पलायन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पलायन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

9.11.10

बच्चों का जितना पलायन उतना उत्पीड़न

शिरीष खरे

इन दिनों बच्चों का पलायन तेजी से बढ़ रहा है और उसी अनुपात में उनके साथ उत्पीड़न की घटनाएं और आकड़े भी. खास तौर से मजदूरी के लिए बच्चों को एक राज्य से दूसरे राज्य में आदान-प्रदान किए जाने का सिलसिला जोर पकड़ता जा रहा है. विभिन्न शोध-सर्वेक्षणों और रपटों से यह जाहिर भी हो रहा है कि मुख्य तौर पर बिहार, पूर्वी उत्तर-प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश से महाराष्ट्र और गुजरात सहित पूरे देश भर में मजदूरी के लिए बच्चों की पूर्ति की जा रही है. इन बच्चों में ज्यादातर की उम्र 10 से 16 के बीच है. इनमें भी ज्यादातर लड़के ही हैं. कई सर्वेक्षणों और तजुर्बे यह भी बता रहे हैं कि मजदूरी में लगे ज्यादातर बच्चे स्कूल जरूर गए हैं, मगर वह नियमित नहीं हो सके हैं. बच्चों के बारम्बार पलायन होने के पीछे की मुख्य वजहों में बच्चों ने अपने घर की गरीबी, मारपीट, डर और दबाव को जिम्मेदार ठहराया है तो कभी मुंबई और सूरत जैसे बड़े शहरों की तड़क-भड़क को देखने की दबी चाहत को भी बाहर निकला है. इस दिशा में जो सर्वेक्षणों के आधार पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर कई कदम उठाए जाने की बात कही जाती रही है, मगर अभी तक इन मामलों के न रुकने से यथार्थ की गंभीरता को भलीभांति समझा जा सकता है.

दूसरी तरफ बालगृहों से लगातार बच्चों के भागने की घटनाएं बयान करती हैं कि मुंबई सहित देश भर के सरकारी बालगृहों में बच्चों की सही देखभाल की असलियत क्या है. बीते समय मुंबई के एक बालगृह से कुछ बच्चों के भागने और उनमें से एक के हादसे में मारे जाने घटना उजागर हुई थी. आम तौर पर देखा गया है कि ज्यादातर बालगृहों द्वारा भागने वाले बच्चों के बारे में पता लगाने जरुरत भी महसूस नहीं की जाती हैं. ऐसे बच्चों को ढूंढने की भी तमाम कोशिशें तो दूर महज एक रिपोर्ट तक नहीं लिखवाई जाती है. तजुर्बों से यह जाहिर हुआ है कि हफ्तों-हफ्तों बच्चों के गायब रहने के बावजूद बालगृहों की तरफ से चुप्पी साध ली जाती है. जबकि नियमानुसार इस तरह की घटनाओं की जानकारी फौरन थाने में और उच्च अधिकारियों को देना जरूरी है. यहां तक कि महिला और बाल कल्याण विभाग को भी इस तरह की ज्यादातर घटनाओं की प्राथमिक सूचना किसी अखबार या गैर-सरकारी संस्था के जरिए ही मिलती है. भागने वाले कुछ बच्चों के बारे में जब हमने खैर-खबर जाननी चाही तो पता लगा कि सामान्यत: बालगृहों की तरफ से इन बच्चों की गुमशुदगी के बारे में न तो पुलिस को ही सूचना दी जाती है और न ही विभाग को इस बारे में बताया जाता है. कई बार तो बच्चों के साथ होने वाली दुर्घटनाएं और अपराधिक मामले प्रकाश में आने के बाद ही बच्चों के भागने की रिपोर्ट दर्ज की जाती है. बच्चों के इस तरह से गायब होने की तुरंत रिपोर्ट न लिखवाना महज एक लापरवाही ही नहीं बड़ा अपराध भी है. मुंबई के सरकारी बालगृहों से बीते 6 सालों में तकरीबन तीन सौ से ज्यादा बच्चे भागे हैं, मगर इतना होने के बावजूद लापरवाही का आलम ज्यों का त्यों है. समाज कल्याण विभाग से मिली गैर-औपचारिक जानकारियों के मुताबिक बालगृहों में कर्मचारियों की कमी है. एक कर्मचारी पर सैकड़ों बच्चों को संभालने की जवाबदारी होती है. काम के दबाव में कई बार कर्मचारियों द्वारा जब बच्चों के साथ बुरा बर्ताव किया जाता है तो बच्चे भाग जाते हैं. उन्हें ठीक-ठाक खाना तक नहीं मिलता है. इस तरह से सरकार द्वारा ऐसे बच्चों के देखभाल उचित के लिए संचालित बालगृह बुरे बर्ताव और उत्पीड़न का केंद्र बन जाते हैं.

हर साल मुंबई जैसे महानगर पहुंचने वाले हजारों बच्चे काम की तलाश में या काम की जगहों से भीख मंगवाने वाले नेटवर्क के हत्थे भी चढ़ जाते हैं. खास तौर से रेल्वे स्टेशनों के प्लेटफार्म और चौराहों पर ऐसे नेटवर्क से जुड़े दलालों की सरगर्मियों को समझा जा सकता है. यही बहुत सारे बच्चे बहुत ही गंदे माहौल में महज खाने-पीने के लिए जद्दोजहद करते रहते हैं. इसके अलावा बहुत से बच्चे नशे के आदी हो जाते हैं तो बहुत से जुर्म की दुनिया में भी दाखिल हो जाते हैं.

भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है, जो हर लिहाज से बाल- शोषण और उत्पीड़न को रोकने में मददगार हो. दूसरी तरफ कुछ जानकारों की राय में समस्या को दूर करने के लिए उसकी जड़ में पहुंचकर कानून के समानांतर गरीबी, विस्थापन, पलायन और विघटन से निपटने के प्रयास किए जाने की जरुरत है. साथ की जो प्रावधान लागू हैं उन्हें क्रियान्वित करने वाली एजेंसियों के सक्रिय और धनराशि के सही इस्तेमाल करने की जरुरत है और इसी के साथ बच्चों के यौन-उत्पीड़न सहित सभी तरह के उत्पीड़नों को ठीक से परिभाषित किए जाने की भी जरुरत है. दूसरी तरफ राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो में बच्चों के उत्पीड़न से जुड़े केवल ऐसे मामले शामिल रहते हैं, जिनकी रिपोर्ट पुलिस में दर्ज मिलती है. मगर असलियत जगजाहिर है कि ज्यादातर मामले तो पुलिस तक पहुंचते ही नहीं हैं. हालांकि सरकार की तरफ से 'बाल अपराध निरोधक बिल' संसद में लाने की बात की जाती रही है. बच्चों की सुरक्षा पर कुल बजट में से 0.03% की बढ़ोत्तरी और महिला व बाल विकास मंत्रालय द्वारा एकीकृत बाल सुरक्षा योजना शुरू करने जैसी घोषणाएं की भी की जाती रही हैं. इन सबके बावजूद इस तरह की नीतियां बनाने और इन नीतियों पर विमर्श का दौर तो खूब चलता है. नहीं चलता है तो उन्हें गर्म जोशी से लागू किए जाने की कोशिशों का दौर.

21.9.10

बाल-अधिकारों का उल्लघंन : आयोजन समिति को नोटिस

शिरीष खरे

दिल्ली बाल संरक्षण आयोग राष्ट्रमंडल खेलों के निर्माण स्थलों पर काम करने वाले प्रवासी मजदूरों के बच्चों के बचाव में आया है. इसके लिए आयोग ने बाल अधिकारों के घोर उल्लंघन को देखते हुए खेल आयोजन समिति सहित विभिन्न सरकारी एजेंसियों को नोटिस भेजा है. पिछले दिनों क्राई द्वारा जारी रिपोर्ट पर गंभीर चिंता जताते हुए आयोग ने भी यह माना है कि प्रवासी मजदूरों के बच्चों के अधिकारों का घोर उल्लंघन किया जा रहा है.

क्राई द्वारा जारी रिपोर्ट में निर्माण स्थलों पर रहने वाले बच्चों के कई बुनियादी अधिकारों जैसे आवास, स्वच्छता, गुणवत्तापूर्ण भोजन, स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य और स्कूली शिक्षा से बेदखल किए जाने से जुड़े पहलुओं को उजागर किया गया था. इस रिपोर्ट में श्रम कानूनों और संविदा श्रम अधिनियम के प्रावधानों सहित विभिन्न नियमों की खुलेआम अवमानना के साथ-साथ दिल्ली श्रम कल्याण बोर्ड की कई परियोजनाओं के निर्माण स्थलों में बच्चों के शोषण को नजरअंदाज बनाए जाने का भी खुलासा किया गया था.

दिल्ली बाल संरक्षण आयोग ने विभिन्न सरकारी एजेंसियों को जांच रिपोर्ट भेजते हुए प्रभावित बच्चों के उचित पुनर्वास और शिक्षा सहित सभी बुनियादी अधिकारों को जल्द से जल्द बहाल करने पर जोर दिया है.

क्राई का यह अवलोकन अध्ययन ध्यानचंद्र नेशनल स्टेडियम, आरके खन्ना स्टेडियम, तालकटोरा स्टेडियम, निजामुद्दीन नाला, नेहरू रोड, जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम के दौरों और सिरी फोर्ट निर्माण स्थल से जताए गए आंकड़ों पर आधारित था. क्राई की डायरेक्टर योगिता वर्मा के मुताबिक ‘‘हमने पाया कि इन कंस्ट्रक्शन साइट्स के बच्चे अस्थाई कैम्पों में रहते हैं. इन्हें स्तरीय भोजन, साफ पानी, स्वच्छता, शिक्षा और यहां तक कि किसी प्रकार का अच्छा माहौल नहीं मिल रहा है. कुल मिलाकर इन बच्चों के बाल अधिकारों का हनन हो रहा है.’’ योगिता वर्मा मानती है ‘‘गरीबी की वजह से कंस्ट्रक्शन साइट्स पर मजदूरों का माइग्रेशन हो रहा है और बच्चे स्कूल छोड़ रहे हैं. स्टडी में पाया गया कि कंस्ट्रक्शन साइट पर मौजूद कोई भी बच्चा स्कूल नहीं जाता है.’’

हाइकोर्ट में दायर एक जनहित याचिका के अनुसार राष्ट्रमंडल खेलों के अलग-अलग निर्माण स्थलों में लगभग 4.15 लाख दिहाड़ी मजदूर काम कर रहे हैं. यहां मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी दी जा रही है. कुलमिलाकर ऐसी तमाम गंभीर स्थितियों का सबसे ज्यादा खामियाजा मजदूरों के बच्चों को भुगतना पड़ रहा है.

यह सब तब हो रहा है जबकि दिल्ली उच्च न्यायालय ने मई में ही कहा था कि आयोजन स्थलों पर काम करने वाले दैनिक मजदूरों को ‘दिल्ली बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स बोर्ड' (डीबीसीडब्ल्यूडब्ल्यूबी) के अंतर्गत पंजीकृत किया जाए ताकि उनके अधिकारों की रक्षा हो सके.

न्यायालय के आदेश को नई दिल्ली नगर निगम (एनडीएमसी), दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) एवं भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) के पास भेज दिया गया था.

क्राई के मुताबिक निर्माण स्थलों पर बच्चों के लिए स्वच्छता की कोई व्यवस्था नहीं है. कहीं-कहीं चलित शौचालय हैं लेकिन उनकी ठीक से सफाई नहीं होती. बच्चों का ध्यान रखने के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई है. इसके लिए निर्माण स्थलों के करीब कोई आंगनबाड़ी भी नहीं है. उनके रहने के स्थानों की हालत दयनीय है. उन्हें प्लास्टिक शीट से बनी झोपड़ियों में रखा गया है.

योगिता वर्मा के मुताबिक ‘‘बच्चों की तरफ हमारे कई संवैधानिक दायित्व हैं, कामनवेल्थ गेम्स को विश्वस्तरीय बनाने की कोशिश में इन संवैधानिक दायित्वों को अनदेखा नहीं किया जा सकता है.’’ संस्था के मुताबिक दिल्ली में जो कामनवेल्थ गेम्स की तैयारी चल रही है, उसमें भारत सरकार अपने देश के बच्चों के लिए संवैधानिक दायित्व और अंतराष्ट्रीय मानवीय अधिकार वचनबद्धताओं को सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रावधान बनाए. इसी तरह निर्माण कार्यो से जुड़े मजदूरों और उनके बच्चों के लिए आवास, स्वच्छता, गुणवत्तापूर्ण भोजन, स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य और स्कूली शिक्षा जैसे बुनियादी अधिकार बहाल किये जाएं. शिक्षा के अधिकार कानून को लागू करने को लेकर सरकार अगर वाकई गंभीर है तो उसे स्कूल से होने वाली ड्राप-आउट की इस समस्या को रोकने की पहल करनी होगी. आंगनबाड़ी और मिड-डे मिल जैसी योजनाओं को तत्काल प्रभाव में लाया जाए. दिल्ली हाइकोर्ट के आदेश (11 फरवरी, 2010) अनुसार सभी परिवारों का पुनर्वास नागरिक सुविधाओं के साथ किया जाए.

15.9.10

गर्त में गये गांव

शिरीष खरे





गांवों की कहानी आकड़ों की जुबानी : 2021 तक भारत में महानगरों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा होगी और हर महानगर में 1 करोड़ से ज्यादा लोग रह रहे होंगे. अमेरिकन इंडिया फाऊंडेशन ऐसा मानता है और वहीं भारत सरकार की जनगणना के मुताबिक भी बीते एक दशक में गांवों से तकरीबन 10 करोड़ लोगों ने पलायन किया है. जबकि निवास स्थान छोड़ने के आधार पर 30 करोड़ 90 हजार लोगों ने अपना निवास स्थान छोड़ा है. योजना आयोग के मुताबिक 1999-2000 में अप्रवासी मजदूरों की कुल संख्या 10 करोड़ 27 हजार थी. जबकि मौसमी पलायन करने वालों की संख्या 2 करोड़ से ज्यादा अनुमानित की गई. कई जानकारों की राय में असली संख्या सरकारी आंकड़े से 10 गुना ज्यादा भी हो सकती है.

2000 की राष्ट्रीय कृषि नीति में कहा गया था कि कृषि अपेक्षाकृत लाभ का पेशा नहीं रह गया है. योजना आयोग के मुताबिक 1990 के दशक के मध्यवर्ती सालों में कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों की बढ़ोत्तरी घटती चली गई है. सिंचाई के साधन वाले भूमि क्षेत्र और सिंचाई के लिए बारिश के पानी पर निर्भर भूमि क्षेत्र के बीच आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है. विश्व-बाजार में मूल्यों का तेज उतार-चढ़ाव से नकदी फसलों का उत्पादन करने वाले क्षेत्रों को घाटा उठाना पड़ रहा है. इसके चलते बड़ी संख्या में किसानों द्वारा खेती का काम छोड़कर शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं. बीते लंबे अरसे से कृषि में लाभ की स्थितियों के मुकाबले लागत और जोखिम लगातार बढ़ रहे हैं और सरकारी सहायता लगातार कम होती जा रही है. 1960 में प्रति किसान भूस्वामित्व की ईकाई का आकार 2.6 हेक्टेयर था जो 2000 में घटकर 1.4 हेक्टेयर रह गया. कुलमिलाकर बीते चार दशकों में भूस्वामित्व की ईकाई का आकार 60% घटा है. भारत के किसानों को मिलने वाली सब्सिडी(66 डॉलर) विकसित देशों जैसे अमेरिका के किसानों को मिलने वाली सब्सिडी(21 हजार डॉलर) के मुकाबले न के बराबर है. 1995 में कुल आबादी का 54.6% हिस्सा खेतिहर आबादी का था जो 2005 में घटकर 49.9% रह गया.

योजना आयोग के मुताबिक 1983 से 1994 के बीच रोजगार में बढ़ोत्तरी की दर 2.03 % थी जो साल 1994 से 2005 के बीच घटकर 1.85% हो गई. 2005 में असंगठित क्षेत्र में खेतिहर मजदूरों की संख्या 98% थी. तकरीबन खेतिहर मजदूरों में 64% का अपना रोजगार है जबकि 36% दिहाड़ी मजदूर हैं. 1983 से 1994 के बीच रोजगार की दर 1.04% थी जो 1994 से 2005 के बीच घटकर 0.08% हो गई. 1994 से 2005 के बीच बेरोजगारी की दर में 1% की बढ़ोतरी हुई. इसी तरह, 1983 से 1994 के बीच रोजगार की बढ़ोतरी की दर 2.03% थी जो 1994 से 2005 के बीच घटकर 1.85% हो गई. योजना आयोग के अनुसार एक किसान परिवार का औसत मासिक खर्च 2770 रुपये है जबकि खेती के अलावा दिहाड़ी मजदूरी सहित अन्य स्रोतों से उसकी औसत मासिक आमदनी 2115 रुपये होती है. जाहिर है एक किसान परिवार का औसत मासिक खर्च उसकी मासिक आमदनी से तकरीबन 25% ज्यादा है. इसीलिये भारतीय किसानों को कर्ज लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है.

बीते 12 सालों में 2 लाख किसानों ने आत्महत्याएं की हैं. इनमें से अधिकतर किसान कपास और सूरजमुखी जैसी नकदी फसल की खेती करने वाले रहे हैं. उत्पादन की लागत बढ़ने के चलते ऐसे किसानों को साहूकारों से ऊंचे ब्याज दर पर कर्ज लेना पड़ा है. कीटनाशक और उर्वरक बेचने वाली कंपनियों ने महाराष्ट्र और कर्नाटक में किसानों को कर्ज देना शुरु किया, जिससे किसानों के पर कर्ज का बोझ और बढ़ गया. एक तो गरीब किसानों की आमदनी बहुत कम है और कर्ज लेने के कारण (शादी ब्याह वगैरह) कहीं ज्यादा होने से वह भंवरजाल से निकल नहीं पा रहे हैं.

योजना आयोग द्वारा प्रस्तुत ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के मुताबिक ग्रामीण गरीबों की कुल संख्या का 41% हिस्सा खेतिहर-मजदूर वर्ग से है. जबकि ग्रामीण गरीबों की कुल संख्या का 80% हिस्सा अनसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग से हैं. खाद्य व कृषि संगठन द्वारा विश्व में आहार-असुरक्षा की स्थिति पर जारी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में तकरीबन 23 करोड़ यानी 21% लोगों को रोजाना भर पेट भोजन नहीं मिलता है. 1983 में ग्रामीण भारत के हर आदमी को रोजाना औसतन 2309 किलो कैलोरी का आहार हासिल था जो साल 1998 में घटकर 2011 किलो कैलोरी रह गया. 1990 के दशक में मजदूरों और किसानों की खरीददारी की क्षमता में काफी कमी आई. इससे जहां ग्रामीण भारत में खेतिहर संकट गहराया तो वहीं अनाज के सरकारी गोदामों में अनाज सड़ता रहा. न्यूट्रिशनल इंटेक इन इंडिया के मुताबिक 1993-94 में प्रतिव्यक्ति रोजाना औसत कैलोरी उपभोग की मात्रा 2153 किलो कैलोरी थी जो साल 2004-05 में घटकर 2047 किलो कैलोरी हो गई. इस तरह कुल 106 किलो कैलोरी की कमी आई. ग्रामीण इलाकों में तकरीबन 66% आबादी रोजाना 2700 किलो कैलोरी से कम का उपभोग करती है. विश्वबैंक के अनुसार औसत से कम वजन के सबसे ज्यादा बच्चे भारत में ही हैं. भारत में 5 राज्यों और 50% गांवों में कुल कुपोषितों की तादाद का 80% हिस्सा रहता है. 5 साल से कम उम्र के 75% बच्चों में आयरन की कमी है और 57% बच्चों में विटामिन ए की कमी से पैदा होने वाले रोग के लक्षण हैं. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के दौरान औसत से कम वजन के बच्चों की संख्या शहरों के(38%) मुकाबले गांवों में(50%) ज्यादा पाई गई. जबकि औसत से कम वजन के बच्चों की संख्या में लड़कों(45%) की तुलना में लड़कियों(53.2%) ज्यादा पाई गईं. अगर जातिगत आधार पर देखा जाए तो अनुसूचित जाति के बच्चों में 53% और अनुसूचित जनजाति के बच्चों में 56% बच्चे औसत से कम वजन के पाये गए. जबकि बाकी जातियों में उनकी संख्या 44% है. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार ग्रामीण भारत में 18.7% परिवारों के पास सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत जारी किया जाने वाला कोई भी कार्ड नहीं है.

एनुअल स्टेटस् ऑव एजुकेशन रिपोर्ट( असर) 2008 के मुताबिक ग्रामीण इलाकों के अनुसूचित जनजाति के तबके में साक्षरता दर सबसे कम(42%) पायी गई है. जबकि अनुसूचित जाति के के तबके में साक्षरता दर(47%) है. सबसे कम भूमि पर अधिकार रखने वाले वर्ग में साक्षरता दर 52% है. जबकि सबसे बड़े आकार की ज्यादा भूमि पर अधिकार रखने वाले वर्ग में साक्षरता दर 64% है. शिक्षा के हर पैमाने पर पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की मौजूदगी कम है. ग्रामीण इलाके की महिलाओं और पुरुषों के बीच साक्षरता दर क्रमशः 51.1% और 68.4%,पायी गई. 2009 में 5 साल की उम्र वाले 50% बच्चे ही स्कूलों में नामांकित पाये गए.

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के मुताबिक तकरीबन 25% भारतीय सिर्फ अस्पताली खर्चे के कारण गरीबी रेखा से नीचे हैं. महज 10% भारतीयों के पास कोई न कोई स्वास्थ्य बीमा है और ये बीमा भी उनकी जरुरतों के मुताबिक नहीं है. वॉलेंटेरी हैल्थ एसोशिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक डॉक्टरों की संख्या कम होना भी एक बड़ी समस्या है. देश में एक हजार की आबादी पर महज 0.6 एमबीबीएस डॉक्टर ही हैं. इसी तरह दवाइयों के दामों में तेज गति से बढ़ोतरी हुई है. मरीज को उपचार के लिए अपने खर्च का औसतन 75% हिस्सा दवाइयों पर न्यौछावर करना पड़ता है. दवाइयां मंहगी होने की मुख्य वजहों में नये पेटेंट कानून, दवा निर्माताओं के ऊपर कानूनों का उचित तरीके से लागू न होना और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक दवाओं का बाजार में प्रचलित होना है. यह भी दक्षिण के राज्यों या धनी राज्यों में ज्यादा हैं. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 के अनुसार गांवों में 43% महिलाओं को प्रसव से पहले कम से कम तीन बार अनिवार्य रूप से चिकित्सा की सुविधा मिल पाती है. शिशु-मृत्यु दर के मामले में प्रति हजार नवजात शिशुओं में से औसतन 60 काल के गाल में समा जाते हैं. 12-13 महीने के नवजात शिशुओं में से महज 44% को ही सभी प्रकार के रोग-प्रतिरोधी टीके लग पाते हैं.

भारत का मानव विकास सूचकांक 0.619 है. यह कुल 177 देशों के बीच 128 वां स्थान दर्शाता है. भारत का मानव-निर्धनता सूचकांक 31.3 है, जो 108 देशों के बीच 67वां स्थान स्थान दर्शाता है. मानवीय विकास का यह आकलन उजागर कर देता है कि कि भारत के नागरिक स्वस्थ और दीर्घायु जीवन जीने में कहां तक समर्थ हैं. इससे यह भी उजागर होता है कि भारत के नागरिक कहां तक शिक्षित हैं और मानव विकास के सूचकांक पर उनका जीवन स्तर कैसा है. 

30.8.10

दिल्ली 2010 : शोषण का खेल चालू है

शिरीष खरे

राष्ट्रमंडल खेल दिल्ली को दुनिया के बेहतरीन खेल शहरों में शामिल कर जाएंगे. यह अभी तक के सबसे मंहगे राष्ट्रमंडल खेल होंगे. यह अभी तक के सबसे सुरक्षित राष्ट्रमंडल खेल भी होंगे. राष्ट्रमंडल खेलों के सफल आयोजन के साथ ही भारत को एक आर्थिक महाशक्ति के रुप में पेश कर सकेंगे.

रूकिए-रुकिए, बड़े-बड़े दावों के बीच कहीं यह उपलब्धि भी छूट न जाए कि मजदूरों के नाम पर उपकर के जरिए सरकार ने केवल राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ी परियोजनाओं से करीब 500 करोड़ रूपए उगाया है. और यह भी कि बदले में मजदूरों के कल्याण के लिए एक भी योजना को लागू नहीं किया है. और हां, यह जानकारी भी कि राष्ट्रमंडल खेल निर्माण स्थलों पर काम के दौरान अब तक सौ और श्रम संगठनों के मुताबिक दो सौ से ज्यादा मजदूर मारे जा चुके हैं और उनमें से एक को भी मुआवजे के रूप में एक रूपया भी नहीं मिला है. ऐसे और इससे भी भयावह कई तथ्य, आंकड़े और झूठ के खेल मजदूरों की छाती पर पसरे हुये हैं. आश्चर्य नहीं कि इन कारणों से यह राष्ट्रमंडल खेल अभी तक के सर्वाधिक शोषण वाले खेलों में भी शामिल हो जाये.

