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13.6.11

आरटीई का दायरा 18 साल तक बढ़ाया जाए- क्राई


नई दिल्ली !    बाल मजदूरी की समस्या के प्रभावी समाधान के लिए 18 वर्ष तक के बच्चों को शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम के दायरे में लाया जाए। यह मांग एक गैरसरकारी संगठन (एनजीओ) ने यहां विश्व बाल मजदूरी विरोध दिवस के अवसर पर सरकार से की।
क्राई (चाइल्ड राइट्स एंड यू) ने यहां दिल्ली हाट से रविवार को एक अभियान की शुरुआत करते हुए सरकार से मांग की कि कानूनन सभी क्षेत्रों से बाल श्रम समाप्त किया जाए।
क्राई की निदेशक योगिता वर्मा ने आईएएनएस से कहा, ''बाल श्रम के विरुध्द कानून सिर्फ 16 क्षेत्रों में लागू है, जबकि बाल श्रम भारत में लगभग हर क्षेत्र में है। हमारी मांग है कि कानून का दायरा बढ़ाकर इसे सभी क्षेत्रों में लागू किया जाए।''
वर्मा ने कहा कि सिर्फ 14 वर्ष तक अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करने का मतलब है कि हम आठवीं कक्षा के बाद बच्चों को बाल मजदूरी करने के लिए बाध्य कर रहे हैं। हम चाहते हैं कि 18 वर्ष तक के सभी बच्चों को मुफ्त शिक्षा मिले।

14.4.11

अन्ना, अनशन, समय और तरीका

शिरीष खरे

भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए अन्ना हजारे ने सही समय पर सही तरीका अपनाया है. अन्ना के प्रभाव और उनके समर्थकों के प्रयासों से कहीं ज्यादा देश के भीतर विश्वसनीय नेतृव्य के अभाव में छटपटा रहे आम आदमी की बैचनी ने पूरे आंदोलन को सफल बनाया है. जंतर-मंतर पर हमने प्रलोभनों से खीचा गया मेला नहीं बल्कि तंत्र को दुरूस्त करने का ऐसा लोक था जिसके पीछे न किसी राजनीतिक दल का बल था और न किसी धर्म का जोर. और तो और जिस तबके पर वोट न डालने की तोहमत लगती है वह भी यही मौजूद था. बीते एक दशक से मध्यवर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले जानकार बता रहे थे कि भ्रष्टाचार अब ऐसा मामला बन चुका है जो जनता को आंदोलित नहीं करता है. लेकिन स्थिति अब उतनी भी निराशाजनक नहीं है जितनी कि कुछ दिनों पहले हुआ करती थी. आजादी के बाद यह पहला आंदोलन है जिसमें एक कानून के समर्थन में पूरा देश एकजुट हुआ. इस आंदोलन ने भ्रष्टाचार को इस देश का सबसे बड़ा मामला बना दिया है.

जहां छोटे से आंदोलन में तनाव की स्थितियां बिगड़ते देर नहीं लगतीं वहीं इस आंदोलन में जर्बदस्त अनुशासन देखने को मिला. जंतर-मंतर पर दि-ब-दिन जनता हजारों की संख्या में जमा होती जा रही थी लेकिन पुलिस के किसी तरह की कोई शिकायत नहीं पहुंची. इन पांच दिनों में न तो आसपास के इलाके की सार्वजनिक संपत्ति को कोई नुकसान पहुंचा और न ही चोरी या अभद्रता जैसा कोई समाचार सुनने को मिला. हर दिन जनसैलाब का जुनून जैसे अपने साथ अपना संयम भी ले आया था. दूसरी ओर अन्ना हजारे के 97 घंटों के अनशन में इंटरनेट के जरिये तकरीबन 45 लाख लोगों ने आंदोलन को लेकर अपनी भावनाएं जाहिर कीं. इस दौरान गूगल इंडिया पर सबसे ज्यादा सर्च किए जाने वाले अन्ना हजारे को फेसबुक पर करीब 11 लाख लोगों ने पसंद किया. सरकार पर इतना दवाब था कि शनिवार रात को करीब 2.30 बजे सरकारी प्रेस खुलवाकर गजट अधिसूचना को प्रकाशित करवाया गया.

पूर्व कानून मंत्री और प्रारुप के लिए गठित संयुक्त समिति के को-चेयरमेन शांतिभूषण का मानना है कि देश के प्रभावशाली लोग जब भ्रष्टाचार करते हैं तो उनके खिलाफ कोई गहन जांच पड़ताल नहीं होती है. इसका एक कारण जांच एंजेसियों का किसी न किसी के दवाब में काम करना है. इससे जहां शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार बढ़ता ही जा रहा है वहीं कोई नतीजा न मिलने से जनता निराश होती जा रही है. असल में हमारे यहां भ्रष्टाचार से निपटने की कोई मजबूत व्यवस्था नहीं है. जन लोकपाल कानून इस दिशा में जनता की निराशाओं को दूर करेगी. इसमें जहां दोषी साबित होने पर भ्रष्टाचार की कमाई को जब्त करने का प्रावधान रहेगा वहीं प्रशासनिक जवाबदारी को ध्यान में रखते हुए अगर कोई अधिकारी समय पर अपना काम पूरा नहीं करता है तो उस पर जुर्माना लगाया जाएगा. कोई भी पीडि़त नागरिक लोकपाल के पास अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है और शिकायत की जांच निश्चित समयसीमा में पूरी होगी.

एक तरफ सरकार कहती रही कि वह भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने चाहती है और दूसरी तरफ से उनके प्रवक्ताओं ने लोकत्रांतिक तरीके से चुने गए प्रतिनिधियों की स्वायत्तता का सवाल उछाला. असल में अन्ना और सरकार के बीच हुआ यह समझौता असामान्य परिस्थितियों की देन है जो सरकार की भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए केवल खोखले आश्वासनों से बनी़. इन्हीं खोखले आश्वासनों के चिढ़ी जनता अन्ना के समर्थन में सड़को पर आकर संसंद पर दवाब बना रही थी. जनता यह भली भांति जानने लगी थी कि कैसे न केवल एक के बाद एक घोटाले हो रहे हैं बल्कि उनके लिए जिम्मेदार लोगों को कैसे बचाने के प्रयास भी किए जा रहे हैं.

