21.11.10

दूरियां कब बनेंगी नजदीकियां



चेन्नई। शिक्षा के अधिकार व अनिवार्य शिक्षा जैसे नारों के पीछे की असलियत यही है कि आज भी कई बच्चे शिक्षा के मौलिक हक से वंचित हैं. विद्यालय और घर के बीच की दूरी इनकी शिक्षा के आड़े आ रही है.

बाल दिवस के मौके पर प्रेस क्लब में कृष्णगिरि जिले के तेनकनीकोट्टै आरक्षित वन्य क्षेत्र के निकट के गुलाटी गांव से आए बी. नागराज (12) और पी. मुनिराज (11) काफी उत्साहित दिखे इसकी वजह उनके परिवार के वे पहले दो बाशिंदे थे जिन्हें उनके घर से आगे कहीं सफर करने का अवसर नसीब हुआ था. उनका कहना था कि उनके दादा-दादी व मां-बाप ने कभी स्कूल नहीं देखा. उनकी गांव में स्कूल न होने के बाद भी पांच साल पहले वे पड़ोसी गांव की स्कूल में नौ वर्ष की आयु में पहली कक्षा में भर्ती हुए. स्कूल में शिक्षा का माध्यम तेलुगू था और अध्यापकों की डयूटी 11 से 2 तक रहती.

क्राई ने इस अवसर को चुनते हुए रविवार को राज्य के पांच अलग-अलग इलाकों से आए बच्चों को मीडिया से मुखातिब कराया जो शिक्षार्जन को लालायित थे. ये बच्चे बेबाक अंदाज में अपनी समस्याओं पर बोले. क्राई ने इस आयोजन के जरिए बताया कि राज्य के कई हिस्सों में स्कूलों की दूरी रिहायशी इलाकों से 10 किमी है जबकि आरटीई के तहत हर 1 किमी पर स्कूल होनी चाहिए.

वे जो भी पढ़ाते भाषाई समस्या के चलते उनकी समझ के परे था. इसी वजह से उनके घर वालों ने पढ़ाई छोड़कर काम में हाथ बंटाने को कहा और वही चीज वे आज कर रहे हैं. इसी तरह रामनाथपुरम के तोवकाडु गांव के एन. नागविजय व मंडवैकुप्पम के एम. पांडियन को स्कूल तक पहुंचने के लिए रोजाना क्रमश: 6 व 8 किमी का फासला तय करना पड़ता था. नागविजय ने इसी वजह से पिछले साल पढ़ाई छोड़ दी थी लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता ने उसे पुन: स्कूल जाने के लिए प्रोत्साहित किया.

छात्रों ने बड़े ही करूणाई अंदाज में कहा कि गर्मी और बारिश के दिनों में छह किमी का सफर पीठ पर बस्ता लेकर तय करना काफी मुश्किल होता है. अपने अभिभावकों के चलते वह स्कूल जा रहा है और उसका लक्ष्य अच्छा पढ़कर जीवन में सफल होना है. इसी तरह दिण्डीगुल जिले के कोडैकेनाल के काड़मनरवु गांव की वी. पी. चित्रा (15) जो छठी में पढ़ती है रोजाना 35 किमी का सफर तय करती है.

क्राई के उप महाप्रबंधक (विकास-समर्थन) पी. कृष्णमूर्ति का कहना है कि वे इस बात से वाकिफ है सरकार देश में शिक्षा व्यवस्था में आमूल परिवर्तन लाने के प्रयास में हैं लेकिन इस कोशिश विच्छिन्नता है. हम चाहते हैं कि राज्य में बदलाव लाने के लिए सरकार आदेश जारी करे. आरटीई के तहत अनिवार्य की गई स्कूल प्रबंधन समितियां इन समस्याओं के समाधान में सहायक हो सकती है.

11.11.10

आरटीई के बावजूद शिक्षा हासिल करना एक चुनौती

शिरीष खरे

‘‘हमारे समूह ने अपने गांव में एचआईवी के साथ जीने वाले एक बच्चे के साथ बरते जाने वाले भेदभाव के खिलाफ कदम उठाया.’’ उत्तर-प्रदेश की एक बाल पंचायत से किशन कुमार कहते हैं कि ‘‘हमने उसके साथ खेला, उसके साथ खाया और वह हमारा दोस्त बन गया. इससे हमसे उम्र में बहुत बड़े लोग शर्मिदा हुए और उन्हें एचआईवी के बारे में फैली अज्ञानता का एहसास हुआ.’’ इसक बाद बाल पंचायत ने उनके दोस्त पर से हर तरह की पाबंदी हटाने के लिए प्रस्ताव पारित किया.

उत्तरप्रदेश की एक बाल-पंचायत से चंदा कहती हैं कि ‘‘जब में चौदह की हुई तो मेरी मां ने मेंरी शादी करने चाही. मगर तब तक मैं यह जान चुकी थी कि कम उम्र में शादी करने वाली लड़कियों को बहुत नुकसान उठाना पड़ता है. आखिर मैं अपनी मां को शादी रोक देने की बात पर समझाने में कामयाब रही.’’ चंदा लड़कियों के विकास की सभी संभावनाओं और उनके शिक्षण के लिए जागरूकता फैलाने का काम कर रही हैं. इसके साथ-साथ वह बाल-विवाह, शीघ्र मातृव्य, नन्हें बच्चों और गर्भवती मांओं के पेट में पलने वाले कुपोषण के दुष्चक्र को तोड़ने का प्रयास भी कर रही हैं.

वही दूसरी तरफ स्थानीय बच्चों के समूह की अध्यक्षा तेरह साल की बानो खान कहती हैं कि ‘‘मेरे जैसे बहुत सारे बच्चे हैं जो गरीब परिवारों से होने की वजह से काम पर जाते हैं, क्योंकि उनके घर के आसपास कोई अच्छे स्कूल नहीं होते हैं.’’ मेरे घर से सबसे पास का स्कूल 2.5 किलोमीटर दूर है, और मेरे घरवाले हर महीने 200 रूप्ए बस किराया नहीं दे सकते हैं.’’ बानो खान का परिवार बदली इंडस्ट्रीय एरिया में सड़क किनारे एक चाय की दुकान चलाता है. बच्चों के लिए मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 में तीन किलोमीटर के भीतर एक उच्च प्राथमिक स्कूल खोले जाने का प्रावधान है.

बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था क्राई द्वारा राजधानी दिल्ली में आयोजित एक सम्मेलन में राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश राज्यों से आए छह बच्चों ने मुफ़्त शिक्षा के अधिकार का समर्थन करते हुए शिक्षा के उपयोग पर अपने विचार और तजुर्बे बांटे. उन्होंने बताया कि उन्हें रोज-रोज स्कूल जाते समय किस-किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. सामूहिक तौर से काम करते हुए इन बच्चों और उनके दोस्तों ने अपनी-अपनी जगहों के स्कूलों में ड्राप-आउट, भेदभाव और अपने समुदायों के बीच से बाल-विवाह जैसी समस्याओं को रोका है.

मध्यप्रदेश के 12 वर्षीय छात्र सुनील चंदेलकर ने बताया कि उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती उसके स्कूल की दूरी है. चंदेलकर ने कहा, "शिक्षा का अधिकार कानून छह से 14 वर्ष आयु वर्ग का मतलब आठवीं कक्षा तक के बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा की बात कहता है लेकिन गांवों के स्कूलों में केवल पांचवी कक्षा तक ही स्कूल हैं. इसके बाद हमें आगे की शिक्षा के लिए तीन किलोमीटर दूर दूसरे गांव के उच्च प्राथमिक स्कूल में जाना पड़ता है."

उन्होंने बताया कि निजी स्कूल बसें उन्हें ले जाने से इंकार कर देती हैं क्योंकि उनके पास उनका भारी शुल्क देने के लिए पैसा नहीं होता. चंदेलकर ने कहा, "हमने इस संबंध में राज्य के शिक्षा मंत्री को लिखा. फिर हमने निजी बस मालिकों के साथ एक बैठक की और अब मामला सुलझ गया है."

क्राई की जनरल मेनेजर अनीता बाला शरद कहती है कि ‘‘घरों के आसपास सरकारी स्कूलों को गुणवत्तापूर्ण तरीके से सक्रिय बनाकर भारत की शिक्षा समस्या का स्थायी समाधान किया जा सकता है. क्राई ने बच्चों के समूहों के साथ काम करते हुए यह दर्शाया है कि बच्चे खुद अपने अधिकारों को कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं.’’ क्राई की जनरल मेनेजर शुभेन्दु भट्टाचार्य बताते हैं कि ‘‘यह सच है कि सभी बच्चों की आवाजें अनुसनी ही रही हैं, चाहे बात आर्थिक पृष्ठभूमि की हो, चाहे गांवों या शहरों में रहने की हो, चाहे व्यस्को द्वारा उनके लिए जवाबदेही की मांग से जुड़े हों और मुफ्त-गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार को संवैधानिक रुप से सुरक्षा देने की हो. हमें बच्चों को परिवर्तन निर्माताओं के तौर पर सामूहिक शक्तियां देनी होंगी. उनके विचारों और जरूरतों को शिक्षा के अधिकार कानून में शामिल किये जाने की जरूरत है.’’

प्रख्यात वकील और कानूनी कार्यकर्ता अशोक अग्रवाल कहते हैं कि ‘‘अगर हम हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना चाहते हैं तो रोजाना की हकीकतों और अड़चनों का सामना करने वाले बच्चों को शिक्षा देने के लिए भारत सरकार को चाहिए कि वह उन्हें अपने क्रियान्वयन नीति का एक हिस्सा बनाए. अधिनियम को एक समान रुप से निजी स्कूलों में भी लागू करने की आवश्यकता है. मुफ्त शिक्षा पाना हर बच्चे का अधिकार है, यह अधिकार देने से निजी स्कूल बच नहीं सकते हैं. यह अधिनियम निजीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा देने की एक शानदार संरचना जान पड़ती है, जो भारत सरकार के कोठारी आयोग द्वारा प्रस्तुत एक समान शिक्षण व्यवस्था के पूरी तरह से विरूद्ध है.

वर्ष 2009 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 17,782 ऐसे आवासीय क्षेत्र हैं जहां स्कूल होना चाहिए लेकिन वहां एक किलोमीटर के क्षेत्र में एक भी प्राथमिक स्कूल नहीं है। उत्तर प्रदेश में ऐसी जगहों की संख्या सबसे ज्यादा 7,568 है. क्राई के मुताबिक देश में छह से 14 आयु वर्ग के 80 लाख से ज्यादा बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं.

जाहिर है शिक्षा का अधिकार कानून के बावजूद कई भारतीय बच्चों के लिए शिक्षा हासिल करना एक रोजमर्रा का संघर्ष बन चुका है क्योंकि उन्हें स्कूलों के उनकी पहुंच में न होने या शिक्षकों के उपलब्ध न होने जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है.

9.11.10

बच्चों का जितना पलायन उतना उत्पीड़न

शिरीष खरे

इन दिनों बच्चों का पलायन तेजी से बढ़ रहा है और उसी अनुपात में उनके साथ उत्पीड़न की घटनाएं और आकड़े भी. खास तौर से मजदूरी के लिए बच्चों को एक राज्य से दूसरे राज्य में आदान-प्रदान किए जाने का सिलसिला जोर पकड़ता जा रहा है. विभिन्न शोध-सर्वेक्षणों और रपटों से यह जाहिर भी हो रहा है कि मुख्य तौर पर बिहार, पूर्वी उत्तर-प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश से महाराष्ट्र और गुजरात सहित पूरे देश भर में मजदूरी के लिए बच्चों की पूर्ति की जा रही है. इन बच्चों में ज्यादातर की उम्र 10 से 16 के बीच है. इनमें भी ज्यादातर लड़के ही हैं. कई सर्वेक्षणों और तजुर्बे यह भी बता रहे हैं कि मजदूरी में लगे ज्यादातर बच्चे स्कूल जरूर गए हैं, मगर वह नियमित नहीं हो सके हैं. बच्चों के बारम्बार पलायन होने के पीछे की मुख्य वजहों में बच्चों ने अपने घर की गरीबी, मारपीट, डर और दबाव को जिम्मेदार ठहराया है तो कभी मुंबई और सूरत जैसे बड़े शहरों की तड़क-भड़क को देखने की दबी चाहत को भी बाहर निकला है. इस दिशा में जो सर्वेक्षणों के आधार पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर कई कदम उठाए जाने की बात कही जाती रही है, मगर अभी तक इन मामलों के न रुकने से यथार्थ की गंभीरता को भलीभांति समझा जा सकता है.

दूसरी तरफ बालगृहों से लगातार बच्चों के भागने की घटनाएं बयान करती हैं कि मुंबई सहित देश भर के सरकारी बालगृहों में बच्चों की सही देखभाल की असलियत क्या है. बीते समय मुंबई के एक बालगृह से कुछ बच्चों के भागने और उनमें से एक के हादसे में मारे जाने घटना उजागर हुई थी. आम तौर पर देखा गया है कि ज्यादातर बालगृहों द्वारा भागने वाले बच्चों के बारे में पता लगाने जरुरत भी महसूस नहीं की जाती हैं. ऐसे बच्चों को ढूंढने की भी तमाम कोशिशें तो दूर महज एक रिपोर्ट तक नहीं लिखवाई जाती है. तजुर्बों से यह जाहिर हुआ है कि हफ्तों-हफ्तों बच्चों के गायब रहने के बावजूद बालगृहों की तरफ से चुप्पी साध ली जाती है. जबकि नियमानुसार इस तरह की घटनाओं की जानकारी फौरन थाने में और उच्च अधिकारियों को देना जरूरी है. यहां तक कि महिला और बाल कल्याण विभाग को भी इस तरह की ज्यादातर घटनाओं की प्राथमिक सूचना किसी अखबार या गैर-सरकारी संस्था के जरिए ही मिलती है. भागने वाले कुछ बच्चों के बारे में जब हमने खैर-खबर जाननी चाही तो पता लगा कि सामान्यत: बालगृहों की तरफ से इन बच्चों की गुमशुदगी के बारे में न तो पुलिस को ही सूचना दी जाती है और न ही विभाग को इस बारे में बताया जाता है. कई बार तो बच्चों के साथ होने वाली दुर्घटनाएं और अपराधिक मामले प्रकाश में आने के बाद ही बच्चों के भागने की रिपोर्ट दर्ज की जाती है. बच्चों के इस तरह से गायब होने की तुरंत रिपोर्ट न लिखवाना महज एक लापरवाही ही नहीं बड़ा अपराध भी है. मुंबई के सरकारी बालगृहों से बीते 6 सालों में तकरीबन तीन सौ से ज्यादा बच्चे भागे हैं, मगर इतना होने के बावजूद लापरवाही का आलम ज्यों का त्यों है. समाज कल्याण विभाग से मिली गैर-औपचारिक जानकारियों के मुताबिक बालगृहों में कर्मचारियों की कमी है. एक कर्मचारी पर सैकड़ों बच्चों को संभालने की जवाबदारी होती है. काम के दबाव में कई बार कर्मचारियों द्वारा जब बच्चों के साथ बुरा बर्ताव किया जाता है तो बच्चे भाग जाते हैं. उन्हें ठीक-ठाक खाना तक नहीं मिलता है. इस तरह से सरकार द्वारा ऐसे बच्चों के देखभाल उचित के लिए संचालित बालगृह बुरे बर्ताव और उत्पीड़न का केंद्र बन जाते हैं.