3 अगस्त, 2006 को दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में बुनियादी ढ़ांचे के विकास पर अलग-अलग एजेंसियों द्वारा व्यय की गई राशि का जिक्र करते हुए दिल्ली के वित्त एवं लोक निर्माण विभाग मंत्री एके वालिया ने कुल 26,808 करोड़ रूपए के खर्च का ब्यौरा दिया था. तब से अब तक दिल्ली को सुसभ्य राजधानी बनाने के चलते बजट में तो बेहताशा इजाफा होता रहा है, मगर मजदूरों को उनकी पूरी मजदूरी के लिए लगातार तरसना पड़ा है.

गुलाब बानो अपने शौहर मंजूर मोहम्मद के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय परिसर स्थित राष्ट्रमंडल खेल निर्माण स्थल में काम करती हैं. यहां आठ साल का बेटा चांद मोहम्मद भी उनके साथ है, और वहां पश्चिम बंगाल के चंचुल गांव में चांद से बड़े भाई-बहन हैं. गुलाब बानो कहती हैं, ‘‘यह इतना छोटा है कि खुद से खा-पी भी नहीं सकता है. कई जान-पहचान वालों ने हमें बताया था कि दिल्ली में काम मिल जाता है, सो चांद के अलावा बाकी सब कुछ वहीं छोड-छाड़ के हम चले आए हैं.’’

यहां ईंटों के ढ़ेर से गुलाब बानो एक बार में 10-12 ईंटें सिर पर उठाती हैं, फिर उन्हें स्टेडियम की ऊंची सीढ़ियों तक ले जाते हुए राजमिस्त्री के सामने उतारने के बाद लौटने का क्रम सैकड़ों बार दोहराती हैं. जहां गुलाब बानो को 125 रूपए प्रतिदिन मिलते हैं, वहीं उनके शौहर को उनसे थोड़ा ज्यादा 150 रूपए प्रतिदिन. मगर गुलाब बानो कहती है ‘‘ठेकेदार के आदमी ने तो हमसे कहा था कि औरतों को 250 रूपए रोजाना और मर्दों को 300 रूपए रोजाना दिया जाएगा.’’ यानी ठेकेदार के जिस एजेंट ने इस जोड़े से जितनी मजदूरी यानी 550 रुपये देने का वादा किया था, उसका आधा 275 रूपए प्रतिदिन भी इन्हें नहीं दिया जा रहा है.

पच्चीस साल के बिरजू का डेरा राष्ट्रमंडल खेल गांव से लगे अक्षरधाम मंदिर के पास है. बीरजू कहते हैं ‘‘जब तुम लोग साइट पर आए थे तो काम से निकाल दिए जाने के डर के मारे मैं बात नहीं कर सका था. वैसे बाहरी आदमियों को वहां कम ही भटकने दिया जाता है.’’

15 महीने पहले जब बिरजू मध्यप्रदेश के कटनी स्टेशन से ट्रेन के सामान्य डिब्बे में सवार होकर दिल्ली आये तो उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों के बारे में सुना भी नहीं था. वह बताते हैं "अगर कोई आदमी साइट पर आकर सुपरवाईजर से पूछे तो वह दिखावा करता है. कहता है कि हर मजदूर को 200 और राजमिस्त्री को 400 रूपए रोजाना दिया जाता है, जबकि हमारा आधा पैसा तो बीच वालों की जेबों में जाता है.’’

बिरजू के साथ के बाकी मजदूरों से भी पता चला कि मजदूरी के भुगतान में देरी होना एक आम बात है. अगर ठेकेदार के आदमियों से पूछो तो वह कहेंगे कि पूरा पैसा तो अधर में ही अटका पड़ा है, फिर भी घर लौटने से पहले-पहले सभी का पूरा हिसाब-किताब जरूर कर दिया जाएगा. खुद बिरजू का बीते दो महीने से 4000 रूपए से भी ज्यादा का हिसाब-किताब बकाया है. इसमें से पूरा मिलेगा या कितना, उसे कुछ पता नहीं है.

फरवरी, 2010 को हाईकोर्ट ने दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों के निर्माण स्थलों पर मजदूरों की स्थिति का आकलन करने के लिए संयुक्त राष्ट्र के पूर्व राजदूत अरूधंती घोष सहित कई सम्मानीय सदस्यों को लेकर एक समिति गठित की थी.

इस समिति ने कानूनों की खुलेआम अवहेलना करने वाले ठेकेदारों के तौर पर कुल 21 ठेकेदारों की पहचान की थी. तब समिति ने मजदूरों का भुगतान न करने वाले ठेकेदारों के खिलाफ कठोर दंड के प्रावधानों की सिफारिश की थी. इसी के साथ समिति ने कई श्रम कानूनों को प्रभावशाली ढंग से लागू करने की भी मांग की थी. समिति के रिपोर्ट के आधार पर दिल्ली हाइकोर्ट ने निर्देश भी जारी किए थे. इसके बावजूद यहां कानूनों के खुलेआम अवमानना का सिलसिला है जो रुकने का नाम नहीं ले रहा. 

25 मई, 2010 को दिल्ली हाईकोर्ट ने केन्द्र और राज्य सरकारों से कहा कि वह राजधानी की अलग-अलग निर्माण स्थलों में ‘दिल्ली भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड’ के तहत पंजीकृत किये गए मजदूरों के अधिकारों को सुनिश्चित करें. तब दिल्ली हाईकोर्ट का यह नोटिस नई दिल्ली नगर निगम, दिल्ली विकास प्राधिकरण और भारतीय खेल प्राधिकरण को भेजा गया था.

इसी से ताल्लुक रखने वाला दूसरा तथ्य यह है कि दिल्ली हाइकोर्ट में दायर एक जनहित याचिका के अनुसार, राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़े कुल 11 आयोजन स्थलों पर 4,15,000 दिहाड़ी मजदूर काम कर रहे हैं. जबकि ‘दिल्ली भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड’ के साथ पंजीकृत मजदूरों की संख्या 20,000 के आसपास दर्ज है. जाहिर है, लाखों की संख्या में मजदूरों को पंजीकृत नहीं किया गया है. यानी दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में लाखों की संख्या में मजदूरों के अधिकारों को सुनिश्चित किये जाने की जबावदारी से सीधे-सीधे बचा गया है.

बिरजू ने बताया कि उनका परिवार भी उनके साथ यही ठहरा हुआ है. जब देखा तो पाया कि उनका पूरा परिवार तो प्लास्टिक के मामूली से तम्बू में तंगहाल है, जिसमें एक भी दरवाजा और खिड़की होने का सवाल ही नहीं उठता है. पूरे परिवार को शौच से लेकर नहाने तक के रोजमर्रा के काम खुले में ही करने हैं. यह तंबू सुरक्षा के लिहाज से भी ठीक नहीं है. यह न बारिश से बचाव कर सकता है और न धूप से. बिरजू का परिवार ठेकेदार के जिस एजेंट के जोर पर यहां तक पहुंचा है, वह इन दिनों रहने के बंदोबस्त सहित बहुत सारे वायदों को लेकर ना-नुकर कर रहा है.

बिरजू की पत्नी कलाबाई के पैरों का दाहीना तलुवा पट्टियों से बंधा हुआ है. पूछने पर वह बताती हैं ‘‘यह चोट तो काम करते समय लगी है. दवाई की बात सुनते ही ठेकेदार ने भगा दिया था. वहां साइट पर तो कोई न कोई घायल होता ही रहता है. मगर किसी तरह के मदद की कोई उम्मीद नहीं है.’’

ऐसे निर्माण स्थलों पर कई खतरनाक कामों को अंजाम देने वाले मजदूरों को सुरक्षा संबंधी बुनियादी चीजें जैसे दास्ताने या जूतों के बगैर काम करते हुए देखा जा सकता है. यहां मजदूरों की जिंदगी को दांव पर रखे जाने को भी क्या राष्ट्र सम्मान से जुड़ा मसला मान लिया जाए ?

दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों का समय जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे सभी तैयारियों को समय पर पूरा करने का सबसे ज्यादा दबाव मजदूरों पर पड़ रहा है. इसी क्रम में मजदूरों के काम के तयशुदा घंटे और सुरक्षा मानकों जैसे जरूरी पैमानों को नजरअंदाज बनाया जा रहा है और असुरक्षित तरीके से रात-दिन मजदूरों से काम कराया जा रहा है. इस बीच खेल मंत्री एमएस गिल द्वारा राज्यसभा में दिये गए कथन के मुताबिक "जल्द ही प्रधानमंत्री कुछ आयोजन स्थलों का दौरा कर सकते हैं."

तैयारियों में हो रही देरी और अनियमितताओं की खबरों के बीच वह यहां से देख सकते हैं कि कैसे अक्टूबर के पहले सप्ताह से शुरू होने वाले इस आयोजन के लिए मेजर ध्यानचंद्र नेशनल स्टेडियम, आरके खन्ना स्टेडियम, जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम और तालकटोरा इंडोर स्टेडियम सहित जगह-जगह फ्लाई ओवर, सब-बे, फुट ब्रिज, ओवर ब्रिज, जल निकासी लाईन, मेट्रो लाईन, रोड लाईन, पार्किंग लाईन, पावर प्लांट, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट तैयार करने के साथ-साथ मजदूरों के शोषण का कार्य भी युद्धस्तर पर चालू है.

राष्ट्रमंडल खेलों के निर्माण स्थलों पर बने अस्थायी शिविरों में रहने वाले मजदूर परिवारों को कई बुनियादी अधिकारों जैसे आवास, स्वच्छता, सुरक्षित वातावरण, गुणवत्तापूर्ण भोजन, स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य और स्कूली शिक्षा से बेदखल रखा गया हैं. गरीबी के चलते बड़ी संख्या में बच्चों को अपनी-अपनी जगहों से पलायन करके यहां आना पड़ा है, नतीजन उसी अनुपात में यह बच्चे स्कूलों से ड्राप आउट भी हुए हैं. देखा जाए तो मामला चाहे मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी मिलने का हो, या अस्थायी शिविरों के घटिया हालातों का हो, कुल मिलाकर यहां मजदूरों के बच्चों को भारी खामियाजा उठाना पड़ रहा है.

बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था 'क्राई' की डायरेक्टर योगिता वर्मा कहती हैं- ‘‘बच्चों को लेकर हमारे कई संवैधानिक दायित्व हैं, राष्ट्रमंडल खेलों को विश्वस्तरीय बनाने की कोशिश में इन संवैधानिक दायित्वों को अनदेखा नहीं किया जा सकता है.’’

क्राई ने सिरीफोर्ट साईट से ली गई अपनी सेम्पल स्टडी में पाया है कि

• इस साइट के बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं.

• यहां या आसपास में चाईल्डकेयर यानी बच्चे की देखभाल जैसे आंगनबाड़ी वगैरह की भी कोई सुविधा नहीं है.

• यहां रहने के स्थानों की हालत दयनीय है, खासतौर से बच्चों के लिए न खाने के इंतजाम हैं, न सोने के.

• यहां प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध नहीं है.

• शौचालय की सेवा भी लगभग न के बराबर हैं.

• यहां तकरीबन सभी मजदूर परिवार गरीबी रेखा से नीचे हैं.

• यहां 84% मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी दी जा रही है.

बारह साल का रौशन भी अपने परिवार के साथ बिहार के औरंगाबाद से दिल्ली चला आया है. उसके पिता एक राजमिस्त्री हैं, जो कि अक्षरधाम मंदिर स्थित निर्माण स्थल पर काम करते हैं. रौशन, अपने भाई-बहन और माता-पिता के साथ 8X8 फीट वाली टीन की चादरों के घेरे में रहता है. हैरत की बात है कि यहां हरेक परिवार चाहे वह कितना भी छोटा या बड़ा हो, के हिस्से में यह टीन के चादरों वाला एक ही आकार-प्रकार का एक ही सकरा घेरा आता है.

हालांकि इसमें एकमात्र दरवाजा भी है, जिसे बंद तो किया जा सकता है, मगर जिसके बंद करते ही सभी को सुरक्षा की कीमत भी चुकानी पड़ती है. टीन की चादरों वाली उस झोपड़ी में एक भी खिड़की जो नहीं है. भीतर बिजली भी नहीं है. इसलिए कोई बच्चा पढ़ना भी चाहे तो भी नहीं पढ़ सकता है. टीन के इन कथित आश्रयों के भीतर मजदूर महिलाएं अगर आग जलाकर रोटी सेंकना भी चाहें तो टीन के चलते वह भी नहीं सेंक सकती हैं.