यह आंदोलन केवल सरकार के विरोध में नहीं बल्कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के विरोध रहा. इसलिए शरद यादव, ओम प्रकाश चैटाला, उमा भारती और मेनका गांधी जैसे राजनेताओं को उल्टे पैर लौटना पड़ा जो समर्थन जताने के लिए जंतर-तंतर पहुंचे थे. लोकपाल विधेयक को लेकर लंबे समय से संघर्ष कर रहीं सामाजिक कार्यकर्ता अरूणा राय कहती हैं कि इस विधेयक की मूल भावना से हमारी किसी तरह की असहमति नहीं है लेकिन हम चाहते हैं कि जो आखिरी मसौदा बने उसमें ज्यादा से ज्यादा जनता की भागीदारी सुनिश्चित हो. अरूणा राय का मानना है कि हजारे और करोड़ों भारतीयों की भावना को देखते हुए केंद्र सरकार को चाहिए कि वह तुरंत जन लोकपाल विधेयक को कानून में बदलने का भरोसा दिलाए.

2.2.11

किशोर उम्र को मिला मकसद

कुछ बड़ा काम करने के लिए, कुछ हटके करने के लिए एक उद्देश्य होना चाहिए। अगर मकसद सामने हो और फिर उसे पाने के लिए कुछ किया जाये, तो बहुत कुछ मिल जाता है। खुद को भी, दूसरों को भी, समाज को भी। उस राह पर और कदम भी चल पड़ते हैं। धीरे-धीरे एक कारवां बन जाता है। नयी राहों पर चलने वालों का मकसद कारवां बनाना कभी नहीं होता। वह तो खुद-ब-खुद बन जाता है। पर जब वे पीछे मुड़कर देखते हैं, अपने पीछे बढ़े आ रहे बहुत से कदमों को आते देखते हैं, तो उन्हें अपने मकसद और उसकी कामयाबी से भी बड़ा अहसास होता है।

शायद संजना सांघी को भी यह अहसास हो।

18 साल की संजना मुंबई की आम जोशीली, चुलबुली किशोरियों की तरह ही दिखती है। पर वह है एकदम अलग।

अलग इसलिए, कि वह इस उम्र की आम लड़कियों की तरह केवल अपने और अपने भविष्य के बारे में ही नहीं सोचती। उसका दिल दूसरों के लिए भी धड़कता है। वह दूसरों के लिए भी सोचती है। भले ही वे 'दूसरे' एकदम अनजान क्यों न हों। उसके लिए हर कोई एक इंसान है। और इंसानियत के इसी जज्बे से वह एक नयी राह पर चल पड़ी है।

संजना ने पिछले साल जून में एक वेबसाइट www.innocenttouch.in बनायी। और इस कदम ने उसकी जिंदगी को एक मकसद दे दिया।

संजना ब्रीच कैंडी के बी.डी. सोमानी स्कूल की छात्रा है। वह भी अपनी उम्र के दूसरे किशोरों की तरह पढ़ना, घूमना और फेसबुक पर मौजूद रहना पसंद करती है। पर उसे लगा कि किशोर ऊर्जा से सराबोर होते हैं, जोश से उफनते हैं। उनकी इस ऊर्जा और जोश का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। अपनी वेबसाइट के जरिये वह किशोरों को विभिन्न एनजीओ से जोड़ती है। एनजीओ से जुड़कर वे किशोर अपनी पढ़ाई, दोस्तों के साथ गपबाजी और सोशल नेटवर्किंग से समय निकालकर दूसरों के लिए कुछ करते हैं।

दरअसल, एक साल पहले संजना के मन में आया कि किसी एनजीओ से जुड़कर समाज के लिए कुछ काम किया जाए। पर उसे यह नहीं पता था कि शुरुआत कैसे करे, किससे संपर्क करे। बस, तभी उसे अपना मकसद मिल गया। किसी तरह उसे विक्टोरिया मेमोरियल स्कूल फॉर ब्लाइंड का पता चला। वह उससे जुड़ गयी। उसे अपना जीवन सार्थक लगने लगा। उसे खयाल आया कि उसकी तरह और भी बहुत से किशोर ऐसा कुछ करना चाहते होंगे, यह उन्हें भी पता नहीं होता होगा कि कैसे शुरुआत करें, किससे संपर्क करें। उसने ठान लिया कि वह ऐसे किशोरों को राह दिखायेगी। काफी माथापच्ची के बाद उसने पांच एनजीओ चुने। उसे लगा कि किशोर इनसे जुड़कर कुछ करना चाहेंगे। और शुरू हो गई वेबसाइट। चंद महीनों में ही यह वेबसाइट दक्षिण मुंबई के विद्यार्थियों में लोकप्रिय हो गई। इसके जरिये 200 से ज्यादा विद्यार्थी सक्रिय स्वयंसेवक बन चुके हैं।

17 साल के वेदांत मुंशी को संजना की वेबसाइट से ही ' आकांक्षा ' एनजीओ का पता चला। वह उससे जुड़ गया। 16 साल की प्रीति गंगवानी शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय ' प्रथम ' के लिए काम करने लगी। सेंट जेवियर्स कॉलेज के 15 विद्यार्थियों का समूह क्राई ( चाइल्ड रिलीफ एंड यू ) से जुड़ गया।

एनजीओ भी इससे खुश हैं। उन्हें कर्मठ और उत्साही स्वयंसेवक मिल रहे हैं। स्कूलों में सभ्यता और सामाजिक जागरूकता के लिए काम कर रहे एनजीओ संस्कार इंडिया फाउंडेशन के संस्थापक किरण मदन का कहना है , ' संजना की उम्र को देखते हुए यह वेबसाइट उसकी बड़ी पहल है। उसके इस प्रयास से हमें जुनूनी कार्यकर्ता मिल रहे हैं। यह कोशिश रंग लायेगी।'

