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15.9.10

गर्त में गये गांव

शिरीष खरे





गांवों की कहानी आकड़ों की जुबानी : 2021 तक भारत में महानगरों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा होगी और हर महानगर में 1 करोड़ से ज्यादा लोग रह रहे होंगे. अमेरिकन इंडिया फाऊंडेशन ऐसा मानता है और वहीं भारत सरकार की जनगणना के मुताबिक भी बीते एक दशक में गांवों से तकरीबन 10 करोड़ लोगों ने पलायन किया है. जबकि निवास स्थान छोड़ने के आधार पर 30 करोड़ 90 हजार लोगों ने अपना निवास स्थान छोड़ा है. योजना आयोग के मुताबिक 1999-2000 में अप्रवासी मजदूरों की कुल संख्या 10 करोड़ 27 हजार थी. जबकि मौसमी पलायन करने वालों की संख्या 2 करोड़ से ज्यादा अनुमानित की गई. कई जानकारों की राय में असली संख्या सरकारी आंकड़े से 10 गुना ज्यादा भी हो सकती है.

2000 की राष्ट्रीय कृषि नीति में कहा गया था कि कृषि अपेक्षाकृत लाभ का पेशा नहीं रह गया है. योजना आयोग के मुताबिक 1990 के दशक के मध्यवर्ती सालों में कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों की बढ़ोत्तरी घटती चली गई है. सिंचाई के साधन वाले भूमि क्षेत्र और सिंचाई के लिए बारिश के पानी पर निर्भर भूमि क्षेत्र के बीच आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है. विश्व-बाजार में मूल्यों का तेज उतार-चढ़ाव से नकदी फसलों का उत्पादन करने वाले क्षेत्रों को घाटा उठाना पड़ रहा है. इसके चलते बड़ी संख्या में किसानों द्वारा खेती का काम छोड़कर शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं. बीते लंबे अरसे से कृषि में लाभ की स्थितियों के मुकाबले लागत और जोखिम लगातार बढ़ रहे हैं और सरकारी सहायता लगातार कम होती जा रही है. 1960 में प्रति किसान भूस्वामित्व की ईकाई का आकार 2.6 हेक्टेयर था जो 2000 में घटकर 1.4 हेक्टेयर रह गया. कुलमिलाकर बीते चार दशकों में भूस्वामित्व की ईकाई का आकार 60% घटा है. भारत के किसानों को मिलने वाली सब्सिडी(66 डॉलर) विकसित देशों जैसे अमेरिका के किसानों को मिलने वाली सब्सिडी(21 हजार डॉलर) के मुकाबले न के बराबर है. 1995 में कुल आबादी का 54.6% हिस्सा खेतिहर आबादी का था जो 2005 में घटकर 49.9% रह गया.

योजना आयोग के मुताबिक 1983 से 1994 के बीच रोजगार में बढ़ोत्तरी की दर 2.03 % थी जो साल 1994 से 2005 के बीच घटकर 1.85% हो गई. 2005 में असंगठित क्षेत्र में खेतिहर मजदूरों की संख्या 98% थी. तकरीबन खेतिहर मजदूरों में 64% का अपना रोजगार है जबकि 36% दिहाड़ी मजदूर हैं. 1983 से 1994 के बीच रोजगार की दर 1.04% थी जो 1994 से 2005 के बीच घटकर 0.08% हो गई. 1994 से 2005 के बीच बेरोजगारी की दर में 1% की बढ़ोतरी हुई. इसी तरह, 1983 से 1994 के बीच रोजगार की बढ़ोतरी की दर 2.03% थी जो 1994 से 2005 के बीच घटकर 1.85% हो गई. योजना आयोग के अनुसार एक किसान परिवार का औसत मासिक खर्च 2770 रुपये है जबकि खेती के अलावा दिहाड़ी मजदूरी सहित अन्य स्रोतों से उसकी औसत मासिक आमदनी 2115 रुपये होती है. जाहिर है एक किसान परिवार का औसत मासिक खर्च उसकी मासिक आमदनी से तकरीबन 25% ज्यादा है. इसीलिये भारतीय किसानों को कर्ज लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है.

बीते 12 सालों में 2 लाख किसानों ने आत्महत्याएं की हैं. इनमें से अधिकतर किसान कपास और सूरजमुखी जैसी नकदी फसल की खेती करने वाले रहे हैं. उत्पादन की लागत बढ़ने के चलते ऐसे किसानों को साहूकारों से ऊंचे ब्याज दर पर कर्ज लेना पड़ा है. कीटनाशक और उर्वरक बेचने वाली कंपनियों ने महाराष्ट्र और कर्नाटक में किसानों को कर्ज देना शुरु किया, जिससे किसानों के पर कर्ज का बोझ और बढ़ गया. एक तो गरीब किसानों की आमदनी बहुत कम है और कर्ज लेने के कारण (शादी ब्याह वगैरह) कहीं ज्यादा होने से वह भंवरजाल से निकल नहीं पा रहे हैं.

योजना आयोग द्वारा प्रस्तुत ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के मुताबिक ग्रामीण गरीबों की कुल संख्या का 41% हिस्सा खेतिहर-मजदूर वर्ग से है. जबकि ग्रामीण गरीबों की कुल संख्या का 80% हिस्सा अनसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग से हैं. खाद्य व कृषि संगठन द्वारा विश्व में आहार-असुरक्षा की स्थिति पर जारी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में तकरीबन 23 करोड़ यानी 21% लोगों को रोजाना भर पेट भोजन नहीं मिलता है. 1983 में ग्रामीण भारत के हर आदमी को रोजाना औसतन 2309 किलो कैलोरी का आहार हासिल था जो साल 1998 में घटकर 2011 किलो कैलोरी रह गया. 1990 के दशक में मजदूरों और किसानों की खरीददारी की क्षमता में काफी कमी आई. इससे जहां ग्रामीण भारत में खेतिहर संकट गहराया तो वहीं अनाज के सरकारी गोदामों में अनाज सड़ता रहा. न्यूट्रिशनल इंटेक इन इंडिया के मुताबिक 1993-94 में प्रतिव्यक्ति रोजाना औसत कैलोरी उपभोग की मात्रा 2153 किलो कैलोरी थी जो साल 2004-05 में घटकर 2047 किलो कैलोरी हो गई. इस तरह कुल 106 किलो कैलोरी की कमी आई. ग्रामीण इलाकों में तकरीबन 66% आबादी रोजाना 2700 किलो कैलोरी से कम का उपभोग करती है. विश्वबैंक के अनुसार औसत से कम वजन के सबसे ज्यादा बच्चे भारत में ही हैं. भारत में 5 राज्यों और 50% गांवों में कुल कुपोषितों की तादाद का 80% हिस्सा रहता है. 5 साल से कम उम्र के 75% बच्चों में आयरन की कमी है और 57% बच्चों में विटामिन ए की कमी से पैदा होने वाले रोग के लक्षण हैं. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के दौरान औसत से कम वजन के बच्चों की संख्या शहरों के(38%) मुकाबले गांवों में(50%) ज्यादा पाई गई. जबकि औसत से कम वजन के बच्चों की संख्या में लड़कों(45%) की तुलना में लड़कियों(53.2%) ज्यादा पाई गईं. अगर जातिगत आधार पर देखा जाए तो अनुसूचित जाति के बच्चों में 53% और अनुसूचित जनजाति के बच्चों में 56% बच्चे औसत से कम वजन के पाये गए. जबकि बाकी जातियों में उनकी संख्या 44% है. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार ग्रामीण भारत में 18.7% परिवारों के पास सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत जारी किया जाने वाला कोई भी कार्ड नहीं है.

एनुअल स्टेटस् ऑव एजुकेशन रिपोर्ट( असर) 2008 के मुताबिक ग्रामीण इलाकों के अनुसूचित जनजाति के तबके में साक्षरता दर सबसे कम(42%) पायी गई है. जबकि अनुसूचित जाति के के तबके में साक्षरता दर(47%) है. सबसे कम भूमि पर अधिकार रखने वाले वर्ग में साक्षरता दर 52% है. जबकि सबसे बड़े आकार की ज्यादा भूमि पर अधिकार रखने वाले वर्ग में साक्षरता दर 64% है. शिक्षा के हर पैमाने पर पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की मौजूदगी कम है. ग्रामीण इलाके की महिलाओं और पुरुषों के बीच साक्षरता दर क्रमशः 51.1% और 68.4%,पायी गई. 2009 में 5 साल की उम्र वाले 50% बच्चे ही स्कूलों में नामांकित पाये गए.

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के मुताबिक तकरीबन 25% भारतीय सिर्फ अस्पताली खर्चे के कारण गरीबी रेखा से नीचे हैं. महज 10% भारतीयों के पास कोई न कोई स्वास्थ्य बीमा है और ये बीमा भी उनकी जरुरतों के मुताबिक नहीं है. वॉलेंटेरी हैल्थ एसोशिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक डॉक्टरों की संख्या कम होना भी एक बड़ी समस्या है. देश में एक हजार की आबादी पर महज 0.6 एमबीबीएस डॉक्टर ही हैं. इसी तरह दवाइयों के दामों में तेज गति से बढ़ोतरी हुई है. मरीज को उपचार के लिए अपने खर्च का औसतन 75% हिस्सा दवाइयों पर न्यौछावर करना पड़ता है. दवाइयां मंहगी होने की मुख्य वजहों में नये पेटेंट कानून, दवा निर्माताओं के ऊपर कानूनों का उचित तरीके से लागू न होना और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक दवाओं का बाजार में प्रचलित होना है. यह भी दक्षिण के राज्यों या धनी राज्यों में ज्यादा हैं. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 के अनुसार गांवों में 43% महिलाओं को प्रसव से पहले कम से कम तीन बार अनिवार्य रूप से चिकित्सा की सुविधा मिल पाती है. शिशु-मृत्यु दर के मामले में प्रति हजार नवजात शिशुओं में से औसतन 60 काल के गाल में समा जाते हैं. 12-13 महीने के नवजात शिशुओं में से महज 44% को ही सभी प्रकार के रोग-प्रतिरोधी टीके लग पाते हैं.

भारत का मानव विकास सूचकांक 0.619 है. यह कुल 177 देशों के बीच 128 वां स्थान दर्शाता है. भारत का मानव-निर्धनता सूचकांक 31.3 है, जो 108 देशों के बीच 67वां स्थान स्थान दर्शाता है. मानवीय विकास का यह आकलन उजागर कर देता है कि कि भारत के नागरिक स्वस्थ और दीर्घायु जीवन जीने में कहां तक समर्थ हैं. इससे यह भी उजागर होता है कि भारत के नागरिक कहां तक शिक्षित हैं और मानव विकास के सूचकांक पर उनका जीवन स्तर कैसा है. 

