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26.9.09

हीरे की मण्डी में हारती जिन्दगी

शिरीष खरे, सूरत से लौटकर


मंदी की उठा-पटक के बीच सूरत का चेहरा भले कई लोगों के लिए अब भी चमकदार लग रहा हो लेकिन इस चमक के पीछे एक ऐसा अंधेरा फैलता जा रहा है, जिसमें जिंदगी हारती जा रही है. मंदी के तूफान ने हीरे की मण्डी सूरत की सूरत कुछ ऐसी बिगाड़ी कि पिछली दीवाली से इस जुलाई के पहले हफ्ते तक हीरा-कारखाने के 39 मजदूरों ने अपनी जान दे दी. हालांकि गैरसरकारी आकड़ों में यह संख्या 90 के पार ठहरती है.

मंदी के तूफान ने हीरे की मण्डी सूरत की सूरत कुछ ऐसी बिगाड़ी कि दीवाली से जुलाई के पहले हफ्ते तक हीरा-कारखाने के 39 मजदूरों ने अपनी जान दे दी. हालांकि गैरसरकारी आकड़ों में यह संख्या 90 के पार ठहरती है.

पिछले कुछ समय में गुजरात के सबसे चमकदार शहर सूरत में हीरे की 10,000 से ज्यादा यूनिट बंद हुई, जिससे आठ लाख से ज्यादा मजदूर बेकार हो गए. पिछले साल नंवबर-दिसम्बर के दो महीनों में ही कम से कम एक लाख मजदूर शहर छोड़ चुके थे. आज की तारीख में यह आंकड़ा चार लाख के बाहर पहुंच चुका है और मज़दूरों के पलायन का यह सिलसिला अब तक जारी है. जनवरी के पहले हफ्ते में ही 5 इलाकों से स्कूलों के 4,500 बच्चों को फीस न भरने के चलते निकाला जा चुका था.

कायदे से सूरत का यह हाल एक 'राष्ट्रीय मुद्दा' होना चाहिए लेकिन राज्य के सारे राजनैतिक दल इन दिनों खामोश हैं. लोकसभा-चुनाव की लहर जा चुकी है, अब सिर पर सूरत-कारर्पोरेशन का चुनाव है. फिर भी हीरा-कारखाने के मजदूरों को राहत देने के सवाल पर हर तरफ सन्नाटा है.

एक नजर सूरत की सूरत पर

सूरत में हीरे की छोटी-बड़ी कुल 14,310 यूनिट हैं, जिसमें से 10,017 याने 70 फीसदी बंद हो चुकी हैं. सभी 14,310 यूनिट में 9,70,000 मजदूर काम करते थे, जिसमें से करीब 8,000000 याने 80 फीसदी से भी ज्यादा बेकार हो चुके हैं. बाकी बचे मजदूरों को अगर काम मिलता भी है तो उनके महीने की आमदनी (12,000) से आधी से आधी से आधी (15,00) हो गई है.


जमीनी पड़ताल के लिए एक छोटे-सा सर्वे देखते हैं. शहर के वारछा रोड़ पर हीरे की 2,59 यूनिट में से 80 के दरवाजे बंद हो चुके हैं. यहां की 1 यूनिट में औसतन 63 मजदूर थे, इस लिहाज से जोड़े तो 5,040 से ज्यादा मजदूरों के हाथों से मजदूरी निकली है. इसी तरह कापोदरा विस्तार की 5,97 यूनिट में से 2,43 में काम बंद है. यहां की 1 यूनिट से औसतन 75 मजदूर थे, यहां भी 18,225 से ज्यादा मजदूर बेकार हुए. यह ऐसी छोटी-छोटी यूनिट थीं जिनके पास अब कच्चा हीरा खरीदने के लिए पैसा नहीं बचा है.


श्यामधाम चौकड़ी, देवीकृपा सोसायटी के सूरज पटेरिया का यह 36 वां साल चल रहा था. गए साल तक उन्होंने खुदखुशी करने के बारे में सोचा भी नहीं होगा. लेकिन दीवाली के बाद सूरज ने दो बार जहर पीकर मरना चाहा. दोनों बार उन्हें पड़ोसियों ने बचा लिया.

एक तो भूख, ऊपर से अपने ही इलाज के खर्च ने उन्हें दिमागी तौर से भी लाचार बना दिया. तीसरी बार उन्होंने अपने को जलाकर खुदखुशी कर ली. अब उनके पीछे उनकी पत्नी अंजू बेन और चौथी में पढ़ने वाला लड़का राहुल है. इन दोनों को अपने आने वाले कल के बारे में कुछ खबर नहीं. अंजू बेन और राहुल केवल नाम भर हैं, सूरज में तो ऐसे परिवारों की एक लंबी सूची हैं, जिसमें नए-नए नाम जुड़ते जा रहे हैं.

सूरत-ए-हाल

देश के हीरा निर्यात में सूरत की हिस्सेदारी 24 अरब डालर के आसपास है. दीवाली के पहले अफ्रीका के एटेन्पर्व से काले पत्थर सूरत के कारखानों में आते थे. ऐसे पत्थरों को सूरत के 'रत्न कलाकार' कहे जाने वाले मजदूर तरासते और चमकदार हीरे में बदल देते.

लेकिन मंदी के मारे बीते अक्टूबर से एटेन्पर्व के काले पत्थरों का आयात बंद हो गया. यही कारण है कि पिछले 9 महीनों से हज़ारों हीरा कारखानों में ताले लटक गये हैं और मज़दूरों के सामने दो जून की रोटी के लाले पड़ गये हैं. शहर की सूरत में कभी चार चांद लगाने वालों की दुनिया फिलहाल घुप्प अंधियारे में है, जहां उजाले की कोई किरण नज़र नहीं आ रही.

सूरत में जब मंदी का शोर कुछ और बढ़ा तो बड़े-बड़े साहूकार मौके की नजाकत भांप गए और छोटी-छोटी यूनिट चलाने वालों का करोड़ो रूपए लेकर भाग गए. जैसे कतारगाम के हर्षद महाजन और घनश्याम पटेल को ही लें. यह दोनों ब्याज के 7 करोड़ रूपए लेकर लापता हैं. इसी तरह साजन तालुका का एक और महाजन जो मिनी बाजार और राजहंस टावर में 1,00-1,50 लोगों के साथ लेन-देन करता था; कोई साढ़े 5 करोड़ रूपए के साथ रफू-चक्कर है. इसलिए छोटी-छोटी यूनिट चलाने वालों के कारोबार ठप्प हुए और फिर बड़ी संख्या में मज़दूर सड़कों पर आ गये.