यह वेबसाइट सरल और सूचनाप्रद है। एनजीओ से जुड़कर समाज के लिए कुछ करना चाहने वालों को केवल तीन स्टेप में ही मनचाही जानकारी मिल जाती है। वेबसाइट पर एक फेसबुक पेज भी है , जिस पर 200 से ज्यादा सदस्य हैं। एक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ एफलेरॉन ने संजना को दो सप्ताह की कांफ्रेंस में एम्सटर्डम में भी बुलाया। संजना को जरा भी नहीं लगता कि वह कोई बड़ा काम कर रही है। वह मासूमियत से कहती है , ' हम सभी किसी मकसद को लेकर पैदा होते हैं। मैं भी इसमें योगदान कर सकती हूं , पर दूसरों के सहयोग के बिना नहीं। मेरा सपना है कि हर कोई किसी ना किसी के जीवन को सुंदर बनाये।

आज हमें एक नहीं , बल्कि अनेक संजनाओं की जरूरत है। अनगिनत संजनाएं चाहिएं हमें। ऐसी संजनाएं , जो अपने तमाम कामकाज , अपनी तमाम व्यस्तता और भागमभाग जिंदगी के बीच कुछ पल दूसरों के लिए भी निकाल सकें। कुछ देर ठहरकर दूसरों के लिए सोच सकें। कुछ नया कर सकें। एक शृंखला बना सकें। ऐसी शृंखला , जिसकी पहली कड़ी वे खुद बनें और फिर दूसरी कडि़यां जुड़ती चली जायें ... वह शृंखला एक सुंदर हार में तब्दील हो जाये ... और वह हार समाज में मानवीय भावनाओं को जगा दे ... उमड़ - घुमड़ पड़ें वे भावनाएं ... और इंसानियत की भीनी - भीनी खुशबू वाली बरसात हो जाए।

भारत एक युवा देश है। अगले एक दशक में युवाओं की आबादी और बढ़ेगी। ये जोश और ऊर्जा से सराबोर युवा होंगे। अगर उनके इस जोश और ऊर्जा को जागृत करके घनीभूत कर दिया जाए , उन्हें कुछ मकसद दिखा दिया जाए , तो प्रगति की दौड़ की अकल्पनीय और अविश्वसनीय तेजी नजर आयेगी।

भले ही संजना को इसका अहसास नहीं है , पर इस सबमें आखिर उसका भी तो योगदान होगा ही!

7.10.10

बिहार चुनाव : कहां गए बच्चे

शिरीष खरे





बिहार के विधानसभा की घमाचान में हर पार्टी के झोले के भीतर से एक-एक करके हर एक के लिए मुद्दे ही मुद्दे और नारे ही नारे बाहर आ रहे हैं. मगर बच्चों के लिए इस बार भी कोई मुद्दा और नारा नहीं गूंज रहा है. ऐसे में क्राई ने बच्चों के मुद्दों को सूचीबद्ध करते हुए सभी राजनैतिक दलों से बच्चों के अधिकारों को वरीयता देने के लिए संवाद का सिलसिला शुरू किया है. इसके तहत बाल अधिकारों का एक घोषणा-पत्र तैयार किया जा चुका है और अब बच्चों के मामले में राजनैतिक दलों पर जल्द से जल्द अपना-अपना रूख स्पष्ट करने के लिए दबाव बनाना भी तय हुआ है.

इस बारे में क्राई से विकास सहयोग विभाग के वरिष्ठ प्रबंधक शरदेन्दु बंधोपध्याय बताते हैं कि "राज्य में चुनावी माहौल के दौरान हम याद दिलाना चाहते हैं कि यहां आबादी का एक चौथाई हिस्सा 18 साल से कम उम्र का होने के चलते वोट नहीं डालता है. 2001 जनगणना के अनुसार बिहार में 3 करोड़ 40 लाख बच्चे हैं. ऐसे में मतदाता और प्रत्याशी के रुप में हमारी जवाबदारी बनती है कि राजनैतिक फलक से बच्चों के जुड़े हुए हितों को भी प्रमुखता से उठाया जाए." लोकतंत्र में किसी पार्टी की ताकत उसके वोट-बैलेंस से बनती-बिगड़ती है और पार्टी का एजेंडा इस वोट-बैलेंस को घटाने-बढ़ाने में खास भूमिका निभाता है. मगर बच्चे वोट-बैलेंस नहीं होते हैं इसलिए बच्चों के हितों का प्रतिनिधित्व बड़ों के हाथों में होता है.

शरदेन्दु बंधोपध्याय बताते हैं कि ‘‘राज्य में बच्चों की एक बहुत बड़ी संख्या होने के बावजूद राजनैतिक दलों द्वारा बच्चों और उनके मुद्दों को लगातार नजरअंदाज बनाया जाता रहा है. इसलिए अबकि बार हमने मीडिया के जरिए बच्चों के मुद्दों को लेकर मतदाताओं और प्रत्याशियों के बीच पहुंचना का सोचा है. हम इस चुनाव में जहां वोटर से बच्चों के अधिकारों के लिए वोट डालने की अपील करेंगे, वहीं प्रत्याशियों को यह याद दिलाना चाहेंगे कि अगर वह जीते तो अपनी जीत को बच्चों की जीत के तौर पर भी याद रखें." इस दौरान चुनाव के उम्मीदवारों से सीधा संपर्क साधा जाएगा और उन्हें घोषणा-पत्र के बारे में बताया जाएगा. साथ ही यह भी देखा जाएगा कि उम्मीदवारों के पास बच्चों के मुद्दे हैं भी या नहीं और अगर हैं भी तो इस रूप में हैं.

