29.4.11

मप्र में 60 फीसदी से ज्यादा बच्चे कुपोषित: क्राई

नई दिल्ली/भोपाल. मध्य प्रदेश एक बार फिर गलत वजह से चर्चा में है। ताजा मामला राज्य में बच्चों के कुपोषण को लेकर है।

बच्चों के अधिकारों की वकालत करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) ने मध्य प्रदेश के दस जिलों में किए गए सर्वे के आधार पर दावा किया है कि यहां कुपोषित बच्चों की संख्या 60 फीसदी से ज्यादा है।

क्राई का कहना है कि पूरे राज्य में आदिवासी समुदाय के 74 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। चौंकाने वाला तथ्य तो यह है कि राजधानी भोपाल की पुनर्वास कॉलोनियों के 49 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार पाए गए हैं।

संस्था के प्रदेश में इस सर्वे को पूरा करने वाले विकास संवाद के प्रशांत दुबे का कहना है कि सिर्फ रीवा जिले में अकेले 83 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार पाए गए हैं।

रीवा में 2006 से 2009 के बीच करीब 15 हजार बच्चों की कुपोषण से मौत हो चुकी है जबकि अन्य जिलों में भी कुपोषित बच्चों का आंकड़ा सरकारी आंकड़े से बहुत अधिक है।

संस्था द्वारा राजधानी भोपाल की पुनर्वास कॉलोनियों में कराए गए शोध के आंकड़े और भी ज्यादा चौंकाने वाले मिले हैं। भोपाल के लगभग 11 रिसेटमेंट कॉलोनियों से इकट्ठा किए गए आंकड़ों से पता चला है कि यहां के 49 फीसदी बच्चे कुपोषण से ग्रसित हैं। जबकि इन्हीं इलाकों के 20 फीसदी बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार पाए गए हैं।

दिल्ली में क्राई की निदेशक योगिता वर्मा का कहना है कि भले राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान राज्य के सभी महिलाओं के मामा होने का दावा करें। लेकिन वे अभी भी राज्य के मासूम बच्चों को कुपोषण से निजात दिलाने में नाकाम साबित हुए हैं।

राज्य बच्चों के बेहतर देखभाल के लिए जरूरी आंगनबाड़ी का भी पूरी इंतजाम नहीं करा पाए हैं। अभी भी पूरे मध्य प्रदेश में लगभग 47 प्रतिशत आंगनबाड़ियों की कमी हैं।

क्राई की निदेशक ने आगे कहा कि राज्य सरकार को सबसे पहले यह कबूलने की जरूरत है कि यहां कुपोषित बच्चों की संख्या सरकारी आंकड़े से कहीं अधिक है, तभी इसे रोकने की सही शुरुआत हो सकेगी।

क्राई के एक अन्य सदस्य आरबी पाल का कहना है कि राज्य में रहने वाले आदिवासी समुदाय के लगभग 74 फीसदी बच्चे भी कुपोषण के शिकार पाए गए हैं।

आरबी का कहना है कि अगर राज्य में कुपोषण को हटाना है तो सरकार को तुरंत आंगनबाड़ी और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत चलने वाले योजनाओं को दुरुस्त करने की जरूरत है। इसके अलावा महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना को भी बेहतर ढंग से लागू करने की दरकार है।

27.4.11

संप्रेक्षण गृह में कई खामियां

आगरा : किशोर संप्रेक्षण गृह में बुधवार को पहुंची क्राई की टीम को खामियां मिलने के साथ ही कई चौंकाने वाली जानकारियां भी मिलीं।
क्राई (चाइल्ड राइट एंड यू) की सदस्य विनीका कारौली व मानवाधिकार कार्यकर्ता नरेश पारस अपराह्न लगभग दो बजे से शाम पांच बजे तक रहे। इस दौरान वहां रहने वाले किशोरों से बातचीत करके उनकी दिक्कतों के बारे में जानकारी की। टीम के सदस्य नरेश पारस ने बताया एक बच्चे ने अपनी उम्र आठ व दूसरे ने दस साल बताई। जबकि एक ने अपनी उम्र 20 साल बताई। गौरतलब है कि किशोर संप्रेक्षण गृह में 12 से 18 साल तक के बच्चों को रखा जाता है। नियमानुसार एक बच्चे को छह माह से अधिक वहां नहीं रखा जा सकता जबकि किशोर गृह में ऐसे भी बच्चे थे जो तीन साल से भी अधिक समय से वहां रह रहे थे। एक किशोर दहेज एक्ट का भी मिला। किशोर गृह की क्षमता 75 की है जबकि वहां 92 किशोर थे। जिसमें 10 से 14 साल तक के 17 बच्चे थे। जबकि 15 से 18 साल तक 77 किशोर थे। निरीक्षण के दौरान कर्मचारियों को व्यवहार के लिए खास हिदायत दी गयी। साथ किशोर गृह की पुरानी हो चुकी इमारत की जगह नई बिल्डिंग बनवाने की जरूरत भी बताई। इस दौरान जिला प्रोबेशन अधिकारी दिलीप कुमार, संप्रेक्षण गृह के सहायक अधीक्षक डा. सुभाषचंद मिश्रा आदि मौजूद थे।

14.4.11

अन्ना, अनशन, समय और तरीका

शिरीष खरे

भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए अन्ना हजारे ने सही समय पर सही तरीका अपनाया है. अन्ना के प्रभाव और उनके समर्थकों के प्रयासों से कहीं ज्यादा देश के भीतर विश्वसनीय नेतृव्य के अभाव में छटपटा रहे आम आदमी की बैचनी ने पूरे आंदोलन को सफल बनाया है. जंतर-मंतर पर हमने प्रलोभनों से खीचा गया मेला नहीं बल्कि तंत्र को दुरूस्त करने का ऐसा लोक था जिसके पीछे न किसी राजनीतिक दल का बल था और न किसी धर्म का जोर. और तो और जिस तबके पर वोट न डालने की तोहमत लगती है वह भी यही मौजूद था. बीते एक दशक से मध्यवर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले जानकार बता रहे थे कि भ्रष्टाचार अब ऐसा मामला बन चुका है जो जनता को आंदोलित नहीं करता है. लेकिन स्थिति अब उतनी भी निराशाजनक नहीं है जितनी कि कुछ दिनों पहले हुआ करती थी. आजादी के बाद यह पहला आंदोलन है जिसमें एक कानून के समर्थन में पूरा देश एकजुट हुआ. इस आंदोलन ने भ्रष्टाचार को इस देश का सबसे बड़ा मामला बना दिया है.

जहां छोटे से आंदोलन में तनाव की स्थितियां बिगड़ते देर नहीं लगतीं वहीं इस आंदोलन में जर्बदस्त अनुशासन देखने को मिला. जंतर-मंतर पर दि-ब-दिन जनता हजारों की संख्या में जमा होती जा रही थी लेकिन पुलिस के किसी तरह की कोई शिकायत नहीं पहुंची. इन पांच दिनों में न तो आसपास के इलाके की सार्वजनिक संपत्ति को कोई नुकसान पहुंचा और न ही चोरी या अभद्रता जैसा कोई समाचार सुनने को मिला. हर दिन जनसैलाब का जुनून जैसे अपने साथ अपना संयम भी ले आया था. दूसरी ओर अन्ना हजारे के 97 घंटों के अनशन में इंटरनेट के जरिये तकरीबन 45 लाख लोगों ने आंदोलन को लेकर अपनी भावनाएं जाहिर कीं. इस दौरान गूगल इंडिया पर सबसे ज्यादा सर्च किए जाने वाले अन्ना हजारे को फेसबुक पर करीब 11 लाख लोगों ने पसंद किया. सरकार पर इतना दवाब था कि शनिवार रात को करीब 2.30 बजे सरकारी प्रेस खुलवाकर गजट अधिसूचना को प्रकाशित करवाया गया.

पूर्व कानून मंत्री और प्रारुप के लिए गठित संयुक्त समिति के को-चेयरमेन शांतिभूषण का मानना है कि देश के प्रभावशाली लोग जब भ्रष्टाचार करते हैं तो उनके खिलाफ कोई गहन जांच पड़ताल नहीं होती है. इसका एक कारण जांच एंजेसियों का किसी न किसी के दवाब में काम करना है. इससे जहां शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार बढ़ता ही जा रहा है वहीं कोई नतीजा न मिलने से जनता निराश होती जा रही है. असल में हमारे यहां भ्रष्टाचार से निपटने की कोई मजबूत व्यवस्था नहीं है. जन लोकपाल कानून इस दिशा में जनता की निराशाओं को दूर करेगी. इसमें जहां दोषी साबित होने पर भ्रष्टाचार की कमाई को जब्त करने का प्रावधान रहेगा वहीं प्रशासनिक जवाबदारी को ध्यान में रखते हुए अगर कोई अधिकारी समय पर अपना काम पूरा नहीं करता है तो उस पर जुर्माना लगाया जाएगा. कोई भी पीडि़त नागरिक लोकपाल के पास अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है और शिकायत की जांच निश्चित समयसीमा में पूरी होगी.

एक तरफ सरकार कहती रही कि वह भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने चाहती है और दूसरी तरफ से उनके प्रवक्ताओं ने लोकत्रांतिक तरीके से चुने गए प्रतिनिधियों की स्वायत्तता का सवाल उछाला. असल में अन्ना और सरकार के बीच हुआ यह समझौता असामान्य परिस्थितियों की देन है जो सरकार की भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए केवल खोखले आश्वासनों से बनी़. इन्हीं खोखले आश्वासनों के चिढ़ी जनता अन्ना के समर्थन में सड़को पर आकर संसंद पर दवाब बना रही थी. जनता यह भली भांति जानने लगी थी कि कैसे न केवल एक के बाद एक घोटाले हो रहे हैं बल्कि उनके लिए जिम्मेदार लोगों को कैसे बचाने के प्रयास भी किए जा रहे हैं.

यह आंदोलन केवल सरकार के विरोध में नहीं बल्कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के विरोध रहा. इसलिए शरद यादव, ओम प्रकाश चैटाला, उमा भारती और मेनका गांधी जैसे राजनेताओं को उल्टे पैर लौटना पड़ा जो समर्थन जताने के लिए जंतर-तंतर पहुंचे थे. लोकपाल विधेयक को लेकर लंबे समय से संघर्ष कर रहीं सामाजिक कार्यकर्ता अरूणा राय कहती हैं कि इस विधेयक की मूल भावना से हमारी किसी तरह की असहमति नहीं है लेकिन हम चाहते हैं कि जो आखिरी मसौदा बने उसमें ज्यादा से ज्यादा जनता की भागीदारी सुनिश्चित हो. अरूणा राय का मानना है कि हजारे और करोड़ों भारतीयों की भावना को देखते हुए केंद्र सरकार को चाहिए कि वह तुरंत जन लोकपाल विधेयक को कानून में बदलने का भरोसा दिलाए.

3.4.11

मुफ्त शिक्षा का दावा खोखला साबित हुआ

शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के एक साल बाद भी बच्चों के लिए शिक्षा पूरी तरह मुफ्त नहीं है। 20 पर्सेंट स्कूल अब भी प्रवेश शुल्क ले रहे हैं। 42 पर्सेंट स्कूल पाठ्य सामग्री के लिए पैसे वसूल रहे हैं और 30 पर्सेंट स्कूल ऐसे हैं, जिनमें पूरे साल दाखिला नहीं दिया जाता। एक साल पहले शिक्षा का अधिकार कानून इस मकसद से लागू किया गया था कि सभी बच्चों को शिक्षा मिले। लेकिन अब भी स्कूल बच्चों को अलग-अलग वजहों से एडमिशन देने से मना करते हैं। स्कूलों में बच्चों की पिटाई में भी कोई कमी नहीं आई है। गरीबी और सरकारी उपेक्षा की वजह से बच्चों की एक बहुत बड़ी आबादी शिक्षा से वंचित है। रंगपुरी पहाड़ी बस्ती महिपालपुर में रहने वाली फरजादी चाहकर भी स्कूल नहीं जा पा रही है। फरजादी के पिता कूड़ा बीनते हैं और मां घरों में नौकरानी का काम करती है। वह बताती की पिटाई में भी कोई कमी नहीं आई है। गरीबी और सरकारी उपेक्षा की वजह से बच्चों की एक बहुत बड़ी आबादी शिक्षा से वंचित है। रंगपुरी पहाड़ी बस्ती महिपालपुर में रहने वाली फरजादी चाहकर भी स्कूल नहीं जा पा रही है। फरजादी के पिता कूड़ा बीनते हैं और मां घरों में नौकरानी का काम करती है। वह बताती कि जब मैं पहली क्लास में पढ़ती थी, तो अचानक गांव जाना पड़ा। तब स्कूल में बिना बताए मैं गांव चली गई। लौटकर आई, तो स्कूल ने कुछ कागज मांगे, जो मेरे पास नहीं थे और मेरा स्कूल छूट गया। मुझे स्कूल में दोबारा दाखिला नहीं मिला। मैं आज भी पढ़ना चाहती हूं। असलम और अकील भी शिक्षा से वंचित हैं। मधुबनी का रहने वाले असलम को उसके मामा बहला-फुसलाकर दिल्ली ले आए। यहां उसे काम पर लगा दिया, जहां उसे 12-14 घंटे काम करना पड़ता था। उसे इस बाल मजदूरी से तो आजादी मिली, लेकिन आज भी वह स्कूल जाने के लिए तरसता है। एक बच्ची ने बताया कि वह जेजे कॉलोनी के सीनियर सेकंडरी स्कूल में पढ़ती है। वहां न तो टॉयलेट का सही इंतजाम है और न ही पानी की व्यवस्था। उसने कहा कि स्कूल के भीतर बाहर के लड़के घुस आते हैं और छेड़छाड़ करते हैं। एक बच्चे ने बताया कि मुझे जब सभी स्कूलों ने एडमिशन देने से मना कर दिया, तो मैं एक एनजीओ के स्कूल में पढ़ने लगा।

आरटीई कानून लागू होने के एक साल बाद भी एक चौथाई बच्चे स्कूल से बाहर हैं, जबकि सरकार कहती है कि बच्चों को स्कूल लाने के विभिन्न प्रयास किए गए। मध्य प्रदेश, यूपी, बिहार, राजस्थान, झारखंड सहित नौ राज्यों में मुफ्त शिक्षा अधिकार लागू ही नहीं हो पाया है। सर्वे में पाया गया कि 24 पर्सेंट बच्चे स्कूल से बाहर हैं। 17 पर्सेंट बच्चों को पाठ्य सामग्री नहीं दी गई है। 50 पर्सेंट स्कूलों में स्कूल प्रबंधन समिति ही नहीं बनी है। 16 पर्सेंट स्कूलों में पीने के साफ पानी का इंतजाम नहीं है। 33 पर्सेंट स्कूलों में अलग से टॉयलेट की व्यवस्था नहीं है। यूपी और झारखंड में अब भी राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग नहीं बने हैं।

क्राई संस्था की सीईओ पूजा मारवाह ने कुछ समय पहले मुंबई में एक सेमीनार में बताया था कि सिर्फ दस राज्यों ने ही अपने यहां आरटीई कानून को अंतिम रूप दिया है। उन्होंने कहा कि मुफ्त और गुणवत्तायुक्त शिक्षा देने वाले स्कूलों के अभाव में बाल मजदूरी में भी इजाफा होता है।

2.2.11

किशोर उम्र को मिला मकसद

कुछ बड़ा काम करने के लिए, कुछ हटके करने के लिए एक उद्देश्य होना चाहिए। अगर मकसद सामने हो और फिर उसे पाने के लिए कुछ किया जाये, तो बहुत कुछ मिल जाता है। खुद को भी, दूसरों को भी, समाज को भी। उस राह पर और कदम भी चल पड़ते हैं। धीरे-धीरे एक कारवां बन जाता है। नयी राहों पर चलने वालों का मकसद कारवां बनाना कभी नहीं होता। वह तो खुद-ब-खुद बन जाता है। पर जब वे पीछे मुड़कर देखते हैं, अपने पीछे बढ़े आ रहे बहुत से कदमों को आते देखते हैं, तो उन्हें अपने मकसद और उसकी कामयाबी से भी बड़ा अहसास होता है।

शायद संजना सांघी को भी यह अहसास हो।

18 साल की संजना मुंबई की आम जोशीली, चुलबुली किशोरियों की तरह ही दिखती है। पर वह है एकदम अलग।

अलग इसलिए, कि वह इस उम्र की आम लड़कियों की तरह केवल अपने और अपने भविष्य के बारे में ही नहीं सोचती। उसका दिल दूसरों के लिए भी धड़कता है। वह दूसरों के लिए भी सोचती है। भले ही वे 'दूसरे' एकदम अनजान क्यों न हों। उसके लिए हर कोई एक इंसान है। और इंसानियत के इसी जज्बे से वह एक नयी राह पर चल पड़ी है।

संजना ने पिछले साल जून में एक वेबसाइट www.innocenttouch.in बनायी। और इस कदम ने उसकी जिंदगी को एक मकसद दे दिया।

संजना ब्रीच कैंडी के बी.डी. सोमानी स्कूल की छात्रा है। वह भी अपनी उम्र के दूसरे किशोरों की तरह पढ़ना, घूमना और फेसबुक पर मौजूद रहना पसंद करती है। पर उसे लगा कि किशोर ऊर्जा से सराबोर होते हैं, जोश से उफनते हैं। उनकी इस ऊर्जा और जोश का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। अपनी वेबसाइट के जरिये वह किशोरों को विभिन्न एनजीओ से जोड़ती है। एनजीओ से जुड़कर वे किशोर अपनी पढ़ाई, दोस्तों के साथ गपबाजी और सोशल नेटवर्किंग से समय निकालकर दूसरों के लिए कुछ करते हैं।

दरअसल, एक साल पहले संजना के मन में आया कि किसी एनजीओ से जुड़कर समाज के लिए कुछ काम किया जाए। पर उसे यह नहीं पता था कि शुरुआत कैसे करे, किससे संपर्क करे। बस, तभी उसे अपना मकसद मिल गया। किसी तरह उसे विक्टोरिया मेमोरियल स्कूल फॉर ब्लाइंड का पता चला। वह उससे जुड़ गयी। उसे अपना जीवन सार्थक लगने लगा। उसे खयाल आया कि उसकी तरह और भी बहुत से किशोर ऐसा कुछ करना चाहते होंगे, यह उन्हें भी पता नहीं होता होगा कि कैसे शुरुआत करें, किससे संपर्क करें। उसने ठान लिया कि वह ऐसे किशोरों को राह दिखायेगी। काफी माथापच्ची के बाद उसने पांच एनजीओ चुने। उसे लगा कि किशोर इनसे जुड़कर कुछ करना चाहेंगे। और शुरू हो गई वेबसाइट। चंद महीनों में ही यह वेबसाइट दक्षिण मुंबई के विद्यार्थियों में लोकप्रिय हो गई। इसके जरिये 200 से ज्यादा विद्यार्थी सक्रिय स्वयंसेवक बन चुके हैं।

17 साल के वेदांत मुंशी को संजना की वेबसाइट से ही ' आकांक्षा ' एनजीओ का पता चला। वह उससे जुड़ गया। 16 साल की प्रीति गंगवानी शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय ' प्रथम ' के लिए काम करने लगी। सेंट जेवियर्स कॉलेज के 15 विद्यार्थियों का समूह क्राई ( चाइल्ड रिलीफ एंड यू ) से जुड़ गया।

एनजीओ भी इससे खुश हैं। उन्हें कर्मठ और उत्साही स्वयंसेवक मिल रहे हैं। स्कूलों में सभ्यता और सामाजिक जागरूकता के लिए काम कर रहे एनजीओ संस्कार इंडिया फाउंडेशन के संस्थापक किरण मदन का कहना है , ' संजना की उम्र को देखते हुए यह वेबसाइट उसकी बड़ी पहल है। उसके इस प्रयास से हमें जुनूनी कार्यकर्ता मिल रहे हैं। यह कोशिश रंग लायेगी।'

यह वेबसाइट सरल और सूचनाप्रद है। एनजीओ से जुड़कर समाज के लिए कुछ करना चाहने वालों को केवल तीन स्टेप में ही मनचाही जानकारी मिल जाती है। वेबसाइट पर एक फेसबुक पेज भी है , जिस पर 200 से ज्यादा सदस्य हैं। एक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ एफलेरॉन ने संजना को दो सप्ताह की कांफ्रेंस में एम्सटर्डम में भी बुलाया। संजना को जरा भी नहीं लगता कि वह कोई बड़ा काम कर रही है। वह मासूमियत से कहती है , ' हम सभी किसी मकसद को लेकर पैदा होते हैं। मैं भी इसमें योगदान कर सकती हूं , पर दूसरों के सहयोग के बिना नहीं। मेरा सपना है कि हर कोई किसी ना किसी के जीवन को सुंदर बनाये।

आज हमें एक नहीं , बल्कि अनेक संजनाओं की जरूरत है। अनगिनत संजनाएं चाहिएं हमें। ऐसी संजनाएं , जो अपने तमाम कामकाज , अपनी तमाम व्यस्तता और भागमभाग जिंदगी के बीच कुछ पल दूसरों के लिए भी निकाल सकें। कुछ देर ठहरकर दूसरों के लिए सोच सकें। कुछ नया कर सकें। एक शृंखला बना सकें। ऐसी शृंखला , जिसकी पहली कड़ी वे खुद बनें और फिर दूसरी कडि़यां जुड़ती चली जायें ... वह शृंखला एक सुंदर हार में तब्दील हो जाये ... और वह हार समाज में मानवीय भावनाओं को जगा दे ... उमड़ - घुमड़ पड़ें वे भावनाएं ... और इंसानियत की भीनी - भीनी खुशबू वाली बरसात हो जाए।

भारत एक युवा देश है। अगले एक दशक में युवाओं की आबादी और बढ़ेगी। ये जोश और ऊर्जा से सराबोर युवा होंगे। अगर उनके इस जोश और ऊर्जा को जागृत करके घनीभूत कर दिया जाए , उन्हें कुछ मकसद दिखा दिया जाए , तो प्रगति की दौड़ की अकल्पनीय और अविश्वसनीय तेजी नजर आयेगी।

भले ही संजना को इसका अहसास नहीं है , पर इस सबमें आखिर उसका भी तो योगदान होगा ही!

31.12.10

2009 आत्महत्या करने वाले किसानों की कुल संख्या 17368

शिरीष खरे

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक 2009 में देश के 17368 किसानों ने आत्महत्या की है. यह बीते 6 सालों में सर्वाधिक है. 2008 में 16196 किसानों ने आत्महत्या की थी. कुल मिलाकर 1997 से अब तक 216500 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. इन आत्महत्याओं में 5 बड़े राज्यों या ‘आत्महत्या बेल्ट’ कहलाने वाले महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्यों में कुल 10765 किसानों यानी 62 प्रतिशत किसानों ने आत्महत्या की है. महाराष्ट्र लगातार 10 सालों से आत्महत्या करने वाले राज्यों में सबसे आगे रहा है. यहां इस वर्ष 2,872 किसानों ने आत्महत्या की है. 2282 किसानों द्वारा की गई आत्महत्या के चलते कर्नाटक दूसरे स्थान पर है.

महाराष्ट्र में 1997 से अब तक कुल 44276 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं, जो कि देशभर की कुल आत्महत्याओं का 20 प्रतिशत है. बाकी के पांच बड़े राज्यों में कर्नाटक में 2009 में आत्महत्याओं में सर्वाधिक वृद्धि हुई है. यहां बीते साल के मुकाबले 545 अधिक किसानों ने आत्महत्या की है. आंध्रप्रदेश में कुल 2414 किसानों ने आत्महत्या की है यह पिछले वर्ष से 309 अधिक है. वहीं मध्यप्रदेश में 1395 किसानों ने व छत्तीसगढ़ में 1802 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं जो कि बीते साल के मुकाबले क्रमशः 16 और 29 अधिक हैं.

भारत में किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं पर व्यापक अध्ययन करने वाले अर्थशास्त्री के नागराज का कहना है कि ''एक ओर तो किसानों की जनसंख्या में कमी आ रही है वहीं दूसरी ओर आत्महत्याओं का बढ़ना यह सुनिश्चित कर रहा है कि किसानों की समस्या अभी भी ज्वलंत है.'' 2003 से 2009 के मध्य करीब 102628 किसानों ने आत्महत्या की है यानी सालाना औसतन 17105 किसान. इस प्रकार इस अवधि में रोजाना करीब 47 किसानों ने या प्रति 30 मिनट में एक किसान द्वारा आत्महत्या की गई है.

22.12.10

बाल संप्रेक्षण गृह हैं या जेल

बीते दिनों क्राई और एमनेस्टी इंटरनेशनल के कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय बालक अधिकार संरक्षण आयोग को भेजी विस्तृत रिपोर्ट में आगरा और मथुरा जिलों के बाल संप्रेक्षण गृहों  को जेल बताते हुए कई अहम कमियों का खुलासा किया. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि स्टाफ को किशोर अधिनियम के बारे में ही पता नहीं है. बाल कल्याण समिति भंग है और कई बच्चों पर कई जघन्य अपराधों के आरोप में हैं. संप्रेक्षण गृहों में क्षमता से दो गुना अधिक तक बच्चे बंद हैं. 6 कमरों में 30 बच्चों को रखने की क्षमता होती है लेकिन यहां केवल 2 कमरों में ही 62 बच्चों को बंद किया हुआ हैं. बाकी के कमरे अन्य उपयोग के लिए काम में लिए जा रहे हैं. खेल का मैदान तो दूर पढ़ाई की कोई व्यवस्था भी नहीं है. रियाजुद्दीन वर्ष, पटवारी सिंह, कालू सिंह, अभिनिक सिंह और राबिन सिंह 12 साल से भी कम उम्र के बच्चे हैं. वही दूसरी तरफ मेघ सिंह और अकील पर 18 साल से अधिक की उम्र का आरोप  है. इनमें मेघ सिंह की एक साल की बच्ची भी है और कहा जा रहा है कि उसे 18 साल से कम दर्शाकर बंद किया गया है.

एक अन्य किशोर बीएसए कालेज में एलएलबी का छात्र है. उस पर अपहरण और बलात्कार का आरोप है. सवाल किया गया है कि क्या एलएलबी का छात्र और एक बच्ची का पिता 18 साल से कम उम्र के हो सकते हैं? साथ ही रिपोर्ट में कहा गया है कि कई बच्चे 3 माह से अधिक समय से बंद हैं जिनमें अकील 4 माह, अनीस 8 माह , विशाल 17 माह, संजीव 21 माह, पटवारी सिंह 1 साल और कृष्णा 2 साल से बंद हैं.

आयोग से अपील की गयी है कि आगरा व मथुरा के किशोर संप्रेक्षण ग्रहों में बंद किशोरों का मेडिकल परीक्षण कराया जाए. सुधार के लिए कड़े निर्देश जारी किए जाएं और उनका सख्ती से पालन हो. स्टाफ को किशोर न्याय अधिनियम से प्रशिक्षित किया जाए.

16.12.10

स्कूलों के असुरक्षित बच्चे

शिरीष खरे

यूं तो स्कूलों को बच्चों के वर्तमान और भविष्य गढ़ने का केन्द्र माना जाता है. लेकिन बीते कुछ सालों से स्कूलों के भीतर से बच्चों के शोषण और उत्पीड़न की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के मुताबिक बीते तीन सालों में स्कूलों के भीतर बच्चों के साथ होने वाले शारारिक प्रताड़ना, यौन शोषण, दुर्व्यवहार, हत्या जैसे मामलों में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है. मौजूदा परिस्थितियां भी कुछ ऐसी हैं कि बच्चों के लिए हिंसामुक्त और भयमुक्त माहौल में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का सवाल अब बहुत बड़ा सवाल बन चुका हैं.

बीते साल स्कूलों में बच्चों के उत्पीड़न के दर्ज हुए मामलों में अगर तमिलनाडू के 12 मामले अलग रखे जाए तो अधिकतर मामले हिंदी भाषी राज्यों से हैं. इसमें 27 मामलों के साथ जहां उत्तरप्रदेश अव्वल है, वहीं उसके बाद दिल्ली 9, मध्यप्रदेश 9, बिहार 4, राजस्थान 4 और हरियाणा 4 का स्थान आता है.

2007 में केन्द्रीय महिला व बाल विकास मंत्रालय द्वारा बच्चों की सुरक्षा की स्थिति को लेकर देश भर में किये गए सर्वेक्षण के मुताबिक हर दो बच्चों में से एक को स्कूल में यौन शोषण का शिकार बनाया जा रहा है. बीते साल राष्ट्रीय बाल अधिकार पैनल को स्कूलों में बच्चों के उत्पीड़न की तकरीबन 100 शिकायतें मिली. इसके बहुत बाद में केन्द्रीय महिला व बाल विकास मंत्री ने भी स्कूलों में बच्चों के बढ़ते उत्पीड़न के ग्राफ को स्वीकारते हुए चिंता जाहिर की.

अनुशासनात्मक कार्रवाई के नाम पर खास तौर से सरकारी स्कूलों में आज भी ‘गुरूजी मारे धम्म-धम्म विद्या आये छम्म-छम्म’ जैसी कहावतें प्रचलित हैं. गौर करने लायक तथ्य है कि अनुशासनात्मक कार्रवाई की आधी से अधिक घटनाएं केवल सरकारी स्कूलों में होती हैं. ऐसी घटनाओं को अंजाम देते समय इस बात को नजरअंदाज बना दिया जाता है कि किसी भी तरह के दुर्व्यवहार से बच्चे में झिझक, संकोच और घबराहट की भावना घर कर सकती है. बच्चों के भीतर की ऐसी भावनाओं को ड्राप आउट की दर अधिक होने के पीछे की एक बड़ी वजह के तौर पर देखा जाता है. लेकिन सामान्य तौर से हमारे आसपास बच्चों के साथ होने वाले दुराचारों को गंभीरता से नहीं लिए जाने की मानसिकता है. इस तरह से बच्चों पर होने वाले अत्याचारों पर चुप रहकर हम उसे जाने-अनजाने प्रोत्साहित कर रहे हैं. जबकि बच्चों को दिये जाने वाली तमाम शारारिक और मानसिक प्रताड़नाओं को तो उनके मूलभूत अधिकारों के हनन के रुप में देख जाने की जरूरत है, जिन्हें कायदे से किन्हीं भी परिस्थितियों में बर्दाश्त नहीं किए जाने चाहिए लेकिन क्या किया जाए आलम यह है कि सरकार ने स्कूलों में सुरक्षित बचपन से जुड़े कई तरह के सवालों के साथ-साथ उनसे जुड़ी मार्गदर्शिका को तैयार किये जाने की मांग को भी लगातार अनदेखा किया जाता रहा है.

वहीं बच्चों का भोलापन ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी समझी जाती है. एक तरफ बच्चे अपने डर, अवसाद और अकेलेपन को खुलकर कह नहीं पाते तो दूसरी तरफ बच्चों के परिवार वाले भी उनकी बातों को कोई खास अहमियत नहीं देते. बच्चों के भोलेपन के शिकारी ऐसी स्थिति का चुपचाप फायदा उठाते हुए अपनी कुंठाओं को पूरा करते हैं. अक्सर देखा गया है कि बच्चों के उत्पीड़न में वहीं लोग शामिल होते हैं जिनके ऊपर उनकी सुरक्षा की जवाबदारी होती है. ऐसे में बच्चों के परिवार वालों के लिए यह जरूरी है कि वह कुछ समय बच्चों के साथ बिताएं और उनसे खुलकर बातचीत करते रहें.

