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4.10.10

पंचायती व्यवस्था का बलात्कार

शिरीष खरे राजस्थान से लौटकर

बाड़मेर और अजमेर. राजौ और गीता. एक ही दुनिया के दो अलग-अलग किस्सों के दो किरदार हैं. इधर है अपनी अस्मत गंवा चुकी राजौ, जो गांव के विरोध पर भी अपनी अर्जी अदालत तक दे तो आती है, मगर लौटकर गांव से छूट जाती है. उधर है कमजोर दलित महिला होने का दर्द झेलनी वाली गीता, जो डर के मारे अपनी गुहार अदालत से वापिस ले आती है, और गांव से दोबारा जुड़ जाती है. दोनों ही मानते हैं कि थाने के रास्ते अदालत आना-जाना और इंसाफ की लड़ाई लड़ना तो फिर भी आसान है, मगर समाज के बगैर रह पाना बड़ा मुश्किल है.

एक को अदालत की लड़ाई मंजूर है, दूसरे को गांव में रहना. दोनों का हाल आपके सामने है. मगर कौन ज्यादा अंधेरे में है, और कौन कम उजाले में. चलिए आप ही तय कीजिए- गांव....थाने....अदालत....पंचायत....समाज के बीच मौजूद इनके फासलों, अंधेरे, उजाले से होकर.

राजौ के यहां जाने से पहले, उस रोज का अखबार भरतपुर जिले के गढ़ीपट्टी में ‘बंदूक की नोंक पर पांच लोगों के दलित औरत से बलात्कार’ की खबर दे रहा था. राजौ का गांव सावऊ, बाड़मेर जिले के गोड़ा थाने से 12 किलोमीटर दूर है. वहां तक पहुंचने में 30 मिनिट भी नहीं लगे, मगर राजौ के भीतर की झिझक ने उसे 45 मिनिट तक बाहर आने से रोके रखा.

राजौ के साथ जो हुआ वो घटना के चार रोज बाद यानी 9 जून, 2003 की एफआईआर में दर्ज था : "श्रीमान थाणेदार जी, एक अरज है कि मैं कुमारी राजौ पिता देदाराम, उम्र 15 साल, जब गोड़ा आने वाली बस से सहरफाटा पर उतरकर घर जा रही थी, तब रास्ते में टीकूराम पिता हीराराम जाट ने पटककर नीचे गिराया, दांतों से काटा, फिर.......और उसने जबरन खोटा काम किया. इसके बाद वह वहां से भाग निकला. मैंने यह बात सबसे पहले अपनी मां को बतलाई. मेरे पिता 120 किलोमीटर दूर मजूरी पर गए थे, पता चलते ही सबेरे लौट आएं. जब गांव वालों से न्याय नहीं मिला तो आज अपने भाई जोगेन्दर के साथ रिपोर्ट लिखवाने आई हूं. साबजी से अरज है कि जल्द से जल्द सख्त से सख्त कार्यवाही करें."

मुंह मोड़ने वाला समाज
राजौ अब 20 साल की हो चुकी है. उसकी मां से मालूम चला कि बचपन में उसकी सगाई अपने ही गांव में पाबूराम के लड़के हुकुमराम से हो चुकी है. मगर वह परिवार अब न तो राजौ को ले जाता है, न ही दूसरी शादी की बात करता है. गांव वालों से किसी मदद की तो पहले ही कोई गुंजाइश नहीं है, मगर 2 किलोमीटर दूर पुनियो के तला गांव में जो ताऊ है, 60 किलोमीटर दूर बनियाना में जो चाचा है, 80 किलोमीटर दूर सोनवा में जो ननिहाल है, वहां से भी कोई खैर-खबर नहीं आती है. उसका झोपड़ा भी गांव से 2 किलोमीटर दूर उसके खेत में आ पहुंचा है, और गृहस्थी का हाल पहले से ज्यादा खराब है. पंचों में चाहे खेताराम जाट हो या रुपाराम, खियाराम हो या अमराराम, सारे यही कहते हैं कि चिड़िया जब पूरा खेत चुग जाए तो उसके बाद पछताने से क्या फायदा है ?

राजौ के पिता देदाराम यह खोटी खबर लेकर सबसे पहले गांव के पंच खियाराम जाट के पास पहुंचे थे. पंच खियाराम जी ने पहले तो इसे अंधेर और जमाने को घोर कलयुगी बतलाया, फिर देदाराम से पूछे बगैर दोषी टीकूराम के पिता के यहां यह संदेशा भी भिजवा दिया कि 20,000 रूपए देकर मामला निपटा लेने में ही भलाई है. मगर टीकूराम के पिता हीराराम जाट ने साफ कह दिया कि वह न तो एक फूटी कोड़ी देने वाला है, न निपटारे के लिए कहीं आने-जाने वाला है. फिर मजिस्ट्रेट की दूसरी पेशी पर बाड़मेर कोर्ट के सामने दोषी समेत गांव के सारे पंच-प्रधान जमा हुए. सबने मिलके राजौ को समझाया कि केस वापिस ले लो, कोर्ट-कचहरी का खर्चापानी भी दे देंगे. पर टीकूराम को साथ देखकर राजौ बिफर पड़ी. उसने राजीनामा के तौर पर लाये गए 50, 000 रूपए जमीन पर फेंक दिए और ऐसी खरी-खोटी सुनाई कि वहां एक न ठहरा.

लड़ाई जारी है
इसके बाद जिस चाचा ने राजौ का नाता जोड़ा था, उसी के जरिए पंचों ने बातें भेजीं कि- राजीनामा कर लो तो हम साथ रहकर गौना भी करवा दें. छोटे भाई की भी शादी करवा दें. नहीं तो सब धरा रह जाएगा. कोर्ट कचहरी के चक्कर में पड़ने से अच्छा है आपस में निपट लेना. वो तो लड़का है, उसका क्या है, जितना तुम्हें पैसा देगा, उतना कचहरी में लुटाकर छूट जाएगा, तुम लड़की हो, उम्र भी क्या है, बाद में कोई साथ नहीं देता बेटी. फिर बदनामी बढ़ाने में अपना और अपनी जात का ही नुकसान होता है.

जब राजौ पर ऐसी बातों का भी असर नहीं हुआ तो कभी राजौ की जान की फिक्र की गई, तो कभी उसके छोटे भाई जोगेन्दर की जान की.

राजौ आज तक केस लड़ रही है. यह अलग बात है कि टीकूराम को जमानत पर रिहाई चुकी है, और उसके बाद उसकी शादी भी हो चुकी है. राजौ को अदालत में लड़ने का फैसला कभी गलत नहीं लगा है, उसे अदालत से फैसले का अब भी इंतजार है. राजौ को गांव में आने-जाने के लिए सीधे तो कोई भी नहीं रोकता, मगर पीठ पीछे तरह-तरह की बातों को वह महसूस करती हैं.


वैसे पंचों को छोड़कर गांव के बाकी लोगों के साथ उसके रिश्ते धीरे-धीरे सुधर रहे हैं. राजौ के यहां से उठते वक्त उससे जब कहा गया कि रिपोर्ट में उसका नाम और फोटो छिपा ली जाएगी तो उसने बेझिझक कहा "मेरा असली नाम और फोटो ही देना. जिनके सामने लाज शरम से रहना था, उनके सामने ही जब ईज्जत उतर गई तो. तो दुनिया में जिन्हें हम जानते तक नहीं, उनसे बदनामी का कैसा डर ?"

इस रात की सुबह कब ?
थानाधिकारी सतीश यादव टेबल पर रखे ‘सत्यमेव जयते’ की प्लेट और पीछे की दीवार पर लटकी गांधीजी की फोटो के बीचोंबीच मानो 180 डिग्री का कोण बनाते हुए बैठे हैं. उन्होंने दूसरी तरफ निगाह टिकाते हुए कहा- "आपकी तारीफ". मगर बगैर जबाव सुने ही चल दिए.

मेरा सवाल यह नहीं कि केस कितना छोटा या बड़ा है, या आप बड़ा किसे मानते हैं, सवाल है कि जब कभी गांवों में दलित और खासकर दलित महिला पर अत्याचार होता है तो न्याय के हर पड़ाव तक कैसी मानसिकता अपनाई जाती है ? आगे की किस्सा इसी मानसिकता को केन्द्र में रखकर लिखा जा रहा है.

रसूलपुरा गांव से दलित-महिला अत्याचारों के एक हफ्ते में ही तीन-तीन केस आने पर थानाधिकारी महोदय क्रोधित है. ‘महिला जन अधिकर समिति’ का आरोप है कि वह दलित-महिलाओं को कानून में दिये गए विशेष अधिकारों पर अमल करना तो दूर शिकायत दर्ज करवाने वाले को ही हवालात की हवा खिलाने लगे हैं.

रसूलपुरा के सुआलाल भाम्बी, उसकी पत्नी गीतादेवी और पुत्री रेणु ने जब बीरम गूजर के खिलाफ जर्बदस्ती गाय हथियाने और मारपीट का मामला अलवर थाने में दर्ज करवाना चाहा तो सुआलाल भाम्बी को ही यह कहते हुए बंद कर लिया गया कि जांच के बाद पता करेंगे कि कसूरवार है कौन ?

रसूलपुरा, अजमेर से जयपुर जाने वाली सड़क पर बामुश्किल 10 किलोमीटर दूर है. यहां करीब 800 मतों में से 600 मुस्लिम, 150 गूजर और 50 दलितों के हैं. 15 साल पहले दलितों की संख्या ठीक-ठाक थी. तब से अब तक करीब 20 दलित परिवारों को अपनी जमीन-जायदाद कौड़ियों के दाम बेचकर अजमेर आना पड़ा है. बचे दलितों को भी गांव से आधा किलोमीटर दूर अपने खेतों में आकर रहना पड़ रहा है.

दलित हो तो नीचे रहो
यहां आज भी चबूतरे पर दलितों का बैठना मना है. वह साइकिल पर सवार होकर निकल तो सकते हैं, मगर जब-तब रोकने-टोकने का डर भी है. पहले तो दलित दूल्हा घोड़े पर चढ़ नहीं सकता था, पर 10 साल पहले हरकिशन मास्टर ने घोड़े पर चढ़कर पुराना रिवाज तोड़ा डाला था. 15 साल पहले छग्गीबाई भील सामान्य सीट से जीतकर सरपंच भी बनी थी. तब गांव की ईज्जत का वास्ता देकर सारे पंचों को एक किया गया और अविश्वास प्रस्ताव के जरिए छग्गीबाई को 6 महीने में ही हटा दिया गया. छग्गीबाई का सामान्य सीट से जीतना करिश्मा जैसा ही था.

छग्गीबाई कहती हैं "तब सामान्य जाति के इतने उम्मीदवार खड़े हो गए कि दलितों के कम मत ही भारी पड़ गए. नतीजा सुनकर उंची जात वालों ने रसूलपुरा स्कूल घेर लिया, ऐसे में पीछे की कमजोर दीवार से लगी खिड़की तोड़कर मुझे पुलिस की गाड़ी से भगाया गया. पुराने सरपंच श्रवण सिंह रावत फौरन पंचायत की तरफ दौड़े, कुर्सी पर बैठकर बोले ‘ई भीली को कोड़ पूछै, कौड़ पैदा नी होय ऐसो, जो जा पंचायती में राज करै’."

यानी एक गांव के ऐसे दो उदाहरणों से बीते 10-15 सालों के भीतर आपसी टकराहटों के कारण साफ समझ में आते हैं. तकरीबन 15 साल पहले ही इलाके की महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए समिति बनायी और नाम रखा ‘महिला जन अधिकार समिति’. तब 2-2 रूपए देकर 10-12 महिलाएं जुड़ी. केसर, तोला, सोहनी, सरजू, सकुंतला, रेनू, जूली, लीला, गंगा, रिहाना, संपत, भंवरीबाई जैसी महिलाएं अपनी छोटी-छोटी दिक्कतों और निपटारे के लिए चर्चाएं करतीं. भंवरीबाई बताती हैं "5 साल के बाद जब हम बालविवाह, मृत्युभोज और जातिप्रथा जैसी बुराईयों के विरोध में बोलने लगे तो हमारा भी विरोध बढ़ने लगा. दलित महिलाएं जब जातिसूचक शब्दों और गालियों पर ऐतराज जताने लगीं तो सवर्ण कहते कि हम तो तुम्हें रोज ही गालियां देते थे, पहले भी तुम्हारे बच्चों को बिगड़े नामों से ही बुलाते थे, तब तो तुम्हें बुरा नहीं लगता था, अब क्यों लग रहा है ?"

दलितों को सरकारी जमीन से होकर अपने खेत आना-जाना होता था. मगर जून की घनी दोपहरी में तेजा गूजर ने उसी रास्ते पर गड्डा खुदवाया, और तार और कांटे की बागड़ लगवा दी. इसके बाद दलित महिलाओं की तरफ से भंवरीबाई ने तेजा गूजर से बात की- "लालजी (देवरजी) डब्बो थाओ बात करणी है." जबाव में उन्हें अश्लील गालियां और गड्डे में ही गाड़ देने जैसी धमकियां मिलीं.

ऐसो पुलिस वालो से तो...
इसके बाद दलित महिलाओं ने उनके बड़े भाई और वार्ड के पंच अंबा गूजर को बताया कि आपको वोट दिया तो इस उम्मीद पर कि सुख-दुख बांटोंगे, आप तो खुद ही दुख दे रहे हैं. जबाव में अंबा गूजर ने थाने घूम आने की नसीहत दी.

रसूलपुरा के दलित परिवारों ने बताया कि यह दोनों भाई कई गांवों जैसे बेड़िया, गूगरा, बुडोल और गगबाड़ा के दलितों की जमीनों को सस्ते दामों में खरीदने में लगे हुए हैं. अगले दिन दलित महिलाएं जब नारेती पुलिस चौकी गईं तो पुलिस वाले बोले कि पहले जांच करेंगे, तब केस लेंगे. जांच के लिए जब कैलाश (दलित) कांस्टेबल आया तो तेजाभाई-अंबाभाई ऊपर बैठे और कैलाश कांस्टेबल आंगन के बाहर नीचे बैठा.

