2.7.09

सरकारी स्कूलों की वकालत जरूरी है

'चाईल्ड राईट्स एण्ड यू’ में ‘विकास सहयोग’ विभाग के महाप्रबंधक कुमार नीलेन्दु से शिरीष खरे की बातचीत।

इस बार भी बोर्ड के नतीजे सबके सामने हैं। इस बार भी प्राइवेट स्कूलों के बच्चे आगे रहे। फिर भी ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ जैसी संस्थाए सरकारी स्कूलों की वकालत करती हैं। क्यों ?
प्राइवेट स्कूलों के लिए बोर्ड के नतीजे बढ़िया रहे क्योंकि वहाँ बच्चों को एडमिशन देने के पहले चुना जाता है। अब कठिन परीक्षाओं को पास करके आने वाले बच्चे तो बढ़िया नतीजे ही देंगे। फिर प्राइवेट स्कूल में अमीर बच्चों को ही लिया जाता है। उनके माँ-बाप को जरूरी लगा तो ट्यूशन भी लगवा लेते हैं। अगर इन सारी चीजों को हटा लिया जाए तो प्राइवेट स्कूलों के नतीजे भी दूसरे स्कूलों जैसे रहेंगे। एक बात यह भी है कि स्कूल की गुणवत्ता का मतलब महंगी बिल्डिंग, अंगेजी माध्यम और पढ़ाई के लिए काम आने वाली चीजों से लगाया जाता है। लेकिन बहुत कम सरकारी स्कूलों में ऐसी व्यवस्थाएँ मौजूद हैं। इसलिए प्राइवेट स्कूलों से मुकाबले की बातों का कोई मतलब नही।
सरकारी शिक्षक सही ढ़ंग से अपनी डयूटी निभा पाते तो नजीते इतने बुरे नहीं आते।
उनके हिस्से में बच्चों को पढ़ाने के अलावा भी बहुत-सी ‘नेशनल डयूटी’ हैं। प्राइवेट के शिक्षक चुनाव, जनगणना, पशुओं की गणना या ऐसे ही दूसरे कामों से बचे रहते हैं। यह कहने में कैसी झिझक कि एक सरकारी शिक्षक के ऊपर काम का बोझ बढ़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि स्कूल की पढ़ाई के दिनों में सरकारी शिक्षकों को चुनाव की डयूटी में न लगाया जाए। लेकिन अभी भी उन्हें लगाया जाता है। बुरे नतीजों के पीछे सरकारी शिक्षक और बच्चों के बीच का असंतुलित अनुपात भी जिम्मेदार है। आप सरकारी स्कूलों में बच्चों की भारी संख्या को देखिए, उसके मुकाबले आपको शिक्षकों की संख्या कुछ भी नहीं लगेगी।
एक ऐसा परिवार जो अपने बच्चों की मंहगी पढ़ाई का बोझ उठा सकता है, उसके सामने ‘सबकी शिक्षा एक समान’ जैसी बातों का क्या मतलब ? उसे तो ऐसी बातें स्कूल चुनने की आजादी को रोकने जैसी लगेगी ?
यही सवाल थोड़ा यूं भी तो देखिए कि अमीर को स्कूल चुनने की आजादी है, गरीब को नहीं। आजादी का अर्थ तो गरीब से गरीब को शिक्षा पाने का हक देता है। एक गरीब का बच्चा अपनी गरीबी की वजह से बराबरी और बेहतर शिक्षा से बेदखल क्यों रहे ? खासतौर पर प्राइमरी स्कूल से। अब तो प्राइमरी तक की पढ़ाई को मौलिक हक के रुप में अपना लिया गया है। फिर भी देश के 100 में से 60 बच्चे प्राइमरी स्कूल नहीं जाते। सीधी बात है, शिक्षा में असमानताएँ हैं। एक तरफ शिक्षा में असमानताएँ हैं, दूसरी तरफ निजीकरण की रफ़्तार के साथ सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक दूरियां बढ़ रही हैं। ऐसे में अलग-अलग तबको के बच्चों के हितों को देखना होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो प्राइवेट सेक्टर का कारोबार तो फलेगा-फूलेगा लेकिन सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक असमानताएँ दिन-ब-दिन बढ़ती जाएगी।
जब सभी बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे तो उनके बीच की असमानताओं के चलते दिक्कते नहीं आएँगी ?
यह बात लोकतंत्र के नजरिए से फिट नहीं बैठती। अब तो दुनिया भर की किताबों में समाज और स्कूल की विविधताओं को न केवल स्वीकार किया जा रहा है, उनका सम्मान भी किया जा रहा है। कई देशों जैसे अमेरिका या इंग्लैण्ड में अलग-अलग तबको से आने वाले बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। वहाँ अलग-अलग योग्यता रखने वाले बच्चे एक साथ बैठते-उठते हैं, सभी बराबरी के साथ बेहतर मौके तलाशते हैं। वहाँ की शिक्षा पब्लिक के हाथों में है। वहाँ के स्कूलों से ऊंच-नीच की सारी असमानताओं को हटा दिया गया है। वहाँ के स्कूलों में प्रवेश के पहले चुना जाना जरूरी नहीं है।
...और भारत में ?
यहाँ प्राइवेट स्कूलों पर ज्यादा भरोसा किया जाता है। इससे प्राइवेट सेक्टर से जुड़े लोगों को मनमाने तरीके से मुनाफा कमाने का मौका मिलता है। दूसरी तरफ कहने को सरकार की कई योजनाएँ हैं। लेकिन सबके अर्थ अलग-अलग हैं। जैसे कुछ योजनाएँ शिक्षा के लिए तो कुछ महज साक्षरता को बढ़ाने के लिए चल रही हैं। इसकी जगह सरकार को एक ऐसे स्कूल की योजना बनानी चाहिए जो सारे अंतरों का लिहाज किए बगैर सारे बच्चों के लिए खुली हो।
इसी तरह सरकारी स्कूलों में भी तो असमानताएँ हैं ?
बिल्कुल, जैसे केन्द्रीय कर्मचारियों के बच्चों के लिए केन्द्रीय स्कूल, सैनिकों के बच्चों के लिए सैनिक स्कूल, मेरिट लिस्ट के बच्चों के लिए नवोदय स्कूल। बात साफ है कि सभी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ताएँ अलग-अलग हैं। इसी तरह शिक्षक को चुने जाने के लिए भी अलग-अलग स्कूलों में योग्यता के अलग-अलग पैमाने रखे गए हैं।
लेकिन समाज की असमानता का क्या किया जाए ?
समाज में जो भेदभाव है, वही तो स्कूल की चारदीवारी में हैं। इसलिए समाज से स्कूल में घुसने वाले उन कारणों को तलाशना होगा जो ऊंच-नीच की भावना बढ़ाते हैं। अगर समाज में समानता लानी ही है तो सबसे अच्छा तो यही रहेगा कि इसकी शुरूआत शिक्षा और बच्चों से ही की जाए।
सबके लिए एक समान स्कूल की बात इतनी सीधी है ?
जब पानी से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य तक की चीजों को बाजार में घसीटा जा रहा हो तो यह बात बेतुकी लग सकती है। लेकिन शिक्षा की जर्जर हालत को देखते हुए तो यह बात बड़े तुक की लगती है। कोठारी आयोग (1964-66) ऐसा पहला आयोग था जिसने सामाजिक बदलावों के लिए बहुत अच्छे सुझाव दिए। उसने देश भर के लिए एक ऐसी व्यवस्था बनाने की बात कही जिसमें हर तबके के बच्चे एक साथ पढ़े-बढ़े। उसने यह भी कहा था कि सबके लिए एक समान शिक्षा नहीं रही तो समाज के ताकतवर लोग सरकारी स्कूलों को छोड देंगे और प्राइवेट की शरण में जाएँगे। इसके बाद हम देखते हैं कि 1970 के बाद से सरकारी स्कूलों की हालात बद से बदत्तर होतक चले गए। सरकार का ध्यान इस तरफ कभी नहीं गया ? वह 1968, 1986 और 1992 की शिक्षा नीतियों में समान स्कूल व्यवस्था की बात तो करती है लेकिन उसे लागू नहीं करती। 2001 में संसद ने शिक्षा का मौलिक हक तो दिया लेकिन देश में शिक्षा की दोहरी नीति को भी जारी रखा।
विकलांग बच्चों के एडमिशन को लेकर प्राइवेट स्कूल कानून से बंधे नहीं होते। जबकि पीडब्ल्यूडी एक्ट के तहत सरकारी स्कूलों में ऐसे बच्चों को लेना जरूरी है। यह भी तो शिक्षा की दोहरी नीति ही है।
हाँ, वैसे इस किस्म के सभी बच्चों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समावेशी शिक्षा आंदोलन चल रहा है। यह शिक्षा या स्कूलों में फैली छोटी-बड़ी गड़बड़ियों को ढ़ूढ़ने और उनसे निजात पाने का शुरूआती कदम है। दूसरा, यह आंदोलन हमारे आसपास की ऐसी कई विविधताओं का पता लगा रहा है जो असमानताएँ फैलाती है। यहाँ समावेशी शिक्षा का मतलब केवल विकलांग बच्चों की शिक्षा से ही नहीं है। इसका मतलब तो सभी किस्म की विविधताओं को सभी पहलुओं से देखने, समझने और उसे शामिल करना भी है।

