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4.10.10

पंचायती व्यवस्था का बलात्कार

शिरीष खरे राजस्थान से लौटकर

बाड़मेर और अजमेर. राजौ और गीता. एक ही दुनिया के दो अलग-अलग किस्सों के दो किरदार हैं. इधर है अपनी अस्मत गंवा चुकी राजौ, जो गांव के विरोध पर भी अपनी अर्जी अदालत तक दे तो आती है, मगर लौटकर गांव से छूट जाती है. उधर है कमजोर दलित महिला होने का दर्द झेलनी वाली गीता, जो डर के मारे अपनी गुहार अदालत से वापिस ले आती है, और गांव से दोबारा जुड़ जाती है. दोनों ही मानते हैं कि थाने के रास्ते अदालत आना-जाना और इंसाफ की लड़ाई लड़ना तो फिर भी आसान है, मगर समाज के बगैर रह पाना बड़ा मुश्किल है.

एक को अदालत की लड़ाई मंजूर है, दूसरे को गांव में रहना. दोनों का हाल आपके सामने है. मगर कौन ज्यादा अंधेरे में है, और कौन कम उजाले में. चलिए आप ही तय कीजिए- गांव....थाने....अदालत....पंचायत....समाज के बीच मौजूद इनके फासलों, अंधेरे, उजाले से होकर.

राजौ के यहां जाने से पहले, उस रोज का अखबार भरतपुर जिले के गढ़ीपट्टी में ‘बंदूक की नोंक पर पांच लोगों के दलित औरत से बलात्कार’ की खबर दे रहा था. राजौ का गांव सावऊ, बाड़मेर जिले के गोड़ा थाने से 12 किलोमीटर दूर है. वहां तक पहुंचने में 30 मिनिट भी नहीं लगे, मगर राजौ के भीतर की झिझक ने उसे 45 मिनिट तक बाहर आने से रोके रखा.

राजौ के साथ जो हुआ वो घटना के चार रोज बाद यानी 9 जून, 2003 की एफआईआर में दर्ज था : "श्रीमान थाणेदार जी, एक अरज है कि मैं कुमारी राजौ पिता देदाराम, उम्र 15 साल, जब गोड़ा आने वाली बस से सहरफाटा पर उतरकर घर जा रही थी, तब रास्ते में टीकूराम पिता हीराराम जाट ने पटककर नीचे गिराया, दांतों से काटा, फिर.......और उसने जबरन खोटा काम किया. इसके बाद वह वहां से भाग निकला. मैंने यह बात सबसे पहले अपनी मां को बतलाई. मेरे पिता 120 किलोमीटर दूर मजूरी पर गए थे, पता चलते ही सबेरे लौट आएं. जब गांव वालों से न्याय नहीं मिला तो आज अपने भाई जोगेन्दर के साथ रिपोर्ट लिखवाने आई हूं. साबजी से अरज है कि जल्द से जल्द सख्त से सख्त कार्यवाही करें."

मुंह मोड़ने वाला समाज
राजौ अब 20 साल की हो चुकी है. उसकी मां से मालूम चला कि बचपन में उसकी सगाई अपने ही गांव में पाबूराम के लड़के हुकुमराम से हो चुकी है. मगर वह परिवार अब न तो राजौ को ले जाता है, न ही दूसरी शादी की बात करता है. गांव वालों से किसी मदद की तो पहले ही कोई गुंजाइश नहीं है, मगर 2 किलोमीटर दूर पुनियो के तला गांव में जो ताऊ है, 60 किलोमीटर दूर बनियाना में जो चाचा है, 80 किलोमीटर दूर सोनवा में जो ननिहाल है, वहां से भी कोई खैर-खबर नहीं आती है. उसका झोपड़ा भी गांव से 2 किलोमीटर दूर उसके खेत में आ पहुंचा है, और गृहस्थी का हाल पहले से ज्यादा खराब है. पंचों में चाहे खेताराम जाट हो या रुपाराम, खियाराम हो या अमराराम, सारे यही कहते हैं कि चिड़िया जब पूरा खेत चुग जाए तो उसके बाद पछताने से क्या फायदा है ?

राजौ के पिता देदाराम यह खोटी खबर लेकर सबसे पहले गांव के पंच खियाराम जाट के पास पहुंचे थे. पंच खियाराम जी ने पहले तो इसे अंधेर और जमाने को घोर कलयुगी बतलाया, फिर देदाराम से पूछे बगैर दोषी टीकूराम के पिता के यहां यह संदेशा भी भिजवा दिया कि 20,000 रूपए देकर मामला निपटा लेने में ही भलाई है. मगर टीकूराम के पिता हीराराम जाट ने साफ कह दिया कि वह न तो एक फूटी कोड़ी देने वाला है, न निपटारे के लिए कहीं आने-जाने वाला है. फिर मजिस्ट्रेट की दूसरी पेशी पर बाड़मेर कोर्ट के सामने दोषी समेत गांव के सारे पंच-प्रधान जमा हुए. सबने मिलके राजौ को समझाया कि केस वापिस ले लो, कोर्ट-कचहरी का खर्चापानी भी दे देंगे. पर टीकूराम को साथ देखकर राजौ बिफर पड़ी. उसने राजीनामा के तौर पर लाये गए 50, 000 रूपए जमीन पर फेंक दिए और ऐसी खरी-खोटी सुनाई कि वहां एक न ठहरा.

लड़ाई जारी है
इसके बाद जिस चाचा ने राजौ का नाता जोड़ा था, उसी के जरिए पंचों ने बातें भेजीं कि- राजीनामा कर लो तो हम साथ रहकर गौना भी करवा दें. छोटे भाई की भी शादी करवा दें. नहीं तो सब धरा रह जाएगा. कोर्ट कचहरी के चक्कर में पड़ने से अच्छा है आपस में निपट लेना. वो तो लड़का है, उसका क्या है, जितना तुम्हें पैसा देगा, उतना कचहरी में लुटाकर छूट जाएगा, तुम लड़की हो, उम्र भी क्या है, बाद में कोई साथ नहीं देता बेटी. फिर बदनामी बढ़ाने में अपना और अपनी जात का ही नुकसान होता है.

जब राजौ पर ऐसी बातों का भी असर नहीं हुआ तो कभी राजौ की जान की फिक्र की गई, तो कभी उसके छोटे भाई जोगेन्दर की जान की.

राजौ आज तक केस लड़ रही है. यह अलग बात है कि टीकूराम को जमानत पर रिहाई चुकी है, और उसके बाद उसकी शादी भी हो चुकी है. राजौ को अदालत में लड़ने का फैसला कभी गलत नहीं लगा है, उसे अदालत से फैसले का अब भी इंतजार है. राजौ को गांव में आने-जाने के लिए सीधे तो कोई भी नहीं रोकता, मगर पीठ पीछे तरह-तरह की बातों को वह महसूस करती हैं.


वैसे पंचों को छोड़कर गांव के बाकी लोगों के साथ उसके रिश्ते धीरे-धीरे सुधर रहे हैं. राजौ के यहां से उठते वक्त उससे जब कहा गया कि रिपोर्ट में उसका नाम और फोटो छिपा ली जाएगी तो उसने बेझिझक कहा "मेरा असली नाम और फोटो ही देना. जिनके सामने लाज शरम से रहना था, उनके सामने ही जब ईज्जत उतर गई तो. तो दुनिया में जिन्हें हम जानते तक नहीं, उनसे बदनामी का कैसा डर ?"

इस रात की सुबह कब ?
थानाधिकारी सतीश यादव टेबल पर रखे ‘सत्यमेव जयते’ की प्लेट और पीछे की दीवार पर लटकी गांधीजी की फोटो के बीचोंबीच मानो 180 डिग्री का कोण बनाते हुए बैठे हैं. उन्होंने दूसरी तरफ निगाह टिकाते हुए कहा- "आपकी तारीफ". मगर बगैर जबाव सुने ही चल दिए.

मेरा सवाल यह नहीं कि केस कितना छोटा या बड़ा है, या आप बड़ा किसे मानते हैं, सवाल है कि जब कभी गांवों में दलित और खासकर दलित महिला पर अत्याचार होता है तो न्याय के हर पड़ाव तक कैसी मानसिकता अपनाई जाती है ? आगे की किस्सा इसी मानसिकता को केन्द्र में रखकर लिखा जा रहा है.

रसूलपुरा गांव से दलित-महिला अत्याचारों के एक हफ्ते में ही तीन-तीन केस आने पर थानाधिकारी महोदय क्रोधित है. ‘महिला जन अधिकर समिति’ का आरोप है कि वह दलित-महिलाओं को कानून में दिये गए विशेष अधिकारों पर अमल करना तो दूर शिकायत दर्ज करवाने वाले को ही हवालात की हवा खिलाने लगे हैं.

रसूलपुरा के सुआलाल भाम्बी, उसकी पत्नी गीतादेवी और पुत्री रेणु ने जब बीरम गूजर के खिलाफ जर्बदस्ती गाय हथियाने और मारपीट का मामला अलवर थाने में दर्ज करवाना चाहा तो सुआलाल भाम्बी को ही यह कहते हुए बंद कर लिया गया कि जांच के बाद पता करेंगे कि कसूरवार है कौन ?

रसूलपुरा, अजमेर से जयपुर जाने वाली सड़क पर बामुश्किल 10 किलोमीटर दूर है. यहां करीब 800 मतों में से 600 मुस्लिम, 150 गूजर और 50 दलितों के हैं. 15 साल पहले दलितों की संख्या ठीक-ठाक थी. तब से अब तक करीब 20 दलित परिवारों को अपनी जमीन-जायदाद कौड़ियों के दाम बेचकर अजमेर आना पड़ा है. बचे दलितों को भी गांव से आधा किलोमीटर दूर अपने खेतों में आकर रहना पड़ रहा है.

दलित हो तो नीचे रहो
यहां आज भी चबूतरे पर दलितों का बैठना मना है. वह साइकिल पर सवार होकर निकल तो सकते हैं, मगर जब-तब रोकने-टोकने का डर भी है. पहले तो दलित दूल्हा घोड़े पर चढ़ नहीं सकता था, पर 10 साल पहले हरकिशन मास्टर ने घोड़े पर चढ़कर पुराना रिवाज तोड़ा डाला था. 15 साल पहले छग्गीबाई भील सामान्य सीट से जीतकर सरपंच भी बनी थी. तब गांव की ईज्जत का वास्ता देकर सारे पंचों को एक किया गया और अविश्वास प्रस्ताव के जरिए छग्गीबाई को 6 महीने में ही हटा दिया गया. छग्गीबाई का सामान्य सीट से जीतना करिश्मा जैसा ही था.

छग्गीबाई कहती हैं "तब सामान्य जाति के इतने उम्मीदवार खड़े हो गए कि दलितों के कम मत ही भारी पड़ गए. नतीजा सुनकर उंची जात वालों ने रसूलपुरा स्कूल घेर लिया, ऐसे में पीछे की कमजोर दीवार से लगी खिड़की तोड़कर मुझे पुलिस की गाड़ी से भगाया गया. पुराने सरपंच श्रवण सिंह रावत फौरन पंचायत की तरफ दौड़े, कुर्सी पर बैठकर बोले ‘ई भीली को कोड़ पूछै, कौड़ पैदा नी होय ऐसो, जो जा पंचायती में राज करै’."

यानी एक गांव के ऐसे दो उदाहरणों से बीते 10-15 सालों के भीतर आपसी टकराहटों के कारण साफ समझ में आते हैं. तकरीबन 15 साल पहले ही इलाके की महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए समिति बनायी और नाम रखा ‘महिला जन अधिकार समिति’. तब 2-2 रूपए देकर 10-12 महिलाएं जुड़ी. केसर, तोला, सोहनी, सरजू, सकुंतला, रेनू, जूली, लीला, गंगा, रिहाना, संपत, भंवरीबाई जैसी महिलाएं अपनी छोटी-छोटी दिक्कतों और निपटारे के लिए चर्चाएं करतीं. भंवरीबाई बताती हैं "5 साल के बाद जब हम बालविवाह, मृत्युभोज और जातिप्रथा जैसी बुराईयों के विरोध में बोलने लगे तो हमारा भी विरोध बढ़ने लगा. दलित महिलाएं जब जातिसूचक शब्दों और गालियों पर ऐतराज जताने लगीं तो सवर्ण कहते कि हम तो तुम्हें रोज ही गालियां देते थे, पहले भी तुम्हारे बच्चों को बिगड़े नामों से ही बुलाते थे, तब तो तुम्हें बुरा नहीं लगता था, अब क्यों लग रहा है ?"

दलितों को सरकारी जमीन से होकर अपने खेत आना-जाना होता था. मगर जून की घनी दोपहरी में तेजा गूजर ने उसी रास्ते पर गड्डा खुदवाया, और तार और कांटे की बागड़ लगवा दी. इसके बाद दलित महिलाओं की तरफ से भंवरीबाई ने तेजा गूजर से बात की- "लालजी (देवरजी) डब्बो थाओ बात करणी है." जबाव में उन्हें अश्लील गालियां और गड्डे में ही गाड़ देने जैसी धमकियां मिलीं.

ऐसो पुलिस वालो से तो...
इसके बाद दलित महिलाओं ने उनके बड़े भाई और वार्ड के पंच अंबा गूजर को बताया कि आपको वोट दिया तो इस उम्मीद पर कि सुख-दुख बांटोंगे, आप तो खुद ही दुख दे रहे हैं. जबाव में अंबा गूजर ने थाने घूम आने की नसीहत दी.

रसूलपुरा के दलित परिवारों ने बताया कि यह दोनों भाई कई गांवों जैसे बेड़िया, गूगरा, बुडोल और गगबाड़ा के दलितों की जमीनों को सस्ते दामों में खरीदने में लगे हुए हैं. अगले दिन दलित महिलाएं जब नारेती पुलिस चौकी गईं तो पुलिस वाले बोले कि पहले जांच करेंगे, तब केस लेंगे. जांच के लिए जब कैलाश (दलित) कांस्टेबल आया तो तेजाभाई-अंबाभाई ऊपर बैठे और कैलाश कांस्टेबल आंगन के बाहर नीचे बैठा.

यह नजारा देखते ही दलित महिलाएं अलवर गेट थाने पहुंची, जहां थानाधिकारी ऐसे मामलों के चलते पहले से ही हैरान-परेशान पाये गए. उन्होंने ऐसी वारदातों में कमी लाने की बात पर जोर दिया.

गांव के दलित व्यक्ति कल्याणजी पूरे भरोसे के साथ बताते हैं ‘‘ऊंची जात के हमारे 30 एकड़ के खेतों के अलावा 4 एकड़ की सरकारी जमीन भी हथियाना चाहते हैं. यहां 1 एकड़ खेत की कीमत 1 लाख के आसपास चल रही है. हमारे पास गृहस्थी चलाने का मुख्य जरिया खेती ही है. 10-15 सालों से सूखा पड़ने से खेती वैसे ही चौपट है. मजूरी के लिए पलायन करना पड़ता है. ऐसे में ऊंची जात वालों की नीयत बिगड़ने से थाने-कचहरी के चक्कर भी लगाने पड़ रहे हैं.’’

मौसेरे भाई
इसी साल के कुछ मामलों पर नजर दौडाएं तो जमीन के विवाद में 12 फरवरी को मामचंद रावत और उसके लोगों ने शंकरलाल रेंगर, उसकी पत्नी कमला, बेटी संगीता, बहू ललिता, बेटे विनोद और गोपाल के साथ घर में घुसकर मारपीट की. ‘दलित अधिकार केन्द्र’ के हस्तक्षेप करने से अलवर गेट थाने में तीन महीने बाद रिपोर्ट दर्ज हो सकी. अभी तक चलान पेश नहीं हुआ.

इसके बाद तेजाभाई-अंबाभाई गूजर ने रास्ता रोकने का विरोध करने वाली गीता और सोहनी को पीटा. एसपी साब के हस्तक्षेप के बाद ही रिपोर्ट लिखी जा सकी. बहुत दिनों से कार्यवाही का इंतजार है. जिन दलितों के दिलों में अपनी जमीन खो देने का डर हैं, उनमें हैं कल्याण, कैलाश, ओमप्रकाश, रतन, सोहन, छोटू, नाथ, मोहन, सुआंलाल, गोगा, घीसू, किशन, दयाल, रामचंद, रामा, हरिराम ने अपने नाम लिखवाए हैं.

रसूलपुरा का राजनैतिक-आर्थिक ताना-बाना ऐसा है कि वर्चस्व की लड़ाई में गूजरों के साथ मुस्लिमों ने हाथ मिला लिया है. लाला शेराणी और लाला सलीम जैसे दो मुस्लिम व्यापारियों ने तो गूजरों का खुला समर्थन किया है. इसमें से लाला सलीम ने तो यहां तक कह दिया है कि "पूरा गांव उलट-पुलट हो जाएगा, अगर एक भी गूजर थाने में गया तो." मुस्लिम और सवर्ण-हिन्दूओं की एकता का इससे बेहतरीन उदाहरण और कहां मिलेगा ?

इधर अलवर गेट थाने के थानाधिकारी महोदय की परेशानी समझ नहीं आती है. शंकरलाल रेंगर जब रिपोर्ट लिखाने पहुंचे तो थानाधिकारी महोदय ने स्वयं समझाने की कोशिश की थी कि यह थाना केवल दलितों या रसूलपुरा के लिए नहीं खोला गया है. इलाके में और भी तो लोग हैं, और भी परेशानियां हैं.

उधर रसूलपुरा में शाम 7 बजे तक जब सुआलाल भाम्बी की गाय न लौटी तो उसकी पत्नी गीता और बेटी रेणु पता लगाने गांव में घूमने लगीं. उन्हें पता चला कि बीरम सिंह ने उनकी गाय बांध रखी है. इसके बाद जिसका अंदेशा था, वही हुआ. गाय मांगने पर गाली-गलौज और विरोध करने पर मारपीट. उस वक्त एक भी बीच-बचाव में न आया. ऐसे में जब सुआंलाल भाम्बी, उसकी पत्नी गीता और बेटी रेणु रिपोर्ट लिखवाने आए तो सुआलाल को बंद कर लिया गया. मगर ‘महिला जन अधिकार समिति’ और ‘दलित अधिकार केन्द्र’ के विरोध के बाद पुलिस सुआलाल से कहती है कि "गांव चलते हैं, अगर एक भी आदमी यह कह दे कि यह तेरी गाय है तो रख लेना."

सुआलाल बोला "गवाह तो एक नहीं कई हैं, पर मामला केवल गाय का नहीं है, गाय तो मेरी है ही, सवाल मेरी पत्नी और बेटी को बेवजह पीटने और गाली-गलौज का है, उसका न्याय चाहिए." पुलिस वालों के हिसाब से "ऐसे तो मामला सुलझने से रहा." इसलिए अगली सुबह गीता और रेणु को जिला एवं सेशन न्यायधीश, अजमेर का रास्ता पकड़ना है. रात उन्हें अजमेर ही ठहरना है. सुबह होने के पहले गांव के पंच उन्हें कचहरी की हकीकत बताने के लिए आते हैं. वह बाकायदा गाय लौटा देने का वादा भी करते हैं. मारपीट और ईज्जत के सवाल पर अस्पताल में लगा खर्चापानी दिलवाने की गांरटी भी देते हैं. दोषी बीरम सिंह माफी भी मांगता है, यह अलग बात है कि केवल ऊंची जाति वालों के सामने.

गांव का वास्ता
गीता और रेणु के शरीर पर चोट के निशान ज्यादा हैं. मगर गांव के पंचों के बढ़ते जोर के सामने उन्हें मारपीट का भंयकर दर्द हमेशा के लिए भूलना पड़ेगा. सुआलाल के हिसाब से यह राजीनामा उसकी खुशी के लिए नहीं गांववालों की खुशी के लिए करना पड़ेगा. बड़े-बड़े लोग जब अपनी ईज्जत की खातिर आ जाएं तो उनका अड़ी ठुकराते भी तो नहीं बनती. खेत का पानी, आंगन का गोबर, चूल्हे की लकड़ियां, कर्ज के पैसे, आटे की चक्की, मजूरी, हर रोज हर एक चीज के लिए तो उन्हीं का आसरा है.

गीता मान रही है कि इस बार ईज्जत से कोई समझौता नहीं होना चाहिए. हालांकि सुबह होने में अभी बहुत देर है , मगर उसके पहले यह भी जानना चाह रही है कि वह गांव और घरबार छोड़कर भी कहीं जी सकती है ?