बिहार में बच्चों के मुद्दों को प्रमुखता देना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि बिहार के 58 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे कुपोषित पाये गए हैं, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर कुपोषित बच्चों का आकड़ा 46 प्रतिशत है. हर साल जन्म लेने वाले 1000 बच्चों में से 61 की मौत हो जाती है, जो दर्शाता है कि यह राज्य शिशु मृत्यु-दर के मामले में दूसरे राज्यों के मुकाबले कितना दयनीय है. बिहार के ग्रामीण इलाके में एनीमिया से पीडि़त बच्चों की संख्या पहले 81 प्रतिशत थी जो बढ़कर 89 प्रतिशत हो गई है. औसत से कम वजन के बच्चों की सबसे ज्यादा संख्या के मामले में बिहार को देश के पांच राज्यों के साथ गिना जाता है. केवल 33 प्रतिशत बच्चों का ही टीकाकरण होता हैं. 51.5 प्रतिशत लड़कियों का विवाह 18 साल से पहले हो जाता है. केवल 47 प्रतिशत पुरूष और 33 प्रतिशत महिलाएं ही साक्षर हैं यानी साक्षरता दर के मामले में बिहार सबसे नीचे है. जबकि मानव विकास सूचकांक के मामले में भी सबसे पिछड़ा राज्य बिहार (0.367) ही है.

क्राई वोट मांगने वाले राजनैतिक दलों के उम्मीदवारों से यह तयशुदा करने के लिए कहेगा कि सभी बच्चे स्कूल में हों और उन्हें पूरी स्कूली शिक्षा प्राप्त हो. सभी बच्चों के लिए पर्याप्त पोषण मिले और उन्हें समान अवसर प्राप्त हों. बच्चों को बाल मजदूरी, शोषण और तशकरी से बचाने के प्रयासों में तेजी लायी जाए. सरकार की जवाबदेही का मूल्यांकन करते हुए अगर जनता बच्चों के अधिकारों को वरीयता दे तो बाल अधिकार को राज्य के राजनैतिक एंजेडे में खास स्थान प्राप्त हो सकता है और उन्हें भोजन, स्वास्थ्य, आवास, शिक्षा, सुरक्षा और खेल से जुड़े अधिकारों की उचित हिस्सेदारी भी. बच्चों को उनके अधिकार समान रुप से मिल सकें इसके लिए उन्हें दूसरे नागरिकों की तरह ही समान रुप से देखे जाने की भी जरूरत है.

क्राई यह मानता है कि गरीबी, पलायन और विस्थापन बच्चों के विकास को रोकता है. इसके लिए संतुलित विकास का होना जरूरी है. कमजोर तबकों के लिए स्थानीय स्तर पर आजीविका के विकल्प के रूप में जमीन देने और बचाने की प्रक्रिया को अपनाने की जरुरत है. भूमि सुधार की ऐसी नीतियां शामिल की जाएं जिससे पलायन रूके और बच्चों को अपने समुदायों तथा क्षेत्रों में ही विकास के मौके मिलें. हर एक के लिए घर, रोजगार और समान वेतन तय हों जिससे बच्चों के अधिकारों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो सके. गरीब किसानों के लिए कृषि-नीति पर दोबारा सोचा जाए और खास तौर से असंगठित मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा देने की नीति को बढ़ावा दिया जाए.

क्राई अपने तजुर्बों के आधार पर यह मानता है कि तकनीकी तौर पर बहुत सारे बच्चे ऐसे हैं जो हाशिए पर होते हुए भी गरीबी रेखा के ऊपर हैं. जब हम गरीबी को ही वास्तविकता से कम आंक रहे हैं तो सरकारी योजनाओं और बजट में खामियां तो होंगी ही. इसलिए हालात पहले से ज्यादा बदतर होते जा रहे हैं. बच्चों की गरीबी केवल उनका आज ही खराब नहीं करता बल्कि ऐसे बच्चे बड़े होकर भी हाशिये पर ही रह जाते हैं. ऐसे में उम्मीदवारों को चाहिए कि वह राज्य में बच्चों की संख्या के हिसाब से सार्वजनिक सेवाओं जैसे प्राथमिक उपचार केन्द्र, आंगनबाड़ी, स्कूल, राशन की दुकानों के लिए और अधिक पैसा खर्च करने पर जोर देंगे.

28.12.09

शिक्षा से जुड़ी मांगों का चार्टर अब राष्ट्रपति के हाथों में

शिरीष खरे

क्राई के एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से मुलाकात कर बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 में व्याप्त कमियों पर चर्चा की। इस प्रतिनिधिमंडल ने भारत के सभी बच्चों को शिक्षा के अधिकार से जोड़ने के लिए अधिनियम में जरूरी संशोधन किए जाने की वकालत भी की।

इस दौरान राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को वह चार्टर भी सौंपा गया जिसमें देशभर से करीब 8 लाख नागरिकों ने शिक्षा के अधिकार अधिनियम में जरूरी संशोधन किए जाने की मांग का समर्थन किया था। क्राई का मानना है कि बच्चों को उनके मूलभूत अधिकारों से जोड़ने और उनके बीच की असमानताओं को घटाने के लिए अधिनियम में कुछ बातों को शामिल करना होगा। अगर अधिनियम और उसके प्रावधानों में यह संशोधन नहीं हुए तो भारत के बहुत सारे बच्चे शिक्षा जैसे मूलभूत अधिकार से बेदखल होते रहेंगे।

राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने प्रतिनिधिमंडल की बातों को गंभीरता से लेते हुए यह माना कि "शिक्षा तो मानवीय विकास की बुनियाद है और हर भारतीय बच्चे तक बेहतर शिक्षा पहुंचनी ही चाहिए।" क्राई की डायरेक्टर पूजा मारवाह के मुताबिक ‘‘हमने राष्ट्रपति के साथ 'सबको शिक्षा समान शिक्षा अभियान' से जुड़ी बहुत सारी बातों को साझा किया। हमने उन्हें बताया कि इस अभियान को देशभर में 18 राज्यों के करीब 8 लाख ऐसे नागरिकों का समर्थन मिला है जो चाहते हैं कि सभी भारतीय बच्चों के बीच एक समान और बेहतर गुणवत्ता वाली शिक्षा व्यवस्था कायम हो। अब हमारी कोशिश यह है कि सरकार हमारी मांगों को माने, जिससे शिक्षा का अधिकार महज कागजी शेर बनकर न रह जाए और यह जमीनी स्तर पर भी अपना असर दिखा पाए।’’ उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘भारतीय बच्चों के नजरिए से शिक्षा के अधिकार का यह अधिनियम मील का पत्थर साबित हो सकता है, बशर्ते इस अधिनियम में छिपी संभावनाओं को व्यापक स्तर पर देखा और समझा जाए तो।’’