हर साल मुंबई जैसे महानगर पहुंचने वाले हजारों बच्चे काम की तलाश में या काम की जगहों से भीख मंगवाने वाले नेटवर्क के हत्थे भी चढ़ जाते हैं. खास तौर से रेल्वे स्टेशनों के प्लेटफार्म और चौराहों पर ऐसे नेटवर्क से जुड़े दलालों की सरगर्मियों को समझा जा सकता है. यही बहुत सारे बच्चे बहुत ही गंदे माहौल में महज खाने-पीने के लिए जद्दोजहद करते रहते हैं. इसके अलावा बहुत से बच्चे नशे के आदी हो जाते हैं तो बहुत से जुर्म की दुनिया में भी दाखिल हो जाते हैं.

भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है, जो हर लिहाज से बाल- शोषण और उत्पीड़न को रोकने में मददगार हो. दूसरी तरफ कुछ जानकारों की राय में समस्या को दूर करने के लिए उसकी जड़ में पहुंचकर कानून के समानांतर गरीबी, विस्थापन, पलायन और विघटन से निपटने के प्रयास किए जाने की जरुरत है. साथ की जो प्रावधान लागू हैं उन्हें क्रियान्वित करने वाली एजेंसियों के सक्रिय और धनराशि के सही इस्तेमाल करने की जरुरत है और इसी के साथ बच्चों के यौन-उत्पीड़न सहित सभी तरह के उत्पीड़नों को ठीक से परिभाषित किए जाने की भी जरुरत है. दूसरी तरफ राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो में बच्चों के उत्पीड़न से जुड़े केवल ऐसे मामले शामिल रहते हैं, जिनकी रिपोर्ट पुलिस में दर्ज मिलती है. मगर असलियत जगजाहिर है कि ज्यादातर मामले तो पुलिस तक पहुंचते ही नहीं हैं. हालांकि सरकार की तरफ से 'बाल अपराध निरोधक बिल' संसद में लाने की बात की जाती रही है. बच्चों की सुरक्षा पर कुल बजट में से 0.03% की बढ़ोत्तरी और महिला व बाल विकास मंत्रालय द्वारा एकीकृत बाल सुरक्षा योजना शुरू करने जैसी घोषणाएं की भी की जाती रही हैं. इन सबके बावजूद इस तरह की नीतियां बनाने और इन नीतियों पर विमर्श का दौर तो खूब चलता है. नहीं चलता है तो उन्हें गर्म जोशी से लागू किए जाने की कोशिशों का दौर.

8.11.10

प्राइवेट स्कूलों का कारोबार 5000 करोड़ रुपये के पार



प्राथमिक शिक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद मुंबई और उपनगरीय इलाकों में बच्चे बीएमसी स्कूलों से मुंह मोड़कर निजी स्कूलों की तरफ जा रहे हैं.

बीएमसी स्कूल में जहां मुफ्त में शिक्षा दी जाती है वहीं निजी स्कूलों में औसतन साल भर में एक बच्चे पर तकरीबन 25-30 हजार रुपये खर्च आता हैं. लाख कोशिशों के बावजूद निजी स्कूलों में डोनेशन प्रथा खत्म होने के बजाए और मजबूत होती जा रही है.

बच्चे को स्कूल में प्रवेश दिलाने के लिए औसतन 25 हजार रुपये बतौर डोनेशन देने पड़ते हैं. समाज सेवा के नाम पर चलाए जा रहे निजी स्कूलों का कारोबार हर साल करीबन 20 फीसदी की दर से बढ़ रहा है. आज शिक्षा कारोबार सालाना लगभग 5000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा का हो चुका है जिसकी सही-सही जानकारी किसी के पास नहीं है.

सरकार साल दर साल बीएमसी स्कूलों में बच्चों को अच्छी शिक्षा और सुविधा देने के लिए बजट बढ़ाती जा रही है, लेकिन बच्चों की संख्या हर साल कम होती जा रही है. बीएमसी ने स्कूल शिक्षा को मजबूत बनाने के लिए 2007-08 में 1,051 करोड़ रुपये और 2008-09 में 1,350 करोड़ रुपये का प्रवाधान किया था, जबकि इस साल (2009-10) बीएमसी शिक्षा पर 1,651 करोड़ रुपये खर्च करेगी.

बीएमसी के अलावा केन्द्र और राज्य सरकार भी स्कूली शिक्षा में भारी भरकम रकम खर्च करती है. बीएमसी स्कूलों में शिक्षा पूरी तरह से मुफ्त दी जाती है. बच्चों की फीस, कॉपी-किताबें, स्कूल यूनिफॉर्म के साथ मिड-डे मिल के तहत खिचड़ी और दोपहर में दूध भी बच्चों को मुफ्त में मिलता है. इसके बावजूद हर साल तकरीबन 30 हजार बच्चे बीएमसी स्कूलों से तौबा कर रहे हैं.

इन स्कूलों में बच्चों का आंकड़ा वर्ष 1999 में 7.5 लाख था, जबकि बीते शिक्षण सत्र में बीएमसी के कुल 1,144 स्कूल में 4.50 लाख ही बच्चों ने दाखिला लिया. इस सप्ताह से शुरू हो रहे नए शिक्षण सत्र में यह संख्या और कम होने की आशंका जताई जा रही है.

बृहन्मुंबई महानगरपालिका शिक्षक सभा के महासचिव एवं ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ टीचर्स ऑर्गनाइजेशन के निदेशक रमेश जोशी का का कहना है, 'बीएमसी स्कूलों में साल दर साल बच्चों की कम होती संख्या की मुख्य वजह लोगों की बदलती सोच है.'

उनके मुताबिक आज लोग सोचते हैं कि सिर्फ अंग्रेजी माध्यम में उनका बच्चा जाएगा तो ही उसका भविष्य संवर सकेगा. बीएमसी स्कूल तो गरीबों का स्कूल है, वहां बच्चा जाएगा तो समाज के लोग क्या कहेंगे? जबकि हमारे सरकारी स्कूलों में जो शिक्षक है वह निजी स्कूल के शिक्षकों के मुकाबले अधिक शिक्षित और प्रशिक्षित हैं.

मुंबई और आसपास के इलाकों में करीबन 2,000 निजी स्कूल हैं. जिनमें करीब-करीब 20 लाख बच्चे पढ़ते हैं और यह आंकड़ा सालाना करीबन 15 फीसदी की रफ्तार से बढ़ता जा रहा है. स्कूली शिक्षा आज सबसे सफल कारोबार बन गया है। निजी स्कूलों में फीस और दूसरे खर्च तय नहीं है.

सभी निजी स्कूलों की दरें अलग-अलग हैं. प्रवेश के समय इमारत या स्कूल के विकास के नाम पर लिये जाने वाली डोनेशन फीस इन स्कूल की आय का एकमुश्त सबसे बड़ा साधन है. तीन-चार साल के बच्चे के एडमिशन के लिए स्कूल प्रबंधन की ओर से मुंबई में 5 हजार रुपये से एक लाख रुपये तक बतौर डोनेशन फीस वसूली जाती है, जिसकी कोई लिखित जानकारी नहीं दी जाती है.

इसके अलावा प्रवेश शुल्क, साल में होने वाली दो परीक्षाओं के अलावा हर महीने टेस्ट फीस, टर्म फीस (पिकनिक और कल्चरल्स प्रोग्राम) को मिलाकर सालभर में एक छात्र से औसतन सालभर में 30 हजार रुपये तक ले लिये जाते हैं. ड्रेस और किताबें स्कूल की बताई हुई दुकानों से ही लेनी पड़ती हैं जो अपेक्षाकृत 20 फीसदी तक महंगी ही होती हैं.

मंहगी होती शिक्षा के बावजूद निजी स्कूलों की तरफ बढ़ते रुझान पर राहुल ग्रुप ऐंड स्कूल कॉलेज के चेयरमैन लल्लन तिवारी कहते हैं, 'लोग अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना चाहते हैं इसीलिए वह अच्छे स्कूल में बच्चे को भेजना चाहते हैं, जिसके लिए पैसा मायने नहीं रखता है.'

महंगे से महंगे स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे को भी कोचिंग का सहारा लेना पड़ रहा है. इस पर महेश टयूटोरियल कोचिंग के प्रबंध निदेशक महेश शेट्टी कहते हैं कि स्कूल में क्या पढ़ाया जाता है, हमे इससे कोई मतलब नहीं है। हमारा लक्ष्य होता है कि बच्चे परीक्षा में अधिक से अधिक नंबर ला पाए.

इसके लिए कोचिंग में नई तकनीक और रिसर्च के आधार पर बच्चों को शिक्षा दी जाती है. यही वजह है कि हर साल बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है, जबकि मंदी के बावजूद कोचिंग फीस में करीबन 15-20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.

लगातार हो रहे शिक्षा के निजीकरण को लेकर बच्चों की शिक्षा पर काम करने वाले स्वयंसेवी संस्था क्राई की निदेशक योगिता वर्मा का कहना है, 'संविधान में शिक्षा को मूलभूत आवश्यकता बताया गया है. इसलिए सबको शिक्षा देना सरकार का कर्तव्य बनता है. शिक्षा के निजीकरण को बंद करना चाहिए. अमेरिका और इंगलैड में सरकारी शिक्षा ही सही मानी जाती है.'

क्राई का मानना है कि सबको मुफ्त और एक जैसी शिक्षा दी जानी चाहिए. वैसे भी सरकारी स्कूलों के अध्यापक निजी स्कूल के अध्यापकों के मुकाबले ज्यादा योग्य होते हैं.

4.11.10

बारूद पर ढ़ेर है भारत का भविष्य

शिरीष खरे

एक बच्चा पटाखा बनाए और दूसरा उसे जलाकर दीपावली मनाए. ऎसी विडम्बना तमिलनाडु के शिवकाशी में आसानी से देखी जा सकती है. जहां एक ओर देश के हरेक कोने का बचपन रोशनी के पर्व को मनाने के अपने तरीके व योजना बना रहा है, वहीं शिवकाशी जो आतिशबाजी उद्योग के लिए प्रसिद्ध है, जहां करीबन 40 हजार बाल मजदूर उनकी खुशियों में चार चांद लगाने के लिए पटाखे बनाने में सक्रिय हैं.

शिवकाशी वह क्षेत्र है जिसे देश की आतिशबाजी राजधानी के रूप में जाना जाता है. यहां लगभग एक हजार छोटी-बड़ी इकाइयां बारूद व माचिस बनाने में बनाने में जुटी हैं जिनका सालाना कारोबार 1000 करोड़ रूपए है. इस उद्योग के चलते एक लाख लोगों की रोजी चलती हैं जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं व बच्चे भी शामिल हैं.

बाल श्रम नाम के अभिशाप की जहां बात चल ही गई है तो यह स्पष्ट कर दें कि शिवकाशी में इसका प्रमाण आसानी से देखा जा सकता है. मसलन, पंद्रह वर्षीय पोन्नुसामी जो यहां एक पटाखा निर्माणी इकाई में कार्यरत है, पांच साल पटाखे बना रहा है. जब उसने यह पेशा चुना तो उसकी समझ का स्तर क्या रहा होगा यह विचारणीय मसला है. उसके अनुसार वह छठी कक्षा का छात्र था जब उसे जबरन इस काम में उतार दिया गया. काम कराने की मंशा भी उनके माता-पिता की ही थी.प्रतिदिन नौ घंटे की कड़ी मेहनत के बाद वह 60 रूपए पाता है. यह बेगारी उसे वयस्क श्रमिकों को मिलने वाली मजदूरी का केवल चालीस फीसदी है. ऎसे कई उदाहरण हैं जिनसे यह स्पष्ट है कि शिवकाशी इलाके के किशोर-किशोरियों की पढ़ाई-लिखाई में गाज गिरने की आशंका रहती है. छोटी उम्र में ही ऎसे खतरनाक काम में झोंकने के मां-बाप के फैसले के पीछे उनकी गरीबी ही मूल कारण है.

कारखानों में हादसे सामान्यत: होते रहते हैं. ऎसे में मासूमों को घातक काम पर लगाने का सवाल जब उठता है तो श्रमिक संगठनों का जवाब होता है कि मृतकों में कोई भी किशोर नहीं है,जबकि दास्तां कुछ अलग ही है. जुलाई 2009 में हुई एक दुर्घटना में तीन बच्चे मर गए.

अगस्त 2010 में तो सरकारी अधिकारियों पर ही गाज गिरी जो अनाधिकृत पटाखा इकाइयों की जांच पर गए थे. बताया गया है कि 8 राजस्व और पुलिस अधिकारियों को इस तहकीकात के दौरान जान से हाथ धोना पड़ा. जब पोन्नुसामी से काम के जानलेवा होने के बारे में पूछा गया तो उसका जवाब यही था कि अगर मैं भाग्यशाली हूं तो कभी हादसा नहीं होगा.

बच्चों के अधिकारों के क्षेत्र में काम करने वाली गैर सरकारी संस्था चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) के अधिकारी जॉन आर की मानें तो शिवकाशी में करीबन 1050 कारखाने हैं जिनमें से 500 बिना किसी लाइसेंस के चल रहे हैं. पटाखों के अलावा 3989 कारखानों में दियासलाई बनती है. वे मानते हैं देश-विदेश में हो रहे प्रयासों के नतीजतन बाल श्रम पर कुछ अंकुश लगा है. हादसों में इजाफा और बच्चों के काम पर लगाने की नौबत गैर लाइसेंसशुदा कारखानों की वजह से आती है जिनका संचालन घरों की असुरक्षित चारदीवारी में होता है.

इन लोगों को लाइसेंस वाली कंपनियां पटाखे बनाने का आदेश दे देती है. अधिक फायदे के लालच व शिक्षा के अभाव में ये लोग आसानी से कानून की दहलीज को लांघ जाते हैं. नाम न छापने की शर्त पर शिवकाशी की ही एक एनजीओ के कार्यकर्ता के अनुसार इस समस्या के बारे में समझ अभी अधूरी है. हम अभिभावकों को जाग्रत करने का प्रयास कर रहे हैं. उन्हें यह समझाया जा रहा है कि वे सीमित आमदनी में गुजर-बसर करते हुए बच्चों के स्वास्थ्य व शिक्षा पर ध्यान दें.

कहावत है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती और अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता. इसी तर्ज पर सरकार, प्रशासन व एनजीओ का प्रयास भी तब तक सफल नहीं हो जाता जब तक कि अन्य पक्षकार जिनमें आतिशबाजी निर्माण इकाइयों के मालिक व अभिभावक शामिल हैं, स्वेच्छा से पहल न करें. अन्यथा उनकी दीपावली कभी भी प्रकाशमान नहीं हो पाएगी. 

सड़ता अनाज सड़ता तंत्र

शिरीष खरे

सरकार चंद पूंजीपतियों के लिए रियायतों का अंबार लगा रही है और करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा के लिए उसके पास न अनाज है और न पैसे का कोई बंदोबस्त. इंडिया शाइनिंग के इस दौर में सरकार को 50,000 करोड़ से अधिक का अनाज सड़ा देना मंजूर है. नहीं मंजूर है तो 8 करोड़ से ज्यादा लोगों की भूख को मिटाने के वास्ते उस सड़ते हुए अनाज में से गरीबों के लिए थोड़ा-सा हिस्सा बांटना. अकाल और कुपोषण के बीच पिसते किसी देश की जनता के लिए क्या उसकी सरकार इस तरह से भी अमानवीय हो सकती है ?



एक तरफ सरकार पूंजीपतियों के लिए 5 लाख करोड़ रूपए की रियायत देती है और दूसरी तरफ भूखे लोगों के लिए कोई इंतजाम नहीं करती है. उलटा भूखे देश की भूख पर परदे डालने के लिए उदाहरण के लिए मुंबई में 19 रूपए से ज्यादा रूपए कमाने वाले को गरीब नहीं मानती है. हकीकत यह है कि आजादी के 63 सालों में प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता बढ़नी चाहिए थी जो लगातार घटती ही जाती है. आजादी के समय से अबतक प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता 440 ग्राम से 436 ग्राम पर आ गई है और इसी तरह दाल की उपलब्धता भी आधी यानी 70 ग्राम से 35 ग्राम ही रह गई है.

