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14.12.10

भोपाल: यह कैसी प्रेतलीला ?

चिन्मय मिश्र 

साधो यह मुरदों का गांव
पीर मरै, पैगम्बर मर गए, मर गए जिंदा जोगी।
                                                            -कबीर

3 दिसम्बर 2010 को भोपाल गैस त्रासदी के 26 साल पूरे हो गए। इस दौरान बकौल ओबामा भारत एक विकासशील से विकसित देश बन गया। वह एक आर्थिक महाशक्ति और तीसरी दुनिया का तथाकथित प्रवक्ता भी बन गया। देश में विदेशी पूंजी निवेश में काफी बढ़ोत्तरी हुई और वह बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पसंदीदा भी बन गया।

मगर भोपाल में यूनियन कार्बाइड से रिसी गैस से पीड़ित समुदाय के लिए तो ढाई दशक का यह समय जैसे ठहरा ही हुआ है। भोपाल की ट्रायल कोर्ट से आए फैसले के बाद लगा था कि केंद्र और राज्य सरकारें चेतेंगी और कुछ सकारात्मक पहल करेंगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। केंद्र सरकार ने कुछ आधा-अधूरा सा उत्तरदायित्व निभाया और मंत्रियों के समूह ने खैरात बांटने के अंदाज में कुछ घोषणाएं कर दीं। लेकिन पीड़ितों का शारीरिक, मानसिक या कानूनी किसी भी तरह की कोई राहत नहीं मिली।

कबीर के शब्दों में कहें तो संभवतः नीति निर्धारक सोचते हैं,

राजा मर गए परजा मर गये, मर गये वैद्य औ रोगी।
चंदा मरिहैं सुरजो मरिहैं, मरिहैं धरती अकासा।

तो फिर शासन प्रशासन को कुछ भी करने की क्या आवश्यकता है ? वैसे इस त्रासदी के बाद हुई वारेन एंडरसन की गिरतारी के खिलाफ भारत के सर्वाधिक प्रतिष्ठित उद्योगपति ने एक ‘मर्मस्पर्शी’ लेख लिखा था। बाद में वे 100 करोड़ रुपए लगाकर ‘देशहित’ में यूनियन कार्बाइड का जहरीला कचरा हटवाने का असफल प्रयास भी कर चुके हैं और अब राडिया टेप कांड के उजागर होने के बाद इन ‘देशभक्त’ उद्योगपति की नाराजगी की वजहें भी सार्वजनिक होती जा रहीं हैं। कहने का अर्थ यह है कि भारत में हो रहे विदेशी पूंजी निवेश के पीछे भी संभवतः यही भावना कार्य कर रही है कि यदि किसी देश में विश्व की अब तक की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना के लिए 26 वर्ष पश्चात भी किसी को पूर्णतः उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सका है तो निवेश का उससे बेहतर स्थान और क्या हो सकता है ?

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के कार्यकाल के पांच वर्ष पूरे होने पर 29 नवम्बर को भोपाल में ‘कार्यकर्ता गौरव दिवस’ में हजारों-हजार लोग इकट्ठा हुए थे। इसमें हुई आमसभा के दौरान भोपाल गैस पीड़ितों को लेकर एक शब्द भी कहा गया हो, ऐसा सुनने में नहीं आया। 3 दिसम्बर को प्रतिवर्ष सभी धर्मों और राजनीतिक दलों द्वारा आयोजित प्रार्थना सभाएं महज रस्मी होकर रह गई हैं। आज कई राष्ट्र दूसरे महायुद्ध के बीत जाने के 60 वर्षों बाद भी अपने द्वारा किसी अन्य राष्ट्र के प्रति की गई अमानवीयता के लिए क्षमा मांगते नजर आते हैं। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपनी हालिया भारत यात्रा के दौरान इस संबंध में माफी मांगना तो दूर, इस दुर्घटना का उल्लेख करना तक जरुरी नहीं समझा।

भारतीय न्याय व्यवस्था भी एक गोल घेरे में रहकर लगातार दोहराव से ग्रसित हो गई है। ट्रायल कोर्ट से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक सब अपनी-अपनी भूमिका की समीक्षा की बात अवश्य करते नजर आते हैं लेकिन धरातल पर कुछ भी नजर नहीं आ रहा है। गैस पीड़ितों के साथ संघर्ष कर रहे संगठन और व्यक्ति लगातार सरकार की विरोधाभासी प्रवृत्तियों को उजागर कर रहे हैं।

प्रशासन तंत्र भी मामले और निपटारे को लगातार लंबित करता जा रहा है। गैस पीड़ितों के लिए बना अस्पताल श्रेष्ठी वर्ग के सुपर स्पेशयलिटी अस्पताल में बदल गया। गैस पीड़ितों के स्वास्थ्य पर बड़े प्रभावों के आकलन व उपचार के लिए गठित शोध समूह को कार्य करने से रोक दिया गया। आज तक इस बात को सार्वजनिक नहीं किया गया कि अंततः भोपाल कितने प्रकार के जहर का शिकार हुआ था।

इस नव उदारीकरण के युग में विकास का पैमाना महज आर्थिक ही रह गया है। लाखों करोड़ रुपए के भ्रष्टाचार की रकम भी जीडीपी में मिल जाएगी और आंकड़े बताने लगेंगे कि हम सब कितनी तेजी से गरीबी रेखा के पार आते जा रहे हैं। परंतु इसके पीछे अलिखित यह है कि गरीबी रेखा वास्तव में ऐसी लक्ष्मण रेखा है इसे जो भी पार करने का प्रयास करेगा वह भस्म हो जाएगा। गांवों से शहरों की ओर पलायन इसी का प्रतीकात्मक स्वरूप ही तो है। भोपाल के गैस पीड़ित अपनी आधी-अधूरी सांस के साथ पिछले ढाई दशक से संघर्ष कर रहे हैं। ये संघर्ष अब एक प्रतीक में बदल चुका है। ऐसा नहीं है कि भोपालवासी यह नहीं जानते कि,