क्राई के प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के सामने शिक्षा के अधिकार अधिनियम में जिन मांगों को शामिल किए जाने पर जोर दिया है, उनमें खास हैं : (एक) 6 साल से नीचे और 15 से 18 साल तक के बच्चों को भी मुख्य प्रावधान में लाया जाए। (दो) हर बस्ती से 1 किलोमीटर के भीतर योग्य शिक्षक और सुविधायुक्त स्कूल हों। (तीन) सकल घरेलू उत्पाद का 10 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च हो।

14.12.09

सबको शिक्षा समान शिक्षा अभियान को उम्मीद से ज्यादा जनसमर्थन

शिरीष खरे

मुंबई / चाईल्ड राईटस एण्ड यू ने बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम में संशोधन किए जाने को लेकर जो हस्ताक्षर अभियान छेड़ा था उसे उम्मीद से ज्यादा जनसमर्थन मिला है। सबको शिक्षा समान शिक्षा के नाम से चलाया गया यह देशव्यापी अभियान अब अपने आखिरी पड़ाव पर है। जैसे कि उम्मीद की जा रही थी कि इस अभियान से देशभर के करीब 5 लाख लोग जुड़ेंग मगर जो नतीजा मिला है उसके मुताबिक 11 दिसम्बर तक 18 राज्यों के 20 शहरों, 6700 मलिन बस्तियों और गांवों से करीब 8 लाख लोगों ने चार्टर पर हस्ताक्षर किए हैं।


14 नंवबर याने बालदिवस के मौके पर चाईल्ड राईटस एण्ड यू ने सबको शिक्षा समान शिक्षा अभियान की शुरूआत की थी। इस अभियान का मकसद देश के नागरिकों की भागीदारी से बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम-2009 में संशोधन करवाना और खास तौर से 3 मांगों को मनवाने के लिए दबाव बनवाना था। इस अभियान को अपनी शुरुआत से ही भारी जनसमर्थन मिलने लगा था।


इस दौरान चार्टर पर हस्ताक्षर करवाने के साथ-साथ बच्चों से संबंधित अनेक गतिविधियां की आयोजित की गईं जैसे- हैदराबाद, बैंगलौर और चेन्नई में बच्चों द्वारा अपनी समस्याओं पर जनसुनवाईयां हुईं। मुंबई में बसों के जरिए कई जगहों पर पहुंचकर, बसों में ही बच्चों की कार्यशालाएं हुईं । कलकत्ता और भुवनेश्वर में नुक्कड़ नाटक हुए। दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान से करीब 1 हजार नागरिकों ने सबको शिक्षा के अधिकार के समर्थन में पैदल मार्च किया। इस कार्यक्रम में बाल समूह के अध्यक्ष 13 वर्षीय महेन्द्र रजक, कभी बाल मजदूर करने वाली 12 वर्षीय अस्मिना शाह, भोजन के अधिकार अभियान के जिआन द्रेज, बिराज पटनायक, सामाजिक कानूनविद अशोक अग्रवाल और क्राई की पूजा मारवाह शामिल हुए। इस मौके पर मोमबत्तियों को जलाकर गीत गाये गए। इसी तरह देशभर से बाकी हिस्सों में भी रैली और जनजागरण से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम हुए।


चाईल्ड राईटस एण्ड यू द्वारा हस्ताक्षर चार्टर को अब राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केन्द्र सरकार के मंत्रियों, राज्य के मुख्यमंत्रियों और सभी महत्वपूर्ण अधिकारियों के सामने रखा जाएगा और उनसे  > 6 साल से नीचे और 15 से 18 साल तक के बच्चों को भी अधिनियम में जगह देने,  >> हर बस्ती से 1 किलोमीटर के भीतर योग्य शिक्षक और सुविधाजनक स्कूल होने और  >>> सकल घरेलू उत्पाद का 10 % शिक्षा पर खर्च करने के लिए कहा जाएगा।


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संपर्क : shirish2410@gmail.com

16.11.09

सिर्फ साक्षर बनाने से कुछ नहीं होगा

शिरीष खरे

मुंबई में बाशीनाका के पास रहने वाली 11 साल की चेन्या इसी इलाके के बाकी लोगों की तरह ही एक मजदूर परिवार से है। जहां चेन्या का बड़ा भाई पटेलनगर की एक होटल में काम करने जाता है वहीं चेन्या पढ़ने के लिए अपने घर से 3 किलोमीटर दूर ‘नेशनल केमीकल फरटीलाइजर कालोनी’ के एक निगम स्कूल में जाती है। मगर इसी साल ‘शिक्षा का अधिकार विधेयक’ पारित होने के बाद वह भी प्राइवेट स्कूल जा सकती है। विधेयक में चेन्या जैसी बच्चियों के लिए 25 प्रतिशत कोटा जो तय किया गया है। फिर भी ऐसा क्यों है कि चेन्या के पिता विठ्ठल भाई बहुत खुश नहीं दिखते ?

