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14.4.11

अन्ना, अनशन, समय और तरीका

शिरीष खरे

भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए अन्ना हजारे ने सही समय पर सही तरीका अपनाया है. अन्ना के प्रभाव और उनके समर्थकों के प्रयासों से कहीं ज्यादा देश के भीतर विश्वसनीय नेतृव्य के अभाव में छटपटा रहे आम आदमी की बैचनी ने पूरे आंदोलन को सफल बनाया है. जंतर-मंतर पर हमने प्रलोभनों से खीचा गया मेला नहीं बल्कि तंत्र को दुरूस्त करने का ऐसा लोक था जिसके पीछे न किसी राजनीतिक दल का बल था और न किसी धर्म का जोर. और तो और जिस तबके पर वोट न डालने की तोहमत लगती है वह भी यही मौजूद था. बीते एक दशक से मध्यवर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले जानकार बता रहे थे कि भ्रष्टाचार अब ऐसा मामला बन चुका है जो जनता को आंदोलित नहीं करता है. लेकिन स्थिति अब उतनी भी निराशाजनक नहीं है जितनी कि कुछ दिनों पहले हुआ करती थी. आजादी के बाद यह पहला आंदोलन है जिसमें एक कानून के समर्थन में पूरा देश एकजुट हुआ. इस आंदोलन ने भ्रष्टाचार को इस देश का सबसे बड़ा मामला बना दिया है.

जहां छोटे से आंदोलन में तनाव की स्थितियां बिगड़ते देर नहीं लगतीं वहीं इस आंदोलन में जर्बदस्त अनुशासन देखने को मिला. जंतर-मंतर पर दि-ब-दिन जनता हजारों की संख्या में जमा होती जा रही थी लेकिन पुलिस के किसी तरह की कोई शिकायत नहीं पहुंची. इन पांच दिनों में न तो आसपास के इलाके की सार्वजनिक संपत्ति को कोई नुकसान पहुंचा और न ही चोरी या अभद्रता जैसा कोई समाचार सुनने को मिला. हर दिन जनसैलाब का जुनून जैसे अपने साथ अपना संयम भी ले आया था. दूसरी ओर अन्ना हजारे के 97 घंटों के अनशन में इंटरनेट के जरिये तकरीबन 45 लाख लोगों ने आंदोलन को लेकर अपनी भावनाएं जाहिर कीं. इस दौरान गूगल इंडिया पर सबसे ज्यादा सर्च किए जाने वाले अन्ना हजारे को फेसबुक पर करीब 11 लाख लोगों ने पसंद किया. सरकार पर इतना दवाब था कि शनिवार रात को करीब 2.30 बजे सरकारी प्रेस खुलवाकर गजट अधिसूचना को प्रकाशित करवाया गया.

पूर्व कानून मंत्री और प्रारुप के लिए गठित संयुक्त समिति के को-चेयरमेन शांतिभूषण का मानना है कि देश के प्रभावशाली लोग जब भ्रष्टाचार करते हैं तो उनके खिलाफ कोई गहन जांच पड़ताल नहीं होती है. इसका एक कारण जांच एंजेसियों का किसी न किसी के दवाब में काम करना है. इससे जहां शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार बढ़ता ही जा रहा है वहीं कोई नतीजा न मिलने से जनता निराश होती जा रही है. असल में हमारे यहां भ्रष्टाचार से निपटने की कोई मजबूत व्यवस्था नहीं है. जन लोकपाल कानून इस दिशा में जनता की निराशाओं को दूर करेगी. इसमें जहां दोषी साबित होने पर भ्रष्टाचार की कमाई को जब्त करने का प्रावधान रहेगा वहीं प्रशासनिक जवाबदारी को ध्यान में रखते हुए अगर कोई अधिकारी समय पर अपना काम पूरा नहीं करता है तो उस पर जुर्माना लगाया जाएगा. कोई भी पीडि़त नागरिक लोकपाल के पास अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है और शिकायत की जांच निश्चित समयसीमा में पूरी होगी.

एक तरफ सरकार कहती रही कि वह भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने चाहती है और दूसरी तरफ से उनके प्रवक्ताओं ने लोकत्रांतिक तरीके से चुने गए प्रतिनिधियों की स्वायत्तता का सवाल उछाला. असल में अन्ना और सरकार के बीच हुआ यह समझौता असामान्य परिस्थितियों की देन है जो सरकार की भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए केवल खोखले आश्वासनों से बनी़. इन्हीं खोखले आश्वासनों के चिढ़ी जनता अन्ना के समर्थन में सड़को पर आकर संसंद पर दवाब बना रही थी. जनता यह भली भांति जानने लगी थी कि कैसे न केवल एक के बाद एक घोटाले हो रहे हैं बल्कि उनके लिए जिम्मेदार लोगों को कैसे बचाने के प्रयास भी किए जा रहे हैं.

यह आंदोलन केवल सरकार के विरोध में नहीं बल्कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के विरोध रहा. इसलिए शरद यादव, ओम प्रकाश चैटाला, उमा भारती और मेनका गांधी जैसे राजनेताओं को उल्टे पैर लौटना पड़ा जो समर्थन जताने के लिए जंतर-तंतर पहुंचे थे. लोकपाल विधेयक को लेकर लंबे समय से संघर्ष कर रहीं सामाजिक कार्यकर्ता अरूणा राय कहती हैं कि इस विधेयक की मूल भावना से हमारी किसी तरह की असहमति नहीं है लेकिन हम चाहते हैं कि जो आखिरी मसौदा बने उसमें ज्यादा से ज्यादा जनता की भागीदारी सुनिश्चित हो. अरूणा राय का मानना है कि हजारे और करोड़ों भारतीयों की भावना को देखते हुए केंद्र सरकार को चाहिए कि वह तुरंत जन लोकपाल विधेयक को कानून में बदलने का भरोसा दिलाए.

2.2.11

किशोर उम्र को मिला मकसद

कुछ बड़ा काम करने के लिए, कुछ हटके करने के लिए एक उद्देश्य होना चाहिए। अगर मकसद सामने हो और फिर उसे पाने के लिए कुछ किया जाये, तो बहुत कुछ मिल जाता है। खुद को भी, दूसरों को भी, समाज को भी। उस राह पर और कदम भी चल पड़ते हैं। धीरे-धीरे एक कारवां बन जाता है। नयी राहों पर चलने वालों का मकसद कारवां बनाना कभी नहीं होता। वह तो खुद-ब-खुद बन जाता है। पर जब वे पीछे मुड़कर देखते हैं, अपने पीछे बढ़े आ रहे बहुत से कदमों को आते देखते हैं, तो उन्हें अपने मकसद और उसकी कामयाबी से भी बड़ा अहसास होता है।

शायद संजना सांघी को भी यह अहसास हो।

18 साल की संजना मुंबई की आम जोशीली, चुलबुली किशोरियों की तरह ही दिखती है। पर वह है एकदम अलग।

अलग इसलिए, कि वह इस उम्र की आम लड़कियों की तरह केवल अपने और अपने भविष्य के बारे में ही नहीं सोचती। उसका दिल दूसरों के लिए भी धड़कता है। वह दूसरों के लिए भी सोचती है। भले ही वे 'दूसरे' एकदम अनजान क्यों न हों। उसके लिए हर कोई एक इंसान है। और इंसानियत के इसी जज्बे से वह एक नयी राह पर चल पड़ी है।

संजना ने पिछले साल जून में एक वेबसाइट www.innocenttouch.in बनायी। और इस कदम ने उसकी जिंदगी को एक मकसद दे दिया।

संजना ब्रीच कैंडी के बी.डी. सोमानी स्कूल की छात्रा है। वह भी अपनी उम्र के दूसरे किशोरों की तरह पढ़ना, घूमना और फेसबुक पर मौजूद रहना पसंद करती है। पर उसे लगा कि किशोर ऊर्जा से सराबोर होते हैं, जोश से उफनते हैं। उनकी इस ऊर्जा और जोश का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। अपनी वेबसाइट के जरिये वह किशोरों को विभिन्न एनजीओ से जोड़ती है। एनजीओ से जुड़कर वे किशोर अपनी पढ़ाई, दोस्तों के साथ गपबाजी और सोशल नेटवर्किंग से समय निकालकर दूसरों के लिए कुछ करते हैं।