तैतीस कोटी देवता मर गए, पड़ी काल की फांसी।

वे जानते हैं कि उनका संघर्ष संभवतः उन्हें स्वयं को न्याय नहीं दिलवा सके। लेकिन इसके परिणामस्व्रूप भारत व तीसरी दुनिया के अनेक देशों में जहर फैलाने वाले उद्योगों की स्थापना पर लगाम अवश्य लगी है।

आज यूनियन कार्बाइड या डाउ केमिकल्स को भारत में नया कारखाना लगाने में असफलता का सामना करना पड़ा है क्योंकि उनका पुराना ‘नाम’ और ‘काम’ आड़े आ रहा है। पुणे के निवासियों ने अपने शहर के पास डाउ केमिकल्स को कारखाना नहीं लगाने दिया। दरअसल भारतीय राजनीतिक तंत्र हमारी जनता की धैर्य की लगातार परीक्षा ले रहा है। स्थितियां बेकाबू होने पर वह विशेष सहायता पैकेज की घोषणा करता है। पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र में विदर्भ और मध्यप्रदेश में नर्मदा घाटी में ऐसे पैकेज भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुके हैं। इस क्रम में अब देश के नक्सल प्रभावित जिलों के लिए करोड़ो रुपए के विशेष सहायता पैकेज की घोषणा की गई है। इसका हश्र भी वहीं होना है।

भोपाल गैस पीड़ितों को भी लगातार भुलावे में रखकर रोज नई-नई घोषणाएं करना अर्थहीन है। भोपाल गैस त्रासदी को लेकर बरती जा रही लापरवाही अनजाने में नहीं हो रही है। यह एक घृणित प्रवृत्ति है जो कि उद्योगपतियों को यह दर्शा रही है कि उन्हें इस देश में कुछ भी करने की छूट है। इसी के समानांतर आम व्यक्ति को भी समझना होगा कि इस मामले में उसकी अरुचि स्वयं उसके लिए भी खतरनाक है। वैसे कबीर ने यह भी लिखा है,

मानुष तन पायौ बड़े भाग अब विचारी के खेलो फाग!

4.11.10

बारूद पर ढ़ेर है भारत का भविष्य

शिरीष खरे

एक बच्चा पटाखा बनाए और दूसरा उसे जलाकर दीपावली मनाए. ऎसी विडम्बना तमिलनाडु के शिवकाशी में आसानी से देखी जा सकती है. जहां एक ओर देश के हरेक कोने का बचपन रोशनी के पर्व को मनाने के अपने तरीके व योजना बना रहा है, वहीं शिवकाशी जो आतिशबाजी उद्योग के लिए प्रसिद्ध है, जहां करीबन 40 हजार बाल मजदूर उनकी खुशियों में चार चांद लगाने के लिए पटाखे बनाने में सक्रिय हैं.

शिवकाशी वह क्षेत्र है जिसे देश की आतिशबाजी राजधानी के रूप में जाना जाता है. यहां लगभग एक हजार छोटी-बड़ी इकाइयां बारूद व माचिस बनाने में बनाने में जुटी हैं जिनका सालाना कारोबार 1000 करोड़ रूपए है. इस उद्योग के चलते एक लाख लोगों की रोजी चलती हैं जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं व बच्चे भी शामिल हैं.

बाल श्रम नाम के अभिशाप की जहां बात चल ही गई है तो यह स्पष्ट कर दें कि शिवकाशी में इसका प्रमाण आसानी से देखा जा सकता है. मसलन, पंद्रह वर्षीय पोन्नुसामी जो यहां एक पटाखा निर्माणी इकाई में कार्यरत है, पांच साल पटाखे बना रहा है. जब उसने यह पेशा चुना तो उसकी समझ का स्तर क्या रहा होगा यह विचारणीय मसला है. उसके अनुसार वह छठी कक्षा का छात्र था जब उसे जबरन इस काम में उतार दिया गया. काम कराने की मंशा भी उनके माता-पिता की ही थी.प्रतिदिन नौ घंटे की कड़ी मेहनत के बाद वह 60 रूपए पाता है. यह बेगारी उसे वयस्क श्रमिकों को मिलने वाली मजदूरी का केवल चालीस फीसदी है. ऎसे कई उदाहरण हैं जिनसे यह स्पष्ट है कि शिवकाशी इलाके के किशोर-किशोरियों की पढ़ाई-लिखाई में गाज गिरने की आशंका रहती है. छोटी उम्र में ही ऎसे खतरनाक काम में झोंकने के मां-बाप के फैसले के पीछे उनकी गरीबी ही मूल कारण है.

कारखानों में हादसे सामान्यत: होते रहते हैं. ऎसे में मासूमों को घातक काम पर लगाने का सवाल जब उठता है तो श्रमिक संगठनों का जवाब होता है कि मृतकों में कोई भी किशोर नहीं है,जबकि दास्तां कुछ अलग ही है. जुलाई 2009 में हुई एक दुर्घटना में तीन बच्चे मर गए.

अगस्त 2010 में तो सरकारी अधिकारियों पर ही गाज गिरी जो अनाधिकृत पटाखा इकाइयों की जांच पर गए थे. बताया गया है कि 8 राजस्व और पुलिस अधिकारियों को इस तहकीकात के दौरान जान से हाथ धोना पड़ा. जब पोन्नुसामी से काम के जानलेवा होने के बारे में पूछा गया तो उसका जवाब यही था कि अगर मैं भाग्यशाली हूं तो कभी हादसा नहीं होगा.

