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8.11.10

प्राइवेट स्कूलों का कारोबार 5000 करोड़ रुपये के पार



प्राथमिक शिक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद मुंबई और उपनगरीय इलाकों में बच्चे बीएमसी स्कूलों से मुंह मोड़कर निजी स्कूलों की तरफ जा रहे हैं.

बीएमसी स्कूल में जहां मुफ्त में शिक्षा दी जाती है वहीं निजी स्कूलों में औसतन साल भर में एक बच्चे पर तकरीबन 25-30 हजार रुपये खर्च आता हैं. लाख कोशिशों के बावजूद निजी स्कूलों में डोनेशन प्रथा खत्म होने के बजाए और मजबूत होती जा रही है.

बच्चे को स्कूल में प्रवेश दिलाने के लिए औसतन 25 हजार रुपये बतौर डोनेशन देने पड़ते हैं. समाज सेवा के नाम पर चलाए जा रहे निजी स्कूलों का कारोबार हर साल करीबन 20 फीसदी की दर से बढ़ रहा है. आज शिक्षा कारोबार सालाना लगभग 5000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा का हो चुका है जिसकी सही-सही जानकारी किसी के पास नहीं है.

सरकार साल दर साल बीएमसी स्कूलों में बच्चों को अच्छी शिक्षा और सुविधा देने के लिए बजट बढ़ाती जा रही है, लेकिन बच्चों की संख्या हर साल कम होती जा रही है. बीएमसी ने स्कूल शिक्षा को मजबूत बनाने के लिए 2007-08 में 1,051 करोड़ रुपये और 2008-09 में 1,350 करोड़ रुपये का प्रवाधान किया था, जबकि इस साल (2009-10) बीएमसी शिक्षा पर 1,651 करोड़ रुपये खर्च करेगी.

बीएमसी के अलावा केन्द्र और राज्य सरकार भी स्कूली शिक्षा में भारी भरकम रकम खर्च करती है. बीएमसी स्कूलों में शिक्षा पूरी तरह से मुफ्त दी जाती है. बच्चों की फीस, कॉपी-किताबें, स्कूल यूनिफॉर्म के साथ मिड-डे मिल के तहत खिचड़ी और दोपहर में दूध भी बच्चों को मुफ्त में मिलता है. इसके बावजूद हर साल तकरीबन 30 हजार बच्चे बीएमसी स्कूलों से तौबा कर रहे हैं.

इन स्कूलों में बच्चों का आंकड़ा वर्ष 1999 में 7.5 लाख था, जबकि बीते शिक्षण सत्र में बीएमसी के कुल 1,144 स्कूल में 4.50 लाख ही बच्चों ने दाखिला लिया. इस सप्ताह से शुरू हो रहे नए शिक्षण सत्र में यह संख्या और कम होने की आशंका जताई जा रही है.

बृहन्मुंबई महानगरपालिका शिक्षक सभा के महासचिव एवं ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ टीचर्स ऑर्गनाइजेशन के निदेशक रमेश जोशी का का कहना है, 'बीएमसी स्कूलों में साल दर साल बच्चों की कम होती संख्या की मुख्य वजह लोगों की बदलती सोच है.'

उनके मुताबिक आज लोग सोचते हैं कि सिर्फ अंग्रेजी माध्यम में उनका बच्चा जाएगा तो ही उसका भविष्य संवर सकेगा. बीएमसी स्कूल तो गरीबों का स्कूल है, वहां बच्चा जाएगा तो समाज के लोग क्या कहेंगे? जबकि हमारे सरकारी स्कूलों में जो शिक्षक है वह निजी स्कूल के शिक्षकों के मुकाबले अधिक शिक्षित और प्रशिक्षित हैं.

मुंबई और आसपास के इलाकों में करीबन 2,000 निजी स्कूल हैं. जिनमें करीब-करीब 20 लाख बच्चे पढ़ते हैं और यह आंकड़ा सालाना करीबन 15 फीसदी की रफ्तार से बढ़ता जा रहा है. स्कूली शिक्षा आज सबसे सफल कारोबार बन गया है। निजी स्कूलों में फीस और दूसरे खर्च तय नहीं है.

सभी निजी स्कूलों की दरें अलग-अलग हैं. प्रवेश के समय इमारत या स्कूल के विकास के नाम पर लिये जाने वाली डोनेशन फीस इन स्कूल की आय का एकमुश्त सबसे बड़ा साधन है. तीन-चार साल के बच्चे के एडमिशन के लिए स्कूल प्रबंधन की ओर से मुंबई में 5 हजार रुपये से एक लाख रुपये तक बतौर डोनेशन फीस वसूली जाती है, जिसकी कोई लिखित जानकारी नहीं दी जाती है.

इसके अलावा प्रवेश शुल्क, साल में होने वाली दो परीक्षाओं के अलावा हर महीने टेस्ट फीस, टर्म फीस (पिकनिक और कल्चरल्स प्रोग्राम) को मिलाकर सालभर में एक छात्र से औसतन सालभर में 30 हजार रुपये तक ले लिये जाते हैं. ड्रेस और किताबें स्कूल की बताई हुई दुकानों से ही लेनी पड़ती हैं जो अपेक्षाकृत 20 फीसदी तक महंगी ही होती हैं.

मंहगी होती शिक्षा के बावजूद निजी स्कूलों की तरफ बढ़ते रुझान पर राहुल ग्रुप ऐंड स्कूल कॉलेज के चेयरमैन लल्लन तिवारी कहते हैं, 'लोग अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना चाहते हैं इसीलिए वह अच्छे स्कूल में बच्चे को भेजना चाहते हैं, जिसके लिए पैसा मायने नहीं रखता है.'

महंगे से महंगे स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे को भी कोचिंग का सहारा लेना पड़ रहा है. इस पर महेश टयूटोरियल कोचिंग के प्रबंध निदेशक महेश शेट्टी कहते हैं कि स्कूल में क्या पढ़ाया जाता है, हमे इससे कोई मतलब नहीं है। हमारा लक्ष्य होता है कि बच्चे परीक्षा में अधिक से अधिक नंबर ला पाए.

इसके लिए कोचिंग में नई तकनीक और रिसर्च के आधार पर बच्चों को शिक्षा दी जाती है. यही वजह है कि हर साल बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है, जबकि मंदी के बावजूद कोचिंग फीस में करीबन 15-20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.

लगातार हो रहे शिक्षा के निजीकरण को लेकर बच्चों की शिक्षा पर काम करने वाले स्वयंसेवी संस्था क्राई की निदेशक योगिता वर्मा का कहना है, 'संविधान में शिक्षा को मूलभूत आवश्यकता बताया गया है. इसलिए सबको शिक्षा देना सरकार का कर्तव्य बनता है. शिक्षा के निजीकरण को बंद करना चाहिए. अमेरिका और इंगलैड में सरकारी शिक्षा ही सही मानी जाती है.'

क्राई का मानना है कि सबको मुफ्त और एक जैसी शिक्षा दी जानी चाहिए. वैसे भी सरकारी स्कूलों के अध्यापक निजी स्कूल के अध्यापकों के मुकाबले ज्यादा योग्य होते हैं.

14.6.10

कमाठीपुरा की गलियों से

शिरीष खरे, मुंबई से


यह शहर के उठने का वक़्त है. बोरीबली से मुंबई सेंट्रल आने वाली लोकल के ठहरने के बीच का यह वक़्त, हजारों लोगों के दौड़ने का भी वक़्त है. मुंबई सेंट्रल से यात्रियों को अपने में समाए बेस्ट यानी ‘बॉम्बे एलेक्ट्रिक सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट’ की लालधारी बसों ने भी चौतरफ़ा दौड़ना शुरू कर दिया है. मुझे भी यहाँ से पैदल अब 15-20 मिनट ही चलना है, सिटी सेंटर से होते हुए सीधे कमाठीपुरा की गलियों की तरफ़.




अटपटे-से एहसासों से जुड़े कुछ सवाल लिए हुए बढ़ रहा हूँ. क्या आप जानते हैं कि रेडलाईट की यह गलियाँ सारी रात जागी हैं और ग्राहकों के इंतजार में अभी भी सोई नहीं हैं ?