दरअसल, एक साल पहले संजना के मन में आया कि किसी एनजीओ से जुड़कर समाज के लिए कुछ काम किया जाए। पर उसे यह नहीं पता था कि शुरुआत कैसे करे, किससे संपर्क करे। बस, तभी उसे अपना मकसद मिल गया। किसी तरह उसे विक्टोरिया मेमोरियल स्कूल फॉर ब्लाइंड का पता चला। वह उससे जुड़ गयी। उसे अपना जीवन सार्थक लगने लगा। उसे खयाल आया कि उसकी तरह और भी बहुत से किशोर ऐसा कुछ करना चाहते होंगे, यह उन्हें भी पता नहीं होता होगा कि कैसे शुरुआत करें, किससे संपर्क करें। उसने ठान लिया कि वह ऐसे किशोरों को राह दिखायेगी। काफी माथापच्ची के बाद उसने पांच एनजीओ चुने। उसे लगा कि किशोर इनसे जुड़कर कुछ करना चाहेंगे। और शुरू हो गई वेबसाइट। चंद महीनों में ही यह वेबसाइट दक्षिण मुंबई के विद्यार्थियों में लोकप्रिय हो गई। इसके जरिये 200 से ज्यादा विद्यार्थी सक्रिय स्वयंसेवक बन चुके हैं।

17 साल के वेदांत मुंशी को संजना की वेबसाइट से ही ' आकांक्षा ' एनजीओ का पता चला। वह उससे जुड़ गया। 16 साल की प्रीति गंगवानी शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय ' प्रथम ' के लिए काम करने लगी। सेंट जेवियर्स कॉलेज के 15 विद्यार्थियों का समूह क्राई ( चाइल्ड रिलीफ एंड यू ) से जुड़ गया।

एनजीओ भी इससे खुश हैं। उन्हें कर्मठ और उत्साही स्वयंसेवक मिल रहे हैं। स्कूलों में सभ्यता और सामाजिक जागरूकता के लिए काम कर रहे एनजीओ संस्कार इंडिया फाउंडेशन के संस्थापक किरण मदन का कहना है , ' संजना की उम्र को देखते हुए यह वेबसाइट उसकी बड़ी पहल है। उसके इस प्रयास से हमें जुनूनी कार्यकर्ता मिल रहे हैं। यह कोशिश रंग लायेगी।'

यह वेबसाइट सरल और सूचनाप्रद है। एनजीओ से जुड़कर समाज के लिए कुछ करना चाहने वालों को केवल तीन स्टेप में ही मनचाही जानकारी मिल जाती है। वेबसाइट पर एक फेसबुक पेज भी है , जिस पर 200 से ज्यादा सदस्य हैं। एक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ एफलेरॉन ने संजना को दो सप्ताह की कांफ्रेंस में एम्सटर्डम में भी बुलाया। संजना को जरा भी नहीं लगता कि वह कोई बड़ा काम कर रही है। वह मासूमियत से कहती है , ' हम सभी किसी मकसद को लेकर पैदा होते हैं। मैं भी इसमें योगदान कर सकती हूं , पर दूसरों के सहयोग के बिना नहीं। मेरा सपना है कि हर कोई किसी ना किसी के जीवन को सुंदर बनाये।

आज हमें एक नहीं , बल्कि अनेक संजनाओं की जरूरत है। अनगिनत संजनाएं चाहिएं हमें। ऐसी संजनाएं , जो अपने तमाम कामकाज , अपनी तमाम व्यस्तता और भागमभाग जिंदगी के बीच कुछ पल दूसरों के लिए भी निकाल सकें। कुछ देर ठहरकर दूसरों के लिए सोच सकें। कुछ नया कर सकें। एक शृंखला बना सकें। ऐसी शृंखला , जिसकी पहली कड़ी वे खुद बनें और फिर दूसरी कडि़यां जुड़ती चली जायें ... वह शृंखला एक सुंदर हार में तब्दील हो जाये ... और वह हार समाज में मानवीय भावनाओं को जगा दे ... उमड़ - घुमड़ पड़ें वे भावनाएं ... और इंसानियत की भीनी - भीनी खुशबू वाली बरसात हो जाए।

भारत एक युवा देश है। अगले एक दशक में युवाओं की आबादी और बढ़ेगी। ये जोश और ऊर्जा से सराबोर युवा होंगे। अगर उनके इस जोश और ऊर्जा को जागृत करके घनीभूत कर दिया जाए , उन्हें कुछ मकसद दिखा दिया जाए , तो प्रगति की दौड़ की अकल्पनीय और अविश्वसनीय तेजी नजर आयेगी।

भले ही संजना को इसका अहसास नहीं है , पर इस सबमें आखिर उसका भी तो योगदान होगा ही!

2.9.10

अब परदेश नहीं जाना

अपने ही देश में कुछ कर गुजरने के जज्बे ने लोहरदगा की मनोरमा एक्का को दोबारा उनकी जमीन से जोड़ दिया है. झारखण्ड की यह लड़की अपने गांवों की लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अमेरिका में अच्छी खासी नौकरी छोड़ कर स्वदेश लौट आई है. जो इनदिनों बाल मजदूरों और ग्रामीण महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने के लिए व्यवस्था से लड़ाई लड़ रही है.



इसे मनोरमा की मेहनत का ही नतीजा कहेंगे कि बदला नवाटोली की फूलमनी और शोभा ही नहीं दर्जनों ऐसी महिलाएं हैं जो आज आत्मनिर्भर बनी हैं और दूसरे को आत्मनिर्भर बनाने में भी जुटी हैं. ये वही महिलाएं हैं जो दो जून की रोटी के लिए दूसरे राज्यों में जाती थीं और ढ़ेर सारी परेशानियां सिर पर झेलती थीं. अब यही महिलाएं गांव में स्वयं सहायता समूह से जुड़ स्वावलंबी बनी हुई हैं. मनोरमा ने 12 गांवों में जागरूकता अभियान चलाकर लगभग डेढ़ सौ बच्चों को स्कूल से जोड़ने का काम किया है. यह बच्चे कभी बाल मजदूर थे.

मनोरमा रांची से पीजी डिप्लोमा इन रूरल डेवलपमेंट की शिक्षा ग्रहण कर अमेरिका चली गई. अमेरिका में उन्होंने जनवरी 2001 तक पढ़ाई के साथ-साथ प्री स्कूल में नौकरी भी की. 2001 के अंतिम महीने में वह अमेरिका से भारत लौट आई. इसके बाद यह फिर से 2005 में सोशल व‌र्क्स की शिक्षा के लिए अमेरिका चली गई. मगर अमेरिका की चमक-दमक भी उसे ज्यादा  देर नहीं रोक सकी और 2007 में वह वापस भारत आकर उरांव आदिवासी महिला के नेतृत्व पर शोध करने लगी. इसी दौरान जब मनोरमा ने महिलाओं और बच्चों की स्थितियों को करीब से देखा तो यही रहकर महिलाओं और बच्चों को अधिकार दिलाने का निर्णय लिया.

जब मनोरमा ने लोहरदगा में महिला और बाल अधिकार को लेकर व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई शुरू की तो पहली बार उसका हकीकत से वास्ता पड़ा. बहुत से राजनैतिक और सामाजिक पेचेदियां सामने आईं मगर वह उन्हें अपने अभ्यास का एक हिस्सा मानती रहीं. यहां तक कि जब यह बाल अधिकार से जुड़े मामलों को लेकर गांव में जाती थी तो गाँव वाले इसे कोई साजिश के तौर पर देखते-समझते थे. इस तरह अपने पहले पड़ाव में मनोरमा को आदिवासी समुदाय का ही पूरा समर्थन नहीं मिल पाया था. मगर अब धीरे-धीरे स्थितियां बहुत हद तक बदल चुकी हैं. बदल रही हैं.

बाल अधिकार पर कार्य करने वाली संस्था क्राई के सहयोग ने मनोरमा के हौसले को बुलंद किया है. मनोरमा ने होप संस्था की स्थापना कर महिला व अधिकार को अपना उद्देश्य बनाया है.

मनोरमा कहती है कि उसने अपनी जिंदगी को समाज में फैली गैर बराबरी मिटाने के नाम कर दी है. वह अपनी भूमिका को बच्चों और महिलाओं तक उनके अधिकार बताने और बेहतर समाज बनाने के रूप में देख रही है.