बच्चों के अधिकारों के क्षेत्र में काम करने वाली गैर सरकारी संस्था चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) के अधिकारी जॉन आर की मानें तो शिवकाशी में करीबन 1050 कारखाने हैं जिनमें से 500 बिना किसी लाइसेंस के चल रहे हैं. पटाखों के अलावा 3989 कारखानों में दियासलाई बनती है. वे मानते हैं देश-विदेश में हो रहे प्रयासों के नतीजतन बाल श्रम पर कुछ अंकुश लगा है. हादसों में इजाफा और बच्चों के काम पर लगाने की नौबत गैर लाइसेंसशुदा कारखानों की वजह से आती है जिनका संचालन घरों की असुरक्षित चारदीवारी में होता है.

इन लोगों को लाइसेंस वाली कंपनियां पटाखे बनाने का आदेश दे देती है. अधिक फायदे के लालच व शिक्षा के अभाव में ये लोग आसानी से कानून की दहलीज को लांघ जाते हैं. नाम न छापने की शर्त पर शिवकाशी की ही एक एनजीओ के कार्यकर्ता के अनुसार इस समस्या के बारे में समझ अभी अधूरी है. हम अभिभावकों को जाग्रत करने का प्रयास कर रहे हैं. उन्हें यह समझाया जा रहा है कि वे सीमित आमदनी में गुजर-बसर करते हुए बच्चों के स्वास्थ्य व शिक्षा पर ध्यान दें.

कहावत है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती और अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता. इसी तर्ज पर सरकार, प्रशासन व एनजीओ का प्रयास भी तब तक सफल नहीं हो जाता जब तक कि अन्य पक्षकार जिनमें आतिशबाजी निर्माण इकाइयों के मालिक व अभिभावक शामिल हैं, स्वेच्छा से पहल न करें. अन्यथा उनकी दीपावली कभी भी प्रकाशमान नहीं हो पाएगी. 

23.6.10

ये ट्रेन मिस कर दो विनय


पशुपति शर्मा

(माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय का पूर्व छात्र, दस्तक का साथी, हिंदुस्तान भागलपुर का पत्रकार और सबसे बढ़कर सबका प्यारा विनय तरुण चला गया, हमेशा-हमेशा के लिए…)


मंगलवार की रात नौ बजे फास्ट ट्रैक का बुलेटिन चल रहा था। मैं पीसीआर में बुलेटिन करवा रहा था, इसी दौरान प्रवीण का फोन आया, मैंने काट दिया। दूसरी बार, तीसरी बार घंटी बजी लेकिन मैंने फोन काट दिया। फिर मनोज भाई का फोन आया। वो फोन भी मैं नहीं उठा सका। बुलेटिन खत्म हुआ, तो संतोष का फोन आया कि विनय नहीं रहा। विनय हम सबको छोड़ कर चला गया। विनय तुम्हारी मौत की खबर भी इस न्यूज बुलेटिन ने मुझ तक पहुंचाने में आधे घंटे की देर कर दी। सुबह पता चला कि तुम भी ऑफिस पहुंचने की आपाधापी में ही…


पुष्य ने बताया कि ऑफिस में देर हो रही थी और शायद तुम्हारी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। पटना से तुम भागलपुर के लिए चले थे लेकिन नाथनगर में पता नहीं तुमने चलती ट्रेन से उतरने की कोशिश की या फिर कुछ और… लेकिन तुम ऑफिस नहीं पहुंच पाये। अब कभी नहीं पहुंच पाओगे। ऑफिस से लौटते हुए जो बात मुझे बहुत ज्यादा कचोट रही थी कि मैंने फोन क्यों नहीं उठाया – यह बात कुछ ज्यादा ही तकलीफ दे रही है। पता नहीं किस हालात और किन दबावों में हम काम करते हैं कि… खैर! ये वक्त इस बात का नहीं लेकिन पुष्य समेत अपने तमाम साथियों के जेहन में न जाने ऐसे ही कई सवाल उठ रहे हैं।

मेट्रो से घर पहुंचने तक कई मित्रों के फोन आये। किसी के पास कहने को कुछ नहीं था। सब एक दूसरे से एक-दो लाइनों में बात करते और फिर शब्द गुम हो जाते। अखिलेश्वर का मेरठ से फोन आया – भैया विनय नहीं… उसके बाद न वो कुछ बोल सका और न मैं। इसी तरह ब्रजेंद्र, उमेश… सभी इस खबर के बाद अजीब सी मन:स्थिति में थे। शिरीष से बात की और ये सूचना दी तो वो भी सन्न रह गया। विनय अब तुमसे तो कोई सवाल नहीं कर सकता लेकिन एक दूसरे से ताकत बटोरने की कोशिश कर रहे हैं। विनय ऐसी भी क्या जल्दी थी? एक दिन ऑफिस छूट ही जाता तो क्या होता? लेकिन हादसों के बारे में क्या कहा जा सकता है? तुमने भी तो शायद ये नहीं सोचा था कि चलती ट्रेन के पहिये तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं…

