9.4.09

रोशनी से रु-ब-रु होती पारधी जमात

शिरीष खरे
बीड़। पारधी लोग घनघोर जंगल में रहते थे। उन्हें रोशनी चाहिए थी। लेकिन दिया नहीं रखते थे। एक आहट मिलते ही डरते कि पुलिस तो नहीं। पारधी लोग गाय के ऊपर गृहस्थी का बोझ लटकाते। चोरी-छिपे भटकते। इस तरह उनकी कई पीढ़ियां गुजरी। उन्हें ‘इंसान’ नहीं ‘चोर’ ही कहा जाता रहा। वह ‘चोर’ हैं या नहीं। और हैं भी तो क्यों-यह किसी ने न जाना। एक रोज इन्हें चोर’ नहीं ‘इंसान’ कहा गया। इन्हें भरोसा न हुआ। धीरे-धीरे होने लगा। तब आसमान, धरती और रास्ते तो जहां के तहां रहे. मगर इनकी दुनिया बदलने लगी।
यह मराठवाड़ा का बीड़ जिला है। यहां ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ और ‘राजार्षि शाहु ग्रामीण विकास’ संस्थाएं सक्रिय हैं। इन दोनों ने मिलकर स्कूल और जमीन के रास्तों से बदलाव लाया है। बदलाव का पहला बीज 21 साल पहले ही गिर चुका था।
एक रोज पाथरड़ी तहसील में चोरी हुई। कई महीने बीते लेकिन चोर का पता नहीं लगा। बीड़ से करीब 100 किलोमीटर दूर आष्टी तहसील के चीखली में रहवसिया पारधी का परिवार ठहरा हुआ था। पुलिस ने उसे ही चोरी के केस में अंदर डाल दिया। इधर रहवसिया को दो महीनों की जेल हुई। उधर उसके परिवार को ऊंची जाति वालों ने जगह छोड़ने के लिए धमकाया। रहवसिया ने बताया- ‘‘परिवार के पास पहुंचते ही मुझे अपने 12 साथियों के साथ रस्सी से बांध दिया। हमें बोला गया कि हम गांव के लिए ‘अपशगुन’ हैं। आग लगाने की बात सुनते ही मैं भाग निकला। 4 किलामीटर दौड़ते हुए संगठन के आफिस पहुंचा। वहां से 7 टेम्पों में करीब 300 कार्यकर्ता नारा लगाते हुए यहां आए। तब ऊंची जाति वाले अपने घरों में ताला लगाकर भागे।’’
आप को लग रहा होगा कि पुलिस या ऊंची जाति वाले बिना वजह ऐसा क्यों करेंगे ? इस बारे में राजार्षि शाहु ग्रामीण विकास’ के बाल्मीक निकालजे ने बताया- ‘‘कभी यह जमात शासन और समाज की व्यवस्था में अहम कड़ी मानी जाती थी। तब यह राजा के शिकारी या खुफिया विभाग में होते थे। युद्धों में इनके राजा हार गए। लेकिन पारधियों ने पहले निजाम और फिर अंगेजों से आखिरी तक हार नहीं मानी। यह देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी साबित हुए। यहां के लोग इसकी कथाएं सुनाते हैं। जब अंग्रेज छापामारी युद्धशैली से परेशान हो गए तो उन्होंने ‘जन्मजाति गुनहगार कानून, 1873’ बनाया और पारधी को ‘गुनहगार जमात’ में रख दिया।’’ 60 साल पहले अंग्रेज चले गए लेकिन धारणाएं नहीं गईं। तभी तो पारधी जमात आज तक गुनहगार बनी हुई है।
इसी धारणा की वजह से ही चीखली के ऊंची जाति वालों ने पारधियों को हटाने के लिए पूरी ताकत का इस्तेमाल किया था। वह तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के पास तक चले गए। लेकिन राजीव गांधी ने दो टूक कह दिया कि पारधी देश के नागरिक हैं और उन्हें हटाया नहीं जा सकता। इसके बाद गांव के दबंगों और पारधियों के बीच 5 साल तक संघर्ष चला। इस बीच पारधी बस्ती में 4 बार हमले हुए। लेकिन कोर्ट में केस पहुंचने के बाद हमले बंद भी हो गए।
दूसरी तरफ पुलिस का अत्याचार जारी रहा। 2002 को राजन गांव में वास्तुक काले की पत्नी विमल खेत में काम कर रही थी। तब इंस्पेक्टर ने आकर बताया कि उसने सोने की पट्टी चुराई है इसलिए थाने चलना होगा। विमल के विरोध करने पर इंस्पेक्टर बोला यह औरत तेज लगती है और सोने की पट्टी इसकी साड़ी के पल्लू में है। आखिरकार आज के दु:शासन ने दोपद्री का पल्लू खीच डाला। 2003 को धिरणी के गोकुल को चोरी के शक में पकड़ लिया। वह जिस सुबह छूटा उसी शाम फांसी लगाकर मर गया। इसे पारधी युवकों की मानसिक स्थिति के तौर पर देखा जाना चाहिए।
'राजार्षि शाहु ग्रामीण विकास’ के सतीश गायकवाड़ ने बताया- ‘‘पुलिस थाने से कचहरी तक कई तरह की मानसिक और आर्थिक उलझनों से गुजरना होता है। इन हालातों से आपराधिक प्रवत्तियां पनपती है। मतलब पहले जो ‘इंसान’ था उसे व्यवस्था ‘चोर’ बनाती है। इसलिए अब यह व्यवस्था का ही फर्ज है कि उसे ‘चोर’ से ‘इंसान’ बनाया जाए। इसके लिए संगठन ने ‘जोर का झटका जोर से’ लगाने की रणनीति अपनायी है।’’ इन दिनों संगठन कानूनी हक और योजनाओं का सहारा ले रहा है। कुछ उदाहरण पेश हैं-
जब सोलेवाड़ी गांव में चोरी हुई तब पुलिस ने तवलबाड़ी के हरन्या और उसके 2 लड़कों को पकड़ लिया। पुलिस 17 किलोमीटर दूर चैभानिम गांव में हरन्या की लड़की नचाबाई के घर भी पहुंची। नचाबाई के विरोध करने पर पुलिस ने मारपीट की जिसमें उसका पैर टूट गया। संगठन ने इंस्पेक्टर एम.यू। कुलकर्णी और उसके साथियों के खिलाफ ‘अत्याचार प्रतिबंधक कानून’ के तहत मुकादमा दायर किया। इसके बाद पुलिस ने माफी मांगी। इसी तरह चीखली से 2 किलामीटर दूर पारगांव के राजेश काले ने अपने खेत से 60 बोर मूंगफलियां उगाई। वह अपना अनाज बेचने करीब 50 किलोमीटर दूर अहमदनगर पहुंचा तो पुलिस ने उस पर छापा मारा। पुलिस की मारपीट से छूटकर 3 लोग भागे और 2 पकड़े गए। इसके जबाव में संगठन ने आंदोलन करते हुए सरकारी विभागों के मंत्रियों के सामने आपत्तियां दर्ज की। वकीलों की मदद से पारधियों को रिहा करवाया गया। आखिरकार पुलिस ने कहा कि वह ठोस सबूत के बिना पारधियों को गिरफ्तार नहीं करेगी।
चीखली में आज 29 पारधी घरों में करीब 300 लोग रहते है। इन्होंने 70 वोटों की ताकत बटोरी है। यह पिछले 15 साल से वोट देते आ रहे हैं। इन्होंने अपने बीच से ही उमेश काले को वार्ड मेम्बर बनाया है। उमेश काले ने बताया- ‘‘हमने थोड़ी-थोड़ी जमीन खरीदी। इससे रहवासी होने के सबूत मिल गए और हमारे नाम वोटरलिस्ट से जुड़ गए। इसलिए आज सभी परिवार बीपीएल और राशनकार्ड की लिस्ट में भी हैं। हम हर पार्टी का दबाव रहता है। लेकिन वोट का फैसला जाति पंचायत में करते हैं। हम अपनी पंचायत में कुछ बुर्जुगों को मुखिया बनाते हैं। उनके सामने एक-एक समस्याएं रखते हैं। जो बात पक्की हुई उसे सामूहिक तौर पर मानते हैं।’’
‘राजार्षि शाहु ग्रामीण विकास’ ने 18 साल पहले पारधी बच्चों को स्कूल में दाखिला लेने के लिए अभियान छेड़ा था। इसका नतीजा यह हुआ कि रविवार भोंसले और बालुंज जिला पंचायत में आडिटर हैं। रविवार का चचेरा भाई रवि भोंसल पुलिस में है। रहवसिया का बड़ा बेटा इमारत भी राज्य परिवहन बस में कण्डेक्टर हो चुका है। नवनाथ काले और सर्विस काले कांस्टेबल हैं। कुल मिलाकर 8 सरकारी नौकरियों में हैं जिसमें से 2 महिलाएं हैं। 1998 में ‘चाईलण्ड राईटस एण्ड यू’ की मदद से चीखली के पारधी बच्चों के लिए ‘गैर औपचारिक केन्द्र’ खोला गया। इसके बच्चे अब 8वीं, 9वीं, 10वीं होते हुए कालेज के दरवाजों पर खड़े हैं।
‘चाईलण्ड राईटस एण्ड यू’ के अनिल जेम्स ने बताया- ‘‘हमारा काम बच्चों को सपना देना और उसे पूरा करने में मददगार बनना है। पारधियों में गजब की बौद्धिक, सांस्कृतिक और खेल प्रतिभाएं हैं। उनकी प्रतिभाओं को विकसित करने की कोशिश चल रही है। पारधियों को कुशल बनाकर ही उनकी पहचान बदली जा सकती है।’’
1995 के बाद संगठन के सहयोग से इस इलाके में 1200 से अधिक पारधियों के लिए कास्ट सर्टिफिकेट बनवाए गए। आज वह खुद ही कास्ट सर्टिफिकेट बनवाते लेते हैं। 2006 में सरकार ने इस इलाके के पारधियों को रोजगार देने के लिए 21 लाख रूपए की योजना बनायी है। इससे उन्हें खाद, खेती, पशुपालन और दुकानों के लिए वित्तीय मदद मिलेगी।
चीखली से लौटते वक्त हसीना काले अपने बच्चों के साथ बाहर आई। उन्होंने अपनी अंगुलिया से बदलाव की गिनती भी सुनाई- ‘‘पहले काम की आदत नहीं थी और अब अपने खेतों से फसल उगाते हैं। पहले घर में चूल्हा नहीं जलता था और अब खाना खुद पकाते हैं। सबके साथ बैठते हैं। एक ही जगह पर रहते हैं। घरों में बिजली जलती है। पुलिस से सीधे बतियाते हैं।’’ उनके साथ खड़े पारधी अभिमन्युओं ने कहा- हम पुलिस के पीछे नहीं भागना चाहते। हम पढ़-लिखकर ऐसा करना हैं कि पुलिस खुद हमें सेल्युट मारे।’’
यहां के पारधी अभिमन्यु अब चक्रव्यूह तोड़ने को बेकरार हैं।

7.4.09

तिरंगा फहराने के जिद की जीत



शिरीष खरे
नागपुर । छोटी-छोटी बातों से जिंदगी बनती है और छोटे-छोटे सिरों से कहानी। यह छोटी-सी कहानी भी एक छोटे-से सिरे से शुरू होती है। लेकिन सबको एक बडे जज्बात से जोडती है। नागपुर की गंगानगर बस्ती में कभी तिरंगा नहीं फहराया था।
२६ जनवरी २००८ को लोगों ने तिरंगा फहराने की सोची। एक मामूली लगने वाले काम की अडचनों को देखते हुए टाल दिया। अगली बार फहराने का कहते हुए भूल गए। लेकिन बच्चों को याद रह गया। जो बच्चे आशाओं की नन्ही-नन्ही नसैनियां लगाकर आकाश पर चढते हैं, उन्हीं में से १२ बच्चों ने साल २००९ की उसी तारीख को आखिरी सिरा जोड दिया। ११ से १४ साल के इन बच्चों ने कौन-सा सिरा, कहां से जोडा, यह जानना भी दिलचस्प होगा।
आपने दो सच को एक साथ और अलग-अलग देखा हैं? यहां एक सच था- काम बेहद आसान है। दूसरा था- काम बेहद मुश्किल है। एक सच ’कहने‘ और दूसरा ’करने‘ से जुडा था। इसलिए एक सच ने दूसरे को बहुत दिनों तक दबाए रखा। लेकिन तीसरा सच भी था कि बच्चों का जज्बा किसी जज्बे से कम नहीं था। इस तीसरे सच ने दूसरे सच को अपने पाले में खीच लिया।
पहला सिरा
जनवरी २००८ की २६ तारीख पहला सिरा बना। इस रोज गंगानगर के लोग झण्डा ऊंचा करने के लिए एक हुए। लेकिन जिस खम्बे से तिरंगा फहराना था, वह टूट गया। लोग बिखर गए और बच्चों के दिल भी टूट गए।
१४ साल की हेमलता नेताम ने याद किया- ‘हमारी ’बाल अधिकार समिति‘ के सभी साथी ’बाल अधिकार भवन‘ में मिले। हमने अपनी बस्ती में तिरंगा फहराने की ठानी।’ इस लिहाज से अगली और अहम तारीख थी १५ अगस्त। बच्चों की बैठक से दो बातें निकली। एक- बस्ती के बडों से चर्चा की जाए। दूसरा- अपने पार्षद को एक एप्लीकेशन दी जाए।
आखिरी सिरे के पहले
११ साल की पूजा भराडे ने याद किया- ‘हमने काम को दूसरों पर छोडा और हार गए। हमें बडों के साथ एप्लीकेशन लिखनी और उन्हें लेकर आगे बढना था। लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा था। जब १५ अगस्त नजदीक आया तो लगा कि झण्डा सिर्फ दिलों में ही फहराकर रह जाएगा। सबकी आंखें १५ से हट गईं। हमारे दिल फिर टूट गए।’ लेकिन १५ की तारीख हार और हिम्मत की तारीख बनी। अगर यह नहीं आती तो २६ जनवरी २००९ जीत की तारीख कैसे बनती!