19.4.10

अपने से यूं भी खड़े हो सकते हैं विकलांग साथी

शिरीष खरे

भूख से मौत और रोजीरोटी के लिए पलायन। ऐसा तब होता है जब लोगों के पास कोई काम नहीं होता। यकीनन गरीबी का यह सबसे भयानक रुप है। इससे निपटने के लिए भारत सरकार के पास ‘‘हर हाथ को काम और काम का पूरा दाम’’ देने वाली ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना’ है। यह योजना लोगों को उनके गांवों में ही काम देने की गांरटी भी देती है। योजना में श्रम पर आधारित कई तरह के कामों का ब्यौरा दिया गया है। इन्हीं में से बहुत सारे कामों से विकलांग साथियों को जोड़ा जा सकता है और उन्हें विकास के रास्ते पर साथ लाया जा सकता है। कैसे, नरेगा का यह तजुर्बा सामने है :

एक आदमी गरीब है, आदिवासी समुदाय से है, और विकलांग है तो उसका हाल आप समझ सकते हैं। उसे उसके हाल से उभारने के लिए आजीविका का कोई मुनासिब जरिया होना जरूरी है। इसलिए दिल्ली में जब गरीबी दूर करने के लिए नरेगा (अब मनरेगा) की बात उठी थी तो मध्यप्रदेश के आदिवासी जिले बड़वानी के ‘आशा ग्राम ट्रस्ट’ ने विकलांग साथियों का ध्यान रखा था और उन्हे रोजगार की गांरटी योजना से जोड़ने की पहल की थी। जहां तय हुआ था कि नरेगा में विकलांग साथियों को उनकी क्षमता और कार्यकुशलता के हिसाब से किस तरह के कामों में और किस तरीके से शामिल जा सकता है।

इसके लिए ब्लाक-स्तर पर एक चरणबद्ध योजना बनायी गई थी। योजना में विकलांग साथियों को न केवल भागीदार बनाया गया था बल्कि उन्हें निर्णायक मंडल में भी रखा गया। उन्होंने एक कार्यशाला के जरिए सबसे पहले वो सूची तैयार की जो बताती थी कि विकलांग साथी कौन-कौन से कामों को कर सकते हैं और कैसे-कैसे। इस सूची में कुल 25 प्रकार के कामों और उनके तरीकों को सुझाया गया था। बाद में सभी 25 प्रकार के कामों को वगीकृत किया गया और सूची को 'वगीकृत कार्यों वाली सूची' कहा गया। अब इस सूची की कई फोटोकापियों को ग्राम-स्तर पर संगठित विकलांग साथी समूहों तक पहुंचाया गया। इसके बाद विकलांग साथियों के लिए ‘जाब-कार्ड बनाओ आवेदन करो’ अभियान छेड़ा गया। दूसरी तरफ, इस अभियान में जन-प्रतिनिधियों की सहभागिता बढ़ाने के लिए ‘गांव-गांव की बैठक’ का सिलसिला भी चलाया गया। इसी दौरान विकलांग साथियों ने अपने जैसे कई और साथियों की पहचान करने के लिए एक सर्वे कार्यक्रम भी चलाया था। इससे जहां बड़ी तादाद में विकलांग साथियों की संख्या ज्ञात हो सकी, वहीं उन्हें जाब-कार्ड बनाने और आवेदन भरने के लिए प्रोत्साहित भी किया जा सका। नतीजन, अकेले बड़वानी ब्लाक के 30 गांवों में 100 से ज्यादा विकलांग साथियों को नरेगा से जोड़ा जा सका। तब यहां के विकलांग कार्यकर्ताओं ने कार्य-स्थलों पर घूम घूमके नरेगा की गतिविधियों का मूल्यांकन भी किया था। आज इन्हीं कार्यकर्ताओं द्वारा जिलेभर के हजारों विकलांग साथियों को नरेगा से जोड़ने का काम प्रगति पर है।

रोजगार के लिए विकलांग कार्यकर्ताओं के सामने बाधाएं तो आज भी आती हैं। मगर ऐसी तमाम बाधाओं से पार पाने के लिए इनके पास जो रणनीति है, उसके खास बिन्दु इस तरह से हैं: (1) रोजगार गारंटी योजना के जरिए ज्यादा से ज्यादा विकलांग साथियों को काम दिलाना। (2) पंचायत स्तर पर सरपंच और सचिवों को संवेदनशील बनाना। (3) जन जागरण कार्यक्रमों को बढावा देना। (4) निगरानी तंत्र को त्रि-स्तरीय याने जिला, ब्लाक और पंचायत स्तर पर मजबूत बनाना। (5) लोक-शिकायत की प्रक्रिया को पारदर्शी और त्वरित कार्यवाही के लिए प्रोत्साहित करना। यह तर्जुबा बताता है कि जब एक छोटे से इलाके के विकलांग साथी नरेगा के रास्ते अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं, तो प्रदेश या देश भर के विकलांग साथी भी यही क्रम दोहरा सकते हैं।

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संपर्क : shirish2410@gmail.com

10.2.10

पत्थरों की खदानों से लौटा बचपन

कभी बाल मजदूरी करने वाला महेन्द्र अब बच्चों के अधिकारों से जुड़ी कई लड़ाईयों का नायक है। महेन्द्र के कामों से जाहिर होता है कि छोटी सी उम्र में मिला एक छोटा सा मौका भी किसी बच्चे की जिंदगी को किस हद तक बदल सकता है।

महेन्द्र रजक, इलाहाबाद जिले के गीन्ज गांव से है- जहां की भंयकर गरीबी अक्सर ऐसे बच्चों को पत्थरों की खदानों की तरफ धकेलती है। महेन्द्र रजक भी अपनी उम्र से कुछ ज्यादा ही बड़ा हो चुका था। इतना बड़ा कि 6 साल की दहलीज पार करके उसने खदानों में जाने का मतलब का जाना था। इतना बड़ा कि 6 दूनी 12, 12 दूनी 24, 24 दूनी 48 जानने की बजाय उसने हमउम्र बच्चों के साथ पत्थर तोड़ने का पहाड़ा जाना था।

‘‘....तब कुछ बच्चों को स्कूल जाते देखते तो लगता कि वो हमारे जैसे नहीं हैं, वो हमसे कहीं अच्छे हैं।’’- अपने बचपने को इस तरह याद करने वाला महेन्द्र अब 16 की उम्र छूने को है। वह बताता है ‘‘मेरे लिए पत्थर तोड़ना तो बहुत मेहनत का काम था। सुबह 7 से शाम के 5 तक, तोड़ते रहो, खाने के लिए घंटेभर की छुट्टी भी नहीं मिलती थी। ठेकेदार आराम नहीं करने देता था, बार-बार पैसे काटने की धमकी अलग देता था।’’ इस तरह महेन्द्र को घर, मैदान और स्कूल से दूर, 9 घंटे के काम के बदले 70 रूपए/रोज मिलते थे।

संचेतना, जो कि क्राई के सहयोग से चलने वाली एक गैर-सरकारी संस्था है, ने जब महेन्द्र के गांव में अनौपचारिक शिक्षण केन्द्र खोला तो जैसे-तैसे करके महेन्द्र के पिता उसे पढ़ाने-लिखाने को राजी हुए। वैसे तो यहां एक प्राइवेट नर्सरी स्कूल भी था, जो बहुत मंहगा होने के चलते महेन्द्र जैसे ज्यादातर पिताओं की पहुंच से बहुत दूर था।

क्राई के पंकज मेहता बीते दिनों को कुछ ताजा करते हैं ‘‘हमारे सामने पत्थर तोड़ने वाले बहुत सारे बच्चे थे, उनके बचपन को बचाने के लिए हमने बस्तियों के पास सरकारी स्कूल खोले जाने का अभियान चलाया। इसके लिए राज्य की शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई बड़े अधिकारियों से मिले-जुले, उनके साथ बैठे-उठे, उनके सामने बार-बार अपनी जरूरतें दोहराते रहे। आखिरकार, 2002 को गीन्ज गांव में भी एक प्राथमिक स्कूल खोला जा सका।’’

