6.9.11

खोए बच्चों की वापसी का इंतजार


आगरा।बौद्ध नगर में एक छोटे से कमरे में रहने वाली सोमवती को अपने तीन बच्चों की वापसी का पिछले नौ साल से इंतजार है। वर्ष 2002 में सोमवती के 10 से 14 वर्ष की उम्र के तीन लड़के एक के बाद एक करके गायब हो गए। अपने बच्चों से बिछड़ने की पीड़ा झेलने वाली सोमवती अकेली नहीं है बल्कि ऐसे सैकड़ों मां-बाप हैं जो अपने खोए बच्चों की वापसी का आज भी इंतजार कर रहे हैं।

सोमवती के बच्चों के गायब होने की रिपोर्ट पुलिस ने पांच साल तक नहीं लिखी। इसके बाद वर्ष 2010 में इस मामले की फाइल बंद कर दी गई। पुलिस और प्रशासन के गलियारों में दर-दर भटक रही इस गरीब महिला ने स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से राष्ट्रपति से गुहार लगाई जहां से राज्य सरकार को इस मामले की जांच के निर्देश दिए गए। फाइल तो दोबारा खुल गई पर सोमवती आज भी बच्चों के इंतजार में पथराई आंखों से इन तंग गलियों को देखती है।

मध्य प्रदेश के मंडला जिले में जनजातीय परिवार की किशोरी सुनीता को वर्ष 2004 में उनके कुछ परिचित 17 साल की उम्र में दिल्ली में काम दिलवाने के बहाने ले गए थे। सुनीता के पिता कुंवर सिंह को दो साल तक उनके परिचित यह कहकर टालते रहे कि उनकी बेटी दिल्ली में काम कर रही है। पर कई बार दिल्ली जाने के बावजूद उन्होंने कुंवर सिंह को न तो उनकी बेटी से मिलवाया गया और न ही उससे बात करने दी।

दो वर्ष बाद 2006 में कुंवर सिंह ने प्रशासन और पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई। उन्हें शक है कि उनकी बेटी को किसी गिरोह के हाथों बेच दिया गया है। कुंवर सिंह की रिपोर्ट में वे लोग बाकायदा नामजद किए गए हैं जो उनकी बेटी को झूठा दिलासा लेकर दिल्ली ले गए थे। लेकिन सरकारी कार्यालयों और थानों में चक्कर काट रहे इस असहाय पिता की गुहार सुनने वाला कोई नहीं है।

गैर सरकारी संगठन चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) के अनुसार दिल्ली, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में बच्चे गायब हो रहे हैं। हालांकि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो द्वारा ऐसे मामलों का रिकार्ड रखा जाता है। पर दिलचस्प बात यह है कि क्राई और उसके सहयोगी संगठनों ने जब सूचना के अधिकार के तहत जानकारी एकत्र की तो पता चला कि बच्चों के गायब होने के मामलों की संख्या वास्तव में थाने में दर्ज मामलों से कहीं ज्यादा है।

समस्या की गम्भीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली में पिछले वर्ष प्रतिदिन 18 बच्चे गायब हुए। क्राई की रपट के अनुसार वर्ष 2010 में दिल्ली में पहले नौ महीनों में गायब हुए 2161 बच्चों में से 1102 लड़के और 962 लड़कियां थीं। इनमें से 1556 बच्चों को तो ढूंढ निकाला गया लेकिन 603 बच्चों को कुछ पता नहीं चला।

मध्यप्रदेश में वर्ष 2003 से 2009 के बीच 57253 बच्चे गायब हो गए। इनमें से लगभग 5350 बच्चों का आज तक पता नहीं चल पाया है।

उत्तर प्रदेश के आठ जिलों में अक्टूबर 2010 में सूचना का अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार 250 बच्चे गायब हो चुके थे। ये आठ जिले हैं-गोरखपुर, मऊ, बाराबंकी, मुजफ्फरनगर, आगरा, अम्बेडकर नगर, प्रतापगढ़ और आजमगढ़। इससे पहले उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा फरवरी 2008 में उपलब्ध करवाई गई जानकारी के अनुसार वर्ष 2006 में राज्य से 3649 बच्चे गायब हो गए थे जिनमें से 712 को तब तक प्रशासन ढूंढ नहीं पाया।

क्राई की रपट के अनुसार देश के नौनिहालों का बड़ी संख्या में गायब होना बदस्तूर जारी है। गायब बच्चों में से बड़ी तादाद गरीब और आर्थिक व सामाजिक रूप से कमजोर परिवारों की है। रपट के अनुसार इन बच्चों का इस्तेमाल बंधुआ मजदूर, बाल मजदूर, बाल विवाह और यौन शोषण के लिए किया जाता है। कई बच्चे ऐसे भी हैं जो घरेलू हिंसा और विभिन्न प्रकार के शोषण से परेशान होकर घरों से भाग जाते हैं और अंतत: किसी गिरोह या स्वार्थी तत्वों के हाथ पड़कर शोषण के शिकार हो जाते हैं।

क्राई की निदेशक योगिता वर्मा के अनुसार, "कई बार ये बच्चे भिखारियों और जेबकतरों के गिरोहों के हाथों शोषित होते हैं। नशीले पदाथरें के तस्कर भी इनका इस्तेमाल करते हैं।"

वर्मा के अनुसार, "खासतौर से सड़कों व चौराहों पर रहने वाले बच्चों को अगवा कर न केवल उनका शारीरिक और यौन शोषण होता है। चिंता की बात यह है कि अक्सर ऐसे मामले दर्ज नहीं हो पाते हैं। "

रपट के अनुसार इस समस्या से निपटने में दो बड़ी बाधाएं सामने आती हैं। पहली बाधा कानूनी है। क्राई के अनुसार यह बात चिंताजनक है कि देश में बच्चों की तस्करी से सम्बंधित कोई अलग कानून नहीं है, इसलिए बच्चों की खरीद-फरोख्त अथवा तस्करी को कानूनी नजरिए से भारत में एक अलग आपराधिक श्रेणी में नहीं रखा जाता है।

दूसरी समस्या है पुलिसकर्मियों में ऐसे मामलों से निपटने के लिए संवेदनशीलता और दक्षता का अभाव। रपट के अनुसार राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी यह पाया है कि ऐसे मामलों को पुलिस प्राथमिकता नहीं देती। पुलिसकर्मियों को ऐसे मामलों से निपटने के लिए विशेष प्रशिक्षण की जरूरत है।

30.8.11

कम वेतन वाले परिवारों के बच्चे कुपोषित


कुपोषण और गरीबी दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और देश की प्रगति में बाधक हैं. जिन परिवारों में कुपोषित बच्चे हैं, उनमें से ज्यादा संख्या ऐसे परिवारों की है जिनके सदस्य बुनियादी न्यूनतम मजदूरी भी अर्जित नहीं करते हैं.

जैसा की क्राई भी मानता है कि जिन परिवारों में कुपोषित बच्चे हैं, उनमें से ज्यादा संख्या ऐसे परिवारों की है जिनके सदस्य न्यूनतम मजदूरी भी अर्जित नहीं करते हैं. क्राई और इसके दिल्ली, उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश में स्थित साझेदार संगठनों के अध्ययन में यह बात सामने आई है कि कुपोषण के अधिक मामले अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्गो में हैं. क्राई के मुताबिक़ "ऐसे परिवारों के ज्यादातर लोग दैनिक मजदूरी पाते हैं." अध्ययन के अनुसार दिल्ली की झुग्गियों में रहने वाले 60 प्रतिशत से अधिक बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. क्राई का अध्ययन बताता है, "दिल्ली की 20 प्रतिशत आबादी झुग्गियों में रहती है और इन झुग्गियों में रहने वाले 66 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं."

अध्ययन में सामने आया है कि मध्य प्रदेश में 60 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में 85 प्रतिशत बच्चों में खून की कमी पाई गई है, जबकि 41.6 प्रतिशत का वजन जरूरत से कम है. राष्ट्रीय आंकड़े के मुताबिक 40 प्रतिशत बच्चों का वजन जरूरत से कम है और 45 प्रतिशत की वृद्धि रुकी हुई है.
वर्मा ने सुझाव दिया कि जन वितरण प्रणाली, समेकित बाल विकास परियोजना एवं राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसी विभिन्न योजनाओं में सुधार लाने की जरूरत है तथा समस्या से निजात पाने के लिए कड़ी निगरानी की जरूरत है.

14.8.11

दलदल में देश का भविष्य



बच्चों को देश का भविष्य कहा जाता है.
लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि देश के अधिसंख्य बच्चे अपना पेट भरने के लिए बाल श्रम, बंधुआ मजदूरी और खतरनाक उद्योगों में जान हथेली पर रख कर काम करने को मजबूर हैं; तो दूसरी तरफ बच्चों का अपहरण करके मानव तस्करी और वेश्यावृत्ति में धकेलने का धंधा भी धड़ल्ले से फल-फू ल रहा है. राजधानी दिल्ली में बच्चे लगातार गायब हो रहे हैं लेकिन किसी ने जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर उनके गायब होने की वजह क्या है.
गैर सरकारी संगठन क्राई को आरटीआई के तहत मिली सूचना में कुछ चौंकाने वाले तथ्य उभर कर सामने आए है. पिछले जनवरी से लेकर अप्रैल तक चार महीने में राजधानी के विभिन्न इलाकों से 1238 बच्चे गुम हुए हैं. जिसमें 690 लड़कियां और 570 लड़के गुम है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक गायब होने वाले बच्चों की उम्र 12 से 18 वर्ष होती है. राष्ट्रीय स्तर पर पिछले दो सालों में पंद्रह राज्यों से 1 लाख 17 हजार बच्चे गायब हुए हैं. आैसतन 60 हजार बच्चे हर साल गायब हो रहे हैं.  
जानकारों के मुताबिक गायब हुए बच्चों को संसार के तीन सबसे पुराने अवैध धंधों- अवैध हथियार का व्यापार, नशीली दवाओं के कारोबार और वेश्यावृत्ति में इस्तेमाल किया जाता है. पूरे विश्व में यह व्यापार सालाना 45 अरब डालर का है. विश्व के कई हिस्सों में तो मासूमों को जानवरों से भी सस्ती कीमत पर बेचा जा रहा है. यानी कहा जा सकता है कि बच्चों को वस्तु बना दिया गया है. देश के कई भागों में कानून के रखवालों द्वारा ऐसे बच्चों की खरीद-फरोख्त में लिप्त लोगों को पकड़ा भी जाता है तथा बच्चों की बरामदगी भी होती है लेकिन कागज के कुछ चंद नोटों के बदले इस जघन्य धंधे के सरगना आसानी से छूट जाते हैं. राजधानी और बड़े-बड़े महानगरों में हर साल अधिकांश बच्चे ट्रैफिकिंग करके लाए जाते हैं. उनके मां-बाप को उनके बेहतर भविष्य का सपना दिखाया जाता है. लेकिन हकीकत में उन्हें जलालत भरी जिंदगी जीने के  लिए विवश किया जाता है.
पूर्वोत्तर राज्यों, बिहार, ओडिसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ के बच्चे तस्करों का आसान शिकार होते हैं. नीति निर्धारक इन बच्चों को गरीबी के चलते पलायित मानते हैं लेकिन असल में ये बाल व्यापार के शिकार हैं. बाल व्यापार में बच्चों के अभिभावकों को थोड़ा-बहुत पैसा देकर उनकी सहमति हासिल की जाती है. ऐसे बच्चों के माता-पिता गरीबी की वजह से पैसे के लोभ में फंस जाते हैं. इसके अलावा अपहरण करके और बच्चों को बहला-फुसलाकर भी बाल व्यापार के दलदल में फंसाया जा रहा है.
बाल व्यापार की मार झेल रहे बच्चों से वेश्यावृत्ति के अलावा मजदूरी भी करवाई जाती है. दरअसल, ऐसे बच्चों को जबरिया मजदूर कहना ज्यादा वाजिब होगा. अंतरराष्ट्रीय कानूनों के मुताबिक इसे समकालीन दासता कहा गया है. पूरी दुनिया में हर साल तकरीबन 60 लाख बच्चे बाल व्यापार के शिकार हो रहे हंै. इसमें से एक तिहाई बच्चे दक्षिण एशियाई देशों से हैं. जहां तक भारत की बात है तो यहां बाल व्यापार में ढकेले जा रहे बच्चों की संख्या से जुड़े सही-सही आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. भारत बाल व्यापार का बहुत बड़ा केंद्र है.
बाल व्यापार के क्षेत्र में भारत स्रोत, गंतव्य और पारागमन केंद्र के रूप में काम कर रहा है. नेपाल और बांग्लादेश से बच्चे यहां लाए जा रहे हैं. यहां से बड़ी संख्या में बच्चे अरब देशों में ले जाए जा रहे हैं. अरब देशों में कम उम्र की मुस्लिम लड़कियां भी ले जाई जा रही हैं. वहां के शेख इनसे अपनी यौन इच्छाओं की पूर्ति कर रहे हैं. इसके अलावा अन्य देशों में घरेलू मजदूर के तौर पर भी मासूमों का इस्तेमाल भारत से ले जाकर किया जा रहा है.
देश में बाल व्यापार के कानून की जद में वेश्यावृत्ति और यौन शोषण ही हैं. कहना न होगा भारत के मौजूदा कानून बाल व्यापार पर लगाम लगाने में अक्षम हैं. इसलिए नए कानून की दरकार है. फरवरी-मार्च 2007 में बचपन बचाओ आंदोलन ने बाल व्यापार के खिलाफ यात्रा निकाली. जिसे संयुक्त राष्ट्र ने इस दिशा में अब तक की सबसे बड़ी यात्रा बताया था. इस यात्रा के परिणामस्वरूप सार्क देशों की बैठक में बाल व्यापार पर चर्चा हुई. सार्क सदस्यों ने इस दिशा में नीति बनाए जाने की वकालत तो की ही, साथ ही साथ एक कार्यदल गठित करने की भी घोषणा की.
उसके बाद संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधियों और केंद्रीय मंत्रियों के साथ एक बैठक में भी बाल व्यापार के खिलाफ कानून बनाए जाने पर सहमति बनी. लेकिन इसके बाद भी देश के कानून में बदलाव आएगा और आने वाले दिनों में इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे, यह कहा नहीं जा सकता है. सार्क देशों ने इसको रोकने के लिए टास्क फोर्स का गठन किया है. सदस्य देशों के सीमांत क्षेत्रों के बाल व्यापार पर लगाम लगाने की बात कही जा रही है. लेकिन क्या इस सारी कवायद के बाद इस अमानवीयता पर रोक लगेंगी? यह बड़ा प्रश्न है.