हालांकि स्कूलों में उत्पीड़न के मामले में पीड़ित बच्चों को किसी उम्र विशेष में नहीं बांधा जा सकता लेकिन दर्ज हुए अधिकतर मामलों से साफ हुआ है कि यौन उत्पीड़न से पीड़ित बच्चों में 8 से 12 साल तक आयु-समूह के बच्चों की संख्या सर्वाधिक रहती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक शारारिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक, दुर्व्यवहार, लैंगिक असामानता इत्यादि बाल उत्पीड़न के अंतर्गत आते हैं. फिर भी बच्चों के उत्पीड़न के कई प्रकार अस्पष्ट हैं और उन्हें परिभाषित करने की संभावनाएं अभी तक बनी हुई हैं. दूसरी तरफ राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो बच्चों के उत्पीड़न से जुड़े केवल वहीं मामले देखता है, जो पुलिस-स्टेशनों तक पहुंचते हैं. जबकि सर्वविदित है कि प्रकाश में आए मामलों के मुकाबले अंधेरों में रहने वाले मामलों की संख्या हमेशा से ही कई गुना तक अधिक रहती है.

हालांकि बच्चों के सुरक्षित बचपन के लिए सरकार ने जहां बजट में 0.03 प्रतिशत बढ़ोतरी की है वहीं इसके लिए देश में पर्याप्त कानून, नीतियां और योजनाएं हैं. लेकिन इन सबके बावजूद महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा किये गए सर्वेक्षण में 65 प्रतिशत बच्चे महज शारारिक प्रताड़नाएं भुगत रहे हैं. जाहिर है समस्या का निपटारा केवल बजट में बढ़ोतरी या सख्ती और सहूलियतों के प्रावधानों भर से मुमकिन नहीं हैं बल्कि इसके लिए मौजूदा शिक्षण पद्धतियों को नैतिकता और सामाजिकता के अनुकूल बनाये जाने की भी जरूरत है. इसी के साथ बच्चों के सीखने की प्रवृतियों में सुरक्षा के प्रति सचेत रहने की प्रवृति को भी शामिल किये जाने की जरूरत है.

14.12.10

भोपाल: यह कैसी प्रेतलीला ?

चिन्मय मिश्र 

साधो यह मुरदों का गांव
पीर मरै, पैगम्बर मर गए, मर गए जिंदा जोगी।
                                                            -कबीर

3 दिसम्बर 2010 को भोपाल गैस त्रासदी के 26 साल पूरे हो गए। इस दौरान बकौल ओबामा भारत एक विकासशील से विकसित देश बन गया। वह एक आर्थिक महाशक्ति और तीसरी दुनिया का तथाकथित प्रवक्ता भी बन गया। देश में विदेशी पूंजी निवेश में काफी बढ़ोत्तरी हुई और वह बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पसंदीदा भी बन गया।

मगर भोपाल में यूनियन कार्बाइड से रिसी गैस से पीड़ित समुदाय के लिए तो ढाई दशक का यह समय जैसे ठहरा ही हुआ है। भोपाल की ट्रायल कोर्ट से आए फैसले के बाद लगा था कि केंद्र और राज्य सरकारें चेतेंगी और कुछ सकारात्मक पहल करेंगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। केंद्र सरकार ने कुछ आधा-अधूरा सा उत्तरदायित्व निभाया और मंत्रियों के समूह ने खैरात बांटने के अंदाज में कुछ घोषणाएं कर दीं। लेकिन पीड़ितों का शारीरिक, मानसिक या कानूनी किसी भी तरह की कोई राहत नहीं मिली।

कबीर के शब्दों में कहें तो संभवतः नीति निर्धारक सोचते हैं,

राजा मर गए परजा मर गये, मर गये वैद्य औ रोगी।
चंदा मरिहैं सुरजो मरिहैं, मरिहैं धरती अकासा।

तो फिर शासन प्रशासन को कुछ भी करने की क्या आवश्यकता है ? वैसे इस त्रासदी के बाद हुई वारेन एंडरसन की गिरतारी के खिलाफ भारत के सर्वाधिक प्रतिष्ठित उद्योगपति ने एक ‘मर्मस्पर्शी’ लेख लिखा था। बाद में वे 100 करोड़ रुपए लगाकर ‘देशहित’ में यूनियन कार्बाइड का जहरीला कचरा हटवाने का असफल प्रयास भी कर चुके हैं और अब राडिया टेप कांड के उजागर होने के बाद इन ‘देशभक्त’ उद्योगपति की नाराजगी की वजहें भी सार्वजनिक होती जा रहीं हैं। कहने का अर्थ यह है कि भारत में हो रहे विदेशी पूंजी निवेश के पीछे भी संभवतः यही भावना कार्य कर रही है कि यदि किसी देश में विश्व की अब तक की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना के लिए 26 वर्ष पश्चात भी किसी को पूर्णतः उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सका है तो निवेश का उससे बेहतर स्थान और क्या हो सकता है ?

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के कार्यकाल के पांच वर्ष पूरे होने पर 29 नवम्बर को भोपाल में ‘कार्यकर्ता गौरव दिवस’ में हजारों-हजार लोग इकट्ठा हुए थे। इसमें हुई आमसभा के दौरान भोपाल गैस पीड़ितों को लेकर एक शब्द भी कहा गया हो, ऐसा सुनने में नहीं आया। 3 दिसम्बर को प्रतिवर्ष सभी धर्मों और राजनीतिक दलों द्वारा आयोजित प्रार्थना सभाएं महज रस्मी होकर रह गई हैं। आज कई राष्ट्र दूसरे महायुद्ध के बीत जाने के 60 वर्षों बाद भी अपने द्वारा किसी अन्य राष्ट्र के प्रति की गई अमानवीयता के लिए क्षमा मांगते नजर आते हैं। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपनी हालिया भारत यात्रा के दौरान इस संबंध में माफी मांगना तो दूर, इस दुर्घटना का उल्लेख करना तक जरुरी नहीं समझा।

भारतीय न्याय व्यवस्था भी एक गोल घेरे में रहकर लगातार दोहराव से ग्रसित हो गई है। ट्रायल कोर्ट से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक सब अपनी-अपनी भूमिका की समीक्षा की बात अवश्य करते नजर आते हैं लेकिन धरातल पर कुछ भी नजर नहीं आ रहा है। गैस पीड़ितों के साथ संघर्ष कर रहे संगठन और व्यक्ति लगातार सरकार की विरोधाभासी प्रवृत्तियों को उजागर कर रहे हैं।

प्रशासन तंत्र भी मामले और निपटारे को लगातार लंबित करता जा रहा है। गैस पीड़ितों के लिए बना अस्पताल श्रेष्ठी वर्ग के सुपर स्पेशयलिटी अस्पताल में बदल गया। गैस पीड़ितों के स्वास्थ्य पर बड़े प्रभावों के आकलन व उपचार के लिए गठित शोध समूह को कार्य करने से रोक दिया गया। आज तक इस बात को सार्वजनिक नहीं किया गया कि अंततः भोपाल कितने प्रकार के जहर का शिकार हुआ था।

इस नव उदारीकरण के युग में विकास का पैमाना महज आर्थिक ही रह गया है। लाखों करोड़ रुपए के भ्रष्टाचार की रकम भी जीडीपी में मिल जाएगी और आंकड़े बताने लगेंगे कि हम सब कितनी तेजी से गरीबी रेखा के पार आते जा रहे हैं। परंतु इसके पीछे अलिखित यह है कि गरीबी रेखा वास्तव में ऐसी लक्ष्मण रेखा है इसे जो भी पार करने का प्रयास करेगा वह भस्म हो जाएगा। गांवों से शहरों की ओर पलायन इसी का प्रतीकात्मक स्वरूप ही तो है। भोपाल के गैस पीड़ित अपनी आधी-अधूरी सांस के साथ पिछले ढाई दशक से संघर्ष कर रहे हैं। ये संघर्ष अब एक प्रतीक में बदल चुका है। ऐसा नहीं है कि भोपालवासी यह नहीं जानते कि,

तैतीस कोटी देवता मर गए, पड़ी काल की फांसी।

वे जानते हैं कि उनका संघर्ष संभवतः उन्हें स्वयं को न्याय नहीं दिलवा सके। लेकिन इसके परिणामस्व्रूप भारत व तीसरी दुनिया के अनेक देशों में जहर फैलाने वाले उद्योगों की स्थापना पर लगाम अवश्य लगी है।

आज यूनियन कार्बाइड या डाउ केमिकल्स को भारत में नया कारखाना लगाने में असफलता का सामना करना पड़ा है क्योंकि उनका पुराना ‘नाम’ और ‘काम’ आड़े आ रहा है। पुणे के निवासियों ने अपने शहर के पास डाउ केमिकल्स को कारखाना नहीं लगाने दिया। दरअसल भारतीय राजनीतिक तंत्र हमारी जनता की धैर्य की लगातार परीक्षा ले रहा है। स्थितियां बेकाबू होने पर वह विशेष सहायता पैकेज की घोषणा करता है। पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र में विदर्भ और मध्यप्रदेश में नर्मदा घाटी में ऐसे पैकेज भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुके हैं। इस क्रम में अब देश के नक्सल प्रभावित जिलों के लिए करोड़ो रुपए के विशेष सहायता पैकेज की घोषणा की गई है। इसका हश्र भी वहीं होना है।

भोपाल गैस पीड़ितों को भी लगातार भुलावे में रखकर रोज नई-नई घोषणाएं करना अर्थहीन है। भोपाल गैस त्रासदी को लेकर बरती जा रही लापरवाही अनजाने में नहीं हो रही है। यह एक घृणित प्रवृत्ति है जो कि उद्योगपतियों को यह दर्शा रही है कि उन्हें इस देश में कुछ भी करने की छूट है। इसी के समानांतर आम व्यक्ति को भी समझना होगा कि इस मामले में उसकी अरुचि स्वयं उसके लिए भी खतरनाक है। वैसे कबीर ने यह भी लिखा है,

मानुष तन पायौ बड़े भाग अब विचारी के खेलो फाग!

13.12.10

इंटरनेट रखता है बच्चों को शारीरिक गतिविधियों से दूर

नोएडा। इंटरनेट और कंप्यूटर गेम बच्चों को भोंदू बना रहे हैं. इससे बच्चे शारीरिक गतिविधियों से दूर हो रहे हैं और बीमारी की गिरफ्त में भी आ रहे हैं. अभिभावकों को चाहिए कि बच्चों की इंटरनेट से दूरी बनाएं और खेलों के प्रति उनमें रुझान बढ़ाएं.

शनिवार को सेक्टर-21 ए स्थित स्टेडियम में स्वयंसेवी संस्था क्राई के तत्वावधान में आयोजित 11वां ‘कॉरपोरेट सिटिजनशिप चैलैंज’ के उद्घाटन अवसर पर यह बात पूर्व टेस्ट क्रिकेटर चेतन चौहान ने कही. उद्घाटन के मौके पर नोएडा अथॉरिटी के चेयरमैन मोहिंदर सिंह और डीसीईओ एनपी सिंह भी उपस्थित थे. इन्होंने गुब्बारे उड़ाकर प्रतियोगिता का उद्घाटन किया.

दो दिवसीय कॉरपोरेट सिटिजनशिप चैलैंज खेल प्रतियोगिता के पहले दिन शनिवार को गोल्फ, टेबल टेनिस, बॉस्केट बॉल, मिनी मैराथन, बैड मिंटन, क्रिकेट समेत 16 कॉरपोरेट टीमों के बीच एक दर्जन खेल टूर्नामेंट हुए. रविवार अंतिम दिन खेलों के सेमीफाइनल और फाइनल टूर्नामेंट होंगे. क्राई की निदेशक योगिता वर्मा ने कहा कि "टूर्नामेंट से मिलने वाली आर्थिक मदद का इस्तेमाल उत्तर प्रदेश के गरीब बच्चों को पढ़ाने, कपड़े उपलब्ध कराने और उनकी मदद के लिए किया जाएगा." 

21.11.10

दूरियां कब बनेंगी नजदीकियां



चेन्नई। शिक्षा के अधिकार व अनिवार्य शिक्षा जैसे नारों के पीछे की असलियत यही है कि आज भी कई बच्चे शिक्षा के मौलिक हक से वंचित हैं. विद्यालय और घर के बीच की दूरी इनकी शिक्षा के आड़े आ रही है.

बाल दिवस के मौके पर प्रेस क्लब में कृष्णगिरि जिले के तेनकनीकोट्टै आरक्षित वन्य क्षेत्र के निकट के गुलाटी गांव से आए बी. नागराज (12) और पी. मुनिराज (11) काफी उत्साहित दिखे इसकी वजह उनके परिवार के वे पहले दो बाशिंदे थे जिन्हें उनके घर से आगे कहीं सफर करने का अवसर नसीब हुआ था. उनका कहना था कि उनके दादा-दादी व मां-बाप ने कभी स्कूल नहीं देखा. उनकी गांव में स्कूल न होने के बाद भी पांच साल पहले वे पड़ोसी गांव की स्कूल में नौ वर्ष की आयु में पहली कक्षा में भर्ती हुए. स्कूल में शिक्षा का माध्यम तेलुगू था और अध्यापकों की डयूटी 11 से 2 तक रहती.

क्राई ने इस अवसर को चुनते हुए रविवार को राज्य के पांच अलग-अलग इलाकों से आए बच्चों को मीडिया से मुखातिब कराया जो शिक्षार्जन को लालायित थे. ये बच्चे बेबाक अंदाज में अपनी समस्याओं पर बोले. क्राई ने इस आयोजन के जरिए बताया कि राज्य के कई हिस्सों में स्कूलों की दूरी रिहायशी इलाकों से 10 किमी है जबकि आरटीई के तहत हर 1 किमी पर स्कूल होनी चाहिए.

वे जो भी पढ़ाते भाषाई समस्या के चलते उनकी समझ के परे था. इसी वजह से उनके घर वालों ने पढ़ाई छोड़कर काम में हाथ बंटाने को कहा और वही चीज वे आज कर रहे हैं. इसी तरह रामनाथपुरम के तोवकाडु गांव के एन. नागविजय व मंडवैकुप्पम के एम. पांडियन को स्कूल तक पहुंचने के लिए रोजाना क्रमश: 6 व 8 किमी का फासला तय करना पड़ता था. नागविजय ने इसी वजह से पिछले साल पढ़ाई छोड़ दी थी लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता ने उसे पुन: स्कूल जाने के लिए प्रोत्साहित किया.

छात्रों ने बड़े ही करूणाई अंदाज में कहा कि गर्मी और बारिश के दिनों में छह किमी का सफर पीठ पर बस्ता लेकर तय करना काफी मुश्किल होता है. अपने अभिभावकों के चलते वह स्कूल जा रहा है और उसका लक्ष्य अच्छा पढ़कर जीवन में सफल होना है. इसी तरह दिण्डीगुल जिले के कोडैकेनाल के काड़मनरवु गांव की वी. पी. चित्रा (15) जो छठी में पढ़ती है रोजाना 35 किमी का सफर तय करती है.

क्राई के उप महाप्रबंधक (विकास-समर्थन) पी. कृष्णमूर्ति का कहना है कि वे इस बात से वाकिफ है सरकार देश में शिक्षा व्यवस्था में आमूल परिवर्तन लाने के प्रयास में हैं लेकिन इस कोशिश विच्छिन्नता है. हम चाहते हैं कि राज्य में बदलाव लाने के लिए सरकार आदेश जारी करे. आरटीई के तहत अनिवार्य की गई स्कूल प्रबंधन समितियां इन समस्याओं के समाधान में सहायक हो सकती है.

11.11.10

आरटीई के बावजूद शिक्षा हासिल करना एक चुनौती

शिरीष खरे

‘‘हमारे समूह ने अपने गांव में एचआईवी के साथ जीने वाले एक बच्चे के साथ बरते जाने वाले भेदभाव के खिलाफ कदम उठाया.’’ उत्तर-प्रदेश की एक बाल पंचायत से किशन कुमार कहते हैं कि ‘‘हमने उसके साथ खेला, उसके साथ खाया और वह हमारा दोस्त बन गया. इससे हमसे उम्र में बहुत बड़े लोग शर्मिदा हुए और उन्हें एचआईवी के बारे में फैली अज्ञानता का एहसास हुआ.’’ इसक बाद बाल पंचायत ने उनके दोस्त पर से हर तरह की पाबंदी हटाने के लिए प्रस्ताव पारित किया.

उत्तरप्रदेश की एक बाल-पंचायत से चंदा कहती हैं कि ‘‘जब में चौदह की हुई तो मेरी मां ने मेंरी शादी करने चाही. मगर तब तक मैं यह जान चुकी थी कि कम उम्र में शादी करने वाली लड़कियों को बहुत नुकसान उठाना पड़ता है. आखिर मैं अपनी मां को शादी रोक देने की बात पर समझाने में कामयाब रही.’’ चंदा लड़कियों के विकास की सभी संभावनाओं और उनके शिक्षण के लिए जागरूकता फैलाने का काम कर रही हैं. इसके साथ-साथ वह बाल-विवाह, शीघ्र मातृव्य, नन्हें बच्चों और गर्भवती मांओं के पेट में पलने वाले कुपोषण के दुष्चक्र को तोड़ने का प्रयास भी कर रही हैं.

वही दूसरी तरफ स्थानीय बच्चों के समूह की अध्यक्षा तेरह साल की बानो खान कहती हैं कि ‘‘मेरे जैसे बहुत सारे बच्चे हैं जो गरीब परिवारों से होने की वजह से काम पर जाते हैं, क्योंकि उनके घर के आसपास कोई अच्छे स्कूल नहीं होते हैं.’’ मेरे घर से सबसे पास का स्कूल 2.5 किलोमीटर दूर है, और मेरे घरवाले हर महीने 200 रूप्ए बस किराया नहीं दे सकते हैं.’’ बानो खान का परिवार बदली इंडस्ट्रीय एरिया में सड़क किनारे एक चाय की दुकान चलाता है. बच्चों के लिए मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 में तीन किलोमीटर के भीतर एक उच्च प्राथमिक स्कूल खोले जाने का प्रावधान है.

बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था क्राई द्वारा राजधानी दिल्ली में आयोजित एक सम्मेलन में राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश राज्यों से आए छह बच्चों ने मुफ़्त शिक्षा के अधिकार का समर्थन करते हुए शिक्षा के उपयोग पर अपने विचार और तजुर्बे बांटे. उन्होंने बताया कि उन्हें रोज-रोज स्कूल जाते समय किस-किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. सामूहिक तौर से काम करते हुए इन बच्चों और उनके दोस्तों ने अपनी-अपनी जगहों के स्कूलों में ड्राप-आउट, भेदभाव और अपने समुदायों के बीच से बाल-विवाह जैसी समस्याओं को रोका है.

मध्यप्रदेश के 12 वर्षीय छात्र सुनील चंदेलकर ने बताया कि उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती उसके स्कूल की दूरी है. चंदेलकर ने कहा, "शिक्षा का अधिकार कानून छह से 14 वर्ष आयु वर्ग का मतलब आठवीं कक्षा तक के बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा की बात कहता है लेकिन गांवों के स्कूलों में केवल पांचवी कक्षा तक ही स्कूल हैं. इसके बाद हमें आगे की शिक्षा के लिए तीन किलोमीटर दूर दूसरे गांव के उच्च प्राथमिक स्कूल में जाना पड़ता है."

उन्होंने बताया कि निजी स्कूल बसें उन्हें ले जाने से इंकार कर देती हैं क्योंकि उनके पास उनका भारी शुल्क देने के लिए पैसा नहीं होता. चंदेलकर ने कहा, "हमने इस संबंध में राज्य के शिक्षा मंत्री को लिखा. फिर हमने निजी बस मालिकों के साथ एक बैठक की और अब मामला सुलझ गया है."

क्राई की जनरल मेनेजर अनीता बाला शरद कहती है कि ‘‘घरों के आसपास सरकारी स्कूलों को गुणवत्तापूर्ण तरीके से सक्रिय बनाकर भारत की शिक्षा समस्या का स्थायी समाधान किया जा सकता है. क्राई ने बच्चों के समूहों के साथ काम करते हुए यह दर्शाया है कि बच्चे खुद अपने अधिकारों को कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं.’’ क्राई की जनरल मेनेजर शुभेन्दु भट्टाचार्य बताते हैं कि ‘‘यह सच है कि सभी बच्चों की आवाजें अनुसनी ही रही हैं, चाहे बात आर्थिक पृष्ठभूमि की हो, चाहे गांवों या शहरों में रहने की हो, चाहे व्यस्को द्वारा उनके लिए जवाबदेही की मांग से जुड़े हों और मुफ्त-गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार को संवैधानिक रुप से सुरक्षा देने की हो. हमें बच्चों को परिवर्तन निर्माताओं के तौर पर सामूहिक शक्तियां देनी होंगी. उनके विचारों और जरूरतों को शिक्षा के अधिकार कानून में शामिल किये जाने की जरूरत है.’’

प्रख्यात वकील और कानूनी कार्यकर्ता अशोक अग्रवाल कहते हैं कि ‘‘अगर हम हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना चाहते हैं तो रोजाना की हकीकतों और अड़चनों का सामना करने वाले बच्चों को शिक्षा देने के लिए भारत सरकार को चाहिए कि वह उन्हें अपने क्रियान्वयन नीति का एक हिस्सा बनाए. अधिनियम को एक समान रुप से निजी स्कूलों में भी लागू करने की आवश्यकता है. मुफ्त शिक्षा पाना हर बच्चे का अधिकार है, यह अधिकार देने से निजी स्कूल बच नहीं सकते हैं. यह अधिनियम निजीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा देने की एक शानदार संरचना जान पड़ती है, जो भारत सरकार के कोठारी आयोग द्वारा प्रस्तुत एक समान शिक्षण व्यवस्था के पूरी तरह से विरूद्ध है.

वर्ष 2009 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 17,782 ऐसे आवासीय क्षेत्र हैं जहां स्कूल होना चाहिए लेकिन वहां एक किलोमीटर के क्षेत्र में एक भी प्राथमिक स्कूल नहीं है। उत्तर प्रदेश में ऐसी जगहों की संख्या सबसे ज्यादा 7,568 है. क्राई के मुताबिक देश में छह से 14 आयु वर्ग के 80 लाख से ज्यादा बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं.

जाहिर है शिक्षा का अधिकार कानून के बावजूद कई भारतीय बच्चों के लिए शिक्षा हासिल करना एक रोजमर्रा का संघर्ष बन चुका है क्योंकि उन्हें स्कूलों के उनकी पहुंच में न होने या शिक्षकों के उपलब्ध न होने जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है.

9.11.10

बच्चों का जितना पलायन उतना उत्पीड़न

शिरीष खरे

इन दिनों बच्चों का पलायन तेजी से बढ़ रहा है और उसी अनुपात में उनके साथ उत्पीड़न की घटनाएं और आकड़े भी. खास तौर से मजदूरी के लिए बच्चों को एक राज्य से दूसरे राज्य में आदान-प्रदान किए जाने का सिलसिला जोर पकड़ता जा रहा है. विभिन्न शोध-सर्वेक्षणों और रपटों से यह जाहिर भी हो रहा है कि मुख्य तौर पर बिहार, पूर्वी उत्तर-प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश से महाराष्ट्र और गुजरात सहित पूरे देश भर में मजदूरी के लिए बच्चों की पूर्ति की जा रही है. इन बच्चों में ज्यादातर की उम्र 10 से 16 के बीच है. इनमें भी ज्यादातर लड़के ही हैं. कई सर्वेक्षणों और तजुर्बे यह भी बता रहे हैं कि मजदूरी में लगे ज्यादातर बच्चे स्कूल जरूर गए हैं, मगर वह नियमित नहीं हो सके हैं. बच्चों के बारम्बार पलायन होने के पीछे की मुख्य वजहों में बच्चों ने अपने घर की गरीबी, मारपीट, डर और दबाव को जिम्मेदार ठहराया है तो कभी मुंबई और सूरत जैसे बड़े शहरों की तड़क-भड़क को देखने की दबी चाहत को भी बाहर निकला है. इस दिशा में जो सर्वेक्षणों के आधार पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर कई कदम उठाए जाने की बात कही जाती रही है, मगर अभी तक इन मामलों के न रुकने से यथार्थ की गंभीरता को भलीभांति समझा जा सकता है.

दूसरी तरफ बालगृहों से लगातार बच्चों के भागने की घटनाएं बयान करती हैं कि मुंबई सहित देश भर के सरकारी बालगृहों में बच्चों की सही देखभाल की असलियत क्या है. बीते समय मुंबई के एक बालगृह से कुछ बच्चों के भागने और उनमें से एक के हादसे में मारे जाने घटना उजागर हुई थी. आम तौर पर देखा गया है कि ज्यादातर बालगृहों द्वारा भागने वाले बच्चों के बारे में पता लगाने जरुरत भी महसूस नहीं की जाती हैं. ऐसे बच्चों को ढूंढने की भी तमाम कोशिशें तो दूर महज एक रिपोर्ट तक नहीं लिखवाई जाती है. तजुर्बों से यह जाहिर हुआ है कि हफ्तों-हफ्तों बच्चों के गायब रहने के बावजूद बालगृहों की तरफ से चुप्पी साध ली जाती है. जबकि नियमानुसार इस तरह की घटनाओं की जानकारी फौरन थाने में और उच्च अधिकारियों को देना जरूरी है. यहां तक कि महिला और बाल कल्याण विभाग को भी इस तरह की ज्यादातर घटनाओं की प्राथमिक सूचना किसी अखबार या गैर-सरकारी संस्था के जरिए ही मिलती है. भागने वाले कुछ बच्चों के बारे में जब हमने खैर-खबर जाननी चाही तो पता लगा कि सामान्यत: बालगृहों की तरफ से इन बच्चों की गुमशुदगी के बारे में न तो पुलिस को ही सूचना दी जाती है और न ही विभाग को इस बारे में बताया जाता है. कई बार तो बच्चों के साथ होने वाली दुर्घटनाएं और अपराधिक मामले प्रकाश में आने के बाद ही बच्चों के भागने की रिपोर्ट दर्ज की जाती है. बच्चों के इस तरह से गायब होने की तुरंत रिपोर्ट न लिखवाना महज एक लापरवाही ही नहीं बड़ा अपराध भी है. मुंबई के सरकारी बालगृहों से बीते 6 सालों में तकरीबन तीन सौ से ज्यादा बच्चे भागे हैं, मगर इतना होने के बावजूद लापरवाही का आलम ज्यों का त्यों है. समाज कल्याण विभाग से मिली गैर-औपचारिक जानकारियों के मुताबिक बालगृहों में कर्मचारियों की कमी है. एक कर्मचारी पर सैकड़ों बच्चों को संभालने की जवाबदारी होती है. काम के दबाव में कई बार कर्मचारियों द्वारा जब बच्चों के साथ बुरा बर्ताव किया जाता है तो बच्चे भाग जाते हैं. उन्हें ठीक-ठाक खाना तक नहीं मिलता है. इस तरह से सरकार द्वारा ऐसे बच्चों के देखभाल उचित के लिए संचालित बालगृह बुरे बर्ताव और उत्पीड़न का केंद्र बन जाते हैं.

हर साल मुंबई जैसे महानगर पहुंचने वाले हजारों बच्चे काम की तलाश में या काम की जगहों से भीख मंगवाने वाले नेटवर्क के हत्थे भी चढ़ जाते हैं. खास तौर से रेल्वे स्टेशनों के प्लेटफार्म और चौराहों पर ऐसे नेटवर्क से जुड़े दलालों की सरगर्मियों को समझा जा सकता है. यही बहुत सारे बच्चे बहुत ही गंदे माहौल में महज खाने-पीने के लिए जद्दोजहद करते रहते हैं. इसके अलावा बहुत से बच्चे नशे के आदी हो जाते हैं तो बहुत से जुर्म की दुनिया में भी दाखिल हो जाते हैं.

भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है, जो हर लिहाज से बाल- शोषण और उत्पीड़न को रोकने में मददगार हो. दूसरी तरफ कुछ जानकारों की राय में समस्या को दूर करने के लिए उसकी जड़ में पहुंचकर कानून के समानांतर गरीबी, विस्थापन, पलायन और विघटन से निपटने के प्रयास किए जाने की जरुरत है. साथ की जो प्रावधान लागू हैं उन्हें क्रियान्वित करने वाली एजेंसियों के सक्रिय और धनराशि के सही इस्तेमाल करने की जरुरत है और इसी के साथ बच्चों के यौन-उत्पीड़न सहित सभी तरह के उत्पीड़नों को ठीक से परिभाषित किए जाने की भी जरुरत है. दूसरी तरफ राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो में बच्चों के उत्पीड़न से जुड़े केवल ऐसे मामले शामिल रहते हैं, जिनकी रिपोर्ट पुलिस में दर्ज मिलती है. मगर असलियत जगजाहिर है कि ज्यादातर मामले तो पुलिस तक पहुंचते ही नहीं हैं. हालांकि सरकार की तरफ से 'बाल अपराध निरोधक बिल' संसद में लाने की बात की जाती रही है. बच्चों की सुरक्षा पर कुल बजट में से 0.03% की बढ़ोत्तरी और महिला व बाल विकास मंत्रालय द्वारा एकीकृत बाल सुरक्षा योजना शुरू करने जैसी घोषणाएं की भी की जाती रही हैं. इन सबके बावजूद इस तरह की नीतियां बनाने और इन नीतियों पर विमर्श का दौर तो खूब चलता है. नहीं चलता है तो उन्हें गर्म जोशी से लागू किए जाने की कोशिशों का दौर.

8.11.10

प्राइवेट स्कूलों का कारोबार 5000 करोड़ रुपये के पार



प्राथमिक शिक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद मुंबई और उपनगरीय इलाकों में बच्चे बीएमसी स्कूलों से मुंह मोड़कर निजी स्कूलों की तरफ जा रहे हैं.

बीएमसी स्कूल में जहां मुफ्त में शिक्षा दी जाती है वहीं निजी स्कूलों में औसतन साल भर में एक बच्चे पर तकरीबन 25-30 हजार रुपये खर्च आता हैं. लाख कोशिशों के बावजूद निजी स्कूलों में डोनेशन प्रथा खत्म होने के बजाए और मजबूत होती जा रही है.

बच्चे को स्कूल में प्रवेश दिलाने के लिए औसतन 25 हजार रुपये बतौर डोनेशन देने पड़ते हैं. समाज सेवा के नाम पर चलाए जा रहे निजी स्कूलों का कारोबार हर साल करीबन 20 फीसदी की दर से बढ़ रहा है. आज शिक्षा कारोबार सालाना लगभग 5000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा का हो चुका है जिसकी सही-सही जानकारी किसी के पास नहीं है.

सरकार साल दर साल बीएमसी स्कूलों में बच्चों को अच्छी शिक्षा और सुविधा देने के लिए बजट बढ़ाती जा रही है, लेकिन बच्चों की संख्या हर साल कम होती जा रही है. बीएमसी ने स्कूल शिक्षा को मजबूत बनाने के लिए 2007-08 में 1,051 करोड़ रुपये और 2008-09 में 1,350 करोड़ रुपये का प्रवाधान किया था, जबकि इस साल (2009-10) बीएमसी शिक्षा पर 1,651 करोड़ रुपये खर्च करेगी.

बीएमसी के अलावा केन्द्र और राज्य सरकार भी स्कूली शिक्षा में भारी भरकम रकम खर्च करती है. बीएमसी स्कूलों में शिक्षा पूरी तरह से मुफ्त दी जाती है. बच्चों की फीस, कॉपी-किताबें, स्कूल यूनिफॉर्म के साथ मिड-डे मिल के तहत खिचड़ी और दोपहर में दूध भी बच्चों को मुफ्त में मिलता है. इसके बावजूद हर साल तकरीबन 30 हजार बच्चे बीएमसी स्कूलों से तौबा कर रहे हैं.

इन स्कूलों में बच्चों का आंकड़ा वर्ष 1999 में 7.5 लाख था, जबकि बीते शिक्षण सत्र में बीएमसी के कुल 1,144 स्कूल में 4.50 लाख ही बच्चों ने दाखिला लिया. इस सप्ताह से शुरू हो रहे नए शिक्षण सत्र में यह संख्या और कम होने की आशंका जताई जा रही है.

बृहन्मुंबई महानगरपालिका शिक्षक सभा के महासचिव एवं ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ टीचर्स ऑर्गनाइजेशन के निदेशक रमेश जोशी का का कहना है, 'बीएमसी स्कूलों में साल दर साल बच्चों की कम होती संख्या की मुख्य वजह लोगों की बदलती सोच है.'

उनके मुताबिक आज लोग सोचते हैं कि सिर्फ अंग्रेजी माध्यम में उनका बच्चा जाएगा तो ही उसका भविष्य संवर सकेगा. बीएमसी स्कूल तो गरीबों का स्कूल है, वहां बच्चा जाएगा तो समाज के लोग क्या कहेंगे? जबकि हमारे सरकारी स्कूलों में जो शिक्षक है वह निजी स्कूल के शिक्षकों के मुकाबले अधिक शिक्षित और प्रशिक्षित हैं.

मुंबई और आसपास के इलाकों में करीबन 2,000 निजी स्कूल हैं. जिनमें करीब-करीब 20 लाख बच्चे पढ़ते हैं और यह आंकड़ा सालाना करीबन 15 फीसदी की रफ्तार से बढ़ता जा रहा है. स्कूली शिक्षा आज सबसे सफल कारोबार बन गया है। निजी स्कूलों में फीस और दूसरे खर्च तय नहीं है.

सभी निजी स्कूलों की दरें अलग-अलग हैं. प्रवेश के समय इमारत या स्कूल के विकास के नाम पर लिये जाने वाली डोनेशन फीस इन स्कूल की आय का एकमुश्त सबसे बड़ा साधन है. तीन-चार साल के बच्चे के एडमिशन के लिए स्कूल प्रबंधन की ओर से मुंबई में 5 हजार रुपये से एक लाख रुपये तक बतौर डोनेशन फीस वसूली जाती है, जिसकी कोई लिखित जानकारी नहीं दी जाती है.

इसके अलावा प्रवेश शुल्क, साल में होने वाली दो परीक्षाओं के अलावा हर महीने टेस्ट फीस, टर्म फीस (पिकनिक और कल्चरल्स प्रोग्राम) को मिलाकर सालभर में एक छात्र से औसतन सालभर में 30 हजार रुपये तक ले लिये जाते हैं. ड्रेस और किताबें स्कूल की बताई हुई दुकानों से ही लेनी पड़ती हैं जो अपेक्षाकृत 20 फीसदी तक महंगी ही होती हैं.

मंहगी होती शिक्षा के बावजूद निजी स्कूलों की तरफ बढ़ते रुझान पर राहुल ग्रुप ऐंड स्कूल कॉलेज के चेयरमैन लल्लन तिवारी कहते हैं, 'लोग अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना चाहते हैं इसीलिए वह अच्छे स्कूल में बच्चे को भेजना चाहते हैं, जिसके लिए पैसा मायने नहीं रखता है.'

महंगे से महंगे स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे को भी कोचिंग का सहारा लेना पड़ रहा है. इस पर महेश टयूटोरियल कोचिंग के प्रबंध निदेशक महेश शेट्टी कहते हैं कि स्कूल में क्या पढ़ाया जाता है, हमे इससे कोई मतलब नहीं है। हमारा लक्ष्य होता है कि बच्चे परीक्षा में अधिक से अधिक नंबर ला पाए.

इसके लिए कोचिंग में नई तकनीक और रिसर्च के आधार पर बच्चों को शिक्षा दी जाती है. यही वजह है कि हर साल बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है, जबकि मंदी के बावजूद कोचिंग फीस में करीबन 15-20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.

लगातार हो रहे शिक्षा के निजीकरण को लेकर बच्चों की शिक्षा पर काम करने वाले स्वयंसेवी संस्था क्राई की निदेशक योगिता वर्मा का कहना है, 'संविधान में शिक्षा को मूलभूत आवश्यकता बताया गया है. इसलिए सबको शिक्षा देना सरकार का कर्तव्य बनता है. शिक्षा के निजीकरण को बंद करना चाहिए. अमेरिका और इंगलैड में सरकारी शिक्षा ही सही मानी जाती है.'

क्राई का मानना है कि सबको मुफ्त और एक जैसी शिक्षा दी जानी चाहिए. वैसे भी सरकारी स्कूलों के अध्यापक निजी स्कूल के अध्यापकों के मुकाबले ज्यादा योग्य होते हैं.

4.11.10

बारूद पर ढ़ेर है भारत का भविष्य

शिरीष खरे

एक बच्चा पटाखा बनाए और दूसरा उसे जलाकर दीपावली मनाए. ऎसी विडम्बना तमिलनाडु के शिवकाशी में आसानी से देखी जा सकती है. जहां एक ओर देश के हरेक कोने का बचपन रोशनी के पर्व को मनाने के अपने तरीके व योजना बना रहा है, वहीं शिवकाशी जो आतिशबाजी उद्योग के लिए प्रसिद्ध है, जहां करीबन 40 हजार बाल मजदूर उनकी खुशियों में चार चांद लगाने के लिए पटाखे बनाने में सक्रिय हैं.

शिवकाशी वह क्षेत्र है जिसे देश की आतिशबाजी राजधानी के रूप में जाना जाता है. यहां लगभग एक हजार छोटी-बड़ी इकाइयां बारूद व माचिस बनाने में बनाने में जुटी हैं जिनका सालाना कारोबार 1000 करोड़ रूपए है. इस उद्योग के चलते एक लाख लोगों की रोजी चलती हैं जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं व बच्चे भी शामिल हैं.

बाल श्रम नाम के अभिशाप की जहां बात चल ही गई है तो यह स्पष्ट कर दें कि शिवकाशी में इसका प्रमाण आसानी से देखा जा सकता है. मसलन, पंद्रह वर्षीय पोन्नुसामी जो यहां एक पटाखा निर्माणी इकाई में कार्यरत है, पांच साल पटाखे बना रहा है. जब उसने यह पेशा चुना तो उसकी समझ का स्तर क्या रहा होगा यह विचारणीय मसला है. उसके अनुसार वह छठी कक्षा का छात्र था जब उसे जबरन इस काम में उतार दिया गया. काम कराने की मंशा भी उनके माता-पिता की ही थी.प्रतिदिन नौ घंटे की कड़ी मेहनत के बाद वह 60 रूपए पाता है. यह बेगारी उसे वयस्क श्रमिकों को मिलने वाली मजदूरी का केवल चालीस फीसदी है. ऎसे कई उदाहरण हैं जिनसे यह स्पष्ट है कि शिवकाशी इलाके के किशोर-किशोरियों की पढ़ाई-लिखाई में गाज गिरने की आशंका रहती है. छोटी उम्र में ही ऎसे खतरनाक काम में झोंकने के मां-बाप के फैसले के पीछे उनकी गरीबी ही मूल कारण है.

कारखानों में हादसे सामान्यत: होते रहते हैं. ऎसे में मासूमों को घातक काम पर लगाने का सवाल जब उठता है तो श्रमिक संगठनों का जवाब होता है कि मृतकों में कोई भी किशोर नहीं है,जबकि दास्तां कुछ अलग ही है. जुलाई 2009 में हुई एक दुर्घटना में तीन बच्चे मर गए.

अगस्त 2010 में तो सरकारी अधिकारियों पर ही गाज गिरी जो अनाधिकृत पटाखा इकाइयों की जांच पर गए थे. बताया गया है कि 8 राजस्व और पुलिस अधिकारियों को इस तहकीकात के दौरान जान से हाथ धोना पड़ा. जब पोन्नुसामी से काम के जानलेवा होने के बारे में पूछा गया तो उसका जवाब यही था कि अगर मैं भाग्यशाली हूं तो कभी हादसा नहीं होगा.

बच्चों के अधिकारों के क्षेत्र में काम करने वाली गैर सरकारी संस्था चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) के अधिकारी जॉन आर की मानें तो शिवकाशी में करीबन 1050 कारखाने हैं जिनमें से 500 बिना किसी लाइसेंस के चल रहे हैं. पटाखों के अलावा 3989 कारखानों में दियासलाई बनती है. वे मानते हैं देश-विदेश में हो रहे प्रयासों के नतीजतन बाल श्रम पर कुछ अंकुश लगा है. हादसों में इजाफा और बच्चों के काम पर लगाने की नौबत गैर लाइसेंसशुदा कारखानों की वजह से आती है जिनका संचालन घरों की असुरक्षित चारदीवारी में होता है.

इन लोगों को लाइसेंस वाली कंपनियां पटाखे बनाने का आदेश दे देती है. अधिक फायदे के लालच व शिक्षा के अभाव में ये लोग आसानी से कानून की दहलीज को लांघ जाते हैं. नाम न छापने की शर्त पर शिवकाशी की ही एक एनजीओ के कार्यकर्ता के अनुसार इस समस्या के बारे में समझ अभी अधूरी है. हम अभिभावकों को जाग्रत करने का प्रयास कर रहे हैं. उन्हें यह समझाया जा रहा है कि वे सीमित आमदनी में गुजर-बसर करते हुए बच्चों के स्वास्थ्य व शिक्षा पर ध्यान दें.

कहावत है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती और अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता. इसी तर्ज पर सरकार, प्रशासन व एनजीओ का प्रयास भी तब तक सफल नहीं हो जाता जब तक कि अन्य पक्षकार जिनमें आतिशबाजी निर्माण इकाइयों के मालिक व अभिभावक शामिल हैं, स्वेच्छा से पहल न करें. अन्यथा उनकी दीपावली कभी भी प्रकाशमान नहीं हो पाएगी. 

सड़ता अनाज सड़ता तंत्र

शिरीष खरे

सरकार चंद पूंजीपतियों के लिए रियायतों का अंबार लगा रही है और करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा के लिए उसके पास न अनाज है और न पैसे का कोई बंदोबस्त. इंडिया शाइनिंग के इस दौर में सरकार को 50,000 करोड़ से अधिक का अनाज सड़ा देना मंजूर है. नहीं मंजूर है तो 8 करोड़ से ज्यादा लोगों की भूख को मिटाने के वास्ते उस सड़ते हुए अनाज में से गरीबों के लिए थोड़ा-सा हिस्सा बांटना. अकाल और कुपोषण के बीच पिसते किसी देश की जनता के लिए क्या उसकी सरकार इस तरह से भी अमानवीय हो सकती है ?



एक तरफ सरकार पूंजीपतियों के लिए 5 लाख करोड़ रूपए की रियायत देती है और दूसरी तरफ भूखे लोगों के लिए कोई इंतजाम नहीं करती है. उलटा भूखे देश की भूख पर परदे डालने के लिए उदाहरण के लिए मुंबई में 19 रूपए से ज्यादा रूपए कमाने वाले को गरीब नहीं मानती है. हकीकत यह है कि आजादी के 63 सालों में प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता बढ़नी चाहिए थी जो लगातार घटती ही जाती है. आजादी के समय से अबतक प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता 440 ग्राम से 436 ग्राम पर आ गई है और इसी तरह दाल की उपलब्धता भी आधी यानी 70 ग्राम से 35 ग्राम ही रह गई है.

दूसरी तरफ असुरक्षित परिस्थितियों में रखे अनाज के त्वरित वितरण से लाखों लोगों को राहत पहुंचाई जा सकती है. जबकि मौजूदा स्थिति यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के 35 किलो अनाज वितरित करने के आदेश को भी एक तरफ रखते हुए फिलहाल देश के कई इलाकों में अधिकतम 20 से 25 किलो अनाज ही वितरित किया जा रहा है. सर्वोच्च न्यायालय के एक और आदेश की अनदेखी करते हुए कई इलाकों में जनवितरण प्रणाली की दुकानें महीने-महीने भर नहीं खुलतीं हैं. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हर राज्य में एक बड़े गोदाम और जिले में पृथक गोदाम बनाने के लिए भी कहा जा चुका है. मगर खाद्य भंडारणों की क्षमता को बढ़ाने और गोदामों की मरम्मत को लेकर सरकार कभी गंभीर नजर नहीं आई है. लिहाजा देश के कई इलाकों में अनाज के भंडारण की समस्या उपजती जा रही है.

जिस देश में सालाना 6 करोड़ टन गेंहूं और चावल की खरीददारी होती है और जिसकी सयुंक्त भंडारण क्षमता 4 करोड़ 80 लाख टन है, उस देश में 6 साल के भीतर गोदामों में 10 लाख 37 हजार 738 टन अनाज सड़ चुका है. 190 लाख टन अनाज प्लास्टिक सीटों के नीचे रामभरोसे पड़ा हुआ है. हर साल गोदामों की सफाई पर करोड़ों रूपए खर्च करने पर भी 2 लाख टन अनाज सड़ जाता है और जब देश का सर्वोच्च न्यायालय अनाज के एक दाने के बर्बाद होने को अपराध मानते हुए अनाज के सड़ने से पहले उसे निशुल्क बांटने का आदेश देता है तो हमारे केंद्र के कृषि मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक 6,000 टन से भी ज्यादा अनाज के खराब होने के अपराध को नजरअंदाज बनाते हुए उल्टा सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की गलत व्याख्या करते हैं और उसकी मर्यादाओं पर ही सवाल खड़े करते हैं.

1947 के बाद से अब तक अगर हम किसानों की अथक मेहनत से उपजे अनाज का सही इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं और हर साल भारतीय खाद्य निगम की गोदामों में रखीं लाखों अनाज की बोरियां खुले में रखे जाने या बाढ़ आ जाने के चलते खराब हो रही हैं तो क्या सरकार को नहीं लगता कि भोजन से जुड़ी नीति, प्रबंधन और वितरण की व्यवस्थाओं पर नए सिरे से सोचे जाने की जरुरत है ?