दूसरी तरफ असुरक्षित परिस्थितियों में रखे अनाज के त्वरित वितरण से लाखों लोगों को राहत पहुंचाई जा सकती है. जबकि मौजूदा स्थिति यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के 35 किलो अनाज वितरित करने के आदेश को भी एक तरफ रखते हुए फिलहाल देश के कई इलाकों में अधिकतम 20 से 25 किलो अनाज ही वितरित किया जा रहा है. सर्वोच्च न्यायालय के एक और आदेश की अनदेखी करते हुए कई इलाकों में जनवितरण प्रणाली की दुकानें महीने-महीने भर नहीं खुलतीं हैं. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हर राज्य में एक बड़े गोदाम और जिले में पृथक गोदाम बनाने के लिए भी कहा जा चुका है. मगर खाद्य भंडारणों की क्षमता को बढ़ाने और गोदामों की मरम्मत को लेकर सरकार कभी गंभीर नजर नहीं आई है. लिहाजा देश के कई इलाकों में अनाज के भंडारण की समस्या उपजती जा रही है.

जिस देश में सालाना 6 करोड़ टन गेंहूं और चावल की खरीददारी होती है और जिसकी सयुंक्त भंडारण क्षमता 4 करोड़ 80 लाख टन है, उस देश में 6 साल के भीतर गोदामों में 10 लाख 37 हजार 738 टन अनाज सड़ चुका है. 190 लाख टन अनाज प्लास्टिक सीटों के नीचे रामभरोसे पड़ा हुआ है. हर साल गोदामों की सफाई पर करोड़ों रूपए खर्च करने पर भी 2 लाख टन अनाज सड़ जाता है और जब देश का सर्वोच्च न्यायालय अनाज के एक दाने के बर्बाद होने को अपराध मानते हुए अनाज के सड़ने से पहले उसे निशुल्क बांटने का आदेश देता है तो हमारे केंद्र के कृषि मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक 6,000 टन से भी ज्यादा अनाज के खराब होने के अपराध को नजरअंदाज बनाते हुए उल्टा सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की गलत व्याख्या करते हैं और उसकी मर्यादाओं पर ही सवाल खड़े करते हैं.

1947 के बाद से अब तक अगर हम किसानों की अथक मेहनत से उपजे अनाज का सही इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं और हर साल भारतीय खाद्य निगम की गोदामों में रखीं लाखों अनाज की बोरियां खुले में रखे जाने या बाढ़ आ जाने के चलते खराब हो रही हैं तो क्या सरकार को नहीं लगता कि भोजन से जुड़ी नीति, प्रबंधन और वितरण की व्यवस्थाओं पर नए सिरे से सोचे जाने की जरुरत है ?

देखा जाए तो खाद्य सुरक्षा दूसरा सवाल है. पहला सवाल पूंजीपतियों के लिए देश की आम जनता से उनके संसाधनों को छीने जाने से जुड़ा है. अगर संसाधनों को लगातार यूं ही छीना जाता रहा तो खाद्य के असुरक्षा की स्थितियां सुधरने की बजाय तेजी से बिगड़ती ही जाएंगी. जहां आदिवासियों को उनके जल, जंगल, जमीन से अलग करके उन्हें भूख और बेकारी की ओर ले जाया जा रहा है, वही सेज के नाम पर खुली लूट की जैसे छूट ही दे दी जा रही है. कहने का मतलब है नीतिगत और कानूनी तौर पर सभी लोगों को आजीविका की सुरक्षा को दिये बगैर भोजन के अधिकार की बात बेमतलब ही रहेगी. भोजन केअधिकार से जुड़े कार्यकर्ता मांग कर रहे हैं कि 5 सदस्यों के एक परिवार के लिए 50 किलो अनाज, 5.25 किलो दाल और 2.8 खाद्य तेल दिया जाए. बीपीएल और एपीएल को पात्रता का आधार नहीं बनाया जाए. सार्वजनिक वितरण की व्यवस्था के साथ-साथ सरकारी खरीदी और वितरण की विकेन्द्रीकृत व्यवस्था हो. व्यक्ति/एकल परिवार को इकाई माना जाए और राशन कार्ड महिलाओं के नाम पर हो. जल स्त्रोत पर पहला अधिकार खेती का हो. इसके साथ ही यह भी नहीं भुलाया जा सकता कि आजादी की बाद से अबतक विकास की विभिन्न परियोजनाओं और कारणों के चलते 6 करोड़ बच्चों का भी पलायन हुआ है. मगर बच्चों के मुद्दे अनदेखे ही रहे हैं और उनके लिए खाद्य सुरक्षा की गारंटी दिये बगैर विकास के तमाम दावे बेबुनियाद ही रहेंगे. इसे भी असंवेदनशीलता का चरम ही कहेंगे कि एक सेकेण्ड के भीतर 5 साल के नीचे का एक बच्चा कुपोषण की चपेट में आ जाने के बावजूद कोई नीतिगत फैसला लेने की बात तो दूर ठोस कार्यवाही की रूपरेखा तक नहीं बन पा रही है. अगर कुपोषण और भूख के चलते देश का आने वाला कल कहे जाने वाले 47 प्रतिशत बच्चों का अपनी उम्र के अनुपात में लंबाई और वजन नहीं बढ़ पाता है तो इसे किस विकास का सूचक समझा जाए ?

अंतत: अनाज का साद जाना एक अमानवीय और आपराधिक प्रवृति है और देश में अनाज भंडारण की उचित व्यवस्था और बेहतर विकल्प तलाशने लिए एक ऐसे संवेदनशील और पारदर्शी तंत्र विकसित करने की भी जरुरत है जो भूख से जुड़े विभिन्न पहलूओं पर कारगार ढ़ंग से शिनाख्त और कार्यवाही करने में सक्षम हो. अन्यथा हर साल लाखों टन अनाज खराब होने, अनाज की कीमत आसमान छूने, खेती के संकट, सूखे की मार और गरीबों के पेट खाली होने से जुड़े समाचारों पर परदे डालने के लिए हमारे पास आर्थिक शक्तियों का दिखावा करने वाली राष्ट्रमंडल खेलों की सुर्ख़ियों के अलावा कुछ नहीं होगा ?



27.10.10

पहले पंचायत चले हम

शिरीष खरे



गांवों के बच्चे बड़ी संख्या में मजदूर बनते जा रहे हैं. अगर बच्चों की संख्या स्कूलों की बजाय काम की जगहों पर ज्यादा मिल रही है तो उनके लिए 'स्कूल चले हम' से पहले 'पंचायत चले हम' का नारा देना जरूरी लगता है.

चाहे गांवों के विकास का हवाला हो या गांवों के लगातार टूटे जाने का मौजूदा हाल हो बच्चों के मुद्दों को बहुत पीछे रखा जा रहा है. खास तौर से गांवों के लगातार टूटे जाने के मौजूदा संदर्भ में बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं. इसे देखते हुए नीतिगत प्रक्रियाओं में बच्चों को केन्द्रीय स्थान देने की जरुरत है. लेकिन विकराल स्वरूप लेते जाने के बावजूद बाल मजदूरी जैसी समस्या जहां मुख्यत: राजनैतिक तौर से नजरअंदाज बनी हुई है, वहीं स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक बच्चों से जुड़े तमाम सवालों को भी बहुत हल्के ढ़ंग से लिए जाने की मानसिकता घर बना चुकी है.

खुशहाल, स्वस्थ्य और रचनात्मक बचपन का सूत्र गांवों के भविष्य का आधार है लेकिन बच्चों के मुद्दों को पंचायत की नीतियों से भी अलग-थलग करने या वरीयता की सूची में निचले पायदान पर रखे जाने से ग्रामीण बच्चों की तस्वीर दिन-ब-दिन बदसूरत देखी जा रही है. जाहिर है कि ग्राम पंचायतों में पंच-सरपंचों और सचिवों से सकारात्मक रुख की अपेक्षा किए बगैर यह तस्वीर नहीं सुधरने वाली है. ऐसे में स्थानीय समुदायों का महत्व बढ़ जाता है जो बाल अधिकारों और संरक्षणों को लेकर अपने-अपने जन-प्रतिनिधियों के साथ लगातार बैठकों को आयोजित करके उन्हें संवेदनशील बना सकते हैं. इसके लिए स्थानीय स्तर पर खास तौर से वंचित समूह के बच्चों की समस्याओं, उनकी जरूरतों और ताकतों की पहचान करके, स्थानीय स्तर पर संचालित विभिन्न योजनाओं के भीतर उन्हें और उनके परिवारजनों के लिए विकल्प तलाशे जा सकते हैं. इसके दूसरे सिरे के रूप में निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों को अपनी प्रशासन अकादमियों से संपर्क बढ़ाने की जरुरत है जिसके जरिए जरूरी जानकारियों को लेते हुए कार्यवाही करने में सहूलियत हो सके.

ग्रामीण इलाकों में बच्चों के लिए काम करने के दौरान बाल अधिकारों से जुड़े मुद्दों को केवल ग्रामीण परिवेश में ही देखने से काम नहीं चलेगा बल्कि उससे जुड़ी कुछ बुनियादी घटनाओं, नीतियों और पहलूओं को भी समझना जरूरी होगा. इससे सभी बच्चों के अधिकारों को सुनिश्चित किया जाना संभव हो सके. उदाहरण के लिए 2 सितम्बर, 1990 को सयुंक्त राष्ट्र के बाल अधिकार समझौता पर विश्व के दो देशों (अमेरिका एवं सोमालिया) को छोडक़र सभी ने हस्ताक्षर किए तथा बच्चों के अधिकारों और संरक्षणों को लेकर पहल की. भारत ने 11 दिसम्बर, 1992 को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए. बाल अधिकार समझौते में 18 साल की आयु तक के बच्चों के अधिकारों और संरक्षणों की बात कही गई है. जबकि भारत में 0 से 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों को ही बच्चा मानकर उनके अधिकारो के संरक्षण के लिये कानूनी प्रावधान किये गये हैं. यही नहीं अलग-अलग अधिनियमों के मुताबिक बच्चों की उम्र भी बदलती जाती है. जैसे किशोर-न्याय अधिनियम, 2000 में 18 साल, बाल-श्रम अधिनियम, 1886 में 14 साल, बाल-विवाह अधिनियम में लड़के के लिए 21 साल और लड़की के लिए 18 साल की उम्र तय की गई है. खदानों में काम करने की उम्र 15 और वोट देने की उम्र 18 साल है. इसी तरह शिक्षा के अधिकार कानून में बच्चों की उम्र 6 से 14 साल रखी गई है. इससे 6 से कम और 14 से अधिक उम्र वालों के लिए शिक्षा का बुनियादी हक नहीं मिल सकेगा. इसी तरह भारत में बच्चों की उम्र को लेकर भी अलग-अलग परिभाषाएं हैं. इसी तरह विभिन्न विभागों और कार्यक्रमों में भी बच्चों की उम्र को लेकर उदासीनता दिखाई देती है. 14 साल तक के बच्चे ‘युवा-कल्याण’ मंत्रालय के अधीन रहते हैं. लेकिन 14 से 18 साल वाले बच्चे की सुरक्षा और विकास के सवाल पर चुप्पी साध ली जाती है. बच्चों के अधिकारों में प्रमुख रूप से चार अधिकार- जीने का अधिकार, विकास का अधिकार, सुरक्षा का अधिकार और विचारों की सहभागिता का अधिकार आते हैं.

बच्चों को सुरक्षित माहौल देने के लिए ग्राम सभा की बैठकों में बच्चों के साथ बाल अधिकारों के बारे में अलग से चर्चा का सिलसिला शुरू किया जा सकता है. बच्चों को सुरक्षित माहौल देने के संबंध में उनका शोषण रोकने, उन्हें बाल मजदूरी से मुक्त रखने और हिंसा से बचाव करने जैसे मामले प्रमुख हैं. हर बच्चा स्कूल जाये, उसे अच्छा खाना मिले, बच्चा अपराधी न बने इसके लिये समुदायों द्वारा चाइल्ड लाईन भी अपनी अहम भूमिका निभा सकते हैं. इस दिशा में मध्य-प्रदेश के भोपाल में चाइल्ड लाईन 1098 को उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है. जिसके जरिए बीते 1 दशक में तकरीबन 1 लाख बच्चों की मदद की जा सकी है. इस तरह समुदायों के आपसी सहयोग से संचालित बाल अधिकारों के हनन की सूचना चाइल्ड लाईन पर दी जा सकती है. कानून में बच्चों को प्रताड़ित करने वालों में से किसी को भी नहीं छोड़ा गया है और परिवारजनों सहित सभी लोगों के लिए सजा का प्रावधान रखा गया है.

पंचायतों में गठित समितियों को सशक्त बनाकर बाल अधिकारों का संरक्षण किया जा सकता है. इसके तहत कई महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान देने की जरुरत है, जैसे बच्चे के पैदा होते ही उसके जन्म पंजीयन का अधिकार है जिसे गांवों में ग्राम पंचायतें पूरा करती हैं. विकलांग एवं परिवारविहीन बच्चों के भी अपने अधिकार हैं जिसे जिला स्तर पर गठित बाल कल्याण कमेटी के माध्यम से पूरा कराया जा सकता हैं वगैरह.

सभी बच्चों खास तौर से बालिकाओं को शिक्षा दिलाने के लिए ग्रामीण परिवेश में भी जागरूकता लाने की जरूरत है. गैरबराबरी को बच्चियों की कमी नही बल्कि उनके खिलाफ मौजदू स्थितियों के तौर पर देखा जाना चाहिए. अगर लडक़ी है तो उसे ऐसा ही होने चाहिए, इस प्रकार की बातें उसके सुधार की राह में बाधाएं बनती हैं. इसके चलते समाज में कन्या भ्रूण हत्या, बाल दुर्व्यवहार और बाल विवाह जैसी समस्याएं पलती-बढ़तीं हैं. सामाजिक धारणा को समझने के साथ-साथ बच्चियों को बहन, बेटी, पत्नी या मां के दायरों से बाहर निकालने और उन्हें सामाजिक भागीदारिता के लिए प्रोत्साहित करने में मदद के तौर पर जाना जाए. समाज में जागरूकता आने के बावजूद अब भी लोग बेटी नहीं बेटे चाहते हैं जबकि क्राई के अध्ययनों में यह साफ् हुआ है कि लडकियां व्यक्तिगत और सामूहिक रूप में समाज की पुरानी परंपराओं को तोड़कर आगे बढ़ रही हैं और भेदभाव को स्वीकार नहीं कर रही हैं. वे मंजिल हासिल करने की दिशा में बढ़ने लगी हैं.

20.10.10

सूरत बदलने की बदसूरत कवायद

शिरीष खरे

सूरत/ एक जमाने में विकास के लिए 'गरीबी हटाओ' एक घोषित नारा था. मगर आज आलम यह है कि विकास के रास्ते से 'गरीबों को हटाना' एक अघोषित एंजेडा बन चुका है. गुजरात के सूरत को देख कर यह समझा जा सकता है कि 'गरीबी की बजाय गरीबों को हटाने' का जो व्यंग्यात्मक मुहावरा था, वह आज किस तरह से गंभीर हकीकत में तब्दील हो चुका है.