29.7.11

मानव तस्करी के शिकार हो रहे हैं राजधानी के नौनिहाल

नई दिल्ली.‘साहब वो बोल नहीं सकती, सुन भी नहीं सकती,.उसे बचा लो साहब, मेरी बच्ची को बचा लो।’ पिछले चार हफ्तों से अपनी मूक-बधिर बेटी की तलाश में बसंतकुंज की रेहाना मदद की आस में दर-दर भटक रही है।

रेहाना की तरह राजधानी में सैकड़ों ऐसे परिवार हैं, जो अपने कलेजे के टुकड़े की तलाश में सालों से इधर-उधर भटक रहे हैं, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं। हद तो तब हो जाती है, जब इन दुखियारों की मदद करने से पुलिस भी मना कर देती है।

कलेजे के टुकड़े से बिछड़ने व पुलिस की उपेक्षा से आहत इन परिजनों के जख्मों में मरहम लगाने के लिए क्राई नामक संस्था ने एक कार्यक्रम आयोजित कर दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों सहित गैर सरकारी संस्थाओं के प्रमुखों के सामने उन्हें अपनी फरियाद सुनाने का अवसर मुहैया कराया।

रेहाना की तरह पिछले नौ साल से बेटे राहुल की तलाश कर रहे सुंदर के ने कहा कि बेटे की तलाश में जब पुलिस से मदद मांगने गए तो उन्होंने पहले खुद ही बेटे की तलाश करने की बात कह वहां से भगा दिया। बेटे के न मिलने पर जब दुबारा थाना पहुंचा तो पुलिस वालों ने उसे मरा बता दिया।

इसी तरह 2006 से लापता विकास की दादी कृष्णा बताती हैं कि बहुत भागदौड़ की, लेकिन वह नहीं मिला। पुलिस वाले आते है और यह कह कर चले जाते हैं कि जान पहचान में ढूंढो, वहीं कहीं होगा। उनका परिवार आज तक इस सदमे से उबर नहीं पाया है। आगरा जगदीशपुर की सोनबती की कहानी तो और भी दिल दहला देने वाली है।

उनके तीन बेटे 2002 में उसकी आंखों के सामने से गायब हो गए। तीनों की उम्र 12,10 और 14 थी। इस सदमे से उसका पति भी चल बसा। बच्चों की तलाश में थाने का चक्कर काटना अब उसकी दिनचर्या सी बन गई है। पांच साल बाद एक एनजीओ के प्रयास से इस मामले में रिपोर्ट दर्ज की गई। बावजूद इसके आज तक उनके बच्चे नहीं मिल पाए हैं।

क्राई द्वारा दिल्ली के आठ जिलों में कराए गए सर्वे के अनुसार, इस साल दिल्ली से करीब 1260 बच्चे लापता हुए हैं। इनमें 570 लड़के व 690 लड़कियां शामिल हैं। लापता होने वाले इन बच्चों में अधिकतर की उम्र 24 महीने से लेकर 18 साल के बीच है।

क्राई के अनुसार, इस साल सर्वाधिक 549 बच्चों के लापता होने की शिकायत बाहरी जिले से दर्ज कराई गई है। इनमें से 437 बच्चे सकुशल घर लौट आए, लेकिन 112 बच्चों का अभी तक कोई सुराग नहीं लगा है। वहीं उत्तर पश्चिम जिले से 465 लापता बच्चों में सिर्फ 203 का सुराग लग सका है।

पूर्व आईपीएस अधिकारी अमोद कंठ के अनुसार, बच्चों के अपहरण अब पैसों की जगह बाल मजदूरी के लिए किया जाता है। मानव तस्करी का 70 प्रतिशत कारोबार बच्चों के माध्यम से देश में सक्रिय है। बावजूद इसके अभी तक हमारे कानून में मानव तस्करी की परिभाषा में बाल मजदूर को शामिल नहीं किया गया है।

रोज गायब हो जाते हैं 20 बच्चे!


हाल ही में जारी चाइल्ड राइट्स एंड यू ( क्राई ) की एकरिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि दिल्ली सेरोजाना 18 से 20 बच्चे गुम हो जाते हैं , जिनमें सेज्यादातर की उम्र 12 से 18 साल के बीच होती है। इन गुमहोने वाले बच्चों में से 6.76 प्रतिशत की उम्र 0-6 साल , 6.76 प्रतिशत की 7-12 साल और 72.8 प्रतिशत की उम्र 12-18 सालके बीच होती है।

ये तो वे आंकड़े हैं जो पुलिस औरआरटीआई की मदद से मिले हैं लेकिन कई ऐसे केस भी हैं जिनके बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं हैं। अगर उन आंकड़ों को भी मिला लिया जाए तो ये आंकड़े और भी बढ़ जाएंगे। क्राई की इस रिपोर्ट को दिल्ली, उत्तर प्रदेश औरमध्य प्रदेश से मिले आंकड़ों के आधार पर तैयार किया गया है। 


इस रिपोर्ट पर बहस के लिए क्राई की ओर से शुक्रवार को चर्चा का आयोजन किया गया था। इस मौके पर खोए बच्चों के पैरंट्स के अलावा जूरी भी मौजूद थी। इस बहस में नांगलोई से आई खुरनारा ने बताया कि उनकी साल की बेटी नेहा घर से गायब हो गई थी। कई दिनों तक ढूंढने के बाद उसका कुछ भी पता नहीं चल पाया औरपुलिस की तरफ से भी इतना सहयोग नहीं मिल पाया था। लेकिन मैं किस्मत वाली थी कि मेरी बेटी मुझे कुछ दिनों बाद वापिस मिल गई। पर हर मां-बाप खुरनारा की तरह किस्मत वाले नहीं होते। ऐसे भी कई लोग वहांमौजूद थे जिनके बच्चों का आजतक कोई पता नहीं चल पाया कि वे कहां हैं। जूरी में संयुक्त पुलिस आयुक्त एस नृत्यनंजनएनसीपीसीआर के वरिष्ठ सलाहकार डॉ रमाकांत नायक ,डीसीपीसीआर के डॉ आमोद कंठसेंटर फॉर चाइल्ड की भारती अलीसुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज डी पी वधवा और दिल्ली हाई कोर्ट के रिटायर्ड चीफ जस्टिस ए पी शाह जैसी हस्तियां मौजूद थीं। क्राई की डायरेक्टरयोगिता वर्मा ने कहा कि बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए काफी जरूरी है कि सभी केसों के अपडेटेड रेकॉडर्स हों।

13.6.11

आरटीई का दायरा 18 साल तक बढ़ाया जाए- क्राई


नई दिल्ली !    बाल मजदूरी की समस्या के प्रभावी समाधान के लिए 18 वर्ष तक के बच्चों को शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम के दायरे में लाया जाए। यह मांग एक गैरसरकारी संगठन (एनजीओ) ने यहां विश्व बाल मजदूरी विरोध दिवस के अवसर पर सरकार से की।
क्राई (चाइल्ड राइट्स एंड यू) ने यहां दिल्ली हाट से रविवार को एक अभियान की शुरुआत करते हुए सरकार से मांग की कि कानूनन सभी क्षेत्रों से बाल श्रम समाप्त किया जाए।
क्राई की निदेशक योगिता वर्मा ने आईएएनएस से कहा, ''बाल श्रम के विरुध्द कानून सिर्फ 16 क्षेत्रों में लागू है, जबकि बाल श्रम भारत में लगभग हर क्षेत्र में है। हमारी मांग है कि कानून का दायरा बढ़ाकर इसे सभी क्षेत्रों में लागू किया जाए।''
वर्मा ने कहा कि सिर्फ 14 वर्ष तक अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करने का मतलब है कि हम आठवीं कक्षा के बाद बच्चों को बाल मजदूरी करने के लिए बाध्य कर रहे हैं। हम चाहते हैं कि 18 वर्ष तक के सभी बच्चों को मुफ्त शिक्षा मिले।

22.5.11

बाल शोषण के कई रूप


जया सिंह
क्राई से जुडी हैं.


रोजाना बहुत से बच्चे मारने-पीटने व गाली-गलौज वाले शोषण से लेकर यौन शोषण तक की चपेट में आते हैं. इनमें कई ऐसे हैं कि जिन्हें हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में शोषण के तौर पर देखते ही नहीं. घर में काम करने वाला बाल मजदूर हो या स्कूलों में बच्चों की शिक्षकों के हाथों पिटाई, हम इसे शोषण के तौर पर नहीं देखते. इनमें निश्चित तौर पर सबसे भयावह बाल यौन शोषण है. बच्चा चाहे 3-4 साल का ही क्यों न हो, उसका यौन शोषण होता है तो उसकी मानसिकता पर उतना ही बुरा प्रभाव पड़ता है जितना 10-11 साल के बच्चे के यौन शोषण से उस पर पड़ता है.

दरअसल, यौन शोषण के लिए बच्चे आसान टारगेट होते हैं. ज्यादातर मामलों में घर-परिवार और परिचित ही ऐसे अपराध में शामिल होते हैं. मौजूदा आधुनिक जीवनशैली में माता-पिता दोनों कामकाजी हो रहे हैं. उन्हें महानगरों की जिंदगी से तालमेल बिठाने के लिए ज्यादा से ज्यादा वक्त अपने काम और सोशल सर्किल में देना होता है. ऐसी सूरत में उनके घर में बच्चा अकेला होता है. या तो वह नौकरों के हवाले होता है या नजदीकी रिश्तेदारों के हवाले. माता-पिता के पास इतनी फुरसत नहीं होती है कि वे बारीकी से बच्चों का ध्यान रख पाएं. ऐसे बच्चों को ज्यादातर निशाना बना लिया जाता है.

बच्चों का यौन शोषण हो जाने पर ज्यादातर मामले पुलिस तक पहुंचते ही नहीं. घर-परिवार के लोगों को इज्जत-प्रतिष्ठा का ख्याल आने लगता है. उन्हें उस मासूम को लगे दंश की पीड़ा नहीं होती. घर ही नहीं, स्कूल, आंगनवाड़ी या फिर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर भी बच्चे सुरक्षित नहीं हैं. वहां भी उनकी बेहतर देखभाल नहीं होती है. शहरों में जागरूकता बढ़ी है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में अभी इस पहलू को लेकर परम्परागत सोच बरकरार है. 'क्राई" इस मामले में जागरूकता बढ़ाने के स्तर पर काम कर रहा है. इसके अलावा हम लोग यह भी देखने की कोशिश कर रहे हैं कि बच्चों पर होने वाले अपराध को लेकर शासन व्यवस्था के अंदर किस तरह के कदम उठाए जा रहे हैं. इस दिशा में सूचना के अधिकार से हमें काफी मदद मिली है.