16.8.10

मुक्ति की बाट जोहते कतकरी

शिरीष खरे

हालांकि रायगढ़ के तुंजा कतकरी के पास अपनी संपत्ति के नाम पर शरीर पर लटके मटमैले कपड़ों के सिवाय बताने लायक कुछ भी नहीं है. इसके बावजूद चोरी के आरोप में पुलिस उसे दर्जनों बार गिरफ्तार कर चुकी है और आरोप साबित न हो पाने के चलते दर्जनों बार छोड़ भी चुकी है. हो सकता है, आप जब यह सब पढ़ रहे हों, उस समय पुलिस उसे एक बार फिर से गिरफ्तार करने की तैयारी कर रही हो. हो यह भी सकता है कि उसे एक बार फिर रिहा करने की तैयारी चल रही हो. यह सब कुछ तुंजा के साथ केवल इसलिये हो सकता है क्योंकि उसके नाम के साथ ‘कतकरी’ जुड़ा हुआ है.

तुंजा अपने नाम के साथ कतकरी जुड़े होने की सजा भुगतने वाले अकेले नहीं हैं. कुछ समय पुरानी एक खबर आपको याद है ? महाराष्ट्र के रायगढ़ में ही खेत के कुंए से पानी चुराने के आरोप में कतकरी जमात के चार लड़कों को आसपास के गांववालों ने पहले तो जमकर मारा-पीटा. उस पर भी जब मन न भरा तो उन्हें पेड़ों से बांधा और उनके गुप्तांगों को मिर्च-मसाले से भर दिया.

सूचना मिलने पर पुलिस घटनास्थल पर पहुंची और गंभीर रूप से घायल उन चारों कतकरी लड़कों को सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया. जहां उन्हें किसी तरह से मौत के मुंह से तो बचा लिया गया. मगर उनके घावों को भरे जाने का काम अब तक शुरू नहीं हुआ है.

दरअसल यहां सवरपदा, सिंधीबाड़ी, मुरमतबाड़ी, गोहे, मंदखिंद, अरधे, कुरकुलबाड़ी, कतकरबाड़ी जैसे गांव ऐसे हैं, जहां कतकरियों के माथे से अपराधी होने का कंलक अब तक नहीं धुला है.

यूं तो कतकरी महाराष्ट्र की एक शिकारी आदिम जनजाति कही जाती है लेकिन सच तो ये है कि सैकड़ों सालों से प्रणालीगत शोषण, नस्ली पूर्वाग्रह, घनघोर गरीबी के चलते अब खुद ही शिकार हो चुकी है. यह अपने लोकाचारों के चक्के पर अपनी पहचान की तलाश में घूमने वाली ऐसी जनजाति बन चुकी है, जो बदनामी के साथ-साथ अपनी पारंपरिक भूमि के लगातार छिनते जाने से अब गुमनामी के अंतिम छोर तक पहुंच चुकी है.

यूं तो ‘कतकरी’ दो मराठी शब्दों से मिलकर बना है, जिसका मतलब हैं ‘खैर नामक पेड़ से पेय पदार्थ बनाने वाले’. मगर समय के साथ आज इसका अर्थ बदल चुका है. अब चोर, डकैत, लुटेरे को ‘कतकरी’ मान लिया जाता है. मानो ‘कतकरी’ कोई जमात न हो, अपराध का एक पर्यायवाची शब्द हो.

इतिहास
गुमनामी के अंतिम छोर तक पहुंचीं ऐसी सैकड़ों जनजातियों की जड़ें, दरअसल 12 अक्टूबर, 1871 यानी किंगजेम्स स्टीफन के जमाने में बने ‘गुनहगार जनजाति अधिनियम’ से जुड़ी हुई हैं. गौरतलब है कि उस समय गुनहगार जनजातियों के तौर पर देश भर से जिन 150 से ज्यादा जनजातियों (ज्यादातर घुमंतू और अर्धघुमंतू) की पहचान की गई थी, उसमें से कतकरी भी एक थी. तब की सरकार ने ऐसी जनजातियों की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखने और ऐसे लोगों को गिरफ्तार किए जाने के लिए पुलिस को विशेष अधिकार दिए थे.

हालांकि 1949 को आयंगर की अध्यक्षता में गठित समिति की सिफारिशों के बाद, 1952 को सरकारी दस्तावेज से अंग्रेजों का वह काला अध्याय हमेशा के लिए समाप्त किया गया और उसके स्थान पर 1959 को दूसरा अधिनियम लागू किया गया, जो केवल उन व्यक्तियों को संज्ञान में लेता है जो कि आदतन अपराधी है, न कि पूरी जाति, जनजाति या समुदाय को.

यहां से 'अपराधी' कही जाने वाली जमातों को 'विमुक्त' कहा जाने लगा. मगर हकीकत आज भी वैसी की वैसी ही है. आज भी कतकरी जैसी जनजातियों को अघोषित तौर पर अपराधिक जनजातियों की तरह ही प्रताड़ित किया जाता है.

यह सच है कि 1871 के कानून के तहत, एक-साथ और एक-बार में 150 से ज्यादा जनजातियों की एक बड़ी आबादी को अपराधी के रुप में परिभाषित किया गया था. मगर जब यह कानून अपनी जमीनी हकीकत में आया, तो इसके आगे का काम दो तरह की प्रवृतियों ने किया. पहला साम्राज्यवादी व्यस्था के सिद्धांतों पर चलने वाली हमारी पुलिसिया प्रवृतियों ने और दूसरा काम के आधार पर परिभाषित भारतीय समाज में अनादिकाल से चली आ रही जातिगत प्रवृतियों ने.

अंधेरा कायम है
अंगेजों का वह कानून तो आजादी के बाद निरस्त कर दिया गया था. मगर खास तौर से भेदभाव की संस्थागत संस्कृति के चलते कतकरी जनजाति को कभी भी सिर उठाने का मौका नहीं दिया गया.

दरअसल कतकरी जैसी जितनी भी जमातें आज अपराधी हैं, वह कभी शिकारी या योद्धा जमातें थीं. एक तरफ, अंग्रेजों ने स्थानीय स्तर से उनकी सत्ता को उनसे छीना था और उन्हें अपराधी ठहराया था तो दूसरी तरफ, भारतीय समाज में अंग्रेजों के करीब आने वाली और वर्चस्व रखने वाली जो जमातें थीं, वह आजादी के बाद भी सत्ता में अपना स्थान सुरक्षित रखने और अपराधी कही जाने वाली जमातों को हाशिए पर ढ़केलने के लिए, बारम्बार यही दोहराती रहीं कि यह तो बस अपराधी ही होती हैं. जबकि ऐसी जमातों के सामने अपराध करने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं छोड़ा जाता रहा है. ऐसे में आप ही बतलाइए, क्या इस नजरिए के साथ अपराधीकरण की प्रक्रिया को समाप्त किया जा सकता है ?

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संपर्क : shirish2410@gmail.com

28.5.10

जंगल से कटकर सूख गये मालधारी

शिरीष खरे

पोरबंदर/ एशियाई शेरों के सुरक्षित घर कहे जाने वाले गिर अभयारण्य में बरसों पहले मालधारियों का भी घर था. ‘माल’ यानी संपति यानी पशुधन और ‘धारी’ का मतलब ‘संभालने वाले’. इस तरह पशुओं को संभाल कर, पाल कर मालधारी अपनी आजीविका चलाते थे. एक दिन पता चला कि अब इस इलाके में केवल शेर रहेंगे. फिर धीरे-धीरे मालधारियों को उनकी जड़ों से उखाड़कर फेंकने का सिलसिला शुरु हुआ.

आज की तारीख में वन्यजीव अभयारण्य के चलते गिरी के जंगलों से बेदखल हुए मालधारी समुदाय के पास जहां रोजीरोटी एक प्रश्नवाचक चिन्ह की तरह हो गया है, वहीं बुनियादी सुविधायें भी सिरे से लापता हैं. अपनी सामाजिक पहचान बनाने की जद्दोजहद के बीच उनके सामने शिक्षा और सेहत जैसे कई सवाल हैं, जिसका जवाब कोई नहीं देना चाहता.

मालधारियों का घर

गुजरात में शुष्क पर्णपाती जंगल, नम पर्णपाती जंगल, घास के बड़े-बड़े मैदान, समुद्र के लंबे-लंबे किनारे और बहुत सारे दलदली इलाके हैं. यहां 4 राष्ट्रीय उद्यान और 20 अभयारण्य हैं, जो 13 विकासखण्डों की 24 जगहों पर बसे हैं. प्रदेश के 4 राष्ट्रीय उद्यान जहां कुल 47,967 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में हैं, वहीं 20 अभयारण्य कुल 16,74,224 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैले हैं.

इन्हीं में एक गिर का अभयारण्य भी है, जो एशियाई शेरों का सुरक्षित घर कहलाता है. यह 1424 वर्ग किलोमीटर में फैला सघन जंगल, देश के सबसे बड़े शुष्क पर्णपाती जंगलों में से एक है. यही वह फैलाव है, जिसके आसपास मालधारी समुदाय का जीवन अपना विस्तार पाता था.

आरक्षित जंगल वाले इस इलाके को 70 के दशक में वन्य अभयारण्य के तौर पर अधिसूचित किया गया था. सबसे पहले 1972 में, सरकार ने यहां के 845 मालधारी परिवारों में से 580 परिवारों को जंगल से बाहर करने की कवायद शुरु की और देखते ही देखते 129 बस्तियों से तकरीबन 5000 आबादी को जंगल से उजाड़ दिया गया. तब से अब तक, यहां वन्य संरक्षण के नाम पर मालधारियों का शिकार बाकायदा जारी है.

बरदा एक ऐसा ही इलाका है, जो विस्थापन की सूची से फिलहाल तो छूटा हुआ है लेकिन वन विभाग का जंगल राज जब तब यह अहसास कराता रहता है कि मालधारियों की कोई औकात नहीं है और वन विभाग जब चाहे मालधारियों को जानवरों की तरह हकाल सकता है.