देखा जाए तो खाद्य सुरक्षा दूसरा सवाल है. पहला सवाल पूंजीपतियों के लिए देश की आम जनता से उनके संसाधनों को छीने जाने से जुड़ा है. अगर संसाधनों को लगातार यूं ही छीना जाता रहा तो खाद्य के असुरक्षा की स्थितियां सुधरने की बजाय तेजी से बिगड़ती ही जाएंगी. जहां आदिवासियों को उनके जल, जंगल, जमीन से अलग करके उन्हें भूख और बेकारी की ओर ले जाया जा रहा है, वही सेज के नाम पर खुली लूट की जैसे छूट ही दे दी जा रही है. कहने का मतलब है नीतिगत और कानूनी तौर पर सभी लोगों को आजीविका की सुरक्षा को दिये बगैर भोजन के अधिकार की बात बेमतलब ही रहेगी. भोजन केअधिकार से जुड़े कार्यकर्ता मांग कर रहे हैं कि 5 सदस्यों के एक परिवार के लिए 50 किलो अनाज, 5.25 किलो दाल और 2.8 खाद्य तेल दिया जाए. बीपीएल और एपीएल को पात्रता का आधार नहीं बनाया जाए. सार्वजनिक वितरण की व्यवस्था के साथ-साथ सरकारी खरीदी और वितरण की विकेन्द्रीकृत व्यवस्था हो. व्यक्ति/एकल परिवार को इकाई माना जाए और राशन कार्ड महिलाओं के नाम पर हो. जल स्त्रोत पर पहला अधिकार खेती का हो. इसके साथ ही यह भी नहीं भुलाया जा सकता कि आजादी की बाद से अबतक विकास की विभिन्न परियोजनाओं और कारणों के चलते 6 करोड़ बच्चों का भी पलायन हुआ है. मगर बच्चों के मुद्दे अनदेखे ही रहे हैं और उनके लिए खाद्य सुरक्षा की गारंटी दिये बगैर विकास के तमाम दावे बेबुनियाद ही रहेंगे. इसे भी असंवेदनशीलता का चरम ही कहेंगे कि एक सेकेण्ड के भीतर 5 साल के नीचे का एक बच्चा कुपोषण की चपेट में आ जाने के बावजूद कोई नीतिगत फैसला लेने की बात तो दूर ठोस कार्यवाही की रूपरेखा तक नहीं बन पा रही है. अगर कुपोषण और भूख के चलते देश का आने वाला कल कहे जाने वाले 47 प्रतिशत बच्चों का अपनी उम्र के अनुपात में लंबाई और वजन नहीं बढ़ पाता है तो इसे किस विकास का सूचक समझा जाए ?

अंतत: अनाज का साद जाना एक अमानवीय और आपराधिक प्रवृति है और देश में अनाज भंडारण की उचित व्यवस्था और बेहतर विकल्प तलाशने लिए एक ऐसे संवेदनशील और पारदर्शी तंत्र विकसित करने की भी जरुरत है जो भूख से जुड़े विभिन्न पहलूओं पर कारगार ढ़ंग से शिनाख्त और कार्यवाही करने में सक्षम हो. अन्यथा हर साल लाखों टन अनाज खराब होने, अनाज की कीमत आसमान छूने, खेती के संकट, सूखे की मार और गरीबों के पेट खाली होने से जुड़े समाचारों पर परदे डालने के लिए हमारे पास आर्थिक शक्तियों का दिखावा करने वाली राष्ट्रमंडल खेलों की सुर्ख़ियों के अलावा कुछ नहीं होगा ?



27.10.10

पहले पंचायत चले हम

शिरीष खरे



गांवों के बच्चे बड़ी संख्या में मजदूर बनते जा रहे हैं. अगर बच्चों की संख्या स्कूलों की बजाय काम की जगहों पर ज्यादा मिल रही है तो उनके लिए 'स्कूल चले हम' से पहले 'पंचायत चले हम' का नारा देना जरूरी लगता है.

चाहे गांवों के विकास का हवाला हो या गांवों के लगातार टूटे जाने का मौजूदा हाल हो बच्चों के मुद्दों को बहुत पीछे रखा जा रहा है. खास तौर से गांवों के लगातार टूटे जाने के मौजूदा संदर्भ में बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं. इसे देखते हुए नीतिगत प्रक्रियाओं में बच्चों को केन्द्रीय स्थान देने की जरुरत है. लेकिन विकराल स्वरूप लेते जाने के बावजूद बाल मजदूरी जैसी समस्या जहां मुख्यत: राजनैतिक तौर से नजरअंदाज बनी हुई है, वहीं स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक बच्चों से जुड़े तमाम सवालों को भी बहुत हल्के ढ़ंग से लिए जाने की मानसिकता घर बना चुकी है.

खुशहाल, स्वस्थ्य और रचनात्मक बचपन का सूत्र गांवों के भविष्य का आधार है लेकिन बच्चों के मुद्दों को पंचायत की नीतियों से भी अलग-थलग करने या वरीयता की सूची में निचले पायदान पर रखे जाने से ग्रामीण बच्चों की तस्वीर दिन-ब-दिन बदसूरत देखी जा रही है. जाहिर है कि ग्राम पंचायतों में पंच-सरपंचों और सचिवों से सकारात्मक रुख की अपेक्षा किए बगैर यह तस्वीर नहीं सुधरने वाली है. ऐसे में स्थानीय समुदायों का महत्व बढ़ जाता है जो बाल अधिकारों और संरक्षणों को लेकर अपने-अपने जन-प्रतिनिधियों के साथ लगातार बैठकों को आयोजित करके उन्हें संवेदनशील बना सकते हैं. इसके लिए स्थानीय स्तर पर खास तौर से वंचित समूह के बच्चों की समस्याओं, उनकी जरूरतों और ताकतों की पहचान करके, स्थानीय स्तर पर संचालित विभिन्न योजनाओं के भीतर उन्हें और उनके परिवारजनों के लिए विकल्प तलाशे जा सकते हैं. इसके दूसरे सिरे के रूप में निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों को अपनी प्रशासन अकादमियों से संपर्क बढ़ाने की जरुरत है जिसके जरिए जरूरी जानकारियों को लेते हुए कार्यवाही करने में सहूलियत हो सके.

ग्रामीण इलाकों में बच्चों के लिए काम करने के दौरान बाल अधिकारों से जुड़े मुद्दों को केवल ग्रामीण परिवेश में ही देखने से काम नहीं चलेगा बल्कि उससे जुड़ी कुछ बुनियादी घटनाओं, नीतियों और पहलूओं को भी समझना जरूरी होगा. इससे सभी बच्चों के अधिकारों को सुनिश्चित किया जाना संभव हो सके. उदाहरण के लिए 2 सितम्बर, 1990 को सयुंक्त राष्ट्र के बाल अधिकार समझौता पर विश्व के दो देशों (अमेरिका एवं सोमालिया) को छोडक़र सभी ने हस्ताक्षर किए तथा बच्चों के अधिकारों और संरक्षणों को लेकर पहल की. भारत ने 11 दिसम्बर, 1992 को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए. बाल अधिकार समझौते में 18 साल की आयु तक के बच्चों के अधिकारों और संरक्षणों की बात कही गई है. जबकि भारत में 0 से 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों को ही बच्चा मानकर उनके अधिकारो के संरक्षण के लिये कानूनी प्रावधान किये गये हैं. यही नहीं अलग-अलग अधिनियमों के मुताबिक बच्चों की उम्र भी बदलती जाती है. जैसे किशोर-न्याय अधिनियम, 2000 में 18 साल, बाल-श्रम अधिनियम, 1886 में 14 साल, बाल-विवाह अधिनियम में लड़के के लिए 21 साल और लड़की के लिए 18 साल की उम्र तय की गई है. खदानों में काम करने की उम्र 15 और वोट देने की उम्र 18 साल है. इसी तरह शिक्षा के अधिकार कानून में बच्चों की उम्र 6 से 14 साल रखी गई है. इससे 6 से कम और 14 से अधिक उम्र वालों के लिए शिक्षा का बुनियादी हक नहीं मिल सकेगा. इसी तरह भारत में बच्चों की उम्र को लेकर भी अलग-अलग परिभाषाएं हैं. इसी तरह विभिन्न विभागों और कार्यक्रमों में भी बच्चों की उम्र को लेकर उदासीनता दिखाई देती है. 14 साल तक के बच्चे ‘युवा-कल्याण’ मंत्रालय के अधीन रहते हैं. लेकिन 14 से 18 साल वाले बच्चे की सुरक्षा और विकास के सवाल पर चुप्पी साध ली जाती है. बच्चों के अधिकारों में प्रमुख रूप से चार अधिकार- जीने का अधिकार, विकास का अधिकार, सुरक्षा का अधिकार और विचारों की सहभागिता का अधिकार आते हैं.

बच्चों को सुरक्षित माहौल देने के लिए ग्राम सभा की बैठकों में बच्चों के साथ बाल अधिकारों के बारे में अलग से चर्चा का सिलसिला शुरू किया जा सकता है. बच्चों को सुरक्षित माहौल देने के संबंध में उनका शोषण रोकने, उन्हें बाल मजदूरी से मुक्त रखने और हिंसा से बचाव करने जैसे मामले प्रमुख हैं. हर बच्चा स्कूल जाये, उसे अच्छा खाना मिले, बच्चा अपराधी न बने इसके लिये समुदायों द्वारा चाइल्ड लाईन भी अपनी अहम भूमिका निभा सकते हैं. इस दिशा में मध्य-प्रदेश के भोपाल में चाइल्ड लाईन 1098 को उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है. जिसके जरिए बीते 1 दशक में तकरीबन 1 लाख बच्चों की मदद की जा सकी है. इस तरह समुदायों के आपसी सहयोग से संचालित बाल अधिकारों के हनन की सूचना चाइल्ड लाईन पर दी जा सकती है. कानून में बच्चों को प्रताड़ित करने वालों में से किसी को भी नहीं छोड़ा गया है और परिवारजनों सहित सभी लोगों के लिए सजा का प्रावधान रखा गया है.

पंचायतों में गठित समितियों को सशक्त बनाकर बाल अधिकारों का संरक्षण किया जा सकता है. इसके तहत कई महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान देने की जरुरत है, जैसे बच्चे के पैदा होते ही उसके जन्म पंजीयन का अधिकार है जिसे गांवों में ग्राम पंचायतें पूरा करती हैं. विकलांग एवं परिवारविहीन बच्चों के भी अपने अधिकार हैं जिसे जिला स्तर पर गठित बाल कल्याण कमेटी के माध्यम से पूरा कराया जा सकता हैं वगैरह.

सभी बच्चों खास तौर से बालिकाओं को शिक्षा दिलाने के लिए ग्रामीण परिवेश में भी जागरूकता लाने की जरूरत है. गैरबराबरी को बच्चियों की कमी नही बल्कि उनके खिलाफ मौजदू स्थितियों के तौर पर देखा जाना चाहिए. अगर लडक़ी है तो उसे ऐसा ही होने चाहिए, इस प्रकार की बातें उसके सुधार की राह में बाधाएं बनती हैं. इसके चलते समाज में कन्या भ्रूण हत्या, बाल दुर्व्यवहार और बाल विवाह जैसी समस्याएं पलती-बढ़तीं हैं. सामाजिक धारणा को समझने के साथ-साथ बच्चियों को बहन, बेटी, पत्नी या मां के दायरों से बाहर निकालने और उन्हें सामाजिक भागीदारिता के लिए प्रोत्साहित करने में मदद के तौर पर जाना जाए. समाज में जागरूकता आने के बावजूद अब भी लोग बेटी नहीं बेटे चाहते हैं जबकि क्राई के अध्ययनों में यह साफ् हुआ है कि लडकियां व्यक्तिगत और सामूहिक रूप में समाज की पुरानी परंपराओं को तोड़कर आगे बढ़ रही हैं और भेदभाव को स्वीकार नहीं कर रही हैं. वे मंजिल हासिल करने की दिशा में बढ़ने लगी हैं.

20.10.10

सूरत बदलने की बदसूरत कवायद

शिरीष खरे

सूरत/ एक जमाने में विकास के लिए 'गरीबी हटाओ' एक घोषित नारा था. मगर आज आलम यह है कि विकास के रास्ते से 'गरीबों को हटाना' एक अघोषित एंजेडा बन चुका है. गुजरात के सूरत को देख कर यह समझा जा सकता है कि 'गरीबी की बजाय गरीबों को हटाने' का जो व्यंग्यात्मक मुहावरा था, वह आज किस तरह से गंभीर हकीकत में तब्दील हो चुका है.

सैकड़ों झोपड़ियों को तोड़ जाने के क्रम में जब झोपड़पट्टी तोड़ने वाले जलाराम नगर के 40 वर्षीय लक्ष्मण चंद्राकार उर्फ संतोष की झोपड़ी को तोड़ने लगे तो उसने केरोसिन डालकर अपने आप को मौत के हवाले करना चाहा था. उसके बाद उसे एक एम्बुलेंस से न्यू सिविल हास्पिटल भेजा गया. वहां पहुंचते-पहुंचते उसके शरीर का 75 प्रतिशत हिस्सा जल गया. उधर डाक्टरों ने संतोष की हालत को बेहद गंभीर बताया और इधर सूरत महानगर पालिका ने शाम होते-होते ताप्ती नदी के किनारे से तीन बस्तियों के हजारों बच्चों, बूढ़ों और औरतों को खुली सड़क पर ला दिया था.

फिलहाल सूरत के गरीबों को न तो साम्प्रदायिक दंगों का सामना करना पड़ रहा है और न ही बाढ़ या भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं का ही. अब उनके साथ जो कुछ घट रहा है, वह सूरत को जीरो स्लम बनाने की सरकारी कवायद का हिस्सा है.

सूरत को जीरो स्लम बनाने के लिए सूरत की कुल 1 लाख से ज्यादा झोपड़ियों को तोड़ा जा रहा है. मगर सरकारी दस्तावेजों पर पुनर्वास के लिए केवल 42000 घर बनाए जाने का उल्लेख है. जाहिर है 58000 से ज्यादा झोपड़ियों का सवाल हवा में है. एक तरफ सालों से घरों को तोड़े जाने का सिलसिला थम नहीं रहा है और दूसरी तरफ इतना तक तय नहीं हो पा रहा है कि घर मिलेंगे भी तो किन्हें, कैसे, कहां और कब तक ?

जबकि 2009 के पहले-पहले सूरत की सभी झोपड़ियों के परिवारों को नए घरों में स्थानांतरित करने का लक्ष्य रखा गया था. मगर उजाड़े गए लाखों रहवासियों के हिस्से में आज तक शहर की सीमारेखा से कोसों दूर कोसाठ या अन्य इलाकों में बसाए जाने का आश्वासन भर है. उनके लिए अगर कुछ और भी है तो प्रशासन द्वारा बमरोली और बेस्तान जैसे इलाकों में चले जाने जैसा सुझाव.

यकीकन इनदिनों शहर की सूरत तेजी से बदल रही है और उसी के सामानांतर तबाही, कार्यवाही, जवाबदारी और राहत से जुड़े कई किस्से भी पनप रहे हैं.


ऐसे बनेगा जीरो स्लम
यह किस्सा बरसात से थोड़े पहले का है. जब सूरत महापालिका ने अपने लक्ष्य का पीछा करते हुए सुभाषनगर, मैनानगर और उदना इलाके से 1650 झोपड़ियों को तोड़ा था. उस समय सूरत को झोपड़पट्टी रहित बनाने के मिशन ने 8500 से भी ज्यादा लोगों के सिरों से उनका छत छीना था. उसी के साथ क्योंकि तुलसीनगर और कल्याणनगर की एक सड़क व्यवस्था को भी ठिकाने पर लाना था, इसीलिए 5000 से ज्यादा गरीबों को ठिकाने लगाया गया था. इसके आगे सेंट्रल जोन की सड़क को भी 80 फीट चौड़ा करने के लिए 2500 से ज्यादा लोगों को शहर की खूबसूरती के नाम पर उजाड़ा गया था.

