से अस्थायी घर बनाए, जो भारी बाढ़ में बह गए। मेरी 90 साल की नानी और एक पैर से कमजोर मौसी ने जो तकलीफ झेली उसे कैसे सुनाऊं, बीबी टीबी की मरीज थी, उसे बच्ची को लेकर मायके जाना पड़ा।’’ यहां की हालत देखकर तो लगता है कि कच्चे-पक्के आशियाने एक बार बनने के बाद खड़े नहीं रहते, हर साल की बाढ़ से टूटते, फूटते, गिरते या बहते ही हैं। इस तरह मानसून के साथ आशियाने बनाने और सामान खरीदने की जद्दोजहद जारी रहती है। इस साल भी भारी बूंदों के साथ तबाही के बादल बरसने लगे हैं।
एसएमसी का (स्व)राज
सूरत महापालिका (प्र)शासन तरीके को टीना बेन के किस्से से समझते हैं। 1992 को टीना बेन 14 साल की थी, तब उन्हें घर के सामने खड़ा करके एक स्लेट पर उनका नाम, एनके परिवार वालों का नाम लिखवाकर फोटो ले लिया गया। 2005 को याने ठीक 12 साल बाद जब वह दो बच्चों की मां बनी तो भी उन्हें 1992 की फोटो के हिसाब से घर का मुआवजा मिला। समय के इतने बड़े अंतराल में घर तो क्या बस्ती की पूरी दुनिया ही बदल जाती है, लेकिन नहीं बदलती है तो सूरत महापालिका की मानसिकता।
कतारगाम में किसी का घर 30 तो किसी का 60 फीट की जगह पर था, लेकिन कोसाठ में सभी को 12 गुणा 35 वर्ग फीट के फार्मूले से जगह बांटी गई। अब आप ही बताइए 12 गुणा 35 वर्ग फीट में कोई क्या बनाएगा, जो बनेगा उसे चाहे तो किचन कह लो, नहीं तो टायलेट, बाथरूम, बेडरूम, हाल या गेलरी, कुछ भी कह लो। ऐसी बस्तियों में लम्बे समय से काम करने वाले अल्फ्रेड भाई बताते हैं- ‘‘महापालिका जिन मकानों को तोड़ने की ठान लेती है उनसे टेक्स वसूलना बंद कर देती है। जिससे टेक्स नहीं लिया जाता वह डर जाता है, अगला नम्बर उसका भी हो सकता है! बुलडोजर आने से पहले पुलिस के पास बस्ती में कड़ा विरोध करने वालों की वाकायदा एक लिस्ट होती है। उन्हें डेमोलेशन से पहले ही धर दबोचा जाता है। कुल मिलाकर सूरत में तोड़-फोड़ की ज्यादातर कार्यवाहियों को तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण भरे माहौल में निपटा लिया जाता है।’’
लौटते वक्त नानदीप मिला। इतनी बड़ी बसाहट में अकेला यही लड़का पढ़ने जाता है, वह भी 2 किलोमीटर दूर के एक मंहगे प्राइवेट स्कूल में। 9 वीं में पढ़ने वाले नानदीप ने बताया- ‘‘जिन महीनों में स्कूल की फीस और टेम्पो का पैसा रहता है, उन्हीं महीनों में ही स्कूल जाता हूं। कतारगाम वाले स्कूल (महापालिका) में इतने हाई-फाई बच्चे नहीं थे। लेकिन यहां के बच्चों के साथ बैठने, पढ़ने में अच्छा नहीं लगता। क्लास 6 में वहां मेरी ‘बी’ ग्रेड थी, और यहां ‘सी’।’’ यह है एसएमसी और प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा और सभ्यता के बीच की खाई। नानदीप जैसे बच्चों से खाई भरने की उम्मीद पालना नाइंसाफी होगी।
काहे के कायदे, वायदे
डेमोलेशन की कानूनी लड़ाईयों में उलझने वाले भरत भाई से यह मालूम हुआ कि इस दौरान ‘यूनाईटेड नेशन’ की गाईडलाईन निभानी जरूरी थी। यहां डेमोलेशन के पहले और बाद में ‘मानव-अधिकारों’’ का खुला अपमान हुआ। जिन्हें उखाड़ना था, उनके साथ बैठकर पुनर्वास और राहत की बातें की जानी थी। गाईडलाईन कहती है कि विकलांग, बुजुर्ग और एसटी-एससी को उनके रोजगार के मुताबिक और पुराने झोपड़े के पास ही बसाया जाए। पीड़ित आदमी को पहले पुनर्वास वाली जगह दिखाई जाए, इसके बाद अगर वह मांग करता है तो उसे कोर्ट में जाने का हक भी है। इसके लिए कम से कम 90 दिनों का समय भी दिया जाए। लेकिन सूरत महापालिका ने तो एक भी कायदा नहीं निभाया।
मावजी भाई, 62 साल के दलित नेता है। कतारगाम बस्ती में डेमोलेशन (2004) के वक्त वहीं थे, पुलिस ने उन्हें भी खूब पीटा, दो दिनों तक जेल में भी रखा। मावजी भाई बताते हैं- ‘‘हमारे नामों को अभी तक वोटरलिस्ट में नहीं लाना, संयोग नहीं, एक साजिश है। महापालिका के चुनाव फिर आ गए, ऐसे में हर एक का राजनैतिक वजूद भी तोड़ा गया है।’’ डेमोलेशन के वक्त आप लोग कारर्पोरेटर (महापालिका का मेम्बर) के पास गए थे ?’ मेरे इस औपचारिक भरे सवाल पर ममता आपा अपनी हंसी नहीं रोक सकीं, वह बोलीं- ‘‘गए थे, वह बोला कि बहुत तेज बुखार आया है, उठने में महीना भर तो लगेगा। 5 साल होने को हैं, न उसका बुखार उतरा, न ही कोई विधायक, मंत्री, सांसद इस तरफ आया।
जैसा कि सब जानते हैं महात्मा गांधी को ‘कालेपन’ की वजह से एक रात साऊथ-अफ्रीका में चलती ट्रेन से फेंका गया था। उन्हीं महात्मा को अपना बताने वाले गुजरात के सूरत में हजारों भारतीयों को ‘झोपड़पट्टी-वाला’ होने की वजह से 25 किलोमीटर दूर फेंका गया है। 120 साल पहले हुए अन्याय का किस्सा इतिहास नहीं वर्तमान है, जो भविष्य में भी बार-बार दोहराया जाएगा। हां यह और बात हैं कि कल कतारगाम जैसी बस्तियों का उल्लेख खोजने से भी नहीं मिलेगा। लेकिन शायद कातरगाम के निवासी नहीं जानते हैं कि सूरत चमकाने के लिए कोई न कोई कीमत अदा करता ही है. यहां, इस शहर में यह कीमत उनसे वसूली जा रही है.