जबकि पानी के बंदोबस्त के नाम पर यहां हर रोज इनके सामने गैरजिम्मेदाराना तरीके से टैंकर का पाइप खोल दिया जाता है. इसी तरह पचासों लोगों के सामने एक शौचालय होता है. कुलमिलाकर यहां रूके मजूदरों को ऐसे हालातों के बीच रहना पड़ रहा है, जिसमें बीमार पड़ने की आशंकाएं सबसे प्रबल रहती हैं.

रौशन की मां जब काम पर जाती है तो अपने साथ 6 महीने की बच्ची को भी ले जाती है. इस बच्ची को साइट पर जहां उसके लायक खाना मुमकिन नहीं है, वहीं यह धूल, गर्मी, शोर और अन्य तरह के जोखिमों के बीच रहने को मजबूर है. स्वभाविक तौर से घातक कारकों का ऐसा संयोजन बहुत सारे बच्चों को कुपोषण, उच्च रूग्णता और मृत्यु-दर की तरफ ले जाता है, और जिसका ठीक-ठीक आंकड़ा मिलना भी मुश्किल होता है.

यहां गौर करने लायक बात यह है कि तकरीबन 450 किलोमीटर लंबे मार्ग में रौशनी का बंदोबश्त करने के बावजूद 80% दिल्ली निवासी रौशनी सहित पानी, सड़क, सीवर, स्कूल और अस्पताल जैसी बुनियादी सहूलियतों से महरूम ही रहेंगे. और यहां गौर करने लायक बात यह भी है कि राष्ट्रमंडल खेलों के निर्माण स्थलों पर काम करने वाले ज्यादातर मजदूर परिवार उन गांवों से आए हुए हैं, जहां कई सालों से सूखा या सैलाब आ रहा है. सूखा और सैलाब से निपटने के हिसाब से जहां सरकार के पास पैसा न होने का रोना है, वहीं 12 दिनों के आयोजन के लिए सरकार यहां पानी की तरह पैसा बहा रही है. गौरतलब है अमेरिका की कुल आबादी से कहीं अधिक तो यहां भूख और कुपोषण से घिरे पीड़ितों की आबादी का आकड़ा है. यहां से सवाल उठता है कि सरकार द्वारा अपने दामन पर लगे ऐसे बहुत सारे दागों को अगर किसी चमकदार आयोजन या राष्ट्रीय स्मारकों को बनाने के मार्फत छिपाया भी जाएगा तो किस तरह से और कितनी देर तलक ?

जबकि भारत दुनिया के भूख सूचकांक में 66वें नम्बर है, जहां 77% लोग एक दिन में 20 रूपए भी नहीं कमा पाते हैं, जहां 83.7 करोड़ लोग अत्यंत गरीब और मलिन हैं, जहां 12 सालों में 2 लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्याएं की हैं, जहां 5 साल से कम उम्र के 48% बच्चे सामान्य से कमजोर जीवन जीते हैं, वहां झूठे गौरव का जयकारा लगाने मात्र के लिए पूरे देश भर का पैसा दिल्ली के कुछ इलाकों में न्यौछावर किया जाना कहीं से न्यायोचित नहीं लगता है.

यहां से यह सवाल भी उठता है कि खाद्य सुरक्षा अधिनियम के लिए जब सरकार के पास पर्याप्त पैसा नहीं है तो भारतीयों में खेलों के प्रति जागरूकता और खेल संस्कृति पैदा करने के नाम पर उसके पास इतना पैसा कहां से आया है ?

2.8.10

कामनवेल्थ खेलों से उजड़ रहा बचपन

दिल्ली/ भारत में बाल अधिकारों के लिए सक्रिय संस्था क्राई ने कहा है कि कामनवेल्थ गेम्स के निर्माण स्थलों पर रहने वाले मजदूर परिवारों के बच्चे कई बुनियादी अधिकारों जैसे आवास, स्वच्छता, गुणवत्तापूर्ण भोजन, स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य और स्कूली शिक्षा से बेदखल हो गए हैं। क्राई ने अपने अवलोकन में पाया है कि निर्माण कार्यों से जुड़े मजदूर परिवारों के बच्चों को कई गंभीर स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।

यह अवलोकन ध्यानचंद्र नेशनल स्टेडियम, आरके खन्ना स्टेडियम, तालकटोरा स्टेडियम, निजामुद्दीन नाला, नेहरू रोड, जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम का दौरा करके क्राई द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट और सिरी फोर्ट निर्माण स्थल से किये गए एक सेम्पल सर्वे के आधार पर किया गया है। क्राई की डायरेक्टर योगिता वर्मा कहती है कि ‘‘निर्माण कार्यो में लगे मजदूरों के बच्चे जिन अस्थायी शिविरों में रह रहे हैं, वहां हमने पाया कि उनके लिए न तो अच्छा भोजन है, न पीने का साफ पानी, न साफ-सफाई, न बारिश या धूप से बचने की सहूलियत, और न ही स्कूली शिक्षा या स्वास्थ्य जैसी बुनियादी अधिकार ही हैं।’’ उन्होंने आगे बताया कि ‘‘गरीबी के चलते बहुत सारे मजदूर परिवारों को अपनी-अपनी जगहों से पलायन करके दिल्ली के निर्माण स्थलों तक आना पड़ा है, नतीजन बड़ी संख्या में उनके बच्चे स्कूलों से ड्राप आउट हो गए हैं।’’

हाइकोर्ट में दायर एक जनहित याचिका के अनुसार, राष्ट्रमंडल खेलों के अलग-अलग निर्माण स्थलों में लगभग 4.15 लाख दिहाड़ी मजदूर काम कर रहे हैं। यहां मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी दी जा रही है। कुलमिलाकर, ऐसी तमाम गंभीर स्थितियों का सबसे ज्यादा खामियाजा मजदूरों के बच्चों को भुगतना पड़ रहा है।

योगिता वर्मा के मुताबिक ‘‘बच्चों की तरफ हमारे कई संवैधानिक दायित्व हैं, कामनवेल्थ गेम्स को विश्वस्तरीय बनाने की कोशिश में इन संवैधानिक दायित्वों को अनदेखा नहीं किया जा सकता है।’’ संस्था के मुताबिक दिल्ली में जो कामनवेल्थ गेम्स की तैयारी चल रही है, उसमें भारत सरकार अपने देश के बच्चों के लिए संवैधानिक दायित्व और अंतराष्ट्रीय मानवीय अधिकार वचनबद्धताओं को सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रावधान बनाएं। इसी तरह :

 निर्माण कार्यो से जुड़े मजदूरों और उनके बच्चों के लिए आवास, स्वच्छता, गुणवत्तापूर्ण भोजन, स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य और स्कूली शिक्षा जैसे बुनियादी अधिकार बहाल किये जाए।

 शिक्षा के अधिकार कानून को लागू करने को लेकर सरकार अगर वाकई गंभीर है तो उसे स्कूल से होने वाली ड्राप-आउट की इस समस्या को रोकने की पहल करनी होगी। आंगनबाड़ी और मिड डे मिल जैसी योजनाओं को तत्काल प्रभाव में लाया जाए।


 दिल्ली हाइकोर्ट के आदेश (11 फरवरी, 2010) अनुसार, सभी परिवारों का पुनर्वास नागरिक सुविधाओं के साथ किया जाए।

सिरी फोर्ट निर्माण स्थल से सेम्पल स्टडी के निष्कर्ष :

 इस निर्माण स्थल के बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। (भारत में 6 से 14 साल तक के 80,43,889 बच्चे स्कूल से बाहर हैं।)

 इस निर्माण स्थल में या इसके आसपास चाईल्डकेयर यानी बच्चे की देखभाल जैसे आंगनबाड़ी वगैरह की कोई सुविधा नहीं है।


 यहां आवास की स्थितियां बहुत खराब हैं। आवासीय सामग्री के तौर पर टीन और प्लास्टिक की चादरों को उपयोग में लाया जा रहा है, जो कि सुरक्षा के लिहाज से कतई ठीक नहीं कही जा सकती हैं। आश्रय के नाम पर मजदूर परिवारों के हिस्से में 7X7 फीट की टीन की चादरों का घेरा है। परिवार में चाहे कितने भी लोग हों, उनके हिस्से में एक ही सकरा घेरा है।

 यहां प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध नहीं है। शौचालय की सेवा भी लगभग न के बराबर हैं, कुछ जगहों पर मोबाइल शौचालय जरूर देखें गए हैं, जो कि साफ-सुथरे नहीं हैं।

 यहां 96% मजदूर गरीबी रेखा से नीचे हैं। 36% मजदूरो को अपनी-अपनी जगहों से खेती की विफलताओं के चलते दिल्ली की ओर पलायन करना पड़ा है।

 यहां 84% मजदूरों को 203 रूपए/प्रति दिन की न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी दी जा रही है।

निर्माण कार्यों से जुड़े यह मजदूर बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाके से दिल्ली आए हुए हैं। इनमें से ज्यादातर भूमिहीन मजदूर और सीमांत किसान हैं। कृषि क्षेत्र में आए संकट के चलते जिन परिवारों को पलायन करना पड़ा है, उनमें से ज्यादातर अनाज पैदा करने के लिए अप्रत्याशित वर्षा पर निर्भर रहते हैं। कई सालों से अपेक्षित वर्षा न होने से इनके सामने आजीविका का संकट गहराया है। निर्माण कार्यों से जुड़े यह मजदूर जिन गांवों से आए हैं, उनके उन गांवों के मुकाबले दिल्ली के निर्माण स्थलों में काम करने और रहने की स्थितियां बेहद खराब हैं। यहां कानूनी सुरक्षा से लेकर मजदूरों और उनके बच्चों के अधिकारों तक का उल्लंघन खुलेआम चल रहा है।  

- - - - -


संपर्क : shirish2410@gmail.com

23.9.09

थार का सरकारी अकाल

शिरीष खरे

थार में फिर अकाल के हालात बन पड़े हैं- इस समय की सबसे खतरनाक पंक्ति को सवाल की तरह कहा जाना चाहिए. दरअसल अकाल को बरसात से जोड़कर देखा जाता है और राजस्थान के अकालग्रस्त जिलों से लेकर जयपुर या दिल्ली तक नेताओं, अफसरों और जनता के बड़े तबके तक यही समझ बनी हुई है. कुछ तो जानबूझकर और कुछ मजबूरी में. लेकिन हकीकत यह भी है कि आस्ट्रेलिया या खाड़ी जैसे दुनिया के अनेक हिस्सों में तो और भी कम बरसात होती है मगर वहां अकाल का साया नहीं पड़ता. तो क्या भारत में अकाल की जड़े सरकारी अनदेखी से जुड़ी हैं ?

अंग्रेजी हुकूमत में अकाल से निपटने के लिए 'फेमिन कोड' (अकाल संहिता) बुकलेट बनी थी. हमारी सरकार आज तक उसी को लेकर बैठी है. आस्ट्रेलिया, अमेरिका, इंग्लैंड और सऊदी अरब जैसे देशों में अकालरोधी नीतियां हैं; भारत देश या राजस्थान प्रदेश में जहां 100 में से 90 साल सूखा पड़ता है, कोई नीति नहीं है.

बायतु, बाड़मेर के भंवरलाल चौधरी और उनके साथी कहते हैं- “पानी, अनाज और चारे का न होना ही अकाल है. अगर पीने के लिए पानी, लोगों को अनाज और पशुओं को चारा मिल जाए तो फिर पानी गिरे या न गिरे, काहे का अकाल.”

जाहिर है, अपनी सरकार लापरवाही छिपाने के लिए अकाल से बरसात को जोड़कर चलती है और जनता भी ‘लकीर की फकीर’ बनी हुई है.

जयपुर से 500 किलोमीटर दूर, पाकिस्तान की सरहद से 100 किलोमीटर पहले, पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तानी जिले बाड़मेर में बायतु ब्लाक के कई अनदेखे गांव इस हकीकत को बयां कर रहे हैं. बायतु, लाहौर जाने वाली थार एक्सप्रेस का छोटा-सा पड़ाव है. वैसे तो सूखे की ज्यादातर योजनाएं यही के लिए बनती हैं, जो जयपुर से जोधपुर आते-आते खप जाती हैं और यहां के लोगों के हिस्से में रह जाती हैं अगले साल के मानसून वाले बादलों की आस.

इस बार मानसून फिर दगा दे गया. बंगाल की खाड़ी में कम दबाव वाले क्षेत्र के कमजोर होने से राजस्थान के 27 जिले भंयकर सूखे से ग्रस्त घोषित किए गए हैं. केंद्रीय रुक्ष क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, काजरी के मुताबिक इस साल 2002 से भी खतरनाक अकाल के हालात हैं. बाड़मेर सहित 6 जिलों में औसत से 60 फीसदी कम बरसात हुई जिससे बाजरा, पानी, कितना सूखा, कितनी उपज, कितनी आमदनी, गरीबी, बेकारी, पलायन, कर्ज, योजनाएं गुहार और मोठ की फसलें फिर खड़ी-खड़ी सूख रही हैं. नतीजतन अभी से हिसाब लगाया जा रहा है- कितना, फायदे, दावे, कायदे..... और वायदे!

अकाल का घर


बाड़मेर जिले में 100 सालों के आकड़े देखें तो 80 साल सूखे के काले साए में बीते. बाकी 20 सालों में से 10 साल सुकाल और 10 साल 50-50 वाला हिसाब-किताब रहा.

फसलों का उत्पादन देखें तो 100 में से 30 साल 0 (शून्य) प्रतिशत और 20 साल 10-20 प्रतिशत (बेहद मामूली) उत्पादन रहा. बाकी बचे 50 में से 20 साल 20-30 प्रतिशत, 10 साल 30-40 प्रतिशत, 10 साल 50-60 प्रतिशत और 10 साल 70 प्रतिशत तक उत्पादन हुआ.

पानी की जरूरत को देखें तो कुल जरूरत का 10 प्रतिशत भी पूरा नहीं हो पाता, बाकी 90 प्रतिशत की पूर्ति के लिए निजी टांके से 40 प्रतिशत, सरकारी टैंकरों से 10 प्रतिशत और खारे पानी से 20 प्रतिशत तक की भरपाई होती है. फिर भी 30 प्रतिशत का भारी अंतर रहता है, जिसका कोई स्त्रोत नहीं.

निजी टांके से जो 40 प्रतिशत पानी की भरपाई होती है, वह भी बरसात के भरोसे है. अगर बूंदे न बरसीं तो निजी टांके की भरपाई का प्रतिशत 40 से लुढ़ककर 5 प्रतिशत तक आ जाता है. तब खारे पानी की भरपाई 20 से 40 प्रतिशत तक बढ़ाना एक मजबूरी है.

सूखे का फायदा

1947 के बाद, 62 सालों में एक बार सूखे का स्थायी हल खोजने की कोशिश हुई थी. राजीव गांधी के समय, पंजाब के हरिकेन बांध से जो इंदिरा-गांधी नहर गडरा (बाड़मेर) तक आनी थी, उसे भी केंद्रीय सत्ता में बैठी ताकतों ने अपने फायदे के लिए मोड़ लिया. नहर को गंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर से होकर करीब 800 किमी का रास्ता तय करना था, जैसे ही यह 300 किमी दूर बीकानेर पहुंची वैसे ही तत्कालीन कपड़ा मंत्री अशोक गहलोत (अबके मुख्यमंत्री) ने पाइपलाइन का रुख जोधपुर की कायलाना झील की तरफ करवा दिया. इससे पहला फायदा महाराजा गजोसिंह को हुआ और झील का पट्टा आज भी उन्हीं के नाम चढ़ा हुआ है. पानी पहुंचते ही पर्यटन का उनका धंधा लहलहा उठा, होटल तो था ही, हुजूर ने ‘वाटर रिसोर्स सेंटर’ के नाम पर महल भी बनवा लिया. अशोक गहलोत, जो खुद भी माली जाति और जोधपुर इलाके से हैं, उन पर ‘माली लॉबी’ के दबाव में काम करने का आरोप लगा क्योंकि पाइपलाइन मोड़ने का दूसरा फायदा माली जाति के कुओं को रिचार्ज करने में हुआ. लिहाजा असली प्रभावितों की आंखे बेवफा बादलों को घूरती रह गई.



1990 में सरकार ने पैसा बटोरने के लिए हरे-भरे खेतों से कलकल बहती नहर की तस्वीर दिखाई थी. अपनी जिंदगी में भी हरियाली लाने के लिए लोगों ने सरकार से नहर के आसपास की जमीनें खरीदी थीं. पनावड़ा, मनावड़ी, भियाड़ और भीमड़ा के गांव वाले अब बताते हैं कि जिनके पास पैसा नहीं था, उन्होंने घर की औरतों के गहने तक बेचे और बोली लगा-लगाकर जमीनें खरीदी थीं. उन्होंने पांच एकड़ की रूखी जमीन के टुकड़े को एक लाख से 5 लाख रु. तक में खरीदा, जंगली झाड़-पेड़ उखाड़े और फिर उन्हें पहले मैदानों में और खेतों में बदला. मगर यह विडंबना ही है कि उस समय भी उन जमीनों की कीमत कुछ नहीं थी, आज भी कुछ नहीं है. वहां रेतीली आंधियों से सिर्फ रेत की नहरें बनती और बिगड़ती रही.

अकाल का हाल

उन्हें पीने के पानी की हरेक बूंद का ख्याल रहता है. महंगा पानी खरीदने से मजूरी का बड़ा हिस्सा पानी में जाता है. कन्नौड़, कोल्हू, अकड़दरा, चिड़िया जैसे कई गांवों में खारे पानी के टयूवबेल दिखते हैं, जो केवल यहीं दिखते हैं और यदा-कदा, टयूवबेल में बाकायदा सरकार के बिजली कनेक्शन लगे हैं. रेतीली मिट्टी में साल्ट ज्यादा होने से पानी रिसते-रिसते अपनी मिठास खो देता है. इसके बावजूद रेतीली जमीन के 250-300 फीट नीचे से खारे पानी को बरसात के मीठे पानी में मिलाकर लोग अपना गला गीला करते हैं. इन्हीं दिनों असंख्य आवारा और घरेलू जानवर असमय मौत के शिकार बनते हैं.

पानी की कमी से गला ही नहीं पेट भी सूखता है. इसलिए मजूरी का दूसरा बड़ा हिस्सा अनाज संकट से उबरने में जाता है. कतरा, केसुमला और शहर के गांववाले बताते हैं कि उन्हें गेहूं, मक्का, ज्वार के बजाए मालाड़ी बाजरा खाने की आदत है. वास्तव में वे यूपी में जानवरों को खिलाने वाला बाजरा खाते हैं. सूखा की लपटों से परंपरागत बीजों की कई किस्में खत्म हो रही हैं. ऊन उत्पादन के लिए भेड़ पालने वाले गड़रिए भेड़ो को काट-काटकर भूख की आग मिटाते हैं.

रोजी-रोटी का दूसरा जरिया चारा है. नगाना और खेतिया का तला के लोगों से जाना कि भैंस के बजाए यहां के लोग गाय, ऊंट, भेड़, बकरी और गधा पालते हैं. बढ़ते तापमान के हिसाब से भैंस की काली चमड़ी ज्यादा पानी मांगती है. जिन चरवाहों के पास 500 से ज्यादा जानवर हैं, वे पंजाब, हरियाणा, यूपी और मध्य प्रदेश का रुख करते हैं.

यहां पलायन की स्थिति दूसरे इलाकों के मुकाबले एकदम जुदा है. पूरे परिवार के बजाए एकाध आदमी घर से बाहर जाता है. छीतर का पार और बायतु के ज्यादातर लोग मानते हैं, पलायन करने वालों की हालत फिर भी ठीक हैं, जो पलायन नहीं कर पाते वो बेहद गरीब हैं. यहां रह जाने वालों का सारा पैसा पानी, अनाज और चारा खरीदने में चला जाता है. एक तो इतनी बेकारी, ऊपर से काम का दूसरा विकल्प न होने से पलायन यहां बुरा नहीं माना जाता. कुल मिलाकर 90 फीसदी घरों से पलायन होता है, जिन 10 फीसदी घरों से पलायन नहीं होता उनमें से ज्यादातर के यहां कमाने वाले ही नहीं होते. यहां के हालात समझने के लिए इतना काफी है कि 1964 का अकाल देख चुकी रत्नीबाई अब 74 बरस की हो चली हैं- पोपले चेहरे में धंसी आंखें भुखमरी, कुपोषण और तपेदिक जैसे रोगों की प्रतीक बन चुकी हैं.

सरकार बताती है कारण


1. बहुत कम बरसात.
2. बरसात की अनियमित आवृत्तियां यानी बादल की पहली बूंदों के बाद दूसरी बूंदें 20-30 दिनों में नहीं गिरीं तो फसलों की बर्बादी, फिर 1000 मिलीमीटर बरसात भी हो तो कोई फायदा नहीं.
3. थार की रेतीली आंधियां.
4. तापमान, अगर मानसून के मुकाबले तापमान का पारा 45 से 50 डिग्री तक चढ़े तो फसल जल जाती है.
5. ओले, पाला और कई किस्म के रोगों से मिलजुलकर अकाल पनपता है.

राहत की राजनीति

राहत योजनाएं अप्रैल से जून यानी साल के तीन महीनों के लिए ही होती हैं. इस दरम्यान बगैर पाइपलाइन वाले इलाकों में टैंकरों से पानी पहुंचाने की कोशिश होती है. लेकिन फतेहपुर के खियाराम कहते हैं- “जहां-जहां पाइपलाइन हैं, उनमें से ज्यादातर इलाकों में पानी की व्यवस्थाएं ठप्प हैं.” यानी ऊपर से ही यह मानकर चला जाता है कि व्यवस्थाएं सुचारू ढ़ंग से चल रही हैं.

चूंकि ‘फेमिन कोड’ में गाय को ही पशु माना गया है इसलिए सरकार के पशु-शिविरों में गाय को ही चारा खिलाने का कायदा है. यूं तो अंग्रेजों के जमाने में तो ऊंट को भी चारा मिलता था, क्योंकि उस समय परिवहन के मुख्य साधन ऊंट ही थे. अबके अधिकारियों को लगता है कि ऊंट परिवहन के साधन नहीं रहे इसलिए ‘वोट बैलेंस’ की राजनीति के चलते सिर्फ गाय के मरने की चिंता व्यक्त कर ली जाती है. वह भी वहां-वहां, जहां-जहां राजनैतिक दबाव है यानी 10 में से इक्का-दुक्का जगह. अकड़दरा के हनुमान कई उदाहरण देते हुए कहते हैं, “इन शिविरों में जब गाय तक चारा नहीं पहुंचता तो वह मरती हैं.” मरी गायों के बारे में लिखा जाता है- बचाने के विशेष प्रयासों के दौरान मारी गई.

सरकार की सुनें तो नरेगा ( राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना) में 100 रु. ‘न्यूनतम मजदूरी’ है लेकिन मांग के मुताबिक भुगतान न होने से 100 रु. भी नहीं मिलते. ऐसे में 100 रु. को ‘अधिकतम मजदूरी’ कहना चाहिए. वैसे 100 रु. को भी घटाने की तैयारियां चल रही हैं. स्थानीय स्थितियों को देखते हुए यह सवाल बड़े काम का है, काम के बदले आखिर करवाया क्या? जैसे कि जिन गांवों में नाड़ियां (तालाब) नहीं हैं, हो भी नहीं सकते, क्योंकि वहां न पानी आता है, न रेतीली जमीनों में ठहरता है, वहां नालियां बनवाने से कोई फायदा नहीं. इसके बावजूद नालियां बनवाकर लाखों रु. राहत वाली फाइलों में चढ़ जाते हैं.

पनावड़ा के करणराम कहते हैं- “कुछ लोगों को तो रोजगार मिलता ही है, कुछ अधिकारियों को भी राहत मिल जाती है.”

आइए इसे एक किस्से से समझते हैं. जोधपुर के पास एक बड़ा पुराना तालाब था. क्योंकि अधिकारियों को नरेगा के तहत इसकी मरम्मत करवानी ही थी इसलिए उसे एक, दो, तीन साल तक खोदते रहे. जिस चिकनी मिट्टी से पानी ठहरता था, उसे ही उखाड़ते हुए आजू-बाजू में बड़े-बड़े टीले खड़े किए. जब बरसात का पानी उसमें आया तो 15 दिनों से ज्यादा नहीं ठहरा. अब अधिकारियों के सामने यह विपदा आन पड़ी कि टीले के वजूद में पड़ी मिट्टी को वापस तालाब में डलवाएं भी तो पैमेन्ट कहां से शो करेंगे, क्योंकि यह टॉस्क की कल्पना से परे था. यानी तालाब के तमाम काम निपटाने के नाम से तालाब का ही काम तमाम कर दिया गया.

इसी तरह विधानसभा क्षेत्र में कुल 25 हेडपंप लगने थे, क्योंकि दो सरपंच विधायक के खास थे इसलिए कोल्हू और अकड़दरा गांवों में 20 हेडपंप लग गए. यहां हेडपंप सफल नहीं माने जाते, लेकिन राहत के छोटे-छोटे बटवारों में भी दलगत, जातिगत, इलाकागत जैसे समीकरणों की भूमिका तो रहती ही है.

एक ओर राजस्व विभाग की गिरदावरी रिपोर्ट ने “बायतु ब्लाक के 47 गांवों में सूखा” बताया, दूसरी तरफ सरकार की ही बीमा कंपनी ने कहा- वह “6 खेतों के मूल्यांकन के बाद बताएगी कि यहां सूखा है या नहीं.”

चलते-चलते

मामला महज बाड़मेर का नहीं है, थार यानी देश के 61 फीसदी रेगिस्तान का जर्रा-जर्रा सूखे की कहानी खुद कहता है. यहां सरकारी उम्मीद की अकाल मौत तो बहुत पहले ही हो चुकी है, इसलिए भूखे, प्यासे और बीमार लोगों को बादलों से ही राहत का इंतजार है. अप्रैल की आखिरी तारीखों में मुख्यमंत्री जी ने बाड़मेर भ्रमण का कार्यक्रम बनाया था. तब पंचायत समिति सिणधरी के चबा गांव में अकाल राहत कार्य के 60 मजदूरों ने हाथ खड़े करके एक महीने से मजदूरी नहीं मिलने की व्यथा कहनी चाही थी. लेकिन दौरे के एक दिन पहले ही प्रशासन ने मुख्यमंत्री को भ्रमित करते हुए नेशनल हाइवे पर पानी के लबालब हौद भरे, चारे के टैंकर खड़े करवा दिए. सूखे को सरकारी आंखों से दिखा दिया गया.

घंटे भर में मुख्यमंत्री जी यहां से वहां हुए, हालात जहां के तहां रहे. हालात इन दिनों सूखे से अकाल में बदल रहे हैं, इसलिए सरकारी महकमों में मुख्यमंत्री जी के वहां से यहां होने की गर्मागर्म चर्चाएं हैं.

30.6.09

हरीबत्ती के इंतजार में



शिरीष खरे
- - - - - - - 

मुंबई के फुटपाथों पर न जाने कितनी बार लालबत्ती हरीबत्ती में बदलती है और हरीबत्ती लालबत्ती में. पर इनके नीचे खड़ी लाखों औरतों को आज भी अपनी जिंदगी में एक हरीबत्ती का इंतजार हैं


‘मुझ जैसी कईयों को अपना शरीर बार-बार बेचना पड़ता है.’ एक औरत की मुंह से पहली बार ऐसा सुन कोई भी झिझक सकता है. सपना ने बेझिझक आगे कहा, ‘पेट की खातिर करना पड़ता है. इज्जत के मारे घर बैठ सकती हूं लेकिन...’ उसके बाद वह चुपचाप एक गली में गई और ओझल हो गई.
देश के कोने-कोने से हजारों मजदूर सपनों के शहर मुंबई आते हैं. इनमें से अधिकतर असंगठित क्षेत्र से हैं. यह शहर के उठने का वक्त है. मुंबई सेंट्रल से बोरीबली आने वाली लोकल के ठहरने के बीच का यह वक्त हजारों लोगों के दौड़ने का भी वक्त है. ठीक इसी वक्त नाकों पर मजदूर औरतें भी खासी संख्या में दिखाई देती हैं. इनमें से कइयों को काम नहीं मिलता और इसलिए कइयों को ‘सपना’ बन जाना पड़ता है. तो क्या पलायन के रास्ते ये बेकारी से होते हुए सीधे देह-व्यापार को जा रही हैं?

मुंबई के उत्तरी तरफ, बोरावली में संजय गांधी नेशनल पार्क के पास दिहाड़ी मजदूरों की एक बस्ती है. यहां पीने के पानी के बाद अब रोजीरोटी के लिए दिन कि शुरुआत एक लंबी लाइन के साथ शुरु हो चुकी है. बुनियादी योजनाओं यहां से होकर नहीं गुजरतीं. इन्होंने अपने हाथों से कई आकाश चूमती इमारतें बनायी हैं. खास तौर से नवी मुंबई को बनाने में कम अवधि के ठेकों पर अंगूठे लगाए हैं. इन्होंने ही कई गिरती इमारतों को दुबारा खड़ा भी किया है. यहां आमतौर पर औरत को 120 और मर्द को 180 रूपये दिन के हिसाब से मजदूरी मिलती है. ठेकेदार और मजदूरों के आपसी रिश्तों से भी मजदूरी तय होती है. एक मजदूर का 3,500 रूपये महीने से कम में गुजारा नहीं होता. मतलब एक दिन के लिए सौ रूपये चाहिए ही चाहिए. इतनी आमदनी पाने के लिए परिवार की औरत भी मजदूरी को जाती है. उसे महीने में कम से कम पंद्रह दिन काम चाहिए. मगर उसे हर दिन काम मिले ही तो यह जरुरी नहीं. कुल मिलाकर, एक औरत के लिए 1,800 रुपए महीना कमाना भी मुश्किल हो जाता है.

यह मलाड नाके का दृश्य है. सड़क किनारे और मेडिकल स्टोर के ठीक सामने मजदूरों के दर्जनों समूह हैं. यहां औरत-मर्द एक-दूसरे के आजू-बाजू बैठे बतियाते हैं. यह काम पाने की सूचनाओं का अहम अड्डा है. यहां सुबह ग्यारह बजे तक भीड़ रहती है. और उसके बाद जिन्हें काम मिलता है वे काम पर जाते हैं और जिन्हें काम नहीं मिलता वे घर लौट आते हैं. पर सेवंती खाली नहीं लौट सकती. इसलिए उसकी सुबह देर रात में बदल जाती है. और उसे नाके से लगी गलियों में पहुंचकर देह के ग्राहक ढूंढने पड़ते हैं.

रविवार होने के बावजूद उसे तीन घंटे से कोई ग्राहक नहीं मिला. इस व्यापार में दलाल कुल कमाई का बड़ा हिस्सा निगल जाता है इसलिए सेवंती दलाल की मदद नहीं लेना चाहती. सेवंती जैसी दूसरी औरतों को भी ग्राहक के एक इशारे का इंतजार है. इनकी उम्र चौदह से पैंतीस है. यह अस्सी से 150 रुपये में सौदा पक्का कर सकती हैं. अगले 24 घंटों में चार ग्राहक भी मिल गये तो बहुत हैं. ये अपने ग्राहकों से दोहरे अर्थो वाली भाषा में बात करती हैं. ऐसा शायद पुलिस और रहवासियों से बचने के लिए कर रही हैं. ये अपने असली नाम भी नहीं बतातीं. जाहिर है इन्हें यहां सुरक्षा का एहसास नहीं है. शारारिक और मानसिक यातनाओं का डर सता रहा है. यहां से किसी को गर्भवती तो किसी को गंभीर बीमारी के शिकार बनने का डर भी सता रहा है.

देह कारोबार से जुड़ी तारा बताती है कि इस कारोबार में सौ में सत्तर 30 साल से कम की है. इसमें से भी पच्चीस बामुश्किल अठारह की हैं. इनदिनों कम उम्र की लड़कियों की संख्या बढ़ रही है. पैंतीस तक आते-आते औरत की आमदनी कम होने लगती है. एक औरत अपने को बीस साल से ज्यादा नहीं बेच पाती. आधे से अधिक औरतें पैसों की कमी के चलते इन गलियों में आती हैं. पीछे खड़ी कुसुम कहती है कि मुझे तो बच्चे और घर-बार भी संभालना होता है. यहां अधिकतर की अंतहीन कहानियां हैं. मसलन, माधुरी का पिता उसे मजदूरी के लिए भेजता है लेकिन वह मजदूरी के साथ अपने शरीर से भी पैसे कमा लाती है. गिरिजा अपने भाई की बेकारी के दिनों का बरकत है. सुब्बा ने पति के एक्सीडेंट के बाद गृहस्थी का बोझ संभाल लिया है. जोया ने छोटी बहिन की शादी के लिए थोड़ा-थोड़ा पैसा बचाना शुरू कर दिया है. पर अब उसकी बहन पढ़ाई के लिए मुंबई आना चाहती है. जोया अपनी सच्चाई छिपाना चाहती है. उसे अपनी इज्जत के तार-तार होने का आशंका है. नगमा पैंतालीस पार हो चुकी है और अब उसकी चौदह साल की बेटी बड़की कमाती है. बड़की बाल यौन-शोषण का जीता जागता रूप है.

और यहां कदम-कदम पर ‘बड़कियां’ खड़ी हैं. ये चोरी-छिपे इस कारोबार में लगी हैं लिहाजा कुल लड़कियों का असली आकड़ा कोई नहीं जानता. कोई बंगाल से है तो कोई नेपाल से तो कोई महाराष्ट्र से. पर इनके दुख-दुविधाओं में अधिक अंतर नहीं दिखता. इन्होंने अपनी चिंताओं को मेकअप की गहरी परतों से ढंक लिया है. मोनी ने बताया कि इस पेशे से हमारा शरीर जुड़ता है, मन नहीं. हम पैसों के लिए अलग-अलग मर्दों को अपना शरीर बेचते हैं लेकिन कई मर्द ऐसे भी हैं जो जिस्मफरोशी के लिए बार-बार ठिकाने बदलते हैं. अगर हमें गलत समझा जाता है तो उन्हें क्यों नही? मोनी का सवाल देह कारोबार के उन अनछुएं पहलुओं पर शिनाख्त करने की मांग करता है जिन्हें समाज की तरह सरकार ने भी अनदेखा किया हुआ है और जब तब ये उठते भी हैं तो इन्हें नैतिकता, अपराध या स्वास्थ्य के दायरों से बांध दिया जाता है. इस क्षेत्र से जुड़े एक वर्ग का मानना है कि यौनकर्मी बनने की बहुत सारी बातें पारिवारिक हिंसा, दुत्कार, अपराध, बलात्कार और खरीद-फरोख्त से भी जुड़ी होती हैं. मगर बाजार की फितरत के चलते यहां भी शोषण के लिए अधिकतर उन्हीं लड़कियों को चुन लिया जाता है जो पिछड़े और गरीब तबके से आती हैं. उनकी मजबूरियों के विरूद्ध उनके सारे सपने बहुत सस्ते और थोक में जो बिक जाते हैं. जाहिर है देह कारोबार का ताल्लुक गरीबी-बेकारी-पलायन जैसी कडि़यों से है. मगर इन कडि़यों के आपसी गठजोड़ की ओर ध्यान नहीं जाता.

भारत में देह कारोबार की रोकथाम के लिए ‘भारतीय दंडविधान, 1860’ से लेकर ‘वेश्यावृत्ति उन्मूलन विधेयक, 1956’ बनाये गये. फिलहाल कानून के फेरबदल पर भी विचार चल रहा है. मगर इस स्थिति की जड़ें तो समाज की भीतरी परतों में छिपी हैं. मुंबई से सांसद प्रिय दत्त के मुताबिक, 'इनकी जिंदगी में फेरबदल तो गरीबी, बेकारी या पलायन में से किसी एक समस्या को हल करने से होगा. इस व्यापार से जुड़ी औरतें दो वक्त की रोटी के लिए लड़ रही हैं. इसलिए ऐसी नीतियां हों जिनमें इन औरतों के जीवन-स्तर को उठाने की बजाय इन्हें जीने के सही मौके दिये जाने को वरीयता दी जाए.'
देखा जाए तो सरकार ने पलायन रोकने के लिए मनरेगा चलाई है जिसके तहत देश के दो सौ जिलों में साल में सौ दिनों के लिए 'हर हाथ को काम और पूरा दाम' का प्रावधान है. मगर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने खुलासा किया है कि यह योजना फ्लॉप साबित हुई है. वहीं 365 दिनों के काम की तलाश में मजदूरों का मुंबई जैसे महानगरों की तरफ पलायन जारी है. दूरदर्शन के कार्यक्रम के बीच ‘रुकावट के लिए खेद’ जैसा संदेश चर्चा का विषय रहा है. मुंबई जैसी महानगरी में कमाठीपुरा जैसी गलियों के भीतर बढ़ते देह के सौदागरों को देखते हुए क्या 'हर हाथ को काम और पूरा दाम' के आगे भी यही संदेश नहीं चिपका देना चाहिए?

पलायन की रफ्तार के बराबर मुंबई का देह कारोबार भी तेजी से फल-फूल रहा है. बात चाहे आजादी के पहले की हो या बाद की. यह किस्सा चाहे कलकत्ता का हो या मुंबई का. मुंबई में सड़क चाहे ग्रांट रोड की हो या मीरा रोड की. चौराहे पर मूर्ति चाहे अंबेडकर की लगी हो या गांधी की. यहां आपको रूकमणी (हिन्दू) भी मिलेगी और रूहाना (मुसलमान) भी. मगर जिन्हें अपने धर्म, क्षेत्र, जुबान या जाति पर नाज है, वे कहीं नहीं दिखते. यहां के लालबत्ती पर रुकी औरतों की जिंदगी बदलाव चाहती है. तस्करी के तारों से जुड़ने के पहले इन्हें एक हरीबत्ती का इंतजार है.
स्टोरी में देह-व्यापार के लिए मजबूर औरतों की पहचान छिपाने के लिए उनके नाम बदल दिये गए हैं.

27.5.09

पीछे छूट गए स्कूल

शिरीष खरे
उस्मानाबाद। हर साल हजारों मजदूर सीमावर्ती इलाकों में गन्ना काटने के लिए जाते हैं। नंवबर से जून के बीच बच्चे भी बड़ों के साथ पलायन करते हैं। यही समय स्कूल की पढ़ाई के लिए खास होता है। लेकिन इसी समय गांव के गांव खाली हो जाने से स्कूल भी खाली पड़ जाते हैं। ऐसे में चीनी पट्टी के नाम से मशहूर मराठवाड़ा के कई बच्चे आगे नहीं पढ़ पाते हैं।
चाईल्ड राईट्स एण्ड यू’ और ‘लोकहित सामाजिक विकास संस्था’ ने कलंब तहसील के 19 गांवों में सर्वे किया और पाया कि 6-14 साल के कुल 1,555 बच्चों में से 342 स्कूल नहीं जाते। इसमें 193 लड़कियां हैं। इसके अलावा ड्रापआउट बच्चों की संख्या 213 है। इसमें से भी 89 लड़कियां हैं। यहां एक साल में 19 बाल-विवाह के मामले भी उजागर हुए हैं। इन संस्थाओं ने 19 गांवों के बच्चों को पढ़ाई से जोड़ने की रुपरेखा तैयार की है। इससे एक छोटे से हिस्से में बदलाव की आशा बंधी है। लेकिन पलायन के इस संकट ने पूरे मराठवाड़ा को घेर रखा है।
‘लोकहित सामाजिक विकास संस्था’ के बजरंग टाटे ने बताया- ‘‘पलायन करने वाले मजदूरों में ज्यादातर दलित और बंजारा जनजाति से होते हैं। इनके पास रोजगार के स्थायी साधन नहीं होते। इसलिए जब यह लोग बाहर निकलते हैं तो पंचायत की कई योजनाओं से छूट जाते हैं। सबसे ज्यादा नुकसान तो स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का होता है। खेतों में जाने वाले इन बच्चों का खूब शोषण होता है।’’
महादेव बस्ती की शिक्षिका प्रतिभा दीक्षित ने बताया कि- ‘‘परीक्षा की तारीख नजदीक आते-आते तो ज्यादातर आदिवासियों के घरों में ताले लटकने लगते हैं। इससे पूरे इलाके में शिक्षा का स्तर बहुत नीचे चला जाता है। बच्चों की अनुपस्थिति के कारण शिक्षकों को कोर्स पूरा करने में मुश्किल होती है। जंगली क्षेत्र के कम-से-कम 75 स्कूलों में तो बच्चों का अकाल पड़ जाता है। परीक्षा के दिन तक 100 में से कम-से-कम 40 बच्चे गायब हो जाते हैं।’’ मजदूरों के साथ यह बच्चे 200 से 700 किलोमीटर दूर याने नगर, पुणे, कोल्हापर और कर्नाटक के बिदर, आलूमटी तथा बेड़गांव के इलाकों तक जाते हैं। यह परिवार गन्ने के खेतों में ही अस्थायी बस्ती बनाकर रहते हैं। काम के मुताबिक यह अपने ठिकाने बदलते रहते हैं।
धाराशिव चीनी मिल, चैरारूवली’ के लिए गन्ना काटने वाले मजदूरों की एक बस्ती को देखने का मौका मिला। पन्नी, कपड़ा और लकड़ियों की मदद से कुल 12 घर खड़े हैं। सभी घर एक-दूसरे से अलग-थलग हैं। 13 साल की नीरा शिंदे ने बताया- ‘‘घर में एक ही कमरा है। इस कमरे में पैर पसारने भर की जगह है। धूप के दिनों में पन्नी के गर्म होने से बहुत गर्मी लगती है। यह घर हमें ठण्ड और पानी से भी नहीं बचा पाते। बरसात में तो पूरा खेत कीचड़ से भर जाता है।’’ 12 साल के रामदास गायकबाड़ ने बताया- ‘‘इस उबड़-खाबड खेत में न कोई गली है, न खेलने का मैदान। पीने का पानी भी हम 2 किलोमीटर दूर से लाते हैं। सभी खुले में नहाते हैं। रात को लाइट नहीं रहने से घुप्प अंधेरा छा जाता है। हम सुबह का इंतजार करते हैं।’’ चीनी मिलों से ट्रालियों का आना-जाना देर रात तक चलता रहता है। इस दौरान कई बच्चे गन्नों को बांधने और उन्हें ट्रालियों में भरने के कामों में शामिल हो जाते हैं।
14 साल की अंगुरी मेहतो ने कहा- ‘‘मुझे अपने 3 छोटे भाईयों को संभालने में बहुत मुश्किल होती है। कंधों पर रखे-रखे शरीर दुखने लगता है। सुबह से शाम तक घर के काम भी करती हूं।’’ यहां 6 से 14 साल के बच्चे-बच्चियां घरों में खाना बनाने और सफाई का काम करते हैं। ऐसी ही दूसरी बच्ची इशाका गोरे ने बताया कि- ‘‘मैं अभी तीसरी में । दूसरी में पहले नम्बर पर आई थी। यहां से जाने के बाद परीक्षा देना है। फिर चौथी बैठूंगी।’’ उसे नहीं मालूम कि अब स्कूल की परीक्षाएं खत्म हो चुकी हैं। उसका परिवार सागली जिले के कराठ गांव से आया है। इशाका के पिता याविक गोरे का मानना है कि- ‘‘यह पढ़े तो ठीक, नहीं तो 4-5 साल में शादी करनी ही है। फिर अपने पति के साथ जोड़ा बनाकर काम करेगी।’’ यहां ज्यादातर लोग अपने बच्चों की शादियां कम उम्र में ही कर देते हैं। इन्हें लगता है कि परिवार में जितने अधिक जोड़े रहेंगे, आमदनी उतनी ही अधिक होगी। ज्यादातर रिश्तेदारियां भी काम की जगहों पर हो जाती हैं। इस तरह बाल-विवाह की प्रथा यहां नए रुप में सामने आती है। इस तरह बाल-विवाह की प्रथा यहां नए रुप में सामने आती है।
दूसरी बस्तियों में भी बच्चों से जुड़ी कई दिक्कते एक समान पायी गई, जैसे- 1) बढ़ते बच्चों को पर्याप्त और समय पर भोजन नहीं मिलता। इससे कुपोषण के मामलों में बढ़ोतरी होती है। 2) खेतों में बच्चे सबसे ज्यादा सर्दी के मौसम में बीमार होते हैं। 3) गन्ना काटते वक्त कोयना जैसे धारदार हथियार लगने, सांप काटने और बावड़ियों में गिरने की घटनाएं होती रहती हैं। 4) ऐसे खेतों से ‘प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र’ करीब 15-20 किलोमीटर दूर होते हैं। इसलिए इमरजेंसी के दौरान अनहोनी की आशंकाएं बढ़ जाती हैं।
‘शंभु महाराज चीनी मिल, हवरगांव’ के लिए गन्ना काटने वाली शोभायनी कस्बे ने बताया- ‘‘हमारे बच्चे हमारे साथ होकर भी दूर हैं। यह कभी चिड़चिड़ाते हैं, कभी चुपचाप हो जाते हैं। ऐसे माहौल में बच्चों का दिमाग बिगड़ जाता है। यह खेलने-पढ़ने के दिनों में भी बहुत काम करते हैं। इन्हें पढ़ाई का कोई तनाव नहीं है। यह तो भूख की मजबूरी से स्कूल नहीं जा पाते।’’
केन्द्र सरकार 2010 तक देश के सभी बच्चों को स्कूल ले जाना चाहती है। लेकिन 11वीं योजना में साफ तौर से कहा गया है कि 7 प्रतिशत बच्चों को स्कूल से जोड़ना मुश्किल हैं। यह बच्चे सामाजिक और आर्थिक कारणों से सरकार की पहुंच से दूर हैं। यूनेस्को ने भी ‘एजुकेशन फार आल मानिटिरिंग, 2007 की रिपोर्ट में कहा है कि भारत, पाकिस्तान और नाईजीरिया में दुनिया के 27 प्रतिशत बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। दुनिया के 101 देशों की तरह भारत भी पूर्ण साक्षरता की दौड़ से बाहर है। यूनेस्को के मुताबिक भारत के 70 लाख बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं। दुनिया के 17 देशों की तरह भारत में प्राइमरी स्कूलों से लड़कियों का पलायन ज्यादा हो रहा है। आखिरी जनगणना के हिसाब से 49.46 करोड़ महिलाओं में से 22.96 करोड़ महिलाएं निरक्षर हैं। ‘चाईल्ड राईटस् एण्ड यू’ मानता है कि भारत में 5 से 9 साल की 53 प्रतिशत लड़कियां पढ़ नहीं पाती।
भारत-सरकार ने 600 में से 597 जिलों को पूर्ण साक्षरता अभियान का हिस्सा बनाया है। उसके पास कई योजनाएं भी हैं जैसे- घरों के पास स्कूल खोलना, स्कालरशिप देना, मिड-डे-मिल चलाना और ब्रिज कोर्स तैयार करना। बीते 3 सालों में प्राइमरी स्तर पर 2,000 से भी अधिक आवासीय स्कूल खोले गए। लड़कियों के लिए 31,000 आदर्श स्कूल भी बने। लेकिन मराठवाड़ा जैसे इलाकों से पलायन करने वाले बच्चे शिक्षा की मुख्यधारा से नहीं जुड़ सके।
पलायन, समाज की भीतरी परतों से जुड़ा है। विकास की असंतुलित रतार के कारण यह समस्या विकराल हो चुकी है। इसे रोजगार के स्थायी साधन और भूमि सुधार की नीतियों की मदद से रोकना होगा। जब तक इंसान की मूलभूत जरूरत पूरी नहीं होगी तब तक बच्चों के भविष्य पर संकट के बादल मडराते रहेंगे।

16.12.08

चीनी की मिठास में घुलता बचपन

शिरीष खरे

मराठवाड़ा से मुंबई लौटते वक्त, छुकछुक करती ट्रेन के साथ बचपन की कविता भी चल रही है- ``शिकारी आता है/ जाल फैलाता है/ दाने का लोभ दिखाता है/ लेकिन हमें जाल में नहीं फसना चाहिए.´´ लेकिन मराठवाड़ा में शोषण का जाल केवल फैला ही नहीं है, काफी कसा हुआ है इसलिए चिड़िया नहीं जानती कि वो जाल के अंदर है या बाहर. सभी शिकारियों ने हाथ मिला लिया है इसलिए उनका शिकार खुद-व-खुद खेतों तक आ जाता है. सरकारी आकड़ों के हिसाब से यहां गन्ना अधिक होता है. लेकिन ऐसा है नहीं, उससे कहीं अधिक यहां के खेतों में शोषण होता है लेकिन इसकी पैदावार का आकड़ा किसी के पास नहीं मिलता.