हीरा-व्यापारियों का हाल सुने तो पालिश्ड हीरे नहीं बिकने से उन्हें नकद नहीं मिल रहा है. इसलिए वह कच्चा हीरा खरीद ही नहीं सकते. तभी तो मिनी बाजार में हीरे के हजारों व्यापारियों का एक साथ जमा होना जैसे बीते कल की बात लगती है.

एक पहेली जिंदगानी

लेकिन सारे आकड़ों के बीच ऐसा पहलू भी छिपा है जो आज नहीं तो कल हालात को और उलझा सकता है. सूरत में 'फेक्ट्री एक्ट' के मद्देनजर हीरे की केवल 4,27 फैक्ट्रियां ही निबंधित हैं. लेकिन यहां चलने वाली फैक्ट्रियों की संख्या 14,310 है. मतलब ये कि सूरत की 13,883 फैक्ट्रियां निबंधित ही नहीं हैं.

असल में ज्यादातर मालिक 'टैक्स' से बचने, मजदूरों को 'पीएफ' और 'ईएसआई' जैसी सुविधाएं न देने के लिए 'फेक्ट्री एक्ट' को अनदेखा करते हैं. इसलिए 13,883 यूनिट से जुड़े करीब 9,40,000 मजदूर 'फेक्ट्री एक्ट' के दायरे से बाहर हैं. अभी तो यहां के एक भी हीरा-मजदूर को मुआवजा नहीं मिला है, लेकिन कल अगर मुआवजे की बात उठती है तो 'अन-रजिस्टर्ड' कही जाने वाली 13,883 फैक्ट्रियों के कोई 9 लाख 40 हज़ार मज़दूरों का क्या होगा ? क्या उन्हें मुआवजे का पात्र समझा जाएगा ?

हार गई जिंदगी

आकार अपार्टमेंट, कुबेरनगर की 'संदवी डायमण्ड' जैसी बड़ी कंपनी से जुड़े 40 साल के कल्पेश जादव की घर-गृहस्थी ठीक-ठाक चल रही थी. लेकिन 6 महीने तक काम न मिलने से वह खाली हाथ घर लौटते थे. एक रात जब वह लौटे तो खाने का एक दाना न होने पर पत्नी से जमकर झगड़ा हुआ. इसके बाद वह कहीं से 5 किलो चावल, 5 किलो आटा और 1 किलो तेल तो लाए लेकिन किसी को अनुमान नहीं था कि कल्पेश के मन में किस तरह का द्वंद्व चल रहा है. कल्पेश उस रोज ताप्ती नदी में ऐसे डूबे कि वापिस नहीं आए. कल्पेश ने मुक्ति पा ली, उनकी पत्नी अब अकेली है, बच्चे अभी से संघर्ष के दिन देखने के लिए रह गए हैं.

पुणागांव, विक्रम सोसायटी के अशोक भाई घाट ने 30 वें साल में कदम रखा था. उनकी बिटिया उन्नति 1 साल की होने वाली थी. अशोक भाई 'शिवजी डायमंड' कंपनी में थे. जब बेरोजगारी की नौबत आई तो उसका सामना करना उन्हें मुश्किल लगा और उन्होंने जहर पी कर अपनी जान दे दी.

उवली रोड़, मोहनदास सोसायटी के भरत ठुमरे ने 35 साल देख लिए थे. फांसी की रस्सी उन्हें जिंदगी की तंगी से कही ढ़ीली लगी होगी. इसलिए तो पत्नी और 10 साल से भी कम उम्र के दो बच्चों को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़कर चले गए.

कतारगाम में 60 साल की जीबी बेन अपने 34 साल के बेटे सूर्य की बेकारी देख न सकी, उन्होंने केरोसिन डालकर खुदखुशी कर ली. सूर्य 'शीतल डायमंड' कंपनी में काम करता था.

वह औरतें सबसे ज्यादा प्रभावित हुई हैं जो जैसे-तैसे अपने घर संभाल रही थीं. पति की लम्बी बेकारी ने उन्हें मायके जाने पर मजबूर किया. इन दिनों सौराष्ट्र से कुछ औरतों की खुदखुशी के मामले जोर पकड़ने लगे हैं. सबसे ज्यादा मजदूर सौराष्ट्र से ही आए थे. दूसरी तरफ कई मजदूरों की शादियां भी टूट रही हैं.

जो जिंदा हैं

19 जनवरी को 'सूरत डायमण्ड एसोसिएशन' की तरफ से बच्चों की स्कूल-फीस माफ करने के लिए फार्म बंटने वाले थे. तब 12,000 की भीड़ जमा हुई. लेकिन अफरा-तफरी के माहौल में पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा.

पुलिस की लाठी से 35 साल की बसंती बेन बगाणी बुरी तरह घायल हो गई. नवी शक्ति, विजय सोसायटी की बसंती बेन से जाना कि वह अपने 3 बच्चों, 4 साल के शिवम, 5 साल के जेनल और 7 साल के सावंत के लिए रात 2 बजे से ही लाइन में लगी थी. जैसे ही उनका नंबर आने को हुआ, लाठी चार्ज हुआ और उनका माथा फूट गया. जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है जनवरी के पहले हफ्ते में ही 5 इलाकों से स्कूलों के 4,500 बच्चों को फीस न भरने के चलते निकाला जा चुका था.

ठक्करनगर की कोकिला बेन से मालूम हुआ कि उनके पति 9 महीने से खाली हैं. उनके सिर पर अब तक 25,000 का कर्ज चढ़ चुका है. चिंटू कहकर बुलाने वाले बड़े लड़के ने 12 वीं 67 प्रतिशत के साथ पास की थी. लेकिन पैसे की मजबूरी से कालेज की पढ़ाई रूकी हुई है. कोकिला बेन कहती हैं- “पहले औरतों को घर में हीरे के पैकेट बनाने का काम मिल जाता था. इससे वह अपने खर्च-पानी के लिए महीने भर में 12,000 से 15,000 रूपए कमा लेती थीं. हीरे के कारखानों के बंद होते ही उनके खर्च-पानी का पैसा भी चला गया.”

आपके पति दूसरा काम तलाश सकते हैं ? जबाव में कोकिला बेन ने बताया कि जो आदमी अपनी कलाकारी से 12,000 रूपए महीना कमाता हो, जिसकी आमदनी के मुताबिक ही घर की जरूरतें बन गई हो, ऐसे में बिल्कुल आमदनी नहीं होने पर जरूरतें पहाड़-सी लगेगी ही. रही बात दूसरे काम की, तो कोई भी हीरा-मजदूर ऐसा चाहकर भी नहीं कर पाएगा. जो मजदूर 15-20 साल से हीरा तराशने जैसा काम करता हो, उससे मेहनत वाली मजदूरी बनेगी भी नहीं. उसे रात-दिन मेहनत से महीने भर में 15,00 ही मिलेंगे, अगर वह मेहनत वाले काम करना भी चाहे तो उसे मेहनत वाले काम देने से पहले हर कोई हिचकिचाएगा.