10.1.09

गांव-गांव टूटकर, ठांव-ठांव बन गए













मेलघाट टाइगर रिर्जव एरिया से

इस साल ज्यों ही टाइगर रिजर्व बना कोरकू जनजाति का जीवन दो टुकड़ों में बट गया. एक विस्थापन और दूसरा पुनर्वास. ऊंट के आकार में उठ आये विस्थापन के सामने पुनर्वास जीरे से भी कम था. पुराने घाव भरने की बजाय एक के बाद एक प्रहारों ने जैसे पूरी जमात को ही काट डाला. अब इसी कड़ी में 27 गांव के 16 हजार लोगों को निकालने का फरमान जारी हुआ है. अफसर कहते हैं बेफिक्र रहिए, कागज में जैसा पुनर्वास लिखा है ठीक वैसा मिलेगा. जबाव में लोग पुनर्वास के कागजी किस्से सुनाते हैं. और आने वाले कल की फिक्र में डूब जाते हैं.


10 तक का पहाड़ा न आने के बावजूद 1974 यहां के बड़े-बूढ़ों की जुबान पर रखा रहता है. 1974 को `वन्य जीव संरक्षण कानून´ बना और `मेलघाट टाइगर रिजर्व´ वजूद में आया. कुल भू-भाग का 73 फीसदी हिस्सा कई तरह की जंगली पहाड़ियों से भरा है. बाकी जिस 27 फीसदी जमीन पर खेती की जाती है वह भी बारिश के भरोसे है. इस तरह आजीविका का मुख्य साधन खेती नहीं बल्कि जंगल ही है. इस 1677.93 वर्ग किलोमीटर इलाके को तीन हिस्सों में बांटा गया है- (पहला) 361.28 वर्ग किलोमीटर में फैला गुगामल नेशनल पार्क, (दूसरा) 768.28 वर्ग किलोमीटर में फैला बफर एरिया और (तीसरा) 1597.23 वर्ग किलोमीटर में फैला मल्टीपल यूजेज एरिया. तब के दस्तावेजों के मुताबिक सरकार ने माना था कि इससे कुल 62 गांव प्रभावित होंगे.