अब तो बच्चों के यौन शोषण वाले पर्यटन के मामले भी बढ़े हैं. यह संगठित कारोबार के तौर पर फैल रहा है. इसमें गरीब बच्चों को धकेला जा रहा है. इसके लिए बच्चों के अपहरण के मामले बढ़े हैं. देश में हर साल 9 हजार बच्चे गायब हो रहे हैं. इसमें दिल्ली सबसे टॉप पर है जहां रोजाना 18 बच्चे गुम हो रहे हैं. इस बारे में पुलिस का रवैया दोषपूर्ण है. उसे लगता है कि इलाके में बच्चों के गायब होने की रिपोर्ट दर्ज की तो कार्रवाई का दबाव बढ़ेगा. वे रिपोर्ट दर्ज करने से बचते हैं. पहली दिसम्बर, 2008 से 30 जून, "09 के बीच दिल्ली में 3,812 बच्चों के गुम होने की शिकायत हुई लेकिन मात्र 1,133 एफआईआर दर्ज हुर्इं. ज्यादातर मामलों में पुलिस इनकार करती रहती है कि ऐसा नहीं हुआ है, जबकि उसे ऐसे मामलों में तत्परता से काम करने की जरूरत है.

समाज में शिक्षकों, डॉक्टरों को भी अपनी जिम्मेदारी ठीक ढंग से निभानी चाहिए. अगर कोई डॉक्टर इलाजे कराने आए मासूम का बलात्कार करता है तो उस डॉक्टर के विरुद्ध सख्त कार्रवाई होनी चाहिए. यही मापदंड शिक्षकों के प्रति भी अपनाना चाहिए पर मुश्किल है कि सरकार इस दिशा में गम्भीर कदम नहीं उठा रही है. चाइल्ड सेक्सुअल अफेंस एक्ट का मसौदा तैयार है लेकिन सरकार उसे लागू कराने में दिलचस्पी नहीं दिखा रही है.

प्रस्तुति : प्रदीप कुमार. साभार : सहारा समय 

5.5.11

गरीबी और बाल मजदूरी के बीच का रिश्ता


श्यामल मजूमदार

करीब एक पखवाड़ा पहले, मोइन नामक एक बच्चे को उसके चाचा ने पीट-पीटकर मार डाला। मोइन अपने चाचा की फैक्टरी में काम करता था। अगर टेलीविजन चैनलों ने उसकी दर्दनाक तस्वीरें न दिखाई होतीं तो शायद यह वाकया लोगों के जेहन में घर भी न कर पाता। अब भी इस बात में संदेह ही है कि एक बार चैनलों का ध्यान हटने के बाद कोई मोइन के साथ घटी घटना को कभी याद भी करेगा या नहीं।

ऐसा अनेक बार हो चुका है। महज एक वर्ष पहले की बात है, बेंगलुरू में  एक इंजीनियर दंपती को उनके यहां घरेलू काम करने वाली 14 वर्षीय बच्ची को प्रताडि़त करने के लिए गिरफ्तार किया गया था। उस लड़की ने पुलिस को बताया कि उसे काम के दौरान उसके कपड़े उतारने के लिए कहा गया था जब उसने विरोध किया तो उसे बुरी तरह मारा पीटा गया। दंपती को कुछ दिन के बाद जमानत मिल गई और जब मीडिया भी और अधिक सनसनीखेज मामलों की तलाश में आगे बढ़ गया तो लोगों में भी उसे लेकर जिज्ञासा कम हो गई।


चूंकि अंतराष्ट्रीय श्रमिक दिवस अभी हाल ही में बीता है तो यह देश में बाल श्रम के आंकड़ों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने का एकदम उचित समय है। बचपन बचाओ आंदोलन के मुताबिक देश भर में अभी भी 1.26 करोड़ बच्चे खतरनाक फैक्टरियों में काम करने के लिए विवश हैं। इतना ही नहीं दिल्ली की सड़कों से रोजाना लगभग पांच बच्चे खो जाते हैं। इन बच्चों को अंतरराज्यीय गैंग बंधुआ मजदूरी के लिए बाहर लेकर चले जाते हैं।

कुछ अन्य बच्चे अभी भी घरों के फर्श साफ करते, पत्थरों की खदानों में  गर्मियों में पसीना बहाते, दिन के 16 घंटे खेतों में काम करते, शहरों की गलियों में कचरा बीनते या फिर सड़क किनारे ढाबों में खाना परोसते दिख जाएंगे। ज्यादा बुरी बात यह है कि खतरनाक पेशों में उनके काम करने की प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है। क्या ये बच्चे मोइन के मुकाबले बेहतर हैं?


बात करते हैं बीड़ी उद्योग की। बाल श्रम के खिलाफ अनगिनत कानून होने के बावजूद आज भी हर दिन बीड़ी उद्योग के बाल श्रमिक हर रोज औसतन 9 रुपये के मेहनताने पर 1,500 बीडिय़ां बनाते हैं। यहां काम की परिस्थितियां बच्चों के स्वास्थ्य के लिए एकदम प्रतिकूल होती हैं। तंबाकू के बीच बहुत अधिक समय बिताने से उन्हें फेफड़ों की बीमारी समेत तमाम तरह की तकलीफें हो जाती हैं। बीड़ी उद्योग से संबंधित समुदायों में बड़े पैमाने पर तपेदिक की बीमारी पाई जाती है।


मानवाधिकार निगरानी संबंधी एक अध्ययन में दर्शाया गया है कि कैसे हर उद्योग में बाल श्रम अधिनियम का बड़े पैमाने पर उल्लंघन किया जाता है। जिन प्रावधानों का उल्लंघन किया जाता है उनमें हर तीन घंटे के काम के बाद एक घंटे के आराम, दिन में अधिकतम छह घंटे काम, सुबह 8 बजे के पहले और शाम 7 बजे के बाद बच्चों के काम पर रोक, हर सप्ताह एक दिन का अवकाश और विभिन्न प्रकार के स्वास्थ्य सुरक्षा संबंधी उपाय शामिल हैं।

क्राई (चाइल्ड राइट्स ऐंड यू) के एक शोध प्रपत्र में मुख्य कार्याधिकारी पूजा मारवाह कहती हैं कि 7,000 से अधिक गांवों और झुग्गियों में जहां उनका संगठन काम करता है, वहां इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण मिले हैं कि आसपास के इलाकों में निशुल्क और बेहतर सरकारी विद्यालयों की कमी से बाल श्रम का सीधा संबंध है। विद्यालयों में भवन की कमी, शिक्षकों की कमी, अनियमित शिक्षण, बच्चियों के लिए अलग शौचालय न होना आदि कुछ ऐसी बातें हैं जो बच्चों को विद्यालयों से इतर काम की ओर मोड़ देती हैं।


बहरहाल, पिछले कुछ दशकों के दौरान विद्यालयों में बच्चों के दाखिले की संख्या में उल्लेखनीय इजाफा हुआ है। ग्रॉस इनरोलमेंट रेशियो (जीईआर) के मुताबिक कक्षा एक से आठ तक यह अनुपात 94.9 फीसदी और कक्षा एक से 12 तक यह 77 फीसदी है। मारवाह कहती हैं कि जीईआर के इन आंकड़ों में बड़ी संख्या उन बच्चों की है जो या तो विद्यालय जाते नहीं या फिर बीच में ही पढ़ाइ्र्र बंद कर देते हैं।
सरकारी विद्यालयों में कक्षा 5 तक एक चौथाई बच्चे पढ़ाई बंद कर देते हैं और कक्षा आठ तक इनकी संख्या आधी हो जाती है। अनेक बच्चे महज इसलिए स्कूल नहीं जा पाते क्योंकि उनके आसपास स्कूल है ही नहीं। मारवाह बताती हैं कि देश में तकरीबन 17,282 ऐसी बस्तियां हैं जिनके एक किलोमीटर के दायरे में कोई प्राथमिक विद्यालय नहीं है।

क्राई यह भी बताता है कि कैसे बच्चों का स्वास्थ्य हमारी देश की प्राथमिकताओं से गायब हो चुका है। 1,000 पर 50 बच्चों की बाल मृत्युदर इसकी ओर सीधा संकेत करती है जबकि सरकार ने 2012 तक इसे कम करके 28 तक लाने का लक्ष्य तय कर रखा है। दुनिया के समस्त अल्पपोषित बच्चों में से 42 फीसदी हमारे देश में हैं। इतना सब होने के बावजूद सरकार सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का महज 1.27 फीसदी पूरे देश के स्वास्थ्य पर खर्च करती है।

हालांकि हमारा देश कानून बनाने के मामले में पीछे नहीं है। हाल ही में बच्चों के घरों में काम करने पर प्रतिबंध लगाया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि कानून का नाम मात्र का ही असर होगा क्योंकि बाल श्रम विकट गरीबी का सह उत्पाद मात्र है। ये बच्चे अपने गरीब परिवारों के लिए भोजन जुटाते हैं या कहें कि खुद को किसी तरह भुखमरी से बचाए हुए हैं। उदाहरण के लिए शिवकाशी के 60 फीसदी घरों के बच्चे काम करते हैं और इन परिवारों की दो तिहाई आय बच्चों के जरिए ही आती है।

29.4.11

मप्र में 60 फीसदी से ज्यादा बच्चे कुपोषित: क्राई

नई दिल्ली/भोपाल. मध्य प्रदेश एक बार फिर गलत वजह से चर्चा में है। ताजा मामला राज्य में बच्चों के कुपोषण को लेकर है।

बच्चों के अधिकारों की वकालत करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) ने मध्य प्रदेश के दस जिलों में किए गए सर्वे के आधार पर दावा किया है कि यहां कुपोषित बच्चों की संख्या 60 फीसदी से ज्यादा है।

क्राई का कहना है कि पूरे राज्य में आदिवासी समुदाय के 74 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। चौंकाने वाला तथ्य तो यह है कि राजधानी भोपाल की पुनर्वास कॉलोनियों के 49 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार पाए गए हैं।

संस्था के प्रदेश में इस सर्वे को पूरा करने वाले विकास संवाद के प्रशांत दुबे का कहना है कि सिर्फ रीवा जिले में अकेले 83 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार पाए गए हैं।

रीवा में 2006 से 2009 के बीच करीब 15 हजार बच्चों की कुपोषण से मौत हो चुकी है जबकि अन्य जिलों में भी कुपोषित बच्चों का आंकड़ा सरकारी आंकड़े से बहुत अधिक है।

संस्था द्वारा राजधानी भोपाल की पुनर्वास कॉलोनियों में कराए गए शोध के आंकड़े और भी ज्यादा चौंकाने वाले मिले हैं। भोपाल के लगभग 11 रिसेटमेंट कॉलोनियों से इकट्ठा किए गए आंकड़ों से पता चला है कि यहां के 49 फीसदी बच्चे कुपोषण से ग्रसित हैं। जबकि इन्हीं इलाकों के 20 फीसदी बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार पाए गए हैं।

दिल्ली में क्राई की निदेशक योगिता वर्मा का कहना है कि भले राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान राज्य के सभी महिलाओं के मामा होने का दावा करें। लेकिन वे अभी भी राज्य के मासूम बच्चों को कुपोषण से निजात दिलाने में नाकाम साबित हुए हैं।

राज्य बच्चों के बेहतर देखभाल के लिए जरूरी आंगनबाड़ी का भी पूरी इंतजाम नहीं करा पाए हैं। अभी भी पूरे मध्य प्रदेश में लगभग 47 प्रतिशत आंगनबाड़ियों की कमी हैं।

क्राई की निदेशक ने आगे कहा कि राज्य सरकार को सबसे पहले यह कबूलने की जरूरत है कि यहां कुपोषित बच्चों की संख्या सरकारी आंकड़े से कहीं अधिक है, तभी इसे रोकने की सही शुरुआत हो सकेगी।

क्राई के एक अन्य सदस्य आरबी पाल का कहना है कि राज्य में रहने वाले आदिवासी समुदाय के लगभग 74 फीसदी बच्चे भी कुपोषण के शिकार पाए गए हैं।

आरबी का कहना है कि अगर राज्य में कुपोषण को हटाना है तो सरकार को तुरंत आंगनबाड़ी और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत चलने वाले योजनाओं को दुरुस्त करने की जरूरत है। इसके अलावा महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना को भी बेहतर ढंग से लागू करने की दरकार है।

27.4.11

संप्रेक्षण गृह में कई खामियां

आगरा : किशोर संप्रेक्षण गृह में बुधवार को पहुंची क्राई की टीम को खामियां मिलने के साथ ही कई चौंकाने वाली जानकारियां भी मिलीं।
क्राई (चाइल्ड राइट एंड यू) की सदस्य विनीका कारौली व मानवाधिकार कार्यकर्ता नरेश पारस अपराह्न लगभग दो बजे से शाम पांच बजे तक रहे। इस दौरान वहां रहने वाले किशोरों से बातचीत करके उनकी दिक्कतों के बारे में जानकारी की। टीम के सदस्य नरेश पारस ने बताया एक बच्चे ने अपनी उम्र आठ व दूसरे ने दस साल बताई। जबकि एक ने अपनी उम्र 20 साल बताई। गौरतलब है कि किशोर संप्रेक्षण गृह में 12 से 18 साल तक के बच्चों को रखा जाता है। नियमानुसार एक बच्चे को छह माह से अधिक वहां नहीं रखा जा सकता जबकि किशोर गृह में ऐसे भी बच्चे थे जो तीन साल से भी अधिक समय से वहां रह रहे थे। एक किशोर दहेज एक्ट का भी मिला। किशोर गृह की क्षमता 75 की है जबकि वहां 92 किशोर थे। जिसमें 10 से 14 साल तक के 17 बच्चे थे। जबकि 15 से 18 साल तक 77 किशोर थे। निरीक्षण के दौरान कर्मचारियों को व्यवहार के लिए खास हिदायत दी गयी। साथ किशोर गृह की पुरानी हो चुकी इमारत की जगह नई बिल्डिंग बनवाने की जरूरत भी बताई। इस दौरान जिला प्रोबेशन अधिकारी दिलीप कुमार, संप्रेक्षण गृह के सहायक अधीक्षक डा. सुभाषचंद मिश्रा आदि मौजूद थे।