संचेतना के सामाजिक कार्यकर्ताओं बताते हैं कि स्कूल भवन तो खड़ा कर दिया था, मगर इसी से तो सबकुछ सुलझने वाला नहीं था। असली चुनौती ऐसे बच्चों को स्कूल तक लाने और उनमें शिक्षा की समझ जगाने की थी। यह बहुत दिक्कत वाली बात थी, क्योंकि यहां बच्चों को कमाने वाले सदस्य के तौर पर देखने का चलन जो था। गरीब मां-बाप की जुबान पर यही सवाल होता था कि चलिए आप कहते हैं तो हम अपने बच्चों को आज काम पर नहीं भेजते हैं, अब आप बताइए कल से गृहस्थी की गाड़ी कैसे चलेगी ? इस बुनियादी सवाल से जूझना आसान न था। इसलिए सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनी पूरी ताकत महेन्द्र जैसे बच्चों के परिवार वालों के बीच आपसी समझ बनाने में लगाई थी। उन्होंने स्कूल के रास्ते पर बच्चों को रोकने वाले कारणों को भी समझा और यह भी समझाया कि बच्चों के भविष्य के लिए इतना तो खर्च किया ही जा सकता है!! क्योंकि महेन्द्र का बड़ा भाई भी काम पर जाता था, इसलिए उसके पिता अपने इस छोटे बेटे को काम की बजाय स्कूल भेजने के लिए तैयार हो गए।’’ इस तरह 9 साल की उम्र से महेन्द्र के स्कूल वाले दिन शुरू हुए।

‘‘अब मैं बाल पंचायत का नेता हूं, पंचायत के बच्चों ने मुझे चुनकर यहां तक भेजा है’’- महेन्द्र के लहजे के ये जवाबदारी भरे अंदाज हैं : ‘‘गांव में ऐसा क्या चल रहा है, जो हमें आगे बढ़ने से रोक रहा है, ऐसी बातों पर बतियाते हैं। अगर किसी बात को लेकर, कुछ हो सकता है तो बाल पंचायत उसमें क्या कर सकती हैं, कैसे कर सकती है, ऐसी चर्चाएं चलती हैं, कभी-कभी किसी बात पर हम सारे बच्चे गांव वालों के साथ हो जाते हैं, जरूरत पड़े तो जिले के अधिकारियों से भी मिल आते हैं।’’ बाल पंचायत का कोई औपचारिक ढ़ांचा नहीं है, यह तो अपनी आपसी सहूलियतों को देखते हुए कहीं भी, किसी भी समय लग सकती है। गांव के सारे बच्चे इसके सदस्य हैं, जो अपने अधिकारों से जुड़े अभियानों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

11 दिसम्बर, 2009 को, नई दिल्ली में सबको शिक्षा समान शिक्षा अभियान के मौके पर, जब महेन्द्र ने देशभर से जुटे एक हजार से भी ज्यादा सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच अपने अनुभवों को साझा किया तो सभी ने इस छोटे से नायक के बड़े कामों को जाना और उसकी चौतरफा सरहना की।

गीन्ज गांव में बच्चे-बच्चे को बाल पंचायत बनने का किस्सा मालूम है। हुआ यह कि- तब बहुत सारे बच्चों ने गांव में खेल के मैदान का मुद्दा उठाया था। इसके लिए उन्होंने बाल दिवस पर इलाहाबाद जाने का मन बनाया। यह बच्चे उस रोज इलाहाबाद की मुख्य सड़कों पर पहुंचे और जमकर खेले। ‘‘यह देख वहां के बहुत सारे लोग आ गए, गुस्से से बोले कि यहां के रास्ते क्यों रोक रहे हो ?’’- तब महेन्द्र ने कहा था - ‘‘यह तो पण्डित नेहरू का शहर है, आज तो बाल दिवस है, आज तो हमें यहां खेलने दो।’’ लगे हाथ उसने यह भी कह दिया कि ‘‘हमारे गांव में तो खेल का मैदान भी नहीं है। यहां तो देखो कितनी चौड़ी-चौड़ी सड़के हैं।’’ उस रोज बच्चों ने विरोध की ऐसी गेंदबाजी की थी कि प्रशासन से जुड़े अधिकारियों को क्लीन बोल्ड होना पड़ा था। मैच का नतीजा यह निकला था कि इलाहाबाद जिले से ही गीन्ज गांव के लिए खेल के मैदान का रास्ता साफ हो गया। खेल-खेल से शुरू हुए बच्चों के ऐसे अभियान समय के साथ गंभीर होते चले गए। फिर बच्चों को यह भी लगा कि अगर गांव के बड़े-बूढ़े की पंचायत हो सकती है तो बच्चों की भी अपनी पंचायत हो सकती है। कुछ इस तरह से बाल पंचायत का वजूद खड़ा हुआ। जो गीन्ज जैसे एक साधारण गांव में, गांव भर के सहयोग के चलते अब बहुत खास बन चुकी है।

महेन्द्र और उसके नन्हें दोस्तों के हिस्से में अब ऐसे दर्जनों किस्से हैं, जो बताते हैं कि बड़े कारनामों को अंजाम तक पहुंचाने के लिए, उतनी बड़ी उम्र भी हो तो ऐसा जरूरी नहीं है। जैसे कि पहले गीन्ज गांव में पांचवीं तक ही स्कूल था। लिहाजा महेन्द्र जैसे बच्चों के लिए आगे पढ़ने का मतलब था कि पहले तो एक साईकिल की जुगाड़ करो, उसके बाद उससे रोजाना 6 किलोमीटर दूर के स्कूल आओ-जाओ। तब बाल पंचायत ने जिले के शिक्षा अधिकारियों के साथ बैठक आयोजित की थी। बाल पंचायत ने इन अधिकारियों के सामने अपने गांव में ही एक सेकेण्डरी स्कूल खोले जाने की वकालत की थी। तब महेन्द्र ने कहा था- ‘‘अगर ऐसा हुआ तो यहां के बहुत सारे बच्चे आगे भी पढ़ सकते हैं।’’ आखिरकार, यहां सेकेण्डरी स्कूल भी खोला गया, जहां आज पास वाले गांवों के भी बहुत सारे बच्चे पढ़ने आते हैं। अगर यह कहा जाए कि यहां के बच्चों ने हर परेशानी का हल खोज लिया है तो यह सही नहीं होगा। मगर यह तो है कि उन्होंने अपने हालातों को पहले से कहीं बेहतर बनाया है। यही वजह है कि जो कामकाजी बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं वो संस्थाओं द्वारा खोले गए गैर-औपचारिक शिक्षण केन्द्रों में पढ़ने आते हैं। यहां ऐसे बच्चों की भारी तादाद यह बताती है कि पत्थर तोड़ने के काम से टूट जाने के बावजूद इनके दिलोदिमाग में पढ़ने की ललक कितनी बकाया है। यहां बैठे-उठे कभी पहाड़ा तो कभी बारहखड़ी पढ़ते ये बच्चे दुनिया में जीने की समझ बढ़ाने के लिए यहां आते हैं। दूसरी तरफ यहां सक्रिय गैर-सरकारी संस्थाओं ने ऐसे गरीब परिवारों की आमदनी में सुधार लाने के लिए उन्हें राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के फायदे उठाने के लिए भी संगठित किया है। यह लोग अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए अब पंचायत की दूसरी योजनाओं से भी जुड़ रहे हैं।

यह कोई तीन हजार आबादी वाले गीन्ज से महेन्द्र के छोटे से गांव का हाल है, जहां बेहतर जीने के लिए लड़ने और लड़ने के लिए पढ़ने के महत्व का पता चला है। मगर महेन्द्र का गांव उसी दुनिया का हिस्सा है, जिसमें सबसे ज्यादा बाल मजदूर भारत के हैं। सरकारी आकड़ों के हिसाब से यहां 14 साल तक के 1 करोड़, 70 लाख बाल मजदूर हैं। इसमें भी 80% बाल मजदूर खेती या कारखानों में लगे हैं। बाकी के पत्थरों की खदानों, चाय के बागानों, ढ़ाबों, दुकानों या घरेलू कामों से जुड़े हैं। बच्चों से मजदूरी कराने वाले ऐसे कई गिरोह सक्रिय हैं जो उन्हें या तो सस्ती मजदूरी या फिर तस्करी के चलते काम की जगहों तक लाते हैं।