कहते हैं ‘‘पांच पंच मिल कीजै काज। हारे जीते होय न लाज।।’’ मगर जहां के पंच अपनी ताकत से सत्य को अपने खाते में रखते हो, वहां के कमजारों के पास हार और लाज ही बची रह जाती है. ऐसे में कोई कमजोर जीतने की उम्मीद से कचहरी के रास्ते जाए भी तो उसे जाती हुई 'राजौ 'और लौटी हुई 'गीता' मिलती है. तब यह सवाल इतना सीधा नहीं रह जाता है कि वह किसके साथ चले, किसके साथ लौटे ?

13.1.10

विधायक की 1 चिट्ठी ने 11 साल से गैंगरेप केस को दबाए रखा है

शिरीष खरे


बड़ोदरा/ इन दिनों रूचिका गिरहोत्रा की दुखद दास्तान से पूरे देश के लोग सकते में हैं और सरकार के कान कुछ खड़े हुए हैं; ऐसे में आइए एक दशक पुरानी उस दास्तान से भी धूल की परतें हटा लेते हैं जिसमें धूलेटी त्यौहार की रात को 13 साल की दलित लड़की के साथ, स्थानीय विधायक के रिश्तेदार और उसके साथी ने बलात्कार किया था।

11 सालों बाद, आज भी यह केस जहां से शुरू हुआ था वहीं अटका पड़ा है- यानि जब वह लड़की नाबालिग थी तो दबंगों ने अपना दम भरते हुए धरदबोचा था। तथ्यों के हिसाब से साफ होता है कि पुलिस ने किस तरह से पूरे मामले को अनदेखा किया था। हालांकि मामला अदालत भी पहुंचा, जो दशक भर से अपनी स्थिर अवस्था में विद्यमान है। अवस्था की स्थिरता को जानने के लिए यही तथ्य काफी है कि 4000 दिनों के गुजरने के बावजूद गवाहों को सम्मन भेजे जाने अभी बाकी हैं। जबकि अदालती लड़ाई में लड़की के दादा अपने हिस्से की ज्यादातर जमीन बेच चुके हैं। जबकि लड़की अब 24 साल की हो चुकी है और उसकी शादी के बाद दो बच्चे भी हैं।

11 साल पहले, विधायक खुमानसिंह चौहान ने कथित तौर पर उस रिश्तेदार को बचाने के लिए पुलिस सब-इंस्पेक्टर को अपने अधिकारिक लेटरहेड पर हाथ से लिखी हुई एक चिट्ठी भेजी थी। खुमानसिंह चौहान सावली विधानसभा क्षेत्र से लगातार कांग्रेस के विधायक रहे हैं।

13 मार्च, 1998 को रमेश बारिया और उसके साथी ने कथित तौर पर मोक्षी गांव की दलित लड़की को उसके घर से अगवा किया और फिर बारी-बारी से बलात्कार किया। अगली सुबह यह दोनों खून से लथपथ उस लड़की को पोण्ड गांव में ही छोड़कर भाग निकल थे। यह लड़की अपने मां-बाप के अलग-अलग हो जाने के बाद से दादा वशराम वंकर के साथ रहती थी। वारदात वाले दिन दादा के बाहर जाने की वजह से यह लड़की घर में अकेली थी।

लड़की के दादा वशराम वंकर ने बताया कि ‘‘जैसे ही मालूम चला, हम उसे पास की पुलिस चौकी ले गए। वहां के पुलिस वालों ने हमसे कहा कि उसे भदरवा पुलिस स्टेशन ले जाओ। जब हम भदरवा पुलिस स्टेशन ले गए तो वहां केस दर्ज करने से मना कर दिया गया। कहा गया कि उसे मेडीकल जांच के वास्ते अस्पताल ले जाओ।’’

एसएसजी अस्पताल के डाक्टर पहले तो यह सोचने लगे कि गहरे सदमे में डूबी यह कौन लड़की है, यहां से उसे मानसिक उपचार के लिए वडोदरा अस्पताल में रेफर किया गया। मगर जब वडोदरा अस्पताल के डाक्टरों को लगा कि इस लड़की के साथ बलात्कार हुआ है तो उसे वापस भेज दिया गया। इसके बाद मेडीकल जांच पड़ताल में उसके साथ बलात्कार होने की पुष्टि हुई। इसकी शिकायत चार दिनों बाद पुलिस स्टेशन में दर्ज हो सकी। वशराम वंकर ने बताया कि ‘‘जब पुलिस वाले लीपापोथी करने लगे तो हम वड़ोदरा जाकर पुलिस अधीक्षक साब से भी मिले, पर साब ने उल्टा यह ईल्जाम लगा दिया कि हम पैसा वसूलने के लिए ऐसा रहे हैं।’’

वशराम वंकर की लड़ाई को गैर सरकारी संस्था ‘कांउसिल फार सोशल जस्टिस’ की तरफ से गुजरात हाई कोर्ट तक ले जाया गया। इसके पहले तक पुलिस वालों का रूख बहुत सख्त और गैर जिम्मेदाराना ही रहा। लड़की के परिवार वालों का मानना है कि 14 मार्च, 1998 को विधायक के लेटरहेड पर हाथ से लिखी गई उस चिट्ठी का यह असर हुआ कि बदरवा पुलिस स्टेशन में बलात्कार का मामला दर्ज नहीं किया गया।

देखा जाए तो उस लेटरहेड पर विधायक खुमानसिंह चौहान के दस्तखत भी हैं। वैसे खुद चौहान का यह दावा है कि उनके लेटरहेड का किसी ने ‘गलत इस्तेमाल’ किया है और वह किसी रमेश बरिया नाम के आदमी के बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं। खुमानसिंह चौहान के मुताबिक ‘‘मैं नियमित रुप से कई सिफारिश पत्रों को लिखता रहता हूं, मगर ऐसे किसी सिफारिश पत्र के बारे में मुझे तो याद नहीं आ रहा है।’’ उन्होंने आगे कहा कि ‘‘ऐसा मैं कभी नहीं कर सकता, बलात्कार जैसे गंभीर मुद्दे पर तो बिल्कुल भी नहीं।’’ दूसरी तरफ ‘कांउसिल फार सोशल जस्टिस’ के सचिव वालजी भाई पटेल के मुताबिक ‘‘चौहान साब सच नहीं कह रहे हैं, रमेश बरिया उनके खास रिश्तेदार हैं, उनके मां के पक्ष से।’’ इस केस के संबंध में वालजी भाई पटेल ‘सोऊ मोटू कांग्निसेंस (स्वतः संज्ञान)’ लिए जाने के पक्ष में हैं। जिससे मामले को और लंबा खींचने की बजाय तुरंत न्याय मिल सके।

पड़ताल से जान पड़ता है कि इस केस में पुलिस ही पहली बाधा बनी। उसने हर स्तर पर लापरवाही और उदासीनता बरती थी :

> पुलिस ने एक महीने की देरी से 25 अप्रेल, 1998 को सेशन कोर्ट के सामने चार्टशीट दाखिल की। इसमें रमेश बरिया और उसके साथी को आरोपी बनाया गया था।

> एक साल बाद, 14 अप्रेल, 1999 को एडिशनल सेशन जज ने कहा कि यह केस सेशन कोर्ट की बजाय लोक अदालत में जाना चाहिए। यह नाबालिग लड़की से सामूहिक बलात्कार का मामला है और इसमें दोनों पक्षों के बीच ‘समझौता’ होने की गुजांइश भी है। मगर लड़की के परिवार वालों ने समझौता करने से साफ मना कर दिया।

> आठ साल गुजरने के बाद, 30 मई, 2007 को, मुकदमा खत्म होने से पहले, कोर्ट को यह एहसास हुआ कि इस केस की सुनवाई के दौरान अपनाई गयी कार्यप्रणाली सही नहीं थी। इसमें पुलिस ने सीधे सेशन जज को ही चाटशीट दे दी थी। कायदे से उसे यह चार्टशीट ज्यूडीशियल फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट को सौंपनी चाहिए थी। इस केस के सारे दस्तावेज इंवेस्टीगेटिंग आफीसर को वापिस दिये गए। उससे कहा गया कि यह सारे दस्तावेज ज्यूडीशियल फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट तक पहुंचाए जाए।

> पुलिस ने 5 महीने का वक्त गुजारने के बाद, 9 अक्टूबर, 2007 को यह केस मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया।

> अब जो स्थिति है उसके मद्देनजर सेशन कोर्ट को और सुनवाई करनी पड़ेगी। इस केस की सुनवाई की अगली तारीख 23 जनवरी, 2010 है।

गुजरात हाई कोर्ट के भूतपूर्व जज जस्टिस एस एम सोनी के मुताबिक ‘‘यह एक बहुत गंभीर मामला है जिसे लोक अदालत में नहीं भेजा जाना चाहिए। यह सेशन कोर्ट कि गलती है कि उसने इस मामले को लोक अदालत में भेजे जाने की बात कही थी। साथ ही इस मामले से जुड़े सारे दस्तावेजों को इंवेस्टीगेटिंग आफीसर को नहीं लौटाए जाने चाहिए थे।’’

‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ के ‘विकास सहयोग’ विभाग की गुजरात टीम में मैनेजर प्रवीण सिंह के मुताबिक ‘‘यह तो प्रकाश में आने वाला एक मामला है। बहुत सारे मामले तो प्रकाश में ही नहीं आते। इसलिए हम वालजी भाई पटेल जैसे सामाजिक कार्यकताओं के अलावा बहुत सी संस्थाओं के साथ मिलकर ऐसी वारदातों के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। हम चाहते हैं कि न केवल दोषियों बल्कि ऐसे मामलों में लापरवाही करने वाले सभी अधिकारियों जैसे इंवेस्टीगेटिंग आफीसर, कोर्ट रजिस्टार्ड, चीफ पब्लिक प्रोस्टिक्यूटर और स्पेशल ट्रायल जज के खिलाफ भी कार्रवाई की जाए। जिससे ऐसे मामले हतोत्साहित हों।’’

लड़की के दादा वशराम वंकर की उम्र अब 70 को पार का चुकी है; उनके साथ इस अदालती लड़ाई में लड़की के मामा सुरेश वंकर भी भागीदार हैं। सुरेश वंकर कहते हैं ‘‘अभियुक्त के रिश्तेदारों ने हमें 50,000 रूपए देने की पेशकश की थी..... जिसे हमने ठुकरा दिया है।’....‘‘काश कोई हमारे दर्द को समझ सकता।’’ दादा वंशराम वंकर एक बात और जोड़ते हुए कहते हैं ‘‘हमारे हिस्से में इतनी राहत तो है कि बच्ची को बहुत प्यार देने वाला पति और ससुराल मिला है। ससुराल वालों को बच्ची के बार-बार अदालत आने-जाने पर भी कोई एतराज नहीं है।’’

* * * *
संपर्क : shirish2410@gmail.com

10.11.09

खेत के मालिक मगर कागज पर भूमिहीन

शिरीष खरे


मुंबई। भिवंडी में  दलित-आदिवासी 60 सालों से 11 हेक्टेयर चारागाह की जमीन पर खेती करने और तमाम सरकारी औपचारिकताएं निपटाने के बावजूद भूमिहीन के भूमिहीन हैं। राजस्व विभाग के अधिकारियों को इनके नाम भूमि दर्ज करने में न जाने क्या परेशानी है ?

अर्जुनली, भिवंडी तालुका के सर्वे नम्बर 44 को देखने पर पता चलता है कि 11 हेक्टर से ज्यादा जमीन चारागाह की है। जहां यंहा के बारक्या मुकणे, कमल्या मुकणे, सजन मुकणे, रामा मुकणे, जाऊ मुकणे, ताराबाई वाघे, बालाराम वाघे, शरद महादू चव्हाण, सुभाष जाधव, आत्माराम चव्हाण, महेन्द्र जाधव, रमेश चव्हाण, राजेन्द्र जाधव, महेन्द जाधव, भीमराव गायकवाड़ और नारायण गायकवाड़ अपने बाप-दादा के जमाने (1949) से फसल उगा रहे हैं। यह तथ्य महाराष्ट्र के `जमीन गायरन कानून´ से मेल खाता है। इस कानून के मुताबिक 14 अप्रैल 1991 के पहले से जो परिवार ऐसी जमीन का इस्तेमाल करते हैं उन्हें वह जमीन दे दी जाए। मगर कानून बनने के एक दशक बाद भी यहां के किसान अपनी जमीन पाने की कोशिशों में उलझे हुए हैं। इन किसानों ने 1958 में जमीन के क्षेत्रफल के हिसाब से राज्य सरकार को दंड भी दिया है।

जमीन के अतिक्रमण की सूचना व मंडल अधिकारी से लेकर तहसीलदार, जिला अधिकारी से लेकर राजस्व विभाग में दर्ज है। विधानसभा चुनाव के पहले तब के राजस्व मंत्री डॉ. पतंगराव कदम और सामाजिक न्याय मंत्री चंद्रकांत हंडोरे ने जिला अधिकारी को कार्रवाई करने का आदेश भी दिया था। इसके बाद जिला अधिकारी ने भिवंडी के तहसीलदार को यह जमीन दलित-आदिवासियों के नाम करने का आदेश दिया। मगर अभी तक इन किसानों के नाम सात बारह तक नहीं पहुंचे हैं। इस तरह यह अभी तक भूमिहीन के भूमिहीन ही हैं। राजस्व विभाग के अधिकारियों की अनदेखी को देखते हुए यह कह पाना मुश्किल है कि यह दलित-आदिवासी किसान न जाने कब तक भूमिहीन के भूमिहीन ही रहेंगे ?

दूसरी तरफ महाराष्ट्र के बीड़ जिले में दलितों ने जानवर चराने वाली पहाड़ियों पर ज्वार पैदा करके सामाजिक ताना-बाना ही बदल दिया। इन दिनों वहां के दलित 69 गांवों की करीब 2000 एकड़ पहाड़ियों पर बीज उगाते हैं। इस संघर्ष में औरतों ने भी बराबरी से हिस्सेदारी निभायी थी। इसलिए उन्हें जमीन का आधा हिस्सा मिला। इस तरह खेतीहीन से किसान हुए कुल 1420 नामों में से 710 औरत हैं। मगर इतने सालों की लड़ाई के बाद भी इनके हक की जमीन इनके नाम नहीं हो सकी हैं।

28.10.09

जाति की जड़ों को काटतीं औरतें

शिरीष खरे


उस्मानाबाद | देश में कुल आबादी का एक-चौथाई हिस्सा दलितों और आदिवासियों का है। मगर उनके पास खेतीलायक जमीन का महज 17.9 प्रतिशत हिस्सा है। इसी तरह कुल आबादी में करीब आधी हिस्सेदारी औरतों की है। जो कुल मेहनत में बड़ी हिस्सेदारी निभाती हैं और उन्हें कुल आमदनी का 10 वां हिस्सा मिलता है। ऐसे में दलित और उस पर भी एक औरत होने की स्थिति को आसानी से जाना जा सकता है। मगर मराठवाड़ा की दलित औरतें धीरे-धीरे जाति की जड़ों को काटकर और पथरीली जमीनों से फसल उगाकर अपना दर्जा खुद तय कर रही है।


उस्मानाबाद जिले में अनुसूचित जाति की आबादी 15 प्रतिशत से भी ज्यादा हैं। मगर 85 प्रतिशत से भी ज्यादा परिवार अपनी रोजीरोटी के लिए यह या तो सवर्णों के खेतों में काम करते हैं या फिर चीनी कारखानों के वास्ते गन्ने काटने के लिए पलायन करते हैं। स्थायी आजीविका न होने से उनके सामने जीने के कई सवाल खड़े रहते हैं। मराठवाड़ा में ‘कुल कितनी जमीनों में से कितना अन्न उगाया है’ के हिसाब से किसी आदमी की सामाजिक-आर्थिक स्थितियां बनती-बिगड़ती हैं। तारामती अपने तजुर्बे से ऐसी बातें अब खूब जानती है।


‘‘लड़कियों का बेहिसाब घूमना या किसी गैर से खुलके बतियाना, यह कोई अच्छे रंग-ढंग तो नहीं- बचपन से हमें यही तो सुनाया जाता है।’’ पर तारामती कस्बे अब वैसी नहीं रही, जैसे वह पहले थी। नहीं तो बहुत पहले, किसी अजनबी आदमी को देखा नहीं कि जा छिपती थी रिवाजों की ओट में। इस तरह यहां बाहरी मर्द से बतियाने के सवाल का कोई सवाल ही नहीं उठता था। दलित परिवार की तारामती के सामने ऐसे कई सवाल कभी नहीं उठे थे। उसे तो अपने पति को पिटते हुए देखकर भी चुप रहना था। गांव के दबंग जात वालों से पूरी मजूरी मांगने की हिम्मत न उसमें थी, न उसके पति में। ऐसा सलूक तो शुरू से ही होता रहा है, सो यह कोई बड़ी बात भी नहीं लगती थी। इसके बावजूद अगर कोई विरोध होता भी था तो मजाल है कि चारदीवारी से बाहर निकल सके। उस पर भी एक औरत की क्या बिसात कि वह ऐसी बातों पर खुसुर-फुसुर भी कर सके ?


‘‘6 साल पहले, यहां की औरतों को हमने ऐसी ही हालत में देखा पाया था।’’ ‘लोकहित समाज विकास संस्थान’ के बजरंग टाटे आगे बताते हैं ‘‘काम शुरू करने के बाद, हम हर रोज यहां आते-जाते, मगर जो भी बातें निकलकर आतीं वो सिर्फ मर्दों की होतीं। हम औरतों में सोचने की आदत के बारे में भी जानना चाहते थे। तब ‘स्वयं सहायता समूह’ ने औरतों के विचारों को आपस में जोड़ के लिए एक कड़ी का काम किया। इस समूह के जरिए धीरे-धीरे पता चला कि औरतों के भीतर गुस्सा फूट-फूटकर भरा है, वह बहुत कुछ बदल देना चाहती हैं, उन्हें अगर खुलेआम बोलने का मौका भी मिला तो काफी कुछ बदल जाएगा।’’ ग्राम धोकी, जिला उस्मानाबाद से तारामती जैसी दर्जनों औरतें धीरे-धीरे ही सही मगर अपने जैसे सबके भीतर भरे गुस्से से एक होती चली गईं।


लंबा वक्त गुजरा, एक रोज धोकी की औरतों ने चर्चा में पाया कि जब-तक जमीनों से फसल नहीं लेंगे तब-तक रोज-रोज की मजूरी के भरोसे ही बैठे रहेंगे। अगले रोज सबके भरोसे में उन्होंने अपना-अपना भरोसा जताया और गांव से बाहर बंजर पड़ी अपनी जमीनों पर खेती करने की हिम्मत जुटायी। जैसे कि आशंका थी, गांव में दबंग जात वालों के अत्याचार बढ़ गए ‘‘उन्होंने सोचा कि जो कल तक हमारे गुलाम थे, वो अगर मालिक बने तो उनके खेत कौन जोतेगा ?’’ हीरा बारेक उन दिनों को याद करती हैं ‘‘पंचायत चलाने वाले ऐसे बड़े लोगों ने मेरे परिवार को खूब धमकियां दीं। मगर अब हम अकेले नहीं थे, संगठन के बहुत सारे लोग भी तो हमारे साथ थे। इसलिए सबके साथ मैंने आगे आकर ललकारा कि अगर तुम अपनी ताकत अजमाओगे, मेरे पति को मारोगे, तो हम भी दिखा देंगे कि हम क्या कर सकते हैं ?’’


एक बार दबंग जात वालों ने कुछ दलित औरतों को जमीनों पर काम करते देखा तो उनके पतियों को बुलवाया। गांव से बंद करने जैसी धमकियां भी दीं। अगली सुबह तारामती और उनकी सहेलियों ने अपने-अपने घरों से निकलते हुए कहा कि ‘मर्द लोगों को डर लगता है तो रहो इधर ही, हम तो काम पर जाते हैं।’ थोड़ी देर बाद, बहुत सारे दलित मर्द जमीनों पर आए। कुल जमा 50 जनों ने वहीं बैठकर फैसला लिया कि वो ‘गांव में भी समूह बनाकर रहेंगे और खेतों में भी’। और इसी के बाद ‘स्वयं सहायता समूह’ की बैठक में औरतों के साथ पहली बार मर्द भी बैठे। इसके पहले तक तो औरतों का समूह अपनी रोजमर्रा की बातों पर ही बतियाता था। मगर अबकि यह समूह गांव के नल से पानी भरने जैसी बातों पर भी गंभीर हो गया। यहां की औरतों ने पानी में अपनी हिस्सेदारी के लिए लड़ने का मन बना लिया। खुद को ऊंची जात का कहने वालों ने सार्वजनिक उपयोगों की जिन बातों पर रोक लगाई थी, वो एक-एक करके टूटने लगी थीं।


यह सच था कि तारामती के समूह से जुड़ी औरतों के मुकाबले दूसरी जात की औरतों में भिन्न्नताएं साफ-साफ दिखती थीं। फिर भी एक बात सारी औरतों को एक साथ जोड़ती थी कि पंरपराओं के लिहाज से सबको मानमर्यादा का ख्याल रखना ही हैं। ऐसे में तारामती और उसके समूह के गांव से बाहर आने-जाने, बार-बार संगठन के दूसरे साथियों से मिलने-जुलने के ऐसे मतलब निकाले गए जो उनके चरित्र पर हमला करते थे। तारामती नहीं रूकी, वह तो एक कदम आगे जाकर उप-सरपंच का चुनाव भी लड़ी। यह अलग बात है कि वह चुनाव हारी। मगर जहां किसी दलित के चुनाव लड़ने को सामान्य खबर न माना जाए, वहां एक दलित औरत के मैदान में कूदने की चर्चा तो गर्म होनी ही थी। तारामती, हीरा बारेक, संगीता कस्बे को तो और आगे जाना था, इसलिए यहां पहली बार मर्दो के बराबर मजूरी की मांग उठी। इसके पहले इन्हें रोजाना 40 रूपए मजूरी मिलती थी, जो मर्दो के मुकाबले आधी थी। विरोध के बाद उन्हें रोजाना 65 रूपए मजूरी मिलने लगी, जो मर्दो से थोड़ी ही कम थी।


तारामती के समूह की औरतें पंचायत में जगह से लेकर जायज मजूरी पाने की जद्दोजहद इसलिए कर सकी, क्योंकि आजीविका के लिहाज से उन्हें अपने खेतों से फसल मिलने लगी थी। संगीता कस्बे बताती हैं ‘‘इससे पहले, वो (सवर्ण) हमें नाम की बजाय जात से बुलाते थे। जात न हो जैसे गाली हो। ‘क्या रे ऐ मान’, ‘क्यों रे महार’- ऐसे बोलते थे। अब वो ईज्जत से बुलाते हैं, बतियाते हैं। ‘आज तुम काम पर आ सकते हो या नहीं ?’- पूछते हैं। सबसे बढ़कर तो यह हुआ कि पंचायत से हमारे काम होने लगे। हम जानने लगे कि सही क्या है, हक क्या हैं। हर चीज केवल उनके हिसाब से तो नहीं चल सकती है ना।’’ हम जब तारामती के समूह से बतिया रहे थे तो दूर के डोराला गांव से कुछ औरतें भी पहुंचीं। वह भी अपने यहां ‘स्वयं सहायता समूह’ बनाना चाहती थीं। उसी समय जाना कि औरतों का समूह जरूरत पड़े तो मर्दो को भी कर्ज देता है। इस समूह में बच्चों की पढ़ाई और किसी अनहोनी से निपटने को वरीयता दी जाती है। पांडुरंग निवरूति ने बताया कि ‘‘आसपास ऐसे 16 महिला घट बनाये गए हैं। हर घट में कम से कम 10 औरतें तो रहती ही हैं।’’


तारामती कहती हैं ‘अगर हम ऐसे ही बैठे रहते तो जो थोड़ा बहुत पाया है, वो भी हाथ नहीं लगता। ऐसा भी नहीं है कि हमारी हालत बहुत सुधर गई है, अभी भी काफी कुछ करना है।’’ यह सच है कि यहां काफी कुछ नहीं बदला है फिर भी कम से कम इन औरतों की दुनिया बेबसी के परंपरागत चंगुलों और उनके बीच उलझी निर्भरताओं से किनारा पा चुकी है। यह अब अपने बच्चें को स्कूल भेजकर बेहतर सपना देख रही हैं.

18.10.09

पांच पंच मिल कीजै काज


शिरीष खरे

बाड़मेर। राजौ और पूसाराम, एक ही दुनिया के दो किस्से हैं, दो किरदार हैं। इधर है अपनी अस्मत गंवा चुकी राजौ, जो गांव के विरोध पर भी अपनी अर्जी अदालत तक दे तो आती है, मगर लौटकर गांव से छूट जाती है। उधर है कमजोर दलित होने का दर्द झेलने वाला पूसाराम, जो डर के मारे अपनी गुहार अदालत से वापिस ले आता है, और गांव से जुड़ जाता है। यह दोनों ही मानते हैं कि थाने के रास्ते अदालत आना-जाना और इंसाफ की लड़ाई लड़ना तो फिर भी आसान है, मगर समाज के बगैर रह पाना बहुत मुश्किल है।



एक ने अदालत जाना मंजूर किया, दूसरे ने गांव में रहना। दोनों का हाल आपके सामने है, मगर कौन ज्यादा अंधेरे में है, कौन कम उजाले में- चलिए आप ही तय कीजिए- गांव....थाने....अदालत....समाज के बीच मौजूद इनके फासलों, अंधेरों से होकर :


राजौ के यहां जाने से पहले, उस रोज का अखबार भरतपुर जिले के गढ़ीपट्टी में ‘बंदूक की नोंक पर पांच लोगों के दलित औरत से बलात्कार’ की खबर देता था। राजौ का गांव सावऊ, बाड़मेर जिले के गोड़ा थाने से 12 किलोमीटर दूर बतलाया गया। वहां तक पहुंचने में 30 मिनिट भी नहीं लगे, मगर राजौ के भीतर की झिझक ने उसे 45 मिनिट तक बाहर आने से रोके रखा। राजौ के साथ जो हुआ वो घटना के चार रोज बाद याने 9 जून, 2003 की एफआईआर में दर्ज था : ‘‘श्रीमान थाणेदार जी, एक अर्ज है कि मैं कुमारी राजौ पिता देदाराम, उम्र 15 साल, जब गोड़ा आने वाली बस से शहरफाटा पर उतरकर घर जा रही थी, तब रास्ते में टीकूराम पिता हीराराम जाट ने पटककर नीचे गिराया, दांतों से काटा, फिर.......और उसने जबरन खोटा काम किया। इसके बाद वह वहां से भाग निकला। मैंने यह बात सबसे पहले अपनी मां को बतलाई। मेरे पिता 120 दूर मजूरी पर गए थे, पता चलते ही अगली सुबह लौट आए। जब गांव वालों से न्याय नहीं मिला तो आज अपने भाई जोगेन्दर सिंह के साथ रिपोर्ट लिखवाने आई हूं। साबजी से अर्ज है कि जल्द से जल्द सख्त कार्यवाही करें।’’


राजौ अब 20 साल की हो चुकी है। उसकी मां से मालूम चला कि बचपन में उसकी सगाई अपने ही गांव में पाबूराम के लड़के हुकुमराम से हो चुकी है। मगर वह परिवार अब न तो राजौ को ले जाता है, न ही दूसरी शादी की बात कहता है। गांव वालों से मदद की तो कोई गुंजाइश भी नहीं है। कहने को 2 किलोमीटर दूर पुनियो के तला गांव में ताऊ है, 60 किलोमीटर दूर बनियाना में चाचा है, 80 किलोमीटर दूर सोनवा में ननिहाल है, मगर कोई खबर नहीं लेता। यह झोपड़ा भी गांव से 2 किलोमीटर दूर यहां आ गया है, गृहस्थी का हाल पहले से ज्यादा खराब है। पंचों में चाहे खेताराम जाट हो या रुपाराम, खियाराम हो या अमराराम, सारे यही कहते हैं कि चिड़िया जब पूरा खेत चुग जाए, इसके बाद पछताओ भी तो क्या फायदा ?


राजौ के पिता देदाराम यह खोटी खबर लेकर सबसे पहले गांव के पंच खियाराम जाट के पास पहुंचे थे। उन्होंने इसे अंधेर और जमाने को घोर कलयुगी बतलाया, फिर देदाराम से पूछे बगैर दोषी टीकूराम के यहां यह संदेशा भी भिजवा दिया कि 20,000 रूपए देकर मामला निपटा लेने में ही भलाई है। मगर टीकूराम के पिता हीराराम जाट ने साफ कह दिया कि वह न तो एक फूटी कोड़ी देने वाला है, न निपटारे के लिए कहीं आने-जाने वाला है। फिर मजिस्ट्रेट की दूसरी पेशी पर बाड़मेर कोर्ट के सामने दोषी समेत गांव के सारे पंच-प्रधान जमा हुए। उन्होंने समझाया कि केस वापिस ले लो, कोर्ट-कचहरी का खर्चापानी भी दे देंगे। पर टीकूराम को साथ देखकर राजौ बिफर पड़ी, उसने राजीनामा के तौर पर लाये गए 50,000 रूपए जमीन पर फेंक दिए और ऐसी खरी-खोटी सुनाई कि वहां एक न ठहरा। इसके बाद जिस चाचा ने राजौ का नाता जोड़ा था, उसी के जरिए पंचों ने बातें भेजीं कि- ‘‘राजीनामा कर लो तो हम साथ रहकर गौना भी करवा दें, और छोटे भाई की शादी भी। नहीं तो सब धरा रह जाएगा। कोर्ट कचहरी के चक्कर में पड़ने से अच्छा है आपस में निपटना। वो तो लड़का है, उसका क्या है, जितना तुम्हें पैसा देगा, उतना कचहरी में लुटाकर छूट जाएगा, तुम लड़की हो, उम्र भी क्या है, बाद में कोई साथ नहीं देता बेटी। फिर बदनामी बढ़ाने में अपना ही नुकसान है।’’ जब ऐसी बातों का असर भी नहीं हुआ तो कभी राजौ की जान की फ़िक्र की गई, कभी उसके छोटे भाई के जान की।


राजौ आज तक केस लड़ रही है। यह अलग बात है कि टीकूराम को जमानत पर रिहाई मिल गई, और उसके बाद उसकी शादी भी हुई। राजौ को कोर्ट में लड़ने का फैसला गलत नहीं लगता है, उसे वहां के फैसले का अब भी इंतजार है। राजौ को गांव में आने-जाने के लिए सीधे तो कोई भी नहीं रोकता, मगर पीठ पीछे......तरह-तरह की बातें तो होती ही हैं। वैसे पंचों को छोड़कर गांव के बाकी लोगों के साथ उसके रिश्ते धीरे-धीरे सुधर रहे हैं। राजौ के यहां से उठते वक्त उससे जब कहा गया कि रिपोर्ट में उसका नाम और फोटो छिपा ली जाएगी तो उसने बेझिझक कहा ‘‘मेरा असली नाम और फोटो ही देना। जिनके सामने लाज शरम से रहना था, उनके सामने ही ईज्जत उतर गई तो....तो दुनिया में जिन्हें हम जानते तक नहीं, उनसे बदनामी का कैसा डर ?’’