बरदा के जेसिंगभाई, हरिसिंग भाई, रामगुलाब, चंदाभामा जैसे लोगों से अगर आप बात करें तो सब के पास अब केवल पुराने दिनों की यादें शेष हैं. एक-एक आदमी के पास अपने-अपने किस्से हैं. वन-विभाग के आने के पहले तक उनका जीवन कितना मस्त, आजाद, आत्मनिर्भर, सरल, व्यवस्थित और हरा भरा था. लेकिन पिछले 40 सालों में सरकार ने मालधारियों को उनकी जड़ों से ऐसा काटा कि उनका जीवन सूख ही गया.

जानवरों के नाम पर

70 के दशक में विभाग ने यहां सर्वे किया, जंगलों को नापा और जमीनों की हदबंधी की. देखते ही देखते, उसने जंगल की जमीनों को राजस्व की जमीनों में बदलना चालू किया. इसके बाद विभाग ने पानी से लेकर कंदमूल और पेड़ की टहनियों, यहां तक कि जिन पत्थरों और गीली माटी से मालधारियों ने अपने घर बनाए , उनके इस्तेमाल तक पर पाबंदी लगा दी.

सरकार को जंगल के जीवों की देखभाल का तो ख्याल आता रहा, मगर पालतू पशुओं की चराई पर लगी रोक को हटाने का ख्याल एक बार भी नहीं आया. जबकि मालधारियों के पास तो बड़ी संख्या में गिर की मशहूर गाएं थीं, जो अब तेजी से घट रही हैं और जिनके घटने के सवाल पर सरकार भी अब चिंता प्रकट कर रही है.

यहां के लोगों पर चौतरफा मार पड़ी है. सरकार ने जहां उनके काम, धंधे और संसाधनों को उनसे छीना है, वहीं उनकी दुनिया में आए अभावों की ओर पलटकर भी नहीं देखा है. इन मालधारियों का जीवन जंगल पर ही निर्भर था और जब वे जंगल से बेदखल किये गये तो जैसे जिंदगी से ही बेदखल कर दिये गये. सरकार ने विस्थापन से पहले कई वायदे किये लेकिन एक बार जंगल से विस्थापित होने के बाद सरकारी महकमे ने इनकी ओर पलट कर नहीं देखा.

बरदा की पहाड़ियां, पोरबंदर से 15 किलोमीटर दूर हैं. अरब सागर के चेहरे को मानो चूमता सा यह इलाका पोरबंदर और जामनगर जिलों से जुड़ा हुआ है. यहां का जंगल कभी राणावाव और जामनगर के राजाओं के अधीन था, सो अभी भी यह पहाड़ियां राणाबरदा और जामबरदा के नाम से ही जानी जाती है.

पत्थर जैसे जिंदगी

राणाबर्दा और जामबर्दा पहाड़ियों पर कुल 61 बस्तियां बची हैं, जो एक-दूसरे से बहुत दूर-दूर और ऊंची नीची पथरीली जगहों पर हैं. यहां 1154 परिवारों के 6372 लोग रहते हैं, उनमें 14 साल तक के 2774 बच्चे हैं. अब दोनों पहाड़ियों की 61 बस्तियों के इतने बच्चों के सामने जो 14 प्राथमिक स्कूल हैं भी तो उनमें से 7 के भवन नहीं हैं. बाकी 7 प्राथमिक स्कूलों के भवन हैं, मगर उनमें भी छोटे-छोटे 15 कमरे ही हैं. मतलब यहां के सारे बच्चों को ध्यान में रखा जाए तो औसतन 185 बच्चों पर केवल एक कमरा ठहरता है.

दूसरी तरफ, राणाबर्दा के प्राथमिक स्कूलों में तो शिक्षकों की संख्या फिर भी ठीक है, मगर जामबर्दा के 1077 बच्चों के सामने जो 5 प्राथमिक स्कूल हैं, उनमें शिक्षकों की संख्या 6 हैं. मतलब यहां औसतन 180 बच्चों पर केवल एक शिक्षक ठहरते हैं. इन्हीं सबके चलते यहां 14 साल तक के 2774 बच्चों में से केवल 728 बच्चों के नाम स्कूली फाइलों में भरे जा सके हैं. बीते 1 अप्रेल से, केन्द्र सरकार ने देश भर के सारे बच्चों के लिए शिक्षा के अधिकार का कानून लागू किया है, मगर यहां के 2046 बच्चों के लिये तो कम से कम यह कानून नाकाफी है.

सरकारी दावे और उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के उलट यहां की 61 बस्तियों के भीतर 6 साल से नीचे के कुल 1354 बच्चे हैं. लेकिन उनकी देखभाल के लिए एक भी आंगनबाड़ी केन्द्र यहां नहीं है. इसी तरह 192 वर्ग मीटर तक फैली इन दो पहाड़ियों के बीच एक भी जगह ऐसी नहीं है, जहां सरकार ने स्वास्थ्य की कोई सेवा उपलब्ध करायी हो. इसलिए तबीयत बिगड़ जाने पर मरीजों को 25 किलोमीटर तक की दूरी तय करनी पड़ती है. कच्ची और खराब सड़क के कारण गंभीर बीमारी या दुर्घटना झेलने वाले बहुत सारे मरीजों और गर्भवती महिलाओं को दुर्गम रास्तों के बीच ही अपनी जान गंवानी पड़ती है.

केन्द्र सरकार ने मातृ मृत्यु-दर और शिशु मृत्यु-दर घटाने के लिए एनएचआरएम यानि ‘राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन’ चलाया है. इसी तर्ज पर गुजरात सरकार ने भी एसएचआरएम यानि ‘राज्य ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन’ छेडा हुआ है. मगर यहां से ऐसा लगता है जैसे न केवल स्वास्थ्य सेवा बल्कि बुनियादी सहूलियत से जुड़ी हर एक नीति, योजना और कार्यक्रम से मालधारियों का यह बरदा इलाका छूटा हुआ है. कुछ ऐसे, जैसे 21वी शताब्दी के 10 साल गुजरने के बाद भी यह इलाका 1970 के जमाने में ही छूट गया हो.

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5.4.10

सरदार सरोवर का सबक

शिरीष खरे

यह सच है कि सरदार सरोवर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बांध है, जो 800 मीटर नदी में बनी अहम परियोजना है। सरकार कहती है कि वह इससे पर्याप्त पानी और बिजली मुहैया कराएगी। मगर सवाल है कि भारी समय और धन की बर्बादी के बाद वह अब तक कुल कितना पानी और कितनी बिजली पैदा कर सकी है और क्या जिन शर्तों के आधार पर बांध को मंजूरी दी गई थी वह शर्तें भी अब तक पूरी हो सकी हैं ?

साल 2000 और 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा है कि सरदार सरोवर की ऊंचाई बढ़ाने के छह महीने पहले सभी प्रभावित परिवारों को ठीक जगह और ठीक सुविधाओं के साथ बसाया जाए। मगर 8 मार्च, 2006 को ही बांध की ऊंचाई 110 मीटर से बढ़ाकर 121 मीटर के फैसले के साथ प्रभावित परिवारों की ठीक व्यवस्था की कोई सुध नही ली गई। हांलाकि 1993 में, जब इसकी ऊंचाई 40 मीटर ही थी तभी बडे पैमाने पर बहुत सारे गांव डूबना शुरू हो गए थे। फिर यह ऊंचाई 40 मीटर से 110 मीटर की गई और प्रभावित परिवारों को ठीक से बसाया नहीं गया।

तत्कालीन मध्य प्रदेश सरकार ने भी स्वीकारा था कि वह इतने बड़े पैमाने पर लोगों का पुनर्वास नहीं कर सकती। इसीलिए 1994 को राज्य सरकार ने एक सर्वदलीय बैठक में बांध की ऊंचाई कम करने की मांग की थी ताकि होने वाले आर्थिक, सामाजिक, भौगोलिक और पर्यावरणीय नुकसान को कम किया जा सके। 1993 को विश्व बैंक भी इस परियोजना से हट गया था। इसी साल केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय के विशेषज्ञ दल ने अपनी रिपोर्ट में कार्य के दौरान पर्यावरण की भारी अनदेखी पर सभी का ध्यान खींचा था। इन सबके बावजूद बांध का काम जारी रहा और जो कुल 245 गांव, कम से कम 45 हजार परिवार, लगभग 2 लाख 50 हजार लोगों को विस्थापित करेगा। अब तक 12 हजार से ज्यादा परिवारों के घर और खेत डूब चुके हैं। बांध में 13,700 हेक्टेयर जंगल डूबना है और करीब इतनी ही उपजाऊ खेती की जमीन भी। मुख्य नहर के कारण गुजरात के एक लाख 57 हजार किसान अपनी जमीन खो देंगे।

अगर सरदार सरोवर परियोजना में लाभ और लागत का आंकलन किया जाए तो बीते 20 सालों में यह परियोजना 42000 करोड़ रूपए से बढ़कर 45000 करोड़ रूपए हो चुकी है। इसमें से अब तक 2500 करोड़ रूपए खर्च भी हो चुके हैं। अनुमान है कि आने वाले समय में यह लागत 70000 करोड़ रूपए पहुंचेगी। गौर करने वाली बात है कि साल 2010-11 के आम बजट में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने सरदार सरोवर परियोजना के लिए 3000 करोड़ रूपए से ज्यादा की रकम आंवटित करने की घोषणा की है। इसके अलावा सरकार के मुताबिक परियोजना की पूरी लागत गुजरात के सिंचाई बजट का 80% हिस्सा है। इसके बावजूद अकेले गुजरात में ही पानी का लाभ 10% से भी कम हासिल हुआ है। जबकि मध्यप्रदेश को भी अनुमान से कम बिजली मिलने वाली है। ऐसे में पूरी परियोजना की समीक्षा होना जरूरी है।

पर्याप्त मुआवजा न मिलना, मकानों व जमीनों का सर्वे नहीं होना, या तो केवल मकानों को मुआवजा देना या फिर केवल खेती लायक जमीन को ही मुआवजा देना, पुनर्वास स्थलों पर बुनियादी सुविधाओं का अभाव, कई प्रभावित परिवार को पुनर्वास स्थल पर भूखण्ड न देने आदि के चलते हजारों डूब प्रभावित अपना गांव छोड़ने को तैयार नहीं हैं। जहां-जहां गांव का पुर्नवास स्थल बनाया गया है वहां-वहां पूरे गांव के प्रभावित परिवारों को एक साथ बसाने की व्यवस्था भी नहीं है। गांव में लोगों की खेती की सिंचित जमीन के बदले सिंचित जमीन कहां देंगे, यह उचित तौर पर बताया नहीं जा रहा है।