क्राई अपने 30 सालों के तजुर्बों से यह मानता है कि बच्चों की समस्या के जो तार उनके समुदाय से जुड़े हैं, जब तक उनकी पहचान नहीं की जाएगी, जब तक उनकी रोकधाम के उपाय नहीं ढ़ूढ़े जाएंगे, तब तक बाल मजदूरी के हालातों में स्थायी बदलाव नहीं आएगा। असल बात तो यह है कि बाल मजदूरी की जड़े भूख, गरीबी, शोषण, बेकारी और अत्याचारों से जुड़ी हैं। अगर बाल मजदूरी से लड़ना है तो सबसे पहले बच्चों की शिक्षा और बड़ों की आजीविका से ताल्लुक रखने वाली सरकारी नीतियों को प्रभावित करना होगा। इसके सामानान्तर ऐसी नीतियों को जमीनी हकीकत में साकार करने की जद्दोजहद को भी जारी रखना होगा।

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संपर्क : shirish2410@gmail.com

25.10.09

मीडिया में मुस्लिम औरतें दिखती भी हैं मगर इस तरह

शिरीष खरे


कहते हैं कि "मीडिया में जो सच नहीं होता, कई बार वह सच से भी बड़ा सच लगने लगता है।" कहते हैं ऐसे हालत से बचने के लिए "जो दिख रहा है वो क्यों दिख रहा है को लेकर चलो" तो कुछ ज्यादा पता चलता है। ऐसे ख्यालों से बेदखल दिलोदिमाग के बीच मेरी नजर यूट्यूब में कुछ और सर्च करते-करते कहीं और जा अटकी। मैंने देखा मुस्लिम औरत को इस्लाम की कट्टरता से जोड़ने वाला यह कोई अकेला वीडियो नहीं था, मीडिया के कई सारे किस्सों से भी जान पड़ता है कि मुस्लिम औरतों के हक किस कदर ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘लोकत्रांतिकता’ की बजाय ‘साम्प्रदायिकता’ और ‘राष्ट्रीयता’ के बीचोबीच झूल रहे हैं।

बीते दिनों बिट्रेन के मशहूर अखबार ‘द गार्जियन’ ने मोबाइल से दो मिनिट का ऐसा वीडियो बनाया जिसमें पाकिस्तान की स्वात घाटी के कट्टरपंथियों ने 17 साल की लड़की पर 34 कोड़े बरसाए थे। इसी तरह के अन्य वीडियो के साथ अब यह भी यूटयूब में अपलोड है, जो संदेश देता है कि वहां कोई लड़की अगर पति को छोड़ दूसरे लड़के के साथ भागती है तो उसका अंजाम आप खुद देख लीजिए। वैसे तो अपने देश के विभिन्न समुदायों में भी ऐसी घटनाएं कम नहीं है मगर इधर की मीडिया ने उधर की घटना को कुछ ज्यादा ही जोर-शोर के साथ जगह दी। यह अलग बात है कि उन्हीं दिनों के आसपास, उत्तरप्रदेश के अमरोड़ा जिले से खुशबू मिर्जा चंद्रयान मिशन का हिस्सा बनी तो ज्यादातर मीडिया वालों को इसमें कोई खासियत दिखाई नहीं दी। देश की एक प्रतिष्ठित पत्रिका ने इस स्टोरी को हाईलाईट किया भी तो ऐसी भूमिका बांधते हुए कि ‘उसने मुस्लिम महिलाओं की सभी नकारात्मक छवियों को तोड़ा है।’ अब नकारात्मक छवियां को लेकर कई सवाल हो सकते हैं मगर उन सबसे ऊपर यह सवाल है कि क्या एक औरत की छवि को, उसके मजहब की छवियों से अलग करके भी देखा जा सकता है या नहीं ? आमतौर से जब ‘मुस्लिम औरतों’ के बारे में कुछ कहने को कहा जाता है तो जवाबों के साथ ‘इस्लाम’, ‘आतंकवाद’, ‘जेहाद’ और ‘तालीबानी’ जैसे शब्दों के अर्थ जैसे खुद-ब-खुद चले आते हैं। पूछे जाने पर ज्यादातर अपनी जानकारी का स्त्रोत अखबार, पत्रिका या चैनल बताते हैं। उन्हें लगता है कि मीडिया जो कहता है वो सच है। इस तरह मुस्लिम औरतों के मुद्दे पर ‘धर्मनिरपेक्ष’ चर्चा की बजाय ‘राष्ट्रवाद’ के क्रूर चहेरे उभर आते हैं।

यह सच है कि दूसरे समुदायों जैसे ही मुस्लिम समुदाय के भीतर का एक हिस्सा भी दकियानूसी रिवाजों के हवाले से प्रगतिशील विचारों को रोकता रहा है। इसके लिए वह ‘आज्ञाकारी औरत’ की छवि को ‘पाक साफ औरत’ का नाम देकर अपना राजनैतिक मतलब साधता रहा है। दूसरी तरफ, यह भी कहा जाता है कि पश्चिम की साम्राज्यवादी ताकतें दूसरे समुदाय की नकारात्मक छवियों को अपने फायदे के लिए प्रचारित करती रही हैं। ऐसे में इस्लाम की दुनिया में औरत की काली छाया वाली तस्वीरों का बारम्बार इस्तेमाल किया जाना जैसे किसी छुपे हुए एजेंडे की तरफ इशारा करता है। जहां तक भारतीय मीडिया की बात है, तो ऐसा नहीं है कि वह पश्चिप के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर-तरीकों से प्रभावित न रहा हो।

अन्यथा भारतीय मीडिया भी मुस्लिम औरतों से जुड़ी उलझनों को सिर्फ मुस्लिम दुनिया के भीतर का किस्सा बनाकर नहीं छोड़ता रहता। ज्यादातर मुस्लिम औरतें मीडिया में तभी आती हैं जब उनसे जुड़ी उलझनें तथाकथित कायदे कानूनों से आ टकराती हैं। मीडिया में ऐसी सुर्खियों की शुरूआत से लेकर उसके खात्मे तक की कहानी, मुसलमानों की कट्टर पहचान को जायज ठहराने से आगे बढ़ती नहीं देखी जाती। इस दौरान देखा गया है कि कई मजहबी नेताओं या मर्दों की रायशुमारियां खास बन जाती हैं। मगर औरतों के हक के सवालों पर औरतों के ही विचार अनदेखे रह जाते हैं। जैसे एक मुस्लिम औरत को मजहबी विरोधाभास से बाहर देखा ही नही जा सकता हो। जैसे भारतीय समाज के सारे रिश्तों से उसका कोई लेना-देना ही न हो। विभिन्न आयामों वाले विषय मजहबी रंगों में डूब जाते हैं। इसी के सामानान्तर मीडिया का दूसरा तबका ऐसा भी होता है जो प्रगतिशील कहे जाने वाली मुस्लिम संस्थानों के ख्यालातों को पेश करता है और अन्तत : मुस्लिम औरतों से हमदर्दी जताना भी नहीं भूलता।

मीडिया के सिद्धांत के मुताबिक मीडिया से प्रसारित धारणाएं उसके लक्षित वर्ग पर आसानी से न मिटने वाला असर छोड़ती हैं। खास तौर पर बाबरी मस्जिद विवाद के समय से भारतीय समाज के धर्मनिरपेक्ष तेवर अपेक्षाकृत तेजी से बदले और उसी हिसाब से मीडिया के तेवर भी। नतीजन, खबरों में चाहे तेहरा तलाक आए या बुर्का पहनने की जबर्दस्ती, उन्हें धार्मिक-राजनैतिक चश्मे से बाहर देखना नहीं हो पाया। यकीनन जबर्दस्ती बुर्का पहनाना, एक औरत से उसकी आजादी छिनने से जुड़ा हुआ मामला है, उसका विरोध अपनी जगह ठीक भी है। मगर दो कदम बढ़कर, उसे तालीबानी नाम देने से तो बुनियादी मुद्दा गुमराह हो जाता है। यह समझने की जरूरत है कि मुस्लिम औरतों के हकों से बेदखली के लिए पूरा इस्लाम जिम्मेदार नहीं है, वैसे ही जैसे कि गुजरात नरसंहार का जिम्मेदार पूरा हिन्दू समुदाय नहीं है। मगर अपने यहां इस्लाम ऐसा तवा है जो चुनाव के आसपास चढ़ता है, जिसमें मुस्लिम औरतों के मामले भी केवल गर्म करने के लिए होते हैं।