१५ अगस्त को वार्ड-१२ की पार्षद मीनाताई बरडे ने तिरंगा फहराया। उनके भाषणों से बच्चों के दिलों में देशप्रेम की भावनाएं उमडती थीं। बच्चों ने आजादी के नारे लगाए। फिर सबके सामने मीनाताई से २६ जनवरी के पहले खम्बा और उसका चबूतरा बनाने की मांग रखी।

देखते-देखते नए साल का सूरज उग गया। १२ साल की रोशनी ठाकरे ने याद किया- ‘हमें भी अपनी जिद पकडी। ५ जनवरी को सारे फिर बैठे। यहां दो फैसले हुए। यह पिछले फैसलों से अलग थे। एक तो अपने हाथों से एप्लीकेशन बनाई। दूसरा खुद जाकर पार्षद से मिलने की सोची। यह काम हमें ही करने थे इसलिए पूरे हुए।’

१३ साल के अक्षय नागेश्वर ने याद किया- ‘हमने जिम्मेदारियां बांटी। ८ जनवरी को १२ बच्चे पार्षद के आफिस पहुंचे। लेकिन मीनाताई नहीं मिलीं। हम उदास हुए, निराश नहीं।’
पार्षद से मिलने की दूसरी तारीख ११ जनवरी रखी गई। इस तारीख की सुबह ९ बजे बच्चे ऑफिस पहुंचे। मीनाताई फिर नहीं थीं। लेकिन मैनेजर ईश्वर बरडे मिल गए। बच्चों ने एप्लीकेशन उन्हें ही दे दी और उनसे मीनाताई का मोबाइल नंबर ले लिया।

बच्चों के अगले १० दिन भी इंतजार में गुजरे। अब पानी सिर के ऊपर था। २१ जनवरी को ’बाल अधिकार भवन‘ में तीसरी बैठक रखनी पडी। यहां से बच्चे फिर मीनाताई के ऑफिस पहुंचे। इस बार संबंधित अधिकारी अशोक सिंह का नम्बर मिला। बच्चों ने अशोक सिंह से खम्बा और उसका चबूतरा बनाने की अपनी पुरानी जिद दोहरायी। कुल मिलाकर बात आई और गई हो गई।

१४ साल के मनीष सोनावने ने याद किया- ‘२६ जनवरी नजदीक आया। यह परीक्षा की घडी थी। हम फिर मीनाताई के ऑफिस में गए। वह फिर नहीं मिली। इसलिए उनके घर जाना पडा। मीनाताई ने जब हमारी परेशानियाँ सुनी तो सॉरी कहा। उन्होंने २६ जनवरी के पहले तक खम्बा और उसका चबूतरा बनाने का वादा किया।’

सुबह की तस्वीर
मीनाताई की बातों से उत्साहित बच्चे घर लौटे। २६ जनवरी के एक रोज पहले बच्चे आगे आए। उन्होंने रात के पहले तक खम्बा और उसका चबूतरा बना डाला। जो बच्चे आकाश से पंतगें तोडकर अपनी छतों पर लहराना चाहते हैं, उन्हीं में से १२ ने अपनी बस्ती में पहली बार तिंरगा फहराने की ख़ुशी महसूस की थी। ’बाल अधिकार समिति‘ की नंदनी गायकबाड और उनके साथी नींव के खास पत्थर साबित हुए। नंदनी बोली- ‘अगली सुबह तिरंगा आंखों के सामने लहरा उठा। अब यह खम्बा बच्चों के दृढ संकल्प और समपर्ण का प्रतीक है।’

जब कोई बच्चा पहली बार जूते के बंध बांधता है तो उसके चेहरे की ख़ुशी देखती ही बनती है। एक रोज कुछ नन्हें हाथ मिले तो किसी ने न देखा। लेकिन जब छोटी-सी आशा हकीकत में बदली तो पूरे गंगानगर देखता रह गया।

’बाल अधिकार भवन‘ में बडा फासला मिटाने वाले छोटे-छोटे कदम एक साथ खडे है। हेमलता नेताम, पूजा भराडे, अक्षय नागेश्वर, रोशनी ठाकरे और मनीष सोनावने को एक तस्वीर में कैद किया गया है। तकदीर से बनी यह तस्वीर अब इस कहानी का आखिरी सिरा है। हो सकता है यह अगली कहानी का पहला सिरा बन जाए!!

24.3.09

घर कहां है ?

शिरीष खरे

23 जनवरी 2009 की रात दुनिया के लिये भले एक सामान्य रात रही होगी लेकिन शांतिनगर, मानखुर्द की नूरजहां शेख के लिए नहीं. आखिर इसी रात तो उनके सपनों का कत्ल हुआ था. अपनी सूनी आंखों से खाली जगह को घुरती हुई नूरजहां अभी जहां बैठी हैं, वहां 23 जनवरी से पहले तक 18 गुणा 24 फीट की झोपड़ी थी, जिसमें एक परदा लगा कर कुल दो परिवारों के तेरह लोग रहते थे.

लेकिन एक लोकतांत्रिक देश की याद दिलाने वाले गणतंत्र दिवस के ठीक 3 दिन पहले ही सारे नियम कायदे ताक पर रख कर नूरजहां शेख की बरसों की जमा पूंजी माटी में मिला दी गयी. 26 जनवरी के 3 रोज पहले सरकारी बुलडोजर ने उनकी गृहस्थी को कुचल डाला. अपनी जीवन भर की कमाई को झटके में गंवाने वाली नूरजहां अकेली नहीं थीं. उस रात मानखुर्द की करीब 1800 झुग्गियां उजड़ीं और 5000 लोगों की जमा-पूंजी माटी में मिल गई.

अंबेडकरनगर, भीमनगर, बंजारवाड़ा, इंदिरानगर और शांतिनगर अब केवल नाम भर हैं, जहां कल तक जिंदगी सांस लेती थी. अब इन इलाकों में केवल अपने-अपने घरों की यादें भर शेष हैं, जिनके सहारे जाने कितने सपने देखे गये थे. आज हज़ारों की संख्या में लोग खुले आकाश के नीचे अपनी रात गुजार रहे हैं. यह बच्चों की परीक्षाओं के दिन हैं लेकिन शासन ने पानी के पाइप और बिजली के खम्बों तक को उखाड़ डाला. इस तरह आने वाले कल के कई सपनों की बत्तियां अभी से बुझा दी गईं.

ताक पर कानून

प्रदेश का कानून कहता है कि 1995 से पहले की झुग्गियां नहीं तोड़ी जाए. अनपढ़ नूरजहां शेख के हाथों में अंग्रेजी का लिखा सरकारी सबूत था. उसे पढ़े-लिखे बाबूओं पर पूरा भरोसा भी था. लेकिन शासन ने बिना बताए ही उसके जैसी हजारों झुग्गियां गिरा दी. नूरजहां की पूरी जिदंगी मामूली जरूरतों को पूरा करने में ही गुजरी है. अपनी उम्र के 50 में से 27 साल उसने मुंबई में ही बिताए. वह अपने शौहर युसुफ शेख के साथ कलकत्ता से यहां आई थी. दोनों 9 सालों तक किराए के मकानों को बदल-बदल कर रहते रहे.

नूरजहां अपने शौहर पर इस कदर निर्भर थीं कि उन्हें मकान का किराया तक मालूम नहीं रहता था. 1995 में युसुफ शेख को बंग्लादेशी होने के शक में गिरफ्तार किया गया. जांच के बाद वह भारतीय निकला. पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में उसके इस बस्ती में रहने का उल्लेख किया.

युसुफ शेख जरी कारखाने में काम करते हुए समय के पहले बूढ़ा हुआ और गुजर गया. तब नूरजहां की जिंदगी से किराए का मकान भी छिन गया. कुछ लोग समुद्र की इस दलदली जगह पर बसे थे. 18 साल पहले नूरजहां भी अपने 6 बच्चों के साथ यही आ गईं.

नूरजहां का पहला बेटा शादी करके अलग हुआ मगर दूसरा उसके साथ है. वह जरी का काम करता है और 1500 रूपए महीने में घर चलाने की भारी जिम्मेदारी निभाता है. उससे छोटी 2 बहिनों ने दसवीं तक पढ़कर छोड़ दिया. आर्थिक तंगी से जूझता नूरजहां का परिवार अब बेहतर कल की उम्मीद भूल बैठा है.

मुश्किल भरे दिन

उस रोज जब 1 बुलडोजर के साथ 10 कर्मचारी और 20 पुलिस वाले मीना विश्वकर्मा की झुग्गी तोड़ने आए तब उसका पति ओमप्रकाश विश्वकर्मा घर पर नहीं था. उस वक्त मीना सहित बस्ती की सारी औरतों को पार्क की तरफ खदेड़ा दिया गया. मीना ने कागज निकालकर बताना चाहा कि उसकी झुग्गी गैरकानूनी नहीं है. 2008 को दादर कोर्ट ने अपने फैसले में उसे 1994 से यहां का निवासी माना है. लेकिन वहां उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं था.

बसंती जैसे ही मां बनी, वैसे ही बस्ती टूटने लगी. उसके यहां बिस्तर, दरवाजा, अनाज के डब्बे और टीवी को तोड़ा गया. पीछे से पति हुकुम सिंह ने सामान निकाला लेकिन गर्म कपड़े और खिलौने यहां-वहां बिखर गए. अब बहुत सारे बच्चे खिलौने और किताबें ढ़ूढ़ रहे हैं. हुकुम सिंह सालों पहले आगरा से सपनों के शहर मुंबई आया था जहां 2005 में उसने बसंती से प्रेम-विवाह किया. अब जब उनके जीवन में सबसे सुंदर दिन आने थे, उसी समय जीवन के सबसे मुश्किल दिनों ने दरवाजे पर दस्तक दे दी. अब बसंती भी बाकी औरतों की तरह खुले आसमान में सोती हैं. ओस की बूदों से उसके बच्चे की तबीयत नाजुक है. उसे दोपहर की धूप भी सहन नहीं होती. इन टूटी झुग्गियों के आसपास मकानों के कई नक्शे दबे रह गए. फिलहाल सस्ती तस्वीरों में दर्ज बेशकीमती कारों वाली हसरतें भी हवा हो चुकी हैं.

बस्ती के लोग याद करते हैं कि सरकारी तोड़फोड़ से पहले विधायक यूसुफ अब्राहीम ने इंदिरानगर मस्जिद में खड़े होकर कहा था कि आपकी झुग्गियां सलामत रहेंगी. लेकिन अतिक्रमण दस्ते ने इंदिरानगर की मस्जिद को तो तोड़ा ही बस्ती के कई मंदिरों को भी तोड़ा.

किस्से सैकड़ों हैं

बस्ती तोड़ने का यह अंदाज नया नही है. पहली बार 1993 में शासन ने करीब 500 झुग्गियां तोड़ने की बात मानी थी. मतलब 1995 के पहले यहां कम-से कम 500 परिवार तो थे ही. सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के मुताबिक 1993 से 2008 तक इस बस्ती को 119 बार तोड़ा गया. लेकिन पिछली कार्यवाहियों के मुकाबले इस कार्यवाही से पूरी बस्ती का वजूद हिला गया है.

समुद्र से लगी भीमनगर की जमीन पर बरसों से बिल्डरों की नजर है. लोग बताते हैं कि 1999 के पहले यह जमीन समुद्र में थी जिसे स्थानीय लोगों ने मिट्टी डालकर रहने लायक बनाया. लेकिन 2001 में खालिद नाम के बिल्डर ने दावा किया कि यह जमीन जयसिंह ठक्कर से उसने खरीदी है. वह झुग्गी वालों को यह जमीन बाईज्जत खाली करने की सलाह भी देने लगा. इसी साल उसकी गाड़ी से एक बच्चे की मौत हुई और वह इस केस में उलझ गया. फिर 2008 में बालकृष्ण गावड़े नाम का एक और बिल्डर आया और दावा किया कि जयसिंह ठक्कर के बेटे से उसने यह जमीन खरीदी है. हालांकि मुंबई उपनगर जिला अधिकारी से मिले पत्र में यह जमीन महाराष्ट्र सरकार की संपत्ति के रुप में दर्ज है.

‘समता’ संस्था की संगीता कांबले बताती हैं- “ 1998 में इस बस्ती का रजिस्ट्रेशन हो चुका है. लेकिन वर्ष 2000 का सर्वे महज 2 दिनों में निपटा लिया गया. जबकि इस दौरान यहां के मजदूर काम पर गए थे और कई झुग्गियां खार में फंसे होने के कारण छोड़ दी गईं थीं. उपर से 2005 में आई मुंबई की बाढ़ इन झुग्गियों में रहने वालों के सारे कागजात बहा ले गई. फिर भी यहां के 75 फीसदी लोगों ने साल 2000 के पहले से रहने के सबूत इकट्ठा किए हैं. ऐसे परिवारों को उनकी झोपड़ियों का पट्टा मिलना चाहिए.”

कब्जे की होड़

“ घर बचाओ-घर बनाओ आंदोलन” ने ‘सूचना के अधिकार’ के तहत जो जानकारियां एकत्र की हैं, उसके अनुसार मुंबई में जगह-जगह बिल्डर और ठेकेदारों का कब्जा है. अट्रीया शापिंग माल महापालिका की जमीन पर बना है. यह 3 एकड़ जमीन 1885 बेघरों को घर और बच्चों को एक स्कूल देने के लिए आवंटित थी.

इसी तर्ज पर हिरानंदानी गार्डन शहर में घोटाला का गार्डन बन चुका है. इस केस में बड़े व्यपारियों को 40 पैसे एकड़ की दर पर 230 एकड़ जमीन 80 साल के लिए लीज पर दी गई.

ऐसा ही इकरारनामा ओशिवरा की 160 एकड़ जमीन के साथ भी हुआ. इसी तरह मुंबई सेन्ट्रल में बन रहा 60 मंजिला टावर देश का सबसे ऊंचा टावर होगा. लेकिन यहां की 12.2 मीटर जमीन डीपी मार्ग के लिए है. यह काम झोपड़पट्टी पुनर्वास योजना के तहत होना है. लेकिन टावर के बहाने गरीबों की करोड़ों रूपए की जमीन घेर ली गई है.

90 के दशक में व्यापारिक केन्द्र के रूप में बांद्रा-कुर्ला कांप्लेक्स तैयार हुआ था. यह मंगरू मार्शेस पर बनाया गया जो माहिम खाड़ी के पास इस नदी के मुंह पर फैला है. यहां 1992 से 1996 के बीच कई नियमों की अनदेखी करके 730 एकड़ जमीन हथियाई गई. आज काम्पलेक्स का कैंपस लाखों वर्ग फिट से अधिक जगह पर फैला हैं. इनमें कई प्राइवेट बैंक और शापिंग माल हैं. मलबार हिल की जो जगह महापालिका थोक बाजार के लिए थी, अब उसे भी छोटे व्यापारियों से छीन लिया गया है.

पूरी व्यवस्था कई तरह के विरोधाभासों से भरी हुई है. मानखुर्द जैसी झुग्गियों में रहने वालों को वोट देने का हक तो है लेकिन आवास में रहने का नहीं. मतलब हर पार्टी सत्ता तक पहुंचने के लिए इनका वोट तो चाहती है लेकिन उसके बदले जीने का मौका नहीं देना चाहती.