कुछेक लोगों को बंजर जमीन दी गई है और कुछेक को गुजरात में उनकी इच्छा के विरूद्ध प्लॉट दिये गए। गुजरात में जहां कुछ परिवारों को बसाने का दावा किया गया है वहां भी स्थिति डूब से अलग नहीं है। करनेट, थुवावी, बरोली आदि पुनर्वास स्थल जलमग्न हो जाते हैं, उनके पहुंच के रास्ते बंद हो जाते हैं। यदि किसी व्यक्ति की जीविका का आधार यानी उसकी खेती लायक जमीन बांध से प्रभावित है और उसका घर पास के गांव में है तो उसे बाहरी बताकर पुनर्वास लाभ से वंचित किया जा रहा है।

डूब प्रभावितों के अनुसार आवल्दा, भादल, तुअरखेड़ा, घोघला आदि गांवों के तो पुर्नवास ही नहीं बनाये गए हैं। गांव भीलखेड़ा साल 1967 और 1970 में दो बार नर्मदा नदी में आई भारी बाढ़ से उजड़कर बसा है। बांध की ऊंचाई बढ़ाने से यह तीसरी बार उजड़ने की कगार पर है। भादल का राहत केम्प 7 किमी दूर ग्राम सेमलेट में बनाया गया है। भादल से सेमलेट सिर्फ पहाड़ी रास्तों से पैदल ही पहुंचा जा सकता है। एकलरा के प्राथमिक स्कूल को गांव से करीब ढ़ाई किलोमीटर दूर पुनर्वास करने से 53 में से केवल 8-10 बच्चे ही पहुंच पा रहे हैं। शिक्षकों को रिकॉर्ड रखने में परेशानी हो रही है और मध्यान्ह भोजन योजना का उचित संचालन नहीं हो पा रहा है।

यह तो महज एक सरदार सरोवर परियोजना के चलते इतने बड़े पैमाने पर चल रहे विनाशलीला का हाल है। मगर 1200 किलोमीटर लंबी नर्मदा नदी पर छोटे, मझोले और बड़े करीब 3200 बांध बनाना तय हुआ है। यहां से आप सोचिए कि नर्मदा नदी को छोटे-छोटे तालाबों में बांटकर किस तरह से पूरी घाटी को असंतुलित विकास, विस्थापन और अनियमितताओं की तरफ धकेला जा रहा है।

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संपर्क : shirish2410@gmail.com

22.11.09

रेल के लिए ज़िंदगी रोक दी

शिरीष खरे



सूरत/ मीराबेन को अब नींद नहीं आती. क्यों? उनके पास इसका सीधा जवाब है, 'अगर आदमी को फांसी पर लटकाना तय हो, पर तारीख तय न हो तो उसे नींद कैसे आएगी?'




मीरा बेन और उनके जैसे सूरत शहर के हजारों लोग इन दिनों परेशान हैं. परेशानी का सबब है उनका आशियाना, जिसे कभी भी, कोई भी सरकारी अमला तोड़ कर चल देता है.

समय के छोटे-छोटे अन्तराल से शहर की बाकी झोपड़ियों की तरह मुंबई-अहमदाबाद मेनलाइन की झोपड़ियों को तोड़कर गिराया जाना आम बात है लेकिन इस बात की जिम्मेदारी कोई नहीं लेना चाहता कि उसने झोपड़ियां तोड़ी हैं. शहर की झोपड़ियों के तोड़े जाने पर पुनर्वास और राहत जैसे मुद्दे जुड़ जाते हैं और इस बार झोपड़ियों को गिरानेवालों ने नया तरीका निकाला. झोपड़ी किसने तोड़ी, इस सवाल का जवाब सब जगह से एक-सा आता है, ‘हमने नहीं उसने’. महापालिका के पास भी यही जवाब है और रेलवे के पास भी.

सवाल सिर्फ एक सूरत का नहीं है, देशभर में रेलवे पट्टियों के दाएं-बाएं बसी असंख्य झोपड़ियों का यही हाल है. इन्हें भी पुनर्वास की वाजिब व्यवस्था चाहिए, जो कि न रेलवे की नीति में दर्ज है और न राष्ट्रीय पुनर्वास की नीति में.

यहां कतारगांव से लगे 18 से ज्यादा झोपड़पट्टियों के 12 हजार से ज्यादा रहवासी जब माटी में मिले झोपड़े का सवाल उठाकर महापालिका और रेलवे के पास पहुंचते हैं तो दोनों पहले तो डेमोलेशन की जानकारी नहीं होने की बात कहते हैं. पर जब मालूम चलता है तो एक-दूसरे को कसूरवार ठहराते हैं. इस तरह, डेमोलेशन के दौरान दोनों आफिस वालों के आपसी कोर्डिनेशन' जैसे अगले सवाल लोगों की जवाब पर ही अटके रह जाते हैं.

जाहिर है, अगर दोनों ने ही डेमोलेशन नहीं किया तो उनमें से एक भी मुआवजा क्यों देगा? और यह कोई प्राकृतिक आपदा भी नहीं कि उम्मीदों को 'सरकारी पंख' ही लग जाए?


सवाल दर सवाल हैं
यहां रेलवे और महापालिका की जमीन के बीच में कम से कम 150 झोपड़ियां ऐसी भी हैं जिन्हें रेलवे का दावा है कि वह महापालिका की जमीन पर हैं, महापालिका का दावा  है कि वह रेलवे की जमीन पर हैं.यानी जब तक साबित नहीं होता तब तक के लिए सारे 'भगवान भरोसे' हैं. और साबित होने की कोई तारीख तय नहीं है.

हालांकि अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए रेलवे और महापालिका दोनों ही इस कोशिश में हैं कि अपने को इससे कितना अधिक दूर रखा जाए. महापालिका का कहना है कि झोपड़पट्टी वाला हिस्सा रेलवे की जमीन पर है इसलिए हम  बिजली और पानी भी नहीं दे सकते. लेकिन थोड़े से फासले पर मफतनगर और संगम टेकरी के लिए महापालिका बिजली-पानी पहुंचाता है. और जब मफतनगर और संगम टेकरी से शौचालय, आंगनबाड़ी, स्कूल के सवाल उठते हैं तो फिर वही जवाब होता है, 'आप रेलवे की जमीन पर हो'.

यह और बात है कि महापालिका के चुनाव में वोट लेने का जब सवाल आता है तो इस तरह के सारे जवाब  गायब हो जाते हैं. दिलचस्प यह भी है कि यहां के ज्यादातर रहवासी बुनियादी सहूलियतों की लालसा में टैक्स देना चाहते हैं लेकिन महापालिका लेना नहीं चाहता. यानी केवल वोट के सवाल पर इन झोपड़पट्टी के लोग ‘महापालिका के लोग’ हैं, अन्यथा ‘रेलवे के लोग’. देखा जाए तो झोपड़ियों तक रोशनी पहुंचाना, कायदे से महापालिका का फर्ज है मगर फायदे के मद्देनजर यह काम प्राइवेट कंपनी संभाले हुए हैं. इसी प्रकार, इन इलाकों में सरकार के बजाय स्वैच्छिक संस्थाएं आंगनबाड़ियां चलाती हैं.

11 फरवरी 2009 को, सरकारी कामकाज के समय यानी सुबह 10 से 1 और दोपहर 2 से 5 तक, रेलवेपट्टी के दोनों तरफ की 400 झोपड़ियां तोड़ी गईं. अंबेडकरनगर के ठाकुरभाई बताते हैं, 'डेमोलेशन दस्ते में 3 बुल्डोजर, 125 के आसपास पुलिस के जवान, 50 के आसपास रेलवे सुरक्षा गार्ड, बहुत सारे रेलवे के अधिकारी, कर्मचारी थे. आगे-आगे डेमोलेशन, उसके पीछे-पीछे महापालिका वाले नल, गटर के पाईप और बिजली के तार काटते जाते थे.'

लोग इस बात को लेकर उत्सुक थे कि अगले दिन झोपड़ियां कहां तोड़ी जाएंगी. लेकिन यह सवाल अनुत्तरित रह गया. अंबेडकरनगर जैसी झोपड़पट्टी के तमाम रहवासियों की तरह अंजू बेन भी इस उम्मीद में थीं कि कोई-न-कोई आएगा, तोड़-फोड़ रोक ही देगा. हर साल वोट लेने वालों से यह उम्मीद तो थी ही. लेकिन अगले दिन की सुबह के साथ तमाम उम्मीदों की भी उम्र टूटी और अंबेडकरनगर का ठिकाना उखाड़ फेका गया. सैकड़ों सिर के ऊपर से दुनिया, दुनिया की चाहरदीवारी में रखी मामूली सुख देने वाली सुविधाएं एक झटके में मिट्टी में मिल गईं.

कोई हमदम ना रहा
अंजू बेन के घर-गृहस्थी के तार तो टूटे ही, घरवाला भी टूट गया. अंजू बेन का पति सूरज यादव अच्छा खासा आटो चालक था, सप्ताह भर पहले ही उसने कोई 1500 रुपये लगाकर आटो की मरम्मत भी करवाई थी. लेकिन उस रोज झोपड़पट्टी तोड़ने वालों ने उसके साथ मारपीट की और आटो भी ले उड़े. सूरज ने अगली सुबह पुलिस की टेबल पर अपने आटो का सवाल रखा, जबाव मिला- अब वह एक सरकारी संपत्ति है. सूरज तब से अब तक लापता है.

मुसलमान परिवार की अंजू बेन ने 20 नंवबर, 1991 को सूरज यादव के साथ नई दुनिया बसायी थी. अंजू बेन 10 की उम्र में भारूच जिले के भाखोदरा से पिता की पान की टपरी के साथ सूरत चली आई थी, 10वीं पढ़ने के बाद वह सेठों के घरों में काम पर लगी. नई दुनिया बसाते ही उसे भाड़े के अलग-अलग मकानों को बदलना पड़ता था. बदलते हुए मकानों के बीच ही काजल हुई, और जब वह बड़ी होने लगी तो 1995 में अंजू बेन ने बराछा-कापुदरा पुलिस-स्टेशन के पीछे 30000 रूपए में झोपड़ा खरीदा. 2001 में उसने वह झोपड़ा डेढ़ लाख में इन उम्मीदों के साथ बेचा कि सस्ता झोपड़ा मिलेगा, बचे हुए पैसे से मजूरी की जगह कोई धंधा-पानी शुरू होगा.