जबाव के इंतजार में...

24 जनवरी को ठक्कर नगर, डायमंड पार्क में राधा बोरसे जैसी 1,000 औरतों ने राज्य के मुखिया नरेन्द्र भाई (मोदी) को 1,000 पोस्ट-कार्ड भेजे. इन औरतों ने लिखा था कि घर में न अनाज है, न केरोसिन. दो टाइम खाने को तरस गए हैं. एक महीने से कोई सब्जी नहीं आई है. बच्चों की पढ़ाई भी रोक दी है. जल्दी मदद भेजिए वरना हमको भी सुसाइड करना पड़ेगा.

उन्होंने राज्य के मुखिया को यह पोस्ट-कार्ड इसलिए लिखा क्योंकि गुजरे विधान-सभा चुनाव के वक्त महिला-सम्मेलन में नरेन्द्र भाई गरजे थे- “तुम्हें कभी कोई परेशानी हो, भाई जानकर एक पोस्ट-कार्ड भर भेजा देना.” अब रक्षाबंधन आने को है, लेकिन सूरत की बहनों को गांधीनगर के भाई का जवाब नहीं मिला.

14 फरवरी को लोक-सभा चुनाव में राहुल भैया (गांधी) भी पधारे थे. उन्होंने अपने ही अंदाज में हीरा-मजदूरों से सीधी बात साधी थी. लोगों ने उनसे पूछा कि चलिए गुजरात सरकार ने हमारे लिए कुछ नहीं किया, केन्द्र सरकार क्या करने वाली है ?

जनता में एक ने उन्हें याद दिलाया कि जब केन्द्र सरकार 'सत्यम' जैसी (7,000 करोड़ का घोटाला करने वाली) कंपनी को बचाने के लिए राहत पैकेज दे सकती है तो देश के जो आम लोग अपनी मौत मर रहे हैं, उन्हें बचाने में इतनी देर क्यों ? राहुल कोई जबाव नहीं दे पाए. कांग्रेस ने दिल्ली में झण्डा फहराते ही जीत की पगड़ी राहुल गांधी के सिर पर बांधी है. इसके बाद तो वह ‘लाजबाव’ हो चुके हैं.

लोकसभा-चुनाव में भाजपा ने कहा- “दिल्ली वाले जाग रहे होते तो ऐसे हालात नहीं होते.” कांग्रेस ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को नया विशेषण दिया- “ कुंभकरण न जाने कब जागेंगे.” कांग्रेस के कार्यकर्ता यह तर्क देते भी घूमते रहे कि- “मामला सेंटर से नहीं, गांधीनगर से सुलझेगा.” इस तरह चुनाव के साथ यह आरोप-प्रत्यारोप भी गुजर गये, नहीं गुजरे तो आत्महत्याओं के हादसे. सांसद चुने गए, नहीं चुनी गई तो मजदूरों की मजबूरियां. सरकार भी बनी, नहीं बंधी तो पहले जैसे हालात बनने की उम्मीदें. वैसे मजदूरों के पास उम्मीद के अलावा और कुछ है भी नही.

लेकिन शहर के कुछ लोग, यहां तक की मीडिया का एक हिस्सा हीरा-कारखाने के सेठ लोगों से खफा है. उनके नजरिए से जब तक मुनाफे का धंधा चल रहा था तब तक तो मजदूरों की मेहनत और कलाकारी से सेठ लाखो से करोड़ो, करोड़ो से अरबो कमाते रहे. लेकिन जैसे ही मंदी ने मुंह दिखाया, सेठ लोगों ने मुंह मोड़ लिया. मजदूरों की उम्मीदें या जरूरतें लाखों-करोड़ों की नहीं हैं. ऐसे में सेठ लोगों को मजदूरों की मामूली जरूरतों में मददगार बनना ही चाहिए था. लेकिन उनकी तरफ से मदद की हवा तो दूर, मदद का एक पत्ता भी नहीं हिलता.

आत्महत्याएं ठण्डे बस्ते में

सूरत में हीरे की चमक नहीं लौट रही है. दो-एक महीने से आत्महत्याओं के मामले में कमी जरूर देखी गई है. यह किसी के विशेष प्रयासों का नतीजा नहीं हैं, यह तो हर दिन करीब तीन सौ मजदूर परिवारों के सूरत छोड़ने का नतीजा है. ऐसे में आत्महत्याओं के किस्से सूरत के आसपास फैल गए हैं. शहर से जाने वाले एक परिवार के जमेश और महेश (भाई-भाई) ने हाथ हिलाते हुए कहा- “दोबारा सूरत ही लौटेंगे.”

लेकिन सूरत में छाये संकट के बादल बरसने भर से खत्म नही होने वाले.

20.9.09

इसलिए सूरत में 50,000 बच्चे काम पर जाते है

शिरीष खरेसूरत: शहर में जो 262 प्राइमरी स्कूल हैं, उनमें महापालिका के स्कूलों की संख्या दो है। दूसरे हैरतअंगेज आंकड़ें के मुताबिक, महापालिका के सेकेण्डरी स्कूलों की संख्या है चार। 112.27 वर्ग किलोमीटर में फैले सूरत की 29 लाख आबादी में से 6 लाख गरीब हैं। एक तो प्राइमरी स्कूलों और गरीबों के बच्चों के बीच का फासला बेहद ज्यादा है, ऐसे में जो थोड़े से बच्चे किसी तरह स्कूल जाते हैं, उनमें से भी 10 प्रतिशत बच्चे सेकेण्डरी स्कूलों तक नहीं पहुंच पाते। सवाल है कि जो बच्चे स्कूल नहीं जाते वो क्या करेंगे ? जवाब मिलता है- आज नहीं तो कल काम पर ही जाएंगे।


गुजरात के महत्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र के अलावा सूरत सबसे मंहगे शहरों में से भी एक है। यहां साग-सब्जी, अनाज और रोजमर्रा की जरूरी चीजें बाहर से आने से बहुत मंहगी मिलती हैं। ऐसे में 4 सदस्यों वाले एक परिवार को यहां रहने के लिए कम से कम 5,000 रूपए तो चाहिए ही। इसलिए, घर की गृहस्थी चलाने में बच्चों को मददगार माना जाता है।
सूरत से मुंबई की तरफ जाने वाली ट्रेन की रफ़्तार तेज होते ही अंबेडकरनगर की घनी झुग्गियां बहुत पीछे छूटने लगती हैं। ऐसे में शायद ही किसी का ध्यान '''स्मीमेल हॉस्पीटल' की उस दीवार पर जाए, जिसके सहारे से करीब 100 झुग्गियां सट गई हैं। पटरियों के आसपास बिखरी गंदगी की सल्तनत से हवा में दूर तक कई किस्म की बदबुएं घुल-मिल गई हैं।
यहां रहने वाले संजू बाघेला, 3 भाईयों में सबसे बड़े हैं। 14 साल की उम्र कोई बड़ी उम्र नहीं कहलाती, फिर भी वह 6 महीनों से टेक्सटाइल मार्केट की गोदाम में लगा है। उसकी 10 गुणा 12 वर्ग फीट की एक झुग्गी ही कई चीजों जैसे डबल-बेड की लकड़ियों, बांस की बल्लियों, कच्ची मिट्टी, पत्थरों, पत्तों और पन्नियों से मिलकर बनी है। उसके मां-बाप रेलवे के खुले पुल के नीचे से गुजरने वाली रोड पर ठेला लगाकर सब्जियां बेचते हैं। सब कुछ ठीक रहा, तो वह रोज का 100 रूपए बचा लेते हैं। इस तरह महीने के 30 दिनों में 3000 रूपए भी जोड़ें, तो सूरत जैसी जगह के लिए बहुत थोड़े पड़ते हैं। ऐसे में संजू एक उम्मीद की तरह है, एक रोज जब वह लायक हो जाएगा तो महीने में 1,000 रूपए तो कमायेगा ही।
मालिक की नजर में संजू अभी लायक नहीं हुआ, इसलिए मेहनताने के नाम पर कुछ नहीं मिलता। यह पहली नौकरी है, इसलिए संजू हर सुबह 7 के पहले-पहले मान दरवाजे की साड़ी-गोदाम को निकलता है। 14 किलोमीटर आने-जाने में उसके कुछ दोस्त रिक्शा शेयर करते हैं। संजू का 10 रूपए रोज भाड़े में ही जाता है। लौटना रात 10 के पहले-पहले नहीं होता। वह सुबह 5 बजे उठने के लिए आते ही सो जाता है। अंधेरा छंटने के पहले उसे पटरी को पार करके खुले में शौच करना पड़ता है, घर का पानी भर लेना पड़ता है। वैसे घर के ज्यादातर काम छोटे भाई मुकेश के हिस्से में हैं। लेकिन, 12 साल के होते ही उसे भी ट्रेनिंग में भेजा जाने वाला है। इन बच्चों की मां दक्षा बेन ने बताया कि सब्जी खरीदने के लिए रोजाना 500 से 600 रूपए चाहिए। इन दिनों आजू-बाजू की बस्ती टूटने से ग्राहकी कम हो गई है। दूसरे किस्म के कामों में अनाड़ी हैं, भूखा सोने से बच्चों को काम पर भेजना अच्छा है।
संजू के तीन दोस्त बेअटक किताबे पढ़ते हैं। संजू केवल अपना नाम लिख पाता है। उसे 1,2,3 भी आता है, जोड़ना-घटाना नहीं। वह कुछेक रोज के लिए स्कूल भी गया था, लेकिन पहली के बच्चे के लिए रेल की पटरियां, संगम टेकरी के पहले आने वाले मेन-रोड़ के ट्रेफिक से गुजरते हुए दो किलोमीटर चलना बहुत मुश्किल था। जब से मोटर-साइकिल की टक्कर में दांया पांव खराब हुआ, तब से उसने स्कूल जाने का नाम ही छोड़ दिया।
आज भी रेलवे लाइन के छोटे बच्चे लाचार हैं क्रासिंग करने से। बड़े लाचार हैं उन्हें स्कूल लाने-ले जाने से। 11 फरवरी को जब बुलडोजर चला, तो पता चला कि यहां कुल 156 झुग्गियों के 1125 लोग रहते हैं, लेकिन यहां से एक भी बच्चा स्कूल नहीं जाता।
इस लाइन के अजय ठाकुर, मोगिया, परवीन अहीरे, संजय उखरू और राजा जनार्दन की कहानियां तो और भी उलझी हैं। अजय का पिता दीवाली को दारू के नशे में अपने दो लड़कों और तीन लड़कियों को छोड़कर खत्म हो गया। सोलह साल का अजय टेक्सटाइल मार्केट की बहुमंजिला इमारतों से बोरियां उठाकर नीचे खड़े ट्रको में भरता है। एक बोरी का 2 रूपए, इस तरह वह दिनभर में 25 बोरियों को ठिकाने लगाता है।
मोगिया का पिता भी ऐसे ही खत्म हुआ था। वह अभी 13 का है, और 12 की छोटी बहिन आकू के साथ कचरा बीनता है। 14 की कविता अपनी मां अरूणा के साथ 'स्मीमेल हास्पीटल' के बाथरूमों को साफ करती है। ऐसे सारे बच्चे रविवार को काम नहीं मिलने पर अंजू बेन के टेलीविजन के सामने जमा होते हैं। इस लाइन में एक ही टेलीविजन होने से यह हिस्सा वीडियो थियेटर जैसा लगता है।
यहां के बच्चे इधर-उधर ज्यादा घूम-फिर नहीं सकते, क्योंकि कई बार पुलिस धारा 155 और 109 का इस्तेमाल करके उन्हें अंदर डाल देती है। अगर मां-बाप को मालूम पड़ा, तो 50 रूपए के बदले वह अपने बच्चे को छुड़ा लाते हैं। दूसरी तरफ कानून को अनदेखा करते हुए महापालिका के कांट्रेक्टर छोटे-छोटे बच्चों से काम करवाते हैं। उदाहरण के लिए 12 साल का विनोद अपने कई दोस्तों के साथ सरदार ब्रिज में बिजली के खंभों को रंगता है। किसी विभाग में अगर 18 साल से कम उम्र के बच्चे काम करते हैं, तो उन्हें दण्ड दिया जाता है। इस लिहाज से महापालिका पर भी ऐसा दण्ड लगना चाहिए। सलामती का कोई भी साधन दिए बगैर बच्चों को ऐसे जोखिम भरे कामों में ही चढ़ा दिया जाता है। हमारे दौरे के दौरान ही पिप्लोद के पास के एक खंभे पर चढ़ा इलेक्ट्रिशियन हादसे में मारा गया।
सोमवार को हम संजू से मिलने के बहाने मान दरवाजे की गोदाम में गए। संजू गोदाम का काम तो करता ही है, जरूरत पड़े तो अशिंका-गारमेंट्स के नाम से चलने वाली मालिक की दूसरी दुकान में भी जाता है। शापिंग-काम्पलेक्स की यह गोदाम जमीन के भीतर है। गोदाम की गैलरी इतनी पतली, अंधियारी है कि बड़े-बड़ों की आंखें धुंधली हो जाएं। यहां एक छोटे से गोदाम में 12 से 15 साल तक के 12 बच्चे पतली-पतली उंगलियों से साड़ियों की कटिंग, धागों की बुनावट, पैकिंग और बोझा उठाने से लेकर सामान को दो मंजिला ऊपर तक लाने-ले जाने का काम करते हैं। 12 में से 8 को खांसी और दमा की बीमारी का पता लगते ही हम चौंक गए। वहां न पंखा है, न खिडकियां। गर्मी, एक जगह घंटों बैठने और काम से शरीर टूटता है, लेकिन काम नहीं रूकता। दिनभर भीतर बैठने से मालूम नहीं चलता कि दिन है या रात। आधे घंटे के लंच की खबर सुनते ही बच्चे समझ जाते हैं कि 2 से 3 बजा होगा।
गुजरात में बाल मजदूरी से जुड़े कुछ तथ्‍य:
गुजरात के ही एक-चौथाई से ज्यादा बाल-मजदूर काम करते हैं। सरकारी आंकडों के हिसाब से सूरत में 5,000 बाल-मजदूर हैं, जबकि गैर सरकारी आंकडों को देखें, तो यह संख्या 50,000 को पार कर जाती है।
इसमें 15 से 18 साल के 68 प्रतिशत बाल मजदूर हैं। ‘राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग’ भी यह मानता है कि गुजरात के सूरत, भावनगर और बांसकांठा जिलों में बाल मजदूरी के मामले सबसे ज्यादा सामने आए हैं। इन जिलों के कुल मजदूरों में से 28.51 प्रतिशत बाल मजदूर हैं।
यहां 4 लाख 50 हजार पावरलूम ही हैं। तेजी से बढ़ती पावरलूम इकाइयों ने अधिक, अकुशल और सस्ती मजदूरी के लिए बड़ी संख्या में बच्चों को काम पर लगाया है। टेक्स्टाइल इंडस्ट्री के बाल-मजदूर तीन पावरलूम फैक्ट्री, डाईंग प्रिटिंग और टेक्स्टाइल मार्केट में बटे हैं। यूनियनों की गैर मौजूदगी से भी बाल-मजदूरी में इजाफा हुआ। इन दिनों शहर की सारी पावरलूम इकाइयां मिलकर हर दिन 5 करोड़ का टर्नओवर करती हैं और हर दिन 35 हजार से एक लाख साड़ियां बनाती हैं।
गुजरात सरकार ने 2010 तक प्रदेश को बाल-मजदूरी से मुक्त करने का संकल्प’ ले लिया है।