यहाँ की गलियों ने यहाँ को बनते हुए देखा है. अंग्रेजों ने अपने सैनिकों के लिए यहाँ कभी ‘कम्फर्ट जोन’ बनवाया था और विदेशों से बड़ी तादाद में यौनकर्मियों को बुलवाया था. 1928 में यौनकर्मियों को लाइसेंस जारी किए थे. मगर 1950 में सरकार ने यौन व्यापार को प्रतिबंधित कर दिया था. इसके बावज़ूद यह इलाक़ा आज भारतीय यौनकर्मियों का बहुत बड़ा घर कहलाता है. यहाँ 200 से ज्य़ादा पिंज़रानुमा कोठरियों में 5000 से भी ज्यादा यौनकर्मियों का रहवास है.

आंध्रप्रदेश के कमाठी मजदूरों के नाम पर यह इलाक़ा कमाठीपुरा कहलाता है. एक ज़माने में गुजरात के वाघरी लोगों की भी यहाँ खासी तादाद थी. मगर अब तो बँगाल, नेपाल, कर्नाटक, तमिलनाडू, उड़ीसा, असम से आए लोग भी ख़ूब मिल जाया करते हैं.

कमाठीपुरा का यह पूरा इलाक़ा मौटे तौर से 16 गलियों में बटा है, 9 गलियों में सेक्स का कारोबार चलता है, ब़ाकी 5 गलियां रेसीडेंटल और बिज़नेस के लिए हैं. यह गलियाँ आगे जाकर नार्थबुक गार्डन, बैलेसिस रोड़, फाकलेंड रोड़ से जुड़कर अपनी पहचान ख़ोने लगती हैं.

बहरहाल, यहाँ की गलियों में भारी भीड़ के बीच से पैदल चलते हुए आदमी कुछ ज्य़ादा ही ठहर रहे हैं, वह चलते-चलते टकरा भी जाते हैं. हो सकता है कि मेरी तरह आपका दिल भी यहाँ धकधक की आवाज़ पर काबू पाने के चक्कर में बैठता जाए, और ज़ुबान अपनेआप सिलती जाए, दर्ज़नो आँखें उम्मीद लिए आपके ऊपर भी अटक जाएं, और मेरी तरह आपका बदन भी पीला पड़ता जाए.


कतरा-कतरा ज़िंदगी
मौसम तो ख़ुशनुमा है, मगर ख़ुली नालियों से आने वाली बदबू चारों ओर फैली रहती है. एक गली से दूसरी और तीसरी से चौथी में मुड़ता हूँ, मगर पूरा इलाक़ा इतना तंग और फ़ैला हुआ है कि दो-चार बार घूमने के बाद भी यह शायद ही समझ में आए.

इन्हीं गलियों में यौनकर्मियों की अनगिनत और अंतहीन कहानियाँ हैं. यहाँ से यौनव्यापार मौटे तौर पर चार तरीकों से चलते हुए देख रहा हूँ- एक तो अपने को सीधे बेचने वाली औरतों से, दूसरा पिंज़रानुमा कोठरियों की मालकिनों यानी घरवालियों से, तीसरा पिंज़रानुमा कोठरियों में कैद लड़कियों से और चौथा दारू के अड्डों से.

यह एक भरा पूरा बाज़ार है- नीचे दुकानें और ऊपर औरतें खड़ी हैं. शहर की ब़ाकी लड़कियां जब प्यार का खु़शनुमा एहसास लिए सोती-जागती हैं, यहाँ की लडकियाँ अपने को किसी के साथ भी किराए पर खुल्ला छोड़ देती हैं. शहर की ब़ाकी औरतों के लिए सुबह, शाम, रात होने के अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं, मगर यहाँ की औरतों के लिए सुबह, शाम, रात का एक ही अर्थ है- ग्राहकों को पकड़ना और उनसे पैसा कमाना. यह अपने ऊपर बेहिस़ाब पाऊडर, लिपिस्टिक, काजल, पर्स, सेंडल, जूड़े, सस्ती जेव्लरी क्या-क्या नहीं लादे हैं. इनके जींस, टीशर्ट, फ़िराक, सलवार-शूट, ब्लाउस, स्कर्ट, साड़ी में हर आकार और प्रकार के कट लगे हुए हैं. ऐसे में एक ग्राहक का काम यहाँ से वह माल छांटना है, जिसे तोड़मरोड़ कर अपने को हल्का कर सके, और कुछ और रातों तक आराम से सो तो सके.

आप यहाँ से देखिए- यह औरतें रंग-ढ़ंग और चाल-ढ़ाल से अपने ग्राहक को किस तरह से पहचान लेती है. दूसरी तरफ, आपको यहाँ आने वालों से भी यह पता लग सकता हैं कि यहाँ कौन-सी गलियाँ कितनी सही हैं, और क्यों हैं, उनमें कौन सी ज़मात वालों का असर ज्य़ादा है, उनका हिसाब-किताब क्या है, उनका धंधापानी कैसा है, कभी-कभार क्या-क्या लफड़ा हो सकता है, और उनसे कैसे-कैसे निपटा जा सकता है, वगैरह-वगैरह.

आप यहाँ से देखिए- एक जगह पर खड़ी होने के बावजूद यह पिंज़रानुमा कोठरी की दुनिया लोकल ट्रेन जैसी नहीं दिखती है, जो कुछ यात्रियों को उतारती है, और नए यात्रियों को चढ़ाकर एक मशीन सी चलती रहती है.

हां भाई सुनिए... एकदम नया आया है.. गलत नहीं ले जाऊंगा चलिए... नेपाली, बंगाली, साऊथ इंडियन सब हैं... पहले देख लीजिए... 12 से 16 का है... गोरा है देखने में क्या जाता है... इधर तो धंधा चलता है... उधर भी सस्ता ही है...

पिंज़रानुमा कोठरी के सामने खड़े हुए नहीं कि एक-एक करके बहुत सारे दलाल आपको घेरने लगते हैं. यहाँ तक कि फ़ोन नम्बर वाली पर्चियां भी देने लगते हैं. इनसे बगैर उलझे आगे बढ़ना ठीक है. वैसे इनकी भी अपनी कहानियाँ हैं. मगर अभी आगे बढ़ना ठीक है.

खै़र पिंज़रानुमा कोठरी के भीतर जैसे ही जाएंगे, वैसे ही आप दूसरी दुनिया में घुस जाएंगे. यहाँ लकड़ी की सीढ़ियों से लगे कुछ कोने, कोनों से दरवाजे, दरवाजों से ताबूतनुमा कमरे और कमरों के अंधियारे से बहुत सारी औरतें दिखाई देती हैं. यहाँ तक़रीबन 25 से 30 औरतों के साथ उनकी एक घरवाली भी दिखेगी. यहाँ औरतों की तादाद और उनकी उम्र से किसी घरवाली की सत्ता और उसकी संपत्ति का पता चलता है. यहाँ तक़रीबन आधी तो 22 साल से ज्य़ादा की नहीं हैं. यहाँ का बड़ा सीधा हिसाब है- 12 से 22 साल तक को ऊँचे दामों पर बेचो, और 30 से 35 साल के बाद घरवाली बन जाओ.


अब मेरी तरह आपको भी यहाँ किसी से सीधे-सीधे यह पूछना मुश्किल हो सकता है कि- "आप यहाँ तक कैसे पहुंचीं"... "वो कौन था जिसने आपसे पहली बार कहा कि पैसे कमाने का यह भी एक तरीका हो सकता है", इसलिए मेरी तरह आप भी यहाँ पहुँचकर हो सकता है कि- ‘आपका नाम...’ ‘आप कैसे हो’ से आगे न बढ़ पाएं.


मगर दिन के उजाले में एक इज्ज़तदार कहलवाने वाला आदमी जहाँ आने से कतराता है, वहाँ से मुझे लगता है कि सुबह से शाम तक का वक़्त ज़रूर बिताया जाए. यहाँ की कुछ सच्चाईयों से दो-चार हो जाया जाए और कोई नैतिक बहस छेड़े बगैर अपना ताज़ातरीन तजुर्बा बांट लिया जाए.