सुबह-सुबह एक ट्रेक्टर से जुड़ी दो ट्रालियों में दर्जनभर मजदूर परिवार बैठे हैं. इन्होंने अपने साथ अनाज, कपड़े, बिस्तर और कुछ जरूरी सामान बांध लिया है. बहुत छोटे बच्चे अपनी मांओं के गोद में सोए हैं, उनसे थोड़े बड़े अपनी बहनों के कंधो पर. एक कोने में बकरियों के गले की रस्सियां ढ़ीली करता बुजुर्ग भी है. ट्रालियों से बाहर पैर लटकाए सारे मर्दों के चेहरों पर एक जैसा रुखापन छाया है. उनके पीछे बैठी औरतों ने भी चुप्पी साध रखी है. मैंने पूछा - ``कहां जाना होगा ?´´ उनमें से एक औरत ने तीन टुकड़ों में कहा- ``बहुत दूर... कर्नाटक.... बीदर कारखाने में´´ फिर अगला सवाल-``लौटना कब होगा ?´´ जबाव आया- ``लौटना, बारिश के दिनों तक ही होगा.´´


यह महाराष्ट्र का मराठवाड़ा इलाका है. यहां के गावं को शहरों से जोड़ने वाली सड़कों पर ऐसी कई गाड़िया दौड़ रही हैं. जिला मुख्यालय उस्मानाबाद से करीब 100 किलोमीटर दूर कलंब तहसील की कई बस्तियां भी खाली हो चुकी हैं. मस्सा गांव के एम.ए. पास एक दलित युवक विनायक तौर ने बताया कि- `यहां दीवाली से बारिश तक हजारों मजदूर जोड़े (पति-पत्नी) चीनी कारखानों के लिए गन्ना काटने जाते हैं. इसमें अधिकतर दलित, बंजारा और पारदी जनजाति से होते हैं. इनके पास न तो खेती लायक जमीन है और न ही अपना कोई धंधा. गांव से बाहर रहने से इन्हें पंचायती योजनाओं का फायदा नहीं मिलता. इनकी बस्तियां भी बदलाव से अछूती रह जाती हैं. सबसे ज्यादा हर्जाना तो स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को भुगतना पड़ता है. ये बच्चे गन्नों के जिन खेतों में काम करते हैं, आप वहां जाकर देखिए शोषण की कितनी कहांनिया बिखरी है.´´

'चाईल्ड राईट्स एण्ड यू´ ने स्थानीय संस्था `लोकहित´ के साथ मिलकर कलंब तहसील के 29 गांवों का एक सर्वे किया और पाया कि 6-14 साल के कुल 1555 बच्चों में से 342 स्कूल नहीं जाते जिसमें 193 लड़कियां हैं. इसके अलावा ड्रापआउट बच्चों की संख्या 213 है जिसमें से भी 89 लड़कियां हैं. एक साल में 19 बाल-विवाह के मामले भी सामने आए. यहां 332 परिवार ऐसे हैं जिनके पास खेती के लिए जमीन नहीं. इसी प्रकार 125 परिवारों को राशन कार्ड नहीं मिला. इन दोनों संस्थाओं ने 29 गांवों के बच्चों को पढ़ाई से जोड़ने के लिए मुहिम चलाने का फैसला लिया है. इससे एक छोटे से हिस्से में बदलाव की उम्मीद बंधी है लेकिन पलायन की समस्या ने यहां विकराल रूप धारण कर लिया है. पूरा मराठवाड़ा ही इसकी कैद में नजर आता है.

मराठवाड़ा का यह इलाका चीनी उत्पादन का केन्द्र है. 1982 को सबसे पहले उस्मानाबाद के ढ़ोकी में `तेरणा चीनी कारखाना´ लगा था. सरकारी आकड़ों के मुताबिक आज यहां करीब 30 कारखाने चालू हैं जिसमें 7 उस्मानाबाद जिले में ही है और उनमें से भी 4 कलंब तहसील में. `तेरणा चीनी कारखाना कमेटी´ के एक सदस्य ने नाम छिपाने की शर्त पर कहा- `यहां हर कारखाना 25-50 किलोमीटर तक के खेतों से गन्ना उठाना चाहती है. इसके लिए वह मुकादम को जरिया बनाती है. हर मुकादम 5 से 10 लाख रूपए लेकर कमेटी से करार करता है. वह 12-20 जोड़ों को 6-10 महीनों तक काम करवाने की गारंटी देता है. मुकादम आसपास के कई जोड़ों से संपर्क रखता है. एक कारखाने से करीब 200-250 मुकादम और उनसे 2500-3000 जोड़े जुड़ते हैं.´´

इसके आगे की बात सामाजिक कार्यकर्ता बजरंग टाटे ने कही- ``मुकादम इस इलाके में ऊंची जाति के ताकतवर लोग बनते हैं. वह जोड़ों को 25-30 हजार रूपए देकर 6-10 महीनों तक काम पर जाने के लिए राजी करता है. वह जोड़ों से स्टाम्प पेपर पर दस्तखत या अंगूठा लगावाता है. कई मुकादमों के करार बहुत दूर के कारखानों से होते हैं इसलिए यहां के जोड़े नगर (200 किमी), पुणे (300 किमी), कोल्हापर (500 किमी) और कर्नाटक (700 किमी) के बिदर, आलूमटी तथा बेड़गांव इलाकों तक जाते हैं. इन्हीं करारों के तहत वहां से जोड़े यहां आते हैं.´´ कलंब के बालाजी मुले ने बताया कि- `जब मुकादम को काम की तारीखों की सूचना मिलती है तब जोड़े जमा करने और उन्हें दूसरे इलाकों में ले जाने के लिए बहुत कम समय मिलता है. ऐसे हालात में कोई मुकादम रियायत नहीं बरतना चाहता.' डोराला गांव में माया शिंदे ने इसी साल हुई एक घटना सुनाई- ``भारत सोनटके ने जब 20 हजार रूपए लेकर 6 महीने का करार किया तब नहीं जानता था कि उसे टीबी जैसी बीमारी हो जाएगी. वह पुणे में अपना इलाज करवा रहा है, यह खबर पाते ही मुकादम आया और भारत की पत्नी के साथ 50 साल से अधिक उम्र के मां-बाप को काम पर ले गया. उनके साथ 6 साल से कम उम्र की दो बिच्चयां भी कोल्हापुर के किसी खेत में होगी.´´

नवंबर में हमने देखा कि कारखानों के आसपास कई जोड़े जमा होने लगे हैं. यहां 15-20 दिन रूकने के लिए सभी की बस्तियां बन चुकी हैं. इसके बाद छोटे-छोटे समूहों में बांटकर इन्हें काम की जगहों पर भेजा जाएगा. फिर काम के लिहाज से ही इनकी बस्तियां बदलती रहती हैं. `धाराशिव चीनी कारखाना, चौरारूवली´ से करीब 25 किलोमीटर दूर, खेड़की गांव के खेत में एक ऐसी ही बस्ती में जाना हुआ. यह 12 घरों की एक अस्थायी बस्ती है जिसका हर घर पन्नी, कपड़ा और कुछ लकड़ियों की मदद से खड़ा भर है. क्योंकि सभी घर एक-दूसरे से दूर-दूर हैं इसलिए पूरी बस्ती अव्यवस्थित नजर आती है. घर में सबके लिए एक ही कमरा है. इस कमरे में पैर पसारने भर की जगह है. उबड़-खाबड खेत में न कोई गली है और न ही मैदान. बच्चे पानी के लिए काफी दूर जाते हैं और औरतों को भी खुले में ही नहाना होता है. सबकी रातें अंधेरे में ही कटती हैं. सुबह खेतों में जाते वक्त मजदूरों के हाथों में कोयना होता है. कोयना लोहे का बना वह धारदार हथियार है जिससे गन्ना काटा जाता है. हर मजदूर गन्ने की तरफ झुककर पहले उसकी जड़ों को काटता हैं, फिर उसे दो भागों में बांटकर पीछे फेंकता हैं. उसका जोड़ीदार गन्ने के इन टुकड़ों को बांधता हैं. इस तरह हर जोड़ा 2 टन गन्ना काटकर, फिर उन्हें बांधकर ट्रालियों में भरता है. कारखानों से ट्रालियों का आना-जाना देर रात तक चलता है. कई बार इन कामों में बच्चे भी शामिल हो जाते हैं. 6 से 14 साल के बच्चे-बिच्चयां घरों में खाना बनाने और सफाई का काम करते हैं. ऐसी ही एक बच्ची इशाका गोरे ने कहा कि वह तीसरी में है और यहां से जाने के बाद चौथी में बैठेगी. उसे नहीं मालूम कि जब वह स्कूल पहुंचेगी तो परीक्षा खत्म हो जाएगी. उसका परिवार सागली जिले के कराठ गांव से आया है. इशाका के पिता याविक गोरे का मानना है कि-`यह पढ़े तो ठीक, नहीं तो 4-5 साल में शादी करनी ही है. फिर जोड़ा बनाकर काम करेगी.´ यहां अधिकतर लोग अपने बच्चों की शादियां कम उम्र में ही कर देते हैं. इन्हें लगता है कि परिवार में जितने अधिक जोड़े रहेंगे, आमदनी उतनी ही अधिक होगी. अधिकतर रिश्तेदारियां काम की जगहों पर हो जाती हैं. इस तरह बाल-विवाह की प्रथा यहां नए रुप में उजागर होती है.

हमने जिन बस्तियों का अध्ययन किया उन बस्तियों में बच्चों से जुड़ी कई दिक्कते एक समान पायी गई, जैसे- बढ़ते बच्चों को पर्याप्त और समय पर भोजन नहीं मिलता जिससे कुपोषण के मामलों में बढ़ोतरी होती है. इन खेतों में बच्चे सर्दी के मौसम में बीमार होते हैं. इसी तरह गन्ना काटते वक्त कोयना लगने, सांप काटने और बावड़ियों में गिरने की घटनाएं होती रहती हैं. ऐसे खेतों से `प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र´ करीब 15-20 किलोमीटर दूर होते हैं इसलिए इमरजेंसी के दौरान अनहोनी का डर रहता है. बीड जिले के राक्षसबाड़ी निवासी सुभाष मोहते ने बताया कि- ``दो साल पहले `येनसाई चीनी कारखाना, राजनी´ के लिए काम करते वक्त जब मेरी बीबी बीमार हुई तो कुछ औरतों ने खेत में ही पर्दा लगाकर गर्भापात कराने की कोशिश की. अचानक उसकी हालत बिगड़ गई और वह मर गई.´´

`शंभु महाराज चीनी कारखाना, हवरगांव´ के लिए गन्ना काटने वाली शोभायनी कस्बे की चिंता अपने बच्चों को लेकर हैं-`हमारे बच्चे पास होकर भी दूर हैं. खेलने-पढ़ने के दिनों में कितना काम करते हैं. यह कभी चिड़चिड़ाते हैं तो कभी चुपचाप हो जाते हैं. गांव के बच्चों से बहुत अलग हैं यहां के बच्चे.´हमारे एक दोस्त ने पूछा-`तो इन्हें घर क्यों नहीं घुमा लाती ?´इसका जबाव मुद्रिका गोरे ने दिया-`जब चुनाव आते हैं तो उम्मीदवार वोट डलवाने के लिए घर ले जाते हैं, उसके बाद वापिस यहीं छोड़ देते हैं. फिर हमारा हाल पूछने कोई नहीं आता और न ही किसी को घर जाने दिया जाता है.´´ अधिकतर जोड़ों ने बताया कि मुकादम उनसे दिये गए रूपए के बदले बहुत काम लेता है. अनबन होने पर मारपीट तक करता है. बाभल गांव के शिवाजी बाग्मारे ने अपने यहां की ऐसी ही घटना का जिक्र किया-`बीते साल यहां गन्ना की पैदावार अधिक हुई थी इसलिए कई मुकादमों ने मियाद खत्म होने के बावजूद काम करवाया. हमारे यहां परवानी जिले के गंगाखेड़े गांव से आए 10 जोड़ों ने इसका विरोध किया और एक रात बिना बताए मिनी टेम्पो से भागना चाहा लेकिन 3 किलोमीटर दूर पहुंचते ही पकड़ा गए. इसके बाद उनके बच्चे और औरतों तक को खूब मारा. मुकादम के आदमियों ने मिनी टेम्पो भी तोड़-फोड़ दिया.´´

सरकार ने गांव में ही `हर हाथ को काम और काम का पूरा दाम´ देने के लिए `महाराष्ट्र ग्रामीण रोजगार गांरटी योजना´ चलाई है. इस योजना का सच जानने के लिए जब विकासखंड कलंब के कार्यालय गए तो कई हेरतअंगेज तथ्य उजागर हुए. `पंचायत विभाग´ के `विस्तार अधिकारी´ बसंत बाग्मारे ने बताया-`योजना को लागू हुए 1 साल बीत गया. इस ब्लॉक के 89 गांवों में से 7 में ही काम चालू है. कुल 35 कामों में से 1 ही पूरा हुआ है, बाकी 34 प्रगति पर हैं. इस ब्लॉक में 50,000 से भी अधिक मजदूर है लेकिन 2500 को ही काम मिल सका. इनमें से भी कईयों का भुगतान नहीं हुआ. इसके लिए जिले से करीब 5 लाख रूपए आने का इंतजार है.´´ जब इस निष्क्रियता के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा-`इस योजना में कागजी औपचारिकता अधिक है.´लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता बजरंग टाटे ने इसका दूसरा कारण बताया- `स्थानीय पंचायतों में ऊंची जातियों का राज है. यह खेती का मौसम है और सवर्णों को अपनी जमीन पर काम करने के लिए मजदूर चाहिए. यदि मजदूरों को ऐसी योजना का पता लग गया तो उनका काम बंद हो जाएगा. इसलिए ऐसी योजनाओं को छिपाया जाता है. सबकी मिलीभगत से यहां शोषण का जाल फैला है.´