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6.12.09

अपने ही देश में परदेशी हैं पारधी

मराठवाड़ा के बंजारा जमातों को संगठित करने के लिए अभियान चला रहे बाल्मीक निकालजे से शिरीष खरे की बातचीत।


अंग्रेज जब यहां से गए तो बहुत कुछ छोड़कर गए।  उनका छोड़ा वो बहुत कुछ हमने आजतक संभाले रखा है। पारधी जमात से चिपका मिथक उन्हीं में से एक है। पारधी अपने ही अतीत और रिवाजों में कैद एक जमात है। जो अंग्रेजों के ‘गुनहगार जनजाति अधिनियम, 1871’ का शिकार होते  ही हमेशा के लिए ‘गुनाहगार’ हो गई।


आजादी के बाद भी कितने तख्त बदले, ताज बदले, नहीं बदले तो पारधी जमात के हालात। तभी तो महाराष्ट्र में पारधी लोग आज भी गांव से दूर रहते हैं, या रखे जाते हैं। तभी तो उनके सामने बुनियादी हकों से जुड़ा हर सवाल मुंबई, 724 किलोमीटर की दूरी बताने वाले पत्थर सा बनकर रह जाता है।


आष्टी, जिला बीड़, महाराष्ट्र। इसके ऊपर राजर्षि शाहु ग्रामीण विकास संस्थान और इसके ऊपर बाल्मीक निकालजे का नाम लिखते ही चिट्ठी जिस ठिकाने पर पहुंचती है, वही बैठे हैं हम। आखा मराठवाड़ा जानता है कि पारदी जैसी बंजारा जमातों के बीच बीते दो दशक से बाल्मीक निकालजे का नाम कितना लोकप्रिय है। नाम में न पड़ते हुए आइए उनसे कुछ काम की बातें जानते हैं। ऐसी बातें जो पारधी जमात से चाहे अनचाहे गुथ्थमगुथ्था हो चुकी हैं :



- पारधी जमात यहां एक उलझी हुई गुथ्थी है...

इतनी उलझी है कि सुलझाना मुश्किल हो रहा है। वैसे जानकार यह भी जानते हैं कि पारधी असल में तो लोगों की रखवाली करने वाले होते थे। इतिहास में पारधियों ने तो गुलामी के खिलाफ सबसे पहली और उग्र प्रतिक्रियाएं दी हैं। यहां के राजा निजाम से हारे, अंग्रेजों से हारे, मगर उन राजाओं के लिए लड़ने वाले पारधियों ने हार नहीं मानी। उन्होंने कई छापामार लड़ाईयां लड़ीं, और जीतीं भी। खुद शिवाजी भी उनकी युद्धशैली से प्रभावित थे। यह और बात है कि अब उनकी वीरता के वो किस्से यहां कम ही कहने सुनने को मिलते हैं।

अंग्रेज भी जब बार-बार और छापामारी अंदाज वाले हमलों से हैरान परेशान हो गए तो उन्होंने पारधियों को गुनहगार घोषित कर दिया। मगर आजादी के बाद तो अपनी सरकार, उसके पुलिस विभाग को यह तरीका बदलना चाहिए था। जो उन्होंने नहीं बदला।

1924 को देशभर में 52 गुनहगार बसाहट बनी। सबसे बड़ी गुनहगार बसाहट अपने शोलापुर में बनी। इसमें तार के भीतर कैदियों को रखा जाता था। 1949 को बाल साहेब खेर ने शोलापुर सेटलमेंट का तार तोड़ा। 52 को अंबेडकर साहब ने गुनहगार बताने वाले अंगेजी कानून को रद्द किया। 60 को नेहरू जी खुद शोलापुर भी आए। मगर आज भी यहां जब चोरी होती है तो पुलिस वाले सबसे पहले पारधी को ही पकड़ते हैं। वह अपने देश में आज भी परदेशी हैं। यहां पहला सवाल उनकी पहचान का ही बना हुआ है।

- उनकी पहचान से क्या मतलब है ?

हम थोड़ा सा शुरू से जान लेते हैं। पारधी, पारध शब्द से निकला है। पारध याने शिकार करने वाला। अब पारधी भी कई तरह के होते हैं। जैसे राज, बाघरी, गाय, हिरन शिकारी, गांव पारधी। राजा के पास जो शिकार का जानकार था, वे राज पारधी कहलाया। राजा बोले कि अब मुझे बाघ पर सवार होना है, उसके लिए बाघरी पारधी रखे जाते। वे ही बाघ पकड़ते, फिर उसे पालतू बनाते। एक तो बाघ को जिंदा पकड़ना ही बहुत मुश्किल है, ऊपर से उसे पालतू बनाना तो और भी मुश्किल। ऐसे ही गाय पारधी की खास सवारी गाय होती। आज भी उनके यहां एकाथ गाय तो होती ही है। गाय भी ऐसी-वैसी नहीं, बाकायदा ट्रेंड गाय। वे बाजार से गाय खरीदने की बजाय अपनी ही गाय के बछड़े को ट्रेंड करते हैं। उनकी गाय सधी होती है, इतनी कि शरीर के जिस हिस्से पर पारधी हाथ रख दे, वो जान जाती है कि अब उसे आगे क्या करना है। यही गाय उनके धंधे की मां है। इसलिए पारधी कभी गाय का मांस नहीं खाते। किसी भी शिकारी के लिए हिरन के पीछे दौड़ना, उसे मारना बड़ा टेढ़ा काम है। मगर पारधी लोग गाय की मदद से शिकार के तरीके को सीधा बना लेते हैं। जैसे हिरन का शिकार करते समय, जब गाय चरती हुई आगे बढ़ती है, उसके पीछे पीछे पारधी छिपा छिपा आता है। हिरन के नजदीक आने पर, वह उसके ऊपर अचानक छलांग मार देता है और शिकार को अपने हाथ में ले लेता है। ऐसी कई शैलियां हैं पारधियों के पास।

वैसे यकीन करना मुश्किल है मगर पारधी पंछियों की बोलियां भी खूब जानते हैं। जैसे पारधी के तीतर जंगलों के तीतरों को गाली देते हैं, तो कई जंगली तीतर लड़ने के लिए उनके पास आ जाते हैं, वो सारे बीच में लगे जाल में फंस जाते हैं। ऐसे शिकार के कई और ढ़ंग भी हैं उनके पास। शिकार के बारे में जितनी बातें पारधियों को पता है, शायद ही कोई जानता हो।

- पारधी कभी लोगों की रखवाली किया करते थे। यह समझाना कितना मुश्किल है...

अगर नई पीढ़ी पारधियों के पीछे छिपे सच जानने लगे तो शायद ही कोई उन्हें गुनाहगार कहेगा। पारधी लोगों की रखवाली के काबिल नहीं होते तो राजा उन्हें अपने सुरक्षा सलाहकार कभी नहीं बनाते। यह दुनिया की सबसे खुफिया और ईमानदार जमातों में से भी एक है। आप उसे एनएसजी कमाण्डो कह सकते हैं। आज भी आप देखिए, अपने यहां कहीं-कहीं एक पारधी के हिस्से में 25 से 50 खेतों की रखवाली आती है। फिर वे आपस में तय करते हैं कि एक दूसरे के खेतों में नहीं जाएंगे। अगर किसी के खेत में चोरी हुई तो उसका नुकसान उस खेत का पारधी भरता है। उसके बाद वह अपने खुफिया नेटवर्क से चोरी का पता लगाता है। अगर पता लगा तो मामले को अपनी जात पंचायत में उठाता है। पंचायत में बात सच साबित हो जाने का मतलब है, कसूरवार को नुकसान से 5 गुना ज्यादा तक दण्ड भरना। पारधी को रखवाली के बदले साल भर का अनाज मिलता है। मतलब यह कि वह गांव की अर्थव्यवस्था का जरूरी हिस्सा रहा है।

उसके जीने का रंग-ढ़ग, उसके धंधे के हिसाब से चलता है। आपने देखा होगा कि जैसे वे कमर में छोटी, एकदम कसी हुई धोती पहनता हैं। छाती पर कई जेबो वाली बण्डी, सिर पर रंग-बिरंगी पगड़ी पहनते हैं। कुल मिलाकर ऐसा पहनावा होता है जो दौड़-भाग में आवाज न करे, न ही किसी और तरह की अड़चन दे।

- समाज के बीच किस तरह की अड़चनों में फंसे हैं पारधी ?