इसी साल आटो तो आया लेकिन बाकी का पैसा चोरी हो गया. हादसे के 4 रोज बाद दिमागी असंतुलन बिगड़ने के चलते अंजू बेन को नवी सिविल अस्पताल लाया गया, सारी दवाईयां सदमे के सामने बेअसर-सी ही रहीं. ऐसी नाजुक घड़ी में अगला ठिकाना कोसाठ के भाड़े का झोपड़ा बना. 2006 की बाढ़ में वह भी साथ छोड़ गया.

दर-दर की ठोकर खाने के बाद आखिरी आशियाना अंबेडकरनगर रहा, यहां कुछेक महीने बीतते ही डेमोलेशन का पहला कहर झेला. लंबी खामोशी के बाद डेमोलेशन का दूसरा कहर अब ऐसा बरपा है कि घरबार तो दूर, घरवाला ही अलग हो चुका है.

इस बच्चे का हत्यारा कौन है ?
11 फरवरी को ही संगम टेकरी की मीरा बेन सहित कुल 168 रहवासियों की झोपड़ियां भी देखते-देखते जमींदोज कर दी गईं. मीरा बेन की झोपड़ी महापालिका की जमीन पर थी और पड़ोस की गोटी बेन की रेलवेकी जमीन पर. अभी भी मीरा बेन-गोटी बेन के सवाल जवाब मांगते हैं कि ‘झोपड़ियां तोड़ी किसने’, ‘मुआवजा देगा कौन’? जबाव में महापालिका ने रेलवे आफिस का पता बताया है, रेलवे के आफीसर ने महापालिका का ठिकाना.

मीरा बेन कहती हैं, 'अगर आदमी को फांसी पर लटकाना तय हो, मगर तारीख तय न हो तो उसे नींद कैसे आएगी? ऐसे ही है हमारी जिंदगी. बार-बार हमें हमारी झोपडियों सहित उजाड़ना है, बार-बार नुकसान सहना है, मगर कब- तारीख कोई नहीं जानता. इसलिए इधर कोई चाहकर भी न तो अपना झोपड़ा सजाता है, न ही झोपड़े का सामान बढ़ाता है. हमारे भीतर से तो बड़ी बिल्डिंग और कारों वाली तस्वीर चिपकाने की चाहत उड़ चुकी है. ‘कल भी आबाद रहेंगे’- इसी चाहत में राहत भरी नींद आ जाए, अब यही बहुत है.'

संगम टेकरी बांस के खूबसूरत फर्नीचर और माटी की मूर्तियां बनाने वाले भील, बसावा और मुसलमानों की बस्ती है. डेमोलेशन की मार से श्रीराम का पक्का मंदिर भी टूट चुका था. यहां के हिन्दू-मुसलमान कलाकारों ने बांस-लकड़ी की शानदार कलाकारी से मंदिर को तो दोबारा खड़ा कर लिया है लेकिन मंजू बेन के 2 दिन के लड़के को कौन लौटाएगा?

वह खाना बनाने-खाने का समय था, अचानक बुल्डोजर चलते ही पूरा समय हर तरफ अफरा-तफरी के माहौल में बदल गया. मंजू बेन को 5 किलो आटा बचाने के लिए 5 मिनट का भी समय नहीं मिला. वह हड़बड़ाहट में उसी खटिया पर गिरीं, जिस पर उनका 2 दिनों का बच्चा सो रहा था. 2 दिन पहले इस दुनिया में आया बच्चा दबा और हमेशा के लिए उसने आंखें मूंद ली. मगर बुल्डोजर न रूका.

बंटे हुए लोग
सामाजिक कार्यकर्ता भरत भाई कंथारिया कहते हैं, 'डेमोलेशन की ज्यादातर कार्यवाहियों मौसम के मिजाज को बिगड़ते हुए देखकर की जाती हैं. सारे झोपड़े एक साथ न तोड़कर, कभी 200 तो कभी 400 की संख्या में तोड़े जाते हैं, जिससे लोग संगठित न हो सकें. ऐसे हमले अचानक और बहुत जल्दी-जल्दी होते हैं.’

ऐसा नहीं है रेलवे पट्टी के लोगों का पुनर्वास महापालिका नहीं कर सकती. मुंबई में जब रेलवे पट्टी के लोगों को हटाया गया तो स्थानीय महापालिका ने बाशी और उससे लगे एक बड़े इलाके में पुनर्वास करवाए. जो बीते 2-3 सालों से लगातार चल भी रहे हैं. लेकिन देश भर की रेलवे पट्टियों के आसपास मौजूद बसाहटों के पुनर्वास की कोई ठोस रूपरेखा नहीं है. इससे जुड़े तमाम तथ्यों, उम्मीदों, संवेदनाओं और हकों से जुड़े सवाल भी फिलहाल रूके हुए हैं.

पचासों सालों से अपनी जगहों पर रूके लोगों के दिलों-दिमाग में ‘अस्थायी’ और ‘पराया’ होने का एहसास बरकरार है. रेलवे पट्टी की जनता कहीं अलग-अलग राज्य, जुबान, तो कहीं अलग-अलग जाति, धर्म, पार्टी जैसे धड़ों में बिखरी है, भटकी है. कुल मिला कर रेलवे पट्टी की बड़ी तादाद एक साथ होकर भी ‘एक’ नहीं है. उनके हिस्से में वोट भी हैं, उलझने भी. उनकी जिंदगी में पुनर्वास और बुनियादी सहूलियतों की उम्मीदें रेलवे की दो पटरियों की तरह हो चुकी हैं. जो सामानांतर चलती तो हैं, लेकिन मिलती कभी नहीं.

4.11.09

शिव के राज में विस्थापितों पर गिरी गाज

शिरीष खरे

खण्डवा। नर्मदा बचाओ आंदोलन के गैरकानूनी दमन के विरोध में अनिश्चितकालीन धरना और क्रमिक अनशन को देशव्यापी समर्थन मिलते देख पुलिस ने अचानक भारतीय दण्ड विधान की धारा 333 के तहत एक और केस दर्ज किया है। इसके बाद आंदोलन की तरफ से जारी प्रेस रिलीज में कहा गया है कि न्यायालय के आदेशों का पालन करने की मांग करने वालों के साथ-साथ संघर्षरत किसान-आदिवासियों पर प्रशासनिक कहर दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। पुलिस नए-नए केसों में उन्हें इस तरह से उलझा रही है कि न्यायालय के आदेशों की मांग करने वाले घबराकर दब जाएं। पुलिस और प्रशासन का यह कृत्य कानून का शासन स्थापित करने में बाधक है। इससे न केवल लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है बल्कि लोकत्रांतिक मूल्यों में आम जनता की आस्था को भी क्षरित करने का दुष्प्रयास किया जा रहा है। प्रशासन की इस मनोवृति के खिलाफ आंदोलन अपना झण्डा बुलंद करेगा।


दूसरी तरफ प्रशासन के इस गैरकानूनी रवैए के विरोध में कई और जगहों से लगातार प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं। जनपहल की तरफ से भोपाल में कई कार्यकर्ताओं ने ‘राज्य मानवाधिकार आयोग’ से दोबारा मुलाकात की और प्रशासन के गैरकानूनी दमन से जुड़े ताजा सबूत पेश किए। आयोग ने इसे गंभीर मानते हुए कहा है कि जिला प्रशासन बुधवार को दी जाने वाली रिपोर्ट में अपनी स्थिति साफ करने वाला है, इसके बाद ही कार्यवाही तय की जाएगी। इंदौर में 50 से अधिक आंदोलन सर्मथकों के एक प्रतिनिधिमण्डल ने कमिशनर से मिलकर खण्डवा जिला प्रशासन की इस दमनकारी नीति का विरोध किया है। प्रतिनिधिमण्डल में वरिष्ठ शिक्षाविद प्रोफेसर आर डी प्रसाद, साहित्यकार सरोज कुमार, संस्कृतिकर्मी चिन्मय मिश्र, शिल्पी केन्द्र के अमूल्य निधि, झुग्गी बस्ती संघर्ष मोर्चा के राकेश चांदोरे ने इस घटना को प्रभावितों के नीतिगत अधिकारों का हनन बताया है। उधर छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा ने दुर्ग में मशाल रैली करने का फैसला लिया है।


हरदा में नारायण टाकीज चौक पर समाजवादी जन परिषद और क्रांति हम्माल जन यूनियन ने आंदोलन के समर्थन में धरनाप्रदर्शन किया। इस दौरान सजप के महामंत्री सुनील ने उच्च न्यायालय के आदेशों के पालन की मांग करने वाले आंदोलनकारियों को हिरासत में लिए जाने को न्यायालय की अवमानना बताया है। बड़वानी में जागृत दलित आदिवासी संगठन ने जिला कलेक्टर को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन देकर आंदोलन का समर्थन किया। इधर खण्डवा में धरनास्थल पर मेधा पाटकर सहित आंदोलन के हजारों कार्यकर्ताओं और समर्थकों की मौजूदगी में कार्यक्रम जारी हैं।

2.11.09

सरकार जो गैरकानूनी हथकण्डे अपना रही है

शिरीष खरे

खण्डवा। यहां से दो खबरें हैं, पहली वो जो यहां की नहीं है और यहां सबको पता है कि सरकार ने हिंसक-गैरकानूनी हथकण्डे अपनाने वाली माओवादी ताकतों को कुचलने की ठानी है। दूसरी खबर वो जो यहां की है और यहां से बाहर अभी बहुत कम लोगों को पता है कि सरकार खुद हिंसक-गैरकानूनी हथकण्डे अपना रही है, इस तरह वह शांतिपूर्ण तरीके से विरोध जताने वाले नर्मदा घाटी के डूब प्रभावितों के विरोध को दबा देना चाहती है। यह और बात है कि पुलिस द्वारा नर्मदा बचाओ आंदोलन कार्यालय पर गैरकानूनी कब्जा किये जाने और दर्जनों बड़े कार्यकताओं को बगैर वारंट हिरासत में लिए जाने के बाद उठे विरोध को अब देश भर से समर्थन मिलने लगा है।

एक नजर में :

  • पिछली 30 अक्टूबर को पुलिस ने नर्मदा बचाओ आंदोलन, खण्डवा कार्यालय पर गैरकानूनी तरीके से कब्जा किया और आलोक अग्रवाल सहित कई बड़े कार्यकर्ताओं को बगैर वारण्ट हिरासत में लिया।