उजाड़ने के बाद प्रशासन का दावा था कि शुरू में तो रहवासियों ने डेमोलेशन का बहुत विरोध किया मगर बाद में कोसाठ में बसाने की बात पर सब मान गए. जबकि यहां से उजाड़े गए रहवासियों का कहना था कि उन्हें डेमोलेशन की सूचना तक नहीं दी गई थी. डेमोलेशन की कार्रवाई को बड़ी निर्दयतापूर्वक पूरा किया गया और जिसके चलते उन्होंने प्रशासन का विरोध भी किया था.

इसके बाद प्रशासन की तरफ से यह साफ हुआ है कि उसके अगले निशाने पर कौन-कौन सी बस्तियां रहेंगी. उसने स्लम डेमोलेशन का अपना लक्ष्य सामने रखा और उसे कुछ दिनों के भीतर पूरा कर लेने का ऐलान भी किया. कुछ दिनों के भीतर बापूनगर कालोनी के तकरीबन 2700 घरों में 15000 से भी ज्यादा लोगों को भी उजाड़ दिया गया.

दूसरा किस्सा सर्दी के समय का है. जब सूरत महापालिका ने कार्यालय के समय यानी 10 से 6 बजे तक जेपी नगर, जलाराम नगर और इकबाल नगर से कुल 502 झोपड़ियों को तोड़ने का रिकार्ड दर्ज किया. पुलिस के भारी बंदोबस्त के बीचोंबीच तनावपूर्ण स्थिति को नियंत्रण में बनाए रखते हुए 4000 से ज्यादा रहवासियों से उनका पता-ठिकाना छीन लिया गया. कुल मिलाकर ताप्ती नदी के आजू-बाजू कई दशक पुरानी इन बस्तियों से 1700 से ज्यादा झोपड़ियों को साफ किया जाना था. अर्थात् 14000 से ज्यादा रहवासियों से उनका पता-ठिकाना छीना जाना था.

जैसा कि महापालिका के बस्ती उन्नयन विभाग से सी वाय भट्ट ने भी जताया कि "नदी और खाड़ी के इर्द-गिर्द जमा झोपड़ियों को साफ करने के लिए डेमोलेशन की कार्रवाई जारी रहेगी." डेमोलेशन की यह कार्रवाई अगले रोज भी जारी रही. मगर सूरत के बाकी इलाकों को तोड़े जाने के अगले चरणों और उनकी तारीखों के सवालों पर एक बार फिर से खामोशी औड़ ली गई. आगे-आगे डेमोलेशन, उसके पीछे-पीछे महापालिका वाले नल, गटर के पाईप और बिजली के तार काटते रहे थे.

सुबह-सुबह, कोई सूचना दिए बगैर, यकायक और पूरे दल-बल के साथ झुग्गी बस्तियों को नेस्तानाबूत करने की प्रशासनिक रणनीति को अब सूरत के रहवासी खूब जानते हैं. इन झोपड़ियों को साफ किए जाने के पहले पुलिस रात को ही उन सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं को हिरासत में ले लेती है, जो महानगर पालिका द्वारा गरीबों को शहर से हटाए जाने वाली मुहिम के विरोधी होते हैं.

उस रोज भी जेपी नगर, जलाराम नगर और इकबाल नगर के रहवासी यह कहने लगे कि घर के बदले घर दिए बगैर हमारे घरों को कैसे उजाड़ा जा रहा है? मगर प्रशासन के लिए यह कोई नया सवाल नहीं था. उनका ध्यान तो झोपड़पट्टी तोड़ने के दौरान 'अधिकतम नुकसान पहुंचाने' के सिद्धांत पर टिका था.

अंधियारा छाने के बहुत पहले ही बस्ती वालों के असंतोष ने आग पकड़ ली थी. देखते ही देखते एक भारी भीड़ पथराव करते हुए आगे बढ़ने लगी. हर एक के हाथों में उनके दुख, दर्द, उनकी आशंकाओं और हताशाओं से भरी भावनाओं में डूबे जनसैलाब के अलावा कुछ न था. इसके बाद मुस्तैद पुलिस वाले आगे आएं और उन्होंने बस्तियों की तरह उनके जनसैलाब को भी लाठीचार्ज के जरिए माटी में मिला दिया. उसके ऊपर से आंसू गैस के दो गोले भी छोड़े गए. ऐसे में जिनकी झोपड़ियां टूटी थीं, उनके लिए कम से कम 2000 रुपये का किराया चुका कर भाड़े का मकान लेना आसान नहीं था. उससे भी बड़ा सवाल तो यही था कि झोपड़पट्टी में रहने वालों को किराये पर मकान देगा कौन?

सामाजिक कार्यकर्ता भरत भाई कंथारिया ने बताया "डेमोलेशन की ज्यादातर कार्यवाहियों मौसम के मिजाज को बिगड़ते हुए देखकर की जाती हैं. सारे झोपड़े एक साथ न तोड़कर, कभी 200 तो कभी 400 की संख्या में तोड़े जाते हैं, जिससे लोग संगठित न हो सकें. ऐसे हमले अचानक और बहुत जल्दी-जल्दी होते हैं. दीवाली का त्यौहार जब सिर पर होगा तो सरकारी नजरिए से वह डेमोलेशन के लिए आदर्श समय होगा."


कारपोरेट की वल्ले-वल्ले
टेम्स नदी से लगे लंदन वाली तस्वीर के हू-ब-हू सूरत को लंदन जैसा बनाने की गति अपने चरम पर है. इसलिए ताप्ती के किनारे से हजारों झापड़ियों को साफ किए जाने की गति अपने चरम पर है. सूरत में स्लम एरिया हटाने के लिए केन्द्र की यूपीए और राज्य की भाजपा सरकार ने मिलकर 2157 करोड़ की रणनीति बना ली है. वहीं सूरत महापालिका का काम जमीनें खाली करवाना और बिल्डरों को सस्ते दामों में बेचना रह गया है.

कतारगाम इलाके का यह वाकया शहर के नक्शे से न केवल गायब हो जाने का बल्कि व्यवस्था के गायब हो जाने का वाकया भी है.

चंद्रकांत भाई रोज की तरह शाम को काम पर लौटे तो पूरी बस्ती को ही लापता देखा. जब उन्होंने पता किया कि पता चला कि बस्ती के बहुत सारे लोग शहर से बाहर कोसाठ नाम की एक जगह पर पहुंच गए हैं. तब अपने घरवालों से मिलने के लिए उन्हें रिक्शा करके फौरन कोसाठ जाना पड़ा.

जून 2004 में बस्ती के 155 घरवाले कारपोरेट के मुनाफे की भेट चढ़ाए गए थे. यहां की 2 एकड़ जमीन पर कभी 250 घरों की 2000 आबादी बसती थी. 90 साल पुरानी इस बस्ती की जमीन ने करोड़ों का भाव पार किया तो यहां के असली मालिकों को सस्ते घरों समेत उखाड़ फेंका गया. गायत्री बेन ने बताया "न सूचना दी, न सुनवाई की. वैसे भनक लग गई थी कि वहां सुन्दर तालाब बनेगा. हमारी जगह पिकनिक वाली जगह में बदलेगी. पार्किंग और गार्डन को जगह मिलेगी. सुबह-शाम टहलने वालों का 'स्पेशल रुट' बनेगा. बिल्डरों की दुकानें खुलेंगी. बस्ती की बजाय बाजार खुलेगा. आप तो वहीं से आ रहे हैं तो आप ही देखिए हमारी बातें कितनी सच साबित हुईं."

शहरों में विकास के नाम पर झोपड़ियां टूटने की खबर अब नई नहीं लगती. मगर कारपोरेट के नाम पर झोपड़ियां टूटने का किस्सा शायद आप पहली बार सुन रहे होंगे. सूरत में जगमगाता मिलेनियम मार्केट एक उदाहरण भर है. मिलेनियम मार्केट, साऊथ-वेस्ट में कोहली खाड़ी से लगा है. वैसे 2 एकड़ से ज्यादा जमीन पर फैले इस टेक्स्टाईल मार्केट का पता कोई भी बता देगा. मगर उनमें से कुछेक ही यह जानते हैं कि 1999 के पहले तक यहां कोई 800 झोपड़ियों का वजूद था.अब तो लगता भी नहीं कि यहां कभी 5000 से ज्यादा की बस्ती थी.5000 आबादी को यहां से साफ करके शहर से 25 कलोमीटर दूर बेस्तान में ठिकाने लगा दिया गया था.

मालम भाई बंजारा बताते हैं कि "हमारा बीता कल कोई सोने जैसा नहीं था. मगर इतना काला भी नहीं था. तब हमारे सस्ते झोपड़े चांदी की जमीन पर जो खड़े थे." उन्होंने चका भाई को देखते हुए कहा "आज मेलेनियम मार्केट की जमीन 100 करोड़ रूपए की तो होगी चका भाई?"

चका भाई फूट पड़े "हम झोपड़पट्टी के करोड़पतियों को 1 रूपए दिए बगैर वहां से खदेड़ा गया था. ऊपर से घर-सामान टूटने का जो नुकसान झेला, उसका हिसाब तो जोड़ा भी नहीं कभी." अन्याय की ईबारत इसके बाद भी नहीं रूकी- लंबे इंतजार के बाद मकान दिए भी तो 55000 के लोन पर. और मकानों का साईज निकला- 10 गुणा 12 वर्ग फीट.


राहत के सवाल पर
21 फरवरी 2009 को नरेन्द्र मोदी सूरत के कोसाठ आने वाले थे. मकसद था कि कोसाठ में जो 30000 मकान बन रहे हैं उनमें से 3700 परिवारों को मकान सौंपे जाए. मगर 20 फरवरी तक यह तय नहीं हो पाया कि किस झोपड़े को यहां शिफ्ट किया जाए. कार्यक्रम तो फेल होना ही था. मगर अहम बात यह है कि आज की तारीख तक उन हजारों झोपड़ों के नाम तक तय नहीं हो सके हैं.

सूरत महापालिका के कायदे में झोपड़पट्टी में कुल बजट का 10 प्रतिशत खर्च करना लिखा है. मगर सामाजिक कार्यकर्ता भरत भाई कंथारिया ने बताया कि "इस बार यह हिस्सा पुनर्वास के खाते में डाल देने से बुनियादी चीजों में कटौती हुई है. मतलब पुनर्वास पर अलग से पैसा खर्च करने की बजाय गरीबों के हिस्से का पैसा गरीबों को ही बांट दिया गया है."

2005-06 में सूरत की 407 झोपड़पट्टियों को हटाने के लिए बायोमेट्रिक सर्वे हुआ. उसके मुताबिक पुनर्वास के लिए जो मकान बनेगा उसमें से कुल खर्च का 50 प्रतिशत केन्द्र सरकार, 25 प्रतिशत राज्य सरकार, बाकी के 25 प्रतिशत में से जिसको मकान मिलेगा वह और सूरत महापालिका आपस में डील करेगी. अगर यह डील कामयाब रही तो भी मकान के मालिक को 5 साल तक मकान के दस्तावेज नहीं मिलेंगे. मतलब यह कि किसी के हिस्से में मकान आया भी तो वह मुफ्त में और बाईज्जत तो नहीं आने वाला.

2007 को ताप्ती नदी की धार को रोकने के लिए जब एक दीवार बनी तो इसके घेरे में सुभाषनगर की तकरीबन 800 झोपड़ियां भी आ गईं. यह दीवार सिंचाई विभाग ने खड़ी की थी इसलिए झोपड़ियां भी उसी ने तोड़ी. मगर तोड़ने का नोटिस कलेक्ट्रर ने भेजा. सूरत महापालिका के बड़े गेट पर मौजूद कन्हैया भाई बंजारा ने बताया "जब हम पुनर्वास की मांग लेकर सिंचाई-विभाग के पास गए तो बाबू लोग बोले पुनर्वास का काम हमारे दायरे में नहीं आता, कलेक्ट्रर साब शायद कुछ बता पाएं. कलेक्ट्रर साब के पास गए तो वह बोले कि मैं तो केवल मोनीटिरिंग करता हूं, सूरत महापालिका कुछ बताएगा. सूरत महापालिका ने कहा कि तोड़-फोड़ तो सिंचाई विभाग और कलेक्ट्रर की तरफ से हुआ, हम क्या बताएं? मगर जब जनता के स्वर ऊंचे हुए तो बायोमेट्रिक सर्वे करा लिया गया. इसमें भी गजब पालिटिक्स हुई. नतीजा यह है कि दर्जनों नए नाम जुड़ गए और पुराने नाम छूट गए." कन्हैया भाई बंजारा उन्हीं में से अब एक छूटा हुआ नाम बन चुके है.

सूरत के लोगों में बहु-विस्थापन की दहशत भी बढ़ रही है. जैसे कि आज मीठी खाड़ी की जिन झोपड़ियों को उखाड़ा जा रहा है, उनमें से कई ऐसी हैं जिन्हें 25 साल पहले उमरबाड़ा से उखाड़ा गया था. अन्तर बस इतना भर है कि पहले सड़क चौड़ी करने के नाम पर उखाड़ा गया था और अब फ्लाईओवर बनाने के नाम पर उखाड़ा जा रहा है.

कोसाठ, विस्थापितों की जगह से 15 से 25 किलोमीटर दूर, शहर के उत्तरी तरफ का आऊटसाइडेड और नक्शे के हिसाब से बाढ़ प्रभावित इलाका है. कौशिक भाई ने बताया "यहां बसाए जाने का विरोध सुनकर महापालिका का अफसर बड़े ठण्डे दिमाग से बोला कि तुम्हें बस्ती बनाने की बजाय ऊंची मंजिलों में रहना चाहिए. बारिश का पानी भरे भी तो दूसरी, नहीं तो तीसरी मंजिल में चढ़ जाना."

तारीखें गवाह हैं कि 2004 की बाढ़ से सूरत के 30000 लोग प्रभावित हुए थे. तब उन्हें न मंजिल नसीब हुई, न जमीन. एक साल बाद महापालिका से जगह यानी 12 गुणा 35 वर्ग फीट प्रति 2 लाख के बदले जगह माटी के दाम जैसी तो मिली लेकिन घर के बदले घर नहीं. न ही तोड़े गए लाखों के घरों और हजारों की गृहस्थियों का मुआवजा. एक साथ इनसे बिजली, पानी, नालियां, टायलेट, रास्ते, मैदान, बाजार, आंगनबाड़ी, स्कूल, राशनकार्ड, वोटरलिस्ट के नाम ऐसे छूटे कि अभी तक नहीं लौटे. उनके बगैर भी काम चल जाता, जब काम की छूट गए तो जिंदगी कैसे चले?


काम और कर्ज का रोना है
"जमीन, घर, गृहस्थी का नुकसान तो सबने देखा. मगर सबसे ज्यादा नुकसान तो बेकारी से हुआ." सूरज महापात्र यह सब बोलते हुये उदासी में डूब जाते हैं.

कोसाठ में उनकी तरह ही दर्जन भर औरत-मर्द अपने-अपने ठिकानों के बाहर खाली बैठते हैं. बातों ही बातों में मालूम पड़ा कि पहले इन्हें कतारगाम इण्डस्ट्रियल एरिया के पावरलूम्स में दिहाड़ी मजदूरी मिल जाती थी. एक दिन में 150 और महीने भर में 3500 से 4000 रूपए तो बनते ही थे. कुछ लोग मजदूरों की छोटी-छोटी जरूरतों जैसे चाय, नाश्ता या खाने-पीने के धंधों से जुड़े थे. औरतें घरेलू काम के लिए आसपास की सोसाइटियों में जातीं और महीने भर में 600 रूपए कमाती थीं. इस तरह हर घर का हाल-चाल बहुत अच्छा तो नहीं था मगर फिर भी चल तो रहा था. यहां आकर तो इनकी दुनिया ठहर ही चुकी है.

अज्जू मियां ने कहा "कतारगाम आओ-जाओ तो 40 रूपए अकेले आटो के. इसके बाद मजदूरी न मिले तो आफत. तब कारखानों के आसपास थे तो मजदूरी मिलती ही थी. अब आसपास के दूसरे लोगों को ही रख लेते हैं." यही हाल औरतों का है. घरों में काम करने से 600 रूपए मिलेगा उससे दोगुना 1200 रूपए तो अब भाड़े में जाएगा.

रक्षा बेन कहती हैं "मालकिनों से जरूरत की चीजें और उधार के पैसे तो मिलते थे. यहां तो ऊंचे ब्याज-दर पर पैसे उठाने पड़ते हैं." महीना भर पहले ही हेमंत भाई की बीबी टीबी के चलते खत्म हुईं. उन्होंने ईलाज के लिए 12 रूपए/महीने के हिसाब से 10,000 उठाए थे. एक तो आमदनी नहीं और ऊपर से कर्ज का बढ़ता बोझ. यहां हर एक कम से कम 25,000 रूपए का कर्जदार तो बना ही रहता है. इनमें से ज्यादातर ने घर बनाने के लिए कर्ज लिया था. जिसका ब्याज अब तक नहीं छूट रहा है.

राजेश भाई रिक्शा चलाते हैं. उन्होंने अधूरे खड़े घरों का इतिहास बताने के लिए 4 साल पुरानी बात छेड़ी "तब 29 दिनों तक तो ऐसे ही पड़े रहे. बीच में जोर की बारिश हुई तो सबने चंदा करके यहां एक टेंट लगवाया. कईयों ने अपने टूटे घरों की लकड़ी, पन्नी और बांस से अस्थायी घर बनाए, जो भारी बाढ़ में बह गए. मेरी 90 साल की नानी और एक पैर से कमजोर मौसी ने जो तकलीफ झेली उसे कैसे सुनाऊं और बीबी टीबी की मरीज थी, उसे बच्ची को लेकर मायके जाना पड़ा."

यहां कच्चे-पक्के आशियाने एक बार बनने के बाद खड़े नहीं रहते. हर साल की बाढ़ से टूटते, फूटते, गिरते या बहते ही हैं. इस तरह मानसून के साथ आशियाने बनाने और सामान खरीदने की जद्दोजहद जारी रहती है. इस साल भी भारी बूंदों के साथ तबाही के बादल बरसने लगे हैं.


यह एसएमसी का राज है भाई
सूरत महापालिका प्रशासन तरीके को टीना बेन के किस्से से समझते हैं. 1992 को टीना बेन 14 साल की थी, तब उन्हें घर के सामने खड़ा करके एक स्लेट पर उनका नाम और उनके परिवार वालों का नाम लिखवाकर फोटो ले लिया गया. 2005 को यानी ठीक 12 साल बाद जब वह दो बच्चों की मां बनी तो भी उन्हें 1992 की फोटो के हिसाब से घर का मुआवजा दिया गया. समय के इतने बड़े अंतराल में घर तो क्या शहर की पूरी दुनिया ही बदल जाती है. मगर नहीं बदलती है तो सूरत महापालिका की मानसिकता.

कतारगाम में किसी का घर 30 तो किसी का 60 फीट की जगह पर था. मगर कोसाठ में सभी को 12 गुणा 35 वर्ग फीट के फार्मूले से जगह बांटी गई. अब आप ही बताइए 12 गुणा 35 वर्ग फीट में कोई क्या बनाएगा, जो बनेगा उसे चाहे तो किचन कह लीजिएगा, नहीं तो टायलेट, बाथरूम, बेडरूम, हाल या गेलरी, कुछ भी कह लीजिए.

ऐसी बस्तियों में लम्बे समय से काम करने वाले अल्फ्रेड भाई ने बताया "महापालिका जिन मकानों को तोड़ने की ठान लेती है उनसे टैक्स वसूलना बंद कर देती है. जिससे टैक्स नहीं लिया जाता वह डर जाता है कि अगला नम्बर उसका भी हो सकता है."


कायदे, वायदे और हकीकत
सामाजिक कार्यकर्ता भरत भाई कंथारिया से यह मालूम हुआ कि इस दौरान संयुक्त राष्ट्र की गाईडलाईन निभानी जरूरी थी. मगर सूरत में डेमोलेशन के पहले और बाद में मानव-अधिकारों का खुला उल्लंघन आम बात हो चुकी है. जिन्हें उखाड़ना था, उनके साथ बैठकर पुनर्वास और राहत की बातें की जानी थीं.

गाईडलाईन कहती है कि विकलांग, बुजुर्ग और एसटी-एससी को उनके रोजगार के मुताबिक और पुराने झोपड़े के पास ही बसाया जाए. पीड़ित आदमी को पहले पुनर्वास वाली जगह दिखाई जाए. इसके बाद अगर वह मांग करता है तो उसे अदालत में जाने का हक भी है. इसके लिए कम से कम 90 दिनों का समय भी दिया जाए. मगर सूरत महापालिका ने तो एक भी कायदा नहीं निभाया.

जैसा कि सब जानते हैं महात्मा गांधी को 'कालेपन' की वजह से एक रात दक्षिण-अफ्रीका में चलती ट्रेन से फेंका गया था. उन्हीं महात्मा को अपना बताने वाले गुजरात के सूरत में हजारों भारतीयों को 'झोपड़पट्टी वाला' होने की वजह से 25 किलोमीटर दूर फेंका गया है. 120 साल पहले हुए अन्याय का किस्सा यहां का इतिहास नहीं वर्तमान और शायद भविष्य भी है.


कैसी पहेली जिंदगानी
राजीवनगर झोपड़पट्टी के लोग कहते हैं कि सूरत महापालिका के अफसरों की जिद के आगे सभी नतमस्तक हैं. असल में महापालिका ने इनके लिए फ्लेट बनवाएं और अब यही लोग कागजों की भूल-भुलैया में गोते खा रहे हैं. आमतौर पर ऐसी बस्तियों के लोग नहीं जानते कि एक दिन उनके घर टूटेंगे. एक दिन उनसे यहां रहने के सबूत मांगे जाएंगे. इसलिए वह कागजों को इकट्ठा नहीं कर पाते. ऐसी बस्तियों के लोग किस कागज के टुकड़े का मतलब नहीं जानते. अफसरों को जो कागज चाहिए उनमें से कुछ कागज यहां के ज्यादातर रहवासियों के पास नहीं हैं. यह रहवासी अफसरों को अपनी झुग्गी दिखाना चाहते हैं. इसके बावजूद कई लोगों को अपने झोपड़ियों का हक नहीं मिल पा रहा है. कुलमिलाकर पूरी योजना आफिस-आफिस के खेल में उलझ चुकी है.

राजीवनगर के 1200 में से सिर्फ 94 परिवार ही रहने के सबूत दिखा सकते हैं. इसलिए 1106 परिवार कोसाठ में बने फ्लेट का सपना नहीं देख सकते. यहां के रहवासियों का आरोप है कि फ्लेट आंवटन से जुड़े सर्वेक्षणों में भारी अनियमितताएं हुई हैं. कुछ बस्तियों में तीन-तीन बार सर्वेक्षण हुए हैं. कुछ बस्तियों में मुश्किल से एक बार. राजीवनगर में ज्यादातर बाहर से आए मजदूर हैं. यह सूरत में 6-8 महीनों के लिए काम करते हैं. इसके बाद यह अपने गांवों को लौट जाते हैं. इनमें से कई 15-20 सालों से यही रहते हैं. बस्ती के ऐसे ही रहवासी संतोष ठाकुर ने बताया ‘‘बिजली, पानी और संपत्ति के बिल तो मकान-मालिक के पास होते हैं. हमें स्थानीय निकायों से एक सर्टिफिकेट मिलता है. मगर अफसर उसे सबूत ही नहीं मानते. कहते हैं कोई दूसरा कागज लाओ." इसी बस्ती के रहवासी रंजन तिवारी ने बताया "हमें हमेशा काम नहीं मिलता. इसलिए काम की तलाश में सुबह जल्दी निकलना होता है. सर्वे ऐसे समय हुआ जब हम बस्ती से दूर थे. हमें कुछ मालूम ही नहीं था. इसलिए हमारे नाम सर्वे से नहीं जुड़ सके."

नगर-निगम के डिप्टी कमिशनर महेश सिंह के अनुसार "झुग्गीवासियों को फ्लेट आवंटित करने के लिए एक कमेटी बनी हुई है. अगर किसी को लगता है कि उसके सबूत जायज हैं तो कमेटी के पास जाए."

नगर-निगम में स्लम अप-ग्रेडेशन सेल के मुखिया मानते रहे हैं कि सर्वें में कई किरायेदारों के नाम छूट गए हैं. उनकी जगह मकान-मालिकों के नाम जुड़ गए हैं. मगर यह मुद्दा तो उसी समय उठाना चाहिए था.

स्लम अप-ग्रेडेशन सेल किसी भी गड़बड़ी को रोकने के लिए दो तरह से सर्वे करता है. पहला सर्वे लोकेशेन के आधार पर होता है और दूसरा नामांकन के आधार पर. इसलिए स्लम अप-ग्रेडेशन सेल यह मानता है कि अगर लोकेशन वाली सूची से किराएदार का नाम है. साथ ही उसके पास 2005 के पहले से रहने का सबूत भी है तो उसे फ्लेट मिल जाएगा. अब यह किराएदार की जिम्मेदारी है कि वह कहीं से सबूत लाए.

बस्ती के सेवाजी केवट ने कहा "मैंने 8 महीने पहले फ्लेट के लिए आवेदन भरा था. मगर अफसरों ने अभी तक चुप्पी साध रखी है. उन्होंने यह नहीं बताया कि मैं फ्लेट के योग्य हूं या नहीं हूं और नहीं हूं तो क्यों ? मैंने पार्षद को भी अपने निवास का सर्टिफिकेट और एप्लीकेशन दिया है. लेकिन मुझसे और कागजातों की मांग की जा रही है. वैसे मेरा नाम बायोमेट्रिक सर्वे से भी जुड़ा है. मगर सरकार के ही अलग-अलग सर्वे एक-दूसरे से मेल नहीं खा रहे हैं."

सवाल महज घर का नहीं है
यूं तो घर का मतलब रहने की एक जगह से होना चाहिए. मगर बाजार में बदलते शहरों के लिए वह प्रापर्टी भर है. सूरत भी इसी दौर से गुजर रहा है. यहां भी 40 प्रतिशत आबादी के विकास के लिए 60 प्रतिशत आबादी को नजरअंदाज किया जा रहा है. यहां भी पहले घर तोड़ो, फिर घर बनाओ की बात हो रही है. जबकि पहले घर बनाओ फिर घर तोड़ो की बात होनी चाहिए. दूसरी बात बस्ती के बदले बस्ती देने की है. घर के आजू-बाजू रास्ते, बत्ती, बालबाड़ी, नल और नालियों से जुड़कर एक बस्ती बनती है. उन्हें खोकर सिर्फ घर पाना नुकसानदायक है. इसलिए घर के आसपास की सुविधाओं का हक भी देना होगा.

सूरत की तरह हर शहर को जीरो स्लम बनाने का मतलब भी समझना होगा. सरकार मजदूरों से उनकी बस्तियां उजाड़ कर उन्हें बहुमंजिला इमारतों में भेजना चाहती है. इसका मतलब यह हुआ कि वह उन्हें घर के बदले घर दे रही है. मगर जमीन के बदले जमीन नहीं. वह गरीबों से छीनी इन सारी जमीनों को बिल्डरों में बांट देगी. मतलब यह कि गरीबों को फ्लेट उनकी जमीनों के बदले मिल सकता है. मतलब यह कि गरीबों को मिलने वाला फ्लेट मुफ्त का नहीं होगा. मगर बिल्डरों को तो मुफ्त में जमीन मिल जाएगी. यही वजह है कि बिल्डर केवल फ्लेट बनाने पर जोर ही देते हैं. उनके दिल और दिमाग में बालबाड़ी या स्कूल बनाने का ख्याल नहीं आता. जाहिर है खेल केवल मुनाफा कमाने भर का रह गया है.

शहर के विकास में शहरवासियों को बराबरी का हिस्सा मिलना जरूरी है. इससे नगर-निगम को शहर की समस्याएं सुलझाने में मदद मिलेगी. मगर ऐसा नहीं चलता. दूसरी तरफ शहरी इलाकों में नागरिक संगठनों का सीमित दायरा है. शहर के गरीबों की भागीदारी को उनकी आर्थिक स्थिति के कारण रोका जा रहा है. विकास में सबका हिस्सा नहीं मिलने से गरीबी का फासला बढ़ेगा. एक तरफ गरीबी हटाने की बजाय गरीबों की बस्तियां तोड़ी जा रही हैं. दूसरी तरफ उन्हें नुकसान के अनुपात में बहुत कम राहत मिल पा रही है. तीसरी तरफ मिलने वाली ऐसी राहतों को कागजी औपचारिकताओं में उलझाया जा रहा है. कुल मिलाकर चौतरफा उलझे सूरतवासियों को उम्मीद की कोई सूरत नजर नहीं आती है. आज यह घर से निकलकर काम पर जाते है. कल यह काम से लौटकर कहां जाएंगे?

क्या बदलेगी शहर की सूरत
एक सूरत को दो सूरतों में बांटा जा रहा है. शहर के भीतरी हिस्से में अमीरी के लिए साफ-सुथरा, व्यवस्थित और महंगी कारों से दौड़ता सूरत होगा. शहर के बाहरी हिस्से में अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए रात-दिन लड़ने वाले गरीबों का सूरत. जहां न लोग सुरक्षित हैं और न ही उनके काम या रहने के स्थान वगैरह. जाहिर है एक सूरत में अमीरी और गरीबी के फासले को कम करने की बात तो दूर दोनों को एक-दूसरे से बहुत दूर-दूर किया जा रहा है. पहला हिस्सा दूसरी हिस्से की मेहनत के जरिए शहर के बाजार से मुनाफा तो चाहता है. मगर बदले में उसका श्रेय और जायज पैसा नहीं देना चाहता है.

अब तक तो एक शहर का मतलब उसकी पूरी आबादी से लगाया जाता रहा है. मगर सूरत में एक छोटे तबके की तरक्की को शहर की तरक्की माना जाने लगा है और शहर का बड़ा तबका ऐसी तरक्की से तबाह हो रहा है. दरअसल इस तबके से भी तरक्की के मायने जानने थे. एक शहर को लंदन बनाने जैसी बातों की बजाय तरक्की में सबका और सबको हिस्सा देने और अमीरी-गरीबी के बीच बढ़ती खाई को भरे जाने जैसे प्रयास होने थे. मगर नागरिक सुविधाएं मुहैया कराने की जवाबदारी लेने वाली सरकार खुद को पीछे और निजी ताकतों को आगे कर रही है.

जबकि कई तजुर्बों से यह साफ हो रहा है कि निजी ताकतों का काम व्यवस्था में सुधार की आड़ में बाजार तैयार करना है. बाजार नागरिकों से नहीं उपभोक्ताओं से चलता है. जबकि गरीबों के पास अपनी उलझनों को सुलझाने के लिए न तो अधिक पैसा होता है और न ही कागजी औपचारिकताओं को निपटाने की समझ.

शहर के लिए तरक्की की संरचनाएं आम आदमी की भागीदारी से नहीं बन रही हैं और नागरिकों के संवाद और विरोध को रोका जा रहा है. 74वें संविधान संशोधन में विकेन्द्रीकरण और जनभागीदारिता का जिक्र हुआ है. इसके लिए वार्ड-सभा और क्षेत्रीय-सभाओं का उल्लेख भी मिलता है. लेकिन इसका सच देखना हो तो सूरत की सूरत देख लें.