इसे यहां के एक किस्से से समझिए। एक बार पाथरड़ी तहसील में कहीं चोरी हुई। कई महीने बीते, चोर का पता न चला। उसी समय आष्टी तहसील के चीखली से थोड़ी दूरी पर, घूमते फिरते रहवसिया नाम के पारधी परिवार वहां आ ठहरा। पुलिस ने उसे ही चोरी के केस में अंदर डाल दिया। उधर रहवसिया दो महीनों तक जेल में रहा। इधर गांव में ऊंची जात वाले उसके परिवार को धमकाते, बोलते जगह खाली कर दो वरना ऐसा-वैसा। जब वह जेल से छूटकर अपने ठिकाने पर आया तो ऊंची जात वालों ने उसे, और उसके 12 साथियों को भी रस्सियों से बांध दिया। उनसे बोला गया कि तुम लोग चोर हो, गांव के लिए अपशगुन हो। कुछ लोग वहां से किसी तरह छूटे, और 4 किलोमीटर दौड़ते हुए अपने कार्यालय पहुंचे। खबर मिलते ही हम यहां से 7 टेम्पों में 300 कार्यकर्ता बैठे, दलित पेंथर का नारा लगाते हुए वहां पहुंचे। तब ऊंची जात वाले अपने घरों में ताला लगाकर छिपे रहे।

यहां के ऊंची जात वाले तो पारधियों को हटाने के लिए राजीव गांधी तक पहुंच गए। तब वह प्रधानमंत्री थे, वो बोले कि पारधी देश के नागरिक हैं, उन्हें हटाया नहीं जा सकता। इसके बाद पूरे इलाके में ऊंची जात वालों और बंजारा जमातों के बीच, 5 साल तक संघर्ष चला। जगह जगह पर बंजारों की बस्तियों में कई कई बार हमले हुए। मगर हमारे पास भी पक्की योजना थी, हम ऐसे मामले बार-बार थाने, कचहरी तक ले जाते। धीरे धीरे जहां तहां ऊंची जात वाले भी ठण्डे पड़ते गए।

- तो क्या ऊंची जात वालों के खिलाफ संघर्ष करने भर से ऐसी धरणाएं बदल सकती हैं ?

बदलाव की कई योजनाएं हो सकती हैं। मकसद सिर्फ यह बात समझाना है कि पारधी चोर नहीं हैं, इंसान हैं। फिर भी आम धारणा है कि पारधी बस चोर ही हैं, अगर ऐसा है भी तो हम लोगों से कहते हैं- क्या उन्हें चोरी के दलदल से निकालाना नहीं चाहिए। इस काम में लोगों के साथ पुलिस का खास रोल हो सकता है। मगर यह दोनों (पब्लिक और पुलिस) तो पारधियों को चोर से ऊपर देखने की कोशिश नहीं कर रहे हैं।

मुझे लगता है हम सबका पहला काम यह बनता है कि, उनके भीतर के डर को पहले बाहर निकालें। इसके लिए जरूरी है सबसे पहले तो उन्हें ही एकजुट करना। वे अपने कानूनों को जानें। और वोट को हक से कहीं ज्यादा एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना सीखें। उन्हें रोजगार के वो साधन मिलें जो स्थानीय भी हों, और स्थायी भी। जैसे जिन बंजर जगहों पर वो अपने जानवर चराते रहे हैं, उन्हीं जगहों से उनसे अन्न पैदा करवाने की मुहिम को बढ़ावा मिले। यहां हमने दलित, बंजारों जमातों के 1420 परिवारों को खेती से जोड़ा है। इसलिए वो स्कूल से लेकर पंचायतों में अपनी जगह खुद बना पा रहे हैं।

पढ़ेलिखे, जागरूक लोग व्यवस्था की गलतियों से लड़ सकते हैं। इसलिए पारधी बच्चों को एक सपना देना होगा, वह यह कि पुलिस या बाकी लोग तुम्हारे पीछे नहीं हैं। देखो, वो तो तुम्हारे साथ है। ऐसा सपना देखने वाले बच्चों को स्कूलों में लाना होगा। उन्हें भरोसा देना होगा कि तुम्हारे खेल, तुम्हारी संस्कृति, तुम्हारी प्रतिभाएं किसी से कम नहीं हैं। ऐसी प्रतिभाओं को मौका देकर भी उनकी पहचान बदली जा सकती है।
 
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संपर्क :  shirish2410@gmail.com

2.7.09

सरकारी स्कूलों की वकालत जरूरी है

'चाईल्ड राईट्स एण्ड यू’ में ‘विकास सहयोग’ विभाग के महाप्रबंधक कुमार नीलेन्दु से शिरीष खरे की बातचीत।