14.4.11

अन्ना, अनशन, समय और तरीका

शिरीष खरे

भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए अन्ना हजारे ने सही समय पर सही तरीका अपनाया है. अन्ना के प्रभाव और उनके समर्थकों के प्रयासों से कहीं ज्यादा देश के भीतर विश्वसनीय नेतृव्य के अभाव में छटपटा रहे आम आदमी की बैचनी ने पूरे आंदोलन को सफल बनाया है. जंतर-मंतर पर हमने प्रलोभनों से खीचा गया मेला नहीं बल्कि तंत्र को दुरूस्त करने का ऐसा लोक था जिसके पीछे न किसी राजनीतिक दल का बल था और न किसी धर्म का जोर. और तो और जिस तबके पर वोट न डालने की तोहमत लगती है वह भी यही मौजूद था. बीते एक दशक से मध्यवर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले जानकार बता रहे थे कि भ्रष्टाचार अब ऐसा मामला बन चुका है जो जनता को आंदोलित नहीं करता है. लेकिन स्थिति अब उतनी भी निराशाजनक नहीं है जितनी कि कुछ दिनों पहले हुआ करती थी. आजादी के बाद यह पहला आंदोलन है जिसमें एक कानून के समर्थन में पूरा देश एकजुट हुआ. इस आंदोलन ने भ्रष्टाचार को इस देश का सबसे बड़ा मामला बना दिया है.

जहां छोटे से आंदोलन में तनाव की स्थितियां बिगड़ते देर नहीं लगतीं वहीं इस आंदोलन में जर्बदस्त अनुशासन देखने को मिला. जंतर-मंतर पर दि-ब-दिन जनता हजारों की संख्या में जमा होती जा रही थी लेकिन पुलिस के किसी तरह की कोई शिकायत नहीं पहुंची. इन पांच दिनों में न तो आसपास के इलाके की सार्वजनिक संपत्ति को कोई नुकसान पहुंचा और न ही चोरी या अभद्रता जैसा कोई समाचार सुनने को मिला. हर दिन जनसैलाब का जुनून जैसे अपने साथ अपना संयम भी ले आया था. दूसरी ओर अन्ना हजारे के 97 घंटों के अनशन में इंटरनेट के जरिये तकरीबन 45 लाख लोगों ने आंदोलन को लेकर अपनी भावनाएं जाहिर कीं. इस दौरान गूगल इंडिया पर सबसे ज्यादा सर्च किए जाने वाले अन्ना हजारे को फेसबुक पर करीब 11 लाख लोगों ने पसंद किया. सरकार पर इतना दवाब था कि शनिवार रात को करीब 2.30 बजे सरकारी प्रेस खुलवाकर गजट अधिसूचना को प्रकाशित करवाया गया.

पूर्व कानून मंत्री और प्रारुप के लिए गठित संयुक्त समिति के को-चेयरमेन शांतिभूषण का मानना है कि देश के प्रभावशाली लोग जब भ्रष्टाचार करते हैं तो उनके खिलाफ कोई गहन जांच पड़ताल नहीं होती है. इसका एक कारण जांच एंजेसियों का किसी न किसी के दवाब में काम करना है. इससे जहां शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार बढ़ता ही जा रहा है वहीं कोई नतीजा न मिलने से जनता निराश होती जा रही है. असल में हमारे यहां भ्रष्टाचार से निपटने की कोई मजबूत व्यवस्था नहीं है. जन लोकपाल कानून इस दिशा में जनता की निराशाओं को दूर करेगी. इसमें जहां दोषी साबित होने पर भ्रष्टाचार की कमाई को जब्त करने का प्रावधान रहेगा वहीं प्रशासनिक जवाबदारी को ध्यान में रखते हुए अगर कोई अधिकारी समय पर अपना काम पूरा नहीं करता है तो उस पर जुर्माना लगाया जाएगा. कोई भी पीडि़त नागरिक लोकपाल के पास अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है और शिकायत की जांच निश्चित समयसीमा में पूरी होगी.

एक तरफ सरकार कहती रही कि वह भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने चाहती है और दूसरी तरफ से उनके प्रवक्ताओं ने लोकत्रांतिक तरीके से चुने गए प्रतिनिधियों की स्वायत्तता का सवाल उछाला. असल में अन्ना और सरकार के बीच हुआ यह समझौता असामान्य परिस्थितियों की देन है जो सरकार की भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए केवल खोखले आश्वासनों से बनी़. इन्हीं खोखले आश्वासनों के चिढ़ी जनता अन्ना के समर्थन में सड़को पर आकर संसंद पर दवाब बना रही थी. जनता यह भली भांति जानने लगी थी कि कैसे न केवल एक के बाद एक घोटाले हो रहे हैं बल्कि उनके लिए जिम्मेदार लोगों को कैसे बचाने के प्रयास भी किए जा रहे हैं.

यह आंदोलन केवल सरकार के विरोध में नहीं बल्कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के विरोध रहा. इसलिए शरद यादव, ओम प्रकाश चैटाला, उमा भारती और मेनका गांधी जैसे राजनेताओं को उल्टे पैर लौटना पड़ा जो समर्थन जताने के लिए जंतर-तंतर पहुंचे थे. लोकपाल विधेयक को लेकर लंबे समय से संघर्ष कर रहीं सामाजिक कार्यकर्ता अरूणा राय कहती हैं कि इस विधेयक की मूल भावना से हमारी किसी तरह की असहमति नहीं है लेकिन हम चाहते हैं कि जो आखिरी मसौदा बने उसमें ज्यादा से ज्यादा जनता की भागीदारी सुनिश्चित हो. अरूणा राय का मानना है कि हजारे और करोड़ों भारतीयों की भावना को देखते हुए केंद्र सरकार को चाहिए कि वह तुरंत जन लोकपाल विधेयक को कानून में बदलने का भरोसा दिलाए.

3.4.11

मुफ्त शिक्षा का दावा खोखला साबित हुआ

शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के एक साल बाद भी बच्चों के लिए शिक्षा पूरी तरह मुफ्त नहीं है। 20 पर्सेंट स्कूल अब भी प्रवेश शुल्क ले रहे हैं। 42 पर्सेंट स्कूल पाठ्य सामग्री के लिए पैसे वसूल रहे हैं और 30 पर्सेंट स्कूल ऐसे हैं, जिनमें पूरे साल दाखिला नहीं दिया जाता। एक साल पहले शिक्षा का अधिकार कानून इस मकसद से लागू किया गया था कि सभी बच्चों को शिक्षा मिले। लेकिन अब भी स्कूल बच्चों को अलग-अलग वजहों से एडमिशन देने से मना करते हैं। स्कूलों में बच्चों की पिटाई में भी कोई कमी नहीं आई है। गरीबी और सरकारी उपेक्षा की वजह से बच्चों की एक बहुत बड़ी आबादी शिक्षा से वंचित है। रंगपुरी पहाड़ी बस्ती महिपालपुर में रहने वाली फरजादी चाहकर भी स्कूल नहीं जा पा रही है। फरजादी के पिता कूड़ा बीनते हैं और मां घरों में नौकरानी का काम करती है। वह बताती की पिटाई में भी कोई कमी नहीं आई है। गरीबी और सरकारी उपेक्षा की वजह से बच्चों की एक बहुत बड़ी आबादी शिक्षा से वंचित है। रंगपुरी पहाड़ी बस्ती महिपालपुर में रहने वाली फरजादी चाहकर भी स्कूल नहीं जा पा रही है। फरजादी के पिता कूड़ा बीनते हैं और मां घरों में नौकरानी का काम करती है। वह बताती कि जब मैं पहली क्लास में पढ़ती थी, तो अचानक गांव जाना पड़ा। तब स्कूल में बिना बताए मैं गांव चली गई। लौटकर आई, तो स्कूल ने कुछ कागज मांगे, जो मेरे पास नहीं थे और मेरा स्कूल छूट गया। मुझे स्कूल में दोबारा दाखिला नहीं मिला। मैं आज भी पढ़ना चाहती हूं। असलम और अकील भी शिक्षा से वंचित हैं। मधुबनी का रहने वाले असलम को उसके मामा बहला-फुसलाकर दिल्ली ले आए। यहां उसे काम पर लगा दिया, जहां उसे 12-14 घंटे काम करना पड़ता था। उसे इस बाल मजदूरी से तो आजादी मिली, लेकिन आज भी वह स्कूल जाने के लिए तरसता है। एक बच्ची ने बताया कि वह जेजे कॉलोनी के सीनियर सेकंडरी स्कूल में पढ़ती है। वहां न तो टॉयलेट का सही इंतजाम है और न ही पानी की व्यवस्था। उसने कहा कि स्कूल के भीतर बाहर के लड़के घुस आते हैं और छेड़छाड़ करते हैं। एक बच्चे ने बताया कि मुझे जब सभी स्कूलों ने एडमिशन देने से मना कर दिया, तो मैं एक एनजीओ के स्कूल में पढ़ने लगा।

आरटीई कानून लागू होने के एक साल बाद भी एक चौथाई बच्चे स्कूल से बाहर हैं, जबकि सरकार कहती है कि बच्चों को स्कूल लाने के विभिन्न प्रयास किए गए। मध्य प्रदेश, यूपी, बिहार, राजस्थान, झारखंड सहित नौ राज्यों में मुफ्त शिक्षा अधिकार लागू ही नहीं हो पाया है। सर्वे में पाया गया कि 24 पर्सेंट बच्चे स्कूल से बाहर हैं। 17 पर्सेंट बच्चों को पाठ्य सामग्री नहीं दी गई है। 50 पर्सेंट स्कूलों में स्कूल प्रबंधन समिति ही नहीं बनी है। 16 पर्सेंट स्कूलों में पीने के साफ पानी का इंतजाम नहीं है। 33 पर्सेंट स्कूलों में अलग से टॉयलेट की व्यवस्था नहीं है। यूपी और झारखंड में अब भी राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग नहीं बने हैं।

क्राई संस्था की सीईओ पूजा मारवाह ने कुछ समय पहले मुंबई में एक सेमीनार में बताया था कि सिर्फ दस राज्यों ने ही अपने यहां आरटीई कानून को अंतिम रूप दिया है। उन्होंने कहा कि मुफ्त और गुणवत्तायुक्त शिक्षा देने वाले स्कूलों के अभाव में बाल मजदूरी में भी इजाफा होता है।

2.2.11

किशोर उम्र को मिला मकसद

कुछ बड़ा काम करने के लिए, कुछ हटके करने के लिए एक उद्देश्य होना चाहिए। अगर मकसद सामने हो और फिर उसे पाने के लिए कुछ किया जाये, तो बहुत कुछ मिल जाता है। खुद को भी, दूसरों को भी, समाज को भी। उस राह पर और कदम भी चल पड़ते हैं। धीरे-धीरे एक कारवां बन जाता है। नयी राहों पर चलने वालों का मकसद कारवां बनाना कभी नहीं होता। वह तो खुद-ब-खुद बन जाता है। पर जब वे पीछे मुड़कर देखते हैं, अपने पीछे बढ़े आ रहे बहुत से कदमों को आते देखते हैं, तो उन्हें अपने मकसद और उसकी कामयाबी से भी बड़ा अहसास होता है।

शायद संजना सांघी को भी यह अहसास हो।

18 साल की संजना मुंबई की आम जोशीली, चुलबुली किशोरियों की तरह ही दिखती है। पर वह है एकदम अलग।

अलग इसलिए, कि वह इस उम्र की आम लड़कियों की तरह केवल अपने और अपने भविष्य के बारे में ही नहीं सोचती। उसका दिल दूसरों के लिए भी धड़कता है। वह दूसरों के लिए भी सोचती है। भले ही वे 'दूसरे' एकदम अनजान क्यों न हों। उसके लिए हर कोई एक इंसान है। और इंसानियत के इसी जज्बे से वह एक नयी राह पर चल पड़ी है।

संजना ने पिछले साल जून में एक वेबसाइट www.innocenttouch.in बनायी। और इस कदम ने उसकी जिंदगी को एक मकसद दे दिया।