यह सवाल लेकर वहां से निकले और पूसाराम भील के गांव बाण्डी धारा की तरफ बढ़े। यहां तक पहुंचने के लिए कच्चे, टेढ़े-मेढ़े रास्ते के बीच इतने हिचकोले खाए कि मिनिटों का समय घण्टे में बदला। पूसाराम भी दो साल पहले अपने पर बीती बातों को घण्टों तक बतलाता रहा कि तब रामसिंह राजपूत और उसके साथ के सात और आदमियों ने दारू पीकर यहां बुरी-बुरी गालियां दीं। फिर उसे डराकर उसका एक बकरा खरीदने और पैसा बाद में देने की बात करने लगे। जब पूसाराम ने न की तो उसे बुरी तरह पीटा। खेत में काम कर रही उसकी घरवाली मीरा ने जब ये चीखें सुनीं तो दोड़ी-दौड़ी आई। आते ही देखा कि रामसिंह उसके बकरे को ले जा रहा है तो उसे छुड़ाने की कोशिश में बेरहम मार भी खाई। इत्तेफाक से वह 26 जनवरी की सुबह थी, इसलिए सारे गांव वाले स्कूल में थे। पूसाराम फौरन वहां भागा और सबके सामने सारी बात सुना डाली। तब गांव वालों ने रामसिंह को बुलवाया, मगर वह नहीं आया। अगले रोज पूसाराम अपनी घरवाली के साथ थाने जाकर रिपोर्ट लिखवा आया। उस तारीख से दो महीने तक उसका केस कचहरी में रहा, मगर इधर गांव वालों के बढ़ते जोर के आगे एक रोज वह ऐसा टूटा कि राजीनामा के लिए हां बोल बैठा। उसे मारपीट का भंयकर दर्द हमेशा के लिए भूल जाना पड़ा। खींचतान से बुरी तरह घायल होकर 5 रोज में मरे बकरे की मौत और उसकी कीमत भी भूल जानी पड़ी। गांव वालों ने सिर्फ अस्पताल में लगे खर्चापानी दिलवाने की गांरटी भर दी। उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि अब आगे से ऐसा नहीं होगा। दोषी रामसिंह राजपूत ने माफी भी मांगी, यह अलग बात है कि केवल ऊंची जाति वालों के सामने। पूसाराम से माफी मांगने के सवाल पर उसके भीतर जाति का अहम अड़ गया था। तब गांव वालों ने ही पूसाराम से माफी मांग ली और केस को निपटा दिया।


‘तो राजीनामा से खुश हो’- ऐसा सुनकर पूसाराम ने सिर से मनाही करते हुए जैसे सख्त ऐतराज जताया। उसने बताया कि ‘‘यह राजीनामा उसकी खुशी से नहीं, गांव वालों की खुशी से हुआ है। जिसकी बड़ी लड़की के ही 3 लड़कियां हो, उसे बेहिसाब पीटने का कोई तुक नहीं बनता। घरवाली की पीठ, पसलियों से उठने वाले दर्द ने महीनों तक तकलीफ दी थी।’’ ‘अगर ऐसा ही था तो राजीनामा किया ही क्यों’- जबाव में पूसाराम बोला ‘‘कुछ लोग बोले देख कितने बड़े लोग तेरे सामने हाथ जोड़ रहे हैं, तू उनकी बातें ठुकरा नहीं सकता, आखिर हम सब को रहना तो गांव में ही है ना। मुझे भी लगा कि वह सही है। खेत के पानी से लेकर आंगन का गोबर, चूल्हे की लकड़ियां, कर्ज के पैसे, आटे की चक्की, मजूरी, सब तो उन्हीं के भरोसे पर है। मेरा जोर चलता तो आगे भी लड़ता, मगर कुछ रोज में गांव छोडना पड़ जाता। यहां झोपड़ी हैं, यहीं जमीन हैं। बीबी, बच्चों, बकरियों को लेकर कहां जाता ?’’


कहते हैं ‘‘पांच पंच मिल कीजै काज। हारे जीते होय न लाज।।’’ मगर जहां के पंच अपनी ताकत से जीत को अपने खाते में रखते हो, वहां के कमजारों के पास हार और लाज ही बची रह जाती है। ऐसे में कोई कमजोर जीतने की उम्मीद से कचहरी के रास्ते जाए भी तो उसे जाती हुई राजौ और लौटता हुआ पूसाराम खड़ा मिलता है। तब यह सवाल इतना सीधा नहीं रह जाता है कि वह किसके साथ चले, किसके साथ लौटे ?

13.9.09

सुबह होने में अभी देर है..