लोग मानते हैं कि मुंबई को सिंगापुर बनाने का जो सपना देखा जा रहा है, वह मेहनजकश मजदूरों के बिना पूरा नहीं हो सकता फिर भी शहर के मास्टर प्लान में करोड़ों कामगारों के सपनों को जगह नहीं मिली है. एक अघोषित एजेंडा यह है कि शहर की झोपड़पट्टियों को तोड़कर भव्य मॉल और कॉम्पलेक्स बनाए जाएं. लेकिन सवाल है कि इन इमारतों को बनाने वाले कहां जाए ?
साभार : रविवार.कॉम से
लिंक : http://raviwar.com/news/139_where-is-my-home-shirish-khare.shtml

उठ गये चौसठ हाथ

शिरीष खरे
महाराष्ट्र के जिला बीड़ के मुख्यालय से कोई 110 किलोमीटर दूर है कनाडी गांव. वहां जाने वाली उबड़-खाबड़ सड़क आधे रास्ते पर साथ छोड़ देती है. फिर लोग अपनी सहूलियत से पगडंडियां बनाते चलते हैं. कनाडी से डेढ़ किलोमीटर पहले एक मुहल्ला आता है. एक ऐसा मुहल्ला, जिसके बारे में न तो पहले कभी सुना था, न कभी देखा था. यह तिरूमली मोहल्ला है. कुल 274 लोगों का मोहल्ला.
नंदी बैल पर फटे-पुराने कपड़ों से लिपटी गृहस्थी लटकाना और गाना-बजाना तिरूमली बंजारों की पहचान है. यह दर-दर रोटी मांगकर पेट भरना अपना काम समझते हैं. विभागीय कर्मचारियों के लिए लापता रहने वाले ऐसे नाम मतदाता सूची से नहीं जुड़ते.
तिरूमली बंजारों ने घर, बिजली, पानी, राशन, स्कूल और अस्पताल की बातों पर कभी सोचा ही नहीं. इनकी सुनें तो सोचने से सब मिलता भी नहीं. शासन को नागरिकता का सबूत चाहिए, जो इनके पास है नहीं. इसलिए हक की बात करना नाजायज होगा. गांव वाले इन्हें चार दिन से ज्यादा न तो ठहरते देखते हैं और न ही ठहरने देते. इसलिए इस आबादी का पूरा पता राज्य-सरकार भी नहीं जानती. इस हालत में तिरूमली मोहल्ला होना किसी हेरतअंगेज समाचार जैसा लगता है.
कनाड़ी गांव के तिरूमलियों ने 118 एकड़ बंजर जमीन से बीज उगाए और कानून को पढ़कर पंचायत से कई काम करवाए. यह ऊंची जाति की ज्यादतियों के खिलाफ लम्बे संघर्ष का नतीजा रहा. 1993 में छिड़ी इस लड़ाई को यह लोग आजादी की पहली लड़ाई से कम नहीं मानते. तब 32 जोड़ों के 64 हाथ एक जगह जीने के लिए उठ गए थे.
वोट की राजनीति
यहां घास-फूस से बंधी झोपडियों के मुंह एक-दूसरे से सटे और आमने-सामने है. यह आपसी और घुली-मिली जीवनशैली की ओर इशारा है. इनके पीछे हू-ब-हू वैसी ही झोपड़ियां गाय, कुत्ता और बकरियों के लिए तैयार हैं. इन 15 सालों में तिरूमली परिवारों की संख्या बढ़कर 45 पहुंच चुकी है और हालत ये है कि 9 सदस्यों वाली पंचायत में 3 सदस्य इसी इलाके के हैं.
लेकिन 10 साल पहले स्थिति एकदम उल्टी थी. तब तिरूमलियों का 1 भी वोटर नहीं था, इसलिए उनकी सुनवाई नहीं होती थी. इन दिनों बस्ती के सभी 26 बच्चे पढ़-लिख रहे हैं. 32 परिवारों के हाथ में राशनकार्ड हैं. इनमें से कुछ बीपीएल में भी हैं. अब यह अस्पताल में बीमारियों का इलाज और सहकारी बैंक से लोन ले सकते हैं. बस पास में 50% की छूट भी मिल गई है. लेकिन इन सबसे ऊपर है इज्जत, आत्मनिर्भर और बराबरी की दुनिया में मिलना. कमसे कम ग्राम-सभा का इनकी रजामंदी से चलना यही जाहिर करता है.
'चाईल्ड राईटस एण्ड यू' और 'राजार्षि शाहु ग्रामीण विकास' बीते एक दशक से इस क्षेत्र में तिरूमली, पारधी, भील और सैय्यद मदारी जैसी घुमन्तु जनजातियों के लिए काम कर रही हैं. सामाजिक कार्यकर्ता बाल्मिक निकालजे के मुताबिक- “ दान देने-लेने के रिवाज को कमजोर किए बिना किसी जमात को ताकतवर बनाना नामुमकिन है. इन भटके लोगों को उनका हक देना सरकार का फर्ज है. वोट-बैलेंस की राजनीति से अछूते होने के कारण एक भी पार्टी का ध्यान उनकी तरफ नहीं जाता. तिरूमली जनजाति के लिए हम लड़े. अब वह आगे की लड़ाई खुद लड़ रहे हैं.”
भूरा गायकबाड़ पूरी लड़ाई के मुख्य सूत्रधार हैं. भूरा कहते हैं- “ तब नंदी का खेल दिखा-दिखाकर जिंदगी तमाशा बन चुकी थी. लेकिन हम और हमारी पुरखे कहीं भी जाएं घूम-फिरकर यहीं आते थे. जब कोई गाय-भैंस पेट से होती तो 15 हजार में उसे खरीदकर बड़े बाजार में 25-30 हजार तक में बेच देते. लेकिन बेचने से पहले उन्हें इसी जमीन पर चराते. यहीं से चारे का धंधा भी करते. कोई-न-कोई यहां जरूर बना रहता. मतलब ये कि इस जमीन से हमारा रिश्ता लगातार बना रहा.''
एक नई कहानी
महाराष्ट्र का 'गायरन जमीन कानून' कहता है कि 14 अप्रैल 1991 के पहले तक जो लोग ऐसी जमीनों का इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें इसका पट्टा दिया जाए. तिरूमलियों ने संस्था की मदद से इसकी एक अर्जी कलेक्टर को भेजी.
लेकिन सवाल वही था कि आखिर जमीन का किया क्या जाये. एक रोज पत्थरों को हटाकर खेत बनाने का काम तय किया गया.
बाबू फुलमारी के अनुसार- “पत्थर बीनने में ही हालत खराब हो गई. हमारे पास बीज, हल, बैल, कुदाड़ी और फावड़ा नहीं थे. खेत में फसल रोपना या कुदाल या हल चलाना नया काम था. यह सब पड़ोस के खेतों में जाकर सीखा. संस्था की मुहिम से 32 कुदालियां और 64 क्विंटल ज्वार के बीज इकट्ठा हो गए.”
इस तरह हर हाथ के लिए 1 कुदाली और 2 क्विंटल बीज मिले. कड़ी मेहनत के बाद खेत बने और उनके बीच से कुछ रास्ते. लेकिन मुश्किल तो आनी ही थी.
बकौल बाबू फुलमारी “ जुताई को 15 दिन भी नहीं गुजरे कि एक सुबह ऊंची जाति के 500 लोगों ने हल्ला बोला. उनके हाथों में लाठी, सुलई, कुल्हाड़ी और कोयता थे. 60 साल के बापू गायकवाड़ को रस्सी से बांधकर दूर तक खींचा. सबको इतना मारा कि एक भी उठने लायक नहीं बचा.”
लेकिन उसमें से छोटा बच्चा रवि जगताप नजर बचाकर निकल भागा. अब वह बड़ा हो चुका है. उसने बताया- “ भागते-भागते 5 किलोमीटर दूर के शिराठ गांव पहुंचा. वहां से 20 किलोमीटर दूर संस्था के आफिस फोन लगवाकर इस मारपीट की खबर सुनाई. जब तक कार्यकर्ता पुलिस के साथ यहां पहुंचते तब तक घायलों की हालत गंभीर हो चुकी थी. उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया.”
इसके बाद 'जाति अत्याचार प्रतिबंध कानून' के तहत केस दायर करके सत्याग्रह छेड़ दिया गया. इसमें बाकी जनजातियों के हजारों लोग शामिल हुए. इससे संगठन की ताकत कई गुना बढ़ी. दबाव में पुलिस ने 7 पिंजरा गाड़ी मंगवायी और करीब 150 आरोपियों को हिरासत में लिया. सभी को जिला मजिस्ट्रेट ने रिमाण्ड पर भेजा और 21 दिनों तक जमानत नहीं दी.
अखबारों ने इन खबरों को चारों तरफ फैला दिया. इससे पूरे इलाकों को कानून का पाठ समझ आ गया. शिराठ गांव के कई दलित तिरूमली मोहल्ला आकर रात को रखवाली करने लगे.
आखिरकार आपसी समझौता हुआ, जिसमें सवर्णों ने फिर कभी न सताने का वादा किया, जिस पर आज तक वो कायम हैं.
हौसला, जज्बा और...
साहिबा फुलमाली कहती हैं- “ हम निडर, ताकतवर, पढ़े-लिखे, अपनी बात पर बोलने और दिल्ली-बम्बई तक लड़ने वाले बन गए हैं.”
उनके साथ बैठे संस्था के समन्वयक सतीश गायकवाड़ की चिंता है कि पिछले 15 सालों की लड़ाई के बाद भी इनके हक की जमीन इनके नाम नहीं हो सकी हैं. अब यही लड़ाई लड़नी और जीतनी है.
“ चाईल्ड राईटस एण्ड यू ” ने स्कूली शिक्षा के लिए यहां 'गैर औपचारिक केन्द्र' खोला. वहां अपनी पढ़ाई शुरु करने वाले बच्चे अब कालेज की दहलीज पर खड़े हैं. वह रमेश और रामा मुलवारी से भी आगे जाना चाहते हैं. तब तीसरी में पढ़ने वाला रमेश फुलमारी अब 'विशेष सुरक्षा बल' में है. इसी तरह रामा फुलमारी राज्य परिवहन बस का कण्डेक्टर है.
जिले के बड़े नक्शे पर तिरूमली मोहल्ला नजर नहीं आता. पूरी तिरूमली आबादी का छोटा सा हिस्सा यहां बसा है. असल में यह बदलाव का एक छोटा उदाहरण भर है. ज्यादातर तिरूमली लोग नंदी बैल के सिर पर महादेव-बाबा की मूर्ति, गले में घण्टी और कमर में रंग-बिरंगा कपड़ा बांधने के बावजूद मटमैली जिंदगी जीते हैं.
बिस्मिल्लाह खां ने जिस 'सवई' को बजाकर देश-विदेश नाम कमाया उसे तिरूमली लोग कई पीढ़ियों से बजाते आ रहे हैं. लेकिन इन्हें न नाम मिला न दाम. मांगी रोटियां मिल-बांटकर खाते हैं. खाने के लिए अन्न नहीं पकाते इसलिए बर्तनों को भी नहीं रखते. बरसात में रेल्वे-पुलों के नीचे सोते हैं. उसके बाद यह 500 किलोमीटर दूर पुना, मुम्बई, सोजारी, उस्मानाबाद, भूम, पारण्डा, शोलापुर और बारसी के इलाकों में भटकते हैं. हर रोज कम से कम 20 से 40 किलोमीटर की यात्रा. इनका हर परिवार 10-15 बच्चों से भरा है. जिन्हें यह कमर, कंधों और सिरों पर ढ़ोते हैं. इससे पैरों में होने वाली तकलीफ बढ़ जाती है.
ऐसे अनगिनत पैरों की तकलीफ दूर करने के लिए 'उठ गए चौसठ हाथ' की कहानी जगह-जगह दोहरानी होगी.
साभार : रविवार.कॉम से लिंक : http://raviwar.com/news/125_tirumali-bid-maharashtra-shirish-khare.shtml

8.3.09

मोनालिसा (ओं) की मुसकान

शिरीष खरे
तीसरी में पढ़ने वाली इशाका गोरे का परिवार महाराष्ट्र के सांगली जिले से है जो गन्नों के खेतों में कटाई के लिए 6 महीनों के लिए बाहर जाता है. इशाका का सपना चौथी में आने का है लेकिन उसके पिता याविक गोरे अगले चार सालों में ही उसकी शादी करना चाहते हैं. मराठवाड़ा के ऐसे कई परिवार अपने बच्चों की शादियां कम उम्र में करते हैं.
यहां जोड़ा (पति-पत्नी) बनाकर काम करने का चलन है. इन्हें लगता है कि परिवार में जितने अधिक जोड़ा रहेंगे, आमदनी उतनी ही रहेगी. फिलहाल इशाका गोरे का सपना काम और किताबों के बीच उलझा है.
सरकार ने लड़कियों के हकों की खातिर `सशक्तिकरण के लिए शिक्षा´ का नारा दिया है. लेकिन नारा जितना आसान है, लक्ष्य उतना ही मुश्किल हो रहा है. क्योंकि देश में इशाका जैसी 50 फीसदी लड़कियां स्कूल नहीं जाती. आखिरी जनगणना के अनुसार भारत की 49.46 करोड़ महिलाओं में से सिर्फ 53.67 फीसदी साक्षर हैं. मतलब 22.91 करोड़ महिलाएं निरक्षर हैं. एशिया महाद्वीप में भारत की महिला साक्षरता दर सबसे कम है. क्राई के मुताबिक भारत में 5 से 9 साल की 53 फीसदी लड़कियां पढ़ना नहीं जानती. इनमें से ज्यादातर रोटी के चक्कर में घर या बाहर काम करती हैं. यहां वह यौन-उत्पीड़न या दुर्व्यवहार की शिकार बनती हैं. 4 से 8 साल के बीच 19 फीसदी लड़कियों के साथ बुरा व्यवहार होता है. इसी तरह 8 से 12 साल की 28 फीसदी और 12 से 16 साल की 35 फीसदी लड़कियों के साथ भी ऐसा ही होता हैं. `राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो´ से मालूम हुआ कि बलात्कार, दहेज प्रथा और महिला शोशण से जुड़े मुकदमों की तादाद देश में सलाना 1 लाख से ऊपर है.
देश में महिलाओं की कम होती संख्या मौजूदा संकटों में से एक बड़ा संकट है. समय के साथ महिलाओं की संख्या और उनकी स्थितियां बिगड़ती जा रही हैं. जहां 1960 में 1000 पुरुषों पर 976 महिलाएं थीं वहीं आखिरी जनगणना के मुताबिक यह अनुपात 1000:927 ही रह गया. यह उनके स्वास्थ्य और जीवन-स्तर में गिरावट का अनुपात भी है. कुल मिलाकर सामाजिक और आर्थिक संतुलन गड़बड़ा चुका है.
सरकार ने लड़कियों की शिक्षा के लिए तमाम योजनाएं बनायी है. जैसे- घरों के पास स्कूल खोलना, स्कॉलरिशप देना, मिड-डे-मिल चलाना और समाज में जागरूकता बढ़ाना. इसके अलावा ग्रामीण और गरीब लड़कियों के लिए कई ब्रिज कोर्स चलाए गए हैं. बीते 3 सालों में प्राथमिक स्तर पर 2000 से अधिक आवासीय स्कूल मंजूर हुए हैं. `राष्ट्रीय बालिका शिक्षा कार्यक्रम´ के तहत 31 हजार आदर्श स्कूल खुले जिसमें 2 लाख शिक्षकों को लैंगिक संवेदनशीलता में ट्रेनिंग दी गई. इन सबका मकसद शिक्षा व्यवस्था को लड़कियों के अनुकूल बनाना है.
ऐसी महात्वाकांक्षी योजनाएं सरकारी स्कूलों के भरोसे हैं. लड़कियों की बड़ी संख्या इन्हीं स्कूलों में हैं. इसलिए स्कूली व्यवस्था में सुधार से लड़कियों की स्थितियां बदल सकती हैं. लेकिन समाज का पितृसत्तात्मक रवैया यहां भी रूकावट खड़ी करता है. एक तो क्लासरुम में लड़कियों की संख्या कम रहती है और दूसरा उनके महत्व को भी कम करके आंका जाता है. हर जगह भेदभाव की यही दीवार होती है. चाहे पढ़ाई-लिखाई हो या खेल-कूद, लायब्रेरी हो लेबोरेट्री या अन्य सुविधाओं का मामला. दीवार के इस तरफ खड़ी भारतीय लड़कियां अपनी अलग पहचान के लिए जूझती है. हमारा समाज भी उन्हें बेटी, बहन, पत्नी, अम्मा या अम्मी के दायरों से बाहर निकलकर नहीं देखना चाहता. दरअसल इस गैरबराबरी को लड़कियों की कमी नहीं बल्कि उनके खिलाफ मौजूद हालातों के तौर पर देखना चाहिए. `अगर लड़की है तो उसे ऐसा ही होना चाहिए´ ऐसी सोच उसके बदलाव में बाधाएं बनती हैं.
एक तरफ स्कूल को सशक्तिकरण का माध्यम माना जा रहा है और दूसरी तरफ ज्यादातर स्कूल औरतों के हकों से बेपरवाह हैं. पाठयपुस्तकों में ही लिंग के आधार पर भेदभाव की झलक देखी जा सकती है. ज्यादातर पाठों के विशय, चित्र और चरित्र लड़कों के इर्द-गिर्द ही घूमते हैं. इन चरित्रों में लड़कियों की भूमिकाएं या तो कमजोर होती हैं या सहयोगी. ऐसी बातें घुल-मिलकर बच्चों के दिलो-दिमाग को प्रभावित करती हैं. फिर वह पूरी उम्र परंपरागत पैमानों से अलग नहीं सोच पाते.
कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं जिनकी गली, मोहल्लों और घरों में महिलाओं के साथ मारपीट होती है. इसके कारण उनके दिलो-दिमाग में कई तरह की भावनाएं या जिज्ञासाएं पनपती हैं. लेकिन स्कूलों में उनके सवालों के जबाव नहीं मिलते. जबकि ऐसे मामलों में बच्चों को जागरूक बनाने के लिए स्कूल मददगार बन सकता है. दरअसल हमारी शिक्षा प्रणाली में ही अभद्र भाशा, पिटाई और लैंगिक-भेदभाव मौजूद है. इसलिए स्कूलों के मार्फत समाज को बदलने के पहले स्कूलों को बदलना चाहिए.
उस्मानाबाद जिले के एक हेडमास्टर सतीश बाग्मारे (बदला नाम) ने फरमाया कि- ``लड़कियों की सुरक्षा के लिए चारों तरफ एक दीवार होना जरूरी है.´´ दीवारों को बनने के बाद हो सकता है उन्हें गार्डों की तैनाती जरूरी लगने लगे. हमारा स्कूल उस समाज से घिरा है जहां लड़कियों को सुरक्षा के नाम पर कैद करने का रिवाज है. आज भी ज्यादातर लड़कियों के लिए िशक्षा का मतलब केवल साक्षर बनाने तक ही है. बचपन से ही उनकी शिक्षा का कोई मकसद नहीं होता. लड़कियों को बीए और एमए कराने के बाद भी उनकी शादी करा दी जाती है. इसलिए लड़कियों की शिक्षा को लेकर रचनात्मक ढ़ंग से सोचना जरूरी है.
गांधीजी ने कहा था-``एक महिला को पढ़ाओगे तो पूरा परिवार पढ़ेगा´´ उन्होंने 23 मई, 1929 को `यंग इण्डिया´ में लिखा-``जरूरी यह है कि शिक्षा प्रणाली को दुरूस्त किया जाए. उसे आम जनता को ध्यान में रखकर बनाया जाए.´´ गांधीजी मानते थे-``ऐसी शिक्षा होनी चाहिए जो लड़का-लड़कियों को खुद के प्रति उत्तरदायी और एक-दूसरे के प्रति सम्मान की भावना पैदा करे. लड़कियां के भीतर अनुचित दबावों के खिलाफ विद्रोह पैदा हो. इससे तर्कसंगत प्रतिरोध होगा.´´ इसलिए महिला आंदोलनों को तर्कसंगत प्रतिरोध के लिए अपने एजेण्डा में `लड़कियों की शिक्षा´ को केन्द्रीय स्थान देना चाहिए. महिलाओं की अलग पहचान के लिए भारतीय शिक्षा पद्धति, शिक्षक और पाठयक्रमों की कार्यप्रणाली पर नए सिरे से सोचना भी जरूरी है.