30.7.09

मुंबई मेट्रो क्या करेगा ?

शिरीष खरे, मुंबई से
“हमारे शहर रहने लायक होने चाहिए, जहाँ आम आदमी गुज़र-बसर कर सके." ये शब्द प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के थे.
21 जून 2006 को मुंबई मेट्रो रेल का शिलान्यास करते हुए जब मनमोहन सिंह ने ये बातें कही थीं तो लगा था कि मुंबई में मेट्रो रेल सच में मुंबई की नई जीवन-रेखा होगी. लेकिन यह सिक्के का एक पहलू था. आज तीन साल बाद भी इसका दूसरा पहलू सवाल बन कर खड़ा है कि आखिर मेट्रो से किन ताकतों का कैसा हित जुड़ा है ? इस मेट्रो रेल से तरक्की के मुकाबले कितनी तबाही होगी ? आखिर मेट्रो से शहर की यातायात व्यवस्था किस हद तक बेहतर होगी ? और ये भी कि मुंबई मेट्रो क्या करेगा ?
सवाल यूं ही नहीं हैं. हर सवाल के साथ कई तरह की आशंकाएं और उलझनें जुड़ी हुई हैं और इन सब से बढ़ कर भ्रष्टाचार के नमूने, जिसने मेट्रो रेलवे को संदिग्ध बना दिया है.
प्रोजेक्ट के नोटिफिकेशन को ही देखें तो इसमें डेवेलपर्स को यह छूट दी गई है कि वह “कंस्ट्रक्शन खत्म होने के बाद बची हुई जमीनों को अपने मुनाफे के लिए बेच ” सकते हैं. इसके अलावा उन्हें “सेंट्रल लाइन के दोनो तरफ आरक्षित 50 मीटर जमीनों को दोबारा विकसित” करने की भी छूट मिलेगी. इससे कारर्पोरेट ताकतों को शहर की “सबसे कीमती जमीनों को हथियाने और यहां से व्यापारिक गतिविधियां चलाने” की छूट खुद-ब-खुद मिल जाएगी.
पैसा-पैसा और पैसा
मुंबई मेट्रो पूरी तरह से सरकारी प्रोजेक्ट नहीं है. इसमें प्राइवेट कंपनी सबसे ज्यादा निवेश करेगी. जाहिर है सबसे ज्यादा मुनाफा भी कंपनी ही कमाएगी, न कि सरकार. दूसरा, नोटिफिकेशन के हिसाब से शहर का खास भू-भाग कंपनी की पकड़ में आ जाएगा. यहां से उसे अपना कारोबारी एजेण्डा पूरा करने में सहूलियत होगी. याने मेट्रो से मुनाफा भी कमाओ, मेट्रो से निकलने वाली जमीन से कारोबार भी फैलाओ. इसे कहते है एक तीर से दो शिकार!!
इन दिनों कई कंपनियां रियल इस्टेट, आईटी और रेल के विकास के नाम पर शहर की जमीनों को हथियाना चाहती हैं. हाल ही में बदनाम हुई 'सत्यम' और उसकी सहयोगी कंपनी 'मेटास' ने हैदराबाद के आसपास की हजारों एकड़ जमीन हथिया ली थी.
‘मेटास’ तो 1,200 करोड़ रूपए की हैदराबाद मेट्रो रेल में भी शामिल थी. लेकिन ‘सत्यम’ में 7,800 करोड़ रूपए के घोटाले के बाद ‘मेटास’ को जांच एजेंसियों के हवाले कर दिया गया. ‘मेटास’ के आऊट होने के बाद अनिल अंबानी की ‘रिलायंस- इंफ्रास्ट्रक्चर' अब हैदराबाद मेट्रो में भी बोली लगाने को बेताब है. वैसे भी ‘रिलायंस- इंफ्रास्ट्रक्चर' मुंबई के साथ-साथ दिल्ली मेट्रो का काम तो कर ही रही है.
अगर दाल में कुछ भी काला नहीं है तो सरकार मेट्रो से जुड़े अहम तथ्यों से पर्दा हटाए। लेकिन धरातल पर ऐसा करना शायद सरकार के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है. यही कारण है कि “सूचना के अधिकार” के तहत कुछ सामान्य-सी सूचनाएं मांगने पर उसने तुरूप का इक्का फेंका- “इस किस्म की सूचनाएं साझा करने से राष्ट्र को खतरा हो सकता है.”
कगार की आग
पिछले महीने 11 मई को शहर की झोपड़ियों से हजारों लोग निकले और यशवंत राव चौहान सेंटर पहुंचे. यहां ‘शहरी विकास विभाग’ ने मेट्रो फेस-2 के लिए दो दिनों की जनसुनवाई रखी थी. लोगों की भारी संख्या को देखकर बड़े अधिकारी चौंक खड़े हुए. न केवल संख्या बल्कि लोगों के कई सवालों ने भी उन्हें घेर लिया. जनसुनवाई में 19 बातों का पालन करना होता है, लेकिन प्रशासन ने चुप्पी साधी, फिर थोड़ी-सी जगह निकाली और निकल भागा.
इसी तरह नवंबर, 2008 में भी प्रदेश सरकार ने प्रोजेक्ट से जुड़ी आपत्तियां मांगी थीं. इसके बाद उसे आपत्तियों से भरे 15,000 पत्र मिले. 8,000 लोग मेट्रो के विरोध में सड़क पर उतरे. तब भी सरकार ने लोगों के विरोध को नजरअंदाज कर दिया था. ऐसे में शहर के बीचों बीच विरोध का एक नारा सुनाई देने लगा- “मेट्रो रेल क्या करेगा, सबका सत्यानाश करेगा !!”