यह नजारा देखते ही दलित महिलाएं अलवर गेट थाने पहुंची, जहां थानाधिकारी ऐसे मामलों के चलते पहले से ही हैरान-परेशान पाये गए. उन्होंने ऐसी वारदातों में कमी लाने की बात पर जोर दिया.

गांव के दलित व्यक्ति कल्याणजी पूरे भरोसे के साथ बताते हैं ‘‘ऊंची जात के हमारे 30 एकड़ के खेतों के अलावा 4 एकड़ की सरकारी जमीन भी हथियाना चाहते हैं. यहां 1 एकड़ खेत की कीमत 1 लाख के आसपास चल रही है. हमारे पास गृहस्थी चलाने का मुख्य जरिया खेती ही है. 10-15 सालों से सूखा पड़ने से खेती वैसे ही चौपट है. मजूरी के लिए पलायन करना पड़ता है. ऐसे में ऊंची जात वालों की नीयत बिगड़ने से थाने-कचहरी के चक्कर भी लगाने पड़ रहे हैं.’’

मौसेरे भाई
इसी साल के कुछ मामलों पर नजर दौडाएं तो जमीन के विवाद में 12 फरवरी को मामचंद रावत और उसके लोगों ने शंकरलाल रेंगर, उसकी पत्नी कमला, बेटी संगीता, बहू ललिता, बेटे विनोद और गोपाल के साथ घर में घुसकर मारपीट की. ‘दलित अधिकार केन्द्र’ के हस्तक्षेप करने से अलवर गेट थाने में तीन महीने बाद रिपोर्ट दर्ज हो सकी. अभी तक चलान पेश नहीं हुआ.

इसके बाद तेजाभाई-अंबाभाई गूजर ने रास्ता रोकने का विरोध करने वाली गीता और सोहनी को पीटा. एसपी साब के हस्तक्षेप के बाद ही रिपोर्ट लिखी जा सकी. बहुत दिनों से कार्यवाही का इंतजार है. जिन दलितों के दिलों में अपनी जमीन खो देने का डर हैं, उनमें हैं कल्याण, कैलाश, ओमप्रकाश, रतन, सोहन, छोटू, नाथ, मोहन, सुआंलाल, गोगा, घीसू, किशन, दयाल, रामचंद, रामा, हरिराम ने अपने नाम लिखवाए हैं.

रसूलपुरा का राजनैतिक-आर्थिक ताना-बाना ऐसा है कि वर्चस्व की लड़ाई में गूजरों के साथ मुस्लिमों ने हाथ मिला लिया है. लाला शेराणी और लाला सलीम जैसे दो मुस्लिम व्यापारियों ने तो गूजरों का खुला समर्थन किया है. इसमें से लाला सलीम ने तो यहां तक कह दिया है कि "पूरा गांव उलट-पुलट हो जाएगा, अगर एक भी गूजर थाने में गया तो." मुस्लिम और सवर्ण-हिन्दूओं की एकता का इससे बेहतरीन उदाहरण और कहां मिलेगा ?

इधर अलवर गेट थाने के थानाधिकारी महोदय की परेशानी समझ नहीं आती है. शंकरलाल रेंगर जब रिपोर्ट लिखाने पहुंचे तो थानाधिकारी महोदय ने स्वयं समझाने की कोशिश की थी कि यह थाना केवल दलितों या रसूलपुरा के लिए नहीं खोला गया है. इलाके में और भी तो लोग हैं, और भी परेशानियां हैं.

उधर रसूलपुरा में शाम 7 बजे तक जब सुआलाल भाम्बी की गाय न लौटी तो उसकी पत्नी गीता और बेटी रेणु पता लगाने गांव में घूमने लगीं. उन्हें पता चला कि बीरम सिंह ने उनकी गाय बांध रखी है. इसके बाद जिसका अंदेशा था, वही हुआ. गाय मांगने पर गाली-गलौज और विरोध करने पर मारपीट. उस वक्त एक भी बीच-बचाव में न आया. ऐसे में जब सुआंलाल भाम्बी, उसकी पत्नी गीता और बेटी रेणु रिपोर्ट लिखवाने आए तो सुआलाल को बंद कर लिया गया. मगर ‘महिला जन अधिकार समिति’ और ‘दलित अधिकार केन्द्र’ के विरोध के बाद पुलिस सुआलाल से कहती है कि "गांव चलते हैं, अगर एक भी आदमी यह कह दे कि यह तेरी गाय है तो रख लेना."

सुआलाल बोला "गवाह तो एक नहीं कई हैं, पर मामला केवल गाय का नहीं है, गाय तो मेरी है ही, सवाल मेरी पत्नी और बेटी को बेवजह पीटने और गाली-गलौज का है, उसका न्याय चाहिए." पुलिस वालों के हिसाब से "ऐसे तो मामला सुलझने से रहा." इसलिए अगली सुबह गीता और रेणु को जिला एवं सेशन न्यायधीश, अजमेर का रास्ता पकड़ना है. रात उन्हें अजमेर ही ठहरना है. सुबह होने के पहले गांव के पंच उन्हें कचहरी की हकीकत बताने के लिए आते हैं. वह बाकायदा गाय लौटा देने का वादा भी करते हैं. मारपीट और ईज्जत के सवाल पर अस्पताल में लगा खर्चापानी दिलवाने की गांरटी भी देते हैं. दोषी बीरम सिंह माफी भी मांगता है, यह अलग बात है कि केवल ऊंची जाति वालों के सामने.

गांव का वास्ता
गीता और रेणु के शरीर पर चोट के निशान ज्यादा हैं. मगर गांव के पंचों के बढ़ते जोर के सामने उन्हें मारपीट का भंयकर दर्द हमेशा के लिए भूलना पड़ेगा. सुआलाल के हिसाब से यह राजीनामा उसकी खुशी के लिए नहीं गांववालों की खुशी के लिए करना पड़ेगा. बड़े-बड़े लोग जब अपनी ईज्जत की खातिर आ जाएं तो उनका अड़ी ठुकराते भी तो नहीं बनती. खेत का पानी, आंगन का गोबर, चूल्हे की लकड़ियां, कर्ज के पैसे, आटे की चक्की, मजूरी, हर रोज हर एक चीज के लिए तो उन्हीं का आसरा है.

गीता मान रही है कि इस बार ईज्जत से कोई समझौता नहीं होना चाहिए. हालांकि सुबह होने में अभी बहुत देर है , मगर उसके पहले यह भी जानना चाह रही है कि वह गांव और घरबार छोड़कर भी कहीं जी सकती है ?

कहते हैं ‘‘पांच पंच मिल कीजै काज। हारे जीते होय न लाज।।’’ मगर जहां के पंच अपनी ताकत से सत्य को अपने खाते में रखते हो, वहां के कमजारों के पास हार और लाज ही बची रह जाती है. ऐसे में कोई कमजोर जीतने की उम्मीद से कचहरी के रास्ते जाए भी तो उसे जाती हुई 'राजौ 'और लौटी हुई 'गीता' मिलती है. तब यह सवाल इतना सीधा नहीं रह जाता है कि वह किसके साथ चले, किसके साथ लौटे ?

3.9.10

महिलाओं में सुधार की गति दावों के मुकाबले बहुत धीमी

शिरीष खरे

महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार देने के तमाम सरकार दावों के बावजूद देश में महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं है. देश में महिलाओं की स्थितियों में सुधार की गति दावों के मुकाबले बहुत धीमी है और हकीकत आज भी इन दावों को कोसो दूर है. हकीकत पर रौशनी डालती क्राई की यह रिपोर्ट.

क्राई की रिपोर्ट कहती है कि ग्रामीण इलाकों में 15% लड़कियों की शादी 13 साल की उम्र में ही कर दी जाती है. इनमें से लगभग 52% लड़कियां 15 से 19 साल की उम्र में गर्भवती हो जाती है. रिपोर्ट में बताया गया है कि 73% लड़कियों में खून की कमी है. वहीं डायरिया हो जाने की स्थिति में 28 % को कोई दवा तक नहीं मिलती है. कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुप्रथाएं आज भी समाज में अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं. हर दिन सात हजार लड़कियों को पेट में ही मौत की नींद सुला दिया जाता है.

जयपुर में 51.50% और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले 67% पिताओं का कहना है कि अगर आर्थिक तंगी आती है वह अपनी बच्ची का स्कूल जाना बंद करवा देंगे. वहीं संविधान द्वारा 14 साल तक के बच्चों को दिए जाने वाले शिक्षा के अधिकार से भी यह बच्चियां वंचित हो रही है. इसके चलते 9 साल तक की उम्र तक पहुंचने के बाद भी 53% लड़कियां स्कूल नहीं जा पा रही है. 24% लड़कियों को शिक्षा से वंचित रहना पड़ रहा है. जो पढ़ना शुरू कर भी देती है उनमें से 60% सेकेंड्री स्कूल तक भी नहीं पहुंच पाती है.

पिछले बालिका दिवस पर क्राई द्वारा राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, महिला व बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ सहित अन्य को अपनी मांगों का एक चार्टर सौंपा जा चुका है. क्राई यह मानता है कि जब तक सरकार और जनता बड़े स्तर पर लड़कियों के एक समान विकास पर ध्यान नहीं देंगे तब तक इन परिस्थितियों को बदल पाने की संभावना कम है. 

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संपर्क : shirish2410@gmail.com

2.9.10

अब परदेश नहीं जाना

अपने ही देश में कुछ कर गुजरने के जज्बे ने लोहरदगा की मनोरमा एक्का को दोबारा उनकी जमीन से जोड़ दिया है. झारखण्ड की यह लड़की अपने गांवों की लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अमेरिका में अच्छी खासी नौकरी छोड़ कर स्वदेश लौट आई है. जो इनदिनों बाल मजदूरों और ग्रामीण महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने के लिए व्यवस्था से लड़ाई लड़ रही है.



इसे मनोरमा की मेहनत का ही नतीजा कहेंगे कि बदला नवाटोली की फूलमनी और शोभा ही नहीं दर्जनों ऐसी महिलाएं हैं जो आज आत्मनिर्भर बनी हैं और दूसरे को आत्मनिर्भर बनाने में भी जुटी हैं. ये वही महिलाएं हैं जो दो जून की रोटी के लिए दूसरे राज्यों में जाती थीं और ढ़ेर सारी परेशानियां सिर पर झेलती थीं. अब यही महिलाएं गांव में स्वयं सहायता समूह से जुड़ स्वावलंबी बनी हुई हैं. मनोरमा ने 12 गांवों में जागरूकता अभियान चलाकर लगभग डेढ़ सौ बच्चों को स्कूल से जोड़ने का काम किया है. यह बच्चे कभी बाल मजदूर थे.

मनोरमा रांची से पीजी डिप्लोमा इन रूरल डेवलपमेंट की शिक्षा ग्रहण कर अमेरिका चली गई. अमेरिका में उन्होंने जनवरी 2001 तक पढ़ाई के साथ-साथ प्री स्कूल में नौकरी भी की. 2001 के अंतिम महीने में वह अमेरिका से भारत लौट आई. इसके बाद यह फिर से 2005 में सोशल व‌र्क्स की शिक्षा के लिए अमेरिका चली गई. मगर अमेरिका की चमक-दमक भी उसे ज्यादा  देर नहीं रोक सकी और 2007 में वह वापस भारत आकर उरांव आदिवासी महिला के नेतृत्व पर शोध करने लगी. इसी दौरान जब मनोरमा ने महिलाओं और बच्चों की स्थितियों को करीब से देखा तो यही रहकर महिलाओं और बच्चों को अधिकार दिलाने का निर्णय लिया.

जब मनोरमा ने लोहरदगा में महिला और बाल अधिकार को लेकर व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई शुरू की तो पहली बार उसका हकीकत से वास्ता पड़ा. बहुत से राजनैतिक और सामाजिक पेचेदियां सामने आईं मगर वह उन्हें अपने अभ्यास का एक हिस्सा मानती रहीं. यहां तक कि जब यह बाल अधिकार से जुड़े मामलों को लेकर गांव में जाती थी तो गाँव वाले इसे कोई साजिश के तौर पर देखते-समझते थे. इस तरह अपने पहले पड़ाव में मनोरमा को आदिवासी समुदाय का ही पूरा समर्थन नहीं मिल पाया था. मगर अब धीरे-धीरे स्थितियां बहुत हद तक बदल चुकी हैं. बदल रही हैं.

बाल अधिकार पर कार्य करने वाली संस्था क्राई के सहयोग ने मनोरमा के हौसले को बुलंद किया है. मनोरमा ने होप संस्था की स्थापना कर महिला व अधिकार को अपना उद्देश्य बनाया है.

मनोरमा कहती है कि उसने अपनी जिंदगी को समाज में फैली गैर बराबरी मिटाने के नाम कर दी है. वह अपनी भूमिका को बच्चों और महिलाओं तक उनके अधिकार बताने और बेहतर समाज बनाने के रूप में देख रही है.

14.6.10

कमाठीपुरा की गलियों से

शिरीष खरे, मुंबई से


यह शहर के उठने का वक़्त है. बोरीबली से मुंबई सेंट्रल आने वाली लोकल के ठहरने के बीच का यह वक़्त, हजारों लोगों के दौड़ने का भी वक़्त है. मुंबई सेंट्रल से यात्रियों को अपने में समाए बेस्ट यानी ‘बॉम्बे एलेक्ट्रिक सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट’ की लालधारी बसों ने भी चौतरफ़ा दौड़ना शुरू कर दिया है. मुझे भी यहाँ से पैदल अब 15-20 मिनट ही चलना है, सिटी सेंटर से होते हुए सीधे कमाठीपुरा की गलियों की तरफ़.




अटपटे-से एहसासों से जुड़े कुछ सवाल लिए हुए बढ़ रहा हूँ. क्या आप जानते हैं कि रेडलाईट की यह गलियाँ सारी रात जागी हैं और ग्राहकों के इंतजार में अभी भी सोई नहीं हैं ?


यहाँ की गलियों ने यहाँ को बनते हुए देखा है. अंग्रेजों ने अपने सैनिकों के लिए यहाँ कभी ‘कम्फर्ट जोन’ बनवाया था और विदेशों से बड़ी तादाद में यौनकर्मियों को बुलवाया था. 1928 में यौनकर्मियों को लाइसेंस जारी किए थे. मगर 1950 में सरकार ने यौन व्यापार को प्रतिबंधित कर दिया था. इसके बावज़ूद यह इलाक़ा आज भारतीय यौनकर्मियों का बहुत बड़ा घर कहलाता है. यहाँ 200 से ज्य़ादा पिंज़रानुमा कोठरियों में 5000 से भी ज्यादा यौनकर्मियों का रहवास है.