25.2.09

बीमार विदर्भ पर फोकस

शि‍रीष खरे

एक तरफ बिजली से रोशन शहर का भारत है दूसरी तरफ खेती के खस्ताहाल से ढ़का देहाती भारत है. एक भारत को दूसरे भारत के बारे में कम ही पता है. फिल्म ‘समर 2007’ शहर और देहात के बीच की इसी खाई को भरने का काम करती है. यह पांच डॉक्टरों को विदर्भ में किसानों की समस्याओं से जोड़ती है.

इन दिनों बालीबुड से गांव गायब हो गए हैं. ऐसे में एक फिल्म देश के मौजूदा संकट को मुख्यधारा के करीब लाती है. लेकिन अब तक किसानों को सरकार की ठोस पहल का इंतजार है और फिल्म को दर्शकों के जरिए प्रचार का. यह फिल्म पूरे देश में नहीं दिखायी जा सकी है और बाहर भी कुल 338 शोज ही हुए.

पी साईनाथ का एक लेख विदर्भ में स्वास्थ्य सेवाओं की गिरावट को बयान करता है. इसी लेख से प्रभावित होकर ब्रजेश जयराजन ने एक कहानी लिखी जिसे निर्देशक सुहैल तातारी और निर्माता अतुल पांडेय ने रूपहले परदे पर साकार किया. इसमें पांच डॉक्टर बने हैं सिंकदर, गुल, पनाग, युविका चैधरी, अर्जुन बाबा और अलेख सेंगल. इसके अलावा विक्रम गोखले, सचिन खेडेकर, आशुतोष राणा, स्वेता मेनन और नीतू चंद्रा ने भी सहज भूमिकाएं निभायी हैं.

पटकथा में विदर्भ का संकट बड़ी खबर बनने से असमंजस, अविश्वास और निराशाएं पनपती हैं. इसलिए मेडिकल छात्रों को अनिवार्य तौर से गांवों में भेजने की बातें चलती है . इन बातों से बेपरवाह पांच दोस्तों का एक ग्रुप है. यह लाखों रूपए देकर मेडिकल की पढ़ाई पूरी करते हैं. सभी अमीर घरों के होने से हर ऐशो-आराम भोग रहे हैं. इनकी जिदंगी की बड़ी उलझनों में प्यार, परीक्षा, गर्लफ्रेड, सेक्स और तकरार हैं. हरेक उलझन खुल-मिलकर रंगीन दुनिया भी बनाती हैं. पांचों हवाओं के रूख में बहे जा रहे हैं. इन्हें समाज के बदलाव से कोई लेना-देना नहीं. लेकिन कॉलेज के चुनाव में प्रकाश नाम का लीडर उन्हें पहली बार सच से रु-ब-रु कराता है. यह लीडर उन्हें चुनाव के लिए उकसाता है. पोलिटिक्स से उकताकर यह पांचों दोस्त कैंपस छोड़ देते हैं. फिर सभी मूड बदलने के लिए एक गांव के ‘प्राइमरी हेल्थ सेंटर’ पहुंचते हैं.

लेकिन बदलाव का रास्ता यही से खुलता है. यहां आकर यह मेडिकल छात्र भारत की असली तस्वीर देखते हैं. उनके सामने घनघोर गरीबी में फंसा पूरा गांव है. यह पांचों दोस्त किसानों की आत्महत्या के मूक दर्शक भी बनते हैं. जिसे कभी नहीं सुना उसे होते देखना बेहद तकलीफ देता है. इससे उनके भीतर भय, दुख और शर्म पैदा होती है. कर्ज से डूबे किसानों का संसार उन्हें ‘मदर इण्डिया’ के रूपहले पर्दे जैसा ही रंगहीन नजर आता है. यहां की सामंती ताकतें नए रुप में हाजिर होती हैं.

ऐसे में स्वास्थ्य व्यवस्था संभालना और लोगों को जीवन की थकान से उभारना मुश्किल होता है. पांचों की अंदरूनी आवाजों ने मिलकर सवाल बनाने शुरू कर दिए. जो देश की तरक्की, गरीबों की आमदनी, आम जनता के हक और राजनैतिक उदासीनता से उभरे. कॉलेज से भागे इन दोस्तों का दिल किसानों की जंग से जुड़ गया. आखिरकार यह पांचों एक उबलते हुए बिन्दु पर पहुंच गए. जहां उन्हें हिंसक समाधान नजर आया.

दरअसल यह पूरी फिल्म अहिंसक समाधान की संभावनाएं ढ़ूढ़ती है. सभी किरदारों की प्रतिक्रियाएं अलग-अलग देखी गई. कभी उन्होंने हकीकत से समझौता करना चाहा, कभी उसे बदलना चाहा, कभी उनका दिल कड़वा हुआ, कभी प्यार से भर गया और कभी दुख से. दृश्यों के सहारे सामाजिक कोणों का स्वाभिक ताना-बाना बुना गया है. जहां कुछ भी रुखा और थोपा हुआ नहीं लगता.

जिस साल यह फिल्म बन रही थी उस साल 784 किसानों ने आत्महत्याएं की थी. प्रधानमंत्री द्वारा 40 अरब रूपए के पैकेज बावजूद यह आकड़ा 1648 तक पहुंच चुका था. तब भारत के ‘नियंत्रक और महालेखा परीक्षक’ की रिपोर्ट ने भी स्वीकारा था कि- ‘‘राहत योजनाओं को लागू करने में गंभीर खामियां हुई हैं.’’ फिल्म निर्माण के दौरान ही देश के कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा था कि- ‘‘आत्महत्याएं अब कम हो रही हैं.’’ लेकिन जिस रोज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आए उस रोज ही अकोला के राकेश बंसल सहित 5 किसानों ने आत्महत्याएं कर ली. "

मौजूदा हाल तो और भी बुरा है. बीते 5 महीनों में यावतमाल, बुलदाना, अकोला, अमरावत, वासीम और वर्धा जिले के 401 किसानों ने आत्महत्याएं की है. इसी प्रकार बीते 5 साल में यहां आत्महत्या करने वाले किसानों की कुल तादाद 5157 है. ‘राष्ट्रीय सेमपल सर्वेक्षण’ के 59वें आकड़ों के मुताबिक- ‘‘यहां के किसान खेती पर खर्च करने के लिए 60 फीसदी कर्ज लेते है ’’ मतलब फसल खराब होने से समस्याएं और बढ़ जाती है."

20 साल पहले यहां 1 क्विंटल कपास 12 ग्राम सोने के बराबर होता था. आज 1 क्विंटल कपास के बदले सिर्फ 1750 रूपए का समर्थन मूल्य मिलता है. बीते दशक से खेती में रासायनिकों का प्रचलन बढ़ा और वह 6 गुना तक महँगी हुई लेकिन कपास की कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई. उधर ‘विश्व व्यापार संगठन’ में हुए समझौते के कारण कपास पर आयात-शुल्क सिर्फ 10 फीसदी ही रह गया. अमेरिका में किसान की 1 किलो कपास की लागत करीब 1.70 डॉलर होती है. वहां की सरकार 1 किलो कपास पर 2 डालर की सब्सिडी भी देती है. इसलिए अमेरिका का किसान लागत से बेहद कम कीमत पर कपास निर्यात कर देता है. विदर्भ का किसान यही मात खा जाता है.

‘समर 2007’ जिन आकड़ों के साथ खत्म होती है उनमें भूमण्डलीकरण के खतरों का विश्लेषण तो नहीं लेकिन इशारा जरूर मिलता है. फिल्म कोई नया सवाल खड़ा नही करतीं. यह पुराने सवालों में ही असर पैदा करती है.

19.2.09

Playing Hangman


There's A Better Way To Pass T i m e
Put your fingers to better use by playing hangman and ensuring child rights at the same time

18.2.09

विवादों का विशालकाय सरोवर

शि‍रीष खरे
इन दिनों सरदार सरोवर परियोजना और डूब प्रभावितों के लिए किये जा रहे पुनर्वास कार्य में भ्रष्ट्राचार कुछ इस प्रकार व्याप्त है कि अनियमितताओं का सिलसिलेवार ब्यौरा जुटाना और उसके आधार पर लगातार कार्यवाहि‍यों की रणनीतियां तैयार करना कठिन हो चुका है. इस विशालकाय बांध की तरह ही इससे प्राप्त होनेवाले लाभों, लागतों और पुनर्वास संबंधित तमाम फर्जीवाड़ों की लम्बी सूचियां विवादों की मोटी गठरी बन चुकी है.
सरदार सरोवर परियोजना 1979 में शुरू हुई थी और यह साल 2025 में पूरी होगी. इससे लगभग दो लाख लोग विस्थापित होंगे. 1993 में विश्व बैंक ने इस परियोजना से अपना हाथ पीछे खींच लिया था. इसी साल “केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय” के विशेषज्ञ दल ने भी अपनी रिपोर्ट में बांध के काम के दौरान पर्यावरण की भारी अनदेखी और लापरवाही पर सभी का ध्‍यान खींचा था. अनेक पर्यावरणविदों की राय में यह योजना पर्यावरण के प्रतिकूल है. इतने बड़े पैमाने पर काम होगा तो पर्यावरण के साथ खिलवाड़ भी उसी अनुपात में होना है. इसके बावजूद कुल 1200 किलोमीटर लंबी नर्मदा पर 3200 बाँध बनाना भी तय हुआ है. मतलब नर्मदा की घाटी में असंतुलित विकास, विस्थापन और अनियमतताओं का अतीत खत्म नहीं होने दिया जाएगा.
लाभ और लागत‘नर्मदा बचाओं आंदोलन’ ने समाज में विकास की परिभाषा और उसके मापदण्डों पर लगातार विचार करने की प्रक्रिया को प्राथमिकता दी है. इसी तर्क को आधार मानकर परियोजना के कुल लाभ और हानियों का हमेशा आकलन चलता रहा है. हर बार यह लागत बढ़ती जा रही है. सरकार के अनुसार पूरी लागत गुजरात के सिंचाई बजट का 80 प्रतिशत हिस्सा है. लेकिन इससे कच्छ के लगभग 2 प्रतिशत और सौराष्ट्र के 9 प्रतिशत भाग में ही पानी पहुंचाया जा सकेगा. मेधा पाटकर के अनुसार- “विगत 20 सालों में यह परियोजना 4200 हजार करोड़ से बढ़कर 4500 हजार करोड़ हो चुकी है. इसमें से अब तक 25 हजार करोड़ खर्च हो भी चुके हैं. अनुमान है कि आने वाले समय में यह लागत 70 हजार करोड़ तक पहुंचेगी. इसके बावजूद अकेले गुजरात में ही पानी का लाभ 10 प्रतिशत से भी कम हासिल है. महाराष्ट्र और राजस्थान को मिलने वाला लाभ नजर नहीं आता जबकि मध्यप्रदेश को भी अनुमान से कम बिजली मिलने वाली है.” कुछ तकनी‍की विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस पूरी योजना को वैकल्पिक तरीक़े से लागू किया जाए और इसे छोटी-छोटी, आत्मनिर्भर तथा पर्यावरण के अनुकूल परियोजनाओं में बांट दिया जाए तो ज़्यादा लाभ हो सकता है.
विस्थापन यहां के आदिवासी लोगों की प्रमुख मांग जमीन के बदले जमीन की है. परंतु सरकार जमीन जुटाने में अपनी असमर्थता व्यक्त करती रही है. कुछ लोगों को पुनर्वास की जो जमीन दी गई है उनमें से ज्यादातर की शिकायत है कि वह जमीन उनकी असली जमीन से कम उपजाउ है. काम की जमीन को पानी में डूबोकर बदले में उन्हें बेकार जमीन दी जा रहीं है. जमीन बिखरे टुकड़ों में दी जा रही है. बहुत बड़ी तादाद में पुनर्वासित लोगों का कहना है कि आज नर्मदा की नहर उनकी दी गई ज़मीन से निकल रही है पर उन्हें ही नर्मदा के पानी से वंचित रखा जा रहा है. पुनर्वास कार्य में अनियमतताओं के गंभीर आरोप बढ़ते ही जाते हैं. उधर ‘नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण’ द्वारा जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया कि ‍‍‍सरदार सरोवर परियोजना से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास कार्य में कथित अनियमितताओं के आरोप गलत हैं. तथ्य यह है कि- “वि‍गत वर्ष मानसून सत्र के दौरान परियोजना प्रभावितों के लिए विक‍‍‍‍सित 88 पुनर्वास स्थलों में 22438 परिवारों को निशुल्क भूखण्डव आंवटित किये गए. जो परिवार भूखण्ड लेना नहीं चाहतें, उन्हें 50 हजार नकद राशि देने का विकल्प रखा गया और 806 परिवारों ने स्वेच्छा से नकद राशि लेने का विकल्प चुना.” लेकिन सरकार के भीतर ही एनवीडीए की कार्यप्रणाली को लेकर अंतर्विरोध के स्वर उभरते रहे हैं. वि‍गत वर्ष मानसून सत्र के दौरान मुख्य सचिव द्वारा नि‍र्माण विभागों की मानिटरिंग के दौरान एनवीडीए अधिकारियों की जमकर क्लास लेने की खबर अखबारों की प्रमुख सुर्खी बनी थी. तब श्री साहनी ने कहा कि "बार-बार निर्देश के बावजूद एनवीडीए में न तो पैसों का सही उपयोग हो पा रहा है और न ही समय सीमा में कार्य हो पा रहा है. बड़े अधि‍कारी स्थल पर जाकर कामकाज की सही समीक्षा करें."
भ्रष्टाचार ‘नर्मदा बचाओं आंदोलन' वैकल्पिक वनीकरण, जल संरक्षण क्षेत्र विकास और पुनर्वास योजनाओं से संबंधित सरकारी दावों और आकड़ो को झूठा तथा विरोधाभाषी बताता है और कहता है कि इसके जवाब में हम मैदानी और कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे। आंदोलन पुनर्वास कार्य में राहत और विस्थापन सहित कई क्षतिपूर्ति योजनाओं में भारी भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं. ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन, बड़वानी’ से मिली जानकारी के अनुसार प्रदेश सरकार ने 13 जिलों के कलेक्टबर और भू-अधिग्रहण अधिकारी को उनके यहां हुईं रजिस्‍ट्रियों की जांच करने के लिए कहा है. कुल 4190 रजिस्ट्रियों में से 2818 रजिस्ट्रियों की जांच की गई, जिनमें से अभी तक कुल 758 फर्जी रजिस्ट्रियों की बात सरकार मान चुकी है मगर आंदोलन के मुताबिक दुर्भाग्य से यह संख्या् उससे कहीं अधिक है. ‘नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण’ के अधिकारियों द्वारा जहां अनेक बैठकों में फर्जी रजिस्ट्री जांच में किसी प्रकार की आंच न आने की बात दोहराई जा रही है वहीं कुछ लोगों का मत है कि मौजूदा अधिकारियों के होते हुए निष्पैक्ष जांच संभव ही नहीं है। आंदोलन के कार्यकर्ता आशीष मंडलोई बताते हैं कि- "एनवीडीए के अधिकारियों द्वारा दोषी अधिकारियों को बचाने और महज विस्थापितों के फसाने का खेल चल रहा है। इस संबंध में जब प्रकरण न्यायालय में है तो ऐसे में निर्णय न्यायालय को लेना है, अधिकारि‍यों द्वारा निर्णय लेना अवैध ही माना जाएगा." उन्होंने इस पूरे प्रकरण पर सीबीआई जांच की मांग की है.