बड़ी बहन, छोटी बहन और...
‘याद आ रही है, तेरी याद आ रही है...’- ‘‘सुबह-सुबह पता नहीं क्यों आ रही है’’ कहते हुए जूही ने रेडियो बंद कर दिया है. आज के दिन पता नहीं कितनों दिनों के बाद वह पूरी नींद सो जाना चाहती है. दिन को जागना उसे कभी भी अच्छा नहीं लगा है. मगर उससे तो हरदम चुस्त रहने की उम्मीद की जाती है. इस उम्मीद के बगैर भी दुनिया चल सकेगी- वह सोच भी नहीं सकती है. शहर के बहुत से ठिकाने बदलने के बाद ही तो वह यहाँ तक आई है, और अब यही की होकर रह गई है.

यहाँ उम्र के पच्चीसवें साल में भी उसने अपने सीधेपन को संभाले रखा है. उसकी सुने तो उसमें अब पहले जैसी बात नहीं है. बचपना तो बहुत पहले ही ख़त्म हो चुका था, जवानी भी ख़त्म होने ही वाली है. असल में जूही की बड़ी बहन चंपा की शादी होने वाली है, इसलिए वह यहाँ हैं. इससे पहले चंपा भी यहाँ बैठ चुकी है. जुही कहती है कि उसके घर में अब कोई फूल (छोटी बहन) नहीं बचा है, इसलिए उसकी शादी के लिए यहाँ कौन बैठने वाली है, पता नहीं है. मगर ऐसा उसने मज़ाक में कहा है या वाकई संज़ीदगी से, यह भी तो पता नहीं चलता है.

वैसे भी उसके हिस्से में दिन और रात का अंतर नहीं बचा है. मौसम के मिजाज़, छुट्टी वाले दिनों या चौपाटी जाने जैसे ख़्यालों से भी जूही का कोई लेना-देना नहीं है. ग्राहक कितना सही है-यह भी उसे नहीं जानना है. शहर के नक़्शे की बजाय उसकी दुनिया के तार तो घनी बस्ती से भी सघन उस नेटवर्क से जुड़े हुए हैं जिसमें हजार रूपए का ग्राहक ढ़ूढ़ लेना सबसे बड़ी बात मान ली जाती है.


मां की तलाश में गोमती
इधर से सबसे आख़िरी के कमरे तक अगर नज़र पहुँचे तो कोई भी यह पूछ सकता है कि उधर रौशनी क्यों नहीं है- यह बात गोमती से अच्छा भला कौन जान सकता है, जिसे 8 साल की उम्र में यहां कैद किया गया था. दरअसल, नेपाल के काठमांडू की गोमती की मम्मी बचपन में मर चुकी थी. इसलिए वह अक्सर स्कूल के बाहर ही बैठी रहती थी. इतनी नाज़ुक उम्र में उसे क्या पता था कि स्कूल या मेले की ऐसी अकेली और गुमसुम बच्चियों पर दलालों की नज़र रहती है.

एक दलाल भी गोमती को कई दिनों से बतियाता और उसे बहलाता-फुसलाता था. उसने यह भी कहा था कि वह उसकी मम्मी को भी जानता है, और अगर वह किसी को कुछ न बताए तो एक दिन मिला भी सकता है. मगर एक दिन उसने गोमती को खाने में ऐसा कुछ दिया कि वह नेपाल से मुंबई तक होश में नहीं आई. यहाँ उसे घरवाली के हाथों बेच दिया गया. घरवाली ने उसे बहुत प्यार-दुलार दिया. उसने कहा मम्मी तुझे मेरे लिए ही तो छोड़ गई है, एक दिन आएगी. मगर गोमती की मम्मी है कि आज तक नहीं आई है.


गोमती बता रही है कि ऐसी लड़कियों को सालों तक कैद करके रखा जाता है. फिर कुछ सालों बाद उसकी बोली लगायी जाती है. अगर लड़की न माने तो उसे कई दिनों तक भूखा और नंगा रखा जाता है, मारा, पीटा और तड़पाया जाता है. मगर जैसे ही लड़की एक बार तैयार हो जाती है तो उसे हाथों हाथ लिया जाता है. जब तक वह कुछ जानती-समझती नहीं है, तब तक तो उससे होने वाली कमाई केवल घरवाली के हाथों में जाती है, मगर जैसे-जैसे लड़की सियानी होती है तो वह खाने, कपड़े, लत्ते के अलावा ग्राहक के पैसे से भी अपना हिस्सा मांगने लगती है.


हर एक बाज़ार में नई और आर्कषक चीज़ों की माँग हमेशा बनी रहती है. सेक्स का बाज़ार भी इसी सिद्धांत पर चलता है, यहाँ भी तो ज्य़ादातर ग्राहकों को कमसिन देह ही चाहिए. इसलिए यहाँ बच्चियों के देह व्यापार में हमेशा तेजी बनी रहती है. मगर बच्चियां भी कोई दिमागी तैयारी के साथ तो देह व्यापार में उतरती नहीं हैं, जो पहले से ही उन्हें सेक्स से जुड़ी जानकारियों का ज्ञान हो. इसलिए उनमें सेक्स से जुड़ी गंभीर बीमारियों की आशंकाए बढ़ जाती हैं. लिहाजा, न जाने कितनी गोमतियां एड्स नामक हालात की गिरफ़्त में आ जाती हैं.



बची रहना बिटिया
वैसे दुर्गा जैसी कई औरतें अपनी बच्चियों को ऐसे धंधे से दूर ही रखना चाहती हैं. इसके लिए वह यहाँ से दूर भिमंडी या मीरा रोड़ जैसी जगहों में रहती हैं. दुर्गा बता रही है कि बहुत कम माँएं अपनी बच्चियों को पढ़ा पा रही हैं. एक तो उनकी आधी से ज्यादा कमाई घरवाली, दलाल, डॉक्टर और साहूकार खा जाते हैं. दूसरा यह भी कि जैसे ही वह 30 की होती हैं, तो अक्सर कई तरह की बीमारियों से घिर जाती हैं, उनके सिर पर जब तक बहुत सारा क़र्ज़ भी चढ़ चुका होता है, और जब तक उनकी बच्चियां भी 12-13 साल की हो जाती हैं, जो कभी अपनी माँओं की बीमारियों, तो कभी उनके कर्जों को उतारने के लिए उन्हीं के नक़्शे-कदमों पर चल रही होती हैं.

वैसे बच्चियां जो देखती हैं, वही करती हैं. वह बचपन से मां के जैसा मेक़अप और व्यवहार देख-देखकर उनसे काफ़ी कुछ सीखा करती हैं. इस तरह उनमें आने वाली आदतें ताज़िंदगी आसानी से नहीं जाती हैं. दूसरी तरफ, कुछ बच्चियों को अपनी माँओं का ग्राहकों के साथ जाना अच्छा नहीं लगता है. कई तो पढ़ने में भी तेज होती हैं, मगर उन्हें सही रास्ता कोई नहीं बताता है, और अगर बताए भी तो घर से उतना सहयोग भी नहीं मिलता है. अक्सर घरवाली और दलाल भी उनसे उल्टी-सीधी बातें करके हतोत्साहित किया करते हैं. इसके अलावा, माँओं के ग्राहक भी उनका यौन-शोषण करना चाहते हैं.

अपनी बच्चियों को बचाने के लिए कुछ माँएं उन्हें अपने रिश्तेदारों के पास भेज देती हैं. कुछ माँएं 14-15 साल की उम्र में शादियाँ करा देती हैं. जबकि कुछ माँएं एनजीओ के पुनर्वास केन्द्रों में भेज देती हैं. मगर अपनी बच्चियों को पुनर्वास केन्द्रों तक भेजने वाली माँओं को यह डर भी रहता है कि अगर उनकी बच्ची सब जानने-समझने के बाद उनके पास नहीं आयी तो ? इसलिए यह माँएं बीच-बीच में अपनी बच्चियों को पुनर्वास केन्द्रों से बुलाती रहती हैं.