सैकड़ों झोपड़ियों को तोड़ जाने के क्रम में जब झोपड़पट्टी तोड़ने वाले जलाराम नगर के 40 वर्षीय लक्ष्मण चंद्राकार उर्फ संतोष की झोपड़ी को तोड़ने लगे तो उसने केरोसिन डालकर अपने आप को मौत के हवाले करना चाहा था. उसके बाद उसे एक एम्बुलेंस से न्यू सिविल हास्पिटल भेजा गया. वहां पहुंचते-पहुंचते उसके शरीर का 75 प्रतिशत हिस्सा जल गया. उधर डाक्टरों ने संतोष की हालत को बेहद गंभीर बताया और इधर सूरत महानगर पालिका ने शाम होते-होते ताप्ती नदी के किनारे से तीन बस्तियों के हजारों बच्चों, बूढ़ों और औरतों को खुली सड़क पर ला दिया था.

फिलहाल सूरत के गरीबों को न तो साम्प्रदायिक दंगों का सामना करना पड़ रहा है और न ही बाढ़ या भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं का ही. अब उनके साथ जो कुछ घट रहा है, वह सूरत को जीरो स्लम बनाने की सरकारी कवायद का हिस्सा है.

सूरत को जीरो स्लम बनाने के लिए सूरत की कुल 1 लाख से ज्यादा झोपड़ियों को तोड़ा जा रहा है. मगर सरकारी दस्तावेजों पर पुनर्वास के लिए केवल 42000 घर बनाए जाने का उल्लेख है. जाहिर है 58000 से ज्यादा झोपड़ियों का सवाल हवा में है. एक तरफ सालों से घरों को तोड़े जाने का सिलसिला थम नहीं रहा है और दूसरी तरफ इतना तक तय नहीं हो पा रहा है कि घर मिलेंगे भी तो किन्हें, कैसे, कहां और कब तक ?

जबकि 2009 के पहले-पहले सूरत की सभी झोपड़ियों के परिवारों को नए घरों में स्थानांतरित करने का लक्ष्य रखा गया था. मगर उजाड़े गए लाखों रहवासियों के हिस्से में आज तक शहर की सीमारेखा से कोसों दूर कोसाठ या अन्य इलाकों में बसाए जाने का आश्वासन भर है. उनके लिए अगर कुछ और भी है तो प्रशासन द्वारा बमरोली और बेस्तान जैसे इलाकों में चले जाने जैसा सुझाव.

यकीकन इनदिनों शहर की सूरत तेजी से बदल रही है और उसी के सामानांतर तबाही, कार्यवाही, जवाबदारी और राहत से जुड़े कई किस्से भी पनप रहे हैं.


ऐसे बनेगा जीरो स्लम
यह किस्सा बरसात से थोड़े पहले का है. जब सूरत महापालिका ने अपने लक्ष्य का पीछा करते हुए सुभाषनगर, मैनानगर और उदना इलाके से 1650 झोपड़ियों को तोड़ा था. उस समय सूरत को झोपड़पट्टी रहित बनाने के मिशन ने 8500 से भी ज्यादा लोगों के सिरों से उनका छत छीना था. उसी के साथ क्योंकि तुलसीनगर और कल्याणनगर की एक सड़क व्यवस्था को भी ठिकाने पर लाना था, इसीलिए 5000 से ज्यादा गरीबों को ठिकाने लगाया गया था. इसके आगे सेंट्रल जोन की सड़क को भी 80 फीट चौड़ा करने के लिए 2500 से ज्यादा लोगों को शहर की खूबसूरती के नाम पर उजाड़ा गया था.

उजाड़ने के बाद प्रशासन का दावा था कि शुरू में तो रहवासियों ने डेमोलेशन का बहुत विरोध किया मगर बाद में कोसाठ में बसाने की बात पर सब मान गए. जबकि यहां से उजाड़े गए रहवासियों का कहना था कि उन्हें डेमोलेशन की सूचना तक नहीं दी गई थी. डेमोलेशन की कार्रवाई को बड़ी निर्दयतापूर्वक पूरा किया गया और जिसके चलते उन्होंने प्रशासन का विरोध भी किया था.

इसके बाद प्रशासन की तरफ से यह साफ हुआ है कि उसके अगले निशाने पर कौन-कौन सी बस्तियां रहेंगी. उसने स्लम डेमोलेशन का अपना लक्ष्य सामने रखा और उसे कुछ दिनों के भीतर पूरा कर लेने का ऐलान भी किया. कुछ दिनों के भीतर बापूनगर कालोनी के तकरीबन 2700 घरों में 15000 से भी ज्यादा लोगों को भी उजाड़ दिया गया.

दूसरा किस्सा सर्दी के समय का है. जब सूरत महापालिका ने कार्यालय के समय यानी 10 से 6 बजे तक जेपी नगर, जलाराम नगर और इकबाल नगर से कुल 502 झोपड़ियों को तोड़ने का रिकार्ड दर्ज किया. पुलिस के भारी बंदोबस्त के बीचोंबीच तनावपूर्ण स्थिति को नियंत्रण में बनाए रखते हुए 4000 से ज्यादा रहवासियों से उनका पता-ठिकाना छीन लिया गया. कुल मिलाकर ताप्ती नदी के आजू-बाजू कई दशक पुरानी इन बस्तियों से 1700 से ज्यादा झोपड़ियों को साफ किया जाना था. अर्थात् 14000 से ज्यादा रहवासियों से उनका पता-ठिकाना छीना जाना था.

जैसा कि महापालिका के बस्ती उन्नयन विभाग से सी वाय भट्ट ने भी जताया कि "नदी और खाड़ी के इर्द-गिर्द जमा झोपड़ियों को साफ करने के लिए डेमोलेशन की कार्रवाई जारी रहेगी." डेमोलेशन की यह कार्रवाई अगले रोज भी जारी रही. मगर सूरत के बाकी इलाकों को तोड़े जाने के अगले चरणों और उनकी तारीखों के सवालों पर एक बार फिर से खामोशी औड़ ली गई. आगे-आगे डेमोलेशन, उसके पीछे-पीछे महापालिका वाले नल, गटर के पाईप और बिजली के तार काटते रहे थे.

सुबह-सुबह, कोई सूचना दिए बगैर, यकायक और पूरे दल-बल के साथ झुग्गी बस्तियों को नेस्तानाबूत करने की प्रशासनिक रणनीति को अब सूरत के रहवासी खूब जानते हैं. इन झोपड़ियों को साफ किए जाने के पहले पुलिस रात को ही उन सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं को हिरासत में ले लेती है, जो महानगर पालिका द्वारा गरीबों को शहर से हटाए जाने वाली मुहिम के विरोधी होते हैं.

उस रोज भी जेपी नगर, जलाराम नगर और इकबाल नगर के रहवासी यह कहने लगे कि घर के बदले घर दिए बगैर हमारे घरों को कैसे उजाड़ा जा रहा है? मगर प्रशासन के लिए यह कोई नया सवाल नहीं था. उनका ध्यान तो झोपड़पट्टी तोड़ने के दौरान 'अधिकतम नुकसान पहुंचाने' के सिद्धांत पर टिका था.

अंधियारा छाने के बहुत पहले ही बस्ती वालों के असंतोष ने आग पकड़ ली थी. देखते ही देखते एक भारी भीड़ पथराव करते हुए आगे बढ़ने लगी. हर एक के हाथों में उनके दुख, दर्द, उनकी आशंकाओं और हताशाओं से भरी भावनाओं में डूबे जनसैलाब के अलावा कुछ न था. इसके बाद मुस्तैद पुलिस वाले आगे आएं और उन्होंने बस्तियों की तरह उनके जनसैलाब को भी लाठीचार्ज के जरिए माटी में मिला दिया. उसके ऊपर से आंसू गैस के दो गोले भी छोड़े गए. ऐसे में जिनकी झोपड़ियां टूटी थीं, उनके लिए कम से कम 2000 रुपये का किराया चुका कर भाड़े का मकान लेना आसान नहीं था. उससे भी बड़ा सवाल तो यही था कि झोपड़पट्टी में रहने वालों को किराये पर मकान देगा कौन?

सामाजिक कार्यकर्ता भरत भाई कंथारिया ने बताया "डेमोलेशन की ज्यादातर कार्यवाहियों मौसम के मिजाज को बिगड़ते हुए देखकर की जाती हैं. सारे झोपड़े एक साथ न तोड़कर, कभी 200 तो कभी 400 की संख्या में तोड़े जाते हैं, जिससे लोग संगठित न हो सकें. ऐसे हमले अचानक और बहुत जल्दी-जल्दी होते हैं. दीवाली का त्यौहार जब सिर पर होगा तो सरकारी नजरिए से वह डेमोलेशन के लिए आदर्श समय होगा."


कारपोरेट की वल्ले-वल्ले
टेम्स नदी से लगे लंदन वाली तस्वीर के हू-ब-हू सूरत को लंदन जैसा बनाने की गति अपने चरम पर है. इसलिए ताप्ती के किनारे से हजारों झापड़ियों को साफ किए जाने की गति अपने चरम पर है. सूरत में स्लम एरिया हटाने के लिए केन्द्र की यूपीए और राज्य की भाजपा सरकार ने मिलकर 2157 करोड़ की रणनीति बना ली है. वहीं सूरत महापालिका का काम जमीनें खाली करवाना और बिल्डरों को सस्ते दामों में बेचना रह गया है.

कतारगाम इलाके का यह वाकया शहर के नक्शे से न केवल गायब हो जाने का बल्कि व्यवस्था के गायब हो जाने का वाकया भी है.

चंद्रकांत भाई रोज की तरह शाम को काम पर लौटे तो पूरी बस्ती को ही लापता देखा. जब उन्होंने पता किया कि पता चला कि बस्ती के बहुत सारे लोग शहर से बाहर कोसाठ नाम की एक जगह पर पहुंच गए हैं. तब अपने घरवालों से मिलने के लिए उन्हें रिक्शा करके फौरन कोसाठ जाना पड़ा.

जून 2004 में बस्ती के 155 घरवाले कारपोरेट के मुनाफे की भेट चढ़ाए गए थे. यहां की 2 एकड़ जमीन पर कभी 250 घरों की 2000 आबादी बसती थी. 90 साल पुरानी इस बस्ती की जमीन ने करोड़ों का भाव पार किया तो यहां के असली मालिकों को सस्ते घरों समेत उखाड़ फेंका गया. गायत्री बेन ने बताया "न सूचना दी, न सुनवाई की. वैसे भनक लग गई थी कि वहां सुन्दर तालाब बनेगा. हमारी जगह पिकनिक वाली जगह में बदलेगी. पार्किंग और गार्डन को जगह मिलेगी. सुबह-शाम टहलने वालों का 'स्पेशल रुट' बनेगा. बिल्डरों की दुकानें खुलेंगी. बस्ती की बजाय बाजार खुलेगा. आप तो वहीं से आ रहे हैं तो आप ही देखिए हमारी बातें कितनी सच साबित हुईं."

शहरों में विकास के नाम पर झोपड़ियां टूटने की खबर अब नई नहीं लगती. मगर कारपोरेट के नाम पर झोपड़ियां टूटने का किस्सा शायद आप पहली बार सुन रहे होंगे. सूरत में जगमगाता मिलेनियम मार्केट एक उदाहरण भर है. मिलेनियम मार्केट, साऊथ-वेस्ट में कोहली खाड़ी से लगा है. वैसे 2 एकड़ से ज्यादा जमीन पर फैले इस टेक्स्टाईल मार्केट का पता कोई भी बता देगा. मगर उनमें से कुछेक ही यह जानते हैं कि 1999 के पहले तक यहां कोई 800 झोपड़ियों का वजूद था.अब तो लगता भी नहीं कि यहां कभी 5000 से ज्यादा की बस्ती थी.5000 आबादी को यहां से साफ करके शहर से 25 कलोमीटर दूर बेस्तान में ठिकाने लगा दिया गया था.

मालम भाई बंजारा बताते हैं कि "हमारा बीता कल कोई सोने जैसा नहीं था. मगर इतना काला भी नहीं था. तब हमारे सस्ते झोपड़े चांदी की जमीन पर जो खड़े थे." उन्होंने चका भाई को देखते हुए कहा "आज मेलेनियम मार्केट की जमीन 100 करोड़ रूपए की तो होगी चका भाई?"

चका भाई फूट पड़े "हम झोपड़पट्टी के करोड़पतियों को 1 रूपए दिए बगैर वहां से खदेड़ा गया था. ऊपर से घर-सामान टूटने का जो नुकसान झेला, उसका हिसाब तो जोड़ा भी नहीं कभी." अन्याय की ईबारत इसके बाद भी नहीं रूकी- लंबे इंतजार के बाद मकान दिए भी तो 55000 के लोन पर. और मकानों का साईज निकला- 10 गुणा 12 वर्ग फीट.


राहत के सवाल पर
21 फरवरी 2009 को नरेन्द्र मोदी सूरत के कोसाठ आने वाले थे. मकसद था कि कोसाठ में जो 30000 मकान बन रहे हैं उनमें से 3700 परिवारों को मकान सौंपे जाए. मगर 20 फरवरी तक यह तय नहीं हो पाया कि किस झोपड़े को यहां शिफ्ट किया जाए. कार्यक्रम तो फेल होना ही था. मगर अहम बात यह है कि आज की तारीख तक उन हजारों झोपड़ों के नाम तक तय नहीं हो सके हैं.

सूरत महापालिका के कायदे में झोपड़पट्टी में कुल बजट का 10 प्रतिशत खर्च करना लिखा है. मगर सामाजिक कार्यकर्ता भरत भाई कंथारिया ने बताया कि "इस बार यह हिस्सा पुनर्वास के खाते में डाल देने से बुनियादी चीजों में कटौती हुई है. मतलब पुनर्वास पर अलग से पैसा खर्च करने की बजाय गरीबों के हिस्से का पैसा गरीबों को ही बांट दिया गया है."

2005-06 में सूरत की 407 झोपड़पट्टियों को हटाने के लिए बायोमेट्रिक सर्वे हुआ. उसके मुताबिक पुनर्वास के लिए जो मकान बनेगा उसमें से कुल खर्च का 50 प्रतिशत केन्द्र सरकार, 25 प्रतिशत राज्य सरकार, बाकी के 25 प्रतिशत में से जिसको मकान मिलेगा वह और सूरत महापालिका आपस में डील करेगी. अगर यह डील कामयाब रही तो भी मकान के मालिक को 5 साल तक मकान के दस्तावेज नहीं मिलेंगे. मतलब यह कि किसी के हिस्से में मकान आया भी तो वह मुफ्त में और बाईज्जत तो नहीं आने वाला.

2007 को ताप्ती नदी की धार को रोकने के लिए जब एक दीवार बनी तो इसके घेरे में सुभाषनगर की तकरीबन 800 झोपड़ियां भी आ गईं. यह दीवार सिंचाई विभाग ने खड़ी की थी इसलिए झोपड़ियां भी उसी ने तोड़ी. मगर तोड़ने का नोटिस कलेक्ट्रर ने भेजा. सूरत महापालिका के बड़े गेट पर मौजूद कन्हैया भाई बंजारा ने बताया "जब हम पुनर्वास की मांग लेकर सिंचाई-विभाग के पास गए तो बाबू लोग बोले पुनर्वास का काम हमारे दायरे में नहीं आता, कलेक्ट्रर साब शायद कुछ बता पाएं. कलेक्ट्रर साब के पास गए तो वह बोले कि मैं तो केवल मोनीटिरिंग करता हूं, सूरत महापालिका कुछ बताएगा. सूरत महापालिका ने कहा कि तोड़-फोड़ तो सिंचाई विभाग और कलेक्ट्रर की तरफ से हुआ, हम क्या बताएं? मगर जब जनता के स्वर ऊंचे हुए तो बायोमेट्रिक सर्वे करा लिया गया. इसमें भी गजब पालिटिक्स हुई. नतीजा यह है कि दर्जनों नए नाम जुड़ गए और पुराने नाम छूट गए." कन्हैया भाई बंजारा उन्हीं में से अब एक छूटा हुआ नाम बन चुके है.