8.2.09

खबर नहीं बना विस्फोट



शिरीष खरे



26 जनवरी के 2 दिनों बाद मतलब 28 तारीख की दोपहर एक विस्फोट से बीड़ जिले का नेकनूर गांव दहल गया. वैसे तो इससे पूरा राष्ट्र और महाराष्ट्र दहलना चाहिए था लेकिन ऐसा हुआ नहीं. यह हादसा किसी आतंकवादी संगठन की साजिश नहीं बल्कि पटाखा फेक्ट्री मालिक की लापरवाही से हुआ. रात 10 बजते-बजते 10 जाने चली. तब तक एक चौंकाने वाला तथ्य यह निकला कि मरने वालों में 5 दलित और 2 मुस्लिम परिवारों के बाल मजदूर हैं. `चंदन फायर वक्र्स एण्ड माचिस फेक्ट्री´ नाम की इस फेक्ट्री के मालिक शेख सलीम और शेख नूर हैं.
इस धमाके से चारों तरफ आग फैल गई जिसमें 35 मजदूर झुलस गए. रिपोर्ट लिखे जाने तक कई मजदूरों की हालत गंभीर बनी हुई थी. इस हादसे के 96 घण्टे गुजरने के बावजूद जब प्रशासनिक उदासीनता बरकरार रही तो महाराश्ट्र के `बाल हक अभियान´ से जुड़े संगठनों ने मुख्यमंत्री अशोक राव चौहान को ज्ञापन लिखकर कड़ी प्रतिक्रया जतायी. इन्होंने फेक्ट्री कारखाने के मालिकों सहित जिम्मेदार अधिकारियों पर तुरंत कार्यवाही करने, मृतक बच्चे के परिवार को 5 लाख तथा घायलों को 1 लाख रूपए देने और ऐसी फैक्ट्रियों पर प्रतिबंध लगाने की मांग भी की है. `चाईल्ड राईटस एण्ड यू´ से सुधीर सुधल के मुताबिक- ``यह हादसा बताता है कि बाल मजदूरी के पीछे गरीबी और बेकारी किस तरह से काम कर रही हैं. साथ ही बाल मजदूरी पर सरकार और जिलाधिकारियों की सजगता की भी पोल घुलती है.´´ संस्था मानती है कि जब तक ऐसे बच्चों के परिवारों को रोजगार और आर्थिक स्थिरता नहीं मिलती तब तक यह समस्या खत्म नहीं होगी. इसलिए उपयोगी और आजीविका पर आधारित शिक्षा व्यवस्था पर जोर दिया जाए. इसके अलावा बाल-श्रम कानून, 1986´ के तहत बाल मजदूरों की कुल संख्या का सिर्फ 15 फीसदी हिस्सा ही लिया जाता है. इसलिए सभी उद्योगों में बाल मजदूरी पर रोक लगाना जरूरी है.
संस्था के विभिन्न शोध बताते हैं कि पूरी दुनिया में 24.6 करोड़ बाल मजदूर हैं जिसमें से सबसे ज्यादा 1.7 करोड भारत में ही हैं. इसमें से 10 फीसदी घेरलू और 85 फीसदी अंसगठित क्षेत्रों से हैं. बहुत सारे बच्चे खेत, खदान और पत्थरों का काम करते हैं. `अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन´ की रिपार्ट में देश भर के करीब 71 फीसदी बाल मजदूर स्कूल नहीं जाते. सबसे ज्यादा बाल मजदूर आंध्र-प्रदेश (14.5 फीसदी) में हैं. इस हिसाब से महाराष्ट्र का नम्बर चौथा (9.5 फीसदी) है. कहते हैं देश का सच्चा धन बैंको में नही बल्कि स्कूलों में होता हैं लेकिन शिक्षा और रोजगार की अनियमितताओं से कानून भी बेअसर हो जाते हैं. संविधान की `धारा-24´ में 14 साल से छोटे बच्चों को फैक्ट्री या खदान के कामों की मनाही है. वह अन्य खतरनाक कामों में भी शामिल नहीं हो सकते. `धारा-39 ई´ के अनुसार राज्य अपनी नीतियां इस तरह बनाए कि बच्चों का शोशण न हो पाए. `धारा-39 एफ´ बच्चों को नैतिक और भौतिक दुरूपयोग से बचाता है.
`फैक्ट्री कानून-48´ के मुताबिक 15 से 18 साल तक के किशोर किसी फेक्ट्री में तभी काम कर सकते हैं जब उन्हें मेडीकल-फिटनेस प्राप्त हो. यह कानून 14 से 18 साल के बच्चों को सिर्फ 4 घण्टे काम कराने की इजाजत देता है. 1986 के `बाल-श्रम कानून´ ने पटाखा, बीड़ी, कालीन, सीमेंट, कपड़ा, छपाई, दियासलाई, चमड़ा, साबुन और भवन निर्माण से जुड़ी फैक्ट्रियों में बच्चों के काम करने को खतरनाक माना. 1996 को सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को खतरनाक पेशों में लिप्त बच्चों की पहचान करने, उन्हें काम से हटाने और बेहतर शिक्षा देने के निर्देश दिए थे. 2006 को कानून में 14 साल से कम उम्र के बच्चों को घर, होटल या मंनोरंजन केन्द्रों तक में काम करने पर रोक लगा दी गई. साथ ही कानून न मानने वालों पर 3-10 महीने की जेल या 10-20 हजार रूपए जुर्माने का प्रावधान भी रखा. जाहिर है 1938 से अब तक बाल-श्रम कानून को कई तरह से जांचा-परखा और बदला गया. फिर भी संवैधानिक कानून और अदालती आदेशों की धज्जियां ही उड़ाई जाती रही.
बाल मजदूरों के विकास के लिए सरकारी बजट का मामूली हिस्सा ही खर्च होता है। इस दिशा में मार्च 2008 को मात्र 156 करोड़ रूपए आंवटित किए। जो पिछले साल के मुकाबले महज 3 करोड़ ही ज्यादा है. इस तरह एक बाल मजदूर को मात्र 10 रूपए महीना मिलेगा. यह रकम देश के 250 जिलों में चल रही करीब 9 हजार परियोजनाओं के लिए होगी. इसमें 9-14 साल तक के 4.5 लाख बच्चे हैं. ऐसे बच्चों के लिए श्रम मंत्रालय आवासीय स्कूल योजना बनाना चाहता है जो फिलहाल ठंडे बस्ते में है. हमारे तंत्र में बच्चों की जिम्मेदारी की ठीक-ठाक रूपरेखा तक नहीं. 6 साल तक के बच्चे `महिला एवं बाल विकास´ की जिम्मेदारी हैं. 6-14 साल तक के बच्चे 'शिक्षा विभाग´ के हवाले हैं. लेकिन 14-18 साल तक के बच्चों का रखवाला कोई नहीं. इसलिए ऐसे हादसों के बाद विभिन्न विभाग हालातों का सही जायजा लेने की बजाय एक-दूसरे की तरफ देखते हैं. नेकनूर गांव का विस्फोट ने यह भी बताया कि सस्ती मजदूरी से बाल-मजदूरी को बढ़ावा मिलता है. इस फेक्ट्री के मालिक अधिक काम के बदले बच्चों को कम पैसे देते थे. इस तरह वह अधिक काम का अतिरिक्त वेतन देने से भी बच जाते थे. देखा जाए तो 14 साल तक के बच्चों को 8 घण्टे के बदले अधिकतम 40 रूपए की ही मजदूरी मिल पाती है. इससे कई बच्चे 14 की उम्र तक आते-आते बीमार हो जाते हैं. सबसे ज्यादा बाल-मजदूर 12-15 साल के होते हैं. मतलब देश के भविश्य को समय से पहले ही बूढ़ा बनाया जा रहा है.

22.1.09

पत्थरों के रास्ते बदलाव


















शिरीष खरे


बीड़ से लौटकर

जिन दलितों से रोजाना रोटी की उलझन नहीं सुलझती थी अब वही पत्थरों के रास्ते बदलाव की तरकीब सुझा रहे हैं। जानवर चराने वाली पहाड़ियों पर ज्वार पैदा करने की सूझ अतिशेक्ति अंलकार जैसी लगती है. मराठवाड़ा में बीड़ जिले के दलितों ने `जमीन हक अभियान´ से जुड़कर जमीन का मतलब जाना और समाज का ताना-बाना पलटकर रख दिया. इन दिनों 69 गांवों की करीब 2000 एकड़ पहाड़ियां दलित-संघर्ष के बीज से हरी-भरी हैं. इस संघर्ष में औरतों ने भी बराबरी से हिस्सेदारी निभायी. इसलिए उन्हें जमीन का आधा हिस्सा मिला. इस तरह खेतीहीन से किसान हुए कुल 1420 नामों में से 710 औरत हैं.


साल पहले तक यह लोग पहाड़ों के चरवाहे कहलाते थे। यह तथ्य महाराष्ट्र के `जमीन गायरन कानून´ से मेल खाता है. इस कानून के मुताबिक 14 अप्रैल 1991 के पहले से जो परिवार ऐसी जमीन का इस्तेमाल करते हैं उन्हें वह जमीन दे दी जाए. लेकिन कानून बनने के एक दशक बाद भी लोग अनजान रहे. यह `जमीन वालों´ के असर से डरकर अपनी जमीन को `अपनी´ नहीं कह सकते थे. इसलिए `चाईल्ड राईटस एण्ड यू´ और `राजार्षि शाहू ग्रामीण विकास´ ने जब गांव-गांव तक इस कानून का संदेश पहुंचाया तो सभी ने उसे अनसुना कर दिया. लेकिन 2002 की एक मामूली प्रतिक्रिया ने बड़े संघर्ष को जन्म दे दिया. शिराल गांव के 2-3 दलित एक सुबह संगठन के आफिस आए और बोले कि हमने जबसे अपनी जमीन पर खेती की बात छेड़ी तब से सवर्ण धमकियां देते हैं. वह अपनी ताकत से हमें दबाते हैं. इसलिए संगठन आगे आए. कार्यकर्ताओं ने उन्हें समझाया कि संगठन चार रोज तुम्हारे साथ रहेगा. तुम्हें वही रहना है इसलिए वह जमीन और उसकी लड़ाई तुम्हारी ही है. उससे जो भी नफा-नुकसान होगा वह भी तुम्हारा ही होगा. सबकुछ तो सवर्णों का है इसलिए डरना तो उन्हें चाहिए. तुम्हारे पास जीने के लिए केवल एक जिंदगी है. कम से कम उस जिंदगी को तो निडर होकर जीओ. ऐसा सुनकर वह दलित अपने खेतों को आजाद कराने की बात कहकर चले गए.

इसके आगे का सिरा महेन्द्र जगतप ने जोड़ा- ``हम लोग गांवों में मिट्टी डालने और पत्थर हटाने लगे तो सवर्णों ने अचानक हमला बोल दिया. इसमें 5 लोग बुरी तरह घायल हो गए. संगठन के साथ मिलकर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज की. पुलिस कार्यवाही में 15 हमलावरों को 18 दिन जेल हुई. यह मामला कचहरी के मार्फत सुलझा.´´ इसके बाद संगठन ने शिराल गांव में जो बैठक बुलायी उसमें 2 हजार लोग इकट्ठा हुए. इसमें दलितों के साथ पारधी, भील, धनगढ़, सुतार, कुम्हार, बड़ई और लोहार समुदाय मिलकर एक हो गए. उन्होंने ``मार खाने को तैयार, जमीन छोड़ने को नहीं´´ जैसे नारे लगाकर यहां खेत बनाए और उसमें बीज डाले. वह एक-दूसरे को सुनते और उसमें गुणा-भाग लगाकर जगह-जगह लड़ने की तैयारियां करते. 8 दिन रूककर बाहरी लोग शिराल गांव से विदा हुए. तब फसल की रखवाली के लिए 35 दलित झोपड़ियां 120 एकड़ खेतों के इर्द-गिर्द बस गई. दामोदर धोरात ने बताया- ``जब पहली बार ज्वार की फसल आई तो हमारे अंदर इज्जत से जीने का सपना जागा. बढ़िया जीने की चाहत नई ऊंचाईयां छूने लगी. खेत मालिक बनने का सपना दूर-दूर तक फैल गया.´´

शिराल की लड़ाई रंग लायी और करंजी गांव के 15 दलितों ने 51 एकड़ पथरीली जमीन पर बीज रोपे. इस बार सवर्ण चुप रहे. मगर यह चुप्पी तूफान के पहले की थी. इसके बाद जहां-जहां दलितों ने खेत मालिक बनना चाहा वहां-वहां सर्वणों का अत्याचार कहर बनकर टूटा. पाठसरा में घर की कुण्डी लगायी और ऊपर की छत निकालकर मारा. भातुड़ी में सामाजिक बाहिश्कार करते हुए दाना-पानी बंद किया. धामनगांव में चोरी के झूठे मामलों के बहाने फंसाया गया. करेहबाड़ी में बस्ती और आसपास के जंगल को आग के हवाले किया. िशडाला में खेत का धान जला दिया. बेलगांव में खड़ी फसल को जानवरों के लिए छोड़ दिया. पारोडी में गेहूं की फसल काट ली और देवीगांव में खेत सहित जंगल जला डाला.