पुनर्वास के बजाय फिर धंधे में
कई पुनर्वास केन्द्रों की एक दिक्कत यह भी है कि उनमें केवल 7 से 12 साल तक के बच्चों को ही रखा जाता है. जया नाम की लड़की जैसे ही 13 की हुई, वैसे ही एक एनजीओ ने उसे यह कहकर अपने पुनर्वास केन्द्र से निकाल दिया कि तुम्हारी उम्र की लड़कियों को रखने की कोई व्यवस्था नहीं है. जया को उस समय पुनर्वास केन्द्र की सबसे ज्यादा ज़रुरत थी, क्योंकि उसकी मां का अपना कोई घर नहीं था और न ही वह उसे कहीं भेज सकती थी. इसलिए जया अपनी माँ के साथ रहने लगी और धीरे-धीरे उसी के धंधे में हाथ बटाने लगी. आज जया को एनजीओ वालों से नफ़रत हैं, वह एनजीओ के बारे में कहती है- "उनका काम तो सब ओर अपना काम दिखाना भर है, कोण्डम या गोली-दवाई देने के अलावा उनका कोई काम नहीं हैं."

यौनकर्मी बनने की बहुत सारी कहानियाँ पारिवारिक हिंसा-दुत्कार, अपराध, बलात्कार और ख़रीद-फ़रोख्त से भी जुड़ी हैं. मगर बाज़ार की फ़ितरत के हिसाब से यहाँ भी शोषण के लिए ज्य़ादातर उन लड़कियों को चुन लिया जाता है, जो पिछड़े और गरीब तबक़े से आती हैं. उनकी मज़बूरियों के ख़िलाफ उनके सारे सपने बहुत सस्ते और थोक में जो ख़रीद लिए जाते हैं.

भारत में यौनव्यापार को रोकने के लिए ‘भारतीय दण्ड विधान, 1860’ से लेकर ‘वेश्यावृत्ति उन्मूलन विधेयक, 1956’ बनाये गए हैं. इनदिनों कानून में बदलाव की चर्चाएं भी ज़ोरों पर चल रही हैं. मगर इस स्थिति की जड़ें तो बेकारी और पलायन से जुड़ी हुई हैं. इन उलझनों के आपसी जुड़ाव को अनदेखा किया जा रहा है. असलियत यह है कि यहाँ की औरतें घर पर बहुत सारा पैसा भेजने की बजाय दो टाइम की रोटी के लिए जूझ रही हैं. इसलिए नीतियों में इनके जीवन-स्तर को उठाने की बजाय इन्हें जीने के मौके देने वाले नियमों की बात हो तो बात बने भी.

कमाठीपुरा की गलियों से गुज़रते हुए आप कुछ और पिंज़रानुमा कोठरियों में भी घुस सकते हैं, कुछ और चरित्रों से भी बतिया सकते हैं. यहाँ के इन भागों को उनकी संपूर्णता में भी देख सकते हैं. दृश्यों को केवल दृश्य भर न मानकर, उनका विश्लेषण भी कर सकते हैं. बहुत सारे बिन्दुओं के मेलजोल से, एक कहानी को उपन्यास में भी बदल सकते हैं. मगर मेरे भीतर से कागज के फ़ूल, पाक़ीजा, उमराव ज़ान जैसी ओल्ड और गोल्ड फ़िल्मों की हिरोइनें हवा हो चुकी हैं... मेरे सामने केवल मंटो की काली सलवारें लटकी हैं.

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संपर्क : shirish2410@gmail.com

22.4.10

विश्व बैंक को इधर से देखिए

शिरीष खरे

विश्व बैंक की शर्तो के तहत गरीबी हटाने के नाम पर किए गए ढांचागत समायोजन कार्यक्रमों के परिणाम अब सर्वत्र दिखाई देने लगे हैं। भारत विश्व बैंक के 4 सर्वाधिक बड़े कर्जदारों में शामिल है। नव-उपनिवेशवादी नीतियों के कारण देश की 65 प्रतिशत आबादी का भरण-पोषण करने वाला कृषि क्षेत्र आज दयनीय हालत में है। हरित क्रांति की आत्ममुग्धता के बावजूद खाद्यान्न आत्मनिर्भरता लगातार कम हो रही है। विदेशी मुद्रा भण्डार का बड़ी मात्रा में उपयोग अनाज, दलहन और खाद्य तेलों के आयात में हो रहा है। निजी कंपनियों को खुली छूट देने से किसानों के लिए कृषि क्षेत्र घाटे का सौदा बनता जा रहा है। फुटकर बाजार में निजी क्षेत्र के प्रवेश ने छोटे-मोटे धंधों से रोजी कमाने वालों को बेकार कर दिया है। रियल एस्टेट में पैदा की गई बूम से आम आदमी के सिर पर छत भी सपना बन कर रह गई है। कुल मिलाकर, बड़े पैमाने पर लोगों को जमीन और रोजगार से बेदखल किया जा रहा है। एक लाख से अधिक अरबपतियों वाले देश में 30 करोड़ लोग दिन में 20 रूपये भी नहीं कमा पाते हैं।

वैसे तो विश्व बैंक का घोषित लक्ष्य दूसरे विश्व युद्ध से जर्जर देशों में ढांचागत सुविधाएं उपलब्ध करवाकर वहां का जीवन स्तर सुधारना था, लेकिन अब यह अपने बड़े निवेशक देशों जैसे अमेरिका, इंग्लैंड, जापान, जर्मनी और फ्रांस की निजी कंपनियों का हितसाधक बन गया है। ढांचागत समायोजन कार्यक्रम ने विश्व बैंक का काम बढ़ा दिया है। इसलिए उसने तीसरी दुनिया के देशों को अपने बाहुपाश में जकड़ने के लिए अंतर्राष्ट्रीय विकास संगठन, अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगमक, बहुपक्षीय निवेश गारंटी एजेंसी जैसी संस्थाएं गठित कर ली है। केवल इतना ही नहीं, उसने `अंतर्राष्ट्रीय निवेश विवाद निराकरण' नाम से अपना अलग न्यायालय भी बना लिया है, जहां देशों और कंपनियों के मध्य गुप्त् रूप से विवाद सुलझाए जाते हैं। जानकारी के मुताबिक, इन दिनों विश्व बैंक लगभग 90 देशों की अर्थव्यवस्थाओं को वहां के राजनीतिक और व्यावसायिक संपन्न वर्ग के सहयोग से काबू में करने में जुटा हुआ है।

अनुभव बताते हैं कि एक बार कोई गरीब देश विश्व बैंक समूह के जाल में फंस जाता है तो उसकी हालत बद से बदतर होती जाती है। मेक्सिको, अर्जेटाईना जैसे लातिनी अमेरिकी देश इसके उदाहरण है, जो अब इससे छुटकारा पाने के लिए कोशिशें कर रहे हैं । विश्व बैंक देश की नीति निर्धारण प्रक्रिया में अंदर तक घुस चुका है। भारत और विश्व बैंक के अधिकारियों की आपस में अदलाबदली आम है। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के अनुसार, विश्व बैंक में नौकरी कर चुके लोगों को देश में अत्यंत संवेदनशील और उच्च् पदों पर बैठाया जाता रहा है। पिछले वर्ष तो योजना आयोग में भी विदेशी फर्मो को अधिकृत रूप से सलाहकार बना दिया गया था। कहने के लिए तो विश्व बैंक खुलेपन का हिमायती है लेकिन व्यवहार में उसका चेहरा ऐसा नहीं है। सारे देश में लागू `सूचना का अधिकार कानून' भी विश्व बैंक की मजबूत चारदिवारी के सामने बेदम है। सामाजिक सरोकारों से उसका कोई इत्तेफाक नहीं रहा है। अपनी नीतियों के नकारात्मक परिणामों पर वह जनमत की उपेक्षा करता है। सन् 2002 में प्रकाशित `विश्व बांध आयोग' की रिपोर्ट को खारिज करते हुए उसने बड़े बांधो के लिए कर्ज देना जारी रखा है। भारत में निर्माणाधीन और प्रस्तावित कुछ बांधों में तो विश्व बैंक का वित्तपोषण है। लेकिन उसने आगे भी समर्थन का संकेत दिया है।