शिरीष खरे
अजमेर स्टेशन उतरते ही भंवरीबाई को मोबाइल लगाया, वह लड़खड़ाती हुई आवाज में बोलीं- ‘‘आप तो औरतों की आवाज लिखने के लिए आ रहे हैं न, सीधे अजमेरी गेट थाने चले आइए।’’ मैंने अपने भीतर की लड़खड़ाहट को साधते हुए कहा- ‘‘लेकिन मामला क्या है...’’ (उधर से) ‘‘मामला थाने से ही समझ लेना। हम तो 50 साल की बूढ़ी औरतें हैं, आप नए लड़के हो, हमें तो दो-चार थप्पड़ के बाद बिठा दिया है, इसलिए आना चाहो तो ही आना।’’
मुंबई लौटने से अच्छा है अजमेरी गेट थाने चलना, आटो वाले ने सामान से लदा देख होटल में रूकने का बजट पूछा लेकिन थाने चलने की बात ने उसे थोड़ी देर के लिए चौंका दिया। थानाधिकारी सतीश यादव टेबल पर रखे ‘सत्यमेव जयते’ की प्लेट और पीछे की दीवार पर लटकी गांधीजी की फोटो के बीचोंबीच मानो 180 डिग्री का कोण बनाते हुए बैठे हैं। उन्होंने दूसरी तरफ निगाह टिकाते हुए कहा-‘‘आपकी तारीफ’’.... लेकिन बगैर जबाव सुने ही चल दिए। मेरा सवाल यह नहीं कि केस कितना छोटा या बड़ा है, या आप बड़ा किसे मानते हैं, सवाल है जब कभी गांवों में दलित और खासकर दलित महिला पर अत्याचार होता है तो आस-पड़ोस से लेकर पंचायत या पुलिस से लेकर कचहरी तक कैसी मानसिकता होती है ? आगे की किस्सा इसी मानसिकता को केन्द्र में रखकर लिखा जा रहा है।
रसूलपुरा गांव से दलित-महिला अत्याचारों के एक हफ्ते में ही तीन-तीन केस आने पर थानाधिकारी महोदय क्रोधित है। ‘महिला जन अधिकर समिति’ का आरोप है कि वह दलित-महिलाओं को कानून में दिये गए विशेष अधिकारों पर अमल करना तो दूर शिकायत दर्ज करवाने वाले को ही हवालात की हवा खिलाने लगे हैं। रसूलपुरा के सुआलाल भाम्बी, उसकी पत्नी गीतादेवी और पुत्री रेणु ने जब बीरम गूजर के खिलाफ जर्बदस्ती गाय हथियाने और मारपीट का मामला अलवर थाने में दर्ज करवाना चाहा तो सुआलाल भाम्बी को ही यह कहते हुए बंद कर लिया गया कि जांच के बाद पता करेंगे कि कसूरवार है कौन ?
रसूलपुरा, अजमेर से जयपुर जाने वाली सड़क पर बामुश्किल 10 किलोमीटर दूर है। यहां करीब 800 मतों में से 600 मुस्लिम, 150 गूजर और 50 दलितों के हैं। 20 साल पहले दलितों की संख्या ठीकठाक थी, तब से अबतक करीब 20 दलित परिवारों को अपनी जमीन-ज्यादाद कौड़ियों के दाम बेचकर अजमेर आना पड़ा है। बचे दलितों को भी गांव से आधा किलोमीटर दूर अपने खेतों में आकर रहना पड़ रहा है। यह भारत का वह हिस्सा है जहां आज भी चबूतरे पर दलितों का बैठना मना है, वह हेडपम्प का पानी नहीं भर सकते, साइकिल पर सवार होकर निकल तो सकते हैं लेकिन टोकने (रोकने) का डर भी है, पहले तो दलित दूल्हा घोड़े पर चढ़ नहीं सकता था लेकिन 10 साल पहले हरकिशन मास्टर ने घोड़े पर चढ़कर पुराना रिवाज तोड़ा था। 15 साल पहले छग्गीबाई भील सामान्य सीट से जीतकर सरपंच भी बनी थी, तब गांव की ईज्जत का वास्ता देकर सारे पंचों को एक किया गया और अविश्वास प्रस्ताव के जरिए छग्गीबाई को 6 महीने में ही हटा दिया गया। छग्गीबाई का सामान्य सीट से जीतना करिश्मा जैसा ही था। छग्गीबाई कहती हैं- ‘‘तब सामान्य जाति के इतने उम्मीदवार खड़े हो गए कि दलितों के कम मत ही भारी पड़ गए। नजीता सुनकर सवर्णों ने रसूलपुरा स्कूल घेर लिया, ऐसे में पीछे की कमजोर दीवार से लगी खिड़की तोड़कर मुझे पुलिस की गाड़ी से भगाया गया। पुराने सरपंच श्रवण सिंह रावत फौरन पंचायत की तरफ दौड़े, कुर्सी पर बैठकर बोले ‘ई भीली को कोड़ पूछै, कौड़ पैदा नी होय ऐसो, जो जा पंचायती में राज करै’।’’ याने एक गांव के ऐसे दो उदाहरणों से बीते 10-15-20 सालों के हालात देखें तो आपसी टकराहटों की तस्वीर थोड़ी-बहुत साफ होती है।
करीब 15 साल पहले इलाके की महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए समिति बनायी, नाम रखा ‘महिला जन अधिकार समिति’, तब 2-2 रूपए देकर 10-12 महिलाएं जुड़ी। केसर, तोला, सोहनी, सरजू, सकुंतला, रेनू, जूली, लीला, गंगा, रिहाना, संपत, भंवरीबाई जैसी महिलाएं अपनी छोटी-छोटी दिक्कतों और निपटारे के लिए चर्चाएं करतीं। भंवरीबाई बताती हैं- ‘‘5 साल के बाद जब हम बालविवाह, मृत्युभोज और जातिप्रथा जैसी बुराईयों के विरोध में बोलने लगे तो हमारा भी विरोध बढ़ने लगा। दलित महिलाएं जब जातिसूचक शब्दों और गालियों पर ऐतराज जताने लगीं तो सवर्ण कहते कि हम तो तुम्हें रोज ही गालियां देते थे, पहले भी तुम्हारे बच्चों को बिगड़े नामों से ही बुलाते थे, तब तो तुम्हें बुरा नहीं लगता था, अब क्यों लग रहा है ?’’ इस तरह की बहसों के बीच आपसी टकराहट का रुप बिगड़ता चला गया।
दलितों को सरकारी जमीन से होकर अपने खेत आना-जाना होता था। बीते 6 जून को तेजा गूजर ने उसी रास्ते पर गड्डा खोदा, तार और कांटे की बागड़ लगा दी। इसके बाद दलित महिलाओं की तरफ से भंवरीबाई ने तेजा गूजर से बात की- ‘‘लालजी (देवरजी) डब्बो थाओ बात करणी है।’’ जबाव में उन्हें मां-बेड़ की गालियां और रास्ते के ही गड्डे में गाड़ देने जैसी धमकियां मिलीं। इसके बाद दलित महिलाओं ने उनके बड़े भाई और वार्ड के पंच अंबा गूजर को बताया कि आपको वोट दिया तो इस उम्मीद पर कि सुख-दुख बांटोंगे, आप तो खुद ही दुख दे रहे हैं। जबाव में अंबा गूजर ने थाने घूम आने की नसीहत दी। असल में यह दोनों भाई कई गांवों जैसे बेड़िया, गूगरा, बुडोल और गगबाड़ा के दलितों की जमीनों को सस्ते दामों में खरीदने में लगे हैं। अगले दिन दलित महिलाएं जब नारेती पुलिस चैकी गईं तो पुलिस वाले बोले कि पहले जांच करेंगे, तब केस लेंगे। जांच के लिए जब कैलाश (दलित) कांस्टेबल आया तो तेजाभाई-अंबाभाई ऊपर बैठे और कैलाश कांस्टेबल आंगन के बाहर नीचे बैठा। यह नजारा देखते ही दलित महिलाएं अलवर गेट थाने पहुंची, जहां थानाधिकारी ऐसे मामलों के चलते पहले से ही हेरान-परेशान पाये गए। उन्होंने ऐसी वारदातों में कमी लाने की बात पर जोर दिया।
कल्याणजी पूरे भरोसे के साथ कहते हैं- ‘‘सवर्ण हमारे 30 एकड़ के खेतों के अलावा 4 एकड़ की सरकारी जमीन भी हथियाना चाहते हैं। यहां 1 एकड़ खेत की कीमत 1 लाख के आसपास चल रही है। हमारे पास गृहस्थी चलाने का मुख्य जरिया खेती ही है। 10-15 सालों से सूखा पड़ने से खेती वैसे ही चौपट है, मजूरी के लिए पलायन करना पड़ता है, ऐसे में सर्वणों की नीयत बिगड़ने से थाने-कचहरी के चक्कर भी लगाने पड़ रहे हैं।’’ इसी साल के कुछ मामलों पर नजर दौड़ाए तो जमीन के विवाद में 12 फरवरी को मामचंद रावत और उसके लोगों ने शंकरलाल रेंगर, उसकी पत्नी कमला, बेटी संगीता, बहू ललिता, बेटे विनोद और गोपाल के साथ घर में घुसकर मारपीट की। ‘दलित अधिकार केन्द्र’ के हस्तक्षेप करने से अलवर गेट थाने में तीन महीने बाद रिपोर्ट दर्ज हो सकी, अभी तक चलान पेश नहीं हुआ। इसके बाद तेजाभाई-अंबाभाई गूजर ने रास्ता रोकने का विरोध करने वाली गीता और सोहनी को पीटा। एसपी साब के हस्तक्षेप के बाद ही रिपोर्ट लिखी जा सकी, बहुत दिनों से कार्यवाही का इंतजार है। जिन दलितों के दिलों में अपनी जमीन खो देने का डर हैं, उनमें हैं कल्याण, कैलाश, ओमप्रकाश, रतन, सोहन, छोटू, नाथ, मोहन, सुआंलाल, गोगा, घीसू, किशन, दयाल, रामचंद, रामा, हरिराम.........
रसूलपुरा का सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक ताना-बाना ऐसा है कि वर्चस्व की लड़ाई में गूजरों के साथ मुस्लिमों ने हाथ मिला लिया है। लाला शेराणी और लाला सलीम जैसे दो मुस्लिम व्यापारियों ने तो गूजरों का खुला समर्थन किया है। इसमें से एक ने तो यहां तक कह दिया कि ‘पूरा गांव उलट-पुलट हो जाएगा, अगर एक भी गूजर थाने में गया तो।’ मुस्लिम और सवर्ण-हिन्दूओं की एकता का इससे बेहतरीन उदाहरण और कहां मिलेगा ?
इधर अलवर गेट थाने के थानाधिकारी महोदय की परेशानी समझ नहीं आती है, शंकरलाल रेंगर जब रिपोर्ट लिखाने पहुंचे तो थानाधिकारी महोदय ने स्वयं समझाने की कोशिश की थी कि ‘यह थाना केवल दलितों या रसूलपुरा के लिए नहीं खोला गया है, और भी तो लोग हैं, और भी परेशानियां हैं।’ उधर रसूलपुरा में शाम 7 बजे तक जब सुआलाल भाम्बी की गाय न लौटी तो उसकी पत्नी गीता और बेटी रेणु पता लगाने गांव में घूमने लगीं। उन्हें पता चला कि बीरम सिंह ने उनकी गाय बांध रखी है। इसके बाद जिसका अंदेशा था वहीं हुआ, गाय मांगने पर गाली-गलौज और विरोध करने पर मारपीट। उस वक्त एक भी बीच-बचाव में न आया। ऐसे में जब सुआंलाल, उसकी पत्नी गीता और बेटी रेणु रिपोर्ट लिखवाने आए तो सुआलाल को बंद कर लिया गया। लेकिन ‘महिला जन अधिकार समिति’ और ‘दलित अधिकार केन्द्र’ के विरोध के बाद पुलिस सुआलाल से कहती है कि ‘गांव चलते हैं, अगर एक भी आदमी यह कह दे कि यह तेरी गाय है तो रख लेना।’ सुआलाल बोला गवाह तो एक नहीं कई हैं, लेकिन मामला केवल गाय का नहीं है, गाय तो मेरी है ही, सवाल मेरी पत्नी और बेटी को बेवजह पीटने और गाली-गलौज का है, उसका न्याय चाहिए।’ पुलिस वालों के हिसाब से ‘ऐसे तो मामला सुलझने से रहा।’ इसलिए अगली सुबह गीता और रेणु को जिला एवं सेशन न्यायधीश, अजमेर का रास्ता पकड़ना है। रात उन्हें अजमेर ही ठहरना है, सुबह होने के पहले गांव के सवर्ण उन्हें कचहरी की हकीकत बताने के लिए आते हैं, वह गाय लौटा देने का वादा भी करते हैं, मारपीट और ईज्जत के सवाल पर लेन-देन की बातें भी चलती हैं। गीता और रेणु के शरीर पर चोट के निशान ज्यादा हैं, सुबह होने में अभी बहुत देर है लेकिन दोनों ने इस बार ईज्जत से कोई समझौता नहीं करने की ठानी है। कचहरी में, कचहरी से गांव और गांव से कचहरी जाने-आने के बीच क्या होता है, कचहरी के रास्ते चलकर क्या गांव के रास्ते चला जा सकता है, गांव के रास्ते पर वापिस लौटकर क्या ईज्जत से जीया जा सकता है, ऐसे ही कुछ और किस्से हैं, अगले हिस्से में....

22.1.09

पत्थरों के रास्ते बदलाव


















शिरीष खरे


बीड़ से लौटकर

जिन दलितों से रोजाना रोटी की उलझन नहीं सुलझती थी अब वही पत्थरों के रास्ते बदलाव की तरकीब सुझा रहे हैं। जानवर चराने वाली पहाड़ियों पर ज्वार पैदा करने की सूझ अतिशेक्ति अंलकार जैसी लगती है. मराठवाड़ा में बीड़ जिले के दलितों ने `जमीन हक अभियान´ से जुड़कर जमीन का मतलब जाना और समाज का ताना-बाना पलटकर रख दिया. इन दिनों 69 गांवों की करीब 2000 एकड़ पहाड़ियां दलित-संघर्ष के बीज से हरी-भरी हैं. इस संघर्ष में औरतों ने भी बराबरी से हिस्सेदारी निभायी. इसलिए उन्हें जमीन का आधा हिस्सा मिला. इस तरह खेतीहीन से किसान हुए कुल 1420 नामों में से 710 औरत हैं.


साल पहले तक यह लोग पहाड़ों के चरवाहे कहलाते थे। यह तथ्य महाराष्ट्र के `जमीन गायरन कानून´ से मेल खाता है. इस कानून के मुताबिक 14 अप्रैल 1991 के पहले से जो परिवार ऐसी जमीन का इस्तेमाल करते हैं उन्हें वह जमीन दे दी जाए. लेकिन कानून बनने के एक दशक बाद भी लोग अनजान रहे. यह `जमीन वालों´ के असर से डरकर अपनी जमीन को `अपनी´ नहीं कह सकते थे. इसलिए `चाईल्ड राईटस एण्ड यू´ और `राजार्षि शाहू ग्रामीण विकास´ ने जब गांव-गांव तक इस कानून का संदेश पहुंचाया तो सभी ने उसे अनसुना कर दिया. लेकिन 2002 की एक मामूली प्रतिक्रिया ने बड़े संघर्ष को जन्म दे दिया. शिराल गांव के 2-3 दलित एक सुबह संगठन के आफिस आए और बोले कि हमने जबसे अपनी जमीन पर खेती की बात छेड़ी तब से सवर्ण धमकियां देते हैं. वह अपनी ताकत से हमें दबाते हैं. इसलिए संगठन आगे आए. कार्यकर्ताओं ने उन्हें समझाया कि संगठन चार रोज तुम्हारे साथ रहेगा. तुम्हें वही रहना है इसलिए वह जमीन और उसकी लड़ाई तुम्हारी ही है. उससे जो भी नफा-नुकसान होगा वह भी तुम्हारा ही होगा. सबकुछ तो सवर्णों का है इसलिए डरना तो उन्हें चाहिए. तुम्हारे पास जीने के लिए केवल एक जिंदगी है. कम से कम उस जिंदगी को तो निडर होकर जीओ. ऐसा सुनकर वह दलित अपने खेतों को आजाद कराने की बात कहकर चले गए.

इसके आगे का सिरा महेन्द्र जगतप ने जोड़ा- ``हम लोग गांवों में मिट्टी डालने और पत्थर हटाने लगे तो सवर्णों ने अचानक हमला बोल दिया. इसमें 5 लोग बुरी तरह घायल हो गए. संगठन के साथ मिलकर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज की. पुलिस कार्यवाही में 15 हमलावरों को 18 दिन जेल हुई. यह मामला कचहरी के मार्फत सुलझा.´´ इसके बाद संगठन ने शिराल गांव में जो बैठक बुलायी उसमें 2 हजार लोग इकट्ठा हुए. इसमें दलितों के साथ पारधी, भील, धनगढ़, सुतार, कुम्हार, बड़ई और लोहार समुदाय मिलकर एक हो गए. उन्होंने ``मार खाने को तैयार, जमीन छोड़ने को नहीं´´ जैसे नारे लगाकर यहां खेत बनाए और उसमें बीज डाले. वह एक-दूसरे को सुनते और उसमें गुणा-भाग लगाकर जगह-जगह लड़ने की तैयारियां करते. 8 दिन रूककर बाहरी लोग शिराल गांव से विदा हुए. तब फसल की रखवाली के लिए 35 दलित झोपड़ियां 120 एकड़ खेतों के इर्द-गिर्द बस गई. दामोदर धोरात ने बताया- ``जब पहली बार ज्वार की फसल आई तो हमारे अंदर इज्जत से जीने का सपना जागा. बढ़िया जीने की चाहत नई ऊंचाईयां छूने लगी. खेत मालिक बनने का सपना दूर-दूर तक फैल गया.´´

शिराल की लड़ाई रंग लायी और करंजी गांव के 15 दलितों ने 51 एकड़ पथरीली जमीन पर बीज रोपे. इस बार सवर्ण चुप रहे. मगर यह चुप्पी तूफान के पहले की थी. इसके बाद जहां-जहां दलितों ने खेत मालिक बनना चाहा वहां-वहां सर्वणों का अत्याचार कहर बनकर टूटा. पाठसरा में घर की कुण्डी लगायी और ऊपर की छत निकालकर मारा. भातुड़ी में सामाजिक बाहिश्कार करते हुए दाना-पानी बंद किया. धामनगांव में चोरी के झूठे मामलों के बहाने फंसाया गया. करेहबाड़ी में बस्ती और आसपास के जंगल को आग के हवाले किया. िशडाला में खेत का धान जला दिया. बेलगांव में खड़ी फसल को जानवरों के लिए छोड़ दिया. पारोडी में गेहूं की फसल काट ली और देवीगांव में खेत सहित जंगल जला डाला.

उस समय एक तरफ सवर्ण हमला करते दूसरी तरफ संगठन से जुड़े दलित पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज कराते। इस तरह पाठसरा से 250, भातुड़ी से 70, धामनगांव से 45, करेहबाड़ी से 70, शिडाला से 150, बेलगांव से 9, पारोड़ी से 70 और देवीगांव से 9 हमलावरों को गिरफ्तार किया गया। जैसे-जैसे गिरफ्तारियां बढ़ी वैसे-वैस दलितों पर हमले कम हुए. 2005 तक जातीय-संघर्ष का यह दौर पूरी तरह थम चुका था.

शिडाला के दादासाहेब बाग्मारे ने बताया- ``जब दलितों की अपनी जमीन हुई तो मजदूरों की कमी पड़ गई. ऐसे में बड़े किसानों ने मजदूरी बढ़ायी और काम के घण्टे तय किए. इससे हम छोटे किसानों को फायदा हुआ. हम अपनी खेतीबाड़ी से फुर्सत होते ही उनके खेतों के काम निपटाते. लेकिन बंधुआ मजदूर बनकर नहीं बल्कि अपनी मेहनत का सही मेहनताना लेकर. प्रभाकर सावले ने कहा- ``हम खेतों से साल भर का अनाज बचाते हैं और चारा बेचकर कुछ पैसा भी. इस तरह कई बकरियां खरीदी हैं. हम बहुत अमीर नहीं हुए लेकिन गृहस्थी की हालत पहले से ठीक है.´´ पाठसरा गांव की बैठक में सैकड़ों लोगों के साथ हम भी मौजूद हैं. यहां `संगठन´ के मतलब और मकसद पर गर्मागम चर्चा चल रही है. नमनदेव काले ने कहा- ``संगठन याने आप. अगर आपके अंदर की ताकत बढ़ती है तो संगठन खुद-ब-खुद ताकतवर होगा.´´ अप्पा बालेकर बोला- ``एक-एक से पूरा गांव और ऐसे कई गांवों से जुड़कर संगठन बनता है. संगठन के आगे आने का मतलब लोगों के आगे आने से होना चाहिए. एक के पीछे एक होने या किसी के हटने से संगठन नहीं रूकता.´´ चागदेव सांग्ले बोला- ``दूसरों के भरोसे जिया भी नहीं जा सकता. जो अपने आप चलता है वहीं संगठन है. हमें नेता नहीं, कार्यकर्ताओं चाहिए.´´ जनाबाई गरजी- ``अगर किसी गांव का संगठन पावरफुल है तो समझो वह आसपास के इलाके का पावरहाउस है.´´

करंजी गांव के मंदिर में दलितों का घुसना मना था लेकिन उर्मिला निकालजे आज वहीं की सरपंच हैं। उन्होंने बताया- ``जमीन-हक को लेकर निकलने वाली रैलियों में 10-15 हजार लोग जमा होते हैं। उन रैलियों को औरतें संभालती हैं। हम पुलिस हो या तहसीलदार, मिनिस्टर हो या कलेक्टर सबसे बतियाते हैं. अब हमारा अभियान सामुदायिक खेती के बारे में सोच रहा है. शिराल गांव की राहीबाई खंडागले ने बताया- ``ऐसी खेती में सारे खेतों की हदों को तोड़ दिया जाएगा। तब हर गांव का एक खेत होगा. इससे कम लागत और मेहनत में ज्यादा पैदावार होगी. जो फसल आएगी उसे बराबर हिस्सों में बांट दिया जाएगा. सवर्ण की सुने तो ऐसा मुश्किल है. जब हमने जमीन की लड़ाई शुरू की थी तब भी वह ऐसा ही कहते थे. हमने मिलकर 22 गांव के खेतों के लिए बाबड़ियां बनायी हैं. इसलिए सब मिलकर खेती भी कर सकते हैं.´´ पोखड़ी गांव की जनाबाई ने बताया- ``खेतों के बिना भी हमारी जिंदगी थी मगर बंधी हुई. ऊंची जाति के घरों से गुजारा चलता था. वह जैसा कहते वैसा करते. हम उनकी गंदगी उठाते. हमारे बच्चे उनके जानवरों के पीछे भागते. हमारे मर्द उनके खेतों में रात-दिन काम करते. इसके बदले साल में एक बार अनाज, उतरन के कपड़े और रोजाना बचा हुआ खाना मिलता. बारिश में जब झोपड़ियां बहती तो उनकी छतों का बाहरी हिस्सा हमारा आसरा बनता.´´ भातुड़ी गांव की अभिधाबाई धेवड़े ने कहा-``पहले बैठकों में हमें बुलाया नहीं जाता था और अब हम पंचायत का फैसला सुनाते हैं.´´

एक सदी पहले महात्मा फुले ने कहा था- ``शिक्षा बिना मति गई, मति बिना गति गई, गति बिना अर्थ गया और अर्थ बिना शूद्र बर्बाद हुए।´´ हमारी पंरपराओं ने दलितों को धन रखने की आजादी नहीं दी जिससे वह लाचार हुए. इसलिए वह सवर्णों पर निर्भर हो गए. यह निर्भरता आज तक बरकरार है. सामाजिक कार्यकर्ता बाल्मिक निकालजे ने इस स्थिति को उल्टने की बात कहते है- अगर दलितों को आत्मनिर्भर बनाना है तो उन्हें जीने के संसाधन देने होंगे। फिलहाल जमीन से बेहतर दूसरा विकल्प नजर नहीं आता. जमीन मिलते ही लोग मालिक बन जाते हैं. इसलिए बीड़ जिले के दलित आज किसी से कुछ नहीं मांगते. जमीन की यह लड़ाई स्वाभिमान से भी जुड़ी है.

जो पत्थर घास को रास्ता नहीं देता था आज वहां ख्वाहिशों की फसल है. यहां के धरतीपुत्रों ने धरती को आजाद किया और उससे जीना सीख लिया. इस तरह उन्होंने अपनी दुनिया को `सुजलाम सुभलाम मलयज शीतलाम´ बना डाला. लेकिन कानून के मद्देनजर उन्हें जमीन का पट्टा मिलना बाकी है. मतलब 15 साल गुजरने के बावजूद जमीन की लड़ाई यहां आज तक जारी है. जब तक लड़ाई पूरी नहीं होती तब तक यह कहानी भी अधूरी ही रहेगी.