विठ्ठल भाई 10 साल पहले रोजीरोटी की तलाश में शोलापुर जिले के गुलबरका गांव से मुंबई चले आए थे। विठ्ठल भाई मानते हैं कि अगर चेन्या प्राइवेट स्कूल में जाए भी तो अमीर बच्चों की अमीरी देखकर वहां खुलकर नहीं पढ़ पाएगी। वह चाहते हैं कि निगम के स्कूलों में ही प्राइवेट स्कूल जैसी ही पढ़ाई हो और बच्चों को बाहरवीं तक शिक्षा की गारंटी भी। इससे गरीब बच्चे न केवल बेहतर बल्कि आत्मविश्वास और ईज्जतदार तरीके से भी पढ़ सकेंगे। ऐसी आपत्तियां विठ्ठल भाई जैसे गरीब लोगों की ही नहीं हैं, बच्चों के हकों से जुड़े कई शिक्षाविदों और कार्यकर्ताओं भी यही राय है। यह सभी ‘शिक्षा के अधिकार विधेयक’ को बहुत सारी खामियों से भरा विधेयक मानते हैं।

क्राई याने ‘चाईल्ड राईटस् एण्ड यू’ का मानना है कि 6 साल से नीचे और 15 से 18 साल के बच्चों को छोड़ देने से विधेयक अपना मकसद खो देता है। 6 साल से नीचे ही 6 करोड़ 70 लाख बच्चे हैं, जिन्हें 1993 में सर्वोच्च न्यायालय ने मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की गांरटी दी थी। जबकि इस विधेयक में उनका हक़ कट हो गया है। यह तो सभी बच्चों को शिक्षा के हक देने की बजाय पूर्ण शिक्षा की गारंटी में कटौती करने वाला विधेयक है। आमतौर पर बच्चे 3 साल में स्कूल जाने लगते हैं मगर बड़ी हैरत की बात है की शिक्षा का हक उनके लिए नहीं होगा। दूसरी तरफ यह विधेयक तकनीकी और उच्च शिक्षा लेने की योग्यता और अवसर नहीं देता है। क्योंकि ज्यादातर तकनीकी शिक्षा बारहवीं के बाद ही की जाती है मगर विधेयक उन्हें आठवीं तक ही शिक्षा देने की बात कह रहा है। मौजूदा हालातों के हिसाब से आठवीं तक की पढ़ाई बच्चों के विकास के लिए काफी नहीं मानी जाती। ऐसे में विधेयक को पढ़कर लगता है कि सरकार की दिलचस्पी जैसे शिक्षा की बजाय साक्षरता बढ़ाने तक हैं। इसी तरह सरकार की कई योजनाओं के अर्थ अलग-अलग हैं। जिसमें से भी बहुत सी तो सिर्फ साक्षरता बढ़ाने के लिए ही चल रही हैं।

सरकारी स्कूलों और शिक्षकों की गुणवत्ता में सुधार से लेकर राज्य द्वारा शिक्षा पर मुनासिब खर्च किए जाने जैसी बातों को विधेयक के भीतर नहीं रखा गया है। इसके अलावा शारारिक और मानसिक तौर से विकलांग बच्चों के हकों के लिए लड़ने वाले कई कार्यकर्ता भी इस विधेयक से संतुष्ट नहीं हैं। क्योंकि विधेयक में एक तो ‘चिल्ड्रन विद डिसेबिलिटी’ शब्द में संशोधन नहीं किया गया है और दूसरा ऐसे बच्चों के हक दिलाने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर डाल दी गई है।

इस विधेयक में वित्तीय जवाबदारियों के मद्देनजर केन्द्र और राज्य सरकारों की भूमिकाओं के बारे में साफ-साफ नहीं किया गया हैं। शिक्षा के बुनियादी हक के हनन पर यह विधेयक उल्टा अदालत जाने से रोकता है। क्योंकि इसमें साफ कहा गया है कि अगर कोई शिकायत हो तो ‘नेशनल कमीशन फार दा प्रोटेक्शन आफ चाइल्ड राईटस’ के पास जाए। जबकि इसके पास कोई न्यायिक अधिकार ही नहीं है।

क्राई इन तथ्यों पर रौशनी डाल रहा है कि भारत की 53 प्रतिशत बस्तियों में ही स्कूल हैं। यहां 40 करोड़ बच्चों में से आधे स्कूल नहीं जा पाते हैं। इसके बावजूद पिछले बजट में बच्चों के हकों से जुड़े कई शब्दों से लेकर ‘सर्व शिक्षा अभियान’ और ‘मिड डे मिल’ जैसे योजनाओं को अपेक्षित जगह नहीं दी गई। कुल बजट में 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी तो की गई मगर बच्चों की शिक्षा पर महज 10 प्रतिशत की ही बढ़ोतरी हुई। याने आमतौर पर बढ़ोतरी दर में से बच्चों की शिक्षा में 15 प्रतिशत की कमी हुई। वह भी ऐसे हालातों में जब भारत 2015 तक स्कूली शिक्षा का लक्ष्य पूरा नहीं कर सकता है।

ई का मानना है कि आबादी का इतना बड़ा हिस्सा मतदान में दूर रहने के चलते राजनैतिक तौर से उपेछित रहता है। इसलिए संस्था ने बच्चों के हकों से जुड़े सवालों को राजनैतिक एजेण्डों से जोड़ने के लिए समय-समय पर जन अभियान चलाया है। इस कड़ी में उसने ‘सबको शिक्षा समान शिक्षा’ नाम से एक राष्ट्रव्यापी अभियान छेड़ा दिया है। इसी तरह लोकसभा चुनाव के समय भी क्राई ने बच्चों के हक को मुद्दा बनाया था। इसके लिए चार्टर तैयार करते हुए उम्मीदवारों और जनता से बच्चों की जीत के लिए वोट मांगे थे। इस दौरान संस्था ने 18 साल से नीचे के सभी किशोरों को बच्चा मानकर उन्हें बच्चों के सभी हक दिए जाने की मांग को बुलंद किया था। जिससे बच्चों पर असर डालने वाली सभी नीतियों और कानूनों में मौजूद असंतुलन को दूर किया जा सके। इसी तरह समाज में जो असंतुलन है, वही तो स्कूल की चारदीवारी में हैं। कुल मिलाकर नीति, कानून और समाज से स्कूल में घुसने वाले उन कारणों को तलाशना होगा जो ऊंच-नीच की भावना को बढ़ाते हैं। अगर समाज में समानता लानी ही है तो सबसे अच्छा तो यही रहेगा कि इसकी शुरूआत शिक्षा और बच्चों से ही की जाए।