विश्व बैंक जिस तरह से देश की नीतियों को प्रभावित कर रहा है उससे आम आदमी का जीवन कष्टमय होता जा रहा है। विश्व बैंक की नीतियों से पीड़ित समाज के विभिन्न वर्गो ने विश्व बैंक को उसकी जनविरोधी नीतियों के प्रति खबरदार किया है। सितंबर 2007 को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर में विश्व बैंक के कामकाज को लेकर स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण (आईपीटी) की सुनवाई हुई थी। इसमें देश के विभिन्न स्थानों से आये प्रभावित समुदायों, लोक संगठनों के प्रतिनिधियों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों आदि ने हिस्सा लिया। इस दौरान विश्व बैंक की कार्यशैली पर प्रकाश डालते हुए 100 से अधिक वक्ताओं ने इसका इतिहास, मान्यता, एजेन्डा, भूमिका, अर्थव्यवस्था और राष्ट्र की संप्रभुता में हस्तक्षेप आदि के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, ऊर्जा, कृषि, वन, खनन, पर्यावरण, आवास, खाद्य-सुरक्षा, गरीबी और मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर अपने विश्लेषण प्रस्तुत किए। इस स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण का आयोजन विश्व बैंक समूह द्वारा वित्तपोषित परियोजनाओं पर निगरानी रखने के लिए किया गया था। इसे विश्व बैंक की नीतियों के प्रति बढ़ने प्रतिरोध के रूप में देखा जाना चाहिए। विश्व बैंक द्वारा न्यायाधिकरण के निष्कर्मो पर जवाब देना यह सिद्ध करता है कि जनआक्रोश की अवहेलना अब उसके लिए आसान नहीं है। उम्मीद करते हैं कि अब देश के प्रभावित समुदाय और बुद्धिजीवी विश्व बैंक की नीतियों पर लगाम लगाने की दिशा में लगातार प्रयासरत रहेंगे।

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संपर्क : shirish2410@gmail.com

26.9.09

हीरे की मण्डी में हारती जिन्दगी

शिरीष खरे, सूरत से लौटकर


मंदी की उठा-पटक के बीच सूरत का चेहरा भले कई लोगों के लिए अब भी चमकदार लग रहा हो लेकिन इस चमक के पीछे एक ऐसा अंधेरा फैलता जा रहा है, जिसमें जिंदगी हारती जा रही है. मंदी के तूफान ने हीरे की मण्डी सूरत की सूरत कुछ ऐसी बिगाड़ी कि पिछली दीवाली से इस जुलाई के पहले हफ्ते तक हीरा-कारखाने के 39 मजदूरों ने अपनी जान दे दी. हालांकि गैरसरकारी आकड़ों में यह संख्या 90 के पार ठहरती है.

मंदी के तूफान ने हीरे की मण्डी सूरत की सूरत कुछ ऐसी बिगाड़ी कि दीवाली से जुलाई के पहले हफ्ते तक हीरा-कारखाने के 39 मजदूरों ने अपनी जान दे दी. हालांकि गैरसरकारी आकड़ों में यह संख्या 90 के पार ठहरती है.

पिछले कुछ समय में गुजरात के सबसे चमकदार शहर सूरत में हीरे की 10,000 से ज्यादा यूनिट बंद हुई, जिससे आठ लाख से ज्यादा मजदूर बेकार हो गए. पिछले साल नंवबर-दिसम्बर के दो महीनों में ही कम से कम एक लाख मजदूर शहर छोड़ चुके थे. आज की तारीख में यह आंकड़ा चार लाख के बाहर पहुंच चुका है और मज़दूरों के पलायन का यह सिलसिला अब तक जारी है. जनवरी के पहले हफ्ते में ही 5 इलाकों से स्कूलों के 4,500 बच्चों को फीस न भरने के चलते निकाला जा चुका था.

कायदे से सूरत का यह हाल एक 'राष्ट्रीय मुद्दा' होना चाहिए लेकिन राज्य के सारे राजनैतिक दल इन दिनों खामोश हैं. लोकसभा-चुनाव की लहर जा चुकी है, अब सिर पर सूरत-कारर्पोरेशन का चुनाव है. फिर भी हीरा-कारखाने के मजदूरों को राहत देने के सवाल पर हर तरफ सन्नाटा है.

एक नजर सूरत की सूरत पर

सूरत में हीरे की छोटी-बड़ी कुल 14,310 यूनिट हैं, जिसमें से 10,017 याने 70 फीसदी बंद हो चुकी हैं. सभी 14,310 यूनिट में 9,70,000 मजदूर काम करते थे, जिसमें से करीब 8,000000 याने 80 फीसदी से भी ज्यादा बेकार हो चुके हैं. बाकी बचे मजदूरों को अगर काम मिलता भी है तो उनके महीने की आमदनी (12,000) से आधी से आधी से आधी (15,00) हो गई है.


जमीनी पड़ताल के लिए एक छोटे-सा सर्वे देखते हैं. शहर के वारछा रोड़ पर हीरे की 2,59 यूनिट में से 80 के दरवाजे बंद हो चुके हैं. यहां की 1 यूनिट में औसतन 63 मजदूर थे, इस लिहाज से जोड़े तो 5,040 से ज्यादा मजदूरों के हाथों से मजदूरी निकली है. इसी तरह कापोदरा विस्तार की 5,97 यूनिट में से 2,43 में काम बंद है. यहां की 1 यूनिट से औसतन 75 मजदूर थे, यहां भी 18,225 से ज्यादा मजदूर बेकार हुए. यह ऐसी छोटी-छोटी यूनिट थीं जिनके पास अब कच्चा हीरा खरीदने के लिए पैसा नहीं बचा है.


श्यामधाम चौकड़ी, देवीकृपा सोसायटी के सूरज पटेरिया का यह 36 वां साल चल रहा था. गए साल तक उन्होंने खुदखुशी करने के बारे में सोचा भी नहीं होगा. लेकिन दीवाली के बाद सूरज ने दो बार जहर पीकर मरना चाहा. दोनों बार उन्हें पड़ोसियों ने बचा लिया.

एक तो भूख, ऊपर से अपने ही इलाज के खर्च ने उन्हें दिमागी तौर से भी लाचार बना दिया. तीसरी बार उन्होंने अपने को जलाकर खुदखुशी कर ली. अब उनके पीछे उनकी पत्नी अंजू बेन और चौथी में पढ़ने वाला लड़का राहुल है. इन दोनों को अपने आने वाले कल के बारे में कुछ खबर नहीं. अंजू बेन और राहुल केवल नाम भर हैं, सूरज में तो ऐसे परिवारों की एक लंबी सूची हैं, जिसमें नए-नए नाम जुड़ते जा रहे हैं.

सूरत-ए-हाल

देश के हीरा निर्यात में सूरत की हिस्सेदारी 24 अरब डालर के आसपास है. दीवाली के पहले अफ्रीका के एटेन्पर्व से काले पत्थर सूरत के कारखानों में आते थे. ऐसे पत्थरों को सूरत के 'रत्न कलाकार' कहे जाने वाले मजदूर तरासते और चमकदार हीरे में बदल देते.

लेकिन मंदी के मारे बीते अक्टूबर से एटेन्पर्व के काले पत्थरों का आयात बंद हो गया. यही कारण है कि पिछले 9 महीनों से हज़ारों हीरा कारखानों में ताले लटक गये हैं और मज़दूरों के सामने दो जून की रोटी के लाले पड़ गये हैं. शहर की सूरत में कभी चार चांद लगाने वालों की दुनिया फिलहाल घुप्प अंधियारे में है, जहां उजाले की कोई किरण नज़र नहीं आ रही.

सूरत में जब मंदी का शोर कुछ और बढ़ा तो बड़े-बड़े साहूकार मौके की नजाकत भांप गए और छोटी-छोटी यूनिट चलाने वालों का करोड़ो रूपए लेकर भाग गए. जैसे कतारगाम के हर्षद महाजन और घनश्याम पटेल को ही लें. यह दोनों ब्याज के 7 करोड़ रूपए लेकर लापता हैं. इसी तरह साजन तालुका का एक और महाजन जो मिनी बाजार और राजहंस टावर में 1,00-1,50 लोगों के साथ लेन-देन करता था; कोई साढ़े 5 करोड़ रूपए के साथ रफू-चक्कर है. इसलिए छोटी-छोटी यूनिट चलाने वालों के कारोबार ठप्प हुए और फिर बड़ी संख्या में मज़दूर सड़कों पर आ गये.

हीरा-व्यापारियों का हाल सुने तो पालिश्ड हीरे नहीं बिकने से उन्हें नकद नहीं मिल रहा है. इसलिए वह कच्चा हीरा खरीद ही नहीं सकते. तभी तो मिनी बाजार में हीरे के हजारों व्यापारियों का एक साथ जमा होना जैसे बीते कल की बात लगती है.

एक पहेली जिंदगानी

लेकिन सारे आकड़ों के बीच ऐसा पहलू भी छिपा है जो आज नहीं तो कल हालात को और उलझा सकता है. सूरत में 'फेक्ट्री एक्ट' के मद्देनजर हीरे की केवल 4,27 फैक्ट्रियां ही निबंधित हैं. लेकिन यहां चलने वाली फैक्ट्रियों की संख्या 14,310 है. मतलब ये कि सूरत की 13,883 फैक्ट्रियां निबंधित ही नहीं हैं.

असल में ज्यादातर मालिक 'टैक्स' से बचने, मजदूरों को 'पीएफ' और 'ईएसआई' जैसी सुविधाएं न देने के लिए 'फेक्ट्री एक्ट' को अनदेखा करते हैं. इसलिए 13,883 यूनिट से जुड़े करीब 9,40,000 मजदूर 'फेक्ट्री एक्ट' के दायरे से बाहर हैं. अभी तो यहां के एक भी हीरा-मजदूर को मुआवजा नहीं मिला है, लेकिन कल अगर मुआवजे की बात उठती है तो 'अन-रजिस्टर्ड' कही जाने वाली 13,883 फैक्ट्रियों के कोई 9 लाख 40 हज़ार मज़दूरों का क्या होगा ? क्या उन्हें मुआवजे का पात्र समझा जाएगा ?

हार गई जिंदगी

आकार अपार्टमेंट, कुबेरनगर की 'संदवी डायमण्ड' जैसी बड़ी कंपनी से जुड़े 40 साल के कल्पेश जादव की घर-गृहस्थी ठीक-ठाक चल रही थी. लेकिन 6 महीने तक काम न मिलने से वह खाली हाथ घर लौटते थे. एक रात जब वह लौटे तो खाने का एक दाना न होने पर पत्नी से जमकर झगड़ा हुआ. इसके बाद वह कहीं से 5 किलो चावल, 5 किलो आटा और 1 किलो तेल तो लाए लेकिन किसी को अनुमान नहीं था कि कल्पेश के मन में किस तरह का द्वंद्व चल रहा है. कल्पेश उस रोज ताप्ती नदी में ऐसे डूबे कि वापिस नहीं आए. कल्पेश ने मुक्ति पा ली, उनकी पत्नी अब अकेली है, बच्चे अभी से संघर्ष के दिन देखने के लिए रह गए हैं.

पुणागांव, विक्रम सोसायटी के अशोक भाई घाट ने 30 वें साल में कदम रखा था. उनकी बिटिया उन्नति 1 साल की होने वाली थी. अशोक भाई 'शिवजी डायमंड' कंपनी में थे. जब बेरोजगारी की नौबत आई तो उसका सामना करना उन्हें मुश्किल लगा और उन्होंने जहर पी कर अपनी जान दे दी.

उवली रोड़, मोहनदास सोसायटी के भरत ठुमरे ने 35 साल देख लिए थे. फांसी की रस्सी उन्हें जिंदगी की तंगी से कही ढ़ीली लगी होगी. इसलिए तो पत्नी और 10 साल से भी कम उम्र के दो बच्चों को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़कर चले गए.

कतारगाम में 60 साल की जीबी बेन अपने 34 साल के बेटे सूर्य की बेकारी देख न सकी, उन्होंने केरोसिन डालकर खुदखुशी कर ली. सूर्य 'शीतल डायमंड' कंपनी में काम करता था.

वह औरतें सबसे ज्यादा प्रभावित हुई हैं जो जैसे-तैसे अपने घर संभाल रही थीं. पति की लम्बी बेकारी ने उन्हें मायके जाने पर मजबूर किया. इन दिनों सौराष्ट्र से कुछ औरतों की खुदखुशी के मामले जोर पकड़ने लगे हैं. सबसे ज्यादा मजदूर सौराष्ट्र से ही आए थे. दूसरी तरफ कई मजदूरों की शादियां भी टूट रही हैं.

जो जिंदा हैं

19 जनवरी को 'सूरत डायमण्ड एसोसिएशन' की तरफ से बच्चों की स्कूल-फीस माफ करने के लिए फार्म बंटने वाले थे. तब 12,000 की भीड़ जमा हुई. लेकिन अफरा-तफरी के माहौल में पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा.

पुलिस की लाठी से 35 साल की बसंती बेन बगाणी बुरी तरह घायल हो गई. नवी शक्ति, विजय सोसायटी की बसंती बेन से जाना कि वह अपने 3 बच्चों, 4 साल के शिवम, 5 साल के जेनल और 7 साल के सावंत के लिए रात 2 बजे से ही लाइन में लगी थी. जैसे ही उनका नंबर आने को हुआ, लाठी चार्ज हुआ और उनका माथा फूट गया. जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है जनवरी के पहले हफ्ते में ही 5 इलाकों से स्कूलों के 4,500 बच्चों को फीस न भरने के चलते निकाला जा चुका था.

ठक्करनगर की कोकिला बेन से मालूम हुआ कि उनके पति 9 महीने से खाली हैं. उनके सिर पर अब तक 25,000 का कर्ज चढ़ चुका है. चिंटू कहकर बुलाने वाले बड़े लड़के ने 12 वीं 67 प्रतिशत के साथ पास की थी. लेकिन पैसे की मजबूरी से कालेज की पढ़ाई रूकी हुई है. कोकिला बेन कहती हैं- “पहले औरतों को घर में हीरे के पैकेट बनाने का काम मिल जाता था. इससे वह अपने खर्च-पानी के लिए महीने भर में 12,000 से 15,000 रूपए कमा लेती थीं. हीरे के कारखानों के बंद होते ही उनके खर्च-पानी का पैसा भी चला गया.”

आपके पति दूसरा काम तलाश सकते हैं ? जबाव में कोकिला बेन ने बताया कि जो आदमी अपनी कलाकारी से 12,000 रूपए महीना कमाता हो, जिसकी आमदनी के मुताबिक ही घर की जरूरतें बन गई हो, ऐसे में बिल्कुल आमदनी नहीं होने पर जरूरतें पहाड़-सी लगेगी ही. रही बात दूसरे काम की, तो कोई भी हीरा-मजदूर ऐसा चाहकर भी नहीं कर पाएगा. जो मजदूर 15-20 साल से हीरा तराशने जैसा काम करता हो, उससे मेहनत वाली मजदूरी बनेगी भी नहीं. उसे रात-दिन मेहनत से महीने भर में 15,00 ही मिलेंगे, अगर वह मेहनत वाले काम करना भी चाहे तो उसे मेहनत वाले काम देने से पहले हर कोई हिचकिचाएगा.

जबाव के इंतजार में...

24 जनवरी को ठक्कर नगर, डायमंड पार्क में राधा बोरसे जैसी 1,000 औरतों ने राज्य के मुखिया नरेन्द्र भाई (मोदी) को 1,000 पोस्ट-कार्ड भेजे. इन औरतों ने लिखा था कि घर में न अनाज है, न केरोसिन. दो टाइम खाने को तरस गए हैं. एक महीने से कोई सब्जी नहीं आई है. बच्चों की पढ़ाई भी रोक दी है. जल्दी मदद भेजिए वरना हमको भी सुसाइड करना पड़ेगा.

