शिरीष खरे9.4.09
रोशनी से रु-ब-रु होती पारधी जमात
शिरीष खरे7.4.09
तिरंगा फहराने के जिद की जीत

शिरीष खरे
१५ अगस्त को वार्ड-१२ की पार्षद मीनाताई बरडे ने तिरंगा फहराया। उनके भाषणों से बच्चों के दिलों में देशप्रेम की भावनाएं उमडती थीं। बच्चों ने आजादी के नारे लगाए। फिर सबके सामने मीनाताई से २६ जनवरी के पहले खम्बा और उसका चबूतरा बनाने की मांग रखी।
देखते-देखते नए साल का सूरज उग गया। १२ साल की रोशनी ठाकरे ने याद किया- ‘हमें भी अपनी जिद पकडी। ५ जनवरी को सारे फिर बैठे। यहां दो फैसले हुए। यह पिछले फैसलों से अलग थे। एक तो अपने हाथों से एप्लीकेशन बनाई। दूसरा खुद जाकर पार्षद से मिलने की सोची। यह काम हमें ही करने थे इसलिए पूरे हुए।’
१३ साल के अक्षय नागेश्वर ने याद किया- ‘हमने जिम्मेदारियां बांटी। ८ जनवरी को १२ बच्चे पार्षद के आफिस पहुंचे। लेकिन मीनाताई नहीं मिलीं। हम उदास हुए, निराश नहीं।’ पार्षद से मिलने की दूसरी तारीख ११ जनवरी रखी गई। इस तारीख की सुबह ९ बजे बच्चे ऑफिस पहुंचे। मीनाताई फिर नहीं थीं। लेकिन मैनेजर ईश्वर बरडे मिल गए। बच्चों ने एप्लीकेशन उन्हें ही दे दी और उनसे मीनाताई का मोबाइल नंबर ले लिया।
बच्चों के अगले १० दिन भी इंतजार में गुजरे। अब पानी सिर के ऊपर था। २१ जनवरी को ’बाल अधिकार भवन‘ में तीसरी बैठक रखनी पडी। यहां से बच्चे फिर मीनाताई के ऑफिस पहुंचे। इस बार संबंधित अधिकारी अशोक सिंह का नम्बर मिला। बच्चों ने अशोक सिंह से खम्बा और उसका चबूतरा बनाने की अपनी पुरानी जिद दोहरायी। कुल मिलाकर बात आई और गई हो गई।
१४ साल के मनीष सोनावने ने याद किया- ‘२६ जनवरी नजदीक आया। यह परीक्षा की घडी थी। हम फिर मीनाताई के ऑफिस में गए। वह फिर नहीं मिली। इसलिए उनके घर जाना पडा। मीनाताई ने जब हमारी परेशानियाँ सुनी तो सॉरी कहा। उन्होंने २६ जनवरी के पहले तक खम्बा और उसका चबूतरा बनाने का वादा किया।’
सुबह की तस्वीर
जब कोई बच्चा पहली बार जूते के बंध बांधता है तो उसके चेहरे की ख़ुशी देखती ही बनती है। एक रोज कुछ नन्हें हाथ मिले तो किसी ने न देखा। लेकिन जब छोटी-सी आशा हकीकत में बदली तो पूरे गंगानगर देखता रह गया।
’बाल अधिकार भवन‘ में बडा फासला मिटाने वाले छोटे-छोटे कदम एक साथ खडे है। हेमलता नेताम, पूजा भराडे, अक्षय नागेश्वर, रोशनी ठाकरे और मनीष सोनावने को एक तस्वीर में कैद किया गया है। तकदीर से बनी यह तस्वीर अब इस कहानी का आखिरी सिरा है। हो सकता है यह अगली कहानी का पहला सिरा बन जाए!!
24.3.09
घर कहां है ?
शिरीष खरेलिंक : http://raviwar.com/news/139_where-is-my-home-shirish-khare.shtml
उठ गये चौसठ हाथ
8.3.09
मोनालिसा (ओं) की मुसकान
शिरीष खरे 25.2.09
बीमार विदर्भ पर फोकस
शिरीष खरेइन दिनों बालीबुड से गांव गायब हो गए हैं. ऐसे में एक फिल्म देश के मौजूदा संकट को मुख्यधारा के करीब लाती है. लेकिन अब तक किसानों को सरकार की ठोस पहल का इंतजार है और फिल्म को दर्शकों के जरिए प्रचार का. यह फिल्म पूरे देश में नहीं दिखायी जा सकी है और बाहर भी कुल 338 शोज ही हुए.
पी साईनाथ का एक लेख विदर्भ में स्वास्थ्य सेवाओं की गिरावट को बयान करता है. इसी लेख से प्रभावित होकर ब्रजेश जयराजन ने एक कहानी लिखी जिसे निर्देशक सुहैल तातारी और निर्माता अतुल पांडेय ने रूपहले परदे पर साकार किया. इसमें पांच डॉक्टर बने हैं सिंकदर, गुल, पनाग, युविका चैधरी, अर्जुन बाबा और अलेख सेंगल. इसके अलावा विक्रम गोखले, सचिन खेडेकर, आशुतोष राणा, स्वेता मेनन और नीतू चंद्रा ने भी सहज भूमिकाएं निभायी हैं.
पटकथा में विदर्भ का संकट बड़ी खबर बनने से असमंजस, अविश्वास और निराशाएं पनपती हैं. इसलिए मेडिकल छात्रों को अनिवार्य तौर से गांवों में भेजने की बातें चलती है . इन बातों से बेपरवाह पांच दोस्तों का एक ग्रुप है. यह लाखों रूपए देकर मेडिकल की पढ़ाई पूरी करते हैं. सभी अमीर घरों के होने से हर ऐशो-आराम भोग रहे हैं. इनकी जिदंगी की बड़ी उलझनों में प्यार, परीक्षा, गर्लफ्रेड, सेक्स और तकरार हैं. हरेक उलझन खुल-मिलकर रंगीन दुनिया भी बनाती हैं. पांचों हवाओं के रूख में बहे जा रहे हैं. इन्हें समाज के बदलाव से कोई लेना-देना नहीं. लेकिन कॉलेज के चुनाव में प्रकाश नाम का लीडर उन्हें पहली बार सच से रु-ब-रु कराता है. यह लीडर उन्हें चुनाव के लिए उकसाता है. पोलिटिक्स से उकताकर यह पांचों दोस्त कैंपस छोड़ देते हैं. फिर सभी मूड बदलने के लिए एक गांव के ‘प्राइमरी हेल्थ सेंटर’ पहुंचते हैं.
लेकिन बदलाव का रास्ता यही से खुलता है. यहां आकर यह मेडिकल छात्र भारत की असली तस्वीर देखते हैं. उनके सामने घनघोर गरीबी में फंसा पूरा गांव है. यह पांचों दोस्त किसानों की आत्महत्या के मूक दर्शक भी बनते हैं. जिसे कभी नहीं सुना उसे होते देखना बेहद तकलीफ देता है. इससे उनके भीतर भय, दुख और शर्म पैदा होती है. कर्ज से डूबे किसानों का संसार उन्हें ‘मदर इण्डिया’ के रूपहले पर्दे जैसा ही रंगहीन नजर आता है. यहां की सामंती ताकतें नए रुप में हाजिर होती हैं.
ऐसे में स्वास्थ्य व्यवस्था संभालना और लोगों को जीवन की थकान से उभारना मुश्किल होता है. पांचों की अंदरूनी आवाजों ने मिलकर सवाल बनाने शुरू कर दिए. जो देश की तरक्की, गरीबों की आमदनी, आम जनता के हक और राजनैतिक उदासीनता से उभरे. कॉलेज से भागे इन दोस्तों का दिल किसानों की जंग से जुड़ गया. आखिरकार यह पांचों एक उबलते हुए बिन्दु पर पहुंच गए. जहां उन्हें हिंसक समाधान नजर आया.
दरअसल यह पूरी फिल्म अहिंसक समाधान की संभावनाएं ढ़ूढ़ती है. सभी किरदारों की प्रतिक्रियाएं अलग-अलग देखी गई. कभी उन्होंने हकीकत से समझौता करना चाहा, कभी उसे बदलना चाहा, कभी उनका दिल कड़वा हुआ, कभी प्यार से भर गया और कभी दुख से. दृश्यों के सहारे सामाजिक कोणों का स्वाभिक ताना-बाना बुना गया है. जहां कुछ भी रुखा और थोपा हुआ नहीं लगता.
जिस साल यह फिल्म बन रही थी उस साल 784 किसानों ने आत्महत्याएं की थी. प्रधानमंत्री द्वारा 40 अरब रूपए के पैकेज बावजूद यह आकड़ा 1648 तक पहुंच चुका था. तब भारत के ‘नियंत्रक और महालेखा परीक्षक’ की रिपोर्ट ने भी स्वीकारा था कि- ‘‘राहत योजनाओं को लागू करने में गंभीर खामियां हुई हैं.’’ फिल्म निर्माण के दौरान ही देश के कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा था कि- ‘‘आत्महत्याएं अब कम हो रही हैं.’’ लेकिन जिस रोज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आए उस रोज ही अकोला के राकेश बंसल सहित 5 किसानों ने आत्महत्याएं कर ली. "
मौजूदा हाल तो और भी बुरा है. बीते 5 महीनों में यावतमाल, बुलदाना, अकोला, अमरावत, वासीम और वर्धा जिले के 401 किसानों ने आत्महत्याएं की है. इसी प्रकार बीते 5 साल में यहां आत्महत्या करने वाले किसानों की कुल तादाद 5157 है. ‘राष्ट्रीय सेमपल सर्वेक्षण’ के 59वें आकड़ों के मुताबिक- ‘‘यहां के किसान खेती पर खर्च करने के लिए 60 फीसदी कर्ज लेते है ’’ मतलब फसल खराब होने से समस्याएं और बढ़ जाती है."
20 साल पहले यहां 1 क्विंटल कपास 12 ग्राम सोने के बराबर होता था. आज 1 क्विंटल कपास के बदले सिर्फ 1750 रूपए का समर्थन मूल्य मिलता है. बीते दशक से खेती में रासायनिकों का प्रचलन बढ़ा और वह 6 गुना तक महँगी हुई लेकिन कपास की कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई. उधर ‘विश्व व्यापार संगठन’ में हुए समझौते के कारण कपास पर आयात-शुल्क सिर्फ 10 फीसदी ही रह गया. अमेरिका में किसान की 1 किलो कपास की लागत करीब 1.70 डॉलर होती है. वहां की सरकार 1 किलो कपास पर 2 डालर की सब्सिडी भी देती है. इसलिए अमेरिका का किसान लागत से बेहद कम कीमत पर कपास निर्यात कर देता है. विदर्भ का किसान यही मात खा जाता है.
‘समर 2007’ जिन आकड़ों के साथ खत्म होती है उनमें भूमण्डलीकरण के खतरों का विश्लेषण तो नहीं लेकिन इशारा जरूर मिलता है. फिल्म कोई नया सवाल खड़ा नही करतीं. यह पुराने सवालों में ही असर पैदा करती है.
19.2.09
Playing Hangman
18.2.09
विवादों का विशालकाय सरोवर
शिरीष खरे8.2.09
खबर नहीं बना विस्फोट

शिरीष खरे
22.1.09
पत्थरों के रास्ते बदलाव
शिरीष खरे
बीड़ से लौटकर
जिन दलितों से रोजाना रोटी की उलझन नहीं सुलझती थी अब वही पत्थरों के रास्ते बदलाव की तरकीब सुझा रहे हैं। जानवर चराने वाली पहाड़ियों पर ज्वार पैदा करने की सूझ अतिशेक्ति अंलकार जैसी लगती है. मराठवाड़ा में बीड़ जिले के दलितों ने `जमीन हक अभियान´ से जुड़कर जमीन का मतलब जाना और समाज का ताना-बाना पलटकर रख दिया. इन दिनों 69 गांवों की करीब 2000 एकड़ पहाड़ियां दलित-संघर्ष के बीज से हरी-भरी हैं. इस संघर्ष में औरतों ने भी बराबरी से हिस्सेदारी निभायी. इसलिए उन्हें जमीन का आधा हिस्सा मिला. इस तरह खेतीहीन से किसान हुए कुल 1420 नामों में से 710 औरत हैं.