आंध्रप्रदेश के कमाठी मजदूरों के नाम पर यह इलाक़ा कमाठीपुरा कहलाता है. एक ज़माने में गुजरात के वाघरी लोगों की भी यहाँ खासी तादाद थी. मगर अब तो बँगाल, नेपाल, कर्नाटक, तमिलनाडू, उड़ीसा, असम से आए लोग भी ख़ूब मिल जाया करते हैं.

कमाठीपुरा का यह पूरा इलाक़ा मौटे तौर से 16 गलियों में बटा है, 9 गलियों में सेक्स का कारोबार चलता है, ब़ाकी 5 गलियां रेसीडेंटल और बिज़नेस के लिए हैं. यह गलियाँ आगे जाकर नार्थबुक गार्डन, बैलेसिस रोड़, फाकलेंड रोड़ से जुड़कर अपनी पहचान ख़ोने लगती हैं.

बहरहाल, यहाँ की गलियों में भारी भीड़ के बीच से पैदल चलते हुए आदमी कुछ ज्य़ादा ही ठहर रहे हैं, वह चलते-चलते टकरा भी जाते हैं. हो सकता है कि मेरी तरह आपका दिल भी यहाँ धकधक की आवाज़ पर काबू पाने के चक्कर में बैठता जाए, और ज़ुबान अपनेआप सिलती जाए, दर्ज़नो आँखें उम्मीद लिए आपके ऊपर भी अटक जाएं, और मेरी तरह आपका बदन भी पीला पड़ता जाए.


कतरा-कतरा ज़िंदगी
मौसम तो ख़ुशनुमा है, मगर ख़ुली नालियों से आने वाली बदबू चारों ओर फैली रहती है. एक गली से दूसरी और तीसरी से चौथी में मुड़ता हूँ, मगर पूरा इलाक़ा इतना तंग और फ़ैला हुआ है कि दो-चार बार घूमने के बाद भी यह शायद ही समझ में आए.

इन्हीं गलियों में यौनकर्मियों की अनगिनत और अंतहीन कहानियाँ हैं. यहाँ से यौनव्यापार मौटे तौर पर चार तरीकों से चलते हुए देख रहा हूँ- एक तो अपने को सीधे बेचने वाली औरतों से, दूसरा पिंज़रानुमा कोठरियों की मालकिनों यानी घरवालियों से, तीसरा पिंज़रानुमा कोठरियों में कैद लड़कियों से और चौथा दारू के अड्डों से.

यह एक भरा पूरा बाज़ार है- नीचे दुकानें और ऊपर औरतें खड़ी हैं. शहर की ब़ाकी लड़कियां जब प्यार का खु़शनुमा एहसास लिए सोती-जागती हैं, यहाँ की लडकियाँ अपने को किसी के साथ भी किराए पर खुल्ला छोड़ देती हैं. शहर की ब़ाकी औरतों के लिए सुबह, शाम, रात होने के अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं, मगर यहाँ की औरतों के लिए सुबह, शाम, रात का एक ही अर्थ है- ग्राहकों को पकड़ना और उनसे पैसा कमाना. यह अपने ऊपर बेहिस़ाब पाऊडर, लिपिस्टिक, काजल, पर्स, सेंडल, जूड़े, सस्ती जेव्लरी क्या-क्या नहीं लादे हैं. इनके जींस, टीशर्ट, फ़िराक, सलवार-शूट, ब्लाउस, स्कर्ट, साड़ी में हर आकार और प्रकार के कट लगे हुए हैं. ऐसे में एक ग्राहक का काम यहाँ से वह माल छांटना है, जिसे तोड़मरोड़ कर अपने को हल्का कर सके, और कुछ और रातों तक आराम से सो तो सके.

आप यहाँ से देखिए- यह औरतें रंग-ढ़ंग और चाल-ढ़ाल से अपने ग्राहक को किस तरह से पहचान लेती है. दूसरी तरफ, आपको यहाँ आने वालों से भी यह पता लग सकता हैं कि यहाँ कौन-सी गलियाँ कितनी सही हैं, और क्यों हैं, उनमें कौन सी ज़मात वालों का असर ज्य़ादा है, उनका हिसाब-किताब क्या है, उनका धंधापानी कैसा है, कभी-कभार क्या-क्या लफड़ा हो सकता है, और उनसे कैसे-कैसे निपटा जा सकता है, वगैरह-वगैरह.

आप यहाँ से देखिए- एक जगह पर खड़ी होने के बावजूद यह पिंज़रानुमा कोठरी की दुनिया लोकल ट्रेन जैसी नहीं दिखती है, जो कुछ यात्रियों को उतारती है, और नए यात्रियों को चढ़ाकर एक मशीन सी चलती रहती है.

हां भाई सुनिए... एकदम नया आया है.. गलत नहीं ले जाऊंगा चलिए... नेपाली, बंगाली, साऊथ इंडियन सब हैं... पहले देख लीजिए... 12 से 16 का है... गोरा है देखने में क्या जाता है... इधर तो धंधा चलता है... उधर भी सस्ता ही है...

पिंज़रानुमा कोठरी के सामने खड़े हुए नहीं कि एक-एक करके बहुत सारे दलाल आपको घेरने लगते हैं. यहाँ तक कि फ़ोन नम्बर वाली पर्चियां भी देने लगते हैं. इनसे बगैर उलझे आगे बढ़ना ठीक है. वैसे इनकी भी अपनी कहानियाँ हैं. मगर अभी आगे बढ़ना ठीक है.

खै़र पिंज़रानुमा कोठरी के भीतर जैसे ही जाएंगे, वैसे ही आप दूसरी दुनिया में घुस जाएंगे. यहाँ लकड़ी की सीढ़ियों से लगे कुछ कोने, कोनों से दरवाजे, दरवाजों से ताबूतनुमा कमरे और कमरों के अंधियारे से बहुत सारी औरतें दिखाई देती हैं. यहाँ तक़रीबन 25 से 30 औरतों के साथ उनकी एक घरवाली भी दिखेगी. यहाँ औरतों की तादाद और उनकी उम्र से किसी घरवाली की सत्ता और उसकी संपत्ति का पता चलता है. यहाँ तक़रीबन आधी तो 22 साल से ज्य़ादा की नहीं हैं. यहाँ का बड़ा सीधा हिसाब है- 12 से 22 साल तक को ऊँचे दामों पर बेचो, और 30 से 35 साल के बाद घरवाली बन जाओ.


अब मेरी तरह आपको भी यहाँ किसी से सीधे-सीधे यह पूछना मुश्किल हो सकता है कि- "आप यहाँ तक कैसे पहुंचीं"... "वो कौन था जिसने आपसे पहली बार कहा कि पैसे कमाने का यह भी एक तरीका हो सकता है", इसलिए मेरी तरह आप भी यहाँ पहुँचकर हो सकता है कि- ‘आपका नाम...’ ‘आप कैसे हो’ से आगे न बढ़ पाएं.


मगर दिन के उजाले में एक इज्ज़तदार कहलवाने वाला आदमी जहाँ आने से कतराता है, वहाँ से मुझे लगता है कि सुबह से शाम तक का वक़्त ज़रूर बिताया जाए. यहाँ की कुछ सच्चाईयों से दो-चार हो जाया जाए और कोई नैतिक बहस छेड़े बगैर अपना ताज़ातरीन तजुर्बा बांट लिया जाए.


बड़ी बहन, छोटी बहन और...
‘याद आ रही है, तेरी याद आ रही है...’- ‘‘सुबह-सुबह पता नहीं क्यों आ रही है’’ कहते हुए जूही ने रेडियो बंद कर दिया है. आज के दिन पता नहीं कितनों दिनों के बाद वह पूरी नींद सो जाना चाहती है. दिन को जागना उसे कभी भी अच्छा नहीं लगा है. मगर उससे तो हरदम चुस्त रहने की उम्मीद की जाती है. इस उम्मीद के बगैर भी दुनिया चल सकेगी- वह सोच भी नहीं सकती है. शहर के बहुत से ठिकाने बदलने के बाद ही तो वह यहाँ तक आई है, और अब यही की होकर रह गई है.

यहाँ उम्र के पच्चीसवें साल में भी उसने अपने सीधेपन को संभाले रखा है. उसकी सुने तो उसमें अब पहले जैसी बात नहीं है. बचपना तो बहुत पहले ही ख़त्म हो चुका था, जवानी भी ख़त्म होने ही वाली है. असल में जूही की बड़ी बहन चंपा की शादी होने वाली है, इसलिए वह यहाँ हैं. इससे पहले चंपा भी यहाँ बैठ चुकी है. जुही कहती है कि उसके घर में अब कोई फूल (छोटी बहन) नहीं बचा है, इसलिए उसकी शादी के लिए यहाँ कौन बैठने वाली है, पता नहीं है. मगर ऐसा उसने मज़ाक में कहा है या वाकई संज़ीदगी से, यह भी तो पता नहीं चलता है.

वैसे भी उसके हिस्से में दिन और रात का अंतर नहीं बचा है. मौसम के मिजाज़, छुट्टी वाले दिनों या चौपाटी जाने जैसे ख़्यालों से भी जूही का कोई लेना-देना नहीं है. ग्राहक कितना सही है-यह भी उसे नहीं जानना है. शहर के नक़्शे की बजाय उसकी दुनिया के तार तो घनी बस्ती से भी सघन उस नेटवर्क से जुड़े हुए हैं जिसमें हजार रूपए का ग्राहक ढ़ूढ़ लेना सबसे बड़ी बात मान ली जाती है.


मां की तलाश में गोमती
इधर से सबसे आख़िरी के कमरे तक अगर नज़र पहुँचे तो कोई भी यह पूछ सकता है कि उधर रौशनी क्यों नहीं है- यह बात गोमती से अच्छा भला कौन जान सकता है, जिसे 8 साल की उम्र में यहां कैद किया गया था. दरअसल, नेपाल के काठमांडू की गोमती की मम्मी बचपन में मर चुकी थी. इसलिए वह अक्सर स्कूल के बाहर ही बैठी रहती थी. इतनी नाज़ुक उम्र में उसे क्या पता था कि स्कूल या मेले की ऐसी अकेली और गुमसुम बच्चियों पर दलालों की नज़र रहती है.

एक दलाल भी गोमती को कई दिनों से बतियाता और उसे बहलाता-फुसलाता था. उसने यह भी कहा था कि वह उसकी मम्मी को भी जानता है, और अगर वह किसी को कुछ न बताए तो एक दिन मिला भी सकता है. मगर एक दिन उसने गोमती को खाने में ऐसा कुछ दिया कि वह नेपाल से मुंबई तक होश में नहीं आई. यहाँ उसे घरवाली के हाथों बेच दिया गया. घरवाली ने उसे बहुत प्यार-दुलार दिया. उसने कहा मम्मी तुझे मेरे लिए ही तो छोड़ गई है, एक दिन आएगी. मगर गोमती की मम्मी है कि आज तक नहीं आई है.


गोमती बता रही है कि ऐसी लड़कियों को सालों तक कैद करके रखा जाता है. फिर कुछ सालों बाद उसकी बोली लगायी जाती है. अगर लड़की न माने तो उसे कई दिनों तक भूखा और नंगा रखा जाता है, मारा, पीटा और तड़पाया जाता है. मगर जैसे ही लड़की एक बार तैयार हो जाती है तो उसे हाथों हाथ लिया जाता है. जब तक वह कुछ जानती-समझती नहीं है, तब तक तो उससे होने वाली कमाई केवल घरवाली के हाथों में जाती है, मगर जैसे-जैसे लड़की सियानी होती है तो वह खाने, कपड़े, लत्ते के अलावा ग्राहक के पैसे से भी अपना हिस्सा मांगने लगती है.


हर एक बाज़ार में नई और आर्कषक चीज़ों की माँग हमेशा बनी रहती है. सेक्स का बाज़ार भी इसी सिद्धांत पर चलता है, यहाँ भी तो ज्य़ादातर ग्राहकों को कमसिन देह ही चाहिए. इसलिए यहाँ बच्चियों के देह व्यापार में हमेशा तेजी बनी रहती है. मगर बच्चियां भी कोई दिमागी तैयारी के साथ तो देह व्यापार में उतरती नहीं हैं, जो पहले से ही उन्हें सेक्स से जुड़ी जानकारियों का ज्ञान हो. इसलिए उनमें सेक्स से जुड़ी गंभीर बीमारियों की आशंकाए बढ़ जाती हैं. लिहाजा, न जाने कितनी गोमतियां एड्स नामक हालात की गिरफ़्त में आ जाती हैं.



बची रहना बिटिया
वैसे दुर्गा जैसी कई औरतें अपनी बच्चियों को ऐसे धंधे से दूर ही रखना चाहती हैं. इसके लिए वह यहाँ से दूर भिमंडी या मीरा रोड़ जैसी जगहों में रहती हैं. दुर्गा बता रही है कि बहुत कम माँएं अपनी बच्चियों को पढ़ा पा रही हैं. एक तो उनकी आधी से ज्यादा कमाई घरवाली, दलाल, डॉक्टर और साहूकार खा जाते हैं. दूसरा यह भी कि जैसे ही वह 30 की होती हैं, तो अक्सर कई तरह की बीमारियों से घिर जाती हैं, उनके सिर पर जब तक बहुत सारा क़र्ज़ भी चढ़ चुका होता है, और जब तक उनकी बच्चियां भी 12-13 साल की हो जाती हैं, जो कभी अपनी माँओं की बीमारियों, तो कभी उनके कर्जों को उतारने के लिए उन्हीं के नक़्शे-कदमों पर चल रही होती हैं.