उन्होंने राज्य के मुखिया को यह पोस्ट-कार्ड इसलिए लिखा क्योंकि गुजरे विधान-सभा चुनाव के वक्त महिला-सम्मेलन में नरेन्द्र भाई गरजे थे- “तुम्हें कभी कोई परेशानी हो, भाई जानकर एक पोस्ट-कार्ड भर भेजा देना.” अब रक्षाबंधन आने को है, लेकिन सूरत की बहनों को गांधीनगर के भाई का जवाब नहीं मिला.

14 फरवरी को लोक-सभा चुनाव में राहुल भैया (गांधी) भी पधारे थे. उन्होंने अपने ही अंदाज में हीरा-मजदूरों से सीधी बात साधी थी. लोगों ने उनसे पूछा कि चलिए गुजरात सरकार ने हमारे लिए कुछ नहीं किया, केन्द्र सरकार क्या करने वाली है ?

जनता में एक ने उन्हें याद दिलाया कि जब केन्द्र सरकार 'सत्यम' जैसी (7,000 करोड़ का घोटाला करने वाली) कंपनी को बचाने के लिए राहत पैकेज दे सकती है तो देश के जो आम लोग अपनी मौत मर रहे हैं, उन्हें बचाने में इतनी देर क्यों ? राहुल कोई जबाव नहीं दे पाए. कांग्रेस ने दिल्ली में झण्डा फहराते ही जीत की पगड़ी राहुल गांधी के सिर पर बांधी है. इसके बाद तो वह ‘लाजबाव’ हो चुके हैं.

लोकसभा-चुनाव में भाजपा ने कहा- “दिल्ली वाले जाग रहे होते तो ऐसे हालात नहीं होते.” कांग्रेस ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को नया विशेषण दिया- “ कुंभकरण न जाने कब जागेंगे.” कांग्रेस के कार्यकर्ता यह तर्क देते भी घूमते रहे कि- “मामला सेंटर से नहीं, गांधीनगर से सुलझेगा.” इस तरह चुनाव के साथ यह आरोप-प्रत्यारोप भी गुजर गये, नहीं गुजरे तो आत्महत्याओं के हादसे. सांसद चुने गए, नहीं चुनी गई तो मजदूरों की मजबूरियां. सरकार भी बनी, नहीं बंधी तो पहले जैसे हालात बनने की उम्मीदें. वैसे मजदूरों के पास उम्मीद के अलावा और कुछ है भी नही.

लेकिन शहर के कुछ लोग, यहां तक की मीडिया का एक हिस्सा हीरा-कारखाने के सेठ लोगों से खफा है. उनके नजरिए से जब तक मुनाफे का धंधा चल रहा था तब तक तो मजदूरों की मेहनत और कलाकारी से सेठ लाखो से करोड़ो, करोड़ो से अरबो कमाते रहे. लेकिन जैसे ही मंदी ने मुंह दिखाया, सेठ लोगों ने मुंह मोड़ लिया. मजदूरों की उम्मीदें या जरूरतें लाखों-करोड़ों की नहीं हैं. ऐसे में सेठ लोगों को मजदूरों की मामूली जरूरतों में मददगार बनना ही चाहिए था. लेकिन उनकी तरफ से मदद की हवा तो दूर, मदद का एक पत्ता भी नहीं हिलता.

आत्महत्याएं ठण्डे बस्ते में

सूरत में हीरे की चमक नहीं लौट रही है. दो-एक महीने से आत्महत्याओं के मामले में कमी जरूर देखी गई है. यह किसी के विशेष प्रयासों का नतीजा नहीं हैं, यह तो हर दिन करीब तीन सौ मजदूर परिवारों के सूरत छोड़ने का नतीजा है. ऐसे में आत्महत्याओं के किस्से सूरत के आसपास फैल गए हैं. शहर से जाने वाले एक परिवार के जमेश और महेश (भाई-भाई) ने हाथ हिलाते हुए कहा- “दोबारा सूरत ही लौटेंगे.”

लेकिन सूरत में छाये संकट के बादल बरसने भर से खत्म नही होने वाले.

9.7.09

सूरत जाकर देखें, 50,000 बच्चे काम पर है....

शिरीष खरे, सूरत से लौटकर

सूरत। यह सच है, लेकिन अधूरा कि देश की टेक्स्टाइल इंडस्ट्री में सूरत ‘रीढ़ की हड्डी’ है। यह सच इस तथ्य के साथ पूरा होगा कि देश के अलग-अलग कोनों से आये ‘बाल-मज़दूरों की बदौलत’ टेक्स्टाइल इंडस्ट्री में सूरत ‘रीढ़ की हड्डी’ है। इसमें गुजरात के ही एक-चौथाई से ज्यादा बाल-मज़दूर काम करते हैं। सरकारी आंकडों के हिसाब से सूरत में 5,000 बाल-मजदूर हैं, जबकि गैर-सरकारी आंकडों को देखे तो यह संख्या 50,000 से भी ऊपर है। इसमें 15 से 18 साल के 68 प्रतिशत बाल-मजदूर हैं। ‘राष्ट्रीय बाल-अधिकार संरक्षण आयोग’ भी यह मानता है कि गुजरात के सूरत, भावनगर और बनासकंथा जिलों में बाल मज़दूरी के मामले सबसे ज्यादा उजागर हुए हैं। इन जिलों के कुल मजदूरों में से 28.51 प्रतिशत बच्चे हैं। इसे देखते हुए 2010 तक गुजरात को बाल-मजदूरी से मुक्त करने का ‘राज्य-सरकारी संकल्प’ एक ‘मजाक’ नहीं तो और क्या है ?