इस बार भी बोर्ड के नतीजे सबके सामने हैं। इस बार भी प्राइवेट स्कूलों के बच्चे आगे रहे। फिर भी ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ जैसी संस्थाए सरकारी स्कूलों की वकालत करती हैं। क्यों ?
प्राइवेट स्कूलों के लिए बोर्ड के नतीजे बढ़िया रहे क्योंकि वहाँ बच्चों को एडमिशन देने के पहले चुना जाता है। अब कठिन परीक्षाओं को पास करके आने वाले बच्चे तो बढ़िया नतीजे ही देंगे। फिर प्राइवेट स्कूल में अमीर बच्चों को ही लिया जाता है। उनके माँ-बाप को जरूरी लगा तो ट्यूशन भी लगवा लेते हैं। अगर इन सारी चीजों को हटा लिया जाए तो प्राइवेट स्कूलों के नतीजे भी दूसरे स्कूलों जैसे रहेंगे। एक बात यह भी है कि स्कूल की गुणवत्ता का मतलब महंगी बिल्डिंग, अंगेजी माध्यम और पढ़ाई के लिए काम आने वाली चीजों से लगाया जाता है। लेकिन बहुत कम सरकारी स्कूलों में ऐसी व्यवस्थाएँ मौजूद हैं। इसलिए प्राइवेट स्कूलों से मुकाबले की बातों का कोई मतलब नही।
सरकारी शिक्षक सही ढ़ंग से अपनी डयूटी निभा पाते तो नजीते इतने बुरे नहीं आते।
उनके हिस्से में बच्चों को पढ़ाने के अलावा भी बहुत-सी ‘नेशनल डयूटी’ हैं। प्राइवेट के शिक्षक चुनाव, जनगणना, पशुओं की गणना या ऐसे ही दूसरे कामों से बचे रहते हैं। यह कहने में कैसी झिझक कि एक सरकारी शिक्षक के ऊपर काम का बोझ बढ़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि स्कूल की पढ़ाई के दिनों में सरकारी शिक्षकों को चुनाव की डयूटी में न लगाया जाए। लेकिन अभी भी उन्हें लगाया जाता है। बुरे नतीजों के पीछे सरकारी शिक्षक और बच्चों के बीच का असंतुलित अनुपात भी जिम्मेदार है। आप सरकारी स्कूलों में बच्चों की भारी संख्या को देखिए, उसके मुकाबले आपको शिक्षकों की संख्या कुछ भी नहीं लगेगी।
एक ऐसा परिवार जो अपने बच्चों की मंहगी पढ़ाई का बोझ उठा सकता है, उसके सामने ‘सबकी शिक्षा एक समान’ जैसी बातों का क्या मतलब ? उसे तो ऐसी बातें स्कूल चुनने की आजादी को रोकने जैसी लगेगी ?
यही सवाल थोड़ा यूं भी तो देखिए कि अमीर को स्कूल चुनने की आजादी है, गरीब को नहीं। आजादी का अर्थ तो गरीब से गरीब को शिक्षा पाने का हक देता है। एक गरीब का बच्चा अपनी गरीबी की वजह से बराबरी और बेहतर शिक्षा से बेदखल क्यों रहे ? खासतौर पर प्राइमरी स्कूल से। अब तो प्राइमरी तक की पढ़ाई को मौलिक हक के रुप में अपना लिया गया है। फिर भी देश के 100 में से 60 बच्चे प्राइमरी स्कूल नहीं जाते। सीधी बात है, शिक्षा में असमानताएँ हैं। एक तरफ शिक्षा में असमानताएँ हैं, दूसरी तरफ निजीकरण की रफ़्तार के साथ सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक दूरियां बढ़ रही हैं। ऐसे में अलग-अलग तबको के बच्चों के हितों को देखना होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो प्राइवेट सेक्टर का कारोबार तो फलेगा-फूलेगा लेकिन सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक असमानताएँ दिन-ब-दिन बढ़ती जाएगी।
जब सभी बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे तो उनके बीच की असमानताओं के चलते दिक्कते नहीं आएँगी ?
यह बात लोकतंत्र के नजरिए से फिट नहीं बैठती। अब तो दुनिया भर की किताबों में समाज और स्कूल की विविधताओं को न केवल स्वीकार किया जा रहा है, उनका सम्मान भी किया जा रहा है। कई देशों जैसे अमेरिका या इंग्लैण्ड में अलग-अलग तबको से आने वाले बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। वहाँ अलग-अलग योग्यता रखने वाले बच्चे एक साथ बैठते-उठते हैं, सभी बराबरी के साथ बेहतर मौके तलाशते हैं। वहाँ की शिक्षा पब्लिक के हाथों में है। वहाँ के स्कूलों से ऊंच-नीच की सारी असमानताओं को हटा दिया गया है। वहाँ के स्कूलों में प्रवेश के पहले चुना जाना जरूरी नहीं है।
...और भारत में ?
यहाँ प्राइवेट स्कूलों पर ज्यादा भरोसा किया जाता है। इससे प्राइवेट सेक्टर से जुड़े लोगों को मनमाने तरीके से मुनाफा कमाने का मौका मिलता है। दूसरी तरफ कहने को सरकार की कई योजनाएँ हैं। लेकिन सबके अर्थ अलग-अलग हैं। जैसे कुछ योजनाएँ शिक्षा के लिए तो कुछ महज साक्षरता को बढ़ाने के लिए चल रही हैं। इसकी जगह सरकार को एक ऐसे स्कूल की योजना बनानी चाहिए जो सारे अंतरों का लिहाज किए बगैर सारे बच्चों के लिए खुली हो।
इसी तरह सरकारी स्कूलों में भी तो असमानताएँ हैं ?
बिल्कुल, जैसे केन्द्रीय कर्मचारियों के बच्चों के लिए केन्द्रीय स्कूल, सैनिकों के बच्चों के लिए सैनिक स्कूल, मेरिट लिस्ट के बच्चों के लिए नवोदय स्कूल। बात साफ है कि सभी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ताएँ अलग-अलग हैं। इसी तरह शिक्षक को चुने जाने के लिए भी अलग-अलग स्कूलों में योग्यता के अलग-अलग पैमाने रखे गए हैं।
लेकिन समाज की असमानता का क्या किया जाए ?
समाज में जो भेदभाव है, वही तो स्कूल की चारदीवारी में हैं। इसलिए समाज से स्कूल में घुसने वाले उन कारणों को तलाशना होगा जो ऊंच-नीच की भावना बढ़ाते हैं। अगर समाज में समानता लानी ही है तो सबसे अच्छा तो यही रहेगा कि इसकी शुरूआत शिक्षा और बच्चों से ही की जाए।
सबके लिए एक समान स्कूल की बात इतनी सीधी है ?
जब पानी से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य तक की चीजों को बाजार में घसीटा जा रहा हो तो यह बात बेतुकी लग सकती है। लेकिन शिक्षा की जर्जर हालत को देखते हुए तो यह बात बड़े तुक की लगती है। कोठारी आयोग (1964-66) ऐसा पहला आयोग था जिसने सामाजिक बदलावों के लिए बहुत अच्छे सुझाव दिए। उसने देश भर के लिए एक ऐसी व्यवस्था बनाने की बात कही जिसमें हर तबके के बच्चे एक साथ पढ़े-बढ़े। उसने यह भी कहा था कि सबके लिए एक समान शिक्षा नहीं रही तो समाज के ताकतवर लोग सरकारी स्कूलों को छोड देंगे और प्राइवेट की शरण में जाएँगे। इसके बाद हम देखते हैं कि 1970 के बाद से सरकारी स्कूलों की हालात बद से बदत्तर होतक चले गए। सरकार का ध्यान इस तरफ कभी नहीं गया ? वह 1968, 1986 और 1992 की शिक्षा नीतियों में समान स्कूल व्यवस्था की बात तो करती है लेकिन उसे लागू नहीं करती। 2001 में संसद ने शिक्षा का मौलिक हक तो दिया लेकिन देश में शिक्षा की दोहरी नीति को भी जारी रखा।
विकलांग बच्चों के एडमिशन को लेकर प्राइवेट स्कूल कानून से बंधे नहीं होते। जबकि पीडब्ल्यूडी एक्ट के तहत सरकारी स्कूलों में ऐसे बच्चों को लेना जरूरी है। यह भी तो शिक्षा की दोहरी नीति ही है।
हाँ, वैसे इस किस्म के सभी बच्चों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समावेशी शिक्षा आंदोलन चल रहा है। यह शिक्षा या स्कूलों में फैली छोटी-बड़ी गड़बड़ियों को ढ़ूढ़ने और उनसे निजात पाने का शुरूआती कदम है। दूसरा, यह आंदोलन हमारे आसपास की ऐसी कई विविधताओं का पता लगा रहा है जो असमानताएँ फैलाती है। यहाँ समावेशी शिक्षा का मतलब केवल विकलांग बच्चों की शिक्षा से ही नहीं है। इसका मतलब तो सभी किस्म की विविधताओं को सभी पहलुओं से देखने, समझने और उसे शामिल करना भी है।