विराट गांव के ठाकुजी खड़के ने बताया कि- ``परियोजना को लेकर हम लोगों से कभी कोई जिक्र नहीं किया गया. 1974 में तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और प्रदेश के वनमंत्री रामू पटेल अपने काफिले के साथ यहां आए और कोलखास रेस्टहाउस में ठहर गए. उस वक्त रामू पटेल ने आसपास के खास लोगों को बुलाकर इतना भर कहा था कि सरकार शेरों को बचाना चाहती है इसलिए यहां शेर के चमड़ा बराबर जगह दे दो.´´ लेकिन यह चमड़ा चौड़ा होते-होते अब पूरे मेलघाट को ही ढ़कने लगा है. ऐसी स्थिति में `चाईल्ड राईटस एण्ड यू´ और `प्रेम´ संस्थाएं कोरकू जनजाति के साथ कदम से कदम मिलाकर संघर्ष कर रही हैं. `चाईल्ड राईटस एण्ड यू´ के महाप्रंबधक कुमार नीलेन्दु के मुताबिक- ``सरकार जनता के हितों के लिए काम करती है. मगर यहां तो स्थिति एकदम उल्टी है. कभी संरक्षण तो कभी विकास के नाम पर जनजातियों का ही विनाश जारी है. ऐसी योजना में न तो लोगों को शामिल किया जाता है और न ही खुली नीति को अपनाया जाता है. इसलिए व्यवस्था में घुल-मिल गई कई खामियां अब पकड़ से दूर होती जा रही हैं. सरकार हल ढ़ूढ़ने की बजाय हमेशा नई उलझनों में डाल देती है.´´

इस दिशा में पहला काम 1974 को बाघों की संख्या खोजने के लिए सर्वे से शुरू हुआ. 6 सालों तक तमाम कागजी कार्यवाहियों का दौर चलता रहा जिसमें सारी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई. 1980 से `वन्य जीव संरक्षण कानून´ व्यवहारिक अगड़ाईयां लेने लगा. पसतलई गांव के तुकाराम सनवारे कहते हैं- ``जब बाबू लोग फाइलों को लेकर इधर-उधर टहलते तब हमने नहीं जाना था कि वह एक दिन जंगलों को इस तरह बांट देंगे. वह जीपों में सवार होकर आते और हर बस्ती की हदबंधी करके चले जाते. साथ ही हमसे खेती के लिए जमीन देने की बातें कहते. हमें अचरज होता कि जो जमीन हमारी ही है उसे क्या लेना. उनकी यह कागजी लिखा-पढ़ी 6 महीने से ज्यादा नहीं चली.´´ सेतुकर डांडेकर ने बताया- इतने कम वक्त में उन्होंने कई परिवारों को खेती के लिए पट्टे बांट देने की बात कर डाली. लेकिन उस वक्त कई परिवार पंजीयन से छूट गए. ऐसा लोगों के पलायन करने और सर्वे में गड़बड़ियों के चलते हुआ. इस तरह उन्होंने हमारी बहुत सारी जमीन को अपनी बताया. हमने भी जमीनों को छोड़ दिया. वन-विभाग ने ऐसी जमीनों पर पेड़ लगाकर उन्हें अपने कब्जे में ले लिया. हमारी सुनवाई एक बार भी नहीं हुई.´´ इस तरह किसानों की एक बड़ी आबादी को मजदूरों में बदल डाला. रोजगार गांरटी योजना के तहत अब तक 45780 मजदूरों के नाम जोड़े जा चुके हैं.

1980 के खत्म होते ही जंगल और आदिवासी के आपसी रिश्तों पर होने वाला असर साफ-साफ दिखने लगा. एक-एक करके उन्हें जंगली चीजों के इस्तेमाल से पूरी तरह बेदखल कर दिया गया. उन्हें भी लगने लगा जंगल हमारा नहीं, पराया है. इस पराएपन के एहसास के बीच उन पर जंगल खाली करने का दबाव डाला गया. `मेलघाट टाइगर रिजर्व´ से सबसे पहले तीन गांव कोहा, कुण्ड और बोरी के 1200 घरों को विस्थापित होना पड़ा था. पुनर्वास के तौर पर उन्हें यहां से करीब 120 किलोमीटर दूर अकोला जिले के अकोठ तहसील भेज दिया गया. कुण्ड पुनर्वास स्थल में मानु डाण्डेकर ने बताया कि- ``सर्वे में तब जो गड़बड़ियां हुई थी उन्हें हम अब भुगत रहे हैं. जैसे 6 परिवारों को यहां आकर मालूम चला कि उन्हें खेती के लिए दी गई जमीन तो तालाब के नीचे पड़ती है. अब आप ही बताए पानी में कौन-सी फसल उगाए? जो जानवर हमारी गुजर-बसर का आसरा हुआ करते थे इधर आते ही उन्हें बेचना पड़ा. क्योंकि चराने के लिए यहां जमीन नहीं थी इसलिए सड़क के किनारे-किनारे चराते. इस पर आसपास के लोग झगड़ा करते और कहते कि हमारे जानवर कहां चरेंगे ? हम आदमी के मरने पर उसे जमीन के नीचे दफनाते हैं. लेकिन यहां कहां दफनाए ?´´

पुनर्वास-नीति के कागजों में दर्ज हर सुंदर कल्पना यहां आकर दम तोड़ देती है. इन पुनर्वास की जगहों पर दौरा करने के बाद मूलभूत सुविधाओं का अकाल नजर आया. तीनों गांवों के बीचोबीच जो स्कूल खोला गया उसकी दूरी हर गांव से 2 किलोमीटर दूर पड़ती हैं. इस तरह गांव की बसाहट एक-दूसरे से बहुत दूर-दूर हो गई है. आंगनबाड़ी यहां से 5 किलोमीटर दूर अस्तापुर में हैं. प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के लिए 10 किलामीटर दूर रूईखेड़ा जाना होता है. इन्हें जिन इलाकों में जगह मिली है वह आदिवासी आरक्षित क्षेत्र से बाहर है इसलिए यह सरकार की विशेष सुविधाओं से भी बाहर हो गए हैं. जैसे पहले इन्हें राशन की दुकान पर अन्तोदय योजना से 3 रूपए किलो में 15 किलो चावल और 2 रूपए किलो में 20 किलो गेहूं मिल जाता था. वह अब नहीं मिलता. और तो और यहां बीपीएल में केवल 3 परिवारों के नाम ही जुड़ सके हैं. लगता है बाकी के हजारों परिवार इस सूची से भी विस्थापित हो गए हैं. 2002 में शासन ने बिजली, पानी और निकास के इंतजाम का वादा किया गया था. बीते 6 सालों में यह वादा एक सपने में तब्दील हो गया.

यहां से 4 किलोमीटर दूर कुण्ड गांव से विस्थापित नत्थू बेलसरे की सुनिए- ``6 साल पहले खेती के लिए मिली जमीन कागज पर तो दिखती है मगर यहां ढ़ूढ़ने पर भी नहीं मिलती. इसके लिए अमरावती से लेकर नागपुर तक कई कार्यालयों के चक्कर लगाए लेकिन जमीन का कोई अता-पता नहीं. इस पर बाबू लोग हैरान और हम परेशान हैं.´´ यहां से 4 किलोमीटर दूर कोहा पुनर्वास स्थल में हरिजंड बेलसरे और हीरा मावस्कर ने खेती के लिए जमीन नहीं मिलने की बात बताई. कुण्ड पुनर्वास स्थल पर तो 11 परिवारों को घर के लिए न तो पैसा मिला और न ही जमीन. लोगों ने कहा कि वह आज भी इधर-उधर गुजर-बसर कर रहे हैं. लेकिन कहां हैं, यह कोई नहीं जानता.

बोरी पुनर्वास स्थल में सुखदेव एवले ने बताया कि- ``हमारी पुश्तैनी बस्तियों को हटाए जाने के पहले इसकी कोई कागजी खबर और तारीख देना भी मुनासिब नहीं समझा गया। अफसर आते और कह जाते बस अब इतने दिन और बचे, फिर तुम्हें जाना होगा। उनका बस्ती हटाने का तरीका भी अजीब है. जिस बस्ती के इर्द-गिर्द 8-15 दिन पहले से ट्रक के ट्रक घूमने लगे, समझो घर-गृहस्थी बांधने का समय आ गया. कर्मचारियों के झुण्ड के झुण्ड चाय-पान की दुकानों पर जमा होकर तोड़ने-फोड़ने की बातें करते हैं. कहते हैं दिल्ली से चला आर्डर तीर की तरह होता है, आज तक वापिस नहीं लौटा. अगर समय रहते हट गए तो कुछ मिल भी जाएगा. नहीं तो घर की एक लकड़ी ले जाना मुश्किल हो जाएगा. ऐसी बातों से घबराकर जब कुछ लोग अपने घर की लकड़ियां और घपड़े उतारने लगते हैं तो वह बस्ती को तुड़वाने में हमारी मदद करते हैं. हमारे लड़को को शाबाशी देते हैं. देखते ही देखते पूरी बस्ती के घर टूट जाते हैं.´´

इसी तरह वैराट, पसतलई और चुरनी जैसे गांवों के घर भी टूटने वाले हैं. पुनर्वास के लिए शासन को 1 करोड़ 9 लाख रूपए दिये गए हैं. अधिकारियों को यह रकम बहुत कम लगी इसलिए उन्होंने और 2 करोड़ रूपए की मांग की है. ऐसे अधिकारी जंगल और जमीन के बदले नकद मुआवजों पर जोर देते हैं. जानकारों की राय में नकद मुआवजा बांटने से भष्ट्राचार की आशंकाएं पनपती हैं. जैसे सरदार सरोवर डूब प्रभावितों को नकद मुआवजा बांटने की आड़ में भष्ट्राचार का बांध खड़ा हो गया. जिसमें अब कई अधिकारी और दलालों के नाम उजागर हो रहे हैं. यहां भी कोरकू जनजाति का रिश्ता जिन कुदरती चीजों से जुड़ा है उसे रूपए-पैसों में तौला जा रहा हैं. लेकिन जनजातियों को रूपए-पैसों के इस्तेमाल की आदत नहीं होती. इसके पहले भी विस्थापित हुए लोगों के पास न तो जंगल ही रहा और न ही नकद. आखिरी में उसकी पीठ पर बस मुसीबतों का पहाड़ रह जाता है. वैराट गांव की मनकी सनवारे कहती है-``यहां से गए लोगों की हालत देखकर हम अपना जंगल नहीं छोड़ना चाहते. सरकार के लोग बस निकलने की बात करते हैं लेकिन अगले ठिकानों के बारे में कोई नहीं बोलता.´´

`प्रेम´ संस्था के संजय इंग्ले मानते हैं- ``शासन के पास दर्जनों गांवों को विस्थापित करने के बाद उन्हें एक जगह बसाने की व्यवस्था नहीं हैं. जिस अनुपात में विस्थापन हो रहा है उसी अनुपात में राहत मुहैया कराना बेहद मुश्किल होगा. पुराने तजुर्बों से भी ऐसा जाहिर होता है इसलिए अब और विस्थापन सहन नहीं होगा´´ उनके साथ वैराट, पसतलई और चुरनी गांवों से तुकाराम सनवारे, तेजुजी सनवारे, फकीरजी हेकड़े, किशनजी हेकड़े, शांता सनवारे, सुले खड़के, फुलाबाई खड़के और गोदाबाई सनवारे जैसी हजारो आवाजों ने विस्थापन के विरोध में एक आवाज बुलंद की है. क्या उनकी यह गूंज जंगल से बाहर भी सुनी जाएगी ?

हाल ही में इस डिवीजन के वनाधिकारी रवीन्द्र बानखेड़े ने सरकार को टाइगर रिजर्व की सीमा 444.14 वर्ग किलोमीटर बढ़ाने के लिए प्रस्ताव भेजा है. जब तक यह रिर्पोट प्रकाशित होगी तब तक हो सकता है उसे मंजूरी मिल जाए. फिलहाल एक और विस्थापन की इबारत लिखकर भेजी जा चुकी है. इसका मतलब दर्जनों गांवों के हजारों लोगों को उनकी दुनिया से बेदखल कर दिया जाएगा. इंसान और जानवर सालों से साथ रहते आये हैं इस सरकारी संरक्षण (उत्पीड़न) के बाद जानवर और इंसान सालों तक नहीं समझ पायेंगे कि उनके साथ क्या किया गया और क्यों?