सूरत के लोगों में बहु-विस्थापन की दहशत भी बढ़ रही है. जैसे कि आज मीठी खाड़ी की जिन झोपड़ियों को उखाड़ा जा रहा है, उनमें से कई ऐसी हैं जिन्हें 25 साल पहले उमरबाड़ा से उखाड़ा गया था. अन्तर बस इतना भर है कि पहले सड़क चौड़ी करने के नाम पर उखाड़ा गया था और अब फ्लाईओवर बनाने के नाम पर उखाड़ा जा रहा है.

कोसाठ, विस्थापितों की जगह से 15 से 25 किलोमीटर दूर, शहर के उत्तरी तरफ का आऊटसाइडेड और नक्शे के हिसाब से बाढ़ प्रभावित इलाका है. कौशिक भाई ने बताया "यहां बसाए जाने का विरोध सुनकर महापालिका का अफसर बड़े ठण्डे दिमाग से बोला कि तुम्हें बस्ती बनाने की बजाय ऊंची मंजिलों में रहना चाहिए. बारिश का पानी भरे भी तो दूसरी, नहीं तो तीसरी मंजिल में चढ़ जाना."

तारीखें गवाह हैं कि 2004 की बाढ़ से सूरत के 30000 लोग प्रभावित हुए थे. तब उन्हें न मंजिल नसीब हुई, न जमीन. एक साल बाद महापालिका से जगह यानी 12 गुणा 35 वर्ग फीट प्रति 2 लाख के बदले जगह माटी के दाम जैसी तो मिली लेकिन घर के बदले घर नहीं. न ही तोड़े गए लाखों के घरों और हजारों की गृहस्थियों का मुआवजा. एक साथ इनसे बिजली, पानी, नालियां, टायलेट, रास्ते, मैदान, बाजार, आंगनबाड़ी, स्कूल, राशनकार्ड, वोटरलिस्ट के नाम ऐसे छूटे कि अभी तक नहीं लौटे. उनके बगैर भी काम चल जाता, जब काम की छूट गए तो जिंदगी कैसे चले?


काम और कर्ज का रोना है
"जमीन, घर, गृहस्थी का नुकसान तो सबने देखा. मगर सबसे ज्यादा नुकसान तो बेकारी से हुआ." सूरज महापात्र यह सब बोलते हुये उदासी में डूब जाते हैं.

कोसाठ में उनकी तरह ही दर्जन भर औरत-मर्द अपने-अपने ठिकानों के बाहर खाली बैठते हैं. बातों ही बातों में मालूम पड़ा कि पहले इन्हें कतारगाम इण्डस्ट्रियल एरिया के पावरलूम्स में दिहाड़ी मजदूरी मिल जाती थी. एक दिन में 150 और महीने भर में 3500 से 4000 रूपए तो बनते ही थे. कुछ लोग मजदूरों की छोटी-छोटी जरूरतों जैसे चाय, नाश्ता या खाने-पीने के धंधों से जुड़े थे. औरतें घरेलू काम के लिए आसपास की सोसाइटियों में जातीं और महीने भर में 600 रूपए कमाती थीं. इस तरह हर घर का हाल-चाल बहुत अच्छा तो नहीं था मगर फिर भी चल तो रहा था. यहां आकर तो इनकी दुनिया ठहर ही चुकी है.

अज्जू मियां ने कहा "कतारगाम आओ-जाओ तो 40 रूपए अकेले आटो के. इसके बाद मजदूरी न मिले तो आफत. तब कारखानों के आसपास थे तो मजदूरी मिलती ही थी. अब आसपास के दूसरे लोगों को ही रख लेते हैं." यही हाल औरतों का है. घरों में काम करने से 600 रूपए मिलेगा उससे दोगुना 1200 रूपए तो अब भाड़े में जाएगा.

रक्षा बेन कहती हैं "मालकिनों से जरूरत की चीजें और उधार के पैसे तो मिलते थे. यहां तो ऊंचे ब्याज-दर पर पैसे उठाने पड़ते हैं." महीना भर पहले ही हेमंत भाई की बीबी टीबी के चलते खत्म हुईं. उन्होंने ईलाज के लिए 12 रूपए/महीने के हिसाब से 10,000 उठाए थे. एक तो आमदनी नहीं और ऊपर से कर्ज का बढ़ता बोझ. यहां हर एक कम से कम 25,000 रूपए का कर्जदार तो बना ही रहता है. इनमें से ज्यादातर ने घर बनाने के लिए कर्ज लिया था. जिसका ब्याज अब तक नहीं छूट रहा है.

राजेश भाई रिक्शा चलाते हैं. उन्होंने अधूरे खड़े घरों का इतिहास बताने के लिए 4 साल पुरानी बात छेड़ी "तब 29 दिनों तक तो ऐसे ही पड़े रहे. बीच में जोर की बारिश हुई तो सबने चंदा करके यहां एक टेंट लगवाया. कईयों ने अपने टूटे घरों की लकड़ी, पन्नी और बांस से अस्थायी घर बनाए, जो भारी बाढ़ में बह गए. मेरी 90 साल की नानी और एक पैर से कमजोर मौसी ने जो तकलीफ झेली उसे कैसे सुनाऊं और बीबी टीबी की मरीज थी, उसे बच्ची को लेकर मायके जाना पड़ा."

यहां कच्चे-पक्के आशियाने एक बार बनने के बाद खड़े नहीं रहते. हर साल की बाढ़ से टूटते, फूटते, गिरते या बहते ही हैं. इस तरह मानसून के साथ आशियाने बनाने और सामान खरीदने की जद्दोजहद जारी रहती है. इस साल भी भारी बूंदों के साथ तबाही के बादल बरसने लगे हैं.


यह एसएमसी का राज है भाई
सूरत महापालिका प्रशासन तरीके को टीना बेन के किस्से से समझते हैं. 1992 को टीना बेन 14 साल की थी, तब उन्हें घर के सामने खड़ा करके एक स्लेट पर उनका नाम और उनके परिवार वालों का नाम लिखवाकर फोटो ले लिया गया. 2005 को यानी ठीक 12 साल बाद जब वह दो बच्चों की मां बनी तो भी उन्हें 1992 की फोटो के हिसाब से घर का मुआवजा दिया गया. समय के इतने बड़े अंतराल में घर तो क्या शहर की पूरी दुनिया ही बदल जाती है. मगर नहीं बदलती है तो सूरत महापालिका की मानसिकता.

कतारगाम में किसी का घर 30 तो किसी का 60 फीट की जगह पर था. मगर कोसाठ में सभी को 12 गुणा 35 वर्ग फीट के फार्मूले से जगह बांटी गई. अब आप ही बताइए 12 गुणा 35 वर्ग फीट में कोई क्या बनाएगा, जो बनेगा उसे चाहे तो किचन कह लीजिएगा, नहीं तो टायलेट, बाथरूम, बेडरूम, हाल या गेलरी, कुछ भी कह लीजिए.

ऐसी बस्तियों में लम्बे समय से काम करने वाले अल्फ्रेड भाई ने बताया "महापालिका जिन मकानों को तोड़ने की ठान लेती है उनसे टैक्स वसूलना बंद कर देती है. जिससे टैक्स नहीं लिया जाता वह डर जाता है कि अगला नम्बर उसका भी हो सकता है."


कायदे, वायदे और हकीकत
सामाजिक कार्यकर्ता भरत भाई कंथारिया से यह मालूम हुआ कि इस दौरान संयुक्त राष्ट्र की गाईडलाईन निभानी जरूरी थी. मगर सूरत में डेमोलेशन के पहले और बाद में मानव-अधिकारों का खुला उल्लंघन आम बात हो चुकी है. जिन्हें उखाड़ना था, उनके साथ बैठकर पुनर्वास और राहत की बातें की जानी थीं.

गाईडलाईन कहती है कि विकलांग, बुजुर्ग और एसटी-एससी को उनके रोजगार के मुताबिक और पुराने झोपड़े के पास ही बसाया जाए. पीड़ित आदमी को पहले पुनर्वास वाली जगह दिखाई जाए. इसके बाद अगर वह मांग करता है तो उसे अदालत में जाने का हक भी है. इसके लिए कम से कम 90 दिनों का समय भी दिया जाए. मगर सूरत महापालिका ने तो एक भी कायदा नहीं निभाया.

जैसा कि सब जानते हैं महात्मा गांधी को 'कालेपन' की वजह से एक रात दक्षिण-अफ्रीका में चलती ट्रेन से फेंका गया था. उन्हीं महात्मा को अपना बताने वाले गुजरात के सूरत में हजारों भारतीयों को 'झोपड़पट्टी वाला' होने की वजह से 25 किलोमीटर दूर फेंका गया है. 120 साल पहले हुए अन्याय का किस्सा यहां का इतिहास नहीं वर्तमान और शायद भविष्य भी है.


कैसी पहेली जिंदगानी
राजीवनगर झोपड़पट्टी के लोग कहते हैं कि सूरत महापालिका के अफसरों की जिद के आगे सभी नतमस्तक हैं. असल में महापालिका ने इनके लिए फ्लेट बनवाएं और अब यही लोग कागजों की भूल-भुलैया में गोते खा रहे हैं. आमतौर पर ऐसी बस्तियों के लोग नहीं जानते कि एक दिन उनके घर टूटेंगे. एक दिन उनसे यहां रहने के सबूत मांगे जाएंगे. इसलिए वह कागजों को इकट्ठा नहीं कर पाते. ऐसी बस्तियों के लोग किस कागज के टुकड़े का मतलब नहीं जानते. अफसरों को जो कागज चाहिए उनमें से कुछ कागज यहां के ज्यादातर रहवासियों के पास नहीं हैं. यह रहवासी अफसरों को अपनी झुग्गी दिखाना चाहते हैं. इसके बावजूद कई लोगों को अपने झोपड़ियों का हक नहीं मिल पा रहा है. कुलमिलाकर पूरी योजना आफिस-आफिस के खेल में उलझ चुकी है.

राजीवनगर के 1200 में से सिर्फ 94 परिवार ही रहने के सबूत दिखा सकते हैं. इसलिए 1106 परिवार कोसाठ में बने फ्लेट का सपना नहीं देख सकते. यहां के रहवासियों का आरोप है कि फ्लेट आंवटन से जुड़े सर्वेक्षणों में भारी अनियमितताएं हुई हैं. कुछ बस्तियों में तीन-तीन बार सर्वेक्षण हुए हैं. कुछ बस्तियों में मुश्किल से एक बार. राजीवनगर में ज्यादातर बाहर से आए मजदूर हैं. यह सूरत में 6-8 महीनों के लिए काम करते हैं. इसके बाद यह अपने गांवों को लौट जाते हैं. इनमें से कई 15-20 सालों से यही रहते हैं. बस्ती के ऐसे ही रहवासी संतोष ठाकुर ने बताया ‘‘बिजली, पानी और संपत्ति के बिल तो मकान-मालिक के पास होते हैं. हमें स्थानीय निकायों से एक सर्टिफिकेट मिलता है. मगर अफसर उसे सबूत ही नहीं मानते. कहते हैं कोई दूसरा कागज लाओ." इसी बस्ती के रहवासी रंजन तिवारी ने बताया "हमें हमेशा काम नहीं मिलता. इसलिए काम की तलाश में सुबह जल्दी निकलना होता है. सर्वे ऐसे समय हुआ जब हम बस्ती से दूर थे. हमें कुछ मालूम ही नहीं था. इसलिए हमारे नाम सर्वे से नहीं जुड़ सके."

नगर-निगम के डिप्टी कमिशनर महेश सिंह के अनुसार "झुग्गीवासियों को फ्लेट आवंटित करने के लिए एक कमेटी बनी हुई है. अगर किसी को लगता है कि उसके सबूत जायज हैं तो कमेटी के पास जाए."

नगर-निगम में स्लम अप-ग्रेडेशन सेल के मुखिया मानते रहे हैं कि सर्वें में कई किरायेदारों के नाम छूट गए हैं. उनकी जगह मकान-मालिकों के नाम जुड़ गए हैं. मगर यह मुद्दा तो उसी समय उठाना चाहिए था.

स्लम अप-ग्रेडेशन सेल किसी भी गड़बड़ी को रोकने के लिए दो तरह से सर्वे करता है. पहला सर्वे लोकेशेन के आधार पर होता है और दूसरा नामांकन के आधार पर. इसलिए स्लम अप-ग्रेडेशन सेल यह मानता है कि अगर लोकेशन वाली सूची से किराएदार का नाम है. साथ ही उसके पास 2005 के पहले से रहने का सबूत भी है तो उसे फ्लेट मिल जाएगा. अब यह किराएदार की जिम्मेदारी है कि वह कहीं से सबूत लाए.

बस्ती के सेवाजी केवट ने कहा "मैंने 8 महीने पहले फ्लेट के लिए आवेदन भरा था. मगर अफसरों ने अभी तक चुप्पी साध रखी है. उन्होंने यह नहीं बताया कि मैं फ्लेट के योग्य हूं या नहीं हूं और नहीं हूं तो क्यों ? मैंने पार्षद को भी अपने निवास का सर्टिफिकेट और एप्लीकेशन दिया है. लेकिन मुझसे और कागजातों की मांग की जा रही है. वैसे मेरा नाम बायोमेट्रिक सर्वे से भी जुड़ा है. मगर सरकार के ही अलग-अलग सर्वे एक-दूसरे से मेल नहीं खा रहे हैं."

सवाल महज घर का नहीं है
यूं तो घर का मतलब रहने की एक जगह से होना चाहिए. मगर बाजार में बदलते शहरों के लिए वह प्रापर्टी भर है. सूरत भी इसी दौर से गुजर रहा है. यहां भी 40 प्रतिशत आबादी के विकास के लिए 60 प्रतिशत आबादी को नजरअंदाज किया जा रहा है. यहां भी पहले घर तोड़ो, फिर घर बनाओ की बात हो रही है. जबकि पहले घर बनाओ फिर घर तोड़ो की बात होनी चाहिए. दूसरी बात बस्ती के बदले बस्ती देने की है. घर के आजू-बाजू रास्ते, बत्ती, बालबाड़ी, नल और नालियों से जुड़कर एक बस्ती बनती है. उन्हें खोकर सिर्फ घर पाना नुकसानदायक है. इसलिए घर के आसपास की सुविधाओं का हक भी देना होगा.

सूरत की तरह हर शहर को जीरो स्लम बनाने का मतलब भी समझना होगा. सरकार मजदूरों से उनकी बस्तियां उजाड़ कर उन्हें बहुमंजिला इमारतों में भेजना चाहती है. इसका मतलब यह हुआ कि वह उन्हें घर के बदले घर दे रही है. मगर जमीन के बदले जमीन नहीं. वह गरीबों से छीनी इन सारी जमीनों को बिल्डरों में बांट देगी. मतलब यह कि गरीबों को फ्लेट उनकी जमीनों के बदले मिल सकता है. मतलब यह कि गरीबों को मिलने वाला फ्लेट मुफ्त का नहीं होगा. मगर बिल्डरों को तो मुफ्त में जमीन मिल जाएगी. यही वजह है कि बिल्डर केवल फ्लेट बनाने पर जोर ही देते हैं. उनके दिल और दिमाग में बालबाड़ी या स्कूल बनाने का ख्याल नहीं आता. जाहिर है खेल केवल मुनाफा कमाने भर का रह गया है.

शहर के विकास में शहरवासियों को बराबरी का हिस्सा मिलना जरूरी है. इससे नगर-निगम को शहर की समस्याएं सुलझाने में मदद मिलेगी. मगर ऐसा नहीं चलता. दूसरी तरफ शहरी इलाकों में नागरिक संगठनों का सीमित दायरा है. शहर के गरीबों की भागीदारी को उनकी आर्थिक स्थिति के कारण रोका जा रहा है. विकास में सबका हिस्सा नहीं मिलने से गरीबी का फासला बढ़ेगा. एक तरफ गरीबी हटाने की बजाय गरीबों की बस्तियां तोड़ी जा रही हैं. दूसरी तरफ उन्हें नुकसान के अनुपात में बहुत कम राहत मिल पा रही है. तीसरी तरफ मिलने वाली ऐसी राहतों को कागजी औपचारिकताओं में उलझाया जा रहा है. कुल मिलाकर चौतरफा उलझे सूरतवासियों को उम्मीद की कोई सूरत नजर नहीं आती है. आज यह घर से निकलकर काम पर जाते है. कल यह काम से लौटकर कहां जाएंगे?

क्या बदलेगी शहर की सूरत
एक सूरत को दो सूरतों में बांटा जा रहा है. शहर के भीतरी हिस्से में अमीरी के लिए साफ-सुथरा, व्यवस्थित और महंगी कारों से दौड़ता सूरत होगा. शहर के बाहरी हिस्से में अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए रात-दिन लड़ने वाले गरीबों का सूरत. जहां न लोग सुरक्षित हैं और न ही उनके काम या रहने के स्थान वगैरह. जाहिर है एक सूरत में अमीरी और गरीबी के फासले को कम करने की बात तो दूर दोनों को एक-दूसरे से बहुत दूर-दूर किया जा रहा है. पहला हिस्सा दूसरी हिस्से की मेहनत के जरिए शहर के बाजार से मुनाफा तो चाहता है. मगर बदले में उसका श्रेय और जायज पैसा नहीं देना चाहता है.

अब तक तो एक शहर का मतलब उसकी पूरी आबादी से लगाया जाता रहा है. मगर सूरत में एक छोटे तबके की तरक्की को शहर की तरक्की माना जाने लगा है और शहर का बड़ा तबका ऐसी तरक्की से तबाह हो रहा है. दरअसल इस तबके से भी तरक्की के मायने जानने थे. एक शहर को लंदन बनाने जैसी बातों की बजाय तरक्की में सबका और सबको हिस्सा देने और अमीरी-गरीबी के बीच बढ़ती खाई को भरे जाने जैसे प्रयास होने थे. मगर नागरिक सुविधाएं मुहैया कराने की जवाबदारी लेने वाली सरकार खुद को पीछे और निजी ताकतों को आगे कर रही है.

जबकि कई तजुर्बों से यह साफ हो रहा है कि निजी ताकतों का काम व्यवस्था में सुधार की आड़ में बाजार तैयार करना है. बाजार नागरिकों से नहीं उपभोक्ताओं से चलता है. जबकि गरीबों के पास अपनी उलझनों को सुलझाने के लिए न तो अधिक पैसा होता है और न ही कागजी औपचारिकताओं को निपटाने की समझ.

शहर के लिए तरक्की की संरचनाएं आम आदमी की भागीदारी से नहीं बन रही हैं और नागरिकों के संवाद और विरोध को रोका जा रहा है. 74वें संविधान संशोधन में विकेन्द्रीकरण और जनभागीदारिता का जिक्र हुआ है. इसके लिए वार्ड-सभा और क्षेत्रीय-सभाओं का उल्लेख भी मिलता है. लेकिन इसका सच देखना हो तो सूरत की सूरत देख लें.

19.10.10

मजदूरी की कीमत पर

शिरीष खरे

खेलने कूदने के दिनों में कोई बच्चा अगर मजदूरी करने को मजबूर हो जाए तो.. और हमारे सामने तो बाल मजदूरी की मजबूरी गांवों से लेकर शहरों और महानगरों में एक मकड़जाल के जैसी फैल रही है. जबकि बाल मजदूरी से परिवारों को आमदनी के स्रोतों का केवल एक रेशा ही मिलता है जिसके लिए गरीब अपने बच्‍चों के भविष्‍य को इस गर्त में झोंक देते है. इसलिए 'क्राई' बाल मजदूरी से निपटने के लिए उसकी जड़ों में जाने और बच्‍चों में स्‍वास्‍थ्‍य, सुरक्षा, शिक्षा, पोषण प्रदान करने को लेकर बीते 30 सालों से कोशिशें करता रहा है.


जैसा कि आप सब जानते हैं कि बाल मजदूरी मानवाधिकारों का घनघोर हनन है और मानवाधिकारों के तहत शारीरिक, मानसिक से लेकर सामाजिक विकास तक का अवसर पाने का अधिकार हर बच्चे को दिया गया है. मगर यह जानकर और अचरज होता है कि खनन उद्योग, निर्माण उद्योगों के साथ-साथ्‍ा कृषि क्षेत्र भी ऐसा क्षेत्र है, जहां बड़ी संख्या में बच्‍चे मजदूरी करते हुए देखे जाते हैं. इन बच्‍चों को पगार के रूप में मेहनताना भी आधा या उससे भी कम दिया जाता है. ऐसा नहीं है कि बाल मजदूरी के निराकरण के लिए सरकारें चिन्तित न हों, मगर यह चिन्‍ता समाधान में कितनी सहयोगी साबित हुई है, यह मूल्‍याकंन का सवाल बना हुआ है.

इस समय उत्‍तर प्रदेश में 2001 की जनगणना के आधार पर 1927997 बाल मजदूरों की पहचान हुई है. इसके एबज में सरकार ने 10वी पंचवर्षीय योजना में 602 करोड़ रूपया आवंटित किया है. जबकि पंचवर्षीय नवीं योजना में 178 करोड़ रूपये खर्च किया गया था. सरकार ने बाल मजदूरी कानून-1986 के अन्‍तर्गत ऐसे क्षेत्रों को चुना है जहां ज्यादा संख्‍या में बाल मजदूर रह रहें हों और जो हानिकारक उद्योगों में काम कर रहें हो. सरकार ने लगभग देश के 250 जिलों में राष्‍ट्रीय बाल मजदूरी परियोजना  द्वारा और 21 जिलों में इण्‍डस प्रोजेक्‍ट द्वारा जिलाधिकारियों को आदेश दे रखें है कि वे बाल मजदूरी को दूर करने के लिए हरसम्‍भव प्रयास करें. इसके लिए विशेष स्‍कूल संचालित किये जाएं, बालश्रमिकों के परिवारों के लिए आर्थिक सहायता उपलब्‍ध करायी जाए  और 18 साल के पहले किसी भी दशा में उनसे मजदूरी न करायी जाए. इस सम्‍बन्‍ध में 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने भी श्रम विभाग को यह आदेश दिया है कि बच्चों को सामान्‍य कार्यो में 6 घण्‍टे से अधिक न लगाया जाए. उन्‍हें निर्धारित अवकाश के साथ्‍ा कम से कम दो घण्‍टे जरूर पढ़ाया जाए. अगर नियोजक ऐसे आदेशों की लापरवाही करें तो उस पर कम से कम 20000 रूपये का जुर्माना लगाया जाए. इस जुर्माने को बच्‍चे के भविष्‍य के लिए उपयोग में लाया जाए.

अब आप जरा देखिये कि सरकार, सुप्रीम कोर्ट, जागरूक जनता के प्रयासों के बावजूद पूरे देश में 58962 नियोजकों के विरूद्ध बालश्रम कराने के लिए मुकदमे दायर किये गये हैं और उत्‍तर प्रदेश में ऐसे अभियोग 6885 हैं. अगर यह सोचा जाए कि सब कुछ कानूनों और सजा से सुधर जाएगा तो यह मुमकिन नहीं है. कानूनों और सजा के प्रावधानों के बावजूद हमें घरों में, ढ़ाबों मे, होटलों में असंख्य बाल मजदूर मिल जाते हैं जो कड़ाके की ठण्‍ड या तपती धूप की परवाह किये बगैर काम करते है. मजदूर कार्यालय या रेलवे स्‍टेशन के बाहर चाय पहुंचाने का काम यह छोटे छोटे हाथ ही करते हैं और मालिक की गालियां भी खाते है. सभ्‍य कहे जाने वाले समाज में यह अभिशाप बरकरार है और जिसे हम नजरअंदाज बनाए हुए हैं. दरअसल तथाकथित अच्‍छे परिवारों में नौकरों के रूप में छोटे बच्‍चों को पसन्‍द किया जाता है और आर्थिक रूप से सशक्‍त होते परिवारों को अपने बच्चे, खिलाने और घर के कामकाज के लिए गरीबों के बच्चे ही पसन्‍द आते हैं.


इन छोटे मजदूरों के छोटे-छोटे कंधों पर बिखरे हुए परिवारों के बड़े बोझ हैं. असल में ऐसे कई समुदाय हैं जिन्होंने अपने आजीविका के साधन खोए हैं, जैसे कि जंगलों पर निर्भर रहने वाले आदिवासी, भूमिहीन, छोटे किसान वगैरह. जबकि देश में गरीबी का आंकलन वास्तविकता से बहुत कम किया गया है. देशभर में काम करने के दौरान हमने पाया है कि बच्चों के लिए पोषित भोजन का संकट बढ़ रहा है, उनके लिए स्कूल और आवास की स्थितियां भी बिगड़ रही हैं. फिर भी तकनीकी तौर पर बहुत सारे बच्चे ऐसे हैं जो वंचित होते हुए भी गरीबी रेखा के ऊपर हैं. जब हम गरीबी को ही वास्तविकता से कम आंक रहे हैं, तो सरकारी योजनाओं और बजट में खामियां तो होगी ही. ऐसे में हालात पहले से ज्यादा मुश्किल होते जा रहे हैं. ऐसे लोगों के लिए लोक कल्याण की योजनाएं जीने का आधार देती हैं. हम इस बात पर ध्यान खींचना चाहते हैं कि बच्चों की गरीबी सिर्फ उनका आज ही खराब नहीं करता, बल्कि ऐसे बच्चे बड़े होकर भी हाशिये पर ही रह जाते हैं. सरकार को चाहिए कि वह देश में बच्चों की संख्या के हिसाब से, सार्वजनिक सेवाओं जैसे प्राथमिक उपचार केन्द्र, आंगनबाड़ी, स्कूल, राशन की दुकानों के लिए और अधिक पैसा खर्च करे.

18.10.10

बच्चों का लापतागंज

शिरीष खरे

देश में एक बार फिर से बच्चों के गायब होने की घटनाएं सामने आ रही हैं. सामने आ रहीं घटनाओं के आधार पर गौर किया जाए तो बड़े शहरो में स्थिति ज्यादा भयावह है. गैर-सरकारी संस्थाओं का अनुमान है कि भारत में हर साल 45000 बच्चे गायब हो रहे हैं. 2007 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि देश में सबसे अधिक बच्चे झारखंड, छत्तीसगढ़, आध्र प्रदेश, बिहार और उड़ीसा से गायब हो रहे हैं.

2001 की जनगणना के आकड़ों के जोड़-घटाने में 7.2 करोड़ बच्चे लापता पाए गए हैं. एक आकड़े के मुताबिक 8.5 करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जाते. दूसरे आकड़े में 5 से 14 साल के 1.3 करोड़ बच्चे मजदूर हैं. अगर 8.5 करोड़ में से 1.3 करोड़ घटा दें तो 7.2 करोड़ बचते हैं. यह उन बच्चों की संख्या है, जो न छात्र हैं, न ही मजदूर. तो फिर यह क्या हैं, कहां हैं और कैसे हैं? इसका हिसाब भी किसी किताब या रिकार्ड में दर्ज नहीं मिलता है. इस 7.2 करोड़ के आकड़े में 14 से 18 साल तक के बच्चे नहीं जोड़े गए हैं. अगर इन्हें भी जोड़ दें तो देश के बच्चों की हालत और भी बदतर नजर आएगी.

भारत में बच्चों की उम्र को लेकर अलग-अलग परिभाषाएं हैं. संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में बच्चों की उम्र 0 से 18 साल रखी गई है. भारत में बच्चों के उम्र की सीमा 14 साल ही है. मगर अलग-अलग अधिनियमों के मुताबिक बच्चों की उम्र बदलती जाती है. जैसे किशोर-न्याय अधिनियम, 2000 में अधिकतम 18 साल, बाल-श्रम अधिनियम, 1886 में अधिकतम 14 साल, बाल-विवाह अधिनियम में लड़के के लिए न्यूनतम 21 साल और लड़की के लिए न्यूनतम 18 साल की उम्र तय की गई है. खदानों में काम करने की उम्र 15 और वोट देने की न्यूनतम उम्र 18 साल रखी गई है. इसी तरह शिक्षा के अधिकार कानून में बच्चों की उम्र 6 से 14 साल रखी गई है.

इस तथ्य को 2001 की जनगणना के उस आकड़े से जोड़कर देखना चाहिए, जिसमें 5 साल से कम उम्र के 6 लाख बच्चे घरेलू कामकाज में उलझे हुए हैं. कानून के ऐसे भेदभाव से अशिक्षा और बाल मजदूरी की समस्याएं उलझती जाती हैं. सरकारी नीति और योजनाओं में भी बच्चों की उम्र को लेकर उदासीनता दिखाई देती है. 14 साल तक के बच्चे युवा-कल्याण मंत्रालय के अधीन रहते हैं. मगर 14 से 18 साल वाले बच्चे की सुरक्षा और विकास के सवाल पर चुप्पी साध ली जाती है. किशोर बच्चों की हालत भी बहुत खराब है. 2001 की जनगणना में किशोर बच्चों की संख्या 22 करोड़ 50 लाख है. यह कुल जनसंख्या का 22 प्रतिशत हिस्सा है. इसमें भी 53 प्रतिशत लड़के और 47 प्रतिशत लड़किया हैं. यह सिर्फ संख्या का अंतर नहीं है, असमानता और लैंगिक-भेदभाव का भी अंतर है.

2001 की जनगणना में 0 से 5 साल की उम्र वालों का लिंग-अनुपात 100-879 है, जबकि 15 से 19 साल वालों में यह 1000-858 है. जिस उम्र में लिंग-अनुपात सबसे खराब है, उसके लिए अलग से कोई रणनीति बननी थी. मगर हमारे देश में उम्र की जरूरत और समस्याओं को अनदेखा किया जा रहा है. बात साफ है कि बच्चियां जैसे-जैसे किशोरिया बन रही हैं, उनकी हालत बद से बदतर हो रही है. देखा जाए तो बालिका शिशु बाल-विभाग, महिला व बाल-विकास के अधीन आता है, मगर एक किशोरी न तो बच्ची है न ही औरत. इसलिए इसके लिए कोई विभाग या मंत्रालय जिम्मेदार नहीं होता. इसलिए देश की किशोरियों को सबसे ज्यादा उपेक्षा सहनी पड़ रही है.

ऐसा नहीं है कि बच्चों के गुम होने जैसी समस्या से अकेले भारत ही जूझ रहा है. दुनिया के विकासशील देशों से लेकर विकसित देशों से भी हर साल लाखों की संख्या में बच्चे गायब हो रहे हैं. ब्रिटेन में हर साल करीब 13000 बच्चों के लापता होने की घटनाएं सामने आईं हैं. चीन में 2000 में हुई जनगणना के दौरान बीते 10 सालों में 3.7 करोड़ बच्चे गायब पाए गए. अफ्रीकी देशों की हालत भी इससे अलग नहीं है. रिकार्ड बताते हैं कि बेल्जियम में हर साल 2928 और रोमानिया में 2354 बच्चे गायब होते हैं. जबकि फ्रांस में सालाना 706 बच्चे गायब हो जाते हैं. अमेरिकी बच्चे भी इससे अछूते नहीं हैं और अमेरिकी सरकार की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2007 में यहां 4802 बच्चों के गायब होने की सूचना पुलिस को थी. यहां कई हाई प्रोफाइल बच्चे भी गायब हुए और सालों बाद भी उनका कोई अता-पता नहीं चला. बच्चों के गायब होने के ये सारे आंकड़े पुलिस द्वारा दिए जाते हैं. मगर ज्यादातर मामलों को पुलिस दर्ज ही नहीं करती या उन तक पहुंचती ही नहीं है.

ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बच्चे गायब हो रहे है बल्कि सवाल यह भी है कि बच्चे कहां जा रहे हैं ? रिकार्ड बताते हैं कि ज्यादातर गायब हुए बच्चों से या तो मजदूरी कराई जाती है या उन्हें सेक्स वर्कर बना दिया जाता है. बड़े शहरों के भीतर खेलने-कूदने की उम्र वाले बच्चों को बड़ी संख्या में भीख मांगने के लिए भी मजबूर किया जा रहा है.

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन भले ही जून 1999 से ही बाल श्रम को खत्म करने के लिए कमर कस चुका हो मगर अब भी करोड़ों बच्चे जीविका चलाने के लिए बाल मजदूरी कर कर रहे हैं. भारत में दुनिया भर के मुकाबले सबसे ज्यादा बाल श्रमिक हैं. देश में 5 से 14 साल के तकरीबन 1 करोड़ बच्चे घातक और जानलेवा पेशे में लगे हुए हैं. 12 जून को बाल श्रम के खिलाफ विश्व दिवस मनाया गया. संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने अपनी रिपोर्ट में माना है कि 1999 से आर्थिक गतिविधियों में लिप्त बच्चों की संख्या भले ही घटी हो मगर अब भी 5 से 14 साल के 16.5 करोड़ बच्चे मजदूर हैं. इनमें से ज्यादातर बच्चे शिक्षा से वंचित हैं और खतरनाक स्थितियों में काम करते हैं. इनमें से कुछ के साथ गुलामों से भी बदतर व्यवहार किया जाता है, जिन्हें उनके गरीब माता-पिता के ऋणों को चुकाने के बदले बेच दिया जाता है.

बाल सैनिकों की समस्या को भी बाल श्रम के खिलाफ विश्व दिवस पर पहचाना गया है, जो बाल श्रम के सबसे बुरे रूपों में से एक है. सयुंक्त राष्ट्र संघ बाल कोष के अनुसार दुनिया भर में करीब तीन लाख बच्चे 30 सशस्त्र संघर्षो में शामिल हैं, जिनमें 7 या 8 साल के छोटे बच्चे भी हैं. हालांकि ज्यादातर बाल सैनिकों को जबरन लड़ाई में झोंका जा रहा है. कई से खानसामों, चौकीदारों, संदेशवाहकों या जासूसों का काम लिया जाता है. लड़का हो या लड़की दोनों का ही बाल मजदूर के तौर पर अक्सर यौन शोषण किया जाता है और बहुधा इसका परिणाम अवांछित गर्भधारण और यौन रोगों में होता है.

7.10.10

बिहार चुनाव : कहां गए बच्चे

शिरीष खरे





बिहार के विधानसभा की घमाचान में हर पार्टी के झोले के भीतर से एक-एक करके हर एक के लिए मुद्दे ही मुद्दे और नारे ही नारे बाहर आ रहे हैं. मगर बच्चों के लिए इस बार भी कोई मुद्दा और नारा नहीं गूंज रहा है. ऐसे में क्राई ने बच्चों के मुद्दों को सूचीबद्ध करते हुए सभी राजनैतिक दलों से बच्चों के अधिकारों को वरीयता देने के लिए संवाद का सिलसिला शुरू किया है. इसके तहत बाल अधिकारों का एक घोषणा-पत्र तैयार किया जा चुका है और अब बच्चों के मामले में राजनैतिक दलों पर जल्द से जल्द अपना-अपना रूख स्पष्ट करने के लिए दबाव बनाना भी तय हुआ है.

इस बारे में क्राई से विकास सहयोग विभाग के वरिष्ठ प्रबंधक शरदेन्दु बंधोपध्याय बताते हैं कि "राज्य में चुनावी माहौल के दौरान हम याद दिलाना चाहते हैं कि यहां आबादी का एक चौथाई हिस्सा 18 साल से कम उम्र का होने के चलते वोट नहीं डालता है. 2001 जनगणना के अनुसार बिहार में 3 करोड़ 40 लाख बच्चे हैं. ऐसे में मतदाता और प्रत्याशी के रुप में हमारी जवाबदारी बनती है कि राजनैतिक फलक से बच्चों के जुड़े हुए हितों को भी प्रमुखता से उठाया जाए." लोकतंत्र में किसी पार्टी की ताकत उसके वोट-बैलेंस से बनती-बिगड़ती है और पार्टी का एजेंडा इस वोट-बैलेंस को घटाने-बढ़ाने में खास भूमिका निभाता है. मगर बच्चे वोट-बैलेंस नहीं होते हैं इसलिए बच्चों के हितों का प्रतिनिधित्व बड़ों के हाथों में होता है.

शरदेन्दु बंधोपध्याय बताते हैं कि ‘‘राज्य में बच्चों की एक बहुत बड़ी संख्या होने के बावजूद राजनैतिक दलों द्वारा बच्चों और उनके मुद्दों को लगातार नजरअंदाज बनाया जाता रहा है. इसलिए अबकि बार हमने मीडिया के जरिए बच्चों के मुद्दों को लेकर मतदाताओं और प्रत्याशियों के बीच पहुंचना का सोचा है. हम इस चुनाव में जहां वोटर से बच्चों के अधिकारों के लिए वोट डालने की अपील करेंगे, वहीं प्रत्याशियों को यह याद दिलाना चाहेंगे कि अगर वह जीते तो अपनी जीत को बच्चों की जीत के तौर पर भी याद रखें." इस दौरान चुनाव के उम्मीदवारों से सीधा संपर्क साधा जाएगा और उन्हें घोषणा-पत्र के बारे में बताया जाएगा. साथ ही यह भी देखा जाएगा कि उम्मीदवारों के पास बच्चों के मुद्दे हैं भी या नहीं और अगर हैं भी तो इस रूप में हैं.

बिहार में बच्चों के मुद्दों को प्रमुखता देना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि बिहार के 58 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे कुपोषित पाये गए हैं, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर कुपोषित बच्चों का आकड़ा 46 प्रतिशत है. हर साल जन्म लेने वाले 1000 बच्चों में से 61 की मौत हो जाती है, जो दर्शाता है कि यह राज्य शिशु मृत्यु-दर के मामले में दूसरे राज्यों के मुकाबले कितना दयनीय है. बिहार के ग्रामीण इलाके में एनीमिया से पीडि़त बच्चों की संख्या पहले 81 प्रतिशत थी जो बढ़कर 89 प्रतिशत हो गई है. औसत से कम वजन के बच्चों की सबसे ज्यादा संख्या के मामले में बिहार को देश के पांच राज्यों के साथ गिना जाता है. केवल 33 प्रतिशत बच्चों का ही टीकाकरण होता हैं. 51.5 प्रतिशत लड़कियों का विवाह 18 साल से पहले हो जाता है. केवल 47 प्रतिशत पुरूष और 33 प्रतिशत महिलाएं ही साक्षर हैं यानी साक्षरता दर के मामले में बिहार सबसे नीचे है. जबकि मानव विकास सूचकांक के मामले में भी सबसे पिछड़ा राज्य बिहार (0.367) ही है.

क्राई वोट मांगने वाले राजनैतिक दलों के उम्मीदवारों से यह तयशुदा करने के लिए कहेगा कि सभी बच्चे स्कूल में हों और उन्हें पूरी स्कूली शिक्षा प्राप्त हो. सभी बच्चों के लिए पर्याप्त पोषण मिले और उन्हें समान अवसर प्राप्त हों. बच्चों को बाल मजदूरी, शोषण और तशकरी से बचाने के प्रयासों में तेजी लायी जाए. सरकार की जवाबदेही का मूल्यांकन करते हुए अगर जनता बच्चों के अधिकारों को वरीयता दे तो बाल अधिकार को राज्य के राजनैतिक एंजेडे में खास स्थान प्राप्त हो सकता है और उन्हें भोजन, स्वास्थ्य, आवास, शिक्षा, सुरक्षा और खेल से जुड़े अधिकारों की उचित हिस्सेदारी भी. बच्चों को उनके अधिकार समान रुप से मिल सकें इसके लिए उन्हें दूसरे नागरिकों की तरह ही समान रुप से देखे जाने की भी जरूरत है.

क्राई यह मानता है कि गरीबी, पलायन और विस्थापन बच्चों के विकास को रोकता है. इसके लिए संतुलित विकास का होना जरूरी है. कमजोर तबकों के लिए स्थानीय स्तर पर आजीविका के विकल्प के रूप में जमीन देने और बचाने की प्रक्रिया को अपनाने की जरुरत है. भूमि सुधार की ऐसी नीतियां शामिल की जाएं जिससे पलायन रूके और बच्चों को अपने समुदायों तथा क्षेत्रों में ही विकास के मौके मिलें. हर एक के लिए घर, रोजगार और समान वेतन तय हों जिससे बच्चों के अधिकारों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो सके. गरीब किसानों के लिए कृषि-नीति पर दोबारा सोचा जाए और खास तौर से असंगठित मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा देने की नीति को बढ़ावा दिया जाए.

क्राई अपने तजुर्बों के आधार पर यह मानता है कि तकनीकी तौर पर बहुत सारे बच्चे ऐसे हैं जो हाशिए पर होते हुए भी गरीबी रेखा के ऊपर हैं. जब हम गरीबी को ही वास्तविकता से कम आंक रहे हैं तो सरकारी योजनाओं और बजट में खामियां तो होंगी ही. इसलिए हालात पहले से ज्यादा बदतर होते जा रहे हैं. बच्चों की गरीबी केवल उनका आज ही खराब नहीं करता बल्कि ऐसे बच्चे बड़े होकर भी हाशिये पर ही रह जाते हैं. ऐसे में उम्मीदवारों को चाहिए कि वह राज्य में बच्चों की संख्या के हिसाब से सार्वजनिक सेवाओं जैसे प्राथमिक उपचार केन्द्र, आंगनबाड़ी, स्कूल, राशन की दुकानों के लिए और अधिक पैसा खर्च करने पर जोर देंगे.

4.10.10

पंचायती व्यवस्था का बलात्कार

शिरीष खरे राजस्थान से लौटकर

बाड़मेर और अजमेर. राजौ और गीता. एक ही दुनिया के दो अलग-अलग किस्सों के दो किरदार हैं. इधर है अपनी अस्मत गंवा चुकी राजौ, जो गांव के विरोध पर भी अपनी अर्जी अदालत तक दे तो आती है, मगर लौटकर गांव से छूट जाती है. उधर है कमजोर दलित महिला होने का दर्द झेलनी वाली गीता, जो डर के मारे अपनी गुहार अदालत से वापिस ले आती है, और गांव से दोबारा जुड़ जाती है. दोनों ही मानते हैं कि थाने के रास्ते अदालत आना-जाना और इंसाफ की लड़ाई लड़ना तो फिर भी आसान है, मगर समाज के बगैर रह पाना बड़ा मुश्किल है.

एक को अदालत की लड़ाई मंजूर है, दूसरे को गांव में रहना. दोनों का हाल आपके सामने है. मगर कौन ज्यादा अंधेरे में है, और कौन कम उजाले में. चलिए आप ही तय कीजिए- गांव....थाने....अदालत....पंचायत....समाज के बीच मौजूद इनके फासलों, अंधेरे, उजाले से होकर.

राजौ के यहां जाने से पहले, उस रोज का अखबार भरतपुर जिले के गढ़ीपट्टी में ‘बंदूक की नोंक पर पांच लोगों के दलित औरत से बलात्कार’ की खबर दे रहा था. राजौ का गांव सावऊ, बाड़मेर जिले के गोड़ा थाने से 12 किलोमीटर दूर है. वहां तक पहुंचने में 30 मिनिट भी नहीं लगे, मगर राजौ के भीतर की झिझक ने उसे 45 मिनिट तक बाहर आने से रोके रखा.

राजौ के साथ जो हुआ वो घटना के चार रोज बाद यानी 9 जून, 2003 की एफआईआर में दर्ज था : "श्रीमान थाणेदार जी, एक अरज है कि मैं कुमारी राजौ पिता देदाराम, उम्र 15 साल, जब गोड़ा आने वाली बस से सहरफाटा पर उतरकर घर जा रही थी, तब रास्ते में टीकूराम पिता हीराराम जाट ने पटककर नीचे गिराया, दांतों से काटा, फिर.......और उसने जबरन खोटा काम किया. इसके बाद वह वहां से भाग निकला. मैंने यह बात सबसे पहले अपनी मां को बतलाई. मेरे पिता 120 किलोमीटर दूर मजूरी पर गए थे, पता चलते ही सबेरे लौट आएं. जब गांव वालों से न्याय नहीं मिला तो आज अपने भाई जोगेन्दर के साथ रिपोर्ट लिखवाने आई हूं. साबजी से अरज है कि जल्द से जल्द सख्त से सख्त कार्यवाही करें."

मुंह मोड़ने वाला समाज
राजौ अब 20 साल की हो चुकी है. उसकी मां से मालूम चला कि बचपन में उसकी सगाई अपने ही गांव में पाबूराम के लड़के हुकुमराम से हो चुकी है. मगर वह परिवार अब न तो राजौ को ले जाता है, न ही दूसरी शादी की बात करता है. गांव वालों से किसी मदद की तो पहले ही कोई गुंजाइश नहीं है, मगर 2 किलोमीटर दूर पुनियो के तला गांव में जो ताऊ है, 60 किलोमीटर दूर बनियाना में जो चाचा है, 80 किलोमीटर दूर सोनवा में जो ननिहाल है, वहां से भी कोई खैर-खबर नहीं आती है. उसका झोपड़ा भी गांव से 2 किलोमीटर दूर उसके खेत में आ पहुंचा है, और गृहस्थी का हाल पहले से ज्यादा खराब है. पंचों में चाहे खेताराम जाट हो या रुपाराम, खियाराम हो या अमराराम, सारे यही कहते हैं कि चिड़िया जब पूरा खेत चुग जाए तो उसके बाद पछताने से क्या फायदा है ?

राजौ के पिता देदाराम यह खोटी खबर लेकर सबसे पहले गांव के पंच खियाराम जाट के पास पहुंचे थे. पंच खियाराम जी ने पहले तो इसे अंधेर और जमाने को घोर कलयुगी बतलाया, फिर देदाराम से पूछे बगैर दोषी टीकूराम के पिता के यहां यह संदेशा भी भिजवा दिया कि 20,000 रूपए देकर मामला निपटा लेने में ही भलाई है. मगर टीकूराम के पिता हीराराम जाट ने साफ कह दिया कि वह न तो एक फूटी कोड़ी देने वाला है, न निपटारे के लिए कहीं आने-जाने वाला है. फिर मजिस्ट्रेट की दूसरी पेशी पर बाड़मेर कोर्ट के सामने दोषी समेत गांव के सारे पंच-प्रधान जमा हुए. सबने मिलके राजौ को समझाया कि केस वापिस ले लो, कोर्ट-कचहरी का खर्चापानी भी दे देंगे. पर टीकूराम को साथ देखकर राजौ बिफर पड़ी. उसने राजीनामा के तौर पर लाये गए 50, 000 रूपए जमीन पर फेंक दिए और ऐसी खरी-खोटी सुनाई कि वहां एक न ठहरा.

लड़ाई जारी है
इसके बाद जिस चाचा ने राजौ का नाता जोड़ा था, उसी के जरिए पंचों ने बातें भेजीं कि- राजीनामा कर लो तो हम साथ रहकर गौना भी करवा दें. छोटे भाई की भी शादी करवा दें. नहीं तो सब धरा रह जाएगा. कोर्ट कचहरी के चक्कर में पड़ने से अच्छा है आपस में निपट लेना. वो तो लड़का है, उसका क्या है, जितना तुम्हें पैसा देगा, उतना कचहरी में लुटाकर छूट जाएगा, तुम लड़की हो, उम्र भी क्या है, बाद में कोई साथ नहीं देता बेटी. फिर बदनामी बढ़ाने में अपना और अपनी जात का ही नुकसान होता है.

जब राजौ पर ऐसी बातों का भी असर नहीं हुआ तो कभी राजौ की जान की फिक्र की गई, तो कभी उसके छोटे भाई जोगेन्दर की जान की.

राजौ आज तक केस लड़ रही है. यह अलग बात है कि टीकूराम को जमानत पर रिहाई चुकी है, और उसके बाद उसकी शादी भी हो चुकी है. राजौ को अदालत में लड़ने का फैसला कभी गलत नहीं लगा है, उसे अदालत से फैसले का अब भी इंतजार है. राजौ को गांव में आने-जाने के लिए सीधे तो कोई भी नहीं रोकता, मगर पीठ पीछे तरह-तरह की बातों को वह महसूस करती हैं.


वैसे पंचों को छोड़कर गांव के बाकी लोगों के साथ उसके रिश्ते धीरे-धीरे सुधर रहे हैं. राजौ के यहां से उठते वक्त उससे जब कहा गया कि रिपोर्ट में उसका नाम और फोटो छिपा ली जाएगी तो उसने बेझिझक कहा "मेरा असली नाम और फोटो ही देना. जिनके सामने लाज शरम से रहना था, उनके सामने ही जब ईज्जत उतर गई तो. तो दुनिया में जिन्हें हम जानते तक नहीं, उनसे बदनामी का कैसा डर ?"

इस रात की सुबह कब ?
थानाधिकारी सतीश यादव टेबल पर रखे ‘सत्यमेव जयते’ की प्लेट और पीछे की दीवार पर लटकी गांधीजी की फोटो के बीचोंबीच मानो 180 डिग्री का कोण बनाते हुए बैठे हैं. उन्होंने दूसरी तरफ निगाह टिकाते हुए कहा- "आपकी तारीफ". मगर बगैर जबाव सुने ही चल दिए.

मेरा सवाल यह नहीं कि केस कितना छोटा या बड़ा है, या आप बड़ा किसे मानते हैं, सवाल है कि जब कभी गांवों में दलित और खासकर दलित महिला पर अत्याचार होता है तो न्याय के हर पड़ाव तक कैसी मानसिकता अपनाई जाती है ? आगे की किस्सा इसी मानसिकता को केन्द्र में रखकर लिखा जा रहा है.

रसूलपुरा गांव से दलित-महिला अत्याचारों के एक हफ्ते में ही तीन-तीन केस आने पर थानाधिकारी महोदय क्रोधित है. ‘महिला जन अधिकर समिति’ का आरोप है कि वह दलित-महिलाओं को कानून में दिये गए विशेष अधिकारों पर अमल करना तो दूर शिकायत दर्ज करवाने वाले को ही हवालात की हवा खिलाने लगे हैं.

रसूलपुरा के सुआलाल भाम्बी, उसकी पत्नी गीतादेवी और पुत्री रेणु ने जब बीरम गूजर के खिलाफ जर्बदस्ती गाय हथियाने और मारपीट का मामला अलवर थाने में दर्ज करवाना चाहा तो सुआलाल भाम्बी को ही यह कहते हुए बंद कर लिया गया कि जांच के बाद पता करेंगे कि कसूरवार है कौन ?

रसूलपुरा, अजमेर से जयपुर जाने वाली सड़क पर बामुश्किल 10 किलोमीटर दूर है. यहां करीब 800 मतों में से 600 मुस्लिम, 150 गूजर और 50 दलितों के हैं. 15 साल पहले दलितों की संख्या ठीक-ठाक थी. तब से अब तक करीब 20 दलित परिवारों को अपनी जमीन-जायदाद कौड़ियों के दाम बेचकर अजमेर आना पड़ा है. बचे दलितों को भी गांव से आधा किलोमीटर दूर अपने खेतों में आकर रहना पड़ रहा है.

दलित हो तो नीचे रहो
यहां आज भी चबूतरे पर दलितों का बैठना मना है. वह साइकिल पर सवार होकर निकल तो सकते हैं, मगर जब-तब रोकने-टोकने का डर भी है. पहले तो दलित दूल्हा घोड़े पर चढ़ नहीं सकता था, पर 10 साल पहले हरकिशन मास्टर ने घोड़े पर चढ़कर पुराना रिवाज तोड़ा डाला था. 15 साल पहले छग्गीबाई भील सामान्य सीट से जीतकर सरपंच भी बनी थी. तब गांव की ईज्जत का वास्ता देकर सारे पंचों को एक किया गया और अविश्वास प्रस्ताव के जरिए छग्गीबाई को 6 महीने में ही हटा दिया गया. छग्गीबाई का सामान्य सीट से जीतना करिश्मा जैसा ही था.

छग्गीबाई कहती हैं "तब सामान्य जाति के इतने उम्मीदवार खड़े हो गए कि दलितों के कम मत ही भारी पड़ गए. नतीजा सुनकर उंची जात वालों ने रसूलपुरा स्कूल घेर लिया, ऐसे में पीछे की कमजोर दीवार से लगी खिड़की तोड़कर मुझे पुलिस की गाड़ी से भगाया गया. पुराने सरपंच श्रवण सिंह रावत फौरन पंचायत की तरफ दौड़े, कुर्सी पर बैठकर बोले ‘ई भीली को कोड़ पूछै, कौड़ पैदा नी होय ऐसो, जो जा पंचायती में राज करै’."

यानी एक गांव के ऐसे दो उदाहरणों से बीते 10-15 सालों के भीतर आपसी टकराहटों के कारण साफ समझ में आते हैं. तकरीबन 15 साल पहले ही इलाके की महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए समिति बनायी और नाम रखा ‘महिला जन अधिकार समिति’. तब 2-2 रूपए देकर 10-12 महिलाएं जुड़ी. केसर, तोला, सोहनी, सरजू, सकुंतला, रेनू, जूली, लीला, गंगा, रिहाना, संपत, भंवरीबाई जैसी महिलाएं अपनी छोटी-छोटी दिक्कतों और निपटारे के लिए चर्चाएं करतीं. भंवरीबाई बताती हैं "5 साल के बाद जब हम बालविवाह, मृत्युभोज और जातिप्रथा जैसी बुराईयों के विरोध में बोलने लगे तो हमारा भी विरोध बढ़ने लगा. दलित महिलाएं जब जातिसूचक शब्दों और गालियों पर ऐतराज जताने लगीं तो सवर्ण कहते कि हम तो तुम्हें रोज ही गालियां देते थे, पहले भी तुम्हारे बच्चों को बिगड़े नामों से ही बुलाते थे, तब तो तुम्हें बुरा नहीं लगता था, अब क्यों लग रहा है ?"

दलितों को सरकारी जमीन से होकर अपने खेत आना-जाना होता था. मगर जून की घनी दोपहरी में तेजा गूजर ने उसी रास्ते पर गड्डा खुदवाया, और तार और कांटे की बागड़ लगवा दी. इसके बाद दलित महिलाओं की तरफ से भंवरीबाई ने तेजा गूजर से बात की- "लालजी (देवरजी) डब्बो थाओ बात करणी है." जबाव में उन्हें अश्लील गालियां और गड्डे में ही गाड़ देने जैसी धमकियां मिलीं.

ऐसो पुलिस वालो से तो...
इसके बाद दलित महिलाओं ने उनके बड़े भाई और वार्ड के पंच अंबा गूजर को बताया कि आपको वोट दिया तो इस उम्मीद पर कि सुख-दुख बांटोंगे, आप तो खुद ही दुख दे रहे हैं. जबाव में अंबा गूजर ने थाने घूम आने की नसीहत दी.

रसूलपुरा के दलित परिवारों ने बताया कि यह दोनों भाई कई गांवों जैसे बेड़िया, गूगरा, बुडोल और गगबाड़ा के दलितों की जमीनों को सस्ते दामों में खरीदने में लगे हुए हैं. अगले दिन दलित महिलाएं जब नारेती पुलिस चौकी गईं तो पुलिस वाले बोले कि पहले जांच करेंगे, तब केस लेंगे. जांच के लिए जब कैलाश (दलित) कांस्टेबल आया तो तेजाभाई-अंबाभाई ऊपर बैठे और कैलाश कांस्टेबल आंगन के बाहर नीचे बैठा.

यह नजारा देखते ही दलित महिलाएं अलवर गेट थाने पहुंची, जहां थानाधिकारी ऐसे मामलों के चलते पहले से ही हैरान-परेशान पाये गए. उन्होंने ऐसी वारदातों में कमी लाने की बात पर जोर दिया.

गांव के दलित व्यक्ति कल्याणजी पूरे भरोसे के साथ बताते हैं ‘‘ऊंची जात के हमारे 30 एकड़ के खेतों के अलावा 4 एकड़ की सरकारी जमीन भी हथियाना चाहते हैं. यहां 1 एकड़ खेत की कीमत 1 लाख के आसपास चल रही है. हमारे पास गृहस्थी चलाने का मुख्य जरिया खेती ही है. 10-15 सालों से सूखा पड़ने से खेती वैसे ही चौपट है. मजूरी के लिए पलायन करना पड़ता है. ऐसे में ऊंची जात वालों की नीयत बिगड़ने से थाने-कचहरी के चक्कर भी लगाने पड़ रहे हैं.’’

मौसेरे भाई
इसी साल के कुछ मामलों पर नजर दौडाएं तो जमीन के विवाद में 12 फरवरी को मामचंद रावत और उसके लोगों ने शंकरलाल रेंगर, उसकी पत्नी कमला, बेटी संगीता, बहू ललिता, बेटे विनोद और गोपाल के साथ घर में घुसकर मारपीट की. ‘दलित अधिकार केन्द्र’ के हस्तक्षेप करने से अलवर गेट थाने में तीन महीने बाद रिपोर्ट दर्ज हो सकी. अभी तक चलान पेश नहीं हुआ.

इसके बाद तेजाभाई-अंबाभाई गूजर ने रास्ता रोकने का विरोध करने वाली गीता और सोहनी को पीटा. एसपी साब के हस्तक्षेप के बाद ही रिपोर्ट लिखी जा सकी. बहुत दिनों से कार्यवाही का इंतजार है. जिन दलितों के दिलों में अपनी जमीन खो देने का डर हैं, उनमें हैं कल्याण, कैलाश, ओमप्रकाश, रतन, सोहन, छोटू, नाथ, मोहन, सुआंलाल, गोगा, घीसू, किशन, दयाल, रामचंद, रामा, हरिराम ने अपने नाम लिखवाए हैं.

रसूलपुरा का राजनैतिक-आर्थिक ताना-बाना ऐसा है कि वर्चस्व की लड़ाई में गूजरों के साथ मुस्लिमों ने हाथ मिला लिया है. लाला शेराणी और लाला सलीम जैसे दो मुस्लिम व्यापारियों ने तो गूजरों का खुला समर्थन किया है. इसमें से लाला सलीम ने तो यहां तक कह दिया है कि "पूरा गांव उलट-पुलट हो जाएगा, अगर एक भी गूजर थाने में गया तो." मुस्लिम और सवर्ण-हिन्दूओं की एकता का इससे बेहतरीन उदाहरण और कहां मिलेगा ?

इधर अलवर गेट थाने के थानाधिकारी महोदय की परेशानी समझ नहीं आती है. शंकरलाल रेंगर जब रिपोर्ट लिखाने पहुंचे तो थानाधिकारी महोदय ने स्वयं समझाने की कोशिश की थी कि यह थाना केवल दलितों या रसूलपुरा के लिए नहीं खोला गया है. इलाके में और भी तो लोग हैं, और भी परेशानियां हैं.

उधर रसूलपुरा में शाम 7 बजे तक जब सुआलाल भाम्बी की गाय न लौटी तो उसकी पत्नी गीता और बेटी रेणु पता लगाने गांव में घूमने लगीं. उन्हें पता चला कि बीरम सिंह ने उनकी गाय बांध रखी है. इसके बाद जिसका अंदेशा था, वही हुआ. गाय मांगने पर गाली-गलौज और विरोध करने पर मारपीट. उस वक्त एक भी बीच-बचाव में न आया. ऐसे में जब सुआंलाल भाम्बी, उसकी पत्नी गीता और बेटी रेणु रिपोर्ट लिखवाने आए तो सुआलाल को बंद कर लिया गया. मगर ‘महिला जन अधिकार समिति’ और ‘दलित अधिकार केन्द्र’ के विरोध के बाद पुलिस सुआलाल से कहती है कि "गांव चलते हैं, अगर एक भी आदमी यह कह दे कि यह तेरी गाय है तो रख लेना."

सुआलाल बोला "गवाह तो एक नहीं कई हैं, पर मामला केवल गाय का नहीं है, गाय तो मेरी है ही, सवाल मेरी पत्नी और बेटी को बेवजह पीटने और गाली-गलौज का है, उसका न्याय चाहिए." पुलिस वालों के हिसाब से "ऐसे तो मामला सुलझने से रहा." इसलिए अगली सुबह गीता और रेणु को जिला एवं सेशन न्यायधीश, अजमेर का रास्ता पकड़ना है. रात उन्हें अजमेर ही ठहरना है. सुबह होने के पहले गांव के पंच उन्हें कचहरी की हकीकत बताने के लिए आते हैं. वह बाकायदा गाय लौटा देने का वादा भी करते हैं. मारपीट और ईज्जत के सवाल पर अस्पताल में लगा खर्चापानी दिलवाने की गांरटी भी देते हैं. दोषी बीरम सिंह माफी भी मांगता है, यह अलग बात है कि केवल ऊंची जाति वालों के सामने.

गांव का वास्ता
गीता और रेणु के शरीर पर चोट के निशान ज्यादा हैं. मगर गांव के पंचों के बढ़ते जोर के सामने उन्हें मारपीट का भंयकर दर्द हमेशा के लिए भूलना पड़ेगा. सुआलाल के हिसाब से यह राजीनामा उसकी खुशी के लिए नहीं गांववालों की खुशी के लिए करना पड़ेगा. बड़े-बड़े लोग जब अपनी ईज्जत की खातिर आ जाएं तो उनका अड़ी ठुकराते भी तो नहीं बनती. खेत का पानी, आंगन का गोबर, चूल्हे की लकड़ियां, कर्ज के पैसे, आटे की चक्की, मजूरी, हर रोज हर एक चीज के लिए तो उन्हीं का आसरा है.

गीता मान रही है कि इस बार ईज्जत से कोई समझौता नहीं होना चाहिए. हालांकि सुबह होने में अभी बहुत देर है , मगर उसके पहले यह भी जानना चाह रही है कि वह गांव और घरबार छोड़कर भी कहीं जी सकती है ?

कहते हैं ‘‘पांच पंच मिल कीजै काज। हारे जीते होय न लाज।।’’ मगर जहां के पंच अपनी ताकत से सत्य को अपने खाते में रखते हो, वहां के कमजारों के पास हार और लाज ही बची रह जाती है. ऐसे में कोई कमजोर जीतने की उम्मीद से कचहरी के रास्ते जाए भी तो उसे जाती हुई 'राजौ 'और लौटी हुई 'गीता' मिलती है. तब यह सवाल इतना सीधा नहीं रह जाता है कि वह किसके साथ चले, किसके साथ लौटे ?