संजना ब्रीच कैंडी के बी.डी. सोमानी स्कूल की छात्रा है। वह भी अपनी उम्र के दूसरे किशोरों की तरह पढ़ना, घूमना और फेसबुक पर मौजूद रहना पसंद करती है। पर उसे लगा कि किशोर ऊर्जा से सराबोर होते हैं, जोश से उफनते हैं। उनकी इस ऊर्जा और जोश का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। अपनी वेबसाइट के जरिये वह किशोरों को विभिन्न एनजीओ से जोड़ती है। एनजीओ से जुड़कर वे किशोर अपनी पढ़ाई, दोस्तों के साथ गपबाजी और सोशल नेटवर्किंग से समय निकालकर दूसरों के लिए कुछ करते हैं।

दरअसल, एक साल पहले संजना के मन में आया कि किसी एनजीओ से जुड़कर समाज के लिए कुछ काम किया जाए। पर उसे यह नहीं पता था कि शुरुआत कैसे करे, किससे संपर्क करे। बस, तभी उसे अपना मकसद मिल गया। किसी तरह उसे विक्टोरिया मेमोरियल स्कूल फॉर ब्लाइंड का पता चला। वह उससे जुड़ गयी। उसे अपना जीवन सार्थक लगने लगा। उसे खयाल आया कि उसकी तरह और भी बहुत से किशोर ऐसा कुछ करना चाहते होंगे, यह उन्हें भी पता नहीं होता होगा कि कैसे शुरुआत करें, किससे संपर्क करें। उसने ठान लिया कि वह ऐसे किशोरों को राह दिखायेगी। काफी माथापच्ची के बाद उसने पांच एनजीओ चुने। उसे लगा कि किशोर इनसे जुड़कर कुछ करना चाहेंगे। और शुरू हो गई वेबसाइट। चंद महीनों में ही यह वेबसाइट दक्षिण मुंबई के विद्यार्थियों में लोकप्रिय हो गई। इसके जरिये 200 से ज्यादा विद्यार्थी सक्रिय स्वयंसेवक बन चुके हैं।

17 साल के वेदांत मुंशी को संजना की वेबसाइट से ही ' आकांक्षा ' एनजीओ का पता चला। वह उससे जुड़ गया। 16 साल की प्रीति गंगवानी शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय ' प्रथम ' के लिए काम करने लगी। सेंट जेवियर्स कॉलेज के 15 विद्यार्थियों का समूह क्राई ( चाइल्ड रिलीफ एंड यू ) से जुड़ गया।

एनजीओ भी इससे खुश हैं। उन्हें कर्मठ और उत्साही स्वयंसेवक मिल रहे हैं। स्कूलों में सभ्यता और सामाजिक जागरूकता के लिए काम कर रहे एनजीओ संस्कार इंडिया फाउंडेशन के संस्थापक किरण मदन का कहना है , ' संजना की उम्र को देखते हुए यह वेबसाइट उसकी बड़ी पहल है। उसके इस प्रयास से हमें जुनूनी कार्यकर्ता मिल रहे हैं। यह कोशिश रंग लायेगी।'

यह वेबसाइट सरल और सूचनाप्रद है। एनजीओ से जुड़कर समाज के लिए कुछ करना चाहने वालों को केवल तीन स्टेप में ही मनचाही जानकारी मिल जाती है। वेबसाइट पर एक फेसबुक पेज भी है , जिस पर 200 से ज्यादा सदस्य हैं। एक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ एफलेरॉन ने संजना को दो सप्ताह की कांफ्रेंस में एम्सटर्डम में भी बुलाया। संजना को जरा भी नहीं लगता कि वह कोई बड़ा काम कर रही है। वह मासूमियत से कहती है , ' हम सभी किसी मकसद को लेकर पैदा होते हैं। मैं भी इसमें योगदान कर सकती हूं , पर दूसरों के सहयोग के बिना नहीं। मेरा सपना है कि हर कोई किसी ना किसी के जीवन को सुंदर बनाये।

आज हमें एक नहीं , बल्कि अनेक संजनाओं की जरूरत है। अनगिनत संजनाएं चाहिएं हमें। ऐसी संजनाएं , जो अपने तमाम कामकाज , अपनी तमाम व्यस्तता और भागमभाग जिंदगी के बीच कुछ पल दूसरों के लिए भी निकाल सकें। कुछ देर ठहरकर दूसरों के लिए सोच सकें। कुछ नया कर सकें। एक शृंखला बना सकें। ऐसी शृंखला , जिसकी पहली कड़ी वे खुद बनें और फिर दूसरी कडि़यां जुड़ती चली जायें ... वह शृंखला एक सुंदर हार में तब्दील हो जाये ... और वह हार समाज में मानवीय भावनाओं को जगा दे ... उमड़ - घुमड़ पड़ें वे भावनाएं ... और इंसानियत की भीनी - भीनी खुशबू वाली बरसात हो जाए।

भारत एक युवा देश है। अगले एक दशक में युवाओं की आबादी और बढ़ेगी। ये जोश और ऊर्जा से सराबोर युवा होंगे। अगर उनके इस जोश और ऊर्जा को जागृत करके घनीभूत कर दिया जाए , उन्हें कुछ मकसद दिखा दिया जाए , तो प्रगति की दौड़ की अकल्पनीय और अविश्वसनीय तेजी नजर आयेगी।

भले ही संजना को इसका अहसास नहीं है , पर इस सबमें आखिर उसका भी तो योगदान होगा ही!

31.12.10

2009 आत्महत्या करने वाले किसानों की कुल संख्या 17368

शिरीष खरे

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक 2009 में देश के 17368 किसानों ने आत्महत्या की है. यह बीते 6 सालों में सर्वाधिक है. 2008 में 16196 किसानों ने आत्महत्या की थी. कुल मिलाकर 1997 से अब तक 216500 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. इन आत्महत्याओं में 5 बड़े राज्यों या ‘आत्महत्या बेल्ट’ कहलाने वाले महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्यों में कुल 10765 किसानों यानी 62 प्रतिशत किसानों ने आत्महत्या की है. महाराष्ट्र लगातार 10 सालों से आत्महत्या करने वाले राज्यों में सबसे आगे रहा है. यहां इस वर्ष 2,872 किसानों ने आत्महत्या की है. 2282 किसानों द्वारा की गई आत्महत्या के चलते कर्नाटक दूसरे स्थान पर है.

महाराष्ट्र में 1997 से अब तक कुल 44276 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं, जो कि देशभर की कुल आत्महत्याओं का 20 प्रतिशत है. बाकी के पांच बड़े राज्यों में कर्नाटक में 2009 में आत्महत्याओं में सर्वाधिक वृद्धि हुई है. यहां बीते साल के मुकाबले 545 अधिक किसानों ने आत्महत्या की है. आंध्रप्रदेश में कुल 2414 किसानों ने आत्महत्या की है यह पिछले वर्ष से 309 अधिक है. वहीं मध्यप्रदेश में 1395 किसानों ने व छत्तीसगढ़ में 1802 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं जो कि बीते साल के मुकाबले क्रमशः 16 और 29 अधिक हैं.

भारत में किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं पर व्यापक अध्ययन करने वाले अर्थशास्त्री के नागराज का कहना है कि ''एक ओर तो किसानों की जनसंख्या में कमी आ रही है वहीं दूसरी ओर आत्महत्याओं का बढ़ना यह सुनिश्चित कर रहा है कि किसानों की समस्या अभी भी ज्वलंत है.'' 2003 से 2009 के मध्य करीब 102628 किसानों ने आत्महत्या की है यानी सालाना औसतन 17105 किसान. इस प्रकार इस अवधि में रोजाना करीब 47 किसानों ने या प्रति 30 मिनट में एक किसान द्वारा आत्महत्या की गई है.

22.12.10

बाल संप्रेक्षण गृह हैं या जेल

बीते दिनों क्राई और एमनेस्टी इंटरनेशनल के कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय बालक अधिकार संरक्षण आयोग को भेजी विस्तृत रिपोर्ट में आगरा और मथुरा जिलों के बाल संप्रेक्षण गृहों  को जेल बताते हुए कई अहम कमियों का खुलासा किया. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि स्टाफ को किशोर अधिनियम के बारे में ही पता नहीं है. बाल कल्याण समिति भंग है और कई बच्चों पर कई जघन्य अपराधों के आरोप में हैं. संप्रेक्षण गृहों में क्षमता से दो गुना अधिक तक बच्चे बंद हैं. 6 कमरों में 30 बच्चों को रखने की क्षमता होती है लेकिन यहां केवल 2 कमरों में ही 62 बच्चों को बंद किया हुआ हैं. बाकी के कमरे अन्य उपयोग के लिए काम में लिए जा रहे हैं. खेल का मैदान तो दूर पढ़ाई की कोई व्यवस्था भी नहीं है. रियाजुद्दीन वर्ष, पटवारी सिंह, कालू सिंह, अभिनिक सिंह और राबिन सिंह 12 साल से भी कम उम्र के बच्चे हैं. वही दूसरी तरफ मेघ सिंह और अकील पर 18 साल से अधिक की उम्र का आरोप  है. इनमें मेघ सिंह की एक साल की बच्ची भी है और कहा जा रहा है कि उसे 18 साल से कम दर्शाकर बंद किया गया है.

एक अन्य किशोर बीएसए कालेज में एलएलबी का छात्र है. उस पर अपहरण और बलात्कार का आरोप है. सवाल किया गया है कि क्या एलएलबी का छात्र और एक बच्ची का पिता 18 साल से कम उम्र के हो सकते हैं? साथ ही रिपोर्ट में कहा गया है कि कई बच्चे 3 माह से अधिक समय से बंद हैं जिनमें अकील 4 माह, अनीस 8 माह , विशाल 17 माह, संजीव 21 माह, पटवारी सिंह 1 साल और कृष्णा 2 साल से बंद हैं.

आयोग से अपील की गयी है कि आगरा व मथुरा के किशोर संप्रेक्षण ग्रहों में बंद किशोरों का मेडिकल परीक्षण कराया जाए. सुधार के लिए कड़े निर्देश जारी किए जाएं और उनका सख्ती से पालन हो. स्टाफ को किशोर न्याय अधिनियम से प्रशिक्षित किया जाए.

16.12.10

स्कूलों के असुरक्षित बच्चे

शिरीष खरे

यूं तो स्कूलों को बच्चों के वर्तमान और भविष्य गढ़ने का केन्द्र माना जाता है. लेकिन बीते कुछ सालों से स्कूलों के भीतर से बच्चों के शोषण और उत्पीड़न की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के मुताबिक बीते तीन सालों में स्कूलों के भीतर बच्चों के साथ होने वाले शारारिक प्रताड़ना, यौन शोषण, दुर्व्यवहार, हत्या जैसे मामलों में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है. मौजूदा परिस्थितियां भी कुछ ऐसी हैं कि बच्चों के लिए हिंसामुक्त और भयमुक्त माहौल में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का सवाल अब बहुत बड़ा सवाल बन चुका हैं.

बीते साल स्कूलों में बच्चों के उत्पीड़न के दर्ज हुए मामलों में अगर तमिलनाडू के 12 मामले अलग रखे जाए तो अधिकतर मामले हिंदी भाषी राज्यों से हैं. इसमें 27 मामलों के साथ जहां उत्तरप्रदेश अव्वल है, वहीं उसके बाद दिल्ली 9, मध्यप्रदेश 9, बिहार 4, राजस्थान 4 और हरियाणा 4 का स्थान आता है.

2007 में केन्द्रीय महिला व बाल विकास मंत्रालय द्वारा बच्चों की सुरक्षा की स्थिति को लेकर देश भर में किये गए सर्वेक्षण के मुताबिक हर दो बच्चों में से एक को स्कूल में यौन शोषण का शिकार बनाया जा रहा है. बीते साल राष्ट्रीय बाल अधिकार पैनल को स्कूलों में बच्चों के उत्पीड़न की तकरीबन 100 शिकायतें मिली. इसके बहुत बाद में केन्द्रीय महिला व बाल विकास मंत्री ने भी स्कूलों में बच्चों के बढ़ते उत्पीड़न के ग्राफ को स्वीकारते हुए चिंता जाहिर की.