13.11.09

सबको शिक्षा समान शिक्षा के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियान

शिरीष खरे









मुंबई। बालदिवस के मौके पर क्राई ने एक 'सबको शिक्षा समान शिक्षा' नाम से राष्ट्रव्यापी अभियान छेड़ा है जिसमें सभी लोगों को एक घोषणापत्र में हस्ताक्षर करने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है। इसके बाद घोषणपत्र को सरकार के सामने रखा जाएगा और बच्चों की निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 में 3 संशोधनों के लिए कहा जाएगा।


क्राई की तीन मांगों में से पहली यह है कि 6 साल से नीचे और 15 से 18 साल तक के बच्चों को भी मुख्य प्रावधान में लाया जाए। दूसरी, हर बस्ती से 1 किलोमीटर के भीतर योग्य शिक्षक और सुविधायुक्त स्कूल हों। तीसरी, सकल घरेलू उत्पाद का 10 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च किया जाए।

क्राई के मुताबिक इस अधिनियम में ऐसी बहुत सारी कमियां हैं जो बच्चों को उनके बुनियादी हकों से बेदखल करती हैं और उनके बीच की असमानताएं बढ़ाती हैं। इसलिए संस्था ने तय किया है कि वह शिक्षा अधिनियम में संशोधन के लिए जनता का समर्थन लेगी और इस तरह से सरकार का ध्यान खीचेगी। यह घोषणापत्र राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केन्द्र सरकार के मंत्रियों और सभी राज्यों के महत्वपूर्ण अधिकारियों के सामने पेश किया जाएगा।

क्राई की डायरेक्टर योगिता वर्मा सहगल ने इस अभियान के बारे में बताया है कि ‘‘आगामी शीतकालीन सत्र हमें सरकार से यह कहने का एक मौका देता है कि अधिनियम और उसके प्रावधानों में संशोधन किए बगैर देश के हर बच्चे तक उसके अधिकार नहीं पहुंच सकते हैं। इसे देखते हुए क्राई ने 18 राज्यों के अपने 200 से भी ज्यादा ग्रासरूट एनजीओ को साथ लिया है और 6700 बस्तियों मे यह हस्ताक्षर अभियान शुरू किया है। हम देश के कई हिस्सों में बहुत से कार्यक्रम करेंगे और नागरिकों को इस अधिनियम में मौजूद कमियों के बारे में बताएंगे। हम उनसे कहेंगे कि वह इस अभियान में भाग लेकर बच्चों के अधिकारों के लिए सरकार पर दबाव बनाएं। हमें उम्मीद है कि इस घोषणापत्र पर देश भर से 5 लाख से ज्यादा नागरिक हस्ताक्षर करेंगे।’’

क्राई ने शिक्षा अधिनियम में संशोधन की जरूरत को बतलाने के लिए 500 से ज्यादा गांवों और 22 से ज्यादा शहरों में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करने का फैसला लिया है। उत्तरप्रदेश के इलाहाबाद और बनारस के कई झुग्गी बस्तियों में बच्चों के ऐसे कार्यक्रम हो भी चुके हैं।

11 दिसम्बर को यह अभियान पूरा होगा। 11 दिसम्बर की तारीख बच्चों के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन की सालगिरह के चलते खास मानी जाती है। देशभर से नागरिकों के हस्ताक्षर करने के बाद इस घोषणापत्र को एक प्रतीकात्मक पुस्तिका के तौर पर राष्ट्रपति के हाथों में सौपा जाएगा।

22.4.09

आपका वोट और बच्चों की जीत

शिरीष खरे
यह चुनाव का वक्त है और हर पार्टी का उम्मीदवार वोटर को अपनी तरफ खींचना चाहता है. लेकिन बच्चों से जुड़ा एक भी नारा नहीं गूंजता. ऐसे में चाईल्ड राईटस् एण्ड यू याने क्राई ने बच्चों के हक को मुद्दा बनाया है. क्राई ने बच्चों के हक के लिए चार्टर तैयार किया है. इस चार्टर में बच्चों की शिक्षा पर जीडीपी का 10 प्रतिशत और स्वास्थ्य पर 7 प्रतिशत हिस्सा खर्च करने की मांग हुई है.
लोकतंत्र है तो चुनाव है और चुनाव है तो वोट. किसी पार्टी की ताकत उसका वोट-बैलेंस है. हर पार्टी का एजेंडा उसके वोट-बैलेंस के घटने-बढ़ने में खास भूमिका निभाता है. लेकिन बच्चे 18 साल के नहीं होते इसलिए वोट नहीं देते. इसलिए एक भी पार्टी को इस 40 करोड़ आबादी की फ्रिक नहीं रहती. इस बार क्राई ने आपके वोट से बच्चों के जीत की उम्मीद जतायी है. संस्था की इला डी हुक्कू ने बताया- ‘‘हम और हमारे सहयोगी चुनाव के उम्मीदवारों से सीधा संपर्क कर रहे हैं. हम उन्हें इस चार्टर के बारे में बता रहे हैं. हम यह भी देख रहे हैं कि उम्मीदवारों के पास बच्चों के मुद्दे हैं भी या नहीं.’’
क्राई के ही दीपांकर मजूमदार ने कहा- ‘‘हम चाहे उम्मीदवार बने या मतदाता, हमारी जिम्मेदारी है कि हम देश की एक चौथाई आबादी के मुद्दों को पोलिटिकल एजेंडों में शामिल करें. इस तरह बच्चों को उनके बचपन से जुड़े सभी हक मिल सकेंगे.’’
क्राई मानता है कि हर साल 1,000 शिशुओं में से 70 की मौत हो जाती है. 5 साल से कम उम्र का हर दूसरा बच्चा कुपोषण का शिकार बन रहा है. 52 प्रतिशत बच्चों के नाम स्कूलों से गायब हैं. बच्चों के हितों का प्रतिनिधित्व बच्चों की बजाय बड़ों के हाथों में होता है. इसलिए आपका वोट बच्चों की आवाज बुलंद कर सकता है. आपका एक फैसला बच्चों को स्कूलों का रास्ता दिखा सकता है. वह अपनी पढ़ाई पूरी कर सकते हैं. उन्हें सम्मान से जीने का वादा मिल सकता है. उन्हें श्रम, शोषण और तस्करी से छुटकारा मिल सकता है. इस तरह आप बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, सुरक्षा, भोजन और खेलने का हक पाने में मददगार बन सकते हैं.
बाल हक चार्टर में
बच्चा होने की एक ही परिभाषा हो. इसमें 18 साल से कम उम्र के सभी लोगों को बच्चा माना जाए. इससे बच्चों पर असर डालने वाली सभी नीतियों और कानूनों में असंतुलन नहीं रहेगा. बच्चों की शिक्षा पर जीडीपी का 10 प्रतिशत और स्वास्थ्य पर 7 प्रतिशत हिस्सा खर्च हो. 6 से 18 साल तक के बच्चों को पड़ोस के स्कूलों में दाखिला मिले. 6 साल से कम उम्र के बच्चों को आंगनवाडी की सुविधा हो. बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का हक देने वाले बिल में जरूरी फेरबदल हो. इससे बच्चों की शिक्षा की मूल भावना साकार हो सकेगी. शिक्षा में निजीकरण बंद हो. सभी प्राइमरी स्कूलों में बेहतर गुणवत्ता का मिड-डे-मिल दिया जाए. इसमें स्कूल न जाने वाले बच्चों को भी जोड़ना होगा. इसे पूरे साल चलाया जाए.
कृषि सहित सभी क्षेत्रों में हर प्रकार की बाल-मजदूरी को पूरी तरह रोका जाए. बाल-मजदूरों और कामकाजी बच्चों को औपचारिक शिक्षा में लाया जाए. घरों में काम-काज और बच्चों की देखभाल करने वाली लड़कियों पर खास ध्यान दिया जाए. नेशनल चाईल्ड पोलिसी (1974) की दोबारा समीक्षा की जाए. संविधान और संयुक्त राष्ट्र के बाल हक कन्वेंशन के मुताबिक इसका दायरा बढ़ाया जाए. भोजन की सुरक्षा और उसके अधिकारों की बात करने वाली नीति लागू हो. ऐसे कानून बनाए जाएं जिससे कोई बच्चा कुपोषण का शिकार न बने. गरीबी रेखा को तय करने वाले पैमानों पर दोबारा सोचा जाए. पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम में गरीबों को अनाज देने वाले पैमानों पर भी दोबारा सोचा जाए. बच्चों के यौन शोषण और उनकी तस्करी रोकने के लिए असरदार कानून हो. विकलांग बच्चों को भी बराबरी से जीने के मौके मिलें.
बाल हक से जुड़े मुद्दे
विस्थापन बच्चों के विकास को रोकता है। इससे शोषण की आशंकाएं पनपती हैं. इसलिए कमजोर तबकों का विस्थापन और असंतुलित विकास को रोका जाए. कमजोर तबकों की जमीन बचाने के लिए सेज एक्ट-2005 में बदलाव हो. पुनर्वास की बेहतर नीति बनायी जाए. शहरी गरीबों के लिए आवास का हक कारगर ढ़ंग से लागू करने के लिए जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन का फिर से गठन किया जाए. इसमें निजीकरण पर जोर देने की बजाए सरकार को विकास की जबावदारी खुद लेनी होगी.
भूमि सुधार की ऐसी नीतियां अपनायी जाएं जिससे माईग्रेशन रूके. इससे बच्चों को अपने समुदाय और क्षेत्रों में ही विकास के मौके मिलेंगे. तटीय इलाकों के रहवासियों के पंरपरागत हकों को बचाने के लिए कोस्टल जोन मैनेजमेंट-2006 को हटाया जाए. इसके बदले कोस्टल जोन रेगूलेशन-1991 को अपनाया जाए. जनजातियों को वनों के इस्तेमाल का हक देने के लिए वनवासी एक्ट-2006 को लागू किया जाए. पेट्रोलियम, केमीकल एण्ड पेट्रोकेमीकल इन्वेस्ट एरिया एक्ट-2003 को हटाया जाए. हरेक के लिए घर, रोजगार और समान वेतन तय हो. इससे बच्चों के हक सुरक्षित होंगे. गरीब किसानों के लिए कृषि-नीति पर दोबारा सोचा जाए. असंगठित मजदूरों सहित सभी को सामाजिक सुरक्षा दी जाए. सांप्रदायिकता का विरोध हो और हर हाल में मानवीय हकों को बचाया जाए.
क्राई का नेटवर्क
क्राई का एक बड़ा नेटवर्क होने से इस केम्पेन को बढ़ावा मिल रहा है. क्राई पिछले 30 सालों से गरीब बच्चों और उनके समुदाय से जुड़ा रहा है. यह 18 राज्यों के 5,000 गांव और झुग्गियों में काम कर रहा है. यह लिंग, जाति, आजीविका और विस्थापन की तह तक जाता है. यह भूख, गरीबी, बेकारी, शोषण और अत्याचार से लड़ता है.
क्राई ने 2006-07 को 5,250 गांवो और बस्तियों के 4,97,343 बच्चों के साथ काम किया. क्राई ने समुदाय के साथ बंद पड़े 143 प्राइमरी स्कूलों को दोबारा चालू किया. क्राई ने शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए लगातार जोर दिया. इसका नतीजा है कि 192 प्राइमरी स्कूलों में 1 भी बच्चा ड्रापआउट नहीं हो सका. क्राई ने 317 पंचायत शिक्षा समितियों को सक्रिय बनाया. 22,736 बच्चों को प्राइमरी स्कूलों तक लाकर शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा. इसलिए अबकि चुनाव में बच्चों के हक को मुद्दा बनाते ही क्राई को भरपूर समर्थन मिलने लगा है.