आंकड़ों की मानें तो मेट्रो से 15,000 से ज्यादा परिवार उजड़ेंगे. इससे लाखों लोग बेकार हो जाएंगे. अकेले ‘कार सेड डिपो’ बनाने में ही 140 एकड़ से भी ज्यादा जमीन जाएगी. इससे जनता कालोनी, संजय नगर, एकता नगर, आजाद कम्पाउण्ड, गांधी नगर, केडी कम्पाउण्ड और लालजीपाड़ा जैसी बस्तियों के नाम नए नक्शे से मिट जाएंगे. तब यहां के हर मोड़ से गुजरने वाले सुस्त कदम रस्ते और तेज कदम राहें हमेशा के लिए रुक जाएंगे.
आज इन इलाकों से हजारों हाथों को काम मिलता है. कल इन हाथों के थम जाने से रोजगार का संकट गहरा जाएगा. कई रहवासी तो 40-45 साल से यही रहते आ रहे हैं. इन्होंने रोजमर्रा के मामूली धंधों से एक बड़ा बाजार तैयार किया है. उत्पादन के नजरिए से देखा जाए तो धारावी के मुकाबले यहां का बाजार काफी बड़ा है. इस बाजार से 10,000 लोगों की घर-गृहस्थियां आबाद हैं. यह इलाका कई सुंदर आभूषण और सजावटी चीजों को बनाने के लिए मशहूर है. यहां से कई चीजों को दुनिया भर में भेजा जाता है. इन चीजों को बनाने और भेजने में 15,000 महिलाएं शामिल हैं.
इस इलाके में बड़ी संख्या में लोग बेकरी और फुटकर सामान बेचने से भी जुड़े हैं. कुल मिलाकर शहर का यह हिस्सा सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों का मजबूत ताना-बाना है. अगर यह टूटा तो रहने और जीने के कई तार टूट जाएंगे. शहर की रफ्तार बढ़ाने वाले बहुत सारे पंख बिखर जाएंगे.
‘कार सेड डिपो’ बनने से पोईसर नदी भी अपना वजूद खो देगी. साथ ही इससे लगा नेशनल पार्क प्रभावित होगा. अभी तक “पर्यावरण पर होने वाले असर का मूल्यांकन ” भी नहीं हो सका है. ‘पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986’ के तहत ऐसा होना जरूरी है. यह कब होगा, तारीख कोई नहीं जानता.
ऐसी है योजना
मुंबई में मेट्रो रेल का पहला चरण 62.68 किलोमीटर का है जिसमें वरसोवा-अंधेरी-घाटकोपर, कोलाबा-बांद्रा-चारकोप और भांडुप-कुर्ला-मानखुर्द को जोड़ा जाएगा. इसके लिए 2011 की समय सीमा तय की गई है. दूसरे चरण को 2011-2016 के बीच खत्म करने का लक्ष्य रख कर 19.5 किलोमीटर तक मेट्रो की रेलवे पटरियों और अन्य सुविधाओं का विस्तार किया जाएगा. तीसरे चरण में 40 किलोमीटर तक निर्माण लक्ष्य रखा गया है, जिसे 2016 से 2021 के बीच पूरा करना है.
शहर का ट्रांसपोर्ट सिस्टम
कुछ ऐसी रिपोर्ट जारी हुई हैं, जो ट्रांसपोर्ट के नजरिए से मेट्रो को ठीक नहीं मानतीं. आईआईटी, दिल्ली के ट्रांसपोर्ट जानकारों ने एक अध्ययन में पाया कि मुंबई में 47 प्रतिशत रहवासी या तो पैदल चलते हैं, या साइकिल से.
इसी तरह 11 प्रतिशत रहवासी कार या मोटर साइकिल चलाते हैं. इसके बाद बस और रिक्शा से चलने वाले लोगों का प्रतिशत घटा दें तो ट्रेन से चलने वाले कुल 21 प्रतिशत ही बचते हैं. लेकिन ट्रांसपोर्ट के बजट का आधे से ज्यादा हिस्सा मेट्रो के लिए खर्च किया जा रहा है. जहां तक लंबी दूरी की बात है तो मेट्रो बेहद मंहगा प्रोजेक्ट हैं. इसमें घनी आबादी वाली बस्तियों के विस्थापन से होने वाले नुकसान को भी जोड़ दिया जाए तो पूरा प्रोजेक्ट बेहद खर्चीला हो जाता है.
ट्रांसपोर्ट के जानकार सुधीर बदानी के मुताबिक-“ मुंबई में ट्रेन के पुराने सिस्टम को दुरूस्त बनाने और बस-ट्रांसपोर्ट को विकसित करने से राहत मिलेगी. जहां मेट्रो के पूरे प्रोजेक्ट में 65,000 करोड़ रूपए खर्च होंगे, वहीं 2,00 किलोमीटर बस-ट्रांसपोर्ट तैयार करने में सिर्फ 3,000 करोड़. इसलिए बस का रास्ता सस्ता, बेहतर और व्यवहारिक है. यह पर्यावरण और रहवासियों के अनुकूल भी है.”
स्लमडाग मिलेनियेर को ‘गोल्डन ग्लोब’ और ‘आस्कर’ आवार्ड मिलने के बाद मुंबई को तीसरी दुनिया के सबसे दिलचस्प शहरों में से एक कहा जा रहा है. यहां एक तरफ ‘अंधेरी’ की उमंग में डूबी रातें हैं तो दूसरी तरफ 'धारावी' जैसा कस्बाई इलाका है. एक तरफ बेहतरीन रेस्टोरेंट, बार और नाइट-क्लब हैं तो दूसरी तरफ खुली झोपड़ियां, कच्ची-पक्की गलियां और टूटी-फूटी नालियां हैं.
इतनी विविधता वाले शहर की योजनाएं जितनी ज्यादा असंतुलित होगी, नुकसान भी उसी अनुपात में होगा. मुंबई मेट्रो में एक हिस्से को फायदा पहुंचाने के लिए दूसरे हिस्से से कीमत वसूली जाएगी. इस मेट्रो से कुछ लोगों के लिए सफर आसान हो जाएगा लेकिन यह कोई नहीं कहना चाहता कि इसी मेट्रो के कारण हज़ारों परिवार की घर-गृहस्थी की गाड़ी रुक जाएगी.

9.7.09

सूरत जाकर देखें, 50,000 बच्चे काम पर है....

शिरीष खरे, सूरत से लौटकर

सूरत। यह सच है, लेकिन अधूरा कि देश की टेक्स्टाइल इंडस्ट्री में सूरत ‘रीढ़ की हड्डी’ है। यह सच इस तथ्य के साथ पूरा होगा कि देश के अलग-अलग कोनों से आये ‘बाल-मज़दूरों की बदौलत’ टेक्स्टाइल इंडस्ट्री में सूरत ‘रीढ़ की हड्डी’ है। इसमें गुजरात के ही एक-चौथाई से ज्यादा बाल-मज़दूर काम करते हैं। सरकारी आंकडों के हिसाब से सूरत में 5,000 बाल-मजदूर हैं, जबकि गैर-सरकारी आंकडों को देखे तो यह संख्या 50,000 से भी ऊपर है। इसमें 15 से 18 साल के 68 प्रतिशत बाल-मजदूर हैं। ‘राष्ट्रीय बाल-अधिकार संरक्षण आयोग’ भी यह मानता है कि गुजरात के सूरत, भावनगर और बनासकंथा जिलों में बाल मज़दूरी के मामले सबसे ज्यादा उजागर हुए हैं। इन जिलों के कुल मजदूरों में से 28.51 प्रतिशत बच्चे हैं। इसे देखते हुए 2010 तक गुजरात को बाल-मजदूरी से मुक्त करने का ‘राज्य-सरकारी संकल्प’ एक ‘मजाक’ नहीं तो और क्या है ?

सूरत के साउथ-ईस्ट जोन से बिजली की मशीनों वाली ‘खट-खट’ भरी आवाजे यूं ही नहीं आती हैं। 2001 की जनगणना के आकड़े बताते हैं कि यहां 4 लाख 50 हजार से ज्यादा पावरलूम हैं। 1951 के जमाने की रिपोर्ट में यह संख्या सिर्फ 2 हजार 2 सौ 82 ही थी। 1970 की रिपोर्ट में भी 19 हजार 25 की संख्या कोई खास नजर नहीं आती। लेकिन 1980 से 90 के बीच ऐसा क्या हुआ कि पावरलूम की संख्या 2 लाख के ऊपर पहुंच गयी और बीते एक दशक में तो यह संख्या दोगुनी से भी ज्यादा!! असल में बात यह है कि 70 के दशक से 1998 आते-आते यहां की 5 बड़ी टेक्स्टाइल मिलों में ‘एक के बाद एक’ ताला लगता गया, उनकी जगह पावरलूम की कई छोटी-छोटी इकाईयों ने ले ली। बड़ी-बड़ी मिलों के मजदूर-यूनियन एक तो मजबूत और संगठित होते थे, दूसरा उन्हें मोबीलाइजेशन में भी कोई परेशानी नहीं थी। लेकिन बड़ी मिलों में ताला लगने के हादसों ने मजदूरों की ऐसी कमर तोड़ी कि वह अपने-अपने यूनियनों के साथ दोबारा खड़े नहीं हो सके। वैसे तो सूरत में आज भी 1,60 यूनियन हैं, लेकिन कहने भर को। गली-गली में बिखरी पावरलूम फेक्ट्रियों के लगने से मजदूर एकता भी बिखर गई, उनसे उनके कानूनी हक और सुविधाएं छीन लिए गए, दिन-ब-दिन मजदूरों के शोषण में भी इजाफा हुआ। मालिकों ने मुनाफे के चक्कर में सस्ते और अकुशल मजदूरों के रूप में बच्चों की बड़ी तादाद को काम पर लगवाया। वह मजबूत यूनियनों की गैर मौजूदगी का फायदा उठाते हुए बाल-मजदूरी को लगातार पनाह देते गए। इन दिनों पावरलूम फेक्ट्रियों के मालिक पतले-पतले हजारों हाथों की मदद से 5 करोड़/रोज का टर्नओवर करते हैं, वह हर रोज 35 हजार से 1 लाख तक साड़िया बनवाते हैं। यह है एक खुशहाल उद्योग की खुशहाल कहानी, जो बदहाल बाल-मजदूरों की बदहाल तस्वीरों के बगैर पूरी नहीं होगी।
सूरत की टेक्स्टाइल इण्डस्ट्री के बाल-मजदूर 3 सेक्टर में बंटे हुए हैं। पहला, पावरलूम फेक्ट्री जहां कच्चा कपड़ा बनाया जाता है। यह कतारगाम, लिम्बायत, पाण्डेयसराय, उदना, फालसाबाड़ी, मफतनगर के आसपास के इलाके में ज्यादा हैं। पावरलूम फेक्ट्री के बच्चे मशीन में तेल डालने के अलावा मशीन ओपरेटर के हेल्पर बनते हैं। दूसरा सेक्टर है डाईंग फेक्ट्री। यहां कच्चे कपड़े को कलर किया जाता है। इसे खतरनाक इण्डस्ट्री इसलिए कहते है, क्योंकि इसमें नुकसानदायक केमीकल होते हैं, स्टीम के इस्तेमाल की वजह से आग लगने का डर रहता है और इसी से सूरत की ताप्ती नदी मटमैली हुई है। ताप्ती के किनारे-किनारे और पाण्डेयसराय के एक बड़े इलाके में 5,00 से ज्यादा डाईंग फेक्ट्री लगी हैं। डाईंग फेक्ट्री के बच्चे कपड़ा रंगने के बाद पक्के कहे जाने वाले कपड़े के भारी बण्डलों को उठाते हैं। डाईंग फेक्ट्री में किसी नए आदमी को घुसने नहीं दिया जाता। तीसरा सेक्टर है टेक्स्टाइल मार्केट। सूरत में टेक्स्टाइल मार्केट की 60 हजार से भी ज्यादा दुकाने हैं। यहां से देश-विदेश में कपड़ा बेचा जाता है। टेक्स्टाइल की ज्यादातर दुकाने बाम्बे मार्केट और न्यू बाम्बे मार्केट में हैं। इस मार्केट के बच्चे साड़ियों की कटिंग, धागों की बुनावट, पेकिंग, बोझा उठाना, उसे दो मंजिल ऊपर तक लाने-ले जाने के काम में लगे रहते हैं।
31 प्रतिशत बच्चे अकेले टेक्स्टाइल मार्केट में हैं, क्योंकि यहां उसे रोजाना 50 से 80 रूपए तक मिलते हैं जो पावरलूम फेक्ट्री के 20 से 25 रूपए से कहीं ज्यादा हैं। टेक्स्टाइल मार्केट में महीने के पूरे 30 दिन काम मिलता हैं और शिफ्ट बदलने की झंझट भी नहीं। दूसरी तरफ पावरलूम फेक्ट्री में कुशलता वाले मजदूर ही चाहिए, ऐसे में सस्ते हेल्पर बनकर रह जाने का डर हैं। टेक्स्टाइल मार्केट वाली पट्टी सूरत के रिंग-रोड़ के साथ-साथ बढ़ती चलती है, इधर काम करने वाले बच्चे 2 से 5 किलोमीटर दूर के इलाकों जैसे लिम्बायत, मीठी खाड़ी, संगम टेकरी, मफत-नगर और अंबेडकर-नगर से आते हैं। ऐसे बच्चे 2-3 किलोमीटर तक तो पैदल चलते हैं लेकिन 5 किलोमीटर के लिए रिक्शा शेयर करते हैं। ये बच्चे यहां सुबह 9 से रात को 10 तक काम करते हैं। टेक्स्टाइल मार्केट में राजस्थानी मारवाड़ियों का दबदबा है जो राजस्थान के गरीब परिवारों से कान्ट्रेक्ट करके उनके बच्चों को यहां ले आते हैं। ऐसे बच्चे बस्ती में नहीं, दुकान के आसपास ही ठिकाना बनाकर रहते हैं। इसलिए उन्हें काम के घण्टों का कोई अता-पता नहीं रहता।
टेक्सटाइल मार्केट के कामों से कई बच्चियां भी जुड़ी हुई हैं। उन्हें एक साड़ी में स्टोन लगाने और धागा काटने के बदले सिर्फ 50 पैसे मिलते हैं। अगर 4-5 बच्चियां मिलकर पूरा दिन भी काम करें तो भी हरेक के हिस्से में 10-12 रूपए ही आते हैं। इस किस्म के काम में ज्यादातर हरपति जनजाति की लड़कियां लगी हुई हैं।
कतारगाम की कई पावरलूम फेक्ट्रियों में देखा गया कि वहां बुनियादी सहूलियतों जैसे टायलेट, पानी की टंकी, वेंटीलेशन और पंखे नहीं हैं। फेक्ट्री में दाखिल होते ही चारों तरफ हल्का अंधियारा और फर्श पर तेल की मोटी परते दिखाई देती हैं। फेक्ट्री के बाहर कुछ मजदूरों से बातचीत में मालूम हुआ कि यहां जरूरत से ज्यादा काम और कम पैसे को लेकर चुप्पी साध ली जाती है। कई फेक्ट्रियों के मालिक रजिस्ट्रेशन नहीं करवाते, इससे उन्हे टेक्स से बचने का मौका तो मिलता ही है, मजदूरों को सुविधाएं देने से भी बच जाते हैं। रजिस्ट्रेशन न होने से फेक्ट्रियों की सही संख्या और काम करने वाले कुल मजदूरों का पता तक नहीं चलता। मजदूरों को न पहचान-पत्र मिलता है, न पीएफ, न ईएसआई। यहां तक कि किसी मजदूर की दुघर्टना होने पर उसे मुआवजा देने का सवाल भी नहीं उठता। यहां एक मजदूर पुरानी मशीनों से काम तो चलाता ही है, वह 4 से 6 मशीनों पर एक साथ काम भी करता है। यहां ज्यादातर मजदूरों की मांग है कि कपड़े के हर मीटर पर 1.25 रूपए मिले जबकि उन्हें हर मीटर पर मिलता है 1 रूपए। उन्हें मासिक वेतन की बजाय पीस रेट के हिसाब से मेहनताना दिया जाता है। यह बड़े मजदूरों का हाल है, बच्चों की हालत तो बदत्तर है।
लिम्बायत और मीठी खाड़ी के कई घरों में उत्तर-प्रदेश और बिहार के मुस्लिम बच्चे साड़ी पर जरी का काम करते हैं। ये बच्चे मुंबई के गोवण्डी से यहां लाये गए हैं। उधर लेवर कमीश्नर का जब दबाव बढ़ जाता है तो ऐसे बच्चों को इधर भेज दिया जाता है। जरी के काम में कई छोटे-छोटे बच्चे, खासकर बच्चियों को 1 खटिया के इर्द-गिर्द बैठाते हैं। 1 हाल में 10-15 बच्चे या बच्चियों के लिए ज्यादा से ज्यादा 4-5 खटियां लगाते हैं। यहां काम करने वाले सारे बच्चे 25 रूपए में 8 से 10 घण्टे तक एक ही जगह बैठे, आंखे गड़ाए और हाथ चलाते नजर आते हैं। यह काम घर पर ही होता है इसलिए बगैर सांस लिए रात और दिन चलता रहता है।
सूरत टेक्स्टाइल इण्डस्ट्री को कभी रीढ़ की हड्डी’ तो कभी ‘लम्बी मीनार’ की तरह देखा जाता है। हमेशा ऊपर देखने वालों को ध्यान उस नींव की तरफ नहीं जाता जिसमें अब तक असंख्य ‘नन्हे भविष्य’ दफन हो चुके हैं। यही वजह है कि यहां टेक्स्टाइल इण्डस्ट्री से जुड़े हर आकड़े का हिसाब-किताब और उसका पूरा ब्यौरा तो मिलता है, नहीं मिलता है तो बच्चों को प्यार भरे सपने देखने, चांद छूने जैसी ख्वाहिशे पालने, चार किताबे पढ़ने और हम जैसे बनने से रोके जाने का आकड़ा।