  • अगले रोज विद्युत विभाग की जांच के नाम पर आंदोलन के कार्यालय को फिर से निशाना बनाया गया। विद्युत विभाग के कर्मचारियों की बजाय पुलिस वाले बिल लेकर पहुंचे।


  • चित्तरुपा पालित और रामकुंवर ने कार्यालय पर गैरकानूनी कब्जे के खिलाफ जेल के भीतर अनिश्चितकालीन अनशन शुरू कर दिया। इसके समर्थन में महेश्वर, अपरवेदा और ओंकारेश्वर बांध के हजारों प्रभावितों का भी अनिश्चितकालीन धरना और क्रमिक अनशन शुरू हो गया।


  • बरगी बांध से प्रभावित धरने में शामिल हुए। इसके अलावा बड़वानी, हरदा, भोपाल, इंदौर, जबलपुर आदि जगहों पर आंदोलन के समर्थन में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए।


  • मेधा पाटकर के नेतृव्य में एक प्रतिनिधि मण्डल कलेक्टर से मिला। उन्होंने आंदोलनकारियों में लगाये गए झूठे मामलों को तुरंत वापिस लेने की मांग की।


  • राज्य मानवाधिकार आयोग ने जिला कलेक्ट्रर और पुलिस अधीक्षक को नोटिस भेजकर 3 दिनों में घटना की रिपोर्ट मांगी।

मामला यही थमता नजर नहीं आ रहा है बल्कि आंदोलन के समर्थन में अब शहर से लेकर देशभर के कई जन संगठन और नागरिक समूह भी सामने आ रहे हैं। रिटायर कर्नल वोम्बेटकेरे ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर पुलिस की असंवैधानिक कार्यवाही के बारे में बताया है। दूसरी जगहों से कई समुदायों ने सरकार से उच्च न्यायालय के आदेशों के तहत विस्थापितों को खेती की जमीन और अन्य पुनर्वास लाभ दिए जाने की वकालत की है।

इस सबंध में वरिष्ठ गांधीवादी विचारक सुश्री राधा भट्ट और उत्तराखण्ड नदी बचाओ अभियान के बसंत पाण्डे ने भी मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कार्यकताओं की रिहाई के लिए मांग की है। पीपुल्स यूनियन आफ डेमोक्रेटिक राईटस ने अपनी प्रेस रिलीज में आंदोलन के प्रति एकजुटता जाहिर की है। साथ ही एक आनलाइन पेटिशन में दुनियाभर से अबतक 500 से ज्यादा लोगों और समूहों ने दस्तखत करके बांध प्रभावितों के दमन पर आपत्ति दर्ज की है। वहीं एशियन मानवाधिकार आयोग ने भी घटना की निंदा करते हुए एक्शन एलर्ट जारी किया है।

खंडवा में धरनास्थल पर बैठे कई आंदोलनकारी यह मानते हैं कि सरकारी मशीनरी अभी भी अपनी सारी ताकत उच्च न्यायालय के आदेशों को मानने की बजाय विस्थापितों के संघर्ष को दबाने में खर्च कर रही है। आंदोलन कार्यालय को निशाना बनाया जाना प्रशासन का एक नया और गैरकानूनी हथकण्डा है। इसी के चलते पुलिस ने आंदोलन कार्यालय को गैरकानूनी ढ़ंग से अपने नियंत्रण में लिया और वरिष्ठ कार्यकर्ता आलोक अग्रवाल को बगैर वारण्ट गिरफ्तार भी किया। पुलिस ने आलोक अग्रवाल की गिरफ्तार को लेकर गुमराह भी किया। एक तरफ लोगों को बताया गया कि उन्हें पूछताछ के लिए लाया गया है दूसरी तरफ वकील से कहा गया कि उन्हें पुराने मामले में गिरफ्तार किया गया है।
जिला प्रशासन के इशारे पर विद्युत विभाग ने जिस तरीके से कार्यालय की जांच की उसे लेकर भी आंदोलनकारी गुस्से में हैं। जांच के बाद विद्युत विभाग ने आंदोलन कार्यालय को व्यवसायिक स्थल बताते हुए 15149 रुपए का अतिरिक्त बिल जारी कर दिया। बिल पहुंचाने विद्युत विभाग के कर्मचारियों की बजाय पुलिसकर्मी आए। आंदोलनकारी बताते हैं कि कार्यालय में बांध प्रभावितों के संवैधानिक अधिकार, कानूनी और लोकत्रांतिक तरीकों के संरक्षण से जुड़ा दस्तावेजीकरण होता है। यह तो किसी तरह की व्यवसायिक गतिविधि नहीं है। विद्युत विभाग तो पहले भी परेशान करता रहा है। वह तो कई बार ताला लगा होने की झूठी बात लिखकर ज्यादा बिल वसूलता रहा है जबकि विद्युत मीटर तो खुले वराण्डे में ही लगा हुआ है। आंदोलन अब इसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की भी सोच रहा है।
विस्थापितों के साथ धोखे पर धोखा

नर्मदा घाटी में बन रहे इंदिरा सागर और ओंकारेश्वर बांध के हज़ारों विस्थापितों को जमीन के बदले जमीन, वयस्क पुत्रों को जमीन और सभी को पुनर्वास की अन्य सुविधाएं देकर बसाना था। मगर इस नीति का खुला उल्लंघन करते हुए विस्थापितों को धोखे एवं दमन के आधार पर ही उज़ाडा गया है। इतना ही नहीं विस्थापितों के हक में दिये गये सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय के फैसलों पर भी अमल नही किया जा रहा है। प्रदेश और देश के विकास के नाम पर त्याग करने वाले लाखों विस्थापित आज दर दर की ठोकरें खाने पर मजबूर है जबकि दूसरी तरफ बांध बनाने वाली कम्पनी एनएचडीसी ने बीते 4 सालों में 1200 करोड़ रूपए से ज्यादा शुद्ध मुनाफा कमाया है।

इंदिरा सागर और ओंकारेश्वर बांध के हजारों विस्थापितों की माँग हैं कि :

इंदिरा सागर परियोजना में :

1. मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने नर्मदा बचाओ आंदोलन द्वारा दायर याचिका में पहले 8 सितम्बर 2006 और फिर 2 सितम्बर 2009 को यह आदेश दिया है कि किसानों के सभी वयस्क पुत्र और अविवाहित पुत्रियों को 5.5 एकड़ कृषि जमीन दी जाए। इसका पालन किया जाए।

2. विस्थापित मज़दूर परिवारों को डूब से खुलने वाली जमीन बांटी जाए और उन्हें सिंचाई की सुविधा दी जाए। जिससे वह पानी खुलने पर हर साल गेहूं और गर्मी की फसल ले सकें। इस तरह विस्थापित मजदूर परिवार भी इज्जत से रोजगार पा सकें।

3. इंदिरा सागर डूब क्षेत्र में विस्थापित मछुआरों के साथ गुंडागर्दी एवं मारपीट की जा रही हैं। इसे तत्काल रोका जाए और इंदिरा सागर में मछली मारने का अधिकार ठेकेदार को नहीं, विस्थापित को दिया जाए।

4. खेतीयोग्य जमीनों पर एनएचडीसी ने मामूली मुआवजा देकर कब्जा कर लिया है। इससे प्रभावित किसान दोबारा जमीन नहीं खरीद सके हैं। इसलिए जमीन के लिए दी जाने वाले विशेष पुनर्वास अनुदान (बढ़त राशि) को हरदा कमाण्ड के अच्छी दर 1.5 से 2 लाख रूपए एकड़ के हिसाब से दिया जाए।

5. अभी भी डूब क्षेत्र में छूटे हुए हजारों घर, जो मुआवजे से छूटे हैं, उनका भू-अर्जन करके मुआवजा दिया जाए।

6. जहां जमीन डूब चुकी है और अब जीने का कोई जरिया बचा ही नही है, उन गांवों के सभी घरों का भू-अर्जन करके विस्थापितों को मुआवजा और पुनर्वास दिया जाए।

7. इंदिरा सागर डूब क्षेत्र खासकर हरदा जिले में भयावह भ्रष्टाचार फैला है। प्रभावितों के अनुदान दलालों द्वारा अधिकारियों की मिलीभगत से निकाले जा रहे हैं। इस पर रोक लगाई जाए और स्वतंत्र जांच कर दोषियो को दण्डित किया जाए।

8. सभी पुनर्वास स्थलों पर विस्थापितों के लिए पूर्ण रोज़गार दिया जाए। उनके लिए बीपीएल राशन कार्ड बनाए जाएं और पुनर्वास स्थल पर स्कूल, अस्पताल, पेयजल आदि सभी सुविधाएं दी जाएं।

9. बहुत से गांवों में अभी तक परिवार सूची ही नही बनी है और वह पुनर्वास के समस्त लाभों से वंचित हैं, उन गांवों की परिवार सूचियां बनाकर, सभी विस्थापितों को पुनर्वास के लाभ दिये जाएं।

10. इंदिरा सागर के डूब में आने वाले छूटे हुए गांव का सर्वे करके परिवारों को मुआवजा और पुनर्वास दिया जाए।

11. 25 प्रातिशत से कम बची जमीन के भू-अर्जन के साथ परिसम्पत्तियों का भी अर्जन किया जाए।

12. जहां घर डूब हैं और जमीने बची हैं वहां 1 किलोमीटर के अंदर पुनर्वास स्थल का निमार्ण किया जाएं।

13. इंदिरा सागर बांध स्थल पर जल स्तर सूचित करने वाला स्केल मिटा दिया गया है, जो कि अत्यंत गंभीर है। बांध का जल स्तर बताने वाला सार्वजनिक स्केल फिर से लिखा जाए।

ओंकारेश्वर परियोजना में :

1. उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुसार विस्थापितों को सिंचित एवं उपजाऊ जमीन देकर बसाया जाए।

2. विस्थापितों को जमीन आवंटन के लिये अतिक्रमित जमीनों को न दिया जाए, जिससे अन्य गरीब परिवारों की रोटी न छिने और विस्थापित की सुरक्षित बसाहट हो सके।

3. उच्च न्यायालय की तारीख 23 सितम्बर 2009 और अन्य सभी आदेशों का तत्काल पालन किया जाए।

4. न्यायालयीन आदेश तथा पुनर्वास नीति के अनुसार कमाण्ड एरिया में विस्थापितों की इच्छा अनुसार घर प्लाट दिये जाएं।

5. छूटे हुए मकानों का भू-अर्जन किया जाए।

6. किसानों को अपर्याप्त मुट्ठी भर मुआवजा दिया गया है। कृषि जमीन का विशेष पुनर्वास अनुदान (बढ़त राशि) कम से कम 1.5 से 2 लाख रूपए एकड़ दिया जाए।

7. तालाब में मछली ठेकेदार को नहीं दी जाए। मछली मारने का सम्पूर्ण अधिकार विस्थापित को दिया जाए।

8. पुनर्वास के लाभों से वंचित सभी परिवारों को घर प्लाॅट, अनुदान व समस्त लाभ दिया जाए।

9. सन् 2004 में धाराजी प्रकरण में सैकड़ो लोगों को एनएचडीसी द्वारा पानी छोड़ने से बह जाना तथा पिछले महीने ग्राम कामनखेड़ा में नन्ही हरिजन बालिका का एनएचडीसी द्वारा पानी बढ़ाने से मौत के लिए जिम्मेदार एनएचडीसी को दण्डित किया जाए।

18.2.09

विवादों का विशालकाय सरोवर

शि‍रीष खरे
इन दिनों सरदार सरोवर परियोजना और डूब प्रभावितों के लिए किये जा रहे पुनर्वास कार्य में भ्रष्ट्राचार कुछ इस प्रकार व्याप्त है कि अनियमितताओं का सिलसिलेवार ब्यौरा जुटाना और उसके आधार पर लगातार कार्यवाहि‍यों की रणनीतियां तैयार करना कठिन हो चुका है. इस विशालकाय बांध की तरह ही इससे प्राप्त होनेवाले लाभों, लागतों और पुनर्वास संबंधित तमाम फर्जीवाड़ों की लम्बी सूचियां विवादों की मोटी गठरी बन चुकी है.
सरदार सरोवर परियोजना 1979 में शुरू हुई थी और यह साल 2025 में पूरी होगी. इससे लगभग दो लाख लोग विस्थापित होंगे. 1993 में विश्व बैंक ने इस परियोजना से अपना हाथ पीछे खींच लिया था. इसी साल “केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय” के विशेषज्ञ दल ने भी अपनी रिपोर्ट में बांध के काम के दौरान पर्यावरण की भारी अनदेखी और लापरवाही पर सभी का ध्‍यान खींचा था. अनेक पर्यावरणविदों की राय में यह योजना पर्यावरण के प्रतिकूल है. इतने बड़े पैमाने पर काम होगा तो पर्यावरण के साथ खिलवाड़ भी उसी अनुपात में होना है. इसके बावजूद कुल 1200 किलोमीटर लंबी नर्मदा पर 3200 बाँध बनाना भी तय हुआ है. मतलब नर्मदा की घाटी में असंतुलित विकास, विस्थापन और अनियमतताओं का अतीत खत्म नहीं होने दिया जाएगा.
लाभ और लागत‘नर्मदा बचाओं आंदोलन’ ने समाज में विकास की परिभाषा और उसके मापदण्डों पर लगातार विचार करने की प्रक्रिया को प्राथमिकता दी है. इसी तर्क को आधार मानकर परियोजना के कुल लाभ और हानियों का हमेशा आकलन चलता रहा है. हर बार यह लागत बढ़ती जा रही है. सरकार के अनुसार पूरी लागत गुजरात के सिंचाई बजट का 80 प्रतिशत हिस्सा है. लेकिन इससे कच्छ के लगभग 2 प्रतिशत और सौराष्ट्र के 9 प्रतिशत भाग में ही पानी पहुंचाया जा सकेगा. मेधा पाटकर के अनुसार- “विगत 20 सालों में यह परियोजना 4200 हजार करोड़ से बढ़कर 4500 हजार करोड़ हो चुकी है. इसमें से अब तक 25 हजार करोड़ खर्च हो भी चुके हैं. अनुमान है कि आने वाले समय में यह लागत 70 हजार करोड़ तक पहुंचेगी. इसके बावजूद अकेले गुजरात में ही पानी का लाभ 10 प्रतिशत से भी कम हासिल है. महाराष्ट्र और राजस्थान को मिलने वाला लाभ नजर नहीं आता जबकि मध्यप्रदेश को भी अनुमान से कम बिजली मिलने वाली है.” कुछ तकनी‍की विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस पूरी योजना को वैकल्पिक तरीक़े से लागू किया जाए और इसे छोटी-छोटी, आत्मनिर्भर तथा पर्यावरण के अनुकूल परियोजनाओं में बांट दिया जाए तो ज़्यादा लाभ हो सकता है.
विस्थापन यहां के आदिवासी लोगों की प्रमुख मांग जमीन के बदले जमीन की है. परंतु सरकार जमीन जुटाने में अपनी असमर्थता व्यक्त करती रही है. कुछ लोगों को पुनर्वास की जो जमीन दी गई है उनमें से ज्यादातर की शिकायत है कि वह जमीन उनकी असली जमीन से कम उपजाउ है. काम की जमीन को पानी में डूबोकर बदले में उन्हें बेकार जमीन दी जा रहीं है. जमीन बिखरे टुकड़ों में दी जा रही है. बहुत बड़ी तादाद में पुनर्वासित लोगों का कहना है कि आज नर्मदा की नहर उनकी दी गई ज़मीन से निकल रही है पर उन्हें ही नर्मदा के पानी से वंचित रखा जा रहा है. पुनर्वास कार्य में अनियमतताओं के गंभीर आरोप बढ़ते ही जाते हैं. उधर ‘नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण’ द्वारा जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया कि ‍‍‍सरदार सरोवर परियोजना से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास कार्य में कथित अनियमितताओं के आरोप गलत हैं. तथ्य यह है कि- “वि‍गत वर्ष मानसून सत्र के दौरान परियोजना प्रभावितों के लिए विक‍‍‍‍सित 88 पुनर्वास स्थलों में 22438 परिवारों को निशुल्क भूखण्डव आंवटित किये गए. जो परिवार भूखण्ड लेना नहीं चाहतें, उन्हें 50 हजार नकद राशि देने का विकल्प रखा गया और 806 परिवारों ने स्वेच्छा से नकद राशि लेने का विकल्प चुना.” लेकिन सरकार के भीतर ही एनवीडीए की कार्यप्रणाली को लेकर अंतर्विरोध के स्वर उभरते रहे हैं. वि‍गत वर्ष मानसून सत्र के दौरान मुख्य सचिव द्वारा नि‍र्माण विभागों की मानिटरिंग के दौरान एनवीडीए अधिकारियों की जमकर क्लास लेने की खबर अखबारों की प्रमुख सुर्खी बनी थी. तब श्री साहनी ने कहा कि "बार-बार निर्देश के बावजूद एनवीडीए में न तो पैसों का सही उपयोग हो पा रहा है और न ही समय सीमा में कार्य हो पा रहा है. बड़े अधि‍कारी स्थल पर जाकर कामकाज की सही समीक्षा करें."
भ्रष्टाचार ‘नर्मदा बचाओं आंदोलन' वैकल्पिक वनीकरण, जल संरक्षण क्षेत्र विकास और पुनर्वास योजनाओं से संबंधित सरकारी दावों और आकड़ो को झूठा तथा विरोधाभाषी बताता है और कहता है कि इसके जवाब में हम मैदानी और कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे। आंदोलन पुनर्वास कार्य में राहत और विस्थापन सहित कई क्षतिपूर्ति योजनाओं में भारी भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं. ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन, बड़वानी’ से मिली जानकारी के अनुसार प्रदेश सरकार ने 13 जिलों के कलेक्टबर और भू-अधिग्रहण अधिकारी को उनके यहां हुईं रजिस्‍ट्रियों की जांच करने के लिए कहा है. कुल 4190 रजिस्ट्रियों में से 2818 रजिस्ट्रियों की जांच की गई, जिनमें से अभी तक कुल 758 फर्जी रजिस्ट्रियों की बात सरकार मान चुकी है मगर आंदोलन के मुताबिक दुर्भाग्य से यह संख्या् उससे कहीं अधिक है. ‘नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण’ के अधिकारियों द्वारा जहां अनेक बैठकों में फर्जी रजिस्ट्री जांच में किसी प्रकार की आंच न आने की बात दोहराई जा रही है वहीं कुछ लोगों का मत है कि मौजूदा अधिकारियों के होते हुए निष्पैक्ष जांच संभव ही नहीं है। आंदोलन के कार्यकर्ता आशीष मंडलोई बताते हैं कि- "एनवीडीए के अधिकारियों द्वारा दोषी अधिकारियों को बचाने और महज विस्थापितों के फसाने का खेल चल रहा है। इस संबंध में जब प्रकरण न्यायालय में है तो ऐसे में निर्णय न्यायालय को लेना है, अधिकारि‍यों द्वारा निर्णय लेना अवैध ही माना जाएगा." उन्होंने इस पूरे प्रकरण पर सीबीआई जांच की मांग की है.

19.12.08

टाईगर रिजर्व में जनजातियों का शिकार

मेलघाट से लौटकर
मेलघाट सतपुड़ा पर्वतमाला की पश्चिमी पहाड़ी है जो महाराष्ट्र के जिला अमरावती की दो तहसील से जुड़कर बनी है. इस 2 लाख 19 हजार हेक्टेयर यानी मुंबई से 4 गुना बड़ी जगह पर कुल 319 गांव मिलते हैं. यहां करीब 3 लाख आबादी में से 80 फीसदी कोरकू जनजाति है. समुद्र तल से 1118 मीटर की ऊंचाई पर बसा यह हरा-भरा भाग `मेलघाट टाइगर रिजर्व´ कहलाता है. 1974 को `एम टी आर´ के नाम से मशहूर इस प्रोजेक्ट से तब 62 गांव प्रभावित हुए. आज भी 27 गांव के करीब 16 हजार लोगों को विस्थापित किया जा रहा है.

1947 से पूरे देश में विभिन्न परियोजनाओं से अब तक 2 करोड़ से अधिक आदिवासियों को विस्थापित किया जा चुका है. सरकार के मुताबिक बाघों को बचाने के लिए यहां विस्थापन जरूरी है लेकिन `राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण´ की रिपोर्ट स्वीकार करती है कि सत्तर के दशक में शुरू हुआ `प्रोजेक्ट टाइगर´ अपने लक्ष्य से काफी दूर रहा. देश में बाघों की संख्या अब तक के सबसे निचले स्तर तक पहुंच चुकी है. 2002 को देश में जहां 3642 बाघ थे वहीं अब 1411 बाघ बचे हैं. राज्यसभा के सांसद ज्ञानप्रकाश पिलानिया के मुताबिक- ``बाघों की संख्या को बढ़ाने के लिए बने रिजर्व एरिया अब उन्हें मारने की मुनासिब जगह बन गए हैं. इसके लिए अवैध िशकार करके उनके अंगों की तश्करी करने वाले व्यापारी जिम्मेदार हैं. बाहरी ताकतों की मिलीभगत से ही इतने बड़े गिरोह पनप सकते हैं.´ दूसरी तरफ विकास की तेज आंधी ने जंगलों का भविष्य खत्म कर दिया है. `भारतीय वन सर्वेक्षण´ की रिपोर्ट बताती है कि 2003 से 2005 के बीच 728 किलोमीटर जंगल कम हुआ. फिलहाल सघन जंगल का हिस्सा महज 1.6 फीसदी ही बचा है. इसी प्रकार 11 रिजर्व एरिया में जंगल घटा है. जाहिर है कि जनजाति को लगातार विस्थापित किए जाने के बावजूद न तो बाघ बच पाए हैं और न जंगल.

मेलघाट में कोरकू जनजाति का अतीत देखा जाए तो 1860-1900 के बीच प्लेग और हैजा से पहाड़ियां खाली हो गई थी. तब ये लोग मध्यप्रदेश के मोवारगढ़, बेतूल, शाहपुरा भवरा और चिंचोली में जाकर बस गए. उसके एक दशक बाद अंग्रेजों की नजर यहां के जंगल पर पड़ी. उन्हें फर्नीचर की खातिर पेड़ काटवाना और उसके लिए पहुंच मार्ग बनवाना था. इसलिए कोरकू जनजाति को वापिस बुलाया गया. आजादी के 25 सालों तक उनका जीवन जंगल से जुड़ा रहा. उन्होंने जंगल से जीवन जीना सीखा था. लेकिन जैसे-जैसे जंगल से जीवन को अलग-थलग किया जाने लगा वैसे-वैसे उनका जीना दूभर होता चला गया.

अनिल जेम्स कहते हैं कि-`बीते 34 सालों से `मेलघाट टाइगर रिजर्व´ में जनजातियों का शिकार जारी है. जैसे जैसे टाईगर रिजर्व सुरक्षित हो रहा है यहां रोटी का संकट गहराता जा रहा है. जनजातीय पंरपराओं का ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो चुका है. यहां सामाजिक ऊथल-पुथल अपने विकराल रुप में हाजिर है. राहत के तौर पर तैयार सरकारी योजनाओं का असर बेअसर ही रहा. हर योजना ने लोगों को कागजों में उलझाए भर रखा और अब लोग भी उलझकर जंगल की मांग ही भूल गए हैं.

बांगलिंगा गांव में 85 साल के झोलेमुक्का धाण्डेकर ने जंगल की बातों के बारे में बताया कि-`पहले हम समूह में रहने के आदी थे. अपनी बस्ती को पंचायत मानते और हर परेशानी को यही सुलझाते. `भवई´ त्यौहार पर साल भर का कामकाज और कायदा बनाते. इन मामलों में औरत भी साथ होती. वह अपना हर फैसला खुद ही लेती. चाहे जिसे दूल्हा चुने और पति से अनबन या उसके मरने पर दूसरी शादी करे. शादी में लेन-देन और बच्ची को मारने जैसी बातें नहीं सुनी थी. संख्या के हिसाब से भी मर्द और औरत बराबर ही बैठते. हमारी बस्ती सागौन, हलदू, साजड़, बेहड़ा, तेंदू, कोसिम, सबय, मोहिम, धावड़ा, तीवस और कोहा के पेड़ों से घिरी थी. जंगल में आग लगती तो हम अपनी बस्तियां बचाने के लिए उसे बुझा देते. तभी तो हमें अंग्रेजों ने जंगलों में ही रहने दिया. वहां से सालगिटी, गालंगा और आरा की भाजियां मिलती. बेचंदी को चावल की तरह उबालकर खाते. कच्चा खाने की चीजों में काला गदालू, बैलकंद, गोगदू और बबरा मिल जाते. ज्वस नाम की बूटी को उबलती सब्जी में मिला दो तो वह तेल का काम करती. इसके अलावा तेंदू, आंवला, महुआ, हिरडा, बेहड़ा, लाख और गोद भी खूब थी. फल, छाल और बीजों की कई किस्मों से दवा-दारू बनाते. खेती के लिए कोदो, कुटकी, जगनी, भल्ली, राठी, बडा़ आमतरी, गड़मल और सुकड़ी के बीज थे. ऐसे बीज बंजर जमीन में भी लहलहाते और साल में दो बार फसल देते. इसलिए अनाज का एक हिस्सा खाने और एक हिस्सा खेती के लिए बचा पाते थे.

यह तब की सरल, खुली और समृद्ध जीवनशैली की झलक भर है. बीते 3 दशकों से भांति-भांति की दखलअंदाजियों ने यहां की दुनिया को बुरी तरह प्रभावित किया. 1974 में सबसे पहले वन-विभाग ने बाघ के पंजों के निशान खोजने और उनकी लंबाई-चौड़ाई तलाशने के लिए सर्वे किया. फिर जमीनों को हदों में बांटा जाने लगा. इस तरह जंगल की जमीन राजस्व की जमीन में बदलने लगी और लोग यहां से बेदखल हुए. 1980 के बाद सरकार ने इन्हें पानी की मछली, जमीन के कंदमूल और पेड़ की पित्तयों के इस्तेमाल से रोका. मगर पूरा जंगल बाजार के लिए खोल दिया गया. जंगल के उत्पाद जब बाजार में बिकने लगे तो यहां की जनजाति भी जंगल की बजाय बाजारों पर निर्भर हो गई. इससे चीजों का लेन-देन बढ़ा और उन्हें रूपए-पैसों में तौला जाने लगा. अनाज के बदले नकद की महिमा बढ़ी. नकदी फसल के रुप में सोयाबीन और कपास पैदा किया जाने लगा. बाजार से खरीदे संकर बीज अधिक से अधिक पानी और रसायन मांगने लगे. समय के साथ खेती मंहगी होती गई. इस बीच नई जरूरतों में इजाफा हुआ और उनके खाने-पीने, रहने और पहनने में अंतर आया. आज कोरकू लोग कई जडियां और उनके उपयोग नहीं जानते.´´

यह तब की सरल, खुली और समृद्ध जीवनशैली की झलक भर है. बीते 3 दशकों से भांति-भांति की दखलअंदाजियों ने यहां की दुनिया को बुरी तरह प्रभावित किया. 1974 में सबसे पहले वन-विभाग ने बाघ के पंजों के निशान खोजने और उनकी लंबाई-चौड़ाई तलाशने के लिए सर्वे किया. फिर जमीनों को हदों में बांटा जाने लगा. इस तरह जंगल की जमीन राजस्व की जमीन में बदलने लगी और लोग यहां से बेदखल हुए. 1980 के बाद सरकार ने इन्हें पानी की मछली, जमीन के कंदमूल और पेड़ की पित्तयों के इस्तेमाल से रोका. मगर पूरा जंगल बाजार के लिए खोल दिया गया. जंगल के उत्पाद जब बाजार में बिकने लगे तो यहां की जनजाति भी जंगल की बजाय बाजारों पर निर्भर हो गई. इससे चीजों का लेन-देन बढ़ा और उन्हें रूपए-पैसों में तौला जाने लगा. अनाज के बदले नकद की महिमा बढ़ी. नकदी फसल के रुप में सोयाबीन और कपास पैदा किया जाने लगा. बाजार से खरीदे संकर बीज अधिक से अधिक पानी और रसायन मांगने लगे. समय के साथ खेती मंहगी होती गई. इस बीच नई जरूरतों में इजाफा हुआ और उनके खाने-पीने, रहने और पहनने में अंतर आया. आज कोरकू लोग कई जडियां और उनके उपयोग नहीं जानते.´´

पसतलई गांव के एक युवक ने नाम छिपाने की शर्त पर बताया कि- `जंगली जानवरों का शिकार करने वाली कई टोलियां यहां घूम रही हैं. कमला पारधन नाम की औरत इसी धंधे में लिप्त थी. बाद में पुलिस ने उसे धारणी में गिरफ्तार कर लिया.´ यहां जानवरों के हमलों की घटनाएं भी बढ़ रही हैं. कुंड गांव की बूढ़ी औरत मानु डाण्डेकर ने जानवरों से बचने के लिए तब की झोपड़ी को याद किया-`वह लकड़ियों और पत्तों की बनी होती, ऊंचाई हमसे 2-3 हाथ ज्यादा रहती. छत आधी गोल होती जो पूरी झोपड़ी को ढ़क लेती. उसमें घुसने के लिए दरवाजा उठाकर जाते. दरवाजे की हद इतनी छोटी रखते कि रेंगकर घुसा जाए. झोपड़ी के चारों तरफ 2-3 फीट लंबी पत्थरों की दीवार बनाते. रात को झोपड़ी के बाहर आग सुलगाते. पूरी बस्ती प्यार, तकरार, शादी, शिकार, जुदाई और पूजन से जुड़े किस्सों पर गाती-धिरकती. जैसे प्यार के गीत में लड़की से मिलने के लिए रास्ता पूछने, शादी के गीत में दूल्हा-दुल्हन बनकर आपस में बतियाने और जुदाई के गीत में शिकार पर गए पति के न लौटने की चर्चा होती.´´

यह बस्तियां अपनी पंरपरा और आधुनिक मापदण्डों के बीच फसी हैं. घरों की दीवारों पर रोमन केलेण्डर और रात में जलती लालटन लटकती हैं. बाहरियों के आने से इनके भीतर हीनता बस गई.यह खुद को बदलने में जुटे हैं. यहां के मोहल्लों ने कस्बों की नकल करके अपनी शक्लों को बिगाड़ रखा है. अब कोरकू बोली की जगह विदर्भ की हिन्दी का असर बढ़ रहा है. जबकि कार्यालय की भाषा मराठी है. इसलिए कोरकू जुबान फिसलती रहती है. खासकर स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को जानने और बोलने में मुश्किल आती है. कोरकू लोग कहते हैं कि सबकुछ खोने के बाद हमें कुछ नहीं मिला. स्कूल के टीचर और अस्पताल के डॉक्टर मैदानी इलाकों में बने हुए हैं. लेकिन हमारे हिस्से में न मैदान आया, न पहाड़. हम कहां जाए?