साल पहले तक यह लोग पहाड़ों के चरवाहे कहलाते थे। यह तथ्य महाराष्ट्र के `जमीन गायरन कानून´ से मेल खाता है. इस कानून के मुताबिक 14 अप्रैल 1991 के पहले से जो परिवार ऐसी जमीन का इस्तेमाल करते हैं उन्हें वह जमीन दे दी जाए. लेकिन कानून बनने के एक दशक बाद भी लोग अनजान रहे. यह `जमीन वालों´ के असर से डरकर अपनी जमीन को `अपनी´ नहीं कह सकते थे. इसलिए `चाईल्ड राईटस एण्ड यू´ और `राजार्षि शाहू ग्रामीण विकास´ ने जब गांव-गांव तक इस कानून का संदेश पहुंचाया तो सभी ने उसे अनसुना कर दिया. लेकिन 2002 की एक मामूली प्रतिक्रिया ने बड़े संघर्ष को जन्म दे दिया. शिराल गांव के 2-3 दलित एक सुबह संगठन के आफिस आए और बोले कि हमने जबसे अपनी जमीन पर खेती की बात छेड़ी तब से सवर्ण धमकियां देते हैं. वह अपनी ताकत से हमें दबाते हैं. इसलिए संगठन आगे आए. कार्यकर्ताओं ने उन्हें समझाया कि संगठन चार रोज तुम्हारे साथ रहेगा. तुम्हें वही रहना है इसलिए वह जमीन और उसकी लड़ाई तुम्हारी ही है. उससे जो भी नफा-नुकसान होगा वह भी तुम्हारा ही होगा. सबकुछ तो सवर्णों का है इसलिए डरना तो उन्हें चाहिए. तुम्हारे पास जीने के लिए केवल एक जिंदगी है. कम से कम उस जिंदगी को तो निडर होकर जीओ. ऐसा सुनकर वह दलित अपने खेतों को आजाद कराने की बात कहकर चले गए.
इसके आगे का सिरा महेन्द्र जगतप ने जोड़ा- ``हम लोग गांवों में मिट्टी डालने और पत्थर हटाने लगे तो सवर्णों ने अचानक हमला बोल दिया. इसमें 5 लोग बुरी तरह घायल हो गए. संगठन के साथ मिलकर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज की. पुलिस कार्यवाही में 15 हमलावरों को 18 दिन जेल हुई. यह मामला कचहरी के मार्फत सुलझा.´´ इसके बाद संगठन ने शिराल गांव में जो बैठक बुलायी उसमें 2 हजार लोग इकट्ठा हुए. इसमें दलितों के साथ पारधी, भील, धनगढ़, सुतार, कुम्हार, बड़ई और लोहार समुदाय मिलकर एक हो गए. उन्होंने ``मार खाने को तैयार, जमीन छोड़ने को नहीं´´ जैसे नारे लगाकर यहां खेत बनाए और उसमें बीज डाले. वह एक-दूसरे को सुनते और उसमें गुणा-भाग लगाकर जगह-जगह लड़ने की तैयारियां करते. 8 दिन रूककर बाहरी लोग शिराल गांव से विदा हुए. तब फसल की रखवाली के लिए 35 दलित झोपड़ियां 120 एकड़ खेतों के इर्द-गिर्द बस गई. दामोदर धोरात ने बताया- ``जब पहली बार ज्वार की फसल आई तो हमारे अंदर इज्जत से जीने का सपना जागा. बढ़िया जीने की चाहत नई ऊंचाईयां छूने लगी. खेत मालिक बनने का सपना दूर-दूर तक फैल गया.´´
शिराल की लड़ाई रंग लायी और करंजी गांव के 15 दलितों ने 51 एकड़ पथरीली जमीन पर बीज रोपे. इस बार सवर्ण चुप रहे. मगर यह चुप्पी तूफान के पहले की थी. इसके बाद जहां-जहां दलितों ने खेत मालिक बनना चाहा वहां-वहां सर्वणों का अत्याचार कहर बनकर टूटा. पाठसरा में घर की कुण्डी लगायी और ऊपर की छत निकालकर मारा. भातुड़ी में सामाजिक बाहिश्कार करते हुए दाना-पानी बंद किया. धामनगांव में चोरी के झूठे मामलों के बहाने फंसाया गया. करेहबाड़ी में बस्ती और आसपास के जंगल को आग के हवाले किया. िशडाला में खेत का धान जला दिया. बेलगांव में खड़ी फसल को जानवरों के लिए छोड़ दिया. पारोडी में गेहूं की फसल काट ली और देवीगांव में खेत सहित जंगल जला डाला.