वैसे बच्चियां जो देखती हैं, वही करती हैं. वह बचपन से मां के जैसा मेक़अप और व्यवहार देख-देखकर उनसे काफ़ी कुछ सीखा करती हैं. इस तरह उनमें आने वाली आदतें ताज़िंदगी आसानी से नहीं जाती हैं. दूसरी तरफ, कुछ बच्चियों को अपनी माँओं का ग्राहकों के साथ जाना अच्छा नहीं लगता है. कई तो पढ़ने में भी तेज होती हैं, मगर उन्हें सही रास्ता कोई नहीं बताता है, और अगर बताए भी तो घर से उतना सहयोग भी नहीं मिलता है. अक्सर घरवाली और दलाल भी उनसे उल्टी-सीधी बातें करके हतोत्साहित किया करते हैं. इसके अलावा, माँओं के ग्राहक भी उनका यौन-शोषण करना चाहते हैं.

अपनी बच्चियों को बचाने के लिए कुछ माँएं उन्हें अपने रिश्तेदारों के पास भेज देती हैं. कुछ माँएं 14-15 साल की उम्र में शादियाँ करा देती हैं. जबकि कुछ माँएं एनजीओ के पुनर्वास केन्द्रों में भेज देती हैं. मगर अपनी बच्चियों को पुनर्वास केन्द्रों तक भेजने वाली माँओं को यह डर भी रहता है कि अगर उनकी बच्ची सब जानने-समझने के बाद उनके पास नहीं आयी तो ? इसलिए यह माँएं बीच-बीच में अपनी बच्चियों को पुनर्वास केन्द्रों से बुलाती रहती हैं.


पुनर्वास के बजाय फिर धंधे में
कई पुनर्वास केन्द्रों की एक दिक्कत यह भी है कि उनमें केवल 7 से 12 साल तक के बच्चों को ही रखा जाता है. जया नाम की लड़की जैसे ही 13 की हुई, वैसे ही एक एनजीओ ने उसे यह कहकर अपने पुनर्वास केन्द्र से निकाल दिया कि तुम्हारी उम्र की लड़कियों को रखने की कोई व्यवस्था नहीं है. जया को उस समय पुनर्वास केन्द्र की सबसे ज्यादा ज़रुरत थी, क्योंकि उसकी मां का अपना कोई घर नहीं था और न ही वह उसे कहीं भेज सकती थी. इसलिए जया अपनी माँ के साथ रहने लगी और धीरे-धीरे उसी के धंधे में हाथ बटाने लगी. आज जया को एनजीओ वालों से नफ़रत हैं, वह एनजीओ के बारे में कहती है- "उनका काम तो सब ओर अपना काम दिखाना भर है, कोण्डम या गोली-दवाई देने के अलावा उनका कोई काम नहीं हैं."

यौनकर्मी बनने की बहुत सारी कहानियाँ पारिवारिक हिंसा-दुत्कार, अपराध, बलात्कार और ख़रीद-फ़रोख्त से भी जुड़ी हैं. मगर बाज़ार की फ़ितरत के हिसाब से यहाँ भी शोषण के लिए ज्य़ादातर उन लड़कियों को चुन लिया जाता है, जो पिछड़े और गरीब तबक़े से आती हैं. उनकी मज़बूरियों के ख़िलाफ उनके सारे सपने बहुत सस्ते और थोक में जो ख़रीद लिए जाते हैं.

भारत में यौनव्यापार को रोकने के लिए ‘भारतीय दण्ड विधान, 1860’ से लेकर ‘वेश्यावृत्ति उन्मूलन विधेयक, 1956’ बनाये गए हैं. इनदिनों कानून में बदलाव की चर्चाएं भी ज़ोरों पर चल रही हैं. मगर इस स्थिति की जड़ें तो बेकारी और पलायन से जुड़ी हुई हैं. इन उलझनों के आपसी जुड़ाव को अनदेखा किया जा रहा है. असलियत यह है कि यहाँ की औरतें घर पर बहुत सारा पैसा भेजने की बजाय दो टाइम की रोटी के लिए जूझ रही हैं. इसलिए नीतियों में इनके जीवन-स्तर को उठाने की बजाय इन्हें जीने के मौके देने वाले नियमों की बात हो तो बात बने भी.

कमाठीपुरा की गलियों से गुज़रते हुए आप कुछ और पिंज़रानुमा कोठरियों में भी घुस सकते हैं, कुछ और चरित्रों से भी बतिया सकते हैं. यहाँ के इन भागों को उनकी संपूर्णता में भी देख सकते हैं. दृश्यों को केवल दृश्य भर न मानकर, उनका विश्लेषण भी कर सकते हैं. बहुत सारे बिन्दुओं के मेलजोल से, एक कहानी को उपन्यास में भी बदल सकते हैं. मगर मेरे भीतर से कागज के फ़ूल, पाक़ीजा, उमराव ज़ान जैसी ओल्ड और गोल्ड फ़िल्मों की हिरोइनें हवा हो चुकी हैं... मेरे सामने केवल मंटो की काली सलवारें लटकी हैं.

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8.3.10

उनकी आधुनिकता को मैं धिक्कारती हूं

तसलीमा नसरीन

पश्चिमी नारीवाद तो क्या प्राच्य के नारीवाद की भी मेरी खास समझ नहीं थी, लेकिन फिर भी बचपन से ही परिवार और समाज के अनेक उपदेशों और बंधनों को मैंने मानने से इनकार कर दिया या उन पर सवाल किए। मुझे जब बाहर मैदान में खेलने नहीं दिया जाता और मेरे भाइयों को खेलने दिया जाता था। ऋतुधर्म के समय मुझे जब अपवित्र बोला जाता। मुझसे कहा जाता कि मैं बड़ी हो गई हूं और बाहर निकलते समय काले रंग का बुरका पहन कर निकलूं। ऐसे हर मौके पर मैंने प्रश्न किए हैं।

रास्तों पर चलते समय अनजान लड़के जब मुङो अपशब्द कहते, दुपट्टे को खींच लेते या छेड़खानी की कोशिश करते तो मैंने प्रतिवाद किया है। जब मैंने देखा कि घर-घर में पति अपनी पत्नियों को पीट रहे हैं, पुत्री के जन्म के बाद स्त्री आशंकित हो रही है, मुझसे यह सब बर्दाश्त नहीं होता था। बलात्कार पीड़ित लड़कियों के लज्जित मुख को देख कर मैं वेदना कातर हुई हूं। वेश्या बनाने के लिए लड़कियों को एक शहर से दूसरे शहर, एक देश से दूसरे देश में बेचने की खबर सुनकर रोई हूं मैं। सिर्फ दो वक्त की रोटी के लिए वेश्यालयों में लड़कियों को यौन-उत्पीड़न सहने के लिए बाध्य होना पड़ता है।

पुरुष चार-चार लड़कियों से विवाह कर उसे घर की नौकर बना रहे हैं। लड़की के रूप में जन्म लेने के कारण उत्तराधिकार के अधिकार से उसे वंचित किया जाता रहा है। मैं इसे नहीं मान सकी हूं। जब मैं देखती कि घर से निकलते ही लड़कियों को घर में घुसने की हिदायत दी जाती, पर पुरुष से प्रेम करने के अपराध में उसे जला कर मार दिया जाता, घर के आंगन में गड्ढा खोदकर उसे उस गड्ढे में डाल दिया जाता और उस पर पत्थर मारा जाता, तब मैं चीखती-चिल्लाती थी। किसी भी तर्क से, किसी भी बुद्धि से लड़कियों के ऊपर पुरुषों, परिवारों, समाज और राष्ट्र के अत्याचारों को मैं नहीं मान सकी हूं। उस समय मेरी इस वेदना, रुलाई, अस्वीकार, न मानना, स्तब्ध होना, न सोना और करुण चीत्कार को किसी ने नहीं देखा। देखा तब, जब मैंने लिखना शुरू किया।

मैं जिस समाज में बड़ी हुई हूं, वहां अनेक लोगों के मन में यह प्रश्न उठता था पर वे पुरुषवादियों के आगे नतमस्तक थे, परंतु मैं बाध्य नहीं हुई। मुझे किसी ने अबाध्य होना नहीं सिखाया। नारी अधिकारों की मांग के लिए बेटी फ्रिडान या रबीन मरम्यान पढ़ने की आवश्यकता नहीं होती है। अपनी चेतना ही काफी होती है। पूर्व की नारियों ने बंद दरवाजों को खोलकर जब भी बाहर निकलने की कोशिश की है तब पूर्व के पुरुषवादी विचारवालों ने उन्हें दोषी ठहराया है और कहा है कि वे पश्चिम के नारीवाद का अनुकरण कर रही हैं।

नारीवाद पश्चिम की संपत्ति नहीं है। अत्याचारित, असम्मानित, अवहेलित नारियों के संगठित होकर नारी के अधिकारों के लिए जीवन की बाजी लगाकर अदम्य संग्राम करने का नाम नारीवाद है। पश्चिमी लड़कियों के जीवन के बारे में जानने पर यह पता चला कि उन्हें जीवन में कम यातना नहीं सहनी पड़ी। पूर्व की लड़कियों की तरह पश्चिम की लड़कियां भी शताब्दियों तक पुरुष, धर्म, नारी विरोधी संस्कारों की शिकार हुई हैं। धर्मान्ध लोगों ने उन्हें जीवित जला कर मार डाला। नारी विरोधी संस्कारों ने उनके शरीर को दासता की जंजीरों में जकड़ दिया, उनको यौन वासना की कृतदासी बनाकर रख दिया।

लड़की होने का अपराध सभी लड़कियों को एक समान ही ङोलना पड़ता है, चाहे वह पूर्व की हो पश्चिम की, उत्तर की या दक्षिण की हो। पश्चिम की लड़कियों ने एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए आंदोलन शुरू किया था, उन्हें उस आंदोलन को एक लम्बे समय तक जारी रखना पड़ा था। वोट देने के अधिकार की मांग करने पर उन्हें अपमानित होना पड़ा है। पुरुषों ने उन पर थूका है, गाली दी है, तब उन्होंने बार-बार एक ही बात दोहराई है कि ‘इस वैषम्य को दूर कर जैसे भी हो, हमें हमारा अधिकार देना होगा’, लेकिन आंदोलन के बाद जो कुछ उन्हें मिला है वह पर्याप्त नहीं है।

गर्भपात के अधिकार के लिए लड़कियां आज भी लड़ रही हैं, बलात्कार के विरुद्ध वे आज भी प्रतिवाद कर रही हैं, समान मजदूरी की मांग कर रही हैं, और संसद में महिलाओं की संख्या बढ़ाने को लेकर आज भी आंदोलनरत हैं। आश्रय केन्द्रों में आज भी उत्पीड़ित लड़कियों की भीड़ लगी है। हां पश्चिम की गोरी और सुनहरे बालों वाली लड़कियों को भी प्रताड़ित होना पड़ता है और आज भी अभाव के कारण उन्हें देह बेचने के लिए रास्ते पर आना पड़ता है। समान अधिकार या मानवाधिकार का कोई पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण नहीं होता। लड़कियां सब देशों में, सब काल में उत्पीड़ित हुई हैं।

यह बात प्राय: उठती है कि मैंने धार्मिक संकीर्णता पर चोट की है। धर्म के साथ नारीवाद का विरोध बहुत पुराना है, नारी के अधिकार के संबंध में जिसको थोड़ी जानकारी है, वह भी यह जानता है कि धर्म मूल रूप से पुरुषवादी है। धर्म में वर्ण का उपयोग करके पुरुषसत्ता को बचाए रखने का षड्यंत्र बहुत पुराना है। बर्बरता के विरोध में हमेशा सभी सांस्कृतिक लोगों ने प्रतिवाद किया है। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर और राम मोहन राय को भी हिन्दू धर्म की अनुभूति पर आक्रमण करना पड़ा था।

कुछ कूपमंडूक लोगों का कहना है कि मैंने मुस्लिम धर्म को आघात पहुंचाया है। वे कहते हैं मेरा बयान पश्चिम का बयान है और पश्चिम की आंखों से प्राच्य को देखने का बयान है। सहिष्णुता के नाम पर मुस्लिम मौलवियों को इस अर्थहीन, तर्कहीन दावे को तथाकथित भारतीय संदर्भ में ‘सेकुलर’ नामधारी प्राय: उच्चारण करते हैं। उन लड़कियों की बातों को ‘पाश्चात्य का बयान’ कह कर जिन लोगों ने नीचा दिखाया है, उनकी आधुनिकता को मैं धिक्कारती हूं।

मैंने क्रिश्चियन, यहूदी धर्म तथा अन्य और भी नारी विरोधी धर्मो की निन्दा की है, लेकिन उसके बाद भी किसी ने इसे लेकर मेरे ऊपर किसी प्रकार का आरोप नहीं लगाया। गैर मुस्लिम धार्मिक अनुभूति पर आक्रमण करने के बावजूद किसी ने मेरी मृत्यु का फतवा जारी नहीं किया। मैंने मानवतावाद को अपने विश्वास के ऊपर चुन लिया है। हमें इस्लाम धर्म के सुधारवादी के रूप में देखा जाता है, लेकिन ऐसी भूल करना उचित नहीं है। मैं रिफार्मर नहीं हूं । मैं किसी समुदाय की नहीं हूं। मेरा समुदाय धर्ममुक्त मानवतावाद का है।

(लेखिका मशहूर कथाकार हैं। लेख में व्यक्त विचार लेखिका के निजी विचार हैं।)

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हिंदुस्तान से साभार।
http://epaper.hindustandainik.com/ArticleImage.aspx?article=08_03_2010_010_015&mode=1

30.1.10

नाबालिग लड़कियों के बच्चों में कुपोषण सबसे ज्यादा

शिरीष खरे


18 साल से कम उम्र में मां बनने वाली लड़कियों से पैदा होने वाले बच्चों पर कुपोषण का खतरा सबसे ज्यादा मंडराता है। बीएमजे यानि बिट्रिश मेडीकल जनरल ने हाल में प्रकाशित अपने शोध अध्ययन से ऐसा जाहिर किया है।


बीते दशक की महत्वपूर्ण आर्थिक वृद्धि के इर्दगिर्द, सबसे ज्यादा होने वाली मौतों के हिसाब से दुनिया के 5 देशों में भारत भी शामिल है। भारत में 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 44.5% (करीब आधी) औरतें ऐसी हैं- जिनकी शादियां 18 साल के पहले हुईं हैं। इन 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 22% (करीब एक चौथाई) औरतें ऐसी हैं- जो 18 साल के पहले मां बनीं हैं। इन कम उम्र की लड़कियों से 73% (सबसे ज्यादा) बच्चे पैदा हुए हैं। फिलहाल इन बच्चों में 67% (आधे से बहुत ज्यादा) कुपोषण के शिकार हैं।


बोस्टन यूनिवर्सिटी के पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेन्ट की एसोशियट प्रोफेसर अनीता राज और उनके सहयोगियों का यह शोध अध्ययन मूलतः भारत में कम उम्र के शादीशुदा संबंधों, शिशु और बाल मृत्यु-दर से जुड़ा है। यह अध्ययन 15 से 49 साल की तकरीबन 1,25,000 भारतीय औरतों के प्रतिनिधि नमूने पर आधारित है। शोध के लिए एकत्रित जानकारियों को नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे (2005-06) से लिया गया है।


यह शोध बताता है कि कम उम्र में शादी करने, दो बच्चों के बीच अंतर न रखने, गर्भावस्था के समय पर्याप्त भोजन न मिलने, प्रसव के समय थोड़ा-सा भी आराम न मिलने और इसी दौरान चिकित्सा की सुविधाओं के अभाव में कुपोषण किस तरह से लहलहा उठता है। यह शोध ‘कम उम्र की किशोरियों और बच्चों’ को केन्द्र में रखकर भारत के कुपोषण की व्याख्या करता है। शोध यह भी मानता है कि कम उम्र में शादी करने वाली औरतों को अगर उनके पतियों या ससुराल वालों द्वारा दरकिनार किया जाता है तो ऐसी औरतों को अपने और अपने बच्चों के लिए भोजन जुटा पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसमें भारत की भुखमरी को पारिवारिक व्यवस्था से लेकर सामाजिक तंत्र, राजनीति से लेकर विचारधारा और व्यवहारिकता तक में मौजूद लैंगिक भेदभाव से जोड़कर देखा गया है।


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19.11.09

आर्थिक विकास के बीच बढ़ती लैंगिक-असमानता

शिरीष खरे


भारत सरकार कहती है कि पहली बार देश में प्रति व्यक्ति आय 3000 रुपए/महीने को पार कर रही है। उधर इस साल विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) के लैंगिक-समानता पर हुए मूल्यांकन में 134 देशों के बीच भारत की 114वीं रैंकिंग रही है। जैसे एक बात (आर्थिक विकास) दूसरी (मानवीय विकास) को काटते हुए जता रही है कि विकास को दर या प्रतिव्यक्ति आय के आंकड़ों से नापना ठीक नहीं है। क्योंकि देश की 80% प्रतिशत पूंजी पर 20% घरानों का कब्जा है। क्योंकि देश का आर्थिक विकास बहुत केन्द्रित है और उसका फायदा भी कुछ घरानों तक ही सीमित है। अगर ऐसा नहीं होता तो लैंगिक-समानता के मद्देनजर दुनिया भर में पुरूष : महिलाओं के बीच संसाधनों और अवसरों के वितरण को लेकर भारत की हालत में कुछ तो सुधार हुआ होता। मगर 2006 को लैंगिक-समानता पर हुए इसी मूल्यांकन में भारत की 98वीं रैकिंग थी, जो अब 16 पायदान नीचे गिरकर 114वीं हो चुकी है।

भारत चाहे तो इस बात पर संतोष जता सकता है कि उसकी कतार में एशिया के कई और देश भी शामिल हैं जैसे कोरिया (115), ईरान (128) और पाकिस्तान (132)। जहां तक लैंगिक-समानता के लिहाज से अव्वल देशों का सवाल है तो आइसलैण्ड पहले स्थान पर है, इसके बाद रैंकिंग में फिनलैण्ड (2), नार्वे (3), स्वीडन (4), न्यूजीलैण्ड (5), साऊथ अफ्रीका (6), डेनमार्क (7), आयरलैण्ड (8), फिलीपिंस (9) और लेसोथो (10) आते हैं। पिछले साल के मुकाबले ब्रिटेन (15) और अमेरिका (31) भी पीछे रहे हैं। भारत आर्थिक विकास के तौर पर जिस चीन का अनुसरण कर रहा है उसकी 60वीं रैंकिंग है, जो पिछले साल के मुकाबले 3 स्थान नीचे है। वहीं रुस की 51वीं और ब्राजील की 82वीं रैंकिंग।

खासतौर से भारत, पाकिस्तान और ईरान में महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक स्थितियां बहुत खराब बतलायी गई हैं। जबकि राजनैतिक जागरूकता के लिहाज से यहां महिलाओं का प्रदर्शन अपेक्षाकृत सुधरा है। कहने को महिलाओं की आबादी में करीब आधी हिस्सेदारी है मगर वह नागरिक समाज के विभिन्न हिस्सों में बराबरी की संख्या और भागीदारी से नहीं जुड़ पा रही हैं। ऐसे में अगर विकास होता भी है तो उसे संतुलित और टिकाऊ विकास नहीं कहा जा सकता।

आयरलैण्ड में सबसे कम मातृ मृत्यु दर है, यहां 100,000 पर 1 की मौत होती है। जबकि चाड में सबसे ज्यादा मातृ मृत्यु दर होती है, यहां 100,000 पर मौतों का आकड़ा 1500 है। 24 देश ऐसे हैं जहां की मातृ मृत्यु दर 100,000 पर 500 से ज्यादा मौतों को छूती हैं। सालाना आधा मिलियन से भी अधिक महिलाएं गर्भावस्था और प्रसव के दौरान मारी जाती हैं। इसी तरह 3.7 मिलियन नवजात शिशु अपने जन्म से 28 दिनों के भीतर मर जाते हैं। हर साल 1 मिलियन से अधिक बच्चे अपनी मांओं के बगैर जीने को मजबूर होते हैं। यह अलग बात है कि गर्भावस्था या प्रसव के दौरान बुनियादी सुविधाएं भर भी मिल जाए तो मातृ मृत्यु को 80% तक रोका जा सकता है। विकासशील देशों में मातृ मृत्यु के 5 सबसे बड़े कारण हैं: रक्तस्त्राव, संक्रमण, उच्च रक्तचाप, असुरक्षित गर्भपात और अत्याधिक श्रम करना। गर्भावस्था या प्रसव के दौरान होने वाली 20% मौतों का कारण मलेरिया और ऐनेमिया जैसी बीमारियां हैं। इसी तरह महिलाओं को जरूरत से कम भोजन मिलना भी एक अति गंभीर समस्या है।

भारतीय स्वास्थ्य सेवा का हाल जानने के लिए मध्यप्रदेश ही काफी है जहां बीते सरकारी संस्थाओं में 10 सालों से 26 हजार बिस्तर ही लगे हैं। प्रसव के आकड़े डेढ़ लाख से बढ़कर साढ़े पंद्रह लाख जा पहुंचे और ढ़ांचागत सुविधाएं हैं कि सुधारने के नाम ही नहीं लेती। मध्यप्रदेश ही नहीं पूरे भारत की यही विडंबना है क्योंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन की अनुशंसा है कि प्रति 1000 मरीजों पर कम से कम 3 बिस्तर तो होने ही चाहिए। फिर भी भारत में प्रति 2000 मरीजों के लिए एक बिस्तर भी नहीं है। यहां महिलाओं के लिए बुनियादी सहूलियत की बात तो दूर, महिलाओं की स्वास्थ्य की स्थिति को जांचने और उससे जुड़ी साधारण सूचनाओं का पता लगाने की भी कोई कारगर व्यवस्था नहीं है। यह भी अजब व्यवस्था की गजब कहानी ही है कि कुपोषण जहां महिला बाल विकास के हिस्से में है वही उससे होने वाली मौत स्वास्थ्य विभाग के हिस्से में। याने यहां बाल और महिलाओं संरक्षणों के लिए कोई एकीकृत नीति नहीं है। देश में स्वास्थ्य सहित दूसरी सेवाओं को सीमित करते हुए उन्हें बाजार में घसीटा जा रहा है। अर्जुन सेनगुप्ता की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 82 करोड़ परिवार ऐसे हैं जो रोजाना 20 रूपए भी खर्च नहीं कर सकते। अब अगर स्वास्थ्य जैसे सेवा क्षेत्र भी बाजार के हाथों में जाएगा तो असर तो पड़ेगा ही, खासतौर पर बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य पर। मगर सरकार है कि स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र में भी निजीकरण को बढ़ावा दे रही है।

इसी के साथ यह तथ्य भी गौर करने लायक है कि अमेरिका में 1325 अमेरिकी नागरिकों पर एक भारतीय डाक्टर है। वहीं भारत में 2200 भारतीयों पर एक भारतीय डाक्टर है। आयरलैंड की पूर्व राष्ट्रपति मेरी रोबिन्सन मानती है कि ‘‘अमीर देशों की स्वास्थ्य सेवाएं गरीब राष्ट्रों के संसाधनों पर आधारित हैं। उदारवादी आर्थिक दर्शन स्वास्थ्य को लागत मानता है, न कि आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए अनिवार्यता। सरकारों को चाहिए कि वह इसकी गणना सकल घरेलू उत्पाद के रूप में करे। मगर मातृ-मृत्यु, जो कि मानव अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है, उसकी तरफ सरकार का ध्यान ही नहीं जाता। इस संबंध में आप मेरे देश का उदाहरण सामने रखें। आयरलैंड में यदि किसी अस्पताल में बच्चे को जन्म देते समय उसकी मां मर जाती है तो पूरा अस्पताल शोक प्रकट करता है। यह एक वास्तविक त्रासदी है।’’ मेरी रोबिन्सन आगे बताती हैं कि ''संकट बहुत महत्वपूर्ण होता है अतएव उसे बर्बाद नहीं करना चाहिए। मौजूदा परिदृश्य भी यह दर्शाता है कि विशुद्ध बाजार आधारित प्रवृत्ति से समानता और न्यायासंगिता नहीं आएगी, खासकर गरीबों के हित में।''

भारत सरकार की आर्थिक नीति को ध्यान में रखते हुए देखा जाए तो यहां आय भी बढ़ रही है तो नागरिकों के बीच का असंतोष भी। क्योंकि आय के वितरण में व्यक्तिगत और क्षैत्रीय असमानताएं जो बढ़ रही हैं। जिसका नतीजा है कि नागरिकों के बीच बुनियादी सहूलियतों का अंतर तो बढ़ ही रहा है, लैगिंक-असमानताएं भी बढ़ रही हैं। ऐसे हालातों में ‘कुल राष्ट्रीय आय’ को विकास का लक्ष्य मानने की बजाय ‘कुल मानव सुखों’ को विकास के पैमानों से जोड़ने की जरूरत है।

28.10.09

जाति की जड़ों को काटतीं औरतें

शिरीष खरे


उस्मानाबाद | देश में कुल आबादी का एक-चौथाई हिस्सा दलितों और आदिवासियों का है। मगर उनके पास खेतीलायक जमीन का महज 17.9 प्रतिशत हिस्सा है। इसी तरह कुल आबादी में करीब आधी हिस्सेदारी औरतों की है। जो कुल मेहनत में बड़ी हिस्सेदारी निभाती हैं और उन्हें कुल आमदनी का 10 वां हिस्सा मिलता है। ऐसे में दलित और उस पर भी एक औरत होने की स्थिति को आसानी से जाना जा सकता है। मगर मराठवाड़ा की दलित औरतें धीरे-धीरे जाति की जड़ों को काटकर और पथरीली जमीनों से फसल उगाकर अपना दर्जा खुद तय कर रही है।


उस्मानाबाद जिले में अनुसूचित जाति की आबादी 15 प्रतिशत से भी ज्यादा हैं। मगर 85 प्रतिशत से भी ज्यादा परिवार अपनी रोजीरोटी के लिए यह या तो सवर्णों के खेतों में काम करते हैं या फिर चीनी कारखानों के वास्ते गन्ने काटने के लिए पलायन करते हैं। स्थायी आजीविका न होने से उनके सामने जीने के कई सवाल खड़े रहते हैं। मराठवाड़ा में ‘कुल कितनी जमीनों में से कितना अन्न उगाया है’ के हिसाब से किसी आदमी की सामाजिक-आर्थिक स्थितियां बनती-बिगड़ती हैं। तारामती अपने तजुर्बे से ऐसी बातें अब खूब जानती है।


‘‘लड़कियों का बेहिसाब घूमना या किसी गैर से खुलके बतियाना, यह कोई अच्छे रंग-ढंग तो नहीं- बचपन से हमें यही तो सुनाया जाता है।’’ पर तारामती कस्बे अब वैसी नहीं रही, जैसे वह पहले थी। नहीं तो बहुत पहले, किसी अजनबी आदमी को देखा नहीं कि जा छिपती थी रिवाजों की ओट में। इस तरह यहां बाहरी मर्द से बतियाने के सवाल का कोई सवाल ही नहीं उठता था। दलित परिवार की तारामती के सामने ऐसे कई सवाल कभी नहीं उठे थे। उसे तो अपने पति को पिटते हुए देखकर भी चुप रहना था। गांव के दबंग जात वालों से पूरी मजूरी मांगने की हिम्मत न उसमें थी, न उसके पति में। ऐसा सलूक तो शुरू से ही होता रहा है, सो यह कोई बड़ी बात भी नहीं लगती थी। इसके बावजूद अगर कोई विरोध होता भी था तो मजाल है कि चारदीवारी से बाहर निकल सके। उस पर भी एक औरत की क्या बिसात कि वह ऐसी बातों पर खुसुर-फुसुर भी कर सके ?


‘‘6 साल पहले, यहां की औरतों को हमने ऐसी ही हालत में देखा पाया था।’’ ‘लोकहित समाज विकास संस्थान’ के बजरंग टाटे आगे बताते हैं ‘‘काम शुरू करने के बाद, हम हर रोज यहां आते-जाते, मगर जो भी बातें निकलकर आतीं वो सिर्फ मर्दों की होतीं। हम औरतों में सोचने की आदत के बारे में भी जानना चाहते थे। तब ‘स्वयं सहायता समूह’ ने औरतों के विचारों को आपस में जोड़ के लिए एक कड़ी का काम किया। इस समूह के जरिए धीरे-धीरे पता चला कि औरतों के भीतर गुस्सा फूट-फूटकर भरा है, वह बहुत कुछ बदल देना चाहती हैं, उन्हें अगर खुलेआम बोलने का मौका भी मिला तो काफी कुछ बदल जाएगा।’’ ग्राम धोकी, जिला उस्मानाबाद से तारामती जैसी दर्जनों औरतें धीरे-धीरे ही सही मगर अपने जैसे सबके भीतर भरे गुस्से से एक होती चली गईं।


लंबा वक्त गुजरा, एक रोज धोकी की औरतों ने चर्चा में पाया कि जब-तक जमीनों से फसल नहीं लेंगे तब-तक रोज-रोज की मजूरी के भरोसे ही बैठे रहेंगे। अगले रोज सबके भरोसे में उन्होंने अपना-अपना भरोसा जताया और गांव से बाहर बंजर पड़ी अपनी जमीनों पर खेती करने की हिम्मत जुटायी। जैसे कि आशंका थी, गांव में दबंग जात वालों के अत्याचार बढ़ गए ‘‘उन्होंने सोचा कि जो कल तक हमारे गुलाम थे, वो अगर मालिक बने तो उनके खेत कौन जोतेगा ?’’ हीरा बारेक उन दिनों को याद करती हैं ‘‘पंचायत चलाने वाले ऐसे बड़े लोगों ने मेरे परिवार को खूब धमकियां दीं। मगर अब हम अकेले नहीं थे, संगठन के बहुत सारे लोग भी तो हमारे साथ थे। इसलिए सबके साथ मैंने आगे आकर ललकारा कि अगर तुम अपनी ताकत अजमाओगे, मेरे पति को मारोगे, तो हम भी दिखा देंगे कि हम क्या कर सकते हैं ?’’


एक बार दबंग जात वालों ने कुछ दलित औरतों को जमीनों पर काम करते देखा तो उनके पतियों को बुलवाया। गांव से बंद करने जैसी धमकियां भी दीं। अगली सुबह तारामती और उनकी सहेलियों ने अपने-अपने घरों से निकलते हुए कहा कि ‘मर्द लोगों को डर लगता है तो रहो इधर ही, हम तो काम पर जाते हैं।’ थोड़ी देर बाद, बहुत सारे दलित मर्द जमीनों पर आए। कुल जमा 50 जनों ने वहीं बैठकर फैसला लिया कि वो ‘गांव में भी समूह बनाकर रहेंगे और खेतों में भी’। और इसी के बाद ‘स्वयं सहायता समूह’ की बैठक में औरतों के साथ पहली बार मर्द भी बैठे। इसके पहले तक तो औरतों का समूह अपनी रोजमर्रा की बातों पर ही बतियाता था। मगर अबकि यह समूह गांव के नल से पानी भरने जैसी बातों पर भी गंभीर हो गया। यहां की औरतों ने पानी में अपनी हिस्सेदारी के लिए लड़ने का मन बना लिया। खुद को ऊंची जात का कहने वालों ने सार्वजनिक उपयोगों की जिन बातों पर रोक लगाई थी, वो एक-एक करके टूटने लगी थीं।


यह सच था कि तारामती के समूह से जुड़ी औरतों के मुकाबले दूसरी जात की औरतों में भिन्न्नताएं साफ-साफ दिखती थीं। फिर भी एक बात सारी औरतों को एक साथ जोड़ती थी कि पंरपराओं के लिहाज से सबको मानमर्यादा का ख्याल रखना ही हैं। ऐसे में तारामती और उसके समूह के गांव से बाहर आने-जाने, बार-बार संगठन के दूसरे साथियों से मिलने-जुलने के ऐसे मतलब निकाले गए जो उनके चरित्र पर हमला करते थे। तारामती नहीं रूकी, वह तो एक कदम आगे जाकर उप-सरपंच का चुनाव भी लड़ी। यह अलग बात है कि वह चुनाव हारी। मगर जहां किसी दलित के चुनाव लड़ने को सामान्य खबर न माना जाए, वहां एक दलित औरत के मैदान में कूदने की चर्चा तो गर्म होनी ही थी। तारामती, हीरा बारेक, संगीता कस्बे को तो और आगे जाना था, इसलिए यहां पहली बार मर्दो के बराबर मजूरी की मांग उठी। इसके पहले इन्हें रोजाना 40 रूपए मजूरी मिलती थी, जो मर्दो के मुकाबले आधी थी। विरोध के बाद उन्हें रोजाना 65 रूपए मजूरी मिलने लगी, जो मर्दो से थोड़ी ही कम थी।


तारामती के समूह की औरतें पंचायत में जगह से लेकर जायज मजूरी पाने की जद्दोजहद इसलिए कर सकी, क्योंकि आजीविका के लिहाज से उन्हें अपने खेतों से फसल मिलने लगी थी। संगीता कस्बे बताती हैं ‘‘इससे पहले, वो (सवर्ण) हमें नाम की बजाय जात से बुलाते थे। जात न हो जैसे गाली हो। ‘क्या रे ऐ मान’, ‘क्यों रे महार’- ऐसे बोलते थे। अब वो ईज्जत से बुलाते हैं, बतियाते हैं। ‘आज तुम काम पर आ सकते हो या नहीं ?’- पूछते हैं। सबसे बढ़कर तो यह हुआ कि पंचायत से हमारे काम होने लगे। हम जानने लगे कि सही क्या है, हक क्या हैं। हर चीज केवल उनके हिसाब से तो नहीं चल सकती है ना।’’ हम जब तारामती के समूह से बतिया रहे थे तो दूर के डोराला गांव से कुछ औरतें भी पहुंचीं। वह भी अपने यहां ‘स्वयं सहायता समूह’ बनाना चाहती थीं। उसी समय जाना कि औरतों का समूह जरूरत पड़े तो मर्दो को भी कर्ज देता है। इस समूह में बच्चों की पढ़ाई और किसी अनहोनी से निपटने को वरीयता दी जाती है। पांडुरंग निवरूति ने बताया कि ‘‘आसपास ऐसे 16 महिला घट बनाये गए हैं। हर घट में कम से कम 10 औरतें तो रहती ही हैं।’’


तारामती कहती हैं ‘अगर हम ऐसे ही बैठे रहते तो जो थोड़ा बहुत पाया है, वो भी हाथ नहीं लगता। ऐसा भी नहीं है कि हमारी हालत बहुत सुधर गई है, अभी भी काफी कुछ करना है।’’ यह सच है कि यहां काफी कुछ नहीं बदला है फिर भी कम से कम इन औरतों की दुनिया बेबसी के परंपरागत चंगुलों और उनके बीच उलझी निर्भरताओं से किनारा पा चुकी है। यह अब अपने बच्चें को स्कूल भेजकर बेहतर सपना देख रही हैं.

25.10.09

मीडिया में मुस्लिम औरतें दिखती भी हैं मगर इस तरह

शिरीष खरे


कहते हैं कि "मीडिया में जो सच नहीं होता, कई बार वह सच से भी बड़ा सच लगने लगता है।" कहते हैं ऐसे हालत से बचने के लिए "जो दिख रहा है वो क्यों दिख रहा है को लेकर चलो" तो कुछ ज्यादा पता चलता है। ऐसे ख्यालों से बेदखल दिलोदिमाग के बीच मेरी नजर यूट्यूब में कुछ और सर्च करते-करते कहीं और जा अटकी। मैंने देखा मुस्लिम औरत को इस्लाम की कट्टरता से जोड़ने वाला यह कोई अकेला वीडियो नहीं था, मीडिया के कई सारे किस्सों से भी जान पड़ता है कि मुस्लिम औरतों के हक किस कदर ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘लोकत्रांतिकता’ की बजाय ‘साम्प्रदायिकता’ और ‘राष्ट्रीयता’ के बीचोबीच झूल रहे हैं।

बीते दिनों बिट्रेन के मशहूर अखबार ‘द गार्जियन’ ने मोबाइल से दो मिनिट का ऐसा वीडियो बनाया जिसमें पाकिस्तान की स्वात घाटी के कट्टरपंथियों ने 17 साल की लड़की पर 34 कोड़े बरसाए थे। इसी तरह के अन्य वीडियो के साथ अब यह भी यूटयूब में अपलोड है, जो संदेश देता है कि वहां कोई लड़की अगर पति को छोड़ दूसरे लड़के के साथ भागती है तो उसका अंजाम आप खुद देख लीजिए। वैसे तो अपने देश के विभिन्न समुदायों में भी ऐसी घटनाएं कम नहीं है मगर इधर की मीडिया ने उधर की घटना को कुछ ज्यादा ही जोर-शोर के साथ जगह दी। यह अलग बात है कि उन्हीं दिनों के आसपास, उत्तरप्रदेश के अमरोड़ा जिले से खुशबू मिर्जा चंद्रयान मिशन का हिस्सा बनी तो ज्यादातर मीडिया वालों को इसमें कोई खासियत दिखाई नहीं दी। देश की एक प्रतिष्ठित पत्रिका ने इस स्टोरी को हाईलाईट किया भी तो ऐसी भूमिका बांधते हुए कि ‘उसने मुस्लिम महिलाओं की सभी नकारात्मक छवियों को तोड़ा है।’ अब नकारात्मक छवियां को लेकर कई सवाल हो सकते हैं मगर उन सबसे ऊपर यह सवाल है कि क्या एक औरत की छवि को, उसके मजहब की छवियों से अलग करके भी देखा जा सकता है या नहीं ? आमतौर से जब ‘मुस्लिम औरतों’ के बारे में कुछ कहने को कहा जाता है तो जवाबों के साथ ‘इस्लाम’, ‘आतंकवाद’, ‘जेहाद’ और ‘तालीबानी’ जैसे शब्दों के अर्थ जैसे खुद-ब-खुद चले आते हैं। पूछे जाने पर ज्यादातर अपनी जानकारी का स्त्रोत अखबार, पत्रिका या चैनल बताते हैं। उन्हें लगता है कि मीडिया जो कहता है वो सच है। इस तरह मुस्लिम औरतों के मुद्दे पर ‘धर्मनिरपेक्ष’ चर्चा की बजाय ‘राष्ट्रवाद’ के क्रूर चहेरे उभर आते हैं।

यह सच है कि दूसरे समुदायों जैसे ही मुस्लिम समुदाय के भीतर का एक हिस्सा भी दकियानूसी रिवाजों के हवाले से प्रगतिशील विचारों को रोकता रहा है। इसके लिए वह ‘आज्ञाकारी औरत’ की छवि को ‘पाक साफ औरत’ का नाम देकर अपना राजनैतिक मतलब साधता रहा है। दूसरी तरफ, यह भी कहा जाता है कि पश्चिम की साम्राज्यवादी ताकतें दूसरे समुदाय की नकारात्मक छवियों को अपने फायदे के लिए प्रचारित करती रही हैं। ऐसे में इस्लाम की दुनिया में औरत की काली छाया वाली तस्वीरों का बारम्बार इस्तेमाल किया जाना जैसे किसी छुपे हुए एजेंडे की तरफ इशारा करता है। जहां तक भारतीय मीडिया की बात है, तो ऐसा नहीं है कि वह पश्चिप के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर-तरीकों से प्रभावित न रहा हो।

अन्यथा भारतीय मीडिया भी मुस्लिम औरतों से जुड़ी उलझनों को सिर्फ मुस्लिम दुनिया के भीतर का किस्सा बनाकर नहीं छोड़ता रहता। ज्यादातर मुस्लिम औरतें मीडिया में तभी आती हैं जब उनसे जुड़ी उलझनें तथाकथित कायदे कानूनों से आ टकराती हैं। मीडिया में ऐसी सुर्खियों की शुरूआत से लेकर उसके खात्मे तक की कहानी, मुसलमानों की कट्टर पहचान को जायज ठहराने से आगे बढ़ती नहीं देखी जाती। इस दौरान देखा गया है कि कई मजहबी नेताओं या मर्दों की रायशुमारियां खास बन जाती हैं। मगर औरतों के हक के सवालों पर औरतों के ही विचार अनदेखे रह जाते हैं। जैसे एक मुस्लिम औरत को मजहबी विरोधाभास से बाहर देखा ही नही जा सकता हो। जैसे भारतीय समाज के सारे रिश्तों से उसका कोई लेना-देना ही न हो। विभिन्न आयामों वाले विषय मजहबी रंगों में डूब जाते हैं। इसी के सामानान्तर मीडिया का दूसरा तबका ऐसा भी होता है जो प्रगतिशील कहे जाने वाली मुस्लिम संस्थानों के ख्यालातों को पेश करता है और अन्तत : मुस्लिम औरतों से हमदर्दी जताना भी नहीं भूलता।

मीडिया के सिद्धांत के मुताबिक मीडिया से प्रसारित धारणाएं उसके लक्षित वर्ग पर आसानी से न मिटने वाला असर छोड़ती हैं। खास तौर पर बाबरी मस्जिद विवाद के समय से भारतीय समाज के धर्मनिरपेक्ष तेवर अपेक्षाकृत तेजी से बदले और उसी हिसाब से मीडिया के तेवर भी। नतीजन, खबरों में चाहे तेहरा तलाक आए या बुर्का पहनने की जबर्दस्ती, उन्हें धार्मिक-राजनैतिक चश्मे से बाहर देखना नहीं हो पाया। यकीनन जबर्दस्ती बुर्का पहनाना, एक औरत से उसकी आजादी छिनने से जुड़ा हुआ मामला है, उसका विरोध अपनी जगह ठीक भी है। मगर दो कदम बढ़कर, उसे तालीबानी नाम देने से तो बुनियादी मुद्दा गुमराह हो जाता है। यह समझने की जरूरत है कि मुस्लिम औरतों के हकों से बेदखली के लिए पूरा इस्लाम जिम्मेदार नहीं है, वैसे ही जैसे कि गुजरात नरसंहार का जिम्मेदार पूरा हिन्दू समुदाय नहीं है। मगर अपने यहां इस्लाम ऐसा तवा है जो चुनाव के आसपास चढ़ता है, जिसमें मुस्लिम औरतों के मामले भी केवल गर्म करने के लिए होते हैं।