अनुशासनात्मक कार्रवाई के नाम पर खास तौर से सरकारी स्कूलों में आज भी ‘गुरूजी मारे धम्म-धम्म विद्या आये छम्म-छम्म’ जैसी कहावतें प्रचलित हैं. गौर करने लायक तथ्य है कि अनुशासनात्मक कार्रवाई की आधी से अधिक घटनाएं केवल सरकारी स्कूलों में होती हैं. ऐसी घटनाओं को अंजाम देते समय इस बात को नजरअंदाज बना दिया जाता है कि किसी भी तरह के दुर्व्यवहार से बच्चे में झिझक, संकोच और घबराहट की भावना घर कर सकती है. बच्चों के भीतर की ऐसी भावनाओं को ड्राप आउट की दर अधिक होने के पीछे की एक बड़ी वजह के तौर पर देखा जाता है. लेकिन सामान्य तौर से हमारे आसपास बच्चों के साथ होने वाले दुराचारों को गंभीरता से नहीं लिए जाने की मानसिकता है. इस तरह से बच्चों पर होने वाले अत्याचारों पर चुप रहकर हम उसे जाने-अनजाने प्रोत्साहित कर रहे हैं. जबकि बच्चों को दिये जाने वाली तमाम शारारिक और मानसिक प्रताड़नाओं को तो उनके मूलभूत अधिकारों के हनन के रुप में देख जाने की जरूरत है, जिन्हें कायदे से किन्हीं भी परिस्थितियों में बर्दाश्त नहीं किए जाने चाहिए लेकिन क्या किया जाए आलम यह है कि सरकार ने स्कूलों में सुरक्षित बचपन से जुड़े कई तरह के सवालों के साथ-साथ उनसे जुड़ी मार्गदर्शिका को तैयार किये जाने की मांग को भी लगातार अनदेखा किया जाता रहा है.

वहीं बच्चों का भोलापन ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी समझी जाती है. एक तरफ बच्चे अपने डर, अवसाद और अकेलेपन को खुलकर कह नहीं पाते तो दूसरी तरफ बच्चों के परिवार वाले भी उनकी बातों को कोई खास अहमियत नहीं देते. बच्चों के भोलेपन के शिकारी ऐसी स्थिति का चुपचाप फायदा उठाते हुए अपनी कुंठाओं को पूरा करते हैं. अक्सर देखा गया है कि बच्चों के उत्पीड़न में वहीं लोग शामिल होते हैं जिनके ऊपर उनकी सुरक्षा की जवाबदारी होती है. ऐसे में बच्चों के परिवार वालों के लिए यह जरूरी है कि वह कुछ समय बच्चों के साथ बिताएं और उनसे खुलकर बातचीत करते रहें.

हालांकि स्कूलों में उत्पीड़न के मामले में पीड़ित बच्चों को किसी उम्र विशेष में नहीं बांधा जा सकता लेकिन दर्ज हुए अधिकतर मामलों से साफ हुआ है कि यौन उत्पीड़न से पीड़ित बच्चों में 8 से 12 साल तक आयु-समूह के बच्चों की संख्या सर्वाधिक रहती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक शारारिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक, दुर्व्यवहार, लैंगिक असामानता इत्यादि बाल उत्पीड़न के अंतर्गत आते हैं. फिर भी बच्चों के उत्पीड़न के कई प्रकार अस्पष्ट हैं और उन्हें परिभाषित करने की संभावनाएं अभी तक बनी हुई हैं. दूसरी तरफ राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो बच्चों के उत्पीड़न से जुड़े केवल वहीं मामले देखता है, जो पुलिस-स्टेशनों तक पहुंचते हैं. जबकि सर्वविदित है कि प्रकाश में आए मामलों के मुकाबले अंधेरों में रहने वाले मामलों की संख्या हमेशा से ही कई गुना तक अधिक रहती है.

हालांकि बच्चों के सुरक्षित बचपन के लिए सरकार ने जहां बजट में 0.03 प्रतिशत बढ़ोतरी की है वहीं इसके लिए देश में पर्याप्त कानून, नीतियां और योजनाएं हैं. लेकिन इन सबके बावजूद महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा किये गए सर्वेक्षण में 65 प्रतिशत बच्चे महज शारारिक प्रताड़नाएं भुगत रहे हैं. जाहिर है समस्या का निपटारा केवल बजट में बढ़ोतरी या सख्ती और सहूलियतों के प्रावधानों भर से मुमकिन नहीं हैं बल्कि इसके लिए मौजूदा शिक्षण पद्धतियों को नैतिकता और सामाजिकता के अनुकूल बनाये जाने की भी जरूरत है. इसी के साथ बच्चों के सीखने की प्रवृतियों में सुरक्षा के प्रति सचेत रहने की प्रवृति को भी शामिल किये जाने की जरूरत है.

14.12.10

भोपाल: यह कैसी प्रेतलीला ?

चिन्मय मिश्र 

साधो यह मुरदों का गांव
पीर मरै, पैगम्बर मर गए, मर गए जिंदा जोगी।
                                                            -कबीर

3 दिसम्बर 2010 को भोपाल गैस त्रासदी के 26 साल पूरे हो गए। इस दौरान बकौल ओबामा भारत एक विकासशील से विकसित देश बन गया। वह एक आर्थिक महाशक्ति और तीसरी दुनिया का तथाकथित प्रवक्ता भी बन गया। देश में विदेशी पूंजी निवेश में काफी बढ़ोत्तरी हुई और वह बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पसंदीदा भी बन गया।

मगर भोपाल में यूनियन कार्बाइड से रिसी गैस से पीड़ित समुदाय के लिए तो ढाई दशक का यह समय जैसे ठहरा ही हुआ है। भोपाल की ट्रायल कोर्ट से आए फैसले के बाद लगा था कि केंद्र और राज्य सरकारें चेतेंगी और कुछ सकारात्मक पहल करेंगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। केंद्र सरकार ने कुछ आधा-अधूरा सा उत्तरदायित्व निभाया और मंत्रियों के समूह ने खैरात बांटने के अंदाज में कुछ घोषणाएं कर दीं। लेकिन पीड़ितों का शारीरिक, मानसिक या कानूनी किसी भी तरह की कोई राहत नहीं मिली।

कबीर के शब्दों में कहें तो संभवतः नीति निर्धारक सोचते हैं,

राजा मर गए परजा मर गये, मर गये वैद्य औ रोगी।
चंदा मरिहैं सुरजो मरिहैं, मरिहैं धरती अकासा।

तो फिर शासन प्रशासन को कुछ भी करने की क्या आवश्यकता है ? वैसे इस त्रासदी के बाद हुई वारेन एंडरसन की गिरतारी के खिलाफ भारत के सर्वाधिक प्रतिष्ठित उद्योगपति ने एक ‘मर्मस्पर्शी’ लेख लिखा था। बाद में वे 100 करोड़ रुपए लगाकर ‘देशहित’ में यूनियन कार्बाइड का जहरीला कचरा हटवाने का असफल प्रयास भी कर चुके हैं और अब राडिया टेप कांड के उजागर होने के बाद इन ‘देशभक्त’ उद्योगपति की नाराजगी की वजहें भी सार्वजनिक होती जा रहीं हैं। कहने का अर्थ यह है कि भारत में हो रहे विदेशी पूंजी निवेश के पीछे भी संभवतः यही भावना कार्य कर रही है कि यदि किसी देश में विश्व की अब तक की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना के लिए 26 वर्ष पश्चात भी किसी को पूर्णतः उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सका है तो निवेश का उससे बेहतर स्थान और क्या हो सकता है ?

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के कार्यकाल के पांच वर्ष पूरे होने पर 29 नवम्बर को भोपाल में ‘कार्यकर्ता गौरव दिवस’ में हजारों-हजार लोग इकट्ठा हुए थे। इसमें हुई आमसभा के दौरान भोपाल गैस पीड़ितों को लेकर एक शब्द भी कहा गया हो, ऐसा सुनने में नहीं आया। 3 दिसम्बर को प्रतिवर्ष सभी धर्मों और राजनीतिक दलों द्वारा आयोजित प्रार्थना सभाएं महज रस्मी होकर रह गई हैं। आज कई राष्ट्र दूसरे महायुद्ध के बीत जाने के 60 वर्षों बाद भी अपने द्वारा किसी अन्य राष्ट्र के प्रति की गई अमानवीयता के लिए क्षमा मांगते नजर आते हैं। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपनी हालिया भारत यात्रा के दौरान इस संबंध में माफी मांगना तो दूर, इस दुर्घटना का उल्लेख करना तक जरुरी नहीं समझा।

भारतीय न्याय व्यवस्था भी एक गोल घेरे में रहकर लगातार दोहराव से ग्रसित हो गई है। ट्रायल कोर्ट से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक सब अपनी-अपनी भूमिका की समीक्षा की बात अवश्य करते नजर आते हैं लेकिन धरातल पर कुछ भी नजर नहीं आ रहा है। गैस पीड़ितों के साथ संघर्ष कर रहे संगठन और व्यक्ति लगातार सरकार की विरोधाभासी प्रवृत्तियों को उजागर कर रहे हैं।

प्रशासन तंत्र भी मामले और निपटारे को लगातार लंबित करता जा रहा है। गैस पीड़ितों के लिए बना अस्पताल श्रेष्ठी वर्ग के सुपर स्पेशयलिटी अस्पताल में बदल गया। गैस पीड़ितों के स्वास्थ्य पर बड़े प्रभावों के आकलन व उपचार के लिए गठित शोध समूह को कार्य करने से रोक दिया गया। आज तक इस बात को सार्वजनिक नहीं किया गया कि अंततः भोपाल कितने प्रकार के जहर का शिकार हुआ था।

इस नव उदारीकरण के युग में विकास का पैमाना महज आर्थिक ही रह गया है। लाखों करोड़ रुपए के भ्रष्टाचार की रकम भी जीडीपी में मिल जाएगी और आंकड़े बताने लगेंगे कि हम सब कितनी तेजी से गरीबी रेखा के पार आते जा रहे हैं। परंतु इसके पीछे अलिखित यह है कि गरीबी रेखा वास्तव में ऐसी लक्ष्मण रेखा है इसे जो भी पार करने का प्रयास करेगा वह भस्म हो जाएगा। गांवों से शहरों की ओर पलायन इसी का प्रतीकात्मक स्वरूप ही तो है। भोपाल के गैस पीड़ित अपनी आधी-अधूरी सांस के साथ पिछले ढाई दशक से संघर्ष कर रहे हैं। ये संघर्ष अब एक प्रतीक में बदल चुका है। ऐसा नहीं है कि भोपालवासी यह नहीं जानते कि,

तैतीस कोटी देवता मर गए, पड़ी काल की फांसी।

वे जानते हैं कि उनका संघर्ष संभवतः उन्हें स्वयं को न्याय नहीं दिलवा सके। लेकिन इसके परिणामस्व्रूप भारत व तीसरी दुनिया के अनेक देशों में जहर फैलाने वाले उद्योगों की स्थापना पर लगाम अवश्य लगी है।

आज यूनियन कार्बाइड या डाउ केमिकल्स को भारत में नया कारखाना लगाने में असफलता का सामना करना पड़ा है क्योंकि उनका पुराना ‘नाम’ और ‘काम’ आड़े आ रहा है। पुणे के निवासियों ने अपने शहर के पास डाउ केमिकल्स को कारखाना नहीं लगाने दिया। दरअसल भारतीय राजनीतिक तंत्र हमारी जनता की धैर्य की लगातार परीक्षा ले रहा है। स्थितियां बेकाबू होने पर वह विशेष सहायता पैकेज की घोषणा करता है। पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र में विदर्भ और मध्यप्रदेश में नर्मदा घाटी में ऐसे पैकेज भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुके हैं। इस क्रम में अब देश के नक्सल प्रभावित जिलों के लिए करोड़ो रुपए के विशेष सहायता पैकेज की घोषणा की गई है। इसका हश्र भी वहीं होना है।

भोपाल गैस पीड़ितों को भी लगातार भुलावे में रखकर रोज नई-नई घोषणाएं करना अर्थहीन है। भोपाल गैस त्रासदी को लेकर बरती जा रही लापरवाही अनजाने में नहीं हो रही है। यह एक घृणित प्रवृत्ति है जो कि उद्योगपतियों को यह दर्शा रही है कि उन्हें इस देश में कुछ भी करने की छूट है। इसी के समानांतर आम व्यक्ति को भी समझना होगा कि इस मामले में उसकी अरुचि स्वयं उसके लिए भी खतरनाक है। वैसे कबीर ने यह भी लिखा है,

मानुष तन पायौ बड़े भाग अब विचारी के खेलो फाग!

13.12.10

इंटरनेट रखता है बच्चों को शारीरिक गतिविधियों से दूर

नोएडा। इंटरनेट और कंप्यूटर गेम बच्चों को भोंदू बना रहे हैं. इससे बच्चे शारीरिक गतिविधियों से दूर हो रहे हैं और बीमारी की गिरफ्त में भी आ रहे हैं. अभिभावकों को चाहिए कि बच्चों की इंटरनेट से दूरी बनाएं और खेलों के प्रति उनमें रुझान बढ़ाएं.

शनिवार को सेक्टर-21 ए स्थित स्टेडियम में स्वयंसेवी संस्था क्राई के तत्वावधान में आयोजित 11वां ‘कॉरपोरेट सिटिजनशिप चैलैंज’ के उद्घाटन अवसर पर यह बात पूर्व टेस्ट क्रिकेटर चेतन चौहान ने कही. उद्घाटन के मौके पर नोएडा अथॉरिटी के चेयरमैन मोहिंदर सिंह और डीसीईओ एनपी सिंह भी उपस्थित थे. इन्होंने गुब्बारे उड़ाकर प्रतियोगिता का उद्घाटन किया.