2 टिप्‍पणियां:

महामंत्री - तस्लीम ने कहा…

नीलेन्‍दु जी के विचारों से अवगत कराने के लिए शुक्रिया।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

creativekona ने कहा…

शिरीष जी ,
कुमार नीलेंदु जी से बातचीत कर उनके विचारों से अवगत कराने के लिए आपका आभार .वैसे भारत की वर्त्तमान शिक्षा व्यवस्था के बारे में मैनें एक लेख कुछ दिनों पहले अपने ब्लॉग पर लिखा था ,जिसमें मैनें भारत के प्राइवेट एवं सरकारी स्कूलों का मुद्दा भी उठाया था ....बहुत सीधी सी बात है अभी हमारे देश में जितने तरह के स्कूल हैं (परिषदीय ,प्राइवेट .मिशनरी कान्वेंट ,सेमीकान्वेंत ,मदरसे ,सरस्वती शिशु मंदिर .....सब के अलग अलग स्तर ...अलग अलग पाठ्यक्रम ...तो ऎसी स्थिति में ये बच्चे कहाँ आगे चलकर बोर्ड की या और भी आगे प्रतियोगी परीक्षाओं में एक स्तर पर मुकाबला कर सकेंगे .
इसलिए मुझे तो लगता है की शिक्षा की स्थिति में सुधार लाने के लिए सबसे पहले प्राथमिक स्तर की पूरी शिक्षा व्यवस्था (स्कूल ,पाठ्यक्रम ,भाषा )में एकरूपता लाने की जरूरत है .तभी शायद भारत की शिक्षा के स्तर में कुछ सुधार आ सकेगा .
हेमंत कुमार