उस समय एक तरफ सवर्ण हमला करते दूसरी तरफ संगठन से जुड़े दलित पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज कराते। इस तरह पाठसरा से 250, भातुड़ी से 70, धामनगांव से 45, करेहबाड़ी से 70, शिडाला से 150, बेलगांव से 9, पारोड़ी से 70 और देवीगांव से 9 हमलावरों को गिरफ्तार किया गया। जैसे-जैसे गिरफ्तारियां बढ़ी वैसे-वैस दलितों पर हमले कम हुए. 2005 तक जातीय-संघर्ष का यह दौर पूरी तरह थम चुका था.

शिडाला के दादासाहेब बाग्मारे ने बताया- ``जब दलितों की अपनी जमीन हुई तो मजदूरों की कमी पड़ गई. ऐसे में बड़े किसानों ने मजदूरी बढ़ायी और काम के घण्टे तय किए. इससे हम छोटे किसानों को फायदा हुआ. हम अपनी खेतीबाड़ी से फुर्सत होते ही उनके खेतों के काम निपटाते. लेकिन बंधुआ मजदूर बनकर नहीं बल्कि अपनी मेहनत का सही मेहनताना लेकर. प्रभाकर सावले ने कहा- ``हम खेतों से साल भर का अनाज बचाते हैं और चारा बेचकर कुछ पैसा भी. इस तरह कई बकरियां खरीदी हैं. हम बहुत अमीर नहीं हुए लेकिन गृहस्थी की हालत पहले से ठीक है.´´ पाठसरा गांव की बैठक में सैकड़ों लोगों के साथ हम भी मौजूद हैं. यहां `संगठन´ के मतलब और मकसद पर गर्मागम चर्चा चल रही है. नमनदेव काले ने कहा- ``संगठन याने आप. अगर आपके अंदर की ताकत बढ़ती है तो संगठन खुद-ब-खुद ताकतवर होगा.´´ अप्पा बालेकर बोला- ``एक-एक से पूरा गांव और ऐसे कई गांवों से जुड़कर संगठन बनता है. संगठन के आगे आने का मतलब लोगों के आगे आने से होना चाहिए. एक के पीछे एक होने या किसी के हटने से संगठन नहीं रूकता.´´ चागदेव सांग्ले बोला- ``दूसरों के भरोसे जिया भी नहीं जा सकता. जो अपने आप चलता है वहीं संगठन है. हमें नेता नहीं, कार्यकर्ताओं चाहिए.´´ जनाबाई गरजी- ``अगर किसी गांव का संगठन पावरफुल है तो समझो वह आसपास के इलाके का पावरहाउस है.´´

करंजी गांव के मंदिर में दलितों का घुसना मना था लेकिन उर्मिला निकालजे आज वहीं की सरपंच हैं। उन्होंने बताया- ``जमीन-हक को लेकर निकलने वाली रैलियों में 10-15 हजार लोग जमा होते हैं। उन रैलियों को औरतें संभालती हैं। हम पुलिस हो या तहसीलदार, मिनिस्टर हो या कलेक्टर सबसे बतियाते हैं. अब हमारा अभियान सामुदायिक खेती के बारे में सोच रहा है. शिराल गांव की राहीबाई खंडागले ने बताया- ``ऐसी खेती में सारे खेतों की हदों को तोड़ दिया जाएगा। तब हर गांव का एक खेत होगा. इससे कम लागत और मेहनत में ज्यादा पैदावार होगी. जो फसल आएगी उसे बराबर हिस्सों में बांट दिया जाएगा. सवर्ण की सुने तो ऐसा मुश्किल है. जब हमने जमीन की लड़ाई शुरू की थी तब भी वह ऐसा ही कहते थे. हमने मिलकर 22 गांव के खेतों के लिए बाबड़ियां बनायी हैं. इसलिए सब मिलकर खेती भी कर सकते हैं.´´ पोखड़ी गांव की जनाबाई ने बताया- ``खेतों के बिना भी हमारी जिंदगी थी मगर बंधी हुई. ऊंची जाति के घरों से गुजारा चलता था. वह जैसा कहते वैसा करते. हम उनकी गंदगी उठाते. हमारे बच्चे उनके जानवरों के पीछे भागते. हमारे मर्द उनके खेतों में रात-दिन काम करते. इसके बदले साल में एक बार अनाज, उतरन के कपड़े और रोजाना बचा हुआ खाना मिलता. बारिश में जब झोपड़ियां बहती तो उनकी छतों का बाहरी हिस्सा हमारा आसरा बनता.´´ भातुड़ी गांव की अभिधाबाई धेवड़े ने कहा-``पहले बैठकों में हमें बुलाया नहीं जाता था और अब हम पंचायत का फैसला सुनाते हैं.´´

एक सदी पहले महात्मा फुले ने कहा था- ``शिक्षा बिना मति गई, मति बिना गति गई, गति बिना अर्थ गया और अर्थ बिना शूद्र बर्बाद हुए।´´ हमारी पंरपराओं ने दलितों को धन रखने की आजादी नहीं दी जिससे वह लाचार हुए. इसलिए वह सवर्णों पर निर्भर हो गए. यह निर्भरता आज तक बरकरार है. सामाजिक कार्यकर्ता बाल्मिक निकालजे ने इस स्थिति को उल्टने की बात कहते है- अगर दलितों को आत्मनिर्भर बनाना है तो उन्हें जीने के संसाधन देने होंगे। फिलहाल जमीन से बेहतर दूसरा विकल्प नजर नहीं आता. जमीन मिलते ही लोग मालिक बन जाते हैं. इसलिए बीड़ जिले के दलित आज किसी से कुछ नहीं मांगते. जमीन की यह लड़ाई स्वाभिमान से भी जुड़ी है.

जो पत्थर घास को रास्ता नहीं देता था आज वहां ख्वाहिशों की फसल है. यहां के धरतीपुत्रों ने धरती को आजाद किया और उससे जीना सीख लिया. इस तरह उन्होंने अपनी दुनिया को `सुजलाम सुभलाम मलयज शीतलाम´ बना डाला. लेकिन कानून के मद्देनजर उन्हें जमीन का पट्टा मिलना बाकी है. मतलब 15 साल गुजरने के बावजूद जमीन की लड़ाई यहां आज तक जारी है. जब तक लड़ाई पूरी नहीं होती तब तक यह कहानी भी अधूरी ही रहेगी.

10.1.09

गांव-गांव टूटकर, ठांव-ठांव बन गए













मेलघाट टाइगर रिर्जव एरिया से

इस साल ज्यों ही टाइगर रिजर्व बना कोरकू जनजाति का जीवन दो टुकड़ों में बट गया. एक विस्थापन और दूसरा पुनर्वास. ऊंट के आकार में उठ आये विस्थापन के सामने पुनर्वास जीरे से भी कम था. पुराने घाव भरने की बजाय एक के बाद एक प्रहारों ने जैसे पूरी जमात को ही काट डाला. अब इसी कड़ी में 27 गांव के 16 हजार लोगों को निकालने का फरमान जारी हुआ है. अफसर कहते हैं बेफिक्र रहिए, कागज में जैसा पुनर्वास लिखा है ठीक वैसा मिलेगा. जबाव में लोग पुनर्वास के कागजी किस्से सुनाते हैं. और आने वाले कल की फिक्र में डूब जाते हैं.


10 तक का पहाड़ा न आने के बावजूद 1974 यहां के बड़े-बूढ़ों की जुबान पर रखा रहता है. 1974 को `वन्य जीव संरक्षण कानून´ बना और `मेलघाट टाइगर रिजर्व´ वजूद में आया. कुल भू-भाग का 73 फीसदी हिस्सा कई तरह की जंगली पहाड़ियों से भरा है. बाकी जिस 27 फीसदी जमीन पर खेती की जाती है वह भी बारिश के भरोसे है. इस तरह आजीविका का मुख्य साधन खेती नहीं बल्कि जंगल ही है. इस 1677.93 वर्ग किलोमीटर इलाके को तीन हिस्सों में बांटा गया है- (पहला) 361.28 वर्ग किलोमीटर में फैला गुगामल नेशनल पार्क, (दूसरा) 768.28 वर्ग किलोमीटर में फैला बफर एरिया और (तीसरा) 1597.23 वर्ग किलोमीटर में फैला मल्टीपल यूजेज एरिया. तब के दस्तावेजों के मुताबिक सरकार ने माना था कि इससे कुल 62 गांव प्रभावित होंगे.

विराट गांव के ठाकुजी खड़के ने बताया कि- ``परियोजना को लेकर हम लोगों से कभी कोई जिक्र नहीं किया गया. 1974 में तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और प्रदेश के वनमंत्री रामू पटेल अपने काफिले के साथ यहां आए और कोलखास रेस्टहाउस में ठहर गए. उस वक्त रामू पटेल ने आसपास के खास लोगों को बुलाकर इतना भर कहा था कि सरकार शेरों को बचाना चाहती है इसलिए यहां शेर के चमड़ा बराबर जगह दे दो.´´ लेकिन यह चमड़ा चौड़ा होते-होते अब पूरे मेलघाट को ही ढ़कने लगा है. ऐसी स्थिति में `चाईल्ड राईटस एण्ड यू´ और `प्रेम´ संस्थाएं कोरकू जनजाति के साथ कदम से कदम मिलाकर संघर्ष कर रही हैं. `चाईल्ड राईटस एण्ड यू´ के महाप्रंबधक कुमार नीलेन्दु के मुताबिक- ``सरकार जनता के हितों के लिए काम करती है. मगर यहां तो स्थिति एकदम उल्टी है. कभी संरक्षण तो कभी विकास के नाम पर जनजातियों का ही विनाश जारी है. ऐसी योजना में न तो लोगों को शामिल किया जाता है और न ही खुली नीति को अपनाया जाता है. इसलिए व्यवस्था में घुल-मिल गई कई खामियां अब पकड़ से दूर होती जा रही हैं. सरकार हल ढ़ूढ़ने की बजाय हमेशा नई उलझनों में डाल देती है.´´

इस दिशा में पहला काम 1974 को बाघों की संख्या खोजने के लिए सर्वे से शुरू हुआ. 6 सालों तक तमाम कागजी कार्यवाहियों का दौर चलता रहा जिसमें सारी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई. 1980 से `वन्य जीव संरक्षण कानून´ व्यवहारिक अगड़ाईयां लेने लगा. पसतलई गांव के तुकाराम सनवारे कहते हैं- ``जब बाबू लोग फाइलों को लेकर इधर-उधर टहलते तब हमने नहीं जाना था कि वह एक दिन जंगलों को इस तरह बांट देंगे. वह जीपों में सवार होकर आते और हर बस्ती की हदबंधी करके चले जाते. साथ ही हमसे खेती के लिए जमीन देने की बातें कहते. हमें अचरज होता कि जो जमीन हमारी ही है उसे क्या लेना. उनकी यह कागजी लिखा-पढ़ी 6 महीने से ज्यादा नहीं चली.´´ सेतुकर डांडेकर ने बताया- इतने कम वक्त में उन्होंने कई परिवारों को खेती के लिए पट्टे बांट देने की बात कर डाली. लेकिन उस वक्त कई परिवार पंजीयन से छूट गए. ऐसा लोगों के पलायन करने और सर्वे में गड़बड़ियों के चलते हुआ. इस तरह उन्होंने हमारी बहुत सारी जमीन को अपनी बताया. हमने भी जमीनों को छोड़ दिया. वन-विभाग ने ऐसी जमीनों पर पेड़ लगाकर उन्हें अपने कब्जे में ले लिया. हमारी सुनवाई एक बार भी नहीं हुई.´´ इस तरह किसानों की एक बड़ी आबादी को मजदूरों में बदल डाला. रोजगार गांरटी योजना के तहत अब तक 45780 मजदूरों के नाम जोड़े जा चुके हैं.

1980 के खत्म होते ही जंगल और आदिवासी के आपसी रिश्तों पर होने वाला असर साफ-साफ दिखने लगा. एक-एक करके उन्हें जंगली चीजों के इस्तेमाल से पूरी तरह बेदखल कर दिया गया. उन्हें भी लगने लगा जंगल हमारा नहीं, पराया है. इस पराएपन के एहसास के बीच उन पर जंगल खाली करने का दबाव डाला गया. `मेलघाट टाइगर रिजर्व´ से सबसे पहले तीन गांव कोहा, कुण्ड और बोरी के 1200 घरों को विस्थापित होना पड़ा था. पुनर्वास के तौर पर उन्हें यहां से करीब 120 किलोमीटर दूर अकोला जिले के अकोठ तहसील भेज दिया गया. कुण्ड पुनर्वास स्थल में मानु डाण्डेकर ने बताया कि- ``सर्वे में तब जो गड़बड़ियां हुई थी उन्हें हम अब भुगत रहे हैं. जैसे 6 परिवारों को यहां आकर मालूम चला कि उन्हें खेती के लिए दी गई जमीन तो तालाब के नीचे पड़ती है. अब आप ही बताए पानी में कौन-सी फसल उगाए? जो जानवर हमारी गुजर-बसर का आसरा हुआ करते थे इधर आते ही उन्हें बेचना पड़ा. क्योंकि चराने के लिए यहां जमीन नहीं थी इसलिए सड़क के किनारे-किनारे चराते. इस पर आसपास के लोग झगड़ा करते और कहते कि हमारे जानवर कहां चरेंगे ? हम आदमी के मरने पर उसे जमीन के नीचे दफनाते हैं. लेकिन यहां कहां दफनाए ?´´

पुनर्वास-नीति के कागजों में दर्ज हर सुंदर कल्पना यहां आकर दम तोड़ देती है. इन पुनर्वास की जगहों पर दौरा करने के बाद मूलभूत सुविधाओं का अकाल नजर आया. तीनों गांवों के बीचोबीच जो स्कूल खोला गया उसकी दूरी हर गांव से 2 किलोमीटर दूर पड़ती हैं. इस तरह गांव की बसाहट एक-दूसरे से बहुत दूर-दूर हो गई है. आंगनबाड़ी यहां से 5 किलोमीटर दूर अस्तापुर में हैं. प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के लिए 10 किलामीटर दूर रूईखेड़ा जाना होता है. इन्हें जिन इलाकों में जगह मिली है वह आदिवासी आरक्षित क्षेत्र से बाहर है इसलिए यह सरकार की विशेष सुविधाओं से भी बाहर हो गए हैं. जैसे पहले इन्हें राशन की दुकान पर अन्तोदय योजना से 3 रूपए किलो में 15 किलो चावल और 2 रूपए किलो में 20 किलो गेहूं मिल जाता था. वह अब नहीं मिलता. और तो और यहां बीपीएल में केवल 3 परिवारों के नाम ही जुड़ सके हैं. लगता है बाकी के हजारों परिवार इस सूची से भी विस्थापित हो गए हैं. 2002 में शासन ने बिजली, पानी और निकास के इंतजाम का वादा किया गया था. बीते 6 सालों में यह वादा एक सपने में तब्दील हो गया.

यहां से 4 किलोमीटर दूर कुण्ड गांव से विस्थापित नत्थू बेलसरे की सुनिए- ``6 साल पहले खेती के लिए मिली जमीन कागज पर तो दिखती है मगर यहां ढ़ूढ़ने पर भी नहीं मिलती. इसके लिए अमरावती से लेकर नागपुर तक कई कार्यालयों के चक्कर लगाए लेकिन जमीन का कोई अता-पता नहीं. इस पर बाबू लोग हैरान और हम परेशान हैं.´´ यहां से 4 किलोमीटर दूर कोहा पुनर्वास स्थल में हरिजंड बेलसरे और हीरा मावस्कर ने खेती के लिए जमीन नहीं मिलने की बात बताई. कुण्ड पुनर्वास स्थल पर तो 11 परिवारों को घर के लिए न तो पैसा मिला और न ही जमीन. लोगों ने कहा कि वह आज भी इधर-उधर गुजर-बसर कर रहे हैं. लेकिन कहां हैं, यह कोई नहीं जानता.