तुम्हारा चेहरा रात से बार-बार मेरे सामने घूम रहा है। सीधा, सपाट और बिल्‍कुल बेबाक विनय और उसकी उतनी ही प्यारी मुस्कुराहट अब कभी देखने को नहीं मिलेगी। वो विनय जो चंद मुलाकातों में ही बिलकुल अपना सा हो गया था, वो पता नहीं कहां गुम हो गया? बंदर मस्त कलंदर का गोडसे उड़न छू हो गया। विनय वो तुम ही तो थे जो बैक स्टेज पर हंसते मुस्कुराते और मंच पर जाते ही गोडसे के चरित्र में ढ़ल जाते थे। तुम्हीं ने राजकमल नायक के साथ एक अलग ही परसाई की कहानी के कैरेक्टर में कमाल की जान डाल दी थी। आज बेजान पड़े हो। बिना किसी रिहर्सल के जिंदगी के नाटक का पटाक्षेप कर दिया।

कई सारी बातें ध्यान में आ रही हैं। बिलकुल बेतरतीब। तुम्हारा भोपाल का कमरा, जहां तुमने मुझे खिचड़ी का न्योता दिया। हबीबगंज स्टेशन पर ट्रेन सीटी बजा रही थी लेकिन तुम्हारे कुकर की सीटी नहीं बज रही थी। बिना खिचड़ी खाये जाना मुमकिन नहीं था। जब तक हम स्टेशन की ओर बढ़ते तब तक ट्रेन जा चुकी थी। तुमने बड़े प्यार से कह दिया – ठीक है एक दिन और रुक जाइए… मेरा मन भी नहीं था कि आप जाएं…

ऐसी ही चंद मुलाकातें बार-बार जेहन में कौंध रही है… तुम्हारी प्रवीण के साथ नोक-झोंक, भागलपुर स्टेशन पर पुष्य के साथ खबरों को लेकर खींचतान…. भागलपुर का वो कमरा जो तुमने तीसरी या चौथी मंजिल पर ले रखा था… जिसका पूरा व्याकरण तुमने अपने मुताबिक गढ़ रखा था। विनय तुम सबसे जुदा थे। सबसे अलग। तुम्हारा स्नेह, तुम्हारा प्यार, तुम्हारी बहस और तुम्हारे सवाल सब तुम्हारे साथ ही गायब हो रहे हैं। कैसे कहूं – हो सके तो लौट आओ मेरे भाई… तुम्हारे हाथ की खिचड़ी खाने का फिर से मन हो रहा है… क्या तुम मौत की ट्रेन मेरे लिए मिस नहीं कर सकते।

26.9.09

हीरे की मण्डी में हारती जिन्दगी

शिरीष खरे, सूरत से लौटकर


मंदी की उठा-पटक के बीच सूरत का चेहरा भले कई लोगों के लिए अब भी चमकदार लग रहा हो लेकिन इस चमक के पीछे एक ऐसा अंधेरा फैलता जा रहा है, जिसमें जिंदगी हारती जा रही है. मंदी के तूफान ने हीरे की मण्डी सूरत की सूरत कुछ ऐसी बिगाड़ी कि पिछली दीवाली से इस जुलाई के पहले हफ्ते तक हीरा-कारखाने के 39 मजदूरों ने अपनी जान दे दी. हालांकि गैरसरकारी आकड़ों में यह संख्या 90 के पार ठहरती है.

मंदी के तूफान ने हीरे की मण्डी सूरत की सूरत कुछ ऐसी बिगाड़ी कि दीवाली से जुलाई के पहले हफ्ते तक हीरा-कारखाने के 39 मजदूरों ने अपनी जान दे दी. हालांकि गैरसरकारी आकड़ों में यह संख्या 90 के पार ठहरती है.

पिछले कुछ समय में गुजरात के सबसे चमकदार शहर सूरत में हीरे की 10,000 से ज्यादा यूनिट बंद हुई, जिससे आठ लाख से ज्यादा मजदूर बेकार हो गए. पिछले साल नंवबर-दिसम्बर के दो महीनों में ही कम से कम एक लाख मजदूर शहर छोड़ चुके थे. आज की तारीख में यह आंकड़ा चार लाख के बाहर पहुंच चुका है और मज़दूरों के पलायन का यह सिलसिला अब तक जारी है. जनवरी के पहले हफ्ते में ही 5 इलाकों से स्कूलों के 4,500 बच्चों को फीस न भरने के चलते निकाला जा चुका था.

कायदे से सूरत का यह हाल एक 'राष्ट्रीय मुद्दा' होना चाहिए लेकिन राज्य के सारे राजनैतिक दल इन दिनों खामोश हैं. लोकसभा-चुनाव की लहर जा चुकी है, अब सिर पर सूरत-कारर्पोरेशन का चुनाव है. फिर भी हीरा-कारखाने के मजदूरों को राहत देने के सवाल पर हर तरफ सन्नाटा है.

एक नजर सूरत की सूरत पर

सूरत में हीरे की छोटी-बड़ी कुल 14,310 यूनिट हैं, जिसमें से 10,017 याने 70 फीसदी बंद हो चुकी हैं. सभी 14,310 यूनिट में 9,70,000 मजदूर काम करते थे, जिसमें से करीब 8,000000 याने 80 फीसदी से भी ज्यादा बेकार हो चुके हैं. बाकी बचे मजदूरों को अगर काम मिलता भी है तो उनके महीने की आमदनी (12,000) से आधी से आधी से आधी (15,00) हो गई है.


जमीनी पड़ताल के लिए एक छोटे-सा सर्वे देखते हैं. शहर के वारछा रोड़ पर हीरे की 2,59 यूनिट में से 80 के दरवाजे बंद हो चुके हैं. यहां की 1 यूनिट में औसतन 63 मजदूर थे, इस लिहाज से जोड़े तो 5,040 से ज्यादा मजदूरों के हाथों से मजदूरी निकली है. इसी तरह कापोदरा विस्तार की 5,97 यूनिट में से 2,43 में काम बंद है. यहां की 1 यूनिट से औसतन 75 मजदूर थे, यहां भी 18,225 से ज्यादा मजदूर बेकार हुए. यह ऐसी छोटी-छोटी यूनिट थीं जिनके पास अब कच्चा हीरा खरीदने के लिए पैसा नहीं बचा है.