सूरत के साउथ-ईस्ट जोन से बिजली की मशीनों वाली ‘खट-खट’ भरी आवाजे यूं ही नहीं आती हैं। 2001 की जनगणना के आकड़े बताते हैं कि यहां 4 लाख 50 हजार से ज्यादा पावरलूम हैं। 1951 के जमाने की रिपोर्ट में यह संख्या सिर्फ 2 हजार 2 सौ 82 ही थी। 1970 की रिपोर्ट में भी 19 हजार 25 की संख्या कोई खास नजर नहीं आती। लेकिन 1980 से 90 के बीच ऐसा क्या हुआ कि पावरलूम की संख्या 2 लाख के ऊपर पहुंच गयी और बीते एक दशक में तो यह संख्या दोगुनी से भी ज्यादा!! असल में बात यह है कि 70 के दशक से 1998 आते-आते यहां की 5 बड़ी टेक्स्टाइल मिलों में ‘एक के बाद एक’ ताला लगता गया, उनकी जगह पावरलूम की कई छोटी-छोटी इकाईयों ने ले ली। बड़ी-बड़ी मिलों के मजदूर-यूनियन एक तो मजबूत और संगठित होते थे, दूसरा उन्हें मोबीलाइजेशन में भी कोई परेशानी नहीं थी। लेकिन बड़ी मिलों में ताला लगने के हादसों ने मजदूरों की ऐसी कमर तोड़ी कि वह अपने-अपने यूनियनों के साथ दोबारा खड़े नहीं हो सके। वैसे तो सूरत में आज भी 1,60 यूनियन हैं, लेकिन कहने भर को। गली-गली में बिखरी पावरलूम फेक्ट्रियों के लगने से मजदूर एकता भी बिखर गई, उनसे उनके कानूनी हक और सुविधाएं छीन लिए गए, दिन-ब-दिन मजदूरों के शोषण में भी इजाफा हुआ। मालिकों ने मुनाफे के चक्कर में सस्ते और अकुशल मजदूरों के रूप में बच्चों की बड़ी तादाद को काम पर लगवाया। वह मजबूत यूनियनों की गैर मौजूदगी का फायदा उठाते हुए बाल-मजदूरी को लगातार पनाह देते गए। इन दिनों पावरलूम फेक्ट्रियों के मालिक पतले-पतले हजारों हाथों की मदद से 5 करोड़/रोज का टर्नओवर करते हैं, वह हर रोज 35 हजार से 1 लाख तक साड़िया बनवाते हैं। यह है एक खुशहाल उद्योग की खुशहाल कहानी, जो बदहाल बाल-मजदूरों की बदहाल तस्वीरों के बगैर पूरी नहीं होगी।
सूरत की टेक्स्टाइल इण्डस्ट्री के बाल-मजदूर 3 सेक्टर में बंटे हुए हैं। पहला, पावरलूम फेक्ट्री जहां कच्चा कपड़ा बनाया जाता है। यह कतारगाम, लिम्बायत, पाण्डेयसराय, उदना, फालसाबाड़ी, मफतनगर के आसपास के इलाके में ज्यादा हैं। पावरलूम फेक्ट्री के बच्चे मशीन में तेल डालने के अलावा मशीन ओपरेटर के हेल्पर बनते हैं। दूसरा सेक्टर है डाईंग फेक्ट्री। यहां कच्चे कपड़े को कलर किया जाता है। इसे खतरनाक इण्डस्ट्री इसलिए कहते है, क्योंकि इसमें नुकसानदायक केमीकल होते हैं, स्टीम के इस्तेमाल की वजह से आग लगने का डर रहता है और इसी से सूरत की ताप्ती नदी मटमैली हुई है। ताप्ती के किनारे-किनारे और पाण्डेयसराय के एक बड़े इलाके में 5,00 से ज्यादा डाईंग फेक्ट्री लगी हैं। डाईंग फेक्ट्री के बच्चे कपड़ा रंगने के बाद पक्के कहे जाने वाले कपड़े के भारी बण्डलों को उठाते हैं। डाईंग फेक्ट्री में किसी नए आदमी को घुसने नहीं दिया जाता। तीसरा सेक्टर है टेक्स्टाइल मार्केट। सूरत में टेक्स्टाइल मार्केट की 60 हजार से भी ज्यादा दुकाने हैं। यहां से देश-विदेश में कपड़ा बेचा जाता है। टेक्स्टाइल की ज्यादातर दुकाने बाम्बे मार्केट और न्यू बाम्बे मार्केट में हैं। इस मार्केट के बच्चे साड़ियों की कटिंग, धागों की बुनावट, पेकिंग, बोझा उठाना, उसे दो मंजिल ऊपर तक लाने-ले जाने के काम में लगे रहते हैं।
31 प्रतिशत बच्चे अकेले टेक्स्टाइल मार्केट में हैं, क्योंकि यहां उसे रोजाना 50 से 80 रूपए तक मिलते हैं जो पावरलूम फेक्ट्री के 20 से 25 रूपए से कहीं ज्यादा हैं। टेक्स्टाइल मार्केट में महीने के पूरे 30 दिन काम मिलता हैं और शिफ्ट बदलने की झंझट भी नहीं। दूसरी तरफ पावरलूम फेक्ट्री में कुशलता वाले मजदूर ही चाहिए, ऐसे में सस्ते हेल्पर बनकर रह जाने का डर हैं। टेक्स्टाइल मार्केट वाली पट्टी सूरत के रिंग-रोड़ के साथ-साथ बढ़ती चलती है, इधर काम करने वाले बच्चे 2 से 5 किलोमीटर दूर के इलाकों जैसे लिम्बायत, मीठी खाड़ी, संगम टेकरी, मफत-नगर और अंबेडकर-नगर से आते हैं। ऐसे बच्चे 2-3 किलोमीटर तक तो पैदल चलते हैं लेकिन 5 किलोमीटर के लिए रिक्शा शेयर करते हैं। ये बच्चे यहां सुबह 9 से रात को 10 तक काम करते हैं। टेक्स्टाइल मार्केट में राजस्थानी मारवाड़ियों का दबदबा है जो राजस्थान के गरीब परिवारों से कान्ट्रेक्ट करके उनके बच्चों को यहां ले आते हैं। ऐसे बच्चे बस्ती में नहीं, दुकान के आसपास ही ठिकाना बनाकर रहते हैं। इसलिए उन्हें काम के घण्टों का कोई अता-पता नहीं रहता।
टेक्सटाइल मार्केट के कामों से कई बच्चियां भी जुड़ी हुई हैं। उन्हें एक साड़ी में स्टोन लगाने और धागा काटने के बदले सिर्फ 50 पैसे मिलते हैं। अगर 4-5 बच्चियां मिलकर पूरा दिन भी काम करें तो भी हरेक के हिस्से में 10-12 रूपए ही आते हैं। इस किस्म के काम में ज्यादातर हरपति जनजाति की लड़कियां लगी हुई हैं।
कतारगाम की कई पावरलूम फेक्ट्रियों में देखा गया कि वहां बुनियादी सहूलियतों जैसे टायलेट, पानी की टंकी, वेंटीलेशन और पंखे नहीं हैं। फेक्ट्री में दाखिल होते ही चारों तरफ हल्का अंधियारा और फर्श पर तेल की मोटी परते दिखाई देती हैं। फेक्ट्री के बाहर कुछ मजदूरों से बातचीत में मालूम हुआ कि यहां जरूरत से ज्यादा काम और कम पैसे को लेकर चुप्पी साध ली जाती है। कई फेक्ट्रियों के मालिक रजिस्ट्रेशन नहीं करवाते, इससे उन्हे टेक्स से बचने का मौका तो मिलता ही है, मजदूरों को सुविधाएं देने से भी बच जाते हैं। रजिस्ट्रेशन न होने से फेक्ट्रियों की सही संख्या और काम करने वाले कुल मजदूरों का पता तक नहीं चलता। मजदूरों को न पहचान-पत्र मिलता है, न पीएफ, न ईएसआई। यहां तक कि किसी मजदूर की दुघर्टना होने पर उसे मुआवजा देने का सवाल भी नहीं उठता। यहां एक मजदूर पुरानी मशीनों से काम तो चलाता ही है, वह 4 से 6 मशीनों पर एक साथ काम भी करता है। यहां ज्यादातर मजदूरों की मांग है कि कपड़े के हर मीटर पर 1.25 रूपए मिले जबकि उन्हें हर मीटर पर मिलता है 1 रूपए। उन्हें मासिक वेतन की बजाय पीस रेट के हिसाब से मेहनताना दिया जाता है। यह बड़े मजदूरों का हाल है, बच्चों की हालत तो बदत्तर है।
लिम्बायत और मीठी खाड़ी के कई घरों में उत्तर-प्रदेश और बिहार के मुस्लिम बच्चे साड़ी पर जरी का काम करते हैं। ये बच्चे मुंबई के गोवण्डी से यहां लाये गए हैं। उधर लेवर कमीश्नर का जब दबाव बढ़ जाता है तो ऐसे बच्चों को इधर भेज दिया जाता है। जरी के काम में कई छोटे-छोटे बच्चे, खासकर बच्चियों को 1 खटिया के इर्द-गिर्द बैठाते हैं। 1 हाल में 10-15 बच्चे या बच्चियों के लिए ज्यादा से ज्यादा 4-5 खटियां लगाते हैं। यहां काम करने वाले सारे बच्चे 25 रूपए में 8 से 10 घण्टे तक एक ही जगह बैठे, आंखे गड़ाए और हाथ चलाते नजर आते हैं। यह काम घर पर ही होता है इसलिए बगैर सांस लिए रात और दिन चलता रहता है।
सूरत टेक्स्टाइल इण्डस्ट्री को कभी रीढ़ की हड्डी’ तो कभी ‘लम्बी मीनार’ की तरह देखा जाता है। हमेशा ऊपर देखने वालों को ध्यान उस नींव की तरफ नहीं जाता जिसमें अब तक असंख्य ‘नन्हे भविष्य’ दफन हो चुके हैं। यही वजह है कि यहां टेक्स्टाइल इण्डस्ट्री से जुड़े हर आकड़े का हिसाब-किताब और उसका पूरा ब्यौरा तो मिलता है, नहीं मिलता है तो बच्चों को प्यार भरे सपने देखने, चांद छूने जैसी ख्वाहिशे पालने, चार किताबे पढ़ने और हम जैसे बनने से रोके जाने का आकड़ा।