बोरी पुनर्वास स्थल में सुखदेव एवले ने बताया कि- ``हमारी पुश्तैनी बस्तियों को हटाए जाने के पहले इसकी कोई कागजी खबर और तारीख देना भी मुनासिब नहीं समझा गया। अफसर आते और कह जाते बस अब इतने दिन और बचे, फिर तुम्हें जाना होगा। उनका बस्ती हटाने का तरीका भी अजीब है. जिस बस्ती के इर्द-गिर्द 8-15 दिन पहले से ट्रक के ट्रक घूमने लगे, समझो घर-गृहस्थी बांधने का समय आ गया. कर्मचारियों के झुण्ड के झुण्ड चाय-पान की दुकानों पर जमा होकर तोड़ने-फोड़ने की बातें करते हैं. कहते हैं दिल्ली से चला आर्डर तीर की तरह होता है, आज तक वापिस नहीं लौटा. अगर समय रहते हट गए तो कुछ मिल भी जाएगा. नहीं तो घर की एक लकड़ी ले जाना मुश्किल हो जाएगा. ऐसी बातों से घबराकर जब कुछ लोग अपने घर की लकड़ियां और घपड़े उतारने लगते हैं तो वह बस्ती को तुड़वाने में हमारी मदद करते हैं. हमारे लड़को को शाबाशी देते हैं. देखते ही देखते पूरी बस्ती के घर टूट जाते हैं.´´

इसी तरह वैराट, पसतलई और चुरनी जैसे गांवों के घर भी टूटने वाले हैं. पुनर्वास के लिए शासन को 1 करोड़ 9 लाख रूपए दिये गए हैं. अधिकारियों को यह रकम बहुत कम लगी इसलिए उन्होंने और 2 करोड़ रूपए की मांग की है. ऐसे अधिकारी जंगल और जमीन के बदले नकद मुआवजों पर जोर देते हैं. जानकारों की राय में नकद मुआवजा बांटने से भष्ट्राचार की आशंकाएं पनपती हैं. जैसे सरदार सरोवर डूब प्रभावितों को नकद मुआवजा बांटने की आड़ में भष्ट्राचार का बांध खड़ा हो गया. जिसमें अब कई अधिकारी और दलालों के नाम उजागर हो रहे हैं. यहां भी कोरकू जनजाति का रिश्ता जिन कुदरती चीजों से जुड़ा है उसे रूपए-पैसों में तौला जा रहा हैं. लेकिन जनजातियों को रूपए-पैसों के इस्तेमाल की आदत नहीं होती. इसके पहले भी विस्थापित हुए लोगों के पास न तो जंगल ही रहा और न ही नकद. आखिरी में उसकी पीठ पर बस मुसीबतों का पहाड़ रह जाता है. वैराट गांव की मनकी सनवारे कहती है-``यहां से गए लोगों की हालत देखकर हम अपना जंगल नहीं छोड़ना चाहते. सरकार के लोग बस निकलने की बात करते हैं लेकिन अगले ठिकानों के बारे में कोई नहीं बोलता.´´

`प्रेम´ संस्था के संजय इंग्ले मानते हैं- ``शासन के पास दर्जनों गांवों को विस्थापित करने के बाद उन्हें एक जगह बसाने की व्यवस्था नहीं हैं. जिस अनुपात में विस्थापन हो रहा है उसी अनुपात में राहत मुहैया कराना बेहद मुश्किल होगा. पुराने तजुर्बों से भी ऐसा जाहिर होता है इसलिए अब और विस्थापन सहन नहीं होगा´´ उनके साथ वैराट, पसतलई और चुरनी गांवों से तुकाराम सनवारे, तेजुजी सनवारे, फकीरजी हेकड़े, किशनजी हेकड़े, शांता सनवारे, सुले खड़के, फुलाबाई खड़के और गोदाबाई सनवारे जैसी हजारो आवाजों ने विस्थापन के विरोध में एक आवाज बुलंद की है. क्या उनकी यह गूंज जंगल से बाहर भी सुनी जाएगी ?

हाल ही में इस डिवीजन के वनाधिकारी रवीन्द्र बानखेड़े ने सरकार को टाइगर रिजर्व की सीमा 444.14 वर्ग किलोमीटर बढ़ाने के लिए प्रस्ताव भेजा है. जब तक यह रिर्पोट प्रकाशित होगी तब तक हो सकता है उसे मंजूरी मिल जाए. फिलहाल एक और विस्थापन की इबारत लिखकर भेजी जा चुकी है. इसका मतलब दर्जनों गांवों के हजारों लोगों को उनकी दुनिया से बेदखल कर दिया जाएगा. इंसान और जानवर सालों से साथ रहते आये हैं इस सरकारी संरक्षण (उत्पीड़न) के बाद जानवर और इंसान सालों तक नहीं समझ पायेंगे कि उनके साथ क्या किया गया और क्यों?

3.1.09

लड़ाई-पढ़ाई साथ-साथ

शिरीष खरे

सरदार सरोवर बांध से नफा और नुकसान। पिछले दो दशकों से जारी इस बहस ने हमारे दिलो-दिमाग पर दो चित्र उभारे हैं। पहला चित्र बिजली, पानी और विकास की गंगा के रूप में तो दूसरा हजारों लागों के विस्थापन का दर्द लिए खड़ा है। नर्मदा घाटी के बाहर इस आंदोलन को जानने की उत्सुकता बनी रहती है। आंदोलन की दो रेखाएं सामानान्तर चल रही हैं। एक अहिंसा पर आधारित लड़ाई को जारी रखती है तो दूसरी रचनात्मकता का रास्ता दिखाती है।

बांध से प्रभावित आदिवासियों ने अपने बच्चों के लिए जीवनशाला नाम से कई स्कूल तैयार किए है। लोगों के मुताबिक `लड़ाई-पढ़ाई साथ-साथ´ होना चाहिए। विंध्यांचल और सतपुड़ा पर्वतमालाओं की ओट में यहां कई छोटे और सुंदर गांव हैं। यह गांव अपने जिला मुख्यालय से बेहद दूर और घनघोर जंगलों के बीच हैं। इन स्थानों में स्कूल भवन बनने और शिक्षक आने की राह तकना नियति का खेल समझा जाता था। ऐसा नहीं कि बांध विस्थापितों ने बच्चों की शिक्षा के लिये कभी गुहार नही लगाई हो। हर बार केवल आश्वासन मिलें और स्थिति जस के तस बनी रही। आखिरकार, आदिवासियों ने खुद बदलाव की यह पहल की। 1991-92 में, चिमलखेड़ी और नीमगांव में जीवनशालाएं शुरू हुई। काम नया और कुछ मालूम नहीं होने से चुनौती पहाड की तरह खड़ी थी। फिर भी जीवनशाला का आधार स्बावलंबी रखा गया। शुरूआत से ही सीमित साधन, संसाधन और समुदायिक क्षमता के अनुरुप बेहतर शिक्षा की बात पर बल दिया गया। इन जीवनशालओं का मकसद महज सरकारी स्कूलों की शून्यता भरना नहीं था बल्कि आदिवासी जीवनशैली को कायम रखना भी था। फिलहाल करीब 13 गांव में जीवनशालाएं संचालित है जो आसपास के 1500 से अधिक बच्चों को जिन्दगी की बारहखड़ी सिखाती हैं।

`नर्मदा बचाओं आंदोलन´ से जुड़े आशीष मण्डलोई बताते है कि- ``वैसे तो जीवनशाला का जन्म विस्थापन रोकने की लड़ाई का नतीजा रहा मगर जल्दी ही ऐसे स्थान आंदोलनकारियों के लिये विविध चर्चा, रणनीति और कार्यक्रम आयोजन का मुख्य केन्द्र बन गए। इस प्रकार आन्दोलन और जीवनशाला, दोनों को एक-दूसरे को लाभ पहुंचाने लगे। ऐसे स्थान आदिवासी एकता और भागीदारिता के प्रतीक बन गए।´´जीवनशाला में पढ़ाई-लिखाई का तरीका सहज ही रखा गया है। लोगों के बीच से कुछ लोग निकले और पढ़ाने लगे। इसमें गांव की बोली को वरीयता दी गई। इस दौरान किताबों का प्रकाशन भी पवरी/भिलाली बोलियों में किया गया। पहली बार बच्चों को उनकी बोली की किताबें मिल सकी। शिक्षकों ने ``अमर केन्या´´ (हमारी कथाएं) में कुल 12 आदिवासी कहानियों को समेटा। इसके अलावा सामाजिक विषयों पर ``अम्रो जंगल´´(हमारा जंगल) और ``आदिवासी वियाब´´(आदिवासी विवाह) जैसी किताबों को लिखा गया। केवल सिंह गुरूजी ने ``अम्रो जंगल´´ में यहां की कई जड़ी-बूटियों को बताया। खुमान सिंह गुरूजी ने ``रोज्या नाईक, चीमा नाईक´´ किताब में अंग्रेजी हुकूमत के वक्त संवरिया गांव के संग्राम पर रोशनी डाली। ऐसी किताबों में आदिवासी समाज का ईतिहास, साहित्य, कला, संस्कृति और परंपराओं से लेकर स्थानीय भूगोल, प्रशासन और कानूनी हकों तक की बातें होती हैं।
हर
किताब जैसे कुदरत के साथ दोस्ताना रिश्ता बनाने का संदेश देती है। पढ़ाई को दिलचस्प बनाने के लिये अनेक तरीको को अजमाया गया। ``अक्षर ओलखान´´(अक्षरमाला) में यहां की बोली के मुताबिक अक्षरों की पहचान और जोड़ना सिखाया गया है। इसमें कई आवाजों को निकालकर या आसपास की चीजों से मेल-जोल कराना होता है। नाच-गाना, चित्र और खेलों से पढ़ाई मंनारंजक बन जाती है। लिखने की कई विधियां को भी बार-बार दोहराया जाता है।
जीवनशाला से निकली पहली पीढ़ी अब तैयार हो चुकी है। जो अब शिक्षक बनकर अपने संस्कारों को आगे बढ़ा रहे हैं। लेकिन विकास के नाम पर जंगल काटने और अब घाटी के लोगों को भोजन की कमी महसूस होने लगी है। अपनी जमीन से अलग-थलग यहां का आदिवासी अपने को यकायक बाजार में खड़ा पाता है। उन्हें न आर्थिक सुरक्षा मिल पा रही है और न ही भावनात्मक। इतनी बड़ी निर्दोष आबादी से जहां एक ओर जीने के साधन छीने गए हैं वहीं दूसरी तरफ उन्हें पिछड़ा बताया जा रहा है। विस्थापन का कार्य गति पर है।

विस्थापन, दोबारा या बार-बार बसना, सरकारी योजना का लाभ न उठा पाना, कानूनी हक से बेदखल, मेजबान समुदाय की आनाकानी, नया समायोजन, शोषण, यौन उत्पीड़न, अधिक व्यय, हिंसा, अपराध,अव्यवस्था,संसाधन या जमीन की सीमितता, निर्णय की गतिविधि से कटाव, अस्थायी मजदूरी, मवेशियों का त्याग, प्रदूषण, सुविधा व स्वास्थ्य संकट........ एक तरफ बांध के कारण विस्थापन से विकराल आशंकाओं का इतना भरी बोझ है और दूसरी ओर जीवनशाला के नन्हें बच्चों के हाथों में खुली किताबों-सा खुला आसमान है। हालांकि उन्हें अभी बहुत सी परीक्षा पास करनी हैं मगर किसी के चेहरे पर चिंता की लकीर तक नहीं। बच्चों के हंसते चेहरों को देखकर लाख समस्याओं से लड़ने की मन करता है।

19.12.08

टाईगर रिजर्व में जनजातियों का शिकार

मेलघाट से लौटकर
मेलघाट सतपुड़ा पर्वतमाला की पश्चिमी पहाड़ी है जो महाराष्ट्र के जिला अमरावती की दो तहसील से जुड़कर बनी है. इस 2 लाख 19 हजार हेक्टेयर यानी मुंबई से 4 गुना बड़ी जगह पर कुल 319 गांव मिलते हैं. यहां करीब 3 लाख आबादी में से 80 फीसदी कोरकू जनजाति है. समुद्र तल से 1118 मीटर की ऊंचाई पर बसा यह हरा-भरा भाग `मेलघाट टाइगर रिजर्व´ कहलाता है. 1974 को `एम टी आर´ के नाम से मशहूर इस प्रोजेक्ट से तब 62 गांव प्रभावित हुए. आज भी 27 गांव के करीब 16 हजार लोगों को विस्थापित किया जा रहा है.

1947 से पूरे देश में विभिन्न परियोजनाओं से अब तक 2 करोड़ से अधिक आदिवासियों को विस्थापित किया जा चुका है. सरकार के मुताबिक बाघों को बचाने के लिए यहां विस्थापन जरूरी है लेकिन `राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण´ की रिपोर्ट स्वीकार करती है कि सत्तर के दशक में शुरू हुआ `प्रोजेक्ट टाइगर´ अपने लक्ष्य से काफी दूर रहा. देश में बाघों की संख्या अब तक के सबसे निचले स्तर तक पहुंच चुकी है. 2002 को देश में जहां 3642 बाघ थे वहीं अब 1411 बाघ बचे हैं. राज्यसभा के सांसद ज्ञानप्रकाश पिलानिया के मुताबिक- ``बाघों की संख्या को बढ़ाने के लिए बने रिजर्व एरिया अब उन्हें मारने की मुनासिब जगह बन गए हैं. इसके लिए अवैध िशकार करके उनके अंगों की तश्करी करने वाले व्यापारी जिम्मेदार हैं. बाहरी ताकतों की मिलीभगत से ही इतने बड़े गिरोह पनप सकते हैं.´ दूसरी तरफ विकास की तेज आंधी ने जंगलों का भविष्य खत्म कर दिया है. `भारतीय वन सर्वेक्षण´ की रिपोर्ट बताती है कि 2003 से 2005 के बीच 728 किलोमीटर जंगल कम हुआ. फिलहाल सघन जंगल का हिस्सा महज 1.6 फीसदी ही बचा है. इसी प्रकार 11 रिजर्व एरिया में जंगल घटा है. जाहिर है कि जनजाति को लगातार विस्थापित किए जाने के बावजूद न तो बाघ बच पाए हैं और न जंगल.

मेलघाट में कोरकू जनजाति का अतीत देखा जाए तो 1860-1900 के बीच प्लेग और हैजा से पहाड़ियां खाली हो गई थी. तब ये लोग मध्यप्रदेश के मोवारगढ़, बेतूल, शाहपुरा भवरा और चिंचोली में जाकर बस गए. उसके एक दशक बाद अंग्रेजों की नजर यहां के जंगल पर पड़ी. उन्हें फर्नीचर की खातिर पेड़ काटवाना और उसके लिए पहुंच मार्ग बनवाना था. इसलिए कोरकू जनजाति को वापिस बुलाया गया. आजादी के 25 सालों तक उनका जीवन जंगल से जुड़ा रहा. उन्होंने जंगल से जीवन जीना सीखा था. लेकिन जैसे-जैसे जंगल से जीवन को अलग-थलग किया जाने लगा वैसे-वैसे उनका जीना दूभर होता चला गया.

अनिल जेम्स कहते हैं कि-`बीते 34 सालों से `मेलघाट टाइगर रिजर्व´ में जनजातियों का शिकार जारी है. जैसे जैसे टाईगर रिजर्व सुरक्षित हो रहा है यहां रोटी का संकट गहराता जा रहा है. जनजातीय पंरपराओं का ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो चुका है. यहां सामाजिक ऊथल-पुथल अपने विकराल रुप में हाजिर है. राहत के तौर पर तैयार सरकारी योजनाओं का असर बेअसर ही रहा. हर योजना ने लोगों को कागजों में उलझाए भर रखा और अब लोग भी उलझकर जंगल की मांग ही भूल गए हैं.