उस समय एक तरफ सवर्ण हमला करते दूसरी तरफ संगठन से जुड़े दलित पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज कराते। इस तरह पाठसरा से 250, भातुड़ी से 70, धामनगांव से 45, करेहबाड़ी से 70, शिडाला से 150, बेलगांव से 9, पारोड़ी से 70 और देवीगांव से 9 हमलावरों को गिरफ्तार किया गया। जैसे-जैसे गिरफ्तारियां बढ़ी वैसे-वैस दलितों पर हमले कम हुए. 2005 तक जातीय-संघर्ष का यह दौर पूरी तरह थम चुका था.
शिडाला के दादासाहेब बाग्मारे ने बताया- ``जब दलितों की अपनी जमीन हुई तो मजदूरों की कमी पड़ गई. ऐसे में बड़े किसानों ने मजदूरी बढ़ायी और काम के घण्टे तय किए. इससे हम छोटे किसानों को फायदा हुआ. हम अपनी खेतीबाड़ी से फुर्सत होते ही उनके खेतों के काम निपटाते. लेकिन बंधुआ मजदूर बनकर नहीं बल्कि अपनी मेहनत का सही मेहनताना लेकर. प्रभाकर सावले ने कहा- ``हम खेतों से साल भर का अनाज बचाते हैं और चारा बेचकर कुछ पैसा भी. इस तरह कई बकरियां खरीदी हैं. हम बहुत अमीर नहीं हुए लेकिन गृहस्थी की हालत पहले से ठीक है.´´ पाठसरा गांव की बैठक में सैकड़ों लोगों के साथ हम भी मौजूद हैं. यहां `संगठन´ के मतलब और मकसद पर गर्मागम चर्चा चल रही है. नमनदेव काले ने कहा- ``संगठन याने आप. अगर आपके अंदर की ताकत बढ़ती है तो संगठन खुद-ब-खुद ताकतवर होगा.´´ अप्पा बालेकर बोला- ``एक-एक से पूरा गांव और ऐसे कई गांवों से जुड़कर संगठन बनता है. संगठन के आगे आने का मतलब लोगों के आगे आने से होना चाहिए. एक के पीछे एक होने या किसी के हटने से संगठन नहीं रूकता.´´ चागदेव सांग्ले बोला- ``दूसरों के भरोसे जिया भी नहीं जा सकता. जो अपने आप चलता है वहीं संगठन है. हमें नेता नहीं, कार्यकर्ताओं चाहिए.´´ जनाबाई गरजी- ``अगर किसी गांव का संगठन पावरफुल है तो समझो वह आसपास के इलाके का पावरहाउस है.´´
करंजी गांव के मंदिर में दलितों का घुसना मना था लेकिन उर्मिला निकालजे आज वहीं की सरपंच हैं। उन्होंने बताया- ``जमीन-हक को लेकर निकलने वाली रैलियों में 10-15 हजार लोग जमा होते हैं। उन रैलियों को औरतें संभालती हैं। हम पुलिस हो या तहसीलदार, मिनिस्टर हो या कलेक्टर सबसे बतियाते हैं. अब हमारा अभियान सामुदायिक खेती के बारे में सोच रहा है. शिराल गांव की राहीबाई खंडागले ने बताया- ``ऐसी खेती में सारे खेतों की हदों को तोड़ दिया जाएगा। तब हर गांव का एक खेत होगा. इससे कम लागत और मेहनत में ज्यादा पैदावार होगी. जो फसल आएगी उसे बराबर हिस्सों में बांट दिया जाएगा. सवर्ण की सुने तो ऐसा मुश्किल है. जब हमने जमीन की लड़ाई शुरू की थी तब भी वह ऐसा ही कहते थे. हमने मिलकर 22 गांव के खेतों के लिए बाबड़ियां बनायी हैं. इसलिए सब मिलकर खेती भी कर सकते हैं.