मामले चाहे मुस्लिम औरतों के घर से हो या उनके समुदाय से, भारतीय मीडिया खबरों से रू-ब-रू कराता रहा है। मुस्लिम औरतों के हकों के मद्देनजर ऐसा जरूरी भी है, मगर इस बीच जो सवाल पैदा होता है वह यह कि खबरों का असली मकसद क्या है, क्या उसकी कीमत सनसनीखेज या बिकने वाली खबर बनाने से ज्यादा भी है या नहीं ?? मामला चाहे शाहबानो का रहा हो या सानिया मिर्जा का, औरतों से जुड़ी घटनाओं के बहस में उनके हकों को वरीयता दी जानी चाहिए थी। मगर ऐसे मौकों पर मीडिया कभी शरीयत तो कभी मुस्लिम पासर्नल ला के आसपास ही घूमता रहा है। इसके पक्ष-विपक्ष से जुड़े तर्क-वितर्क भाषा की गर्म लपटों के बीच फौरन हवा होते रहे। नई सुर्खियां आते ही पुरानी चर्चाएं बीच में ही छूट जाती हैं, मामले ज्यादा जटिल बन जाते हैं और धारणाओं की नई परतें अंधेरा गहराने रह जाती हैं।

अक्सर मुस्लिम औरतों की हैसियत को उनके व्यक्तिगत कानूनों के दायरों से बाहर आकर नहीं देखा जाता रहा। इसलिए बहस के केन्द्र में ‘औरत’ की जगह कभी ‘रिवाज’ तो कभी ‘मौलवी’ हावी हो जाते रहे। इसी तरह नौकरियों के मामले में, मुस्लिम औरतों के पिछड़ेपन को लेकर कभी ‘धार्मिक’ तो कभी ‘सांस्कृतिक’ जड़ों में जाया जाता रहा, जबकि मुनासिब मौकों या सहूलियतों की बातें जाने कहां गुम होती रहीं। असल में मुस्लिम औरतों के मामलों की पड़ताल के समय, उसके भीतरी और बाहरी समुदायों के अंतर्दन्द और अंतर्सबन्धों को समझने की जरूरत है। जाने-अनजाने ही सही मीडिया में मुस्लिम औरतों की पहचान जैसे उसके मजहब के नीचे दब सी जाती है।

जिस तरह डाक्टर के यहां आने वाला बीमार किसी भी मजहब से हो उसकी बीमारी या इलाज कर तरीका नहीं बदलता- इसी तरह मीडिया भी तो मुस्लिम औरतों को मजहब की दीवारों से बाहर निकालकर, उन्हें बाकी औरतों के साथ एक पंक्ति में ला खड़ा कर सकता है। जहां डाक्टर के सामने इलाज के मद्देनजर सारी दीवारें टूट जाती हैं, सिर्फ बीमारी और इलाज का ही रिश्ता बनता है जो प्यार, राहत और भरोसे की बुनियाद पर टिका होता है- ऐसे ही मीडिया भी तो तमाम जगहों पर अलग-थलग बिखरीं मुस्लिम औरतों की उलझनों को एक जगह जमा कर सकता है।

मुस्लिम महिलाओं के कानूनों में सुधार की बातें, औरतों के हक और इस्लाम पर विमर्श से जुड़ी हैं। इसलिए मीडिया ऐसी बहसों में मुस्लिम औरतों को हिस्सेदार बना सकता है। वह ऐसा माहौल बनाने में भी मददगार हो सकता है जिसमें मुस्लिम औरतें देश के प्रगतिशील समूहों से जुड़ सकें और मुनासिब मौकों या सहूलियतों को फायदा उठा सकें। कुल मिलाकर मीडिया चाहे तो मजहब के रंगों में छिपी मुस्लिम औरतों की पहचान को रौशन कर सकता है।

18.10.09

पांच पंच मिल कीजै काज


शिरीष खरे

बाड़मेर। राजौ और पूसाराम, एक ही दुनिया के दो किस्से हैं, दो किरदार हैं। इधर है अपनी अस्मत गंवा चुकी राजौ, जो गांव के विरोध पर भी अपनी अर्जी अदालत तक दे तो आती है, मगर लौटकर गांव से छूट जाती है। उधर है कमजोर दलित होने का दर्द झेलने वाला पूसाराम, जो डर के मारे अपनी गुहार अदालत से वापिस ले आता है, और गांव से जुड़ जाता है। यह दोनों ही मानते हैं कि थाने के रास्ते अदालत आना-जाना और इंसाफ की लड़ाई लड़ना तो फिर भी आसान है, मगर समाज के बगैर रह पाना बहुत मुश्किल है।



एक ने अदालत जाना मंजूर किया, दूसरे ने गांव में रहना। दोनों का हाल आपके सामने है, मगर कौन ज्यादा अंधेरे में है, कौन कम उजाले में- चलिए आप ही तय कीजिए- गांव....थाने....अदालत....समाज के बीच मौजूद इनके फासलों, अंधेरों से होकर :


राजौ के यहां जाने से पहले, उस रोज का अखबार भरतपुर जिले के गढ़ीपट्टी में ‘बंदूक की नोंक पर पांच लोगों के दलित औरत से बलात्कार’ की खबर देता था। राजौ का गांव सावऊ, बाड़मेर जिले के गोड़ा थाने से 12 किलोमीटर दूर बतलाया गया। वहां तक पहुंचने में 30 मिनिट भी नहीं लगे, मगर राजौ के भीतर की झिझक ने उसे 45 मिनिट तक बाहर आने से रोके रखा। राजौ के साथ जो हुआ वो घटना के चार रोज बाद याने 9 जून, 2003 की एफआईआर में दर्ज था : ‘‘श्रीमान थाणेदार जी, एक अर्ज है कि मैं कुमारी राजौ पिता देदाराम, उम्र 15 साल, जब गोड़ा आने वाली बस से शहरफाटा पर उतरकर घर जा रही थी, तब रास्ते में टीकूराम पिता हीराराम जाट ने पटककर नीचे गिराया, दांतों से काटा, फिर.......और उसने जबरन खोटा काम किया। इसके बाद वह वहां से भाग निकला। मैंने यह बात सबसे पहले अपनी मां को बतलाई। मेरे पिता 120 दूर मजूरी पर गए थे, पता चलते ही अगली सुबह लौट आए। जब गांव वालों से न्याय नहीं मिला तो आज अपने भाई जोगेन्दर सिंह के साथ रिपोर्ट लिखवाने आई हूं। साबजी से अर्ज है कि जल्द से जल्द सख्त कार्यवाही करें।’’


राजौ अब 20 साल की हो चुकी है। उसकी मां से मालूम चला कि बचपन में उसकी सगाई अपने ही गांव में पाबूराम के लड़के हुकुमराम से हो चुकी है। मगर वह परिवार अब न तो राजौ को ले जाता है, न ही दूसरी शादी की बात कहता है। गांव वालों से मदद की तो कोई गुंजाइश भी नहीं है। कहने को 2 किलोमीटर दूर पुनियो के तला गांव में ताऊ है, 60 किलोमीटर दूर बनियाना में चाचा है, 80 किलोमीटर दूर सोनवा में ननिहाल है, मगर कोई खबर नहीं लेता। यह झोपड़ा भी गांव से 2 किलोमीटर दूर यहां आ गया है, गृहस्थी का हाल पहले से ज्यादा खराब है। पंचों में चाहे खेताराम जाट हो या रुपाराम, खियाराम हो या अमराराम, सारे यही कहते हैं कि चिड़िया जब पूरा खेत चुग जाए, इसके बाद पछताओ भी तो क्या फायदा ?


राजौ के पिता देदाराम यह खोटी खबर लेकर सबसे पहले गांव के पंच खियाराम जाट के पास पहुंचे थे। उन्होंने इसे अंधेर और जमाने को घोर कलयुगी बतलाया, फिर देदाराम से पूछे बगैर दोषी टीकूराम के यहां यह संदेशा भी भिजवा दिया कि 20,000 रूपए देकर मामला निपटा लेने में ही भलाई है। मगर टीकूराम के पिता हीराराम जाट ने साफ कह दिया कि वह न तो एक फूटी कोड़ी देने वाला है, न निपटारे के लिए कहीं आने-जाने वाला है। फिर मजिस्ट्रेट की दूसरी पेशी पर बाड़मेर कोर्ट के सामने दोषी समेत गांव के सारे पंच-प्रधान जमा हुए। उन्होंने समझाया कि केस वापिस ले लो, कोर्ट-कचहरी का खर्चापानी भी दे देंगे। पर टीकूराम को साथ देखकर राजौ बिफर पड़ी, उसने राजीनामा के तौर पर लाये गए 50,000 रूपए जमीन पर फेंक दिए और ऐसी खरी-खोटी सुनाई कि वहां एक न ठहरा। इसके बाद जिस चाचा ने राजौ का नाता जोड़ा था, उसी के जरिए पंचों ने बातें भेजीं कि- ‘‘राजीनामा कर लो तो हम साथ रहकर गौना भी करवा दें, और छोटे भाई की शादी भी। नहीं तो सब धरा रह जाएगा। कोर्ट कचहरी के चक्कर में पड़ने से अच्छा है आपस में निपटना। वो तो लड़का है, उसका क्या है, जितना तुम्हें पैसा देगा, उतना कचहरी में लुटाकर छूट जाएगा, तुम लड़की हो, उम्र भी क्या है, बाद में कोई साथ नहीं देता बेटी। फिर बदनामी बढ़ाने में अपना ही नुकसान है।’’ जब ऐसी बातों का असर भी नहीं हुआ तो कभी राजौ की जान की फ़िक्र की गई, कभी उसके छोटे भाई के जान की।


राजौ आज तक केस लड़ रही है। यह अलग बात है कि टीकूराम को जमानत पर रिहाई मिल गई, और उसके बाद उसकी शादी भी हुई। राजौ को कोर्ट में लड़ने का फैसला गलत नहीं लगता है, उसे वहां के फैसले का अब भी इंतजार है। राजौ को गांव में आने-जाने के लिए सीधे तो कोई भी नहीं रोकता, मगर पीठ पीछे......तरह-तरह की बातें तो होती ही हैं। वैसे पंचों को छोड़कर गांव के बाकी लोगों के साथ उसके रिश्ते धीरे-धीरे सुधर रहे हैं। राजौ के यहां से उठते वक्त उससे जब कहा गया कि रिपोर्ट में उसका नाम और फोटो छिपा ली जाएगी तो उसने बेझिझक कहा ‘‘मेरा असली नाम और फोटो ही देना। जिनके सामने लाज शरम से रहना था, उनके सामने ही ईज्जत उतर गई तो....तो दुनिया में जिन्हें हम जानते तक नहीं, उनसे बदनामी का कैसा डर ?’’


यह सवाल लेकर वहां से निकले और पूसाराम भील के गांव बाण्डी धारा की तरफ बढ़े। यहां तक पहुंचने के लिए कच्चे, टेढ़े-मेढ़े रास्ते के बीच इतने हिचकोले खाए कि मिनिटों का समय घण्टे में बदला। पूसाराम भी दो साल पहले अपने पर बीती बातों को घण्टों तक बतलाता रहा कि तब रामसिंह राजपूत और उसके साथ के सात और आदमियों ने दारू पीकर यहां बुरी-बुरी गालियां दीं। फिर उसे डराकर उसका एक बकरा खरीदने और पैसा बाद में देने की बात करने लगे। जब पूसाराम ने न की तो उसे बुरी तरह पीटा। खेत में काम कर रही उसकी घरवाली मीरा ने जब ये चीखें सुनीं तो दोड़ी-दौड़ी आई। आते ही देखा कि रामसिंह उसके बकरे को ले जा रहा है तो उसे छुड़ाने की कोशिश में बेरहम मार भी खाई। इत्तेफाक से वह 26 जनवरी की सुबह थी, इसलिए सारे गांव वाले स्कूल में थे। पूसाराम फौरन वहां भागा और सबके सामने सारी बात सुना डाली। तब गांव वालों ने रामसिंह को बुलवाया, मगर वह नहीं आया। अगले रोज पूसाराम अपनी घरवाली के साथ थाने जाकर रिपोर्ट लिखवा आया। उस तारीख से दो महीने तक उसका केस कचहरी में रहा, मगर इधर गांव वालों के बढ़ते जोर के आगे एक रोज वह ऐसा टूटा कि राजीनामा के लिए हां बोल बैठा। उसे मारपीट का भंयकर दर्द हमेशा के लिए भूल जाना पड़ा। खींचतान से बुरी तरह घायल होकर 5 रोज में मरे बकरे की मौत और उसकी कीमत भी भूल जानी पड़ी। गांव वालों ने सिर्फ अस्पताल में लगे खर्चापानी दिलवाने की गांरटी भर दी। उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि अब आगे से ऐसा नहीं होगा। दोषी रामसिंह राजपूत ने माफी भी मांगी, यह अलग बात है कि केवल ऊंची जाति वालों के सामने। पूसाराम से माफी मांगने के सवाल पर उसके भीतर जाति का अहम अड़ गया था। तब गांव वालों ने ही पूसाराम से माफी मांग ली और केस को निपटा दिया।


‘तो राजीनामा से खुश हो’- ऐसा सुनकर पूसाराम ने सिर से मनाही करते हुए जैसे सख्त ऐतराज जताया। उसने बताया कि ‘‘यह राजीनामा उसकी खुशी से नहीं, गांव वालों की खुशी से हुआ है। जिसकी बड़ी लड़की के ही 3 लड़कियां हो, उसे बेहिसाब पीटने का कोई तुक नहीं बनता। घरवाली की पीठ, पसलियों से उठने वाले दर्द ने महीनों तक तकलीफ दी थी।’’ ‘अगर ऐसा ही था तो राजीनामा किया ही क्यों’- जबाव में पूसाराम बोला ‘‘कुछ लोग बोले देख कितने बड़े लोग तेरे सामने हाथ जोड़ रहे हैं, तू उनकी बातें ठुकरा नहीं सकता, आखिर हम सब को रहना तो गांव में ही है ना। मुझे भी लगा कि वह सही है। खेत के पानी से लेकर आंगन का गोबर, चूल्हे की लकड़ियां, कर्ज के पैसे, आटे की चक्की, मजूरी, सब तो उन्हीं के भरोसे पर है। मेरा जोर चलता तो आगे भी लड़ता, मगर कुछ रोज में गांव छोडना पड़ जाता। यहां झोपड़ी हैं, यहीं जमीन हैं। बीबी, बच्चों, बकरियों को लेकर कहां जाता ?’’