दो दिवसीय कॉरपोरेट सिटिजनशिप चैलैंज खेल प्रतियोगिता के पहले दिन शनिवार को गोल्फ, टेबल टेनिस, बॉस्केट बॉल, मिनी मैराथन, बैड मिंटन, क्रिकेट समेत 16 कॉरपोरेट टीमों के बीच एक दर्जन खेल टूर्नामेंट हुए. रविवार अंतिम दिन खेलों के सेमीफाइनल और फाइनल टूर्नामेंट होंगे. क्राई की निदेशक योगिता वर्मा ने कहा कि "टूर्नामेंट से मिलने वाली आर्थिक मदद का इस्तेमाल उत्तर प्रदेश के गरीब बच्चों को पढ़ाने, कपड़े उपलब्ध कराने और उनकी मदद के लिए किया जाएगा." 

21.11.10

दूरियां कब बनेंगी नजदीकियां



चेन्नई। शिक्षा के अधिकार व अनिवार्य शिक्षा जैसे नारों के पीछे की असलियत यही है कि आज भी कई बच्चे शिक्षा के मौलिक हक से वंचित हैं. विद्यालय और घर के बीच की दूरी इनकी शिक्षा के आड़े आ रही है.

बाल दिवस के मौके पर प्रेस क्लब में कृष्णगिरि जिले के तेनकनीकोट्टै आरक्षित वन्य क्षेत्र के निकट के गुलाटी गांव से आए बी. नागराज (12) और पी. मुनिराज (11) काफी उत्साहित दिखे इसकी वजह उनके परिवार के वे पहले दो बाशिंदे थे जिन्हें उनके घर से आगे कहीं सफर करने का अवसर नसीब हुआ था. उनका कहना था कि उनके दादा-दादी व मां-बाप ने कभी स्कूल नहीं देखा. उनकी गांव में स्कूल न होने के बाद भी पांच साल पहले वे पड़ोसी गांव की स्कूल में नौ वर्ष की आयु में पहली कक्षा में भर्ती हुए. स्कूल में शिक्षा का माध्यम तेलुगू था और अध्यापकों की डयूटी 11 से 2 तक रहती.

क्राई ने इस अवसर को चुनते हुए रविवार को राज्य के पांच अलग-अलग इलाकों से आए बच्चों को मीडिया से मुखातिब कराया जो शिक्षार्जन को लालायित थे. ये बच्चे बेबाक अंदाज में अपनी समस्याओं पर बोले. क्राई ने इस आयोजन के जरिए बताया कि राज्य के कई हिस्सों में स्कूलों की दूरी रिहायशी इलाकों से 10 किमी है जबकि आरटीई के तहत हर 1 किमी पर स्कूल होनी चाहिए.

वे जो भी पढ़ाते भाषाई समस्या के चलते उनकी समझ के परे था. इसी वजह से उनके घर वालों ने पढ़ाई छोड़कर काम में हाथ बंटाने को कहा और वही चीज वे आज कर रहे हैं. इसी तरह रामनाथपुरम के तोवकाडु गांव के एन. नागविजय व मंडवैकुप्पम के एम. पांडियन को स्कूल तक पहुंचने के लिए रोजाना क्रमश: 6 व 8 किमी का फासला तय करना पड़ता था. नागविजय ने इसी वजह से पिछले साल पढ़ाई छोड़ दी थी लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता ने उसे पुन: स्कूल जाने के लिए प्रोत्साहित किया.

छात्रों ने बड़े ही करूणाई अंदाज में कहा कि गर्मी और बारिश के दिनों में छह किमी का सफर पीठ पर बस्ता लेकर तय करना काफी मुश्किल होता है. अपने अभिभावकों के चलते वह स्कूल जा रहा है और उसका लक्ष्य अच्छा पढ़कर जीवन में सफल होना है. इसी तरह दिण्डीगुल जिले के कोडैकेनाल के काड़मनरवु गांव की वी. पी. चित्रा (15) जो छठी में पढ़ती है रोजाना 35 किमी का सफर तय करती है.

क्राई के उप महाप्रबंधक (विकास-समर्थन) पी. कृष्णमूर्ति का कहना है कि वे इस बात से वाकिफ है सरकार देश में शिक्षा व्यवस्था में आमूल परिवर्तन लाने के प्रयास में हैं लेकिन इस कोशिश विच्छिन्नता है. हम चाहते हैं कि राज्य में बदलाव लाने के लिए सरकार आदेश जारी करे. आरटीई के तहत अनिवार्य की गई स्कूल प्रबंधन समितियां इन समस्याओं के समाधान में सहायक हो सकती है.

11.11.10

आरटीई के बावजूद शिक्षा हासिल करना एक चुनौती

शिरीष खरे

‘‘हमारे समूह ने अपने गांव में एचआईवी के साथ जीने वाले एक बच्चे के साथ बरते जाने वाले भेदभाव के खिलाफ कदम उठाया.’’ उत्तर-प्रदेश की एक बाल पंचायत से किशन कुमार कहते हैं कि ‘‘हमने उसके साथ खेला, उसके साथ खाया और वह हमारा दोस्त बन गया. इससे हमसे उम्र में बहुत बड़े लोग शर्मिदा हुए और उन्हें एचआईवी के बारे में फैली अज्ञानता का एहसास हुआ.’’ इसक बाद बाल पंचायत ने उनके दोस्त पर से हर तरह की पाबंदी हटाने के लिए प्रस्ताव पारित किया.

उत्तरप्रदेश की एक बाल-पंचायत से चंदा कहती हैं कि ‘‘जब में चौदह की हुई तो मेरी मां ने मेंरी शादी करने चाही. मगर तब तक मैं यह जान चुकी थी कि कम उम्र में शादी करने वाली लड़कियों को बहुत नुकसान उठाना पड़ता है. आखिर मैं अपनी मां को शादी रोक देने की बात पर समझाने में कामयाब रही.’’ चंदा लड़कियों के विकास की सभी संभावनाओं और उनके शिक्षण के लिए जागरूकता फैलाने का काम कर रही हैं. इसके साथ-साथ वह बाल-विवाह, शीघ्र मातृव्य, नन्हें बच्चों और गर्भवती मांओं के पेट में पलने वाले कुपोषण के दुष्चक्र को तोड़ने का प्रयास भी कर रही हैं.

वही दूसरी तरफ स्थानीय बच्चों के समूह की अध्यक्षा तेरह साल की बानो खान कहती हैं कि ‘‘मेरे जैसे बहुत सारे बच्चे हैं जो गरीब परिवारों से होने की वजह से काम पर जाते हैं, क्योंकि उनके घर के आसपास कोई अच्छे स्कूल नहीं होते हैं.’’ मेरे घर से सबसे पास का स्कूल 2.5 किलोमीटर दूर है, और मेरे घरवाले हर महीने 200 रूप्ए बस किराया नहीं दे सकते हैं.’’ बानो खान का परिवार बदली इंडस्ट्रीय एरिया में सड़क किनारे एक चाय की दुकान चलाता है. बच्चों के लिए मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 में तीन किलोमीटर के भीतर एक उच्च प्राथमिक स्कूल खोले जाने का प्रावधान है.

बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था क्राई द्वारा राजधानी दिल्ली में आयोजित एक सम्मेलन में राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश राज्यों से आए छह बच्चों ने मुफ़्त शिक्षा के अधिकार का समर्थन करते हुए शिक्षा के उपयोग पर अपने विचार और तजुर्बे बांटे. उन्होंने बताया कि उन्हें रोज-रोज स्कूल जाते समय किस-किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. सामूहिक तौर से काम करते हुए इन बच्चों और उनके दोस्तों ने अपनी-अपनी जगहों के स्कूलों में ड्राप-आउट, भेदभाव और अपने समुदायों के बीच से बाल-विवाह जैसी समस्याओं को रोका है.

मध्यप्रदेश के 12 वर्षीय छात्र सुनील चंदेलकर ने बताया कि उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती उसके स्कूल की दूरी है. चंदेलकर ने कहा, "शिक्षा का अधिकार कानून छह से 14 वर्ष आयु वर्ग का मतलब आठवीं कक्षा तक के बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा की बात कहता है लेकिन गांवों के स्कूलों में केवल पांचवी कक्षा तक ही स्कूल हैं. इसके बाद हमें आगे की शिक्षा के लिए तीन किलोमीटर दूर दूसरे गांव के उच्च प्राथमिक स्कूल में जाना पड़ता है."

उन्होंने बताया कि निजी स्कूल बसें उन्हें ले जाने से इंकार कर देती हैं क्योंकि उनके पास उनका भारी शुल्क देने के लिए पैसा नहीं होता. चंदेलकर ने कहा, "हमने इस संबंध में राज्य के शिक्षा मंत्री को लिखा. फिर हमने निजी बस मालिकों के साथ एक बैठक की और अब मामला सुलझ गया है."

क्राई की जनरल मेनेजर अनीता बाला शरद कहती है कि ‘‘घरों के आसपास सरकारी स्कूलों को गुणवत्तापूर्ण तरीके से सक्रिय बनाकर भारत की शिक्षा समस्या का स्थायी समाधान किया जा सकता है. क्राई ने बच्चों के समूहों के साथ काम करते हुए यह दर्शाया है कि बच्चे खुद अपने अधिकारों को कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं.’’ क्राई की जनरल मेनेजर शुभेन्दु भट्टाचार्य बताते हैं कि ‘‘यह सच है कि सभी बच्चों की आवाजें अनुसनी ही रही हैं, चाहे बात आर्थिक पृष्ठभूमि की हो, चाहे गांवों या शहरों में रहने की हो, चाहे व्यस्को द्वारा उनके लिए जवाबदेही की मांग से जुड़े हों और मुफ्त-गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार को संवैधानिक रुप से सुरक्षा देने की हो. हमें बच्चों को परिवर्तन निर्माताओं के तौर पर सामूहिक शक्तियां देनी होंगी. उनके विचारों और जरूरतों को शिक्षा के अधिकार कानून में शामिल किये जाने की जरूरत है.’’

प्रख्यात वकील और कानूनी कार्यकर्ता अशोक अग्रवाल कहते हैं कि ‘‘अगर हम हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना चाहते हैं तो रोजाना की हकीकतों और अड़चनों का सामना करने वाले बच्चों को शिक्षा देने के लिए भारत सरकार को चाहिए कि वह उन्हें अपने क्रियान्वयन नीति का एक हिस्सा बनाए. अधिनियम को एक समान रुप से निजी स्कूलों में भी लागू करने की आवश्यकता है. मुफ्त शिक्षा पाना हर बच्चे का अधिकार है, यह अधिकार देने से निजी स्कूल बच नहीं सकते हैं. यह अधिनियम निजीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा देने की एक शानदार संरचना जान पड़ती है, जो भारत सरकार के कोठारी आयोग द्वारा प्रस्तुत एक समान शिक्षण व्यवस्था के पूरी तरह से विरूद्ध है.

वर्ष 2009 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 17,782 ऐसे आवासीय क्षेत्र हैं जहां स्कूल होना चाहिए लेकिन वहां एक किलोमीटर के क्षेत्र में एक भी प्राथमिक स्कूल नहीं है। उत्तर प्रदेश में ऐसी जगहों की संख्या सबसे ज्यादा 7,568 है. क्राई के मुताबिक देश में छह से 14 आयु वर्ग के 80 लाख से ज्यादा बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं.

जाहिर है शिक्षा का अधिकार कानून के बावजूद कई भारतीय बच्चों के लिए शिक्षा हासिल करना एक रोजमर्रा का संघर्ष बन चुका है क्योंकि उन्हें स्कूलों के उनकी पहुंच में न होने या शिक्षकों के उपलब्ध न होने जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है.

9.11.10

बच्चों का जितना पलायन उतना उत्पीड़न

शिरीष खरे

इन दिनों बच्चों का पलायन तेजी से बढ़ रहा है और उसी अनुपात में उनके साथ उत्पीड़न की घटनाएं और आकड़े भी. खास तौर से मजदूरी के लिए बच्चों को एक राज्य से दूसरे राज्य में आदान-प्रदान किए जाने का सिलसिला जोर पकड़ता जा रहा है. विभिन्न शोध-सर्वेक्षणों और रपटों से यह जाहिर भी हो रहा है कि मुख्य तौर पर बिहार, पूर्वी उत्तर-प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश से महाराष्ट्र और गुजरात सहित पूरे देश भर में मजदूरी के लिए बच्चों की पूर्ति की जा रही है. इन बच्चों में ज्यादातर की उम्र 10 से 16 के बीच है. इनमें भी ज्यादातर लड़के ही हैं. कई सर्वेक्षणों और तजुर्बे यह भी बता रहे हैं कि मजदूरी में लगे ज्यादातर बच्चे स्कूल जरूर गए हैं, मगर वह नियमित नहीं हो सके हैं. बच्चों के बारम्बार पलायन होने के पीछे की मुख्य वजहों में बच्चों ने अपने घर की गरीबी, मारपीट, डर और दबाव को जिम्मेदार ठहराया है तो कभी मुंबई और सूरत जैसे बड़े शहरों की तड़क-भड़क को देखने की दबी चाहत को भी बाहर निकला है. इस दिशा में जो सर्वेक्षणों के आधार पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर कई कदम उठाए जाने की बात कही जाती रही है, मगर अभी तक इन मामलों के न रुकने से यथार्थ की गंभीरता को भलीभांति समझा जा सकता है.