´´ पोखड़ी गांव की जनाबाई ने बताया- ``खेतों के बिना भी हमारी जिंदगी थी मगर बंधी हुई. ऊंची जाति के घरों से गुजारा चलता था. वह जैसा कहते वैसा करते. हम उनकी गंदगी उठाते. हमारे बच्चे उनके जानवरों के पीछे भागते. हमारे मर्द उनके खेतों में रात-दिन काम करते. इसके बदले साल में एक बार अनाज, उतरन के कपड़े और रोजाना बचा हुआ खाना मिलता. बारिश में जब झोपड़ियां बहती तो उनकी छतों का बाहरी हिस्सा हमारा आसरा बनता.´´ भातुड़ी गांव की अभिधाबाई धेवड़े ने कहा-``पहले बैठकों में हमें बुलाया नहीं जाता था और अब हम पंचायत का फैसला सुनाते हैं.´´
एक सदी पहले महात्मा फुले ने कहा था- ``शिक्षा बिना मति गई, मति बिना गति गई, गति बिना अर्थ गया और अर्थ बिना शूद्र बर्बाद हुए।´´ हमारी पंरपराओं ने दलितों को धन रखने की आजादी नहीं दी जिससे वह लाचार हुए. इसलिए वह सवर्णों पर निर्भर हो गए. यह निर्भरता आज तक बरकरार है. सामाजिक कार्यकर्ता बाल्मिक निकालजे ने इस स्थिति को उल्टने की बात कहते है- अगर दलितों को आत्मनिर्भर बनाना है तो उन्हें जीने के संसाधन देने होंगे। फिलहाल जमीन से बेहतर दूसरा विकल्प नजर नहीं आता. जमीन मिलते ही लोग मालिक बन जाते हैं. इसलिए बीड़ जिले के दलित आज किसी से कुछ नहीं मांगते. जमीन की यह लड़ाई स्वाभिमान से भी जुड़ी है.
जो पत्थर घास को रास्ता नहीं देता था आज वहां ख्वाहिशों की फसल है. यहां के धरतीपुत्रों ने धरती को आजाद किया और उससे जीना सीख लिया. इस तरह उन्होंने अपनी दुनिया को `सुजलाम सुभलाम मलयज शीतलाम´ बना डाला. लेकिन कानून के मद्देनजर उन्हें जमीन का पट्टा मिलना बाकी है. मतलब 15 साल गुजरने के बावजूद जमीन की लड़ाई यहां आज तक जारी है. जब तक लड़ाई पूरी नहीं होती तब तक यह कहानी भी अधूरी ही रहेगी.
10.1.09
गांव-गांव टूटकर, ठांव-ठांव बन गए

3.1.09
लड़ाई-पढ़ाई साथ-साथ
सरदार सरोवर बांध से नफा और नुकसान। पिछले दो दशकों से जारी इस बहस ने हमारे दिलो-दिमाग पर दो चित्र उभारे हैं। पहला चित्र बिजली, पानी और विकास की गंगा के रूप में तो दूसरा हजारों लागों के विस्थापन का दर्द लिए खड़ा है। नर्मदा घाटी के बाहर इस आंदोलन को जानने की उत्सुकता बनी रहती है। आंदोलन की दो रेखाएं सामानान्तर चल रही हैं। एक अहिंसा पर आधारित लड़ाई को जारी रखती है तो दूसरी रचनात्मकता का रास्ता दिखाती है।
बांध से प्रभावित आदिवासियों ने अपने बच्चों के लिए जीवनशाला नाम से कई स्कूल तैयार किए है। लोगों के मुताबिक `लड़ाई-पढ़ाई साथ-साथ´ होना चाहिए। विंध्यांचल और सतपुड़ा पर्वतमालाओं की ओट में यहां कई छोटे और सुंदर गांव हैं। यह गांव अपने जिला मुख्यालय से बेहद दूर और घनघोर जंगलों के बीच हैं। इन स्थानों में स्कूल भवन बनने और शिक्षक आने की राह तकना नियति का खेल समझा जाता था। ऐसा नहीं कि बांध विस्थापितों ने बच्चों की शिक्षा के लिये कभी गुहार नही लगाई हो। हर बार केवल आश्वासन मिलें और स्थिति जस के तस बनी रही। आखिरकार, आदिवासियों ने खुद बदलाव की यह पहल की। 1991-92 में, चिमलखेड़ी और नीमगांव में जीवनशालाएं शुरू हुई। काम नया और कुछ मालूम नहीं होने से चुनौती पहाड की तरह खड़ी थी। फिर भी जीवनशाला का आधार स्बावलंबी रखा गया। शुरूआत से ही सीमित साधन, संसाधन और समुदायिक क्षमता के अनुरुप बेहतर शिक्षा की बात पर बल दिया गया। इन जीवनशालओं का मकसद महज सरकारी स्कूलों की शून्यता भरना नहीं था बल्कि आदिवासी जीवनशैली को कायम रखना भी था। फिलहाल करीब 13 गांव में जीवनशालाएं संचालित है जो आसपास के 1500 से अधिक बच्चों को जिन्दगी की बारहखड़ी सिखाती हैं।
`नर्मदा बचाओं आंदोलन´ से जुड़े आशीष मण्डलोई बताते है कि- ``वैसे तो जीवनशाला का जन्म विस्थापन रोकने की लड़ाई का नतीजा रहा मगर जल्दी ही ऐसे स्थान आंदोलनकारियों के लिये विविध चर्चा, रणनीति और कार्यक्रम आयोजन का मुख्य केन्द्र बन गए। इस प्रकार आन्दोलन और जीवनशाला, दोनों को एक-दूसरे को लाभ पहुंचाने लगे। ऐसे स्थान आदिवासी एकता और भागीदारिता के प्रतीक बन गए।´´जीवनशाला में पढ़ाई-लिखाई का तरीका सहज ही रखा गया है। लोगों के बीच से कुछ लोग निकले और पढ़ाने लगे। इसमें गांव की बोली को वरीयता दी गई। इस दौरान किताबों का प्रकाशन भी पवरी/भिलाली बोलियों में किया गया। पहली बार बच्चों को उनकी बोली की किताबें मिल सकी। शिक्षकों ने ``अमर केन्या´´ (हमारी कथाएं) में कुल 12 आदिवासी कहानियों को समेटा। इसके अलावा सामाजिक विषयों पर ``अम्रो जंगल´´(हमारा जंगल) और ``आदिवासी वियाब´´(आदिवासी विवाह) जैसी किताबों को लिखा गया। केवल सिंह गुरूजी ने ``अम्रो जंगल´´ में यहां की कई जड़ी-बूटियों को बताया। खुमान सिंह गुरूजी ने ``रोज्या नाईक, चीमा नाईक´´ किताब में अंग्रेजी हुकूमत के वक्त संवरिया गांव के संग्राम पर रोशनी डाली। ऐसी किताबों में आदिवासी समाज का ईतिहास, साहित्य, कला, संस्कृति और परंपराओं से लेकर स्थानीय भूगोल, प्रशासन और कानूनी हकों तक की बातें होती हैं।
हर किताब जैसे कुदरत के साथ दोस्ताना रिश्ता बनाने का संदेश देती है। पढ़ाई को दिलचस्प बनाने के लिये अनेक तरीको को अजमाया गया। ``अक्षर ओलखान´´(अक्षरमाला) में यहां की बोली के मुताबिक अक्षरों की पहचान और जोड़ना सिखाया गया है। इसमें कई आवाजों को निकालकर या आसपास की चीजों से मेल-जोल कराना होता है। नाच-गाना, चित्र और खेलों से पढ़ाई मंनारंजक बन जाती है। लिखने की कई विधियां को भी बार-बार दोहराया जाता है। जीवनशाला से निकली पहली पीढ़ी अब तैयार हो चुकी है। जो अब शिक्षक बनकर अपने संस्कारों को आगे बढ़ा रहे हैं। लेकिन विकास के नाम पर जंगल काटने और अब घाटी के लोगों को भोजन की कमी महसूस होने लगी है। अपनी जमीन से अलग-थलग यहां का आदिवासी अपने को यकायक बाजार में खड़ा पाता है। उन्हें न आर्थिक सुरक्षा मिल पा रही है और न ही भावनात्मक। इतनी बड़ी निर्दोष आबादी से जहां एक ओर जीने के साधन छीने गए हैं वहीं दूसरी तरफ उन्हें पिछड़ा बताया जा रहा है। विस्थापन का कार्य गति पर है।