कहते हैं ‘‘पांच पंच मिल कीजै काज। हारे जीते होय न लाज।।’’ मगर जहां के पंच अपनी ताकत से जीत को अपने खाते में रखते हो, वहां के कमजारों के पास हार और लाज ही बची रह जाती है। ऐसे में कोई कमजोर जीतने की उम्मीद से कचहरी के रास्ते जाए भी तो उसे जाती हुई राजौ और लौटता हुआ पूसाराम खड़ा मिलता है। तब यह सवाल इतना सीधा नहीं रह जाता है कि वह किसके साथ चले, किसके साथ लौटे ?

13.9.09

सुबह होने में अभी देर है..

शिरीष खरे
अजमेर स्टेशन उतरते ही भंवरीबाई को मोबाइल लगाया, वह लड़खड़ाती हुई आवाज में बोलीं- ‘‘आप तो औरतों की आवाज लिखने के लिए आ रहे हैं न, सीधे अजमेरी गेट थाने चले आइए।’’ मैंने अपने भीतर की लड़खड़ाहट को साधते हुए कहा- ‘‘लेकिन मामला क्या है...’’ (उधर से) ‘‘मामला थाने से ही समझ लेना। हम तो 50 साल की बूढ़ी औरतें हैं, आप नए लड़के हो, हमें तो दो-चार थप्पड़ के बाद बिठा दिया है, इसलिए आना चाहो तो ही आना।’’
मुंबई लौटने से अच्छा है अजमेरी गेट थाने चलना, आटो वाले ने सामान से लदा देख होटल में रूकने का बजट पूछा लेकिन थाने चलने की बात ने उसे थोड़ी देर के लिए चौंका दिया। थानाधिकारी सतीश यादव टेबल पर रखे ‘सत्यमेव जयते’ की प्लेट और पीछे की दीवार पर लटकी गांधीजी की फोटो के बीचोंबीच मानो 180 डिग्री का कोण बनाते हुए बैठे हैं। उन्होंने दूसरी तरफ निगाह टिकाते हुए कहा-‘‘आपकी तारीफ’’.... लेकिन बगैर जबाव सुने ही चल दिए। मेरा सवाल यह नहीं कि केस कितना छोटा या बड़ा है, या आप बड़ा किसे मानते हैं, सवाल है जब कभी गांवों में दलित और खासकर दलित महिला पर अत्याचार होता है तो आस-पड़ोस से लेकर पंचायत या पुलिस से लेकर कचहरी तक कैसी मानसिकता होती है ? आगे की किस्सा इसी मानसिकता को केन्द्र में रखकर लिखा जा रहा है।
रसूलपुरा गांव से दलित-महिला अत्याचारों के एक हफ्ते में ही तीन-तीन केस आने पर थानाधिकारी महोदय क्रोधित है। ‘महिला जन अधिकर समिति’ का आरोप है कि वह दलित-महिलाओं को कानून में दिये गए विशेष अधिकारों पर अमल करना तो दूर शिकायत दर्ज करवाने वाले को ही हवालात की हवा खिलाने लगे हैं। रसूलपुरा के सुआलाल भाम्बी, उसकी पत्नी गीतादेवी और पुत्री रेणु ने जब बीरम गूजर के खिलाफ जर्बदस्ती गाय हथियाने और मारपीट का मामला अलवर थाने में दर्ज करवाना चाहा तो सुआलाल भाम्बी को ही यह कहते हुए बंद कर लिया गया कि जांच के बाद पता करेंगे कि कसूरवार है कौन ?
रसूलपुरा, अजमेर से जयपुर जाने वाली सड़क पर बामुश्किल 10 किलोमीटर दूर है। यहां करीब 800 मतों में से 600 मुस्लिम, 150 गूजर और 50 दलितों के हैं। 20 साल पहले दलितों की संख्या ठीकठाक थी, तब से अबतक करीब 20 दलित परिवारों को अपनी जमीन-ज्यादाद कौड़ियों के दाम बेचकर अजमेर आना पड़ा है। बचे दलितों को भी गांव से आधा किलोमीटर दूर अपने खेतों में आकर रहना पड़ रहा है। यह भारत का वह हिस्सा है जहां आज भी चबूतरे पर दलितों का बैठना मना है, वह हेडपम्प का पानी नहीं भर सकते, साइकिल पर सवार होकर निकल तो सकते हैं लेकिन टोकने (रोकने) का डर भी है, पहले तो दलित दूल्हा घोड़े पर चढ़ नहीं सकता था लेकिन 10 साल पहले हरकिशन मास्टर ने घोड़े पर चढ़कर पुराना रिवाज तोड़ा था। 15 साल पहले छग्गीबाई भील सामान्य सीट से जीतकर सरपंच भी बनी थी, तब गांव की ईज्जत का वास्ता देकर सारे पंचों को एक किया गया और अविश्वास प्रस्ताव के जरिए छग्गीबाई को 6 महीने में ही हटा दिया गया। छग्गीबाई का सामान्य सीट से जीतना करिश्मा जैसा ही था। छग्गीबाई कहती हैं- ‘‘तब सामान्य जाति के इतने उम्मीदवार खड़े हो गए कि दलितों के कम मत ही भारी पड़ गए। नजीता सुनकर सवर्णों ने रसूलपुरा स्कूल घेर लिया, ऐसे में पीछे की कमजोर दीवार से लगी खिड़की तोड़कर मुझे पुलिस की गाड़ी से भगाया गया। पुराने सरपंच श्रवण सिंह रावत फौरन पंचायत की तरफ दौड़े, कुर्सी पर बैठकर बोले ‘ई भीली को कोड़ पूछै, कौड़ पैदा नी होय ऐसो, जो जा पंचायती में राज करै’।’’ याने एक गांव के ऐसे दो उदाहरणों से बीते 10-15-20 सालों के हालात देखें तो आपसी टकराहटों की तस्वीर थोड़ी-बहुत साफ होती है।
करीब 15 साल पहले इलाके की महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए समिति बनायी, नाम रखा ‘महिला जन अधिकार समिति’, तब 2-2 रूपए देकर 10-12 महिलाएं जुड़ी। केसर, तोला, सोहनी, सरजू, सकुंतला, रेनू, जूली, लीला, गंगा, रिहाना, संपत, भंवरीबाई जैसी महिलाएं अपनी छोटी-छोटी दिक्कतों और निपटारे के लिए चर्चाएं करतीं। भंवरीबाई बताती हैं- ‘‘5 साल के बाद जब हम बालविवाह, मृत्युभोज और जातिप्रथा जैसी बुराईयों के विरोध में बोलने लगे तो हमारा भी विरोध बढ़ने लगा। दलित महिलाएं जब जातिसूचक शब्दों और गालियों पर ऐतराज जताने लगीं तो सवर्ण कहते कि हम तो तुम्हें रोज ही गालियां देते थे, पहले भी तुम्हारे बच्चों को बिगड़े नामों से ही बुलाते थे, तब तो तुम्हें बुरा नहीं लगता था, अब क्यों लग रहा है ?’’ इस तरह की बहसों के बीच आपसी टकराहट का रुप बिगड़ता चला गया।
दलितों को सरकारी जमीन से होकर अपने खेत आना-जाना होता था। बीते 6 जून को तेजा गूजर ने उसी रास्ते पर गड्डा खोदा, तार और कांटे की बागड़ लगा दी। इसके बाद दलित महिलाओं की तरफ से भंवरीबाई ने तेजा गूजर से बात की- ‘‘लालजी (देवरजी) डब्बो थाओ बात करणी है।’’ जबाव में उन्हें मां-बेड़ की गालियां और रास्ते के ही गड्डे में गाड़ देने जैसी धमकियां मिलीं। इसके बाद दलित महिलाओं ने उनके बड़े भाई और वार्ड के पंच अंबा गूजर को बताया कि आपको वोट दिया तो इस उम्मीद पर कि सुख-दुख बांटोंगे, आप तो खुद ही दुख दे रहे हैं। जबाव में अंबा गूजर ने थाने घूम आने की नसीहत दी। असल में यह दोनों भाई कई गांवों जैसे बेड़िया, गूगरा, बुडोल और गगबाड़ा के दलितों की जमीनों को सस्ते दामों में खरीदने में लगे हैं। अगले दिन दलित महिलाएं जब नारेती पुलिस चैकी गईं तो पुलिस वाले बोले कि पहले जांच करेंगे, तब केस लेंगे। जांच के लिए जब कैलाश (दलित) कांस्टेबल आया तो तेजाभाई-अंबाभाई ऊपर बैठे और कैलाश कांस्टेबल आंगन के बाहर नीचे बैठा। यह नजारा देखते ही दलित महिलाएं अलवर गेट थाने पहुंची, जहां थानाधिकारी ऐसे मामलों के चलते पहले से ही हेरान-परेशान पाये गए। उन्होंने ऐसी वारदातों में कमी लाने की बात पर जोर दिया।
कल्याणजी पूरे भरोसे के साथ कहते हैं- ‘‘सवर्ण हमारे 30 एकड़ के खेतों के अलावा 4 एकड़ की सरकारी जमीन भी हथियाना चाहते हैं। यहां 1 एकड़ खेत की कीमत 1 लाख के आसपास चल रही है। हमारे पास गृहस्थी चलाने का मुख्य जरिया खेती ही है। 10-15 सालों से सूखा पड़ने से खेती वैसे ही चौपट है, मजूरी के लिए पलायन करना पड़ता है, ऐसे में सर्वणों की नीयत बिगड़ने से थाने-कचहरी के चक्कर भी लगाने पड़ रहे हैं।’’ इसी साल के कुछ मामलों पर नजर दौड़ाए तो जमीन के विवाद में 12 फरवरी को मामचंद रावत और उसके लोगों ने शंकरलाल रेंगर, उसकी पत्नी कमला, बेटी संगीता, बहू ललिता, बेटे विनोद और गोपाल के साथ घर में घुसकर मारपीट की। ‘दलित अधिकार केन्द्र’ के हस्तक्षेप करने से अलवर गेट थाने में तीन महीने बाद रिपोर्ट दर्ज हो सकी, अभी तक चलान पेश नहीं हुआ। इसके बाद तेजाभाई-अंबाभाई गूजर ने रास्ता रोकने का विरोध करने वाली गीता और सोहनी को पीटा। एसपी साब के हस्तक्षेप के बाद ही रिपोर्ट लिखी जा सकी, बहुत दिनों से कार्यवाही का इंतजार है। जिन दलितों के दिलों में अपनी जमीन खो देने का डर हैं, उनमें हैं कल्याण, कैलाश, ओमप्रकाश, रतन, सोहन, छोटू, नाथ, मोहन, सुआंलाल, गोगा, घीसू, किशन, दयाल, रामचंद, रामा, हरिराम.........
रसूलपुरा का सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक ताना-बाना ऐसा है कि वर्चस्व की लड़ाई में गूजरों के साथ मुस्लिमों ने हाथ मिला लिया है। लाला शेराणी और लाला सलीम जैसे दो मुस्लिम व्यापारियों ने तो गूजरों का खुला समर्थन किया है। इसमें से एक ने तो यहां तक कह दिया कि ‘पूरा गांव उलट-पुलट हो जाएगा, अगर एक भी गूजर थाने में गया तो।’ मुस्लिम और सवर्ण-हिन्दूओं की एकता का इससे बेहतरीन उदाहरण और कहां मिलेगा ?
इधर अलवर गेट थाने के थानाधिकारी महोदय की परेशानी समझ नहीं आती है, शंकरलाल रेंगर जब रिपोर्ट लिखाने पहुंचे तो थानाधिकारी महोदय ने स्वयं समझाने की कोशिश की थी कि ‘यह थाना केवल दलितों या रसूलपुरा के लिए नहीं खोला गया है, और भी तो लोग हैं, और भी परेशानियां हैं।’ उधर रसूलपुरा में शाम 7 बजे तक जब सुआलाल भाम्बी की गाय न लौटी तो उसकी पत्नी गीता और बेटी रेणु पता लगाने गांव में घूमने लगीं। उन्हें पता चला कि बीरम सिंह ने उनकी गाय बांध रखी है। इसके बाद जिसका अंदेशा था वहीं हुआ, गाय मांगने पर गाली-गलौज और विरोध करने पर मारपीट। उस वक्त एक भी बीच-बचाव में न आया। ऐसे में जब सुआंलाल, उसकी पत्नी गीता और बेटी रेणु रिपोर्ट लिखवाने आए तो सुआलाल को बंद कर लिया गया। लेकिन ‘महिला जन अधिकार समिति’ और ‘दलित अधिकार केन्द्र’ के विरोध के बाद पुलिस सुआलाल से कहती है कि ‘गांव चलते हैं, अगर एक भी आदमी यह कह दे कि यह तेरी गाय है तो रख लेना।’ सुआलाल बोला गवाह तो एक नहीं कई हैं, लेकिन मामला केवल गाय का नहीं है, गाय तो मेरी है ही, सवाल मेरी पत्नी और बेटी को बेवजह पीटने और गाली-गलौज का है, उसका न्याय चाहिए।’ पुलिस वालों के हिसाब से ‘ऐसे तो मामला सुलझने से रहा।’ इसलिए अगली सुबह गीता और रेणु को जिला एवं सेशन न्यायधीश, अजमेर का रास्ता पकड़ना है। रात उन्हें अजमेर ही ठहरना है, सुबह होने के पहले गांव के सवर्ण उन्हें कचहरी की हकीकत बताने के लिए आते हैं, वह गाय लौटा देने का वादा भी करते हैं, मारपीट और ईज्जत के सवाल पर लेन-देन की बातें भी चलती हैं। गीता और रेणु के शरीर पर चोट के निशान ज्यादा हैं, सुबह होने में अभी बहुत देर है लेकिन दोनों ने इस बार ईज्जत से कोई समझौता नहीं करने की ठानी है। कचहरी में, कचहरी से गांव और गांव से कचहरी जाने-आने के बीच क्या होता है, कचहरी के रास्ते चलकर क्या गांव के रास्ते चला जा सकता है, गांव के रास्ते पर वापिस लौटकर क्या ईज्जत से जीया जा सकता है, ऐसे ही कुछ और किस्से हैं, अगले हिस्से में....