मामले चाहे मुस्लिम औरतों के घर से हो या उनके समुदाय से, भारतीय मीडिया खबरों से रू-ब-रू कराता रहा है। मुस्लिम औरतों के हकों के मद्देनजर ऐसा जरूरी भी है, मगर इस बीच जो सवाल पैदा होता है वह यह कि खबरों का असली मकसद क्या है, क्या उसकी कीमत सनसनीखेज या बिकने वाली खबर बनाने से ज्यादा भी है या नहीं ?? मामला चाहे शाहबानो का रहा हो या सानिया मिर्जा का, औरतों से जुड़ी घटनाओं के बहस में उनके हकों को वरीयता दी जानी चाहिए थी। मगर ऐसे मौकों पर मीडिया कभी शरीयत तो कभी मुस्लिम पासर्नल ला के आसपास ही घूमता रहा है। इसके पक्ष-विपक्ष से जुड़े तर्क-वितर्क भाषा की गर्म लपटों के बीच फौरन हवा होते रहे। नई सुर्खियां आते ही पुरानी चर्चाएं बीच में ही छूट जाती हैं, मामले ज्यादा जटिल बन जाते हैं और धारणाओं की नई परतें अंधेरा गहराने रह जाती हैं।

अक्सर मुस्लिम औरतों की हैसियत को उनके व्यक्तिगत कानूनों के दायरों से बाहर आकर नहीं देखा जाता रहा। इसलिए बहस के केन्द्र में ‘औरत’ की जगह कभी ‘रिवाज’ तो कभी ‘मौलवी’ हावी हो जाते रहे। इसी तरह नौकरियों के मामले में, मुस्लिम औरतों के पिछड़ेपन को लेकर कभी ‘धार्मिक’ तो कभी ‘सांस्कृतिक’ जड़ों में जाया जाता रहा, जबकि मुनासिब मौकों या सहूलियतों की बातें जाने कहां गुम होती रहीं। असल में मुस्लिम औरतों के मामलों की पड़ताल के समय, उसके भीतरी और बाहरी समुदायों के अंतर्दन्द और अंतर्सबन्धों को समझने की जरूरत है। जाने-अनजाने ही सही मीडिया में मुस्लिम औरतों की पहचान जैसे उसके मजहब के नीचे दब सी जाती है।

जिस तरह डाक्टर के यहां आने वाला बीमार किसी भी मजहब से हो उसकी बीमारी या इलाज कर तरीका नहीं बदलता- इसी तरह मीडिया भी तो मुस्लिम औरतों को मजहब की दीवारों से बाहर निकालकर, उन्हें बाकी औरतों के साथ एक पंक्ति में ला खड़ा कर सकता है। जहां डाक्टर के सामने इलाज के मद्देनजर सारी दीवारें टूट जाती हैं, सिर्फ बीमारी और इलाज का ही रिश्ता बनता है जो प्यार, राहत और भरोसे की बुनियाद पर टिका होता है- ऐसे ही मीडिया भी तो तमाम जगहों पर अलग-थलग बिखरीं मुस्लिम औरतों की उलझनों को एक जगह जमा कर सकता है।

मुस्लिम महिलाओं के कानूनों में सुधार की बातें, औरतों के हक और इस्लाम पर विमर्श से जुड़ी हैं। इसलिए मीडिया ऐसी बहसों में मुस्लिम औरतों को हिस्सेदार बना सकता है। वह ऐसा माहौल बनाने में भी मददगार हो सकता है जिसमें मुस्लिम औरतें देश के प्रगतिशील समूहों से जुड़ सकें और मुनासिब मौकों या सहूलियतों को फायदा उठा सकें। कुल मिलाकर मीडिया चाहे तो मजहब के रंगों में छिपी मुस्लिम औरतों की पहचान को रौशन कर सकता है।

13.9.09

सुबह होने में अभी देर है..

शिरीष खरे
अजमेर स्टेशन उतरते ही भंवरीबाई को मोबाइल लगाया, वह लड़खड़ाती हुई आवाज में बोलीं- ‘‘आप तो औरतों की आवाज लिखने के लिए आ रहे हैं न, सीधे अजमेरी गेट थाने चले आइए।’’ मैंने अपने भीतर की लड़खड़ाहट को साधते हुए कहा- ‘‘लेकिन मामला क्या है...’’ (उधर से) ‘‘मामला थाने से ही समझ लेना। हम तो 50 साल की बूढ़ी औरतें हैं, आप नए लड़के हो, हमें तो दो-चार थप्पड़ के बाद बिठा दिया है, इसलिए आना चाहो तो ही आना।’’
मुंबई लौटने से अच्छा है अजमेरी गेट थाने चलना, आटो वाले ने सामान से लदा देख होटल में रूकने का बजट पूछा लेकिन थाने चलने की बात ने उसे थोड़ी देर के लिए चौंका दिया। थानाधिकारी सतीश यादव टेबल पर रखे ‘सत्यमेव जयते’ की प्लेट और पीछे की दीवार पर लटकी गांधीजी की फोटो के बीचोंबीच मानो 180 डिग्री का कोण बनाते हुए बैठे हैं। उन्होंने दूसरी तरफ निगाह टिकाते हुए कहा-‘‘आपकी तारीफ’’.... लेकिन बगैर जबाव सुने ही चल दिए। मेरा सवाल यह नहीं कि केस कितना छोटा या बड़ा है, या आप बड़ा किसे मानते हैं, सवाल है जब कभी गांवों में दलित और खासकर दलित महिला पर अत्याचार होता है तो आस-पड़ोस से लेकर पंचायत या पुलिस से लेकर कचहरी तक कैसी मानसिकता होती है ? आगे की किस्सा इसी मानसिकता को केन्द्र में रखकर लिखा जा रहा है।
रसूलपुरा गांव से दलित-महिला अत्याचारों के एक हफ्ते में ही तीन-तीन केस आने पर थानाधिकारी महोदय क्रोधित है। ‘महिला जन अधिकर समिति’ का आरोप है कि वह दलित-महिलाओं को कानून में दिये गए विशेष अधिकारों पर अमल करना तो दूर शिकायत दर्ज करवाने वाले को ही हवालात की हवा खिलाने लगे हैं। रसूलपुरा के सुआलाल भाम्बी, उसकी पत्नी गीतादेवी और पुत्री रेणु ने जब बीरम गूजर के खिलाफ जर्बदस्ती गाय हथियाने और मारपीट का मामला अलवर थाने में दर्ज करवाना चाहा तो सुआलाल भाम्बी को ही यह कहते हुए बंद कर लिया गया कि जांच के बाद पता करेंगे कि कसूरवार है कौन ?
रसूलपुरा, अजमेर से जयपुर जाने वाली सड़क पर बामुश्किल 10 किलोमीटर दूर है। यहां करीब 800 मतों में से 600 मुस्लिम, 150 गूजर और 50 दलितों के हैं। 20 साल पहले दलितों की संख्या ठीकठाक थी, तब से अबतक करीब 20 दलित परिवारों को अपनी जमीन-ज्यादाद कौड़ियों के दाम बेचकर अजमेर आना पड़ा है। बचे दलितों को भी गांव से आधा किलोमीटर दूर अपने खेतों में आकर रहना पड़ रहा है। यह भारत का वह हिस्सा है जहां आज भी चबूतरे पर दलितों का बैठना मना है, वह हेडपम्प का पानी नहीं भर सकते, साइकिल पर सवार होकर निकल तो सकते हैं लेकिन टोकने (रोकने) का डर भी है, पहले तो दलित दूल्हा घोड़े पर चढ़ नहीं सकता था लेकिन 10 साल पहले हरकिशन मास्टर ने घोड़े पर चढ़कर पुराना रिवाज तोड़ा था। 15 साल पहले छग्गीबाई भील सामान्य सीट से जीतकर सरपंच भी बनी थी, तब गांव की ईज्जत का वास्ता देकर सारे पंचों को एक किया गया और अविश्वास प्रस्ताव के जरिए छग्गीबाई को 6 महीने में ही हटा दिया गया। छग्गीबाई का सामान्य सीट से जीतना करिश्मा जैसा ही था। छग्गीबाई कहती हैं- ‘‘तब सामान्य जाति के इतने उम्मीदवार खड़े हो गए कि दलितों के कम मत ही भारी पड़ गए। नजीता सुनकर सवर्णों ने रसूलपुरा स्कूल घेर लिया, ऐसे में पीछे की कमजोर दीवार से लगी खिड़की तोड़कर मुझे पुलिस की गाड़ी से भगाया गया। पुराने सरपंच श्रवण सिंह रावत फौरन पंचायत की तरफ दौड़े, कुर्सी पर बैठकर बोले ‘ई भीली को कोड़ पूछै, कौड़ पैदा नी होय ऐसो, जो जा पंचायती में राज करै’।’’ याने एक गांव के ऐसे दो उदाहरणों से बीते 10-15-20 सालों के हालात देखें तो आपसी टकराहटों की तस्वीर थोड़ी-बहुत साफ होती है।
करीब 15 साल पहले इलाके की महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए समिति बनायी, नाम रखा ‘महिला जन अधिकार समिति’, तब 2-2 रूपए देकर 10-12 महिलाएं जुड़ी। केसर, तोला, सोहनी, सरजू, सकुंतला, रेनू, जूली, लीला, गंगा, रिहाना, संपत, भंवरीबाई जैसी महिलाएं अपनी छोटी-छोटी दिक्कतों और निपटारे के लिए चर्चाएं करतीं। भंवरीबाई बताती हैं- ‘‘5 साल के बाद जब हम बालविवाह, मृत्युभोज और जातिप्रथा जैसी बुराईयों के विरोध में बोलने लगे तो हमारा भी विरोध बढ़ने लगा। दलित महिलाएं जब जातिसूचक शब्दों और गालियों पर ऐतराज जताने लगीं तो सवर्ण कहते कि हम तो तुम्हें रोज ही गालियां देते थे, पहले भी तुम्हारे बच्चों को बिगड़े नामों से ही बुलाते थे, तब तो तुम्हें बुरा नहीं लगता था, अब क्यों लग रहा है ?’’ इस तरह की बहसों के बीच आपसी टकराहट का रुप बिगड़ता चला गया।
दलितों को सरकारी जमीन से होकर अपने खेत आना-जाना होता था। बीते 6 जून को तेजा गूजर ने उसी रास्ते पर गड्डा खोदा, तार और कांटे की बागड़ लगा दी। इसके बाद दलित महिलाओं की तरफ से भंवरीबाई ने तेजा गूजर से बात की- ‘‘लालजी (देवरजी) डब्बो थाओ बात करणी है।’’ जबाव में उन्हें मां-बेड़ की गालियां और रास्ते के ही गड्डे में गाड़ देने जैसी धमकियां मिलीं। इसके बाद दलित महिलाओं ने उनके बड़े भाई और वार्ड के पंच अंबा गूजर को बताया कि आपको वोट दिया तो इस उम्मीद पर कि सुख-दुख बांटोंगे, आप तो खुद ही दुख दे रहे हैं। जबाव में अंबा गूजर ने थाने घूम आने की नसीहत दी। असल में यह दोनों भाई कई गांवों जैसे बेड़िया, गूगरा, बुडोल और गगबाड़ा के दलितों की जमीनों को सस्ते दामों में खरीदने में लगे हैं। अगले दिन दलित महिलाएं जब नारेती पुलिस चैकी गईं तो पुलिस वाले बोले कि पहले जांच करेंगे, तब केस लेंगे। जांच के लिए जब कैलाश (दलित) कांस्टेबल आया तो तेजाभाई-अंबाभाई ऊपर बैठे और कैलाश कांस्टेबल आंगन के बाहर नीचे बैठा। यह नजारा देखते ही दलित महिलाएं अलवर गेट थाने पहुंची, जहां थानाधिकारी ऐसे मामलों के चलते पहले से ही हेरान-परेशान पाये गए। उन्होंने ऐसी वारदातों में कमी लाने की बात पर जोर दिया।
कल्याणजी पूरे भरोसे के साथ कहते हैं- ‘‘सवर्ण हमारे 30 एकड़ के खेतों के अलावा 4 एकड़ की सरकारी जमीन भी हथियाना चाहते हैं। यहां 1 एकड़ खेत की कीमत 1 लाख के आसपास चल रही है। हमारे पास गृहस्थी चलाने का मुख्य जरिया खेती ही है। 10-15 सालों से सूखा पड़ने से खेती वैसे ही चौपट है, मजूरी के लिए पलायन करना पड़ता है, ऐसे में सर्वणों की नीयत बिगड़ने से थाने-कचहरी के चक्कर भी लगाने पड़ रहे हैं।’’ इसी साल के कुछ मामलों पर नजर दौड़ाए तो जमीन के विवाद में 12 फरवरी को मामचंद रावत और उसके लोगों ने शंकरलाल रेंगर, उसकी पत्नी कमला, बेटी संगीता, बहू ललिता, बेटे विनोद और गोपाल के साथ घर में घुसकर मारपीट की। ‘दलित अधिकार केन्द्र’ के हस्तक्षेप करने से अलवर गेट थाने में तीन महीने बाद रिपोर्ट दर्ज हो सकी, अभी तक चलान पेश नहीं हुआ। इसके बाद तेजाभाई-अंबाभाई गूजर ने रास्ता रोकने का विरोध करने वाली गीता और सोहनी को पीटा। एसपी साब के हस्तक्षेप के बाद ही रिपोर्ट लिखी जा सकी, बहुत दिनों से कार्यवाही का इंतजार है। जिन दलितों के दिलों में अपनी जमीन खो देने का डर हैं, उनमें हैं कल्याण, कैलाश, ओमप्रकाश, रतन, सोहन, छोटू, नाथ, मोहन, सुआंलाल, गोगा, घीसू, किशन, दयाल, रामचंद, रामा, हरिराम.........
रसूलपुरा का सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक ताना-बाना ऐसा है कि वर्चस्व की लड़ाई में गूजरों के साथ मुस्लिमों ने हाथ मिला लिया है। लाला शेराणी और लाला सलीम जैसे दो मुस्लिम व्यापारियों ने तो गूजरों का खुला समर्थन किया है। इसमें से एक ने तो यहां तक कह दिया कि ‘पूरा गांव उलट-पुलट हो जाएगा, अगर एक भी गूजर थाने में गया तो।’ मुस्लिम और सवर्ण-हिन्दूओं की एकता का इससे बेहतरीन उदाहरण और कहां मिलेगा ?
इधर अलवर गेट थाने के थानाधिकारी महोदय की परेशानी समझ नहीं आती है, शंकरलाल रेंगर जब रिपोर्ट लिखाने पहुंचे तो थानाधिकारी महोदय ने स्वयं समझाने की कोशिश की थी कि ‘यह थाना केवल दलितों या रसूलपुरा के लिए नहीं खोला गया है, और भी तो लोग हैं, और भी परेशानियां हैं।’ उधर रसूलपुरा में शाम 7 बजे तक जब सुआलाल भाम्बी की गाय न लौटी तो उसकी पत्नी गीता और बेटी रेणु पता लगाने गांव में घूमने लगीं। उन्हें पता चला कि बीरम सिंह ने उनकी गाय बांध रखी है। इसके बाद जिसका अंदेशा था वहीं हुआ, गाय मांगने पर गाली-गलौज और विरोध करने पर मारपीट। उस वक्त एक भी बीच-बचाव में न आया। ऐसे में जब सुआंलाल, उसकी पत्नी गीता और बेटी रेणु रिपोर्ट लिखवाने आए तो सुआलाल को बंद कर लिया गया। लेकिन ‘महिला जन अधिकार समिति’ और ‘दलित अधिकार केन्द्र’ के विरोध के बाद पुलिस सुआलाल से कहती है कि ‘गांव चलते हैं, अगर एक भी आदमी यह कह दे कि यह तेरी गाय है तो रख लेना।’ सुआलाल बोला गवाह तो एक नहीं कई हैं, लेकिन मामला केवल गाय का नहीं है, गाय तो मेरी है ही, सवाल मेरी पत्नी और बेटी को बेवजह पीटने और गाली-गलौज का है, उसका न्याय चाहिए।’ पुलिस वालों के हिसाब से ‘ऐसे तो मामला सुलझने से रहा।’ इसलिए अगली सुबह गीता और रेणु को जिला एवं सेशन न्यायधीश, अजमेर का रास्ता पकड़ना है। रात उन्हें अजमेर ही ठहरना है, सुबह होने के पहले गांव के सवर्ण उन्हें कचहरी की हकीकत बताने के लिए आते हैं, वह गाय लौटा देने का वादा भी करते हैं, मारपीट और ईज्जत के सवाल पर लेन-देन की बातें भी चलती हैं। गीता और रेणु के शरीर पर चोट के निशान ज्यादा हैं, सुबह होने में अभी बहुत देर है लेकिन दोनों ने इस बार ईज्जत से कोई समझौता नहीं करने की ठानी है। कचहरी में, कचहरी से गांव और गांव से कचहरी जाने-आने के बीच क्या होता है, कचहरी के रास्ते चलकर क्या गांव के रास्ते चला जा सकता है, गांव के रास्ते पर वापिस लौटकर क्या ईज्जत से जीया जा सकता है, ऐसे ही कुछ और किस्से हैं, अगले हिस्से में....

7.4.09

तिरंगा फहराने के जिद की जीत



शिरीष खरे
नागपुर । छोटी-छोटी बातों से जिंदगी बनती है और छोटे-छोटे सिरों से कहानी। यह छोटी-सी कहानी भी एक छोटे-से सिरे से शुरू होती है। लेकिन सबको एक बडे जज्बात से जोडती है। नागपुर की गंगानगर बस्ती में कभी तिरंगा नहीं फहराया था।
२६ जनवरी २००८ को लोगों ने तिरंगा फहराने की सोची। एक मामूली लगने वाले काम की अडचनों को देखते हुए टाल दिया। अगली बार फहराने का कहते हुए भूल गए। लेकिन बच्चों को याद रह गया। जो बच्चे आशाओं की नन्ही-नन्ही नसैनियां लगाकर आकाश पर चढते हैं, उन्हीं में से १२ बच्चों ने साल २००९ की उसी तारीख को आखिरी सिरा जोड दिया। ११ से १४ साल के इन बच्चों ने कौन-सा सिरा, कहां से जोडा, यह जानना भी दिलचस्प होगा।
आपने दो सच को एक साथ और अलग-अलग देखा हैं? यहां एक सच था- काम बेहद आसान है। दूसरा था- काम बेहद मुश्किल है। एक सच ’कहने‘ और दूसरा ’करने‘ से जुडा था। इसलिए एक सच ने दूसरे को बहुत दिनों तक दबाए रखा। लेकिन तीसरा सच भी था कि बच्चों का जज्बा किसी जज्बे से कम नहीं था। इस तीसरे सच ने दूसरे सच को अपने पाले में खीच लिया।
पहला सिरा
जनवरी २००८ की २६ तारीख पहला सिरा बना। इस रोज गंगानगर के लोग झण्डा ऊंचा करने के लिए एक हुए। लेकिन जिस खम्बे से तिरंगा फहराना था, वह टूट गया। लोग बिखर गए और बच्चों के दिल भी टूट गए।
१४ साल की हेमलता नेताम ने याद किया- ‘हमारी ’बाल अधिकार समिति‘ के सभी साथी ’बाल अधिकार भवन‘ में मिले। हमने अपनी बस्ती में तिरंगा फहराने की ठानी।’ इस लिहाज से अगली और अहम तारीख थी १५ अगस्त। बच्चों की बैठक से दो बातें निकली। एक- बस्ती के बडों से चर्चा की जाए। दूसरा- अपने पार्षद को एक एप्लीकेशन दी जाए।
आखिरी सिरे के पहले
११ साल की पूजा भराडे ने याद किया- ‘हमने काम को दूसरों पर छोडा और हार गए। हमें बडों के साथ एप्लीकेशन लिखनी और उन्हें लेकर आगे बढना था। लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा था। जब १५ अगस्त नजदीक आया तो लगा कि झण्डा सिर्फ दिलों में ही फहराकर रह जाएगा। सबकी आंखें १५ से हट गईं। हमारे दिल फिर टूट गए।’ लेकिन १५ की तारीख हार और हिम्मत की तारीख बनी। अगर यह नहीं आती तो २६ जनवरी २००९ जीत की तारीख कैसे बनती!

१५ अगस्त को वार्ड-१२ की पार्षद मीनाताई बरडे ने तिरंगा फहराया। उनके भाषणों से बच्चों के दिलों में देशप्रेम की भावनाएं उमडती थीं। बच्चों ने आजादी के नारे लगाए। फिर सबके सामने मीनाताई से २६ जनवरी के पहले खम्बा और उसका चबूतरा बनाने की मांग रखी।

देखते-देखते नए साल का सूरज उग गया। १२ साल की रोशनी ठाकरे ने याद किया- ‘हमें भी अपनी जिद पकडी। ५ जनवरी को सारे फिर बैठे। यहां दो फैसले हुए। यह पिछले फैसलों से अलग थे। एक तो अपने हाथों से एप्लीकेशन बनाई। दूसरा खुद जाकर पार्षद से मिलने की सोची। यह काम हमें ही करने थे इसलिए पूरे हुए।’

१३ साल के अक्षय नागेश्वर ने याद किया- ‘हमने जिम्मेदारियां बांटी। ८ जनवरी को १२ बच्चे पार्षद के आफिस पहुंचे। लेकिन मीनाताई नहीं मिलीं। हम उदास हुए, निराश नहीं।’
पार्षद से मिलने की दूसरी तारीख ११ जनवरी रखी गई। इस तारीख की सुबह ९ बजे बच्चे ऑफिस पहुंचे। मीनाताई फिर नहीं थीं। लेकिन मैनेजर ईश्वर बरडे मिल गए। बच्चों ने एप्लीकेशन उन्हें ही दे दी और उनसे मीनाताई का मोबाइल नंबर ले लिया।

बच्चों के अगले १० दिन भी इंतजार में गुजरे। अब पानी सिर के ऊपर था। २१ जनवरी को ’बाल अधिकार भवन‘ में तीसरी बैठक रखनी पडी। यहां से बच्चे फिर मीनाताई के ऑफिस पहुंचे। इस बार संबंधित अधिकारी अशोक सिंह का नम्बर मिला। बच्चों ने अशोक सिंह से खम्बा और उसका चबूतरा बनाने की अपनी पुरानी जिद दोहरायी। कुल मिलाकर बात आई और गई हो गई।

१४ साल के मनीष सोनावने ने याद किया- ‘२६ जनवरी नजदीक आया। यह परीक्षा की घडी थी। हम फिर मीनाताई के ऑफिस में गए। वह फिर नहीं मिली। इसलिए उनके घर जाना पडा। मीनाताई ने जब हमारी परेशानियाँ सुनी तो सॉरी कहा। उन्होंने २६ जनवरी के पहले तक खम्बा और उसका चबूतरा बनाने का वादा किया।’

सुबह की तस्वीर
मीनाताई की बातों से उत्साहित बच्चे घर लौटे। २६ जनवरी के एक रोज पहले बच्चे आगे आए। उन्होंने रात के पहले तक खम्बा और उसका चबूतरा बना डाला। जो बच्चे आकाश से पंतगें तोडकर अपनी छतों पर लहराना चाहते हैं, उन्हीं में से १२ ने अपनी बस्ती में पहली बार तिंरगा फहराने की ख़ुशी महसूस की थी। ’बाल अधिकार समिति‘ की नंदनी गायकबाड और उनके साथी नींव के खास पत्थर साबित हुए। नंदनी बोली- ‘अगली सुबह तिरंगा आंखों के सामने लहरा उठा। अब यह खम्बा बच्चों के दृढ संकल्प और समपर्ण का प्रतीक है।’

जब कोई बच्चा पहली बार जूते के बंध बांधता है तो उसके चेहरे की ख़ुशी देखती ही बनती है। एक रोज कुछ नन्हें हाथ मिले तो किसी ने न देखा। लेकिन जब छोटी-सी आशा हकीकत में बदली तो पूरे गंगानगर देखता रह गया।

’बाल अधिकार भवन‘ में बडा फासला मिटाने वाले छोटे-छोटे कदम एक साथ खडे है। हेमलता नेताम, पूजा भराडे, अक्षय नागेश्वर, रोशनी ठाकरे और मनीष सोनावने को एक तस्वीर में कैद किया गया है। तकदीर से बनी यह तस्वीर अब इस कहानी का आखिरी सिरा है। हो सकता है यह अगली कहानी का पहला सिरा बन जाए!!