विस्थापन, दोबारा या बार-बार बसना, सरकारी योजना का लाभ न उठा पाना, कानूनी हक से बेदखल, मेजबान समुदाय की आनाकानी, नया समायोजन, शोषण, यौन उत्पीड़न, अधिक व्यय, हिंसा, अपराध,अव्यवस्था,संसाधन या जमीन की सीमितता, निर्णय की गतिविधि से कटाव, अस्थायी मजदूरी, मवेशियों का त्याग, प्रदूषण, सुविधा व स्वास्थ्य संकट........ एक तरफ बांध के कारण विस्थापन से विकराल आशंकाओं का इतना भरी बोझ है और दूसरी ओर जीवनशाला के नन्हें बच्चों के हाथों में खुली किताबों-सा खुला आसमान है। हालांकि उन्हें अभी बहुत सी परीक्षा पास करनी हैं मगर किसी के चेहरे पर चिंता की लकीर तक नहीं। बच्चों के हंसते चेहरों को देखकर लाख समस्याओं से लड़ने की मन करता है।
19.12.08
टाईगर रिजर्व में जनजातियों का शिकार
16.12.08
चीनी की मिठास में घुलता बचपन
शिरीष खरे
सुबह-सुबह एक ट्रेक्टर से जुड़ी दो ट्रालियों में दर्जनभर मजदूर परिवार बैठे हैं. इन्होंने अपने साथ अनाज, कपड़े, बिस्तर और कुछ जरूरी सामान बांध लिया है. बहुत छोटे बच्चे अपनी मांओं के गोद में सोए हैं, उनसे थोड़े बड़े अपनी बहनों के कंधो पर. एक कोने में बकरियों के गले की रस्सियां ढ़ीली करता बुजुर्ग भी है. ट्रालियों से बाहर पैर लटकाए सारे मर्दों के चेहरों पर एक जैसा रुखापन छाया है. उनके पीछे बैठी औरतों ने भी चुप्पी साध रखी है. मैंने पूछा - ``कहां जाना होगा ?´´ उनमें से एक औरत ने तीन टुकड़ों में कहा- ``बहुत दूर... कर्नाटक.... बीदर कारखाने में´´ फिर अगला सवाल-``लौटना कब होगा ?´´ जबाव आया- ``लौटना, बारिश के दिनों तक ही होगा.´´
यह महाराष्ट्र का मराठवाड़ा इलाका है. यहां के गावं को शहरों से जोड़ने वाली सड़कों पर ऐसी कई गाड़िया दौड़ रही हैं. जिला मुख्यालय उस्मानाबाद से करीब 100 किलोमीटर दूर कलंब तहसील की कई बस्तियां भी खाली हो चुकी हैं. मस्सा गांव के एम.ए. पास एक दलित युवक विनायक तौर ने बताया कि- `यहां दीवाली से बारिश तक हजारों मजदूर जोड़े (पति-पत्नी) चीनी कारखानों के लिए गन्ना काटने जाते हैं. इसमें अधिकतर दलित, बंजारा और पारदी जनजाति से होते हैं. इनके पास न तो खेती लायक जमीन है और न ही अपना कोई धंधा. गांव से बाहर रहने से इन्हें पंचायती योजनाओं का फायदा नहीं मिलता. इनकी बस्तियां भी बदलाव से अछूती रह जाती हैं. सबसे ज्यादा हर्जाना तो स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को भुगतना पड़ता है. ये बच्चे गन्नों के जिन खेतों में काम करते हैं, आप वहां जाकर देखिए शोषण की कितनी कहांनिया बिखरी है.´´