दूसरी तरफ बालगृहों से लगातार बच्चों के भागने की घटनाएं बयान करती हैं कि मुंबई सहित देश भर के सरकारी बालगृहों में बच्चों की सही देखभाल की असलियत क्या है. बीते समय मुंबई के एक बालगृह से कुछ बच्चों के भागने और उनमें से एक के हादसे में मारे जाने घटना उजागर हुई थी. आम तौर पर देखा गया है कि ज्यादातर बालगृहों द्वारा भागने वाले बच्चों के बारे में पता लगाने जरुरत भी महसूस नहीं की जाती हैं. ऐसे बच्चों को ढूंढने की भी तमाम कोशिशें तो दूर महज एक रिपोर्ट तक नहीं लिखवाई जाती है. तजुर्बों से यह जाहिर हुआ है कि हफ्तों-हफ्तों बच्चों के गायब रहने के बावजूद बालगृहों की तरफ से चुप्पी साध ली जाती है. जबकि नियमानुसार इस तरह की घटनाओं की जानकारी फौरन थाने में और उच्च अधिकारियों को देना जरूरी है. यहां तक कि महिला और बाल कल्याण विभाग को भी इस तरह की ज्यादातर घटनाओं की प्राथमिक सूचना किसी अखबार या गैर-सरकारी संस्था के जरिए ही मिलती है. भागने वाले कुछ बच्चों के बारे में जब हमने खैर-खबर जाननी चाही तो पता लगा कि सामान्यत: बालगृहों की तरफ से इन बच्चों की गुमशुदगी के बारे में न तो पुलिस को ही सूचना दी जाती है और न ही विभाग को इस बारे में बताया जाता है. कई बार तो बच्चों के साथ होने वाली दुर्घटनाएं और अपराधिक मामले प्रकाश में आने के बाद ही बच्चों के भागने की रिपोर्ट दर्ज की जाती है. बच्चों के इस तरह से गायब होने की तुरंत रिपोर्ट न लिखवाना महज एक लापरवाही ही नहीं बड़ा अपराध भी है. मुंबई के सरकारी बालगृहों से बीते 6 सालों में तकरीबन तीन सौ से ज्यादा बच्चे भागे हैं, मगर इतना होने के बावजूद लापरवाही का आलम ज्यों का त्यों है. समाज कल्याण विभाग से मिली गैर-औपचारिक जानकारियों के मुताबिक बालगृहों में कर्मचारियों की कमी है. एक कर्मचारी पर सैकड़ों बच्चों को संभालने की जवाबदारी होती है. काम के दबाव में कई बार कर्मचारियों द्वारा जब बच्चों के साथ बुरा बर्ताव किया जाता है तो बच्चे भाग जाते हैं. उन्हें ठीक-ठाक खाना तक नहीं मिलता है. इस तरह से सरकार द्वारा ऐसे बच्चों के देखभाल उचित के लिए संचालित बालगृह बुरे बर्ताव और उत्पीड़न का केंद्र बन जाते हैं.

हर साल मुंबई जैसे महानगर पहुंचने वाले हजारों बच्चे काम की तलाश में या काम की जगहों से भीख मंगवाने वाले नेटवर्क के हत्थे भी चढ़ जाते हैं. खास तौर से रेल्वे स्टेशनों के प्लेटफार्म और चौराहों पर ऐसे नेटवर्क से जुड़े दलालों की सरगर्मियों को समझा जा सकता है. यही बहुत सारे बच्चे बहुत ही गंदे माहौल में महज खाने-पीने के लिए जद्दोजहद करते रहते हैं. इसके अलावा बहुत से बच्चे नशे के आदी हो जाते हैं तो बहुत से जुर्म की दुनिया में भी दाखिल हो जाते हैं.

भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है, जो हर लिहाज से बाल- शोषण और उत्पीड़न को रोकने में मददगार हो. दूसरी तरफ कुछ जानकारों की राय में समस्या को दूर करने के लिए उसकी जड़ में पहुंचकर कानून के समानांतर गरीबी, विस्थापन, पलायन और विघटन से निपटने के प्रयास किए जाने की जरुरत है. साथ की जो प्रावधान लागू हैं उन्हें क्रियान्वित करने वाली एजेंसियों के सक्रिय और धनराशि के सही इस्तेमाल करने की जरुरत है और इसी के साथ बच्चों के यौन-उत्पीड़न सहित सभी तरह के उत्पीड़नों को ठीक से परिभाषित किए जाने की भी जरुरत है. दूसरी तरफ राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो में बच्चों के उत्पीड़न से जुड़े केवल ऐसे मामले शामिल रहते हैं, जिनकी रिपोर्ट पुलिस में दर्ज मिलती है. मगर असलियत जगजाहिर है कि ज्यादातर मामले तो पुलिस तक पहुंचते ही नहीं हैं. हालांकि सरकार की तरफ से 'बाल अपराध निरोधक बिल' संसद में लाने की बात की जाती रही है. बच्चों की सुरक्षा पर कुल बजट में से 0.03% की बढ़ोत्तरी और महिला व बाल विकास मंत्रालय द्वारा एकीकृत बाल सुरक्षा योजना शुरू करने जैसी घोषणाएं की भी की जाती रही हैं. इन सबके बावजूद इस तरह की नीतियां बनाने और इन नीतियों पर विमर्श का दौर तो खूब चलता है. नहीं चलता है तो उन्हें गर्म जोशी से लागू किए जाने की कोशिशों का दौर.

8.11.10

प्राइवेट स्कूलों का कारोबार 5000 करोड़ रुपये के पार

सुशील मिश्र

प्राथमिक शिक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद मुंबई और उपनगरीय इलाकों में बच्चे बीएमसी स्कूलों से मुंह मोड़कर निजी स्कूलों की तरफ जा रहे हैं.

बीएमसी स्कूल में जहां मुफ्त में शिक्षा दी जाती है वहीं निजी स्कूलों में औसतन साल भर में एक बच्चे पर तकरीबन 25-30 हजार रुपये खर्च आता हैं. लाख कोशिशों के बावजूद निजी स्कूलों में डोनेशन प्रथा खत्म होने के बजाए और मजबूत होती जा रही है.

बच्चे को स्कूल में प्रवेश दिलाने के लिए औसतन 25 हजार रुपये बतौर डोनेशन देने पड़ते हैं. समाज सेवा के नाम पर चलाए जा रहे निजी स्कूलों का कारोबार हर साल करीबन 20 फीसदी की दर से बढ़ रहा है. आज शिक्षा कारोबार सालाना लगभग 5000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा का हो चुका है जिसकी सही-सही जानकारी किसी के पास नहीं है.

सरकार साल दर साल बीएमसी स्कूलों में बच्चों को अच्छी शिक्षा और सुविधा देने के लिए बजट बढ़ाती जा रही है, लेकिन बच्चों की संख्या हर साल कम होती जा रही है. बीएमसी ने स्कूल शिक्षा को मजबूत बनाने के लिए 2007-08 में 1,051 करोड़ रुपये और 2008-09 में 1,350 करोड़ रुपये का प्रवाधान किया था, जबकि इस साल (2009-10) बीएमसी शिक्षा पर 1,651 करोड़ रुपये खर्च करेगी.

बीएमसी के अलावा केन्द्र और राज्य सरकार भी स्कूली शिक्षा में भारी भरकम रकम खर्च करती है. बीएमसी स्कूलों में शिक्षा पूरी तरह से मुफ्त दी जाती है. बच्चों की फीस, कॉपी-किताबें, स्कूल यूनिफॉर्म के साथ मिड-डे मिल के तहत खिचड़ी और दोपहर में दूध भी बच्चों को मुफ्त में मिलता है. इसके बावजूद हर साल तकरीबन 30 हजार बच्चे बीएमसी स्कूलों से तौबा कर रहे हैं.

इन स्कूलों में बच्चों का आंकड़ा वर्ष 1999 में 7.5 लाख था, जबकि बीते शिक्षण सत्र में बीएमसी के कुल 1,144 स्कूल में 4.50 लाख ही बच्चों ने दाखिला लिया. इस सप्ताह से शुरू हो रहे नए शिक्षण सत्र में यह संख्या और कम होने की आशंका जताई जा रही है.

बृहन्मुंबई महानगरपालिका शिक्षक सभा के महासचिव एवं ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ टीचर्स ऑर्गनाइजेशन के निदेशक रमेश जोशी का का कहना है, 'बीएमसी स्कूलों में साल दर साल बच्चों की कम होती संख्या की मुख्य वजह लोगों की बदलती सोच है.'

उनके मुताबिक आज लोग सोचते हैं कि सिर्फ अंग्रेजी माध्यम में उनका बच्चा जाएगा तो ही उसका भविष्य संवर सकेगा. बीएमसी स्कूल तो गरीबों का स्कूल है, वहां बच्चा जाएगा तो समाज के लोग क्या कहेंगे? जबकि हमारे सरकारी स्कूलों में जो शिक्षक है वह निजी स्कूल के शिक्षकों के मुकाबले अधिक शिक्षित और प्रशिक्षित हैं.

मुंबई और आसपास के इलाकों में करीबन 2,000 निजी स्कूल हैं. जिनमें करीब-करीब 20 लाख बच्चे पढ़ते हैं और यह आंकड़ा सालाना करीबन 15 फीसदी की रफ्तार से बढ़ता जा रहा है. स्कूली शिक्षा आज सबसे सफल कारोबार बन गया है। निजी स्कूलों में फीस और दूसरे खर्च तय नहीं है.

सभी निजी स्कूलों की दरें अलग-अलग हैं. प्रवेश के समय इमारत या स्कूल के विकास के नाम पर लिये जाने वाली डोनेशन फीस इन स्कूल की आय का एकमुश्त सबसे बड़ा साधन है. तीन-चार साल के बच्चे के एडमिशन के लिए स्कूल प्रबंधन की ओर से मुंबई में 5 हजार रुपये से एक लाख रुपये तक बतौर डोनेशन फीस वसूली जाती है, जिसकी कोई लिखित जानकारी नहीं दी जाती है.

इसके अलावा प्रवेश शुल्क, साल में होने वाली दो परीक्षाओं के अलावा हर महीने टेस्ट फीस, टर्म फीस (पिकनिक और कल्चरल्स प्रोग्राम) को मिलाकर सालभर में एक छात्र से औसतन सालभर में 30 हजार रुपये तक ले लिये जाते हैं. ड्रेस और किताबें स्कूल की बताई हुई दुकानों से ही लेनी पड़ती हैं जो अपेक्षाकृत 20 फीसदी तक महंगी ही होती हैं.

मंहगी होती शिक्षा के बावजूद निजी स्कूलों की तरफ बढ़ते रुझान पर राहुल ग्रुप ऐंड स्कूल कॉलेज के चेयरमैन लल्लन तिवारी कहते हैं, 'लोग अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना चाहते हैं इसीलिए वह अच्छे स्कूल में बच्चे को भेजना चाहते हैं, जिसके लिए पैसा मायने नहीं रखता है.'

महंगे से महंगे स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे को भी कोचिंग का सहारा लेना पड़ रहा है. इस पर महेश टयूटोरियल कोचिंग के प्रबंध निदेशक महेश शेट्टी कहते हैं कि स्कूल में क्या पढ़ाया जाता है, हमे इससे कोई मतलब नहीं है। हमारा लक्ष्य होता है कि बच्चे परीक्षा में अधिक से अधिक नंबर ला पाए.

इसके लिए कोचिंग में नई तकनीक और रिसर्च के आधार पर बच्चों को शिक्षा दी जाती है. यही वजह है कि हर साल बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है, जबकि मंदी के बावजूद कोचिंग फीस में करीबन 15-20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.

लगातार हो रहे शिक्षा के निजीकरण को लेकर बच्चों की शिक्षा पर काम करने वाले स्वयंसेवी संस्था क्राई की निदेशक योगिता वर्मा का कहना है, 'संविधान में शिक्षा को मूलभूत आवश्यकता बताया गया है. इसलिए सबको शिक्षा देना सरकार का कर्तव्य बनता है. शिक्षा के निजीकरण को बंद करना चाहिए. अमेरिका और इंगलैड में सरकारी शिक्षा ही सही मानी जाती है.'

क्राई का मानना है कि सबको मुफ्त और एक जैसी शिक्षा दी जानी चाहिए. वैसे भी सरकारी स्कूलों के अध्यापक निजी स्कूल के अध्यापकों के मुकाबले ज्यादा योग्य होते हैं.