श्यामधाम चौकड़ी, देवीकृपा सोसायटी के सूरज पटेरिया का यह 36 वां साल चल रहा था. गए साल तक उन्होंने खुदखुशी करने के बारे में सोचा भी नहीं होगा. लेकिन दीवाली के बाद सूरज ने दो बार जहर पीकर मरना चाहा. दोनों बार उन्हें पड़ोसियों ने बचा लिया.

एक तो भूख, ऊपर से अपने ही इलाज के खर्च ने उन्हें दिमागी तौर से भी लाचार बना दिया. तीसरी बार उन्होंने अपने को जलाकर खुदखुशी कर ली. अब उनके पीछे उनकी पत्नी अंजू बेन और चौथी में पढ़ने वाला लड़का राहुल है. इन दोनों को अपने आने वाले कल के बारे में कुछ खबर नहीं. अंजू बेन और राहुल केवल नाम भर हैं, सूरज में तो ऐसे परिवारों की एक लंबी सूची हैं, जिसमें नए-नए नाम जुड़ते जा रहे हैं.

सूरत-ए-हाल

देश के हीरा निर्यात में सूरत की हिस्सेदारी 24 अरब डालर के आसपास है. दीवाली के पहले अफ्रीका के एटेन्पर्व से काले पत्थर सूरत के कारखानों में आते थे. ऐसे पत्थरों को सूरत के 'रत्न कलाकार' कहे जाने वाले मजदूर तरासते और चमकदार हीरे में बदल देते.

लेकिन मंदी के मारे बीते अक्टूबर से एटेन्पर्व के काले पत्थरों का आयात बंद हो गया. यही कारण है कि पिछले 9 महीनों से हज़ारों हीरा कारखानों में ताले लटक गये हैं और मज़दूरों के सामने दो जून की रोटी के लाले पड़ गये हैं. शहर की सूरत में कभी चार चांद लगाने वालों की दुनिया फिलहाल घुप्प अंधियारे में है, जहां उजाले की कोई किरण नज़र नहीं आ रही.

सूरत में जब मंदी का शोर कुछ और बढ़ा तो बड़े-बड़े साहूकार मौके की नजाकत भांप गए और छोटी-छोटी यूनिट चलाने वालों का करोड़ो रूपए लेकर भाग गए. जैसे कतारगाम के हर्षद महाजन और घनश्याम पटेल को ही लें. यह दोनों ब्याज के 7 करोड़ रूपए लेकर लापता हैं. इसी तरह साजन तालुका का एक और महाजन जो मिनी बाजार और राजहंस टावर में 1,00-1,50 लोगों के साथ लेन-देन करता था; कोई साढ़े 5 करोड़ रूपए के साथ रफू-चक्कर है. इसलिए छोटी-छोटी यूनिट चलाने वालों के कारोबार ठप्प हुए और फिर बड़ी संख्या में मज़दूर सड़कों पर आ गये.

हीरा-व्यापारियों का हाल सुने तो पालिश्ड हीरे नहीं बिकने से उन्हें नकद नहीं मिल रहा है. इसलिए वह कच्चा हीरा खरीद ही नहीं सकते. तभी तो मिनी बाजार में हीरे के हजारों व्यापारियों का एक साथ जमा होना जैसे बीते कल की बात लगती है.

एक पहेली जिंदगानी

लेकिन सारे आकड़ों के बीच ऐसा पहलू भी छिपा है जो आज नहीं तो कल हालात को और उलझा सकता है. सूरत में 'फेक्ट्री एक्ट' के मद्देनजर हीरे की केवल 4,27 फैक्ट्रियां ही निबंधित हैं. लेकिन यहां चलने वाली फैक्ट्रियों की संख्या 14,310 है. मतलब ये कि सूरत की 13,883 फैक्ट्रियां निबंधित ही नहीं हैं.

असल में ज्यादातर मालिक 'टैक्स' से बचने, मजदूरों को 'पीएफ' और 'ईएसआई' जैसी सुविधाएं न देने के लिए 'फेक्ट्री एक्ट' को अनदेखा करते हैं. इसलिए 13,883 यूनिट से जुड़े करीब 9,40,000 मजदूर 'फेक्ट्री एक्ट' के दायरे से बाहर हैं. अभी तो यहां के एक भी हीरा-मजदूर को मुआवजा नहीं मिला है, लेकिन कल अगर मुआवजे की बात उठती है तो 'अन-रजिस्टर्ड' कही जाने वाली 13,883 फैक्ट्रियों के कोई 9 लाख 40 हज़ार मज़दूरों का क्या होगा ? क्या उन्हें मुआवजे का पात्र समझा जाएगा ?

हार गई जिंदगी

आकार अपार्टमेंट, कुबेरनगर की 'संदवी डायमण्ड' जैसी बड़ी कंपनी से जुड़े 40 साल के कल्पेश जादव की घर-गृहस्थी ठीक-ठाक चल रही थी. लेकिन 6 महीने तक काम न मिलने से वह खाली हाथ घर लौटते थे. एक रात जब वह लौटे तो खाने का एक दाना न होने पर पत्नी से जमकर झगड़ा हुआ. इसके बाद वह कहीं से 5 किलो चावल, 5 किलो आटा और 1 किलो तेल तो लाए लेकिन किसी को अनुमान नहीं था कि कल्पेश के मन में किस तरह का द्वंद्व चल रहा है. कल्पेश उस रोज ताप्ती नदी में ऐसे डूबे कि वापिस नहीं आए. कल्पेश ने मुक्ति पा ली, उनकी पत्नी अब अकेली है, बच्चे अभी से संघर्ष के दिन देखने के लिए रह गए हैं.

पुणागांव, विक्रम सोसायटी के अशोक भाई घाट ने 30 वें साल में कदम रखा था. उनकी बिटिया उन्नति 1 साल की होने वाली थी. अशोक भाई 'शिवजी डायमंड' कंपनी में थे. जब बेरोजगारी की नौबत आई तो उसका सामना करना उन्हें मुश्किल लगा और उन्होंने जहर पी कर अपनी जान दे दी.

उवली रोड़, मोहनदास सोसायटी के भरत ठुमरे ने 35 साल देख लिए थे. फांसी की रस्सी उन्हें जिंदगी की तंगी से कही ढ़ीली लगी होगी. इसलिए तो पत्नी और 10 साल से भी कम उम्र के दो बच्चों को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़कर चले गए.

कतारगाम में 60 साल की जीबी बेन अपने 34 साल के बेटे सूर्य की बेकारी देख न सकी, उन्होंने केरोसिन डालकर खुदखुशी कर ली. सूर्य 'शीतल डायमंड' कंपनी में काम करता था.

वह औरतें सबसे ज्यादा प्रभावित हुई हैं जो जैसे-तैसे अपने घर संभाल रही थीं. पति की लम्बी बेकारी ने उन्हें मायके जाने पर मजबूर किया. इन दिनों सौराष्ट्र से कुछ औरतों की खुदखुशी के मामले जोर पकड़ने लगे हैं. सबसे ज्यादा मजदूर सौराष्ट्र से ही आए थे. दूसरी तरफ कई मजदूरों की शादियां भी टूट रही हैं.

जो जिंदा हैं

19 जनवरी को 'सूरत डायमण्ड एसोसिएशन' की तरफ से बच्चों की स्कूल-फीस माफ करने के लिए फार्म बंटने वाले थे. तब 12,000 की भीड़ जमा हुई. लेकिन अफरा-तफरी के माहौल में पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा.

पुलिस की लाठी से 35 साल की बसंती बेन बगाणी बुरी तरह घायल हो गई. नवी शक्ति, विजय सोसायटी की बसंती बेन से जाना कि वह अपने 3 बच्चों, 4 साल के शिवम, 5 साल के जेनल और 7 साल के सावंत के लिए रात 2 बजे से ही लाइन में लगी थी. जैसे ही उनका नंबर आने को हुआ, लाठी चार्ज हुआ और उनका माथा फूट गया. जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है जनवरी के पहले हफ्ते में ही 5 इलाकों से स्कूलों के 4,500 बच्चों को फीस न भरने के चलते निकाला जा चुका था.

ठक्करनगर की कोकिला बेन से मालूम हुआ कि उनके पति 9 महीने से खाली हैं. उनके सिर पर अब तक 25,000 का कर्ज चढ़ चुका है. चिंटू कहकर बुलाने वाले बड़े लड़के ने 12 वीं 67 प्रतिशत के साथ पास की थी. लेकिन पैसे की मजबूरी से कालेज की पढ़ाई रूकी हुई है. कोकिला बेन कहती हैं- “पहले औरतों को घर में हीरे के पैकेट बनाने का काम मिल जाता था. इससे वह अपने खर्च-पानी के लिए महीने भर में 12,000 से 15,000 रूपए कमा लेती थीं. हीरे के कारखानों के बंद होते ही उनके खर्च-पानी का पैसा भी चला गया.”

आपके पति दूसरा काम तलाश सकते हैं ? जबाव में कोकिला बेन ने बताया कि जो आदमी अपनी कलाकारी से 12,000 रूपए महीना कमाता हो, जिसकी आमदनी के मुताबिक ही घर की जरूरतें बन गई हो, ऐसे में बिल्कुल आमदनी नहीं होने पर जरूरतें पहाड़-सी लगेगी ही. रही बात दूसरे काम की, तो कोई भी हीरा-मजदूर ऐसा चाहकर भी नहीं कर पाएगा. जो मजदूर 15-20 साल से हीरा तराशने जैसा काम करता हो, उससे मेहनत वाली मजदूरी बनेगी भी नहीं. उसे रात-दिन मेहनत से महीने भर में 15,00 ही मिलेंगे, अगर वह मेहनत वाले काम करना भी चाहे तो उसे मेहनत वाले काम देने से पहले हर कोई हिचकिचाएगा.

जबाव के इंतजार में...

24 जनवरी को ठक्कर नगर, डायमंड पार्क में राधा बोरसे जैसी 1,000 औरतों ने राज्य के मुखिया नरेन्द्र भाई (मोदी) को 1,000 पोस्ट-कार्ड भेजे. इन औरतों ने लिखा था कि घर में न अनाज है, न केरोसिन. दो टाइम खाने को तरस गए हैं. एक महीने से कोई सब्जी नहीं आई है. बच्चों की पढ़ाई भी रोक दी है. जल्दी मदद भेजिए वरना हमको भी सुसाइड करना पड़ेगा.

उन्होंने राज्य के मुखिया को यह पोस्ट-कार्ड इसलिए लिखा क्योंकि गुजरे विधान-सभा चुनाव के वक्त महिला-सम्मेलन में नरेन्द्र भाई गरजे थे- “तुम्हें कभी कोई परेशानी हो, भाई जानकर एक पोस्ट-कार्ड भर भेजा देना.” अब रक्षाबंधन आने को है, लेकिन सूरत की बहनों को गांधीनगर के भाई का जवाब नहीं मिला.

14 फरवरी को लोक-सभा चुनाव में राहुल भैया (गांधी) भी पधारे थे. उन्होंने अपने ही अंदाज में हीरा-मजदूरों से सीधी बात साधी थी. लोगों ने उनसे पूछा कि चलिए गुजरात सरकार ने हमारे लिए कुछ नहीं किया, केन्द्र सरकार क्या करने वाली है ?

जनता में एक ने उन्हें याद दिलाया कि जब केन्द्र सरकार 'सत्यम' जैसी (7,000 करोड़ का घोटाला करने वाली) कंपनी को बचाने के लिए राहत पैकेज दे सकती है तो देश के जो आम लोग अपनी मौत मर रहे हैं, उन्हें बचाने में इतनी देर क्यों ? राहुल कोई जबाव नहीं दे पाए. कांग्रेस ने दिल्ली में झण्डा फहराते ही जीत की पगड़ी राहुल गांधी के सिर पर बांधी है. इसके बाद तो वह ‘लाजबाव’ हो चुके हैं.

लोकसभा-चुनाव में भाजपा ने कहा- “दिल्ली वाले जाग रहे होते तो ऐसे हालात नहीं होते.” कांग्रेस ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को नया विशेषण दिया- “ कुंभकरण न जाने कब जागेंगे.” कांग्रेस के कार्यकर्ता यह तर्क देते भी घूमते रहे कि- “मामला सेंटर से नहीं, गांधीनगर से सुलझेगा.” इस तरह चुनाव के साथ यह आरोप-प्रत्यारोप भी गुजर गये, नहीं गुजरे तो आत्महत्याओं के हादसे. सांसद चुने गए, नहीं चुनी गई तो मजदूरों की मजबूरियां. सरकार भी बनी, नहीं बंधी तो पहले जैसे हालात बनने की उम्मीदें. वैसे मजदूरों के पास उम्मीद के अलावा और कुछ है भी नही.

लेकिन शहर के कुछ लोग, यहां तक की मीडिया का एक हिस्सा हीरा-कारखाने के सेठ लोगों से खफा है. उनके नजरिए से जब तक मुनाफे का धंधा चल रहा था तब तक तो मजदूरों की मेहनत और कलाकारी से सेठ लाखो से करोड़ो, करोड़ो से अरबो कमाते रहे. लेकिन जैसे ही मंदी ने मुंह दिखाया, सेठ लोगों ने मुंह मोड़ लिया. मजदूरों की उम्मीदें या जरूरतें लाखों-करोड़ों की नहीं हैं. ऐसे में सेठ लोगों को मजदूरों की मामूली जरूरतों में मददगार बनना ही चाहिए था. लेकिन उनकी तरफ से मदद की हवा तो दूर, मदद का एक पत्ता भी नहीं हिलता.

आत्महत्याएं ठण्डे बस्ते में

सूरत में हीरे की चमक नहीं लौट रही है. दो-एक महीने से आत्महत्याओं के मामले में कमी जरूर देखी गई है. यह किसी के विशेष प्रयासों का नतीजा नहीं हैं, यह तो हर दिन करीब तीन सौ मजदूर परिवारों के सूरत छोड़ने का नतीजा है. ऐसे में आत्महत्याओं के किस्से सूरत के आसपास फैल गए हैं. शहर से जाने वाले एक परिवार के जमेश और महेश (भाई-भाई) ने हाथ हिलाते हुए कहा- “दोबारा सूरत ही लौटेंगे.”

लेकिन सूरत में छाये संकट के बादल बरसने भर से खत्म नही होने वाले.

8.2.09

खबर नहीं बना विस्फोट



शिरीष खरे



26 जनवरी के 2 दिनों बाद मतलब 28 तारीख की दोपहर एक विस्फोट से बीड़ जिले का नेकनूर गांव दहल गया. वैसे तो इससे पूरा राष्ट्र और महाराष्ट्र दहलना चाहिए था लेकिन ऐसा हुआ नहीं. यह हादसा किसी आतंकवादी संगठन की साजिश नहीं बल्कि पटाखा फेक्ट्री मालिक की लापरवाही से हुआ. रात 10 बजते-बजते 10 जाने चली. तब तक एक चौंकाने वाला तथ्य यह निकला कि मरने वालों में 5 दलित और 2 मुस्लिम परिवारों के बाल मजदूर हैं. `चंदन फायर वक्र्स एण्ड माचिस फेक्ट्री´ नाम की इस फेक्ट्री के मालिक शेख सलीम और शेख नूर हैं.
इस धमाके से चारों तरफ आग फैल गई जिसमें 35 मजदूर झुलस गए. रिपोर्ट लिखे जाने तक कई मजदूरों की हालत गंभीर बनी हुई थी. इस हादसे के 96 घण्टे गुजरने के बावजूद जब प्रशासनिक उदासीनता बरकरार रही तो महाराश्ट्र के `बाल हक अभियान´ से जुड़े संगठनों ने मुख्यमंत्री अशोक राव चौहान को ज्ञापन लिखकर कड़ी प्रतिक्रया जतायी. इन्होंने फेक्ट्री कारखाने के मालिकों सहित जिम्मेदार अधिकारियों पर तुरंत कार्यवाही करने, मृतक बच्चे के परिवार को 5 लाख तथा घायलों को 1 लाख रूपए देने और ऐसी फैक्ट्रियों पर प्रतिबंध लगाने की मांग भी की है. `चाईल्ड राईटस एण्ड यू´ से सुधीर सुधल के मुताबिक- ``यह हादसा बताता है कि बाल मजदूरी के पीछे गरीबी और बेकारी किस तरह से काम कर रही हैं. साथ ही बाल मजदूरी पर सरकार और जिलाधिकारियों की सजगता की भी पोल घुलती है.´´ संस्था मानती है कि जब तक ऐसे बच्चों के परिवारों को रोजगार और आर्थिक स्थिरता नहीं मिलती तब तक यह समस्या खत्म नहीं होगी. इसलिए उपयोगी और आजीविका पर आधारित शिक्षा व्यवस्था पर जोर दिया जाए. इसके अलावा बाल-श्रम कानून, 1986´ के तहत बाल मजदूरों की कुल संख्या का सिर्फ 15 फीसदी हिस्सा ही लिया जाता है. इसलिए सभी उद्योगों में बाल मजदूरी पर रोक लगाना जरूरी है.
संस्था के विभिन्न शोध बताते हैं कि पूरी दुनिया में 24.6 करोड़ बाल मजदूर हैं जिसमें से सबसे ज्यादा 1.7 करोड भारत में ही हैं. इसमें से 10 फीसदी घेरलू और 85 फीसदी अंसगठित क्षेत्रों से हैं. बहुत सारे बच्चे खेत, खदान और पत्थरों का काम करते हैं. `अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन´ की रिपार्ट में देश भर के करीब 71 फीसदी बाल मजदूर स्कूल नहीं जाते. सबसे ज्यादा बाल मजदूर आंध्र-प्रदेश (14.5 फीसदी) में हैं. इस हिसाब से महाराष्ट्र का नम्बर चौथा (9.5 फीसदी) है. कहते हैं देश का सच्चा धन बैंको में नही बल्कि स्कूलों में होता हैं लेकिन शिक्षा और रोजगार की अनियमितताओं से कानून भी बेअसर हो जाते हैं. संविधान की `धारा-24´ में 14 साल से छोटे बच्चों को फैक्ट्री या खदान के कामों की मनाही है. वह अन्य खतरनाक कामों में भी शामिल नहीं हो सकते. `धारा-39 ई´ के अनुसार राज्य अपनी नीतियां इस तरह बनाए कि बच्चों का शोशण न हो पाए. `धारा-39 एफ´ बच्चों को नैतिक और भौतिक दुरूपयोग से बचाता है.
`फैक्ट्री कानून-48´ के मुताबिक 15 से 18 साल तक के किशोर किसी फेक्ट्री में तभी काम कर सकते हैं जब उन्हें मेडीकल-फिटनेस प्राप्त हो. यह कानून 14 से 18 साल के बच्चों को सिर्फ 4 घण्टे काम कराने की इजाजत देता है. 1986 के `बाल-श्रम कानून´ ने पटाखा, बीड़ी, कालीन, सीमेंट, कपड़ा, छपाई, दियासलाई, चमड़ा, साबुन और भवन निर्माण से जुड़ी फैक्ट्रियों में बच्चों के काम करने को खतरनाक माना. 1996 को सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को खतरनाक पेशों में लिप्त बच्चों की पहचान करने, उन्हें काम से हटाने और बेहतर शिक्षा देने के निर्देश दिए थे. 2006 को कानून में 14 साल से कम उम्र के बच्चों को घर, होटल या मंनोरंजन केन्द्रों तक में काम करने पर रोक लगा दी गई. साथ ही कानून न मानने वालों पर 3-10 महीने की जेल या 10-20 हजार रूपए जुर्माने का प्रावधान भी रखा. जाहिर है 1938 से अब तक बाल-श्रम कानून को कई तरह से जांचा-परखा और बदला गया. फिर भी संवैधानिक कानून और अदालती आदेशों की धज्जियां ही उड़ाई जाती रही.
बाल मजदूरों के विकास के लिए सरकारी बजट का मामूली हिस्सा ही खर्च होता है। इस दिशा में मार्च 2008 को मात्र 156 करोड़ रूपए आंवटित किए। जो पिछले साल के मुकाबले महज 3 करोड़ ही ज्यादा है. इस तरह एक बाल मजदूर को मात्र 10 रूपए महीना मिलेगा. यह रकम देश के 250 जिलों में चल रही करीब 9 हजार परियोजनाओं के लिए होगी. इसमें 9-14 साल तक के 4.5 लाख बच्चे हैं. ऐसे बच्चों के लिए श्रम मंत्रालय आवासीय स्कूल योजना बनाना चाहता है जो फिलहाल ठंडे बस्ते में है. हमारे तंत्र में बच्चों की जिम्मेदारी की ठीक-ठाक रूपरेखा तक नहीं. 6 साल तक के बच्चे `महिला एवं बाल विकास´ की जिम्मेदारी हैं. 6-14 साल तक के बच्चे 'शिक्षा विभाग´ के हवाले हैं. लेकिन 14-18 साल तक के बच्चों का रखवाला कोई नहीं. इसलिए ऐसे हादसों के बाद विभिन्न विभाग हालातों का सही जायजा लेने की बजाय एक-दूसरे की तरफ देखते हैं. नेकनूर गांव का विस्फोट ने यह भी बताया कि सस्ती मजदूरी से बाल-मजदूरी को बढ़ावा मिलता है. इस फेक्ट्री के मालिक अधिक काम के बदले बच्चों को कम पैसे देते थे. इस तरह वह अधिक काम का अतिरिक्त वेतन देने से भी बच जाते थे. देखा जाए तो 14 साल तक के बच्चों को 8 घण्टे के बदले अधिकतम 40 रूपए की ही मजदूरी मिल पाती है. इससे कई बच्चे 14 की उम्र तक आते-आते बीमार हो जाते हैं. सबसे ज्यादा बाल-मजदूर 12-15 साल के होते हैं. मतलब देश के भविश्य को समय से पहले ही बूढ़ा बनाया जा रहा है.