बांगलिंगा गांव में 85 साल के झोलेमुक्का धाण्डेकर ने जंगल की बातों के बारे में बताया कि-`पहले हम समूह में रहने के आदी थे. अपनी बस्ती को पंचायत मानते और हर परेशानी को यही सुलझाते. `भवई´ त्यौहार पर साल भर का कामकाज और कायदा बनाते. इन मामलों में औरत भी साथ होती. वह अपना हर फैसला खुद ही लेती. चाहे जिसे दूल्हा चुने और पति से अनबन या उसके मरने पर दूसरी शादी करे. शादी में लेन-देन और बच्ची को मारने जैसी बातें नहीं सुनी थी. संख्या के हिसाब से भी मर्द और औरत बराबर ही बैठते. हमारी बस्ती सागौन, हलदू, साजड़, बेहड़ा, तेंदू, कोसिम, सबय, मोहिम, धावड़ा, तीवस और कोहा के पेड़ों से घिरी थी. जंगल में आग लगती तो हम अपनी बस्तियां बचाने के लिए उसे बुझा देते. तभी तो हमें अंग्रेजों ने जंगलों में ही रहने दिया. वहां से सालगिटी, गालंगा और आरा की भाजियां मिलती. बेचंदी को चावल की तरह उबालकर खाते. कच्चा खाने की चीजों में काला गदालू, बैलकंद, गोगदू और बबरा मिल जाते. ज्वस नाम की बूटी को उबलती सब्जी में मिला दो तो वह तेल का काम करती. इसके अलावा तेंदू, आंवला, महुआ, हिरडा, बेहड़ा, लाख और गोद भी खूब थी. फल, छाल और बीजों की कई किस्मों से दवा-दारू बनाते. खेती के लिए कोदो, कुटकी, जगनी, भल्ली, राठी, बडा़ आमतरी, गड़मल और सुकड़ी के बीज थे. ऐसे बीज बंजर जमीन में भी लहलहाते और साल में दो बार फसल देते. इसलिए अनाज का एक हिस्सा खाने और एक हिस्सा खेती के लिए बचा पाते थे.

यह तब की सरल, खुली और समृद्ध जीवनशैली की झलक भर है. बीते 3 दशकों से भांति-भांति की दखलअंदाजियों ने यहां की दुनिया को बुरी तरह प्रभावित किया. 1974 में सबसे पहले वन-विभाग ने बाघ के पंजों के निशान खोजने और उनकी लंबाई-चौड़ाई तलाशने के लिए सर्वे किया. फिर जमीनों को हदों में बांटा जाने लगा. इस तरह जंगल की जमीन राजस्व की जमीन में बदलने लगी और लोग यहां से बेदखल हुए. 1980 के बाद सरकार ने इन्हें पानी की मछली, जमीन के कंदमूल और पेड़ की पित्तयों के इस्तेमाल से रोका. मगर पूरा जंगल बाजार के लिए खोल दिया गया. जंगल के उत्पाद जब बाजार में बिकने लगे तो यहां की जनजाति भी जंगल की बजाय बाजारों पर निर्भर हो गई. इससे चीजों का लेन-देन बढ़ा और उन्हें रूपए-पैसों में तौला जाने लगा. अनाज के बदले नकद की महिमा बढ़ी. नकदी फसल के रुप में सोयाबीन और कपास पैदा किया जाने लगा. बाजार से खरीदे संकर बीज अधिक से अधिक पानी और रसायन मांगने लगे. समय के साथ खेती मंहगी होती गई. इस बीच नई जरूरतों में इजाफा हुआ और उनके खाने-पीने, रहने और पहनने में अंतर आया. आज कोरकू लोग कई जडियां और उनके उपयोग नहीं जानते.´´

यह तब की सरल, खुली और समृद्ध जीवनशैली की झलक भर है. बीते 3 दशकों से भांति-भांति की दखलअंदाजियों ने यहां की दुनिया को बुरी तरह प्रभावित किया. 1974 में सबसे पहले वन-विभाग ने बाघ के पंजों के निशान खोजने और उनकी लंबाई-चौड़ाई तलाशने के लिए सर्वे किया. फिर जमीनों को हदों में बांटा जाने लगा. इस तरह जंगल की जमीन राजस्व की जमीन में बदलने लगी और लोग यहां से बेदखल हुए. 1980 के बाद सरकार ने इन्हें पानी की मछली, जमीन के कंदमूल और पेड़ की पित्तयों के इस्तेमाल से रोका. मगर पूरा जंगल बाजार के लिए खोल दिया गया. जंगल के उत्पाद जब बाजार में बिकने लगे तो यहां की जनजाति भी जंगल की बजाय बाजारों पर निर्भर हो गई. इससे चीजों का लेन-देन बढ़ा और उन्हें रूपए-पैसों में तौला जाने लगा. अनाज के बदले नकद की महिमा बढ़ी. नकदी फसल के रुप में सोयाबीन और कपास पैदा किया जाने लगा. बाजार से खरीदे संकर बीज अधिक से अधिक पानी और रसायन मांगने लगे. समय के साथ खेती मंहगी होती गई. इस बीच नई जरूरतों में इजाफा हुआ और उनके खाने-पीने, रहने और पहनने में अंतर आया. आज कोरकू लोग कई जडियां और उनके उपयोग नहीं जानते.´´

पसतलई गांव के एक युवक ने नाम छिपाने की शर्त पर बताया कि- `जंगली जानवरों का शिकार करने वाली कई टोलियां यहां घूम रही हैं. कमला पारधन नाम की औरत इसी धंधे में लिप्त थी. बाद में पुलिस ने उसे धारणी में गिरफ्तार कर लिया.´ यहां जानवरों के हमलों की घटनाएं भी बढ़ रही हैं. कुंड गांव की बूढ़ी औरत मानु डाण्डेकर ने जानवरों से बचने के लिए तब की झोपड़ी को याद किया-`वह लकड़ियों और पत्तों की बनी होती, ऊंचाई हमसे 2-3 हाथ ज्यादा रहती. छत आधी गोल होती जो पूरी झोपड़ी को ढ़क लेती. उसमें घुसने के लिए दरवाजा उठाकर जाते. दरवाजे की हद इतनी छोटी रखते कि रेंगकर घुसा जाए. झोपड़ी के चारों तरफ 2-3 फीट लंबी पत्थरों की दीवार बनाते. रात को झोपड़ी के बाहर आग सुलगाते. पूरी बस्ती प्यार, तकरार, शादी, शिकार, जुदाई और पूजन से जुड़े किस्सों पर गाती-धिरकती. जैसे प्यार के गीत में लड़की से मिलने के लिए रास्ता पूछने, शादी के गीत में दूल्हा-दुल्हन बनकर आपस में बतियाने और जुदाई के गीत में शिकार पर गए पति के न लौटने की चर्चा होती.´´

यह बस्तियां अपनी पंरपरा और आधुनिक मापदण्डों के बीच फसी हैं. घरों की दीवारों पर रोमन केलेण्डर और रात में जलती लालटन लटकती हैं. बाहरियों के आने से इनके भीतर हीनता बस गई.यह खुद को बदलने में जुटे हैं. यहां के मोहल्लों ने कस्बों की नकल करके अपनी शक्लों को बिगाड़ रखा है. अब कोरकू बोली की जगह विदर्भ की हिन्दी का असर बढ़ रहा है. जबकि कार्यालय की भाषा मराठी है. इसलिए कोरकू जुबान फिसलती रहती है. खासकर स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को जानने और बोलने में मुश्किल आती है. कोरकू लोग कहते हैं कि सबकुछ खोने के बाद हमें कुछ नहीं मिला. स्कूल के टीचर और अस्पताल के डॉक्टर मैदानी इलाकों में बने हुए हैं. लेकिन हमारे हिस्से में न मैदान आया, न पहाड़. हम कहां जाए?

16.12.08

चीनी की मिठास में घुलता बचपन

शिरीष खरे

मराठवाड़ा से मुंबई लौटते वक्त, छुकछुक करती ट्रेन के साथ बचपन की कविता भी चल रही है- ``शिकारी आता है/ जाल फैलाता है/ दाने का लोभ दिखाता है/ लेकिन हमें जाल में नहीं फसना चाहिए.´´ लेकिन मराठवाड़ा में शोषण का जाल केवल फैला ही नहीं है, काफी कसा हुआ है इसलिए चिड़िया नहीं जानती कि वो जाल के अंदर है या बाहर. सभी शिकारियों ने हाथ मिला लिया है इसलिए उनका शिकार खुद-व-खुद खेतों तक आ जाता है. सरकारी आकड़ों के हिसाब से यहां गन्ना अधिक होता है. लेकिन ऐसा है नहीं, उससे कहीं अधिक यहां के खेतों में शोषण होता है लेकिन इसकी पैदावार का आकड़ा किसी के पास नहीं मिलता.


सुबह-सुबह एक ट्रेक्टर से जुड़ी दो ट्रालियों में दर्जनभर मजदूर परिवार बैठे हैं. इन्होंने अपने साथ अनाज, कपड़े, बिस्तर और कुछ जरूरी सामान बांध लिया है. बहुत छोटे बच्चे अपनी मांओं के गोद में सोए हैं, उनसे थोड़े बड़े अपनी बहनों के कंधो पर. एक कोने में बकरियों के गले की रस्सियां ढ़ीली करता बुजुर्ग भी है. ट्रालियों से बाहर पैर लटकाए सारे मर्दों के चेहरों पर एक जैसा रुखापन छाया है. उनके पीछे बैठी औरतों ने भी चुप्पी साध रखी है. मैंने पूछा - ``कहां जाना होगा ?´´ उनमें से एक औरत ने तीन टुकड़ों में कहा- ``बहुत दूर... कर्नाटक.... बीदर कारखाने में´´ फिर अगला सवाल-``लौटना कब होगा ?´´ जबाव आया- ``लौटना, बारिश के दिनों तक ही होगा.´´


यह महाराष्ट्र का मराठवाड़ा इलाका है. यहां के गावं को शहरों से जोड़ने वाली सड़कों पर ऐसी कई गाड़िया दौड़ रही हैं. जिला मुख्यालय उस्मानाबाद से करीब 100 किलोमीटर दूर कलंब तहसील की कई बस्तियां भी खाली हो चुकी हैं. मस्सा गांव के एम.ए. पास एक दलित युवक विनायक तौर ने बताया कि- `यहां दीवाली से बारिश तक हजारों मजदूर जोड़े (पति-पत्नी) चीनी कारखानों के लिए गन्ना काटने जाते हैं. इसमें अधिकतर दलित, बंजारा और पारदी जनजाति से होते हैं. इनके पास न तो खेती लायक जमीन है और न ही अपना कोई धंधा. गांव से बाहर रहने से इन्हें पंचायती योजनाओं का फायदा नहीं मिलता. इनकी बस्तियां भी बदलाव से अछूती रह जाती हैं. सबसे ज्यादा हर्जाना तो स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को भुगतना पड़ता है. ये बच्चे गन्नों के जिन खेतों में काम करते हैं, आप वहां जाकर देखिए शोषण की कितनी कहांनिया बिखरी है.´´

'चाईल्ड राईट्स एण्ड यू´ ने स्थानीय संस्था `लोकहित´ के साथ मिलकर कलंब तहसील के 29 गांवों का एक सर्वे किया और पाया कि 6-14 साल के कुल 1555 बच्चों में से 342 स्कूल नहीं जाते जिसमें 193 लड़कियां हैं. इसके अलावा ड्रापआउट बच्चों की संख्या 213 है जिसमें से भी 89 लड़कियां हैं. एक साल में 19 बाल-विवाह के मामले भी सामने आए. यहां 332 परिवार ऐसे हैं जिनके पास खेती के लिए जमीन नहीं. इसी प्रकार 125 परिवारों को राशन कार्ड नहीं मिला. इन दोनों संस्थाओं ने 29 गांवों के बच्चों को पढ़ाई से जोड़ने के लिए मुहिम चलाने का फैसला लिया है. इससे एक छोटे से हिस्से में बदलाव की उम्मीद बंधी है लेकिन पलायन की समस्या ने यहां विकराल रूप धारण कर लिया है. पूरा मराठवाड़ा ही इसकी कैद में नजर आता है.

मराठवाड़ा का यह इलाका चीनी उत्पादन का केन्द्र है. 1982 को सबसे पहले उस्मानाबाद के ढ़ोकी में `तेरणा चीनी कारखाना´ लगा था. सरकारी आकड़ों के मुताबिक आज यहां करीब 30 कारखाने चालू हैं जिसमें 7 उस्मानाबाद जिले में ही है और उनमें से भी 4 कलंब तहसील में. `तेरणा चीनी कारखाना कमेटी´ के एक सदस्य ने नाम छिपाने की शर्त पर कहा- `यहां हर कारखाना 25-50 किलोमीटर तक के खेतों से गन्ना उठाना चाहती है. इसके लिए वह मुकादम को जरिया बनाती है. हर मुकादम 5 से 10 लाख रूपए लेकर कमेटी से करार करता है. वह 12-20 जोड़ों को 6-10 महीनों तक काम करवाने की गारंटी देता है. मुकादम आसपास के कई जोड़ों से संपर्क रखता है. एक कारखाने से करीब 200-250 मुकादम और उनसे 2500-3000 जोड़े जुड़ते हैं.´´

इसके आगे की बात सामाजिक कार्यकर्ता बजरंग टाटे ने कही- ``मुकादम इस इलाके में ऊंची जाति के ताकतवर लोग बनते हैं. वह जोड़ों को 25-30 हजार रूपए देकर 6-10 महीनों तक काम पर जाने के लिए राजी करता है. वह जोड़ों से स्टाम्प पेपर पर दस्तखत या अंगूठा लगावाता है. कई मुकादमों के करार बहुत दूर के कारखानों से होते हैं इसलिए यहां के जोड़े नगर (200 किमी), पुणे (300 किमी), कोल्हापर (500 किमी) और कर्नाटक (700 किमी) के बिदर, आलूमटी तथा बेड़गांव इलाकों तक जाते हैं. इन्हीं करारों के तहत वहां से जोड़े यहां आते हैं.´´ कलंब के बालाजी मुले ने बताया कि- `जब मुकादम को काम की तारीखों की सूचना मिलती है तब जोड़े जमा करने और उन्हें दूसरे इलाकों में ले जाने के लिए बहुत कम समय मिलता है. ऐसे हालात में कोई मुकादम रियायत नहीं बरतना चाहता.' डोराला गांव में माया शिंदे ने इसी साल हुई एक घटना सुनाई- ``भारत सोनटके ने जब 20 हजार रूपए लेकर 6 महीने का करार किया तब नहीं जानता था कि उसे टीबी जैसी बीमारी हो जाएगी. वह पुणे में अपना इलाज करवा रहा है, यह खबर पाते ही मुकादम आया और भारत की पत्नी के साथ 50 साल से अधिक उम्र के मां-बाप को काम पर ले गया. उनके साथ 6 साल से कम उम्र की दो बिच्चयां भी कोल्हापुर के किसी खेत में होगी.´´

नवंबर में हमने देखा कि कारखानों के आसपास कई जोड़े जमा होने लगे हैं. यहां 15-20 दिन रूकने के लिए सभी की बस्तियां बन चुकी हैं. इसके बाद छोटे-छोटे समूहों में बांटकर इन्हें काम की जगहों पर भेजा जाएगा. फिर काम के लिहाज से ही इनकी बस्तियां बदलती रहती हैं. `धाराशिव चीनी कारखाना, चौरारूवली´ से करीब 25 किलोमीटