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4.11.10

सड़ता अनाज सड़ता तंत्र

शिरीष खरे

सरकार चंद पूंजीपतियों के लिए रियायतों का अंबार लगा रही है और करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा के लिए उसके पास न अनाज है और न पैसे का कोई बंदोबस्त. इंडिया शाइनिंग के इस दौर में सरकार को 50,000 करोड़ से अधिक का अनाज सड़ा देना मंजूर है. नहीं मंजूर है तो 8 करोड़ से ज्यादा लोगों की भूख को मिटाने के वास्ते उस सड़ते हुए अनाज में से गरीबों के लिए थोड़ा-सा हिस्सा बांटना. अकाल और कुपोषण के बीच पिसते किसी देश की जनता के लिए क्या उसकी सरकार इस तरह से भी अमानवीय हो सकती है ?



एक तरफ सरकार पूंजीपतियों के लिए 5 लाख करोड़ रूपए की रियायत देती है और दूसरी तरफ भूखे लोगों के लिए कोई इंतजाम नहीं करती है. उलटा भूखे देश की भूख पर परदे डालने के लिए उदाहरण के लिए मुंबई में 19 रूपए से ज्यादा रूपए कमाने वाले को गरीब नहीं मानती है. हकीकत यह है कि आजादी के 63 सालों में प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता बढ़नी चाहिए थी जो लगातार घटती ही जाती है. आजादी के समय से अबतक प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता 440 ग्राम से 436 ग्राम पर आ गई है और इसी तरह दाल की उपलब्धता भी आधी यानी 70 ग्राम से 35 ग्राम ही रह गई है.

दूसरी तरफ असुरक्षित परिस्थितियों में रखे अनाज के त्वरित वितरण से लाखों लोगों को राहत पहुंचाई जा सकती है. जबकि मौजूदा स्थिति यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के 35 किलो अनाज वितरित करने के आदेश को भी एक तरफ रखते हुए फिलहाल देश के कई इलाकों में अधिकतम 20 से 25 किलो अनाज ही वितरित किया जा रहा है. सर्वोच्च न्यायालय के एक और आदेश की अनदेखी करते हुए कई इलाकों में जनवितरण प्रणाली की दुकानें महीने-महीने भर नहीं खुलतीं हैं. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हर राज्य में एक बड़े गोदाम और जिले में पृथक गोदाम बनाने के लिए भी कहा जा चुका है. मगर खाद्य भंडारणों की क्षमता को बढ़ाने और गोदामों की मरम्मत को लेकर सरकार कभी गंभीर नजर नहीं आई है. लिहाजा देश के कई इलाकों में अनाज के भंडारण की समस्या उपजती जा रही है.

जिस देश में सालाना 6 करोड़ टन गेंहूं और चावल की खरीददारी होती है और जिसकी सयुंक्त भंडारण क्षमता 4 करोड़ 80 लाख टन है, उस देश में 6 साल के भीतर गोदामों में 10 लाख 37 हजार 738 टन अनाज सड़ चुका है. 190 लाख टन अनाज प्लास्टिक सीटों के नीचे रामभरोसे पड़ा हुआ है. हर साल गोदामों की सफाई पर करोड़ों रूपए खर्च करने पर भी 2 लाख टन अनाज सड़ जाता है और जब देश का सर्वोच्च न्यायालय अनाज के एक दाने के बर्बाद होने को अपराध मानते हुए अनाज के सड़ने से पहले उसे निशुल्क बांटने का आदेश देता है तो हमारे केंद्र के कृषि मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक 6,000 टन से भी ज्यादा अनाज के खराब होने के अपराध को नजरअंदाज बनाते हुए उल्टा सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की गलत व्याख्या करते हैं और उसकी मर्यादाओं पर ही सवाल खड़े करते हैं.

1947 के बाद से अब तक अगर हम किसानों की अथक मेहनत से उपजे अनाज का सही इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं और हर साल भारतीय खाद्य निगम की गोदामों में रखीं लाखों अनाज की बोरियां खुले में रखे जाने या बाढ़ आ जाने के चलते खराब हो रही हैं तो क्या सरकार को नहीं लगता कि भोजन से जुड़ी नीति, प्रबंधन और वितरण की व्यवस्थाओं पर नए सिरे से सोचे जाने की जरुरत है ?

देखा जाए तो खाद्य सुरक्षा दूसरा सवाल है. पहला सवाल पूंजीपतियों के लिए देश की आम जनता से उनके संसाधनों को छीने जाने से जुड़ा है. अगर संसाधनों को लगातार यूं ही छीना जाता रहा तो खाद्य के असुरक्षा की स्थितियां सुधरने की बजाय तेजी से बिगड़ती ही जाएंगी. जहां आदिवासियों को उनके जल, जंगल, जमीन से अलग करके उन्हें भूख और बेकारी की ओर ले जाया जा रहा है, वही सेज के नाम पर खुली लूट की जैसे छूट ही दे दी जा रही है. कहने का मतलब है नीतिगत और कानूनी तौर पर सभी लोगों को आजीविका की सुरक्षा को दिये बगैर भोजन के अधिकार की बात बेमतलब ही रहेगी. भोजन केअधिकार से जुड़े कार्यकर्ता मांग कर रहे हैं कि 5 सदस्यों के एक परिवार के लिए 50 किलो अनाज, 5.25 किलो दाल और 2.8 खाद्य तेल दिया जाए. बीपीएल और एपीएल को पात्रता का आधार नहीं बनाया जाए. सार्वजनिक वितरण की व्यवस्था के साथ-साथ सरकारी खरीदी और वितरण की विकेन्द्रीकृत व्यवस्था हो. व्यक्ति/एकल परिवार को इकाई माना जाए और राशन कार्ड महिलाओं के नाम पर हो. जल स्त्रोत पर पहला अधिकार खेती का हो. इसके साथ ही यह भी नहीं भुलाया जा सकता कि आजादी की बाद से अबतक विकास की विभिन्न परियोजनाओं और कारणों के चलते 6 करोड़ बच्चों का भी पलायन हुआ है. मगर बच्चों के मुद्दे अनदेखे ही रहे हैं और उनके लिए खाद्य सुरक्षा की गारंटी दिये बगैर विकास के तमाम दावे बेबुनियाद ही रहेंगे. इसे भी असंवेदनशीलता का चरम ही कहेंगे कि एक सेकेण्ड के भीतर 5 साल के नीचे का एक बच्चा कुपोषण की चपेट में आ जाने के बावजूद कोई नीतिगत फैसला लेने की बात तो दूर ठोस कार्यवाही की रूपरेखा तक नहीं बन पा रही है. अगर कुपोषण और भूख के चलते देश का आने वाला कल कहे जाने वाले 47 प्रतिशत बच्चों का अपनी उम्र के अनुपात में लंबाई और वजन नहीं बढ़ पाता है तो इसे किस विकास का सूचक समझा जाए ?

अंतत: अनाज का साद जाना एक अमानवीय और आपराधिक प्रवृति है और देश में अनाज भंडारण की उचित व्यवस्था और बेहतर विकल्प तलाशने लिए एक ऐसे संवेदनशील और पारदर्शी तंत्र विकसित करने की भी जरुरत है जो भूख से जुड़े विभिन्न पहलूओं पर कारगार ढ़ंग से शिनाख्त और कार्यवाही करने में सक्षम हो. अन्यथा हर साल लाखों टन अनाज खराब होने, अनाज की कीमत आसमान छूने, खेती के संकट, सूखे की मार और गरीबों के पेट खाली होने से जुड़े समाचारों पर परदे डालने के लिए हमारे पास आर्थिक शक्तियों का दिखावा करने वाली राष्ट्रमंडल खेलों की सुर्ख़ियों के अलावा कुछ नहीं होगा ?



19.4.10

अपने से यूं भी खड़े हो सकते हैं विकलांग साथी

शिरीष खरे

भूख से मौत और रोजीरोटी के लिए पलायन। ऐसा तब होता है जब लोगों के पास कोई काम नहीं होता। यकीनन गरीबी का यह सबसे भयानक रुप है। इससे निपटने के लिए भारत सरकार के पास ‘‘हर हाथ को काम और काम का पूरा दाम’’ देने वाली ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना’ है। यह योजना लोगों को उनके गांवों में ही काम देने की गांरटी भी देती है। योजना में श्रम पर आधारित कई तरह के कामों का ब्यौरा दिया गया है। इन्हीं में से बहुत सारे कामों से विकलांग साथियों को जोड़ा जा सकता है और उन्हें विकास के रास्ते पर साथ लाया जा सकता है। कैसे, नरेगा का यह तजुर्बा सामने है :

एक आदमी गरीब है, आदिवासी समुदाय से है, और विकलांग है तो उसका हाल आप समझ सकते हैं। उसे उसके हाल से उभारने के लिए आजीविका का कोई मुनासिब जरिया होना जरूरी है। इसलिए दिल्ली में जब गरीबी दूर करने के लिए नरेगा (अब मनरेगा) की बात उठी थी तो मध्यप्रदेश के आदिवासी जिले बड़वानी के ‘आशा ग्राम ट्रस्ट’ ने विकलांग साथियों का ध्यान रखा था और उन्हे रोजगार की गांरटी योजना से जोड़ने की पहल की थी। जहां तय हुआ था कि नरेगा में विकलांग साथियों को उनकी क्षमता और कार्यकुशलता के हिसाब से किस तरह के कामों में और किस तरीके से शामिल जा सकता है।

इसके लिए ब्लाक-स्तर पर एक चरणबद्ध योजना बनायी गई थी। योजना में विकलांग साथियों को न केवल भागीदार बनाया गया था बल्कि उन्हें निर्णायक मंडल में भी रखा गया। उन्होंने एक कार्यशाला के जरिए सबसे पहले वो सूची तैयार की जो बताती थी कि विकलांग साथी कौन-कौन से कामों को कर सकते हैं और कैसे-कैसे। इस सूची में कुल 25 प्रकार के कामों और उनके तरीकों को सुझाया गया था। बाद में सभी 25 प्रकार के कामों को वगीकृत किया गया और सूची को 'वगीकृत कार्यों वाली सूची' कहा गया। अब इस सूची की कई फोटोकापियों को ग्राम-स्तर पर संगठित विकलांग साथी समूहों तक पहुंचाया गया। इसके बाद विकलांग साथियों के लिए ‘जाब-कार्ड बनाओ आवेदन करो’ अभियान छेड़ा गया। दूसरी तरफ, इस अभियान में जन-प्रतिनिधियों की सहभागिता बढ़ाने के लिए ‘गांव-गांव की बैठक’ का सिलसिला भी चलाया गया। इसी दौरान विकलांग साथियों ने अपने जैसे कई और साथियों की पहचान करने के लिए एक सर्वे कार्यक्रम भी चलाया था। इससे जहां बड़ी तादाद में विकलांग साथियों की संख्या ज्ञात हो सकी, वहीं उन्हें जाब-कार्ड बनाने और आवेदन भरने के लिए प्रोत्साहित भी किया जा सका। नतीजन, अकेले बड़वानी ब्लाक के 30 गांवों में 100 से ज्यादा विकलांग साथियों को नरेगा से जोड़ा जा सका। तब यहां के विकलांग कार्यकर्ताओं ने कार्य-स्थलों पर घूम घूमके नरेगा की गतिविधियों का मूल्यांकन भी किया था। आज इन्हीं कार्यकर्ताओं द्वारा जिलेभर के हजारों विकलांग साथियों को नरेगा से जोड़ने का काम प्रगति पर है।

रोजगार के लिए विकलांग कार्यकर्ताओं के सामने बाधाएं तो आज भी आती हैं। मगर ऐसी तमाम बाधाओं से पार पाने के लिए इनके पास जो रणनीति है, उसके खास बिन्दु इस तरह से हैं: (1) रोजगार गारंटी योजना के जरिए ज्यादा से ज्यादा विकलांग साथियों को काम दिलाना। (2) पंचायत स्तर पर सरपंच और सचिवों को संवेदनशील बनाना। (3) जन जागरण कार्यक्रमों को बढावा देना। (4) निगरानी तंत्र को त्रि-स्तरीय याने जिला, ब्लाक और पंचायत स्तर पर मजबूत बनाना। (5) लोक-शिकायत की प्रक्रिया को पारदर्शी और त्वरित कार्यवाही के लिए प्रोत्साहित करना। यह तर्जुबा बताता है कि जब एक छोटे से इलाके के विकलांग साथी नरेगा के रास्ते अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं, तो प्रदेश या देश भर के विकलांग साथी भी यही क्रम दोहरा सकते हैं।

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संपर्क : shirish2410@gmail.com

14.10.09

सूखे की स्थाई परियोजना की अकाल मौत



शिरीष खरे


बाड़मेर। ‘‘यह बारिश नहीं बरसेगी। कहीं और जाकर बरसेगी। शायद बाड़मेर, शायद जोधपुर, जयपुर, या उससे भी आगे दिल्ली। बारिश, फिर दगा दे गई।’’

बायतु गांव में, उस रात भंवरलाल की छत पर हनुमान, ठकराराम, करणराम, मुरली चौधरी के साथ बैठे बैठे बादलों की नौटंकी देर तक देखते रहे। कड़कड़ाती और चमकदार बिजलियों के बीच, काले बदलों में भरी उन संभावनाओं पर बतियाते रहे, जो हवा के साथ कबके छूमंतर हो चुके थे। इसी बीच कुंभाराम ने आकर बेवफा बारिश के हवाले से जैसे सबको बुरी तरह टोक डाला। जाते जाते वह ऐसी भविष्यवाणी भी करता गया, जो सबको मालूम थी- ‘‘अब फिर से सूखा होगा, भंयकर अकाल पड़ेगा।’’

यहां जब बादल नहीं होते तो उसके किस्से होते हैं: निराशाओं, सामूहिक हताशाओं से भरे हुए। मगर मुरली चौधरी ने सूखे की हालत पर एक खुशनुमा लोकगीत शुरू कर दिया। जिसका मतलब है- ‘‘सूखा तो यहां के पैर में है, नाक में है, गर्दन में है। कभी-कभार इधर-उधर हो आता हैं, मगर उसका असली मुकाम यहीं है। जैसा भी है, है तो अपना दोस्त।’’

अब वह एक नया लोकगीत रचने के लिए मचल पड़ा है। जिसके बोल जुड़े हैं ‘अकाल को जड़ सहित उखाड़ने’ के नाम पर बनी- इंदिरा गांधी नहर परियोजना से। जो खाका बना है, उसमें ‘‘सूखे ने सत्ता की दुष्ट शक्तियों के साथ हाथ मिलाया है, वह राक्षस का रुप धारण करके लोभ और भष्ट्राचार के फेरे में पड़ गया है, वह सबकुछ निगल जाने को बैठा है। सुनो रे परदेसी, यह आज का नहीं, बहुत पहले का किस्सा है’’ :

1947 से अबतक, ऐसा नहीं है कि यहां सूखे के स्थायी निपटारे के बारे में कभी सोचा नहीं गया। राजीव गांधी के समय, एक बार सोचा गया था। उस समय, पंजाब के हरिकेन बांध से इंदिरा-गांधी नहर गडरा (बाड़मेर) तक आनी थी, वह चली भी मगर दिल्ली की सत्ता में बैठी ताकतों ने उसका रूख अपनी तरफ करवा लिया। नहर को गंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर से होकर यहीं कोई 800 किलोमीटर का सफर निभाना था। इधर यह 300 किलोमीटर दूर बीकानेर जिले में पहुंची, उधर राजीव गांधी के बेहद नजदीकी और तबके केन्द्रीय कपड़ामंत्री (अबके मुख्यमंत्री) अशोक गहलोत की सक्रियता बढ़ी। आखिरकार नहर की पाइपलाइनों को जोधपुर की कायलाना झील की ओर मोड़ दिया गया।

इससे पहला फायदा जोधपुर के महाराजा कहे जाने वाले गजोसिंह को हुआ। कायलाना झील का पट्टा, आज तक उन्हीं के नाम जो चढ़ा हुआ है। यहां तक पानी पहुंचते ही उनका पर्यटन का धंधा लहलहा उठा। होटल तो था ही, महाराजा साहब ने ‘वाटर रिसोर्स सेंटर’ के नाम पर महल भी खड़ा करवा दिया। अशोक गहलोत, माली जाति और जोधपुर इलाके से रहे हैं, उन पर ‘माली लॉबी’ के फायदे के लिए अपने असर के गलत इस्तेमाल का आरोप लगा। पाइपलाइन मोड़ने का दूसरा फायदा अशोक गहलोत और माली जाति के कुओं को रिचार्ज करने में हुआ। इसलिए सूखे के घेरे के असली पीड़ितों की आंखे बेवफा बादलों तक सिमटी रही।


1990 में यहां परियोजना का सरकारी प्रचार प्रसार हुआ। जनता से पैसा बटोरने के लिए एक तस्वीर दिखाई- ’’हरे-भरे खेतों से कलकल बहती नहर और खुशहाल किसान परिवार।’’ अपने परिवार को भी हराभरा बनाने के लिए जनता ने वहीं किया जो सरकार ने चाहा। उसने ऊंची बोली लगाकर नहर के आसपास की जमीनों को खरीदा। पनावड़ा, मनावड़ी, भियाड़, भीमड़ा के गांव वाले कहते हैं ‘‘जिनके पास पैसा नहीं था, उन्होंने घर की औरतों के गहने तक बेचे।’’ उन्होंने पांच एकड़ के मरूस्थल को 1 से 5 लाख रूपए तक में खरीदा। उन्होंने अपनी जगहों से जंगली झाड़-पेड़ उखाड़े, पहले मैदानों में और फिर खेतों में बदला। मगर इसे क्या कहेंगे कि उस समय भी उन जमीनों की कीमत न के बराबर थी, आज भी न के बराबर है। यहां रेतीले तूफानों से महज रेतीली नहरें अब भी बनती हैं, तब भी बिगड़ती थीं।

बीकानेर से दूरदराज का अंदरूनी, इंदिरा गांधी नहर के नीले नक्शे का यह रेतीला हिस्सा है। सुबह से ही रेत पर गुफानुमा परतों में सूखा ठहरा है। ऊपर, काले बादलों के रंग-ढंग से उभरते हुए अकाल का पता चलता है। मुख्य नहर पार करके कोलायत तहसील की कुछ अस्त-व्यस्त बसाहटों में पहुंचते हैं, साथ लाए पानी का बड़ा आसरा है, यहां की गरीबी मटमैली रंग सी साफ झलकती है। नहर के रास्ते ऐसे हैं, जैसे कभी थे ही नहीं। बहुत सूखे, बहुत प्यासे और कंठ तक रेत से भरे भरे। अब तो विशाल भूगोल के टप्पे टप्पे से हरे भरे बनने के सपने भी झर गए हैं। भीमसेन अपने इधर का हाल सुनाते हैं ‘‘यह पट्टी, जानवरों को सैकड़ो क्विंटल चारा चराने वाली जीवनरेखा है। मगर कोई लकड़ी नहीं बची, नहर के नाम से सिर्फ पेड़ों को उखाड़ा है। हमारे देखते देखते बहुत सारी झाड़ियां भी गायब हो गई हैं।’’

बाड़मेर जिले के गांव भी इसी नजारे से तरबतर हैं। इन दिनों थोड़ी (बहुत) नाटकीयता लिए हुई है। कई कई जगहों में तो मर्द, औरते, बच्चे बादलों को बुलाने की विद्या में जुटे हैं। हरेक जी भरकर सफेद बादलों के गुच्छों को तांकते हैं, जो रेत के समुद्र के सामानान्तर फैले आकाश में तैर रहे हैं। उधर सूरज ठंडा नहीं होता, इधर रेत धधकती है। कभी कभार बादलों के गुच्छे एक जगह जमा होकर, भूरे रंगों में आकार लेते हुए होश उड़ा देते हैं। शाम के वक्त, बेहया धूप ढ़लती रोशनी के नीचे सुस्ताने लगती है। यहां थार के ताजा चेहरे पर ‘बरसात की अनिश्चितता’ साफ साफ लिखी है। दोपहर तक सूरज की तेज रोशनी, रेत के रूखे रंगों से भी नमी चुराना चाहती है। प्यासे पौधे जीने की जद्दोजहद में हैं, तालाब भी खेत की तरह रीते पड़े हैं, जैसे यह सारे यहां से अब दुख की सर्द रातों की तरफ में दाखिल हो जाएंगे। मगर इन सब से बेफिक्र उस रात थोड़ी देर तक हम सुनते रहे ‘‘कतरा-कतरा पिघलता रहा आसमान। इन वादियों में न जाने कहां। एक ‘नहर’ दिलरूबा गीत गाती रही कि- आप यूं फासलों से गुजरते रहे.....’’


चलते चलते :
बाड़मेर जिले के 100 सालों में 80 सूखे के रहे। बाकी 20 सालों में 10 सुकाल के, 10 साल ऐसे ही रहे। फसल उत्पादन के हिसाब से 100 में से 30 साल 0 (शून्य) प्रतिशत, 20 साल 10-20 प्रतिशत (बेहद मामूली) उत्पादन रहा। बाकी बचे 50 में से 20 साल 20-30 प्रतिशत, 10 साल 30-40 प्रतिशत, 10 साल 50-60 प्रतिशत और 10 साल 70 प्रतिशत उत्पादन हुआ। पानी की मांग के लिहाज से कुल जरूरत का 10 प्रतिशत भी पूरा नहीं हो पाता। बाकी 90 प्रतिशत को पूरा करने के लिए निजी टांके से 40 प्रतिशत, सरकारी टैंकरों से 10 प्रतिशत और खारे पानी से 20 प्रतिशत तक की भरपाई होती है। कम से कम 30 प्रतिशत का भारी अंतर बना रहता है।

23.9.09

थार का सरकारी अकाल

शिरीष खरे

थार में फिर अकाल के हालात बन पड़े हैं- इस समय की सबसे खतरनाक पंक्ति को सवाल की तरह कहा जाना चाहिए. दरअसल अकाल को बरसात से जोड़कर देखा जाता है और राजस्थान के अकालग्रस्त जिलों से लेकर जयपुर या दिल्ली तक नेताओं, अफसरों और जनता के बड़े तबके तक यही समझ बनी हुई है. कुछ तो जानबूझकर और कुछ मजबूरी में. लेकिन हकीकत यह भी है कि आस्ट्रेलिया या खाड़ी जैसे दुनिया के अनेक हिस्सों में तो और भी कम बरसात होती है मगर वहां अकाल का साया नहीं पड़ता. तो क्या भारत में अकाल की जड़े सरकारी अनदेखी से जुड़ी हैं ?

अंग्रेजी हुकूमत में अकाल से निपटने के लिए 'फेमिन कोड' (अकाल संहिता) बुकलेट बनी थी. हमारी सरकार आज तक उसी को लेकर बैठी है. आस्ट्रेलिया, अमेरिका, इंग्लैंड और सऊदी अरब जैसे देशों में अकालरोधी नीतियां हैं; भारत देश या राजस्थान प्रदेश में जहां 100 में से 90 साल सूखा पड़ता है, कोई नीति नहीं है.

बायतु, बाड़मेर के भंवरलाल चौधरी और उनके साथी कहते हैं- “पानी, अनाज और चारे का न होना ही अकाल है. अगर पीने के लिए पानी, लोगों को अनाज और पशुओं को चारा मिल जाए तो फिर पानी गिरे या न गिरे, काहे का अकाल.”

जाहिर है, अपनी सरकार लापरवाही छिपाने के लिए अकाल से बरसात को जोड़कर चलती है और जनता भी ‘लकीर की फकीर’ बनी हुई है.

जयपुर से 500 किलोमीटर दूर, पाकिस्तान की सरहद से 100 किलोमीटर पहले, पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तानी जिले बाड़मेर में बायतु ब्लाक के कई अनदेखे गांव इस हकीकत को बयां कर रहे हैं. बायतु, लाहौर जाने वाली थार एक्सप्रेस का छोटा-सा पड़ाव है. वैसे तो सूखे की ज्यादातर योजनाएं यही के लिए बनती हैं, जो जयपुर से जोधपुर आते-आते खप जाती हैं और यहां के लोगों के हिस्से में रह जाती हैं अगले साल के मानसून वाले बादलों की आस.

इस बार मानसून फिर दगा दे गया. बंगाल की खाड़ी में कम दबाव वाले क्षेत्र के कमजोर होने से राजस्थान के 27 जिले भंयकर सूखे से ग्रस्त घोषित किए गए हैं. केंद्रीय रुक्ष क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, काजरी के मुताबिक इस साल 2002 से भी खतरनाक अकाल के हालात हैं. बाड़मेर सहित 6 जिलों में औसत से 60 फीसदी कम बरसात हुई जिससे बाजरा, पानी, कितना सूखा, कितनी उपज, कितनी आमदनी, गरीबी, बेकारी, पलायन, कर्ज, योजनाएं गुहार और मोठ की फसलें फिर खड़ी-खड़ी सूख रही हैं. नतीजतन अभी से हिसाब लगाया जा रहा है- कितना, फायदे, दावे, कायदे..... और वायदे!

अकाल का घर


बाड़मेर जिले में 100 सालों के आकड़े देखें तो 80 साल सूखे के काले साए में बीते. बाकी 20 सालों में से 10 साल सुकाल और 10 साल 50-50 वाला हिसाब-किताब रहा.

फसलों का उत्पादन देखें तो 100 में से 30 साल 0 (शून्य) प्रतिशत और 20 साल 10-20 प्रतिशत (बेहद मामूली) उत्पादन रहा. बाकी बचे 50 में से 20 साल 20-30 प्रतिशत, 10 साल 30-40 प्रतिशत, 10 साल 50-60 प्रतिशत और 10 साल 70 प्रतिशत तक उत्पादन हुआ.

पानी की जरूरत को देखें तो कुल जरूरत का 10 प्रतिशत भी पूरा नहीं हो पाता, बाकी 90 प्रतिशत की पूर्ति के लिए निजी टांके से 40 प्रतिशत, सरकारी टैंकरों से 10 प्रतिशत और खारे पानी से 20 प्रतिशत तक की भरपाई होती है. फिर भी 30 प्रतिशत का भारी अंतर रहता है, जिसका कोई स्त्रोत नहीं.

निजी टांके से जो 40 प्रतिशत पानी की भरपाई होती है, वह भी बरसात के भरोसे है. अगर बूंदे न बरसीं तो निजी टांके की भरपाई का प्रतिशत 40 से लुढ़ककर 5 प्रतिशत तक आ जाता है. तब खारे पानी की भरपाई 20 से 40 प्रतिशत तक बढ़ाना एक मजबूरी है.

सूखे का फायदा

1947 के बाद, 62 सालों में एक बार सूखे का स्थायी हल खोजने की कोशिश हुई थी. राजीव गांधी के समय, पंजाब के हरिकेन बांध से जो इंदिरा-गांधी नहर गडरा (बाड़मेर) तक आनी थी, उसे भी केंद्रीय सत्ता में बैठी ताकतों ने अपने फायदे के लिए मोड़ लिया. नहर को गंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर से होकर करीब 800 किमी का रास्ता तय करना था, जैसे ही यह 300 किमी दूर बीकानेर पहुंची वैसे ही तत्कालीन कपड़ा मंत्री अशोक गहलोत (अबके मुख्यमंत्री) ने पाइपलाइन का रुख जोधपुर की कायलाना झील की तरफ करवा दिया. इससे पहला फायदा महाराजा गजोसिंह को हुआ और झील का पट्टा आज भी उन्हीं के नाम चढ़ा हुआ है. पानी पहुंचते ही पर्यटन का उनका धंधा लहलहा उठा, होटल तो था ही, हुजूर ने ‘वाटर रिसोर्स सेंटर’ के नाम पर महल भी बनवा लिया. अशोक गहलोत, जो खुद भी माली जाति और जोधपुर इलाके से हैं, उन पर ‘माली लॉबी’ के दबाव में काम करने का आरोप लगा क्योंकि पाइपलाइन मोड़ने का दूसरा फायदा माली जाति के कुओं को रिचार्ज करने में हुआ. लिहाजा असली प्रभावितों की आंखे बेवफा बादलों को घूरती रह गई.



1990 में सरकार ने पैसा बटोरने के लिए हरे-भरे खेतों से कलकल बहती नहर की तस्वीर दिखाई थी. अपनी जिंदगी में भी हरियाली लाने के लिए लोगों ने सरकार से नहर के आसपास की जमीनें खरीदी थीं. पनावड़ा, मनावड़ी, भियाड़ और भीमड़ा के गांव वाले अब बताते हैं कि जिनके पास पैसा नहीं था, उन्होंने घर की औरतों के गहने तक बेचे और बोली लगा-लगाकर जमीनें खरीदी थीं. उन्होंने पांच एकड़ की रूखी जमीन के टुकड़े को एक लाख से 5 लाख रु. तक में खरीदा, जंगली झाड़-पेड़ उखाड़े और फिर उन्हें पहले मैदानों में और खेतों में बदला. मगर यह विडंबना ही है कि उस समय भी उन जमीनों की कीमत कुछ नहीं थी, आज भी कुछ नहीं है. वहां रेतीली आंधियों से सिर्फ रेत की नहरें बनती और बिगड़ती रही.

अकाल का हाल

उन्हें पीने के पानी की हरेक बूंद का ख्याल रहता है. महंगा पानी खरीदने से मजूरी का बड़ा हिस्सा पानी में जाता है. कन्नौड़, कोल्हू, अकड़दरा, चिड़िया जैसे कई गांवों में खारे पानी के टयूवबेल दिखते हैं, जो केवल यहीं दिखते हैं और यदा-कदा, टयूवबेल में बाकायदा सरकार के बिजली कनेक्शन लगे हैं. रेतीली मिट्टी में साल्ट ज्यादा होने से पानी रिसते-रिसते अपनी मिठास खो देता है. इसके बावजूद रेतीली जमीन के 250-300 फीट नीचे से खारे पानी को बरसात के मीठे पानी में मिलाकर लोग अपना गला गीला करते हैं. इन्हीं दिनों असंख्य आवारा और घरेलू जानवर असमय मौत के शिकार बनते हैं.

पानी की कमी से गला ही नहीं पेट भी सूखता है. इसलिए मजूरी का दूसरा बड़ा हिस्सा अनाज संकट से उबरने में जाता है. कतरा, केसुमला और शहर के गांववाले बताते हैं कि उन्हें गेहूं, मक्का, ज्वार के बजाए मालाड़ी बाजरा खाने की आदत है. वास्तव में वे यूपी में जानवरों को खिलाने वाला बाजरा खाते हैं. सूखा की लपटों से परंपरागत बीजों की कई किस्में खत्म हो रही हैं. ऊन उत्पादन के लिए भेड़ पालने वाले गड़रिए भेड़ो को काट-काटकर भूख की आग मिटाते हैं.

रोजी-रोटी का दूसरा जरिया चारा है. नगाना और खेतिया का तला के लोगों से जाना कि भैंस के बजाए यहां के लोग गाय, ऊंट, भेड़, बकरी और गधा पालते हैं. बढ़ते तापमान के हिसाब से भैंस की काली चमड़ी ज्यादा पानी मांगती है. जिन चरवाहों के पास 500 से ज्यादा जानवर हैं, वे पंजाब, हरियाणा, यूपी और मध्य प्रदेश का रुख करते हैं.

यहां पलायन की स्थिति दूसरे इलाकों के मुकाबले एकदम जुदा है. पूरे परिवार के बजाए एकाध आदमी घर से बाहर जाता है. छीतर का पार और बायतु के ज्यादातर लोग मानते हैं, पलायन करने वालों की हालत फिर भी ठीक हैं, जो पलायन नहीं कर पाते वो बेहद गरीब हैं. यहां रह जाने वालों का सारा पैसा पानी, अनाज और चारा खरीदने में चला जाता है. एक तो इतनी बेकारी, ऊपर से काम का दूसरा विकल्प न होने से पलायन यहां बुरा नहीं माना जाता. कुल मिलाकर 90 फीसदी घरों से पलायन होता है, जिन 10 फीसदी घरों से पलायन नहीं होता उनमें से ज्यादातर के यहां कमाने वाले ही नहीं होते. यहां के हालात समझने के लिए इतना काफी है कि 1964 का अकाल देख चुकी रत्नीबाई अब 74 बरस की हो चली हैं- पोपले चेहरे में धंसी आंखें भुखमरी, कुपोषण और तपेदिक जैसे रोगों की प्रतीक बन चुकी हैं.

सरकार बताती है कारण


1. बहुत कम बरसात.
2. बरसात की अनियमित आवृत्तियां यानी बादल की पहली बूंदों के बाद दूसरी बूंदें 20-30 दिनों में नहीं गिरीं तो फसलों की बर्बादी, फिर 1000 मिलीमीटर बरसात भी हो तो कोई फायदा नहीं.
3. थार की रेतीली आंधियां.
4. तापमान, अगर मानसून के मुकाबले तापमान का पारा 45 से 50 डिग्री तक चढ़े तो फसल जल जाती है.
5. ओले, पाला और कई किस्म के रोगों से मिलजुलकर अकाल पनपता है.

राहत की राजनीति

राहत योजनाएं अप्रैल से जून यानी साल के तीन महीनों के लिए ही होती हैं. इस दरम्यान बगैर पाइपलाइन वाले इलाकों में टैंकरों से पानी पहुंचाने की कोशिश होती है. लेकिन फतेहपुर के खियाराम कहते हैं- “जहां-जहां पाइपलाइन हैं, उनमें से ज्यादातर इलाकों में पानी की व्यवस्थाएं ठप्प हैं.” यानी ऊपर से ही यह मानकर चला जाता है कि व्यवस्थाएं सुचारू ढ़ंग से चल रही हैं.

चूंकि ‘फेमिन कोड’ में गाय को ही पशु माना गया है इसलिए सरकार के पशु-शिविरों में गाय को ही चारा खिलाने का कायदा है. यूं तो अंग्रेजों के जमाने में तो ऊंट को भी चारा मिलता था, क्योंकि उस समय परिवहन के मुख्य साधन ऊंट ही थे. अबके अधिकारियों को लगता है कि ऊंट परिवहन के साधन नहीं रहे इसलिए ‘वोट बैलेंस’ की राजनीति के चलते सिर्फ गाय के मरने की चिंता व्यक्त कर ली जाती है. वह भी वहां-वहां, जहां-जहां राजनैतिक दबाव है यानी 10 में से इक्का-दुक्का जगह. अकड़दरा के हनुमान कई उदाहरण देते हुए कहते हैं, “इन शिविरों में जब गाय तक चारा नहीं पहुंचता तो वह मरती हैं.” मरी गायों के बारे में लिखा जाता है- बचाने के विशेष प्रयासों के दौरान मारी गई.

सरकार की सुनें तो नरेगा ( राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना) में 100 रु. ‘न्यूनतम मजदूरी’ है लेकिन मांग के मुताबिक भुगतान न होने से 100 रु. भी नहीं मिलते. ऐसे में 100 रु. को ‘अधिकतम मजदूरी’ कहना चाहिए. वैसे 100 रु. को भी घटाने की तैयारियां चल रही हैं. स्थानीय स्थितियों को देखते हुए यह सवाल बड़े काम का है, काम के बदले आखिर करवाया क्या? जैसे कि जिन गांवों में नाड़ियां (तालाब) नहीं हैं, हो भी नहीं सकते, क्योंकि वहां न पानी आता है, न रेतीली जमीनों में ठहरता है, वहां नालियां बनवाने से कोई फायदा नहीं. इसके बावजूद नालियां बनवाकर लाखों रु. राहत वाली फाइलों में चढ़ जाते हैं.

पनावड़ा के करणराम कहते हैं- “कुछ लोगों को तो रोजगार मिलता ही है, कुछ अधिकारियों को भी राहत मिल जाती है.”

आइए इसे एक किस्से से समझते हैं. जोधपुर के पास एक बड़ा पुराना तालाब था. क्योंकि अधिकारियों को नरेगा के तहत इसकी मरम्मत करवानी ही थी इसलिए उसे एक, दो, तीन साल तक खोदते रहे. जिस चिकनी मिट्टी से पानी ठहरता था, उसे ही उखाड़ते हुए आजू-बाजू में बड़े-बड़े टीले खड़े किए. जब बरसात का पानी उसमें आया तो 15 दिनों से ज्यादा नहीं ठहरा. अब अधिकारियों के सामने यह विपदा आन पड़ी कि टीले के वजूद में पड़ी मिट्टी को वापस तालाब में डलवाएं भी तो पैमेन्ट कहां से शो करेंगे, क्योंकि यह टॉस्क की कल्पना से परे था. यानी तालाब के तमाम काम निपटाने के नाम से तालाब का ही काम तमाम कर दिया गया.

इसी तरह विधानसभा क्षेत्र में कुल 25 हेडपंप लगने थे, क्योंकि दो सरपंच विधायक के खास थे इसलिए कोल्हू और अकड़दरा गांवों में 20 हेडपंप लग गए. यहां हेडपंप सफल नहीं माने जाते, लेकिन राहत के छोटे-छोटे बटवारों में भी दलगत, जातिगत, इलाकागत जैसे समीकरणों की भूमिका तो रहती ही है.

एक ओर राजस्व विभाग की गिरदावरी रिपोर्ट ने “बायतु ब्लाक के 47 गांवों में सूखा” बताया, दूसरी तरफ सरकार की ही बीमा कंपनी ने कहा- वह “6 खेतों के मूल्यांकन के बाद बताएगी कि यहां सूखा है या नहीं.”

चलते-चलते

मामला महज बाड़मेर का नहीं है, थार यानी देश के 61 फीसदी रेगिस्तान का जर्रा-जर्रा सूखे की कहानी खुद कहता है. यहां सरकारी उम्मीद की अकाल मौत तो बहुत पहले ही हो चुकी है, इसलिए भूखे, प्यासे और बीमार लोगों को बादलों से ही राहत का इंतजार है. अप्रैल की आखिरी तारीखों में मुख्यमंत्री जी ने बाड़मेर भ्रमण का कार्यक्रम बनाया था. तब पंचायत समिति सिणधरी के चबा गांव में अकाल राहत कार्य के 60 मजदूरों ने हाथ खड़े करके एक महीने से मजदूरी नहीं मिलने की व्यथा कहनी चाही थी. लेकिन दौरे के एक दिन पहले ही प्रशासन ने मुख्यमंत्री को भ्रमित करते हुए नेशनल हाइवे पर पानी के लबालब हौद भरे, चारे के टैंकर खड़े करवा दिए. सूखे को सरकारी आंखों से दिखा दिया गया.

घंटे भर में मुख्यमंत्री जी यहां से वहां हुए, हालात जहां के तहां रहे. हालात इन दिनों सूखे से अकाल में बदल रहे हैं, इसलिए सरकारी महकमों में मुख्यमंत्री जी के वहां से यहां होने की गर्मागर्म चर्चाएं हैं.

9.9.09

वनों से कटे अधिकार

वनाधिकार कानून, 2005 को पारित करते समय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह माना था कि आजादी के 6 दशकों तक आदिवासियों के साथ ऐतहासिक अन्याय होता रहा है और इस कानून के बाद उन्हें न्याय मिल पाएगा। लेकिन दक्षिण राजस्थान के वनों में वनाधिकार का हाल सरकार की दोहरी मानसिकता दर्शाता है। राजस्थान के उदयपुर जिले के गावों का दौरा करके लौटे शिरीष खरे की रिपोर्ट।
‘‘कानून में पटवारी फैसला नहीं लेता है। कानून में तो वह वनाधिकार समिति के साथ मिलकर कितना खसरा, कितना रकबा पर कितना कब्जा है, यह भर सत्यपापित करता है। लेकिन जमीन पर पटवारी ही असली खिलाड़ी है। खसरा, रकबा और कब्जा से जुड़ा अंतिम और सर्वमान्य फैसला उसी का है। यही हाल वन-विभाग के वनपाल का है। उसके हिस्से में वनक्षेत्र के नंबर देने, मेपिंग करने जैसे काम हैं। लेकिन उसका रोल भी मालिक जैसा है। सरकार ने कहा कि जो सत्यापन होगा वह जीपीएस मशीन से होगा, कानून में ऐसा तो कहीं भी नहीं लिखा है। यहां जीपीएस मशीनें बहुत कम हैं, उस पर प्रशिक्षित वनपाल ढ़ूढ़े से नहीं मिलते हैं।’’ - रामलाल खोकरिया और उनके कई सारे साथी, भलाई, उदयपुर।
‘‘ब्लाक स्तर की कमेटी बनी, उसने दावों की फाइलों को तीन भागों में बांटा- (एक) जो 1980 वाली फाइलें हैं, उन्हें पहली वरीयता दी जाए। (दो) इसके बाद 1991 की धारा में जो अतिक्रमित काष्ठकार हैं, उनका नियमन किया जाए। जिनके पास सबूत हैं उन्हीं के बारे में विचार किया जाए। (तीन) आखिरी में बचे लोगों के लिए 11 पेजों वाला आवेदन है। कानून में ऐसी वरीयता नहीं है। लेकिन सरकार ने वन के अधिकार को तीन भागों में बांटकर हमें भम्र के जाल में डाला हुआ है।’’ - हीरालाल बांदर और उनके कई सारे साथी, बावई, उदयपुर।
‘‘कानून कहता है कि जहां व्यक्तिगत दावा नहीं लग सकता वहां सार्वजनिक वनाधिकार का इस्तेमाल कर सकते हैं। दूसरी तरफ सरकार को सामुदायिक वनाधिकार देने में अड़चन है। तभी तो यहां वनाधिकार के आवेदन तक नहीं बने हैं।’’ - छत्तरसिंह चैहान, गड़रवास, उदयपुर।
‘‘आवेदन मंजूरी का अंतिम अधिकार जिला कमेटी को है। जिले भर से आवेदन की फाइलें आती रहती हैं लेकिन निपटारे के लिए कमेटी को बैठने का समय नहीं। याने जब आवेदन ही नहीं होंगे तो अधिकार के सवाल भी नहीं उठेंगे।’’ - शंकर सिंह सिसोदिया, निचला तालाब, उदयपुर।
‘‘दावों का सत्यापन गंभीरता से किया जा रहा है। यह एक लंबी प्रक्रिया है। कमी रहने पर दावे निचले स्तर पर भी लौटाए जा रहे हैं।’’-ओ पी सिंह, अतिरिक्त आयोग, जनजाति विकास विभाग, उदयपुर।
राजस्थान में वनाधिकार कानून, 2005 को 2008 में लागू किया गया। इसके मुकाबले महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्य बहुत आगे रहे। तब कि वसुंधरा राजे सरकार ने आवेदन को बेहद जटिल बना दिया। पहले इसे 3 पेज का बनाया, फिर 11 पेज का। फिर कहा कि इसमें एसडीएम की सील भी जरूरी है। यह आवेदन राज्य सरकार को उपलब्ध कराने थे लेकिन जब बाजारों में आए तो सरकार ने बाजारों के आवेदनों पर रोक लगा दी। सरकार ने वनाधिकार कानून को वनों तक लाने में जरूरत से ज्यादा समय खर्च किया। और जब यह वनों तक आया है तब: जीपीएस मशीन किसी भी व्यक्ति का लोकेशन देखता है तो अक्षांतर और देशांतर को केन्द्र में रखकर। इसमें सभी व्यक्तियों का लोकेशन नहीं देखा गया है। जैसे कि उदयपुर जिले के बबई गांव को अनसेटल्ड एरिया होने के चलते मापा नहीं जा सका है। ऐसे अनगिनत गांवों हैं जहां जीपीएस मशीन के गैरमौजूदगी में आवेदन नहीं भरे जा सके हैं। इसी तरह भाखरा गांव की फाइल रूकी हुई है। यहां के लोगों को वन-विभाग के भौतिक सत्यापन का इंतजार है। बिछीवाड़ा में वन-विभाग के दबाव में लोगों को जमीनों से बेदखल किया गया है। जलपका गांव के लोगों का आरोप है कि पटवारीसाब ‘खर्चापानी’ के चक्कर में फाइलें सत्यापित नहीं करते। पटवारीसाब के पास जीपीएस मशीन न होने का ठोस बहाना जो है।
मानव आश्रिता संस्थान, बावलवाड़ा’ के अजमाल सिंह के मुताबिक- ‘‘असलियत यह है कि यहां जमीन जोतने, लघु वन उपज, पंरपरागत सामुदायिक जंगल और उसकी रक्षा जैसे हकों का आज भी इंतजार है। कानून की लगाम विभागीय कर्मचारियों के हाथों में जो रखी गई है।’’ दक्षिणी राजस्थान के 5 जिलों उदयपुर, डोंगरपुर, बांसवाड़ा, राजसमंद और प्रतापगढ़ की 23 पंचायत समितियों में की कुल आबादी का करीब 75 प्रतिशत हिस्सा जनजातियों का है। इन्होंने 1995 से ‘जंगल जमीन जन आंदोलन’ के बैनर तले वनाधिकार की जो लड़ाई शुरू की थी उसे कानूनी तौर से 2005 में जीती भी। लेकिन कानून को उसी रूप में वनों तक लाने की लड़ाई अबतक चालू है। आंदोलन मानता है कि पहले 10 सालों में काफी कुछ बदला है और काफी कुछ बदलना बाकी है।
जमीन का आंदोलन
एक तरफ 1 जुलाई 1992 का आदेश था कि 01/07/1980 के पहले से जो आदिवासी जहां रहते हैं उनका नियमन राज्य सरकार शीघ्रातिशीघ्र करे। 1995 तक राजस्थान भर में कुल 11 कब्जों की पहचान हुई। दूसरी तरफ वन-विभाग वाले आदिवासियों को जंगल से बेदखली, हफ्तावासूली के साथ-साथ उनकी झोपड़ियों और खड़ी फसलों में आग लगाने जैसी कार्यवाहियां होती रही। 1995 में जनसंगठनों ने कुल 23 पंचायत समितियों में 17000 काष्ठकारों के जंगल में रहने का आकड़ा उजागर किया। 6 अक्टूबर, 1995 को 2000 आदिवासियों ने पहला प्रदर्शन जनजाति आयुक्त कार्यालय, उदयपुर में किया। प्रदर्शन से पहले लोग एक-दूसरे को भले ही नहीं जानते हो लेकिन सबका दर्द एक ही था। नारे क्या लगाने हैं, भाषण कौन देगा जैसी बातें भी उन्होंने टाउनहाल में तय की थीं। जब शहर के बीचोबीच जुलूस में भारी भीड़ उमड़ी तो दफ्तर के लोगों से मंत्रालय तक पता जाकर चला कि यह तो बड़ी समस्या है। आदिवासियों ने मांग रखी कि वन-विभाग की तरफ से बेदखली की कार्यवाही बंद हो। 15 दिसंबर, 1995 को जब राजस्थान के मुख्य सचिव मीठालाल मेहता उदयपुर दौरे पर आए तो जनता ने उन्हें 1992 के आदेश के नियमन की याद दिलायी। मुख्य सचिव ने तिथि आगे बढ़ाने और शीघ्रातिशीघ्र नियमन का आश्वासन दिया।
आश्वासन के अलावा कुछ होता नहीं देख 6 जुलाई, 1996 को उदयपुर तहसील की सभी तहसीलों के साथ बांसवाड़ा, डुंगरपुर और चित्तोड़गढ़ से 3000 आदिवासियों ने टाउनहाल के सामने अनिश्चितकालीन धरने की बात कही। प्रशासन ने सोचा कि यह दम दिखावटी है, रात होते-होते लोग वापस चले जाएंगे। लेकिन शाम होते-होते जब लोग अपने साथ लाए आटा-सामान खोलकर रोटियां बनाने लगे तो प्रशासन समझा। सुबह 10 बजते-बजते संभागीय आयुक्त एस अहमद ने लिखित आश्वासन पढ़कर सुनाया तो पुराने तजुर्बों के चलते लोगों ने भरोसा नहीं किया। काफी चर्चा-बहस के बाद लोग लिखित आश्वासन की सैकड़ों प्रतियां लेकर गांव गए। लिखित आश्वासन में कहा गया था कि लोकसभा के चुनाव के बाद कब्जों की पहचान करायी जाएगी। ऐसा कोई कार्यवाही होते न देख आंदोलन ने सर्वे प्रपत्र खुद बनाने का फैसला लिया। इसमें ग्राम स्तर पर समितियां बनाई गई। 31 जनवरी, 1997 तक सूचनाएं जमा हुई, जिसमें कुल 8788 लोगों का 71304 बीघा जमीन पर कब्जा पाया गया। याने 1 परिवार की औसतन 8 बीघा जमीन। 6 फरवरी, 1997 में जनजाति आयुक्त को 1980 से पहले काबिज लोगों की तहसीलवार सूचियां दी गई। 9 सितम्बर, 1997 को दो दिनों तक चले सम्मेलन में तय हुआ कि चार स्तरीय समितियां (ग्राम-पंचायत-तहसील-केन्द्रीय स्तर) बनायी जाए। 1998-99 में सरकार ने मौका सत्यापन के लिए शिविर लगाए। कोरम के अभाव में जो खानापूर्ति बनकर रह गए। 1998 के लोकसभा चुनाव में ‘सवाल हमारे जबाव आपके’ नाम से जो अभियान चलाया गया उसमें उम्मीदवारों से जंगल-जमीन को नियमन करने की बात पर लिखित आश्वासन मांगे गए। अलग-अलग क्षेत्रों से अलग-अलग पार्टी के उम्मीदवार जीते और पुराने आश्वासन भूले। लेकिन 5 सालों तक वनाधिकार की लड़ाई ने आंदोलन का रुप ले लिया था।
15 सितम्बर, 2004 तक वन मंत्री बीना काक ने जब कब्जों का भैतिक सत्यापन करवाने के वायदा नहीं निभाया तो आंदोलन ने विधानसभा का घेराव किया। उस समय दक्षिण राजस्थान के 16 विधायकों के साथ हुई चर्चा हुई। तब कई विधायकों और मंत्रियों का समर्थन मिला। 19 जुलाई को नई दिल्ली में दो दिनों तक चली राष्ट्रीय जनसुनवाई में 13 राज्यों से प्रतिनिधि आए। इसमें फैसला लिया गया कि जिन राज्यों की याचिकाएं ‘केन्द्रीय सशक्त समिति’ में दायर नहीं की गई हैं उन्हें दायर किया जाए। 18 अक्टूबर को तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के साथ हुई बैठक में दो बातें तय हुईं। एक तो आदिवासियों की बेदखली को फौरन रोका जाए। दूसरा फसल को आग लगाने से लेकर पुलिस कार्यवाही की घटनाएं भी बंद हो।
2002 को राजस्थान में लगातार चौथे साल अकाल पड़ने और राहत नहीं मिलने से आदिवासी इलाकों से भारी तादाद में पलायन होने लगा। भुखमरी और पशुओं की मौतों की तादाद में इजाफा बढ़ते देख आंदोलन ने 12 अप्रेल, 2002 को जो धरना दिया उसमें विश्वनाथ प्रताप सिंह और सीताराम येचुरी भी शामिल हुए। लोगों ने नारे लगाए- ‘‘भूखे पेट नहीं चलेगा यह अन्याय।’’ उस समय 60 लाख टन अनाज को सड़ाकर समुद्र में फेंका जा रहा था। लोग जैसे ही एफसीआई की गोदामों की तरफ बढ़े वैसे ही पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। इसके बाद राज्य के लोगों को 2.5 लाख टन अनाज का कोटा मिला और ‘काम के बदले अनाज' की योजना बनी।
7 से 21 मार्च, 2005 को जंतर-मंतर, दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे ‘इज्जत से जीने के अधिकार’ के साथ ‘वनाधिकार विधेयक’ को संसद में पास कराने के लिए 15 दिनों का धरना दिया गया। इसके समर्थन में 41 सांसद व्यक्तिगत तौर से उपस्थिति हुए। इसके बाद 20 सांसदों की एक समिति भी बनी जिसने अपने स्तर पर संसद में काम करना शुरू किया। 16 सितम्बर, 2005 को राष्ट्रीय नेता और दक्षिण राजस्थान से 5000 से ज्यादा आदिवासियों ने ‘संयुक्त संघर्ष मंच’ की उदयपुर रैली में भाग लिया। 15 दिसम्बर को वनाधिकार कानून लोकसभा में और 18 दिसम्बर को राज्यसभा में पारित हुआ।
लेकिन दक्षिणी राजस्थान में वनाधिकार की लड़ाई अभी अधूरी है। प्रशासन ने अपनी सहूलियत के हिसाब से कानून में कई तरह के छेद कर दिए हैं। फिलहाल वनों के लिए बने अधिकार वनों से कटे लगते हैं। इसलिए यहां के आदिवासियों के बीच एक नारा बुलंद हो रहा है- ‘‘हमें जब तक वनाधिकार नहीं। हमारे वोट पर तुम्हारा अधिकार नहीं।।’’

8.9.09

एक कहे अकाल दूसरा बोले सुकाल

शिरीष खरे
4 फरवरी को जब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बाड़मेर आए तो उन्होंने अफसरों को सीधे शब्दों में कह दिया कि संवेदनशील, पारदर्शी और स्वच्छ प्रशासन सरकार की पहली मंशा है। इसके बाद अनियमितता में डूबे विभागों ने मुख्यमंत्री जी के कथन को जिस ढ़ंग से उड़ाया उसका एक रंग है यह।
एक तरफ से राजस्व विभाग की गिरदावरी रिर्पोट ने बायतु ब्लाक के 47 गांवों को अकालग्रस्त दिखाया। उसने दावा किया कि राज्य सरकार ने अकालराहत के काम खोले, लोगों को रोजगार बांटा और कुल मिलाकर बड़ी राहत पहुंचाई। दूसरी तरफ कृषि विभाग ने अकाल मानने से मना कर दिया। याने एक ही सरकार के दो विभागों की अलग-अलग रिपोर्ट एक-दूसरे से ऐसी उलझी कि किसान बीच में ही फंसा रह गया। इस तरह से फसल बीमा योजना की क्लेम राशि ने अकाल पर ऐसा सवाल (बवाल) खड़ा कर दिया कि सवालिया निशान पर किसान ही झूलता नजर आया।
असलियत से मीलों दूर खड़ी यह योजना यहां के अकालग्रस्त गांवों को सुकाल में दर्शाने के लिए बदनाम हो गई। इसमें अकाल का आंकलन करने के लिए क्राप कटिंग को आधार बनाया जाता है। याने एक तहसील की 50 से ज्यादा पंचायतों के हजारों खेतों में से सिर्फ 16 खेतों को चुना जाता है। इन खेतों के एक छोटे से हिस्से की फसल को काटकर राजस्व बोर्ड के दफ्तर भेजा जाता है, इसके बाद राजस्व बोर्ड कृषि प्रयोगशाला में इसकी पैदावार का जोड़-घटाना लगाकर तय करता है कि इस बार अकाल आया भी है या नहीं। तब इसकी रिपोर्ट से निकलने वाले पैदावार के आकड़े पटवारियों की रिपोर्ट के आकड़ों से भिड़ जाते हैं। और सोचने के लिए रह जाता है किसान कि आखिर तहसील के हजारों खेतों की पैदावार की बुनियाद केवल 16 खेत कैसे हो सकते हैं ? वह भी थार में जहां बरसात का यह हाल है कि एक गांव में अकाल रहता है और दूसरे में सुकाल।
लेकिन 28 मार्च को एक बड़े अखबार के स्थानीय संवाददाता ने बाड़मेर-बालोतरा संस्करण में जो रिपोर्ट भेजी उसका र्शीषक था- ‘किसानों की उम्मीदों को पंख’। इंटरो था- ‘‘राष्ट्रीय कृषि बीमा कंपनी ने खरीफ फसल बीमा क्लेम राशि जारी कर किसानों को नए साल में नई सौगात दी है।’’ खबर का शरीर बनाते हुए उसने लिखा- ‘‘..... इससे आठों तहसील क्षेत्र के अकालग्रस्त गांवों के किसानों को प्रीमियम के आधार पर क्लेम मिलेगा। अकेले दी बाड़मेर सेंट्रल को-आपरेटिव बैंक को 24 करोड़ रूपए खरीफ बीमा क्लेम राशि मिली है। प्रबंध कार्यालय ने सभी ग्राम सेवा सहकारी समितियों को यह राशि जारी करने की कवायद शुरू कर दी है जो किसानों के खातों में जमा होगी।’’ जबकि उसी तारीख में बीमा कंपनी ने सभी तहसीलों में खरीफ फसल की ग्वार का क्लेम अटकाकर रखा था। मानो फसल के नुकसान का गलत आंकलन और भुगतान की अनियमितताएं कोई मामला ही न हो। मानो कुछेक गाँवों में ही अकाल की छाया हो, और उसे हटाने के लिए भी राहत का इंतजाम हो गया हो।
अप्रैल की 3 तारीख को बायतु इलाके के किसानों ने राजस्व मंत्री हेमारामजी चौधरी को ज्ञापन दिया और बताया कि कृषि विभाग ने क्राप कटिंग पैटर्न के तरीके से बाजरा और ग्वार में पूर्ण पैदावार दर्शायी है, इस तरह बाजरा और ग्वार में औसत 7.6 प्रतिशत और मोठ में 19 प्रतिशत की दर से भुगतान किया जा रहा है। किसानों ने कहा कि जितना उत्पादन लिखा है उतना तो बीज ही लग जाता हैं। योजना का यह हाल है कि जिसने लोन लिया उसे फायदा मिलता है, जिसने लोन नहीं लिया वह छूट जाता है। यह भी कहा कि बायतु अक्सर अकाल की मार झेलता रहा है इसलिए किसानों की आर्थिक स्थितियां बहुत खराब हैं। सरकार को तो अतिरिक्त सहायता पैकेज देना चाहिए था ऐसे में उल्टा किसानों को मिलने वाली राशि भी काटी जा रही है। इससे साफ समझ में आता है कि बीमा कंपनियों को फायदा पहुंचाया जा रहा है। यहां के किसानों ने मंत्री महोदय से मांग की : पूरा बीमा क्लेम दिया जाए और बीमा आंकलन का तरीका बदलते हुए गिरदावरी रिपोर्ट को आधार बनाया जाए। इन्होंने बताया कि फसल खराब होती है सितम्बर में और राहत पैसा मिलता है अप्रेल में। इससे 6 महीने का ब्याज ही करोड़ों रूपए हो जाता है, अकेले बायतु में 47 करोड़ रूपए बकाया हैं। इसलिए बीमा क्लेम का भुगतान फसल खराब होने के तुरंत बाद दिया जाए।
राजस्व मंत्री हेमारामजी चौधरी ने संशोधन की जरूरत पर जोर की बात को माना- ‘‘फसल बीमा में तहसील को आधार रखा गया है, जबकि गांव को इकाई बनाया जाए तो सही होगा।’’ इस बात को अगर एक उदाहरण से जोड़कर देखेंगे तो तस्वीर और साफ होगी- इस बार बाड़मेर तहसील में बाजरे का बीमा 14.67 प्रतिशत आया है। अब जिनका बाजरा पूरा खराब हुआ है उन्हें भी इतनी राशि मिलेगी और जिनका कुछ भी खराब नहीं हुआ उन्हें भी इतनी ही राशि।
आश्वासन की आश में जब हफ्ताभर से ज्यादा गुजर गया तो हजारों किसानों ने तहसील मुख्यालय के सामने धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया। मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपते हुए किसान संघ जनमोर्चा के पूर्व प्रदेश संयोजक भंवरलाल चौधरी ने सरकार से आर-पार की लड़ाई लड़ने का ऐलान किया और अखिल भारतीय किसान सभा, एसएफआई के साथ-साथ बाल पैरवी नेटवर्क की तरफ से भी समर्थन मिला। अनिश्चितकालीन धरने के 5 दिन बीत जाने पर भी प्रशासन हरकत में नहीं आया तो किसानों ने आमरण अनशन की धमकी देते हुए नेशनल हाइवे रोकने की चेतावनी दी। नेशनल हाइवे रोकने की खबर मिलने ही अधिकारी चेते। चर्चा में उपखण्ड अधिकारी और तहसीलदार ने 2 महीने की मोहलत मांगी। उन्होंने कहा कि ग्वार में बीमा कंपनी ने 61 प्रतिशत मंजूरी दी है, 2 दिनों में मुआवजे के लिए नुकसान की रिपोर्ट ऊपर भेज देंगे। किसानों ने प्रशासन की ओर से सही कार्यवाही और आचार सहिंता का पालन करने की बातें सुनकर अपना आंदोलन रोक दिया।
अनिश्चितकालीन धरने के उन 5 दिनों को याद करते हुए बाल पैरवी नेटवर्क के मोटाराम गौड़ बताते हैं- ‘‘यह किसानों का मामला था, किसानों ने ही उठाया और आगे बढ़ाया। वही तय करते कि आज कौन सा गांव रोटी लेकर आएगा। इसमें छोटे-छोटे जनप्रतिनिधियों की भागीदारिता रही। बड़ा प्रतिनिधि (जैसे सांसद) वगैरह आते तो 20-25 सरपंचों को देखकर दबाव में आ जाते।’’ बुजुर्ग किसान उदाराम कहते हैं- ‘‘14 अप्रेल याने अंबेडकर जंयती पर बड़े नेता के हाथों आमरण अनशन तोड़ने की बजाय नन्हीं बच्ची के हाथों जूस लिया। बीमा क्लेम यहां इतने बड़े मामले की तरह छाया कि हर पार्टी के बड़े नेता की गले में हड्डी बन गया। सांसद पद के कई उम्मीदवार हमारा समर्थन करते घूमते। हरीशचंदजी ने इसे 200 से ज्यादा बैठकों में उठाया और उनकी जीत में यहां के मतों ने अहम भूमिका निभाई।‘‘ अब नई सरकार के पुराने वायदे पूरा करने का समय है। अब देखना यह है कि जनता ने नई सरकार में जिस प्रतिनिधि (सांसद) को चुना है उसके कथन का रंग भी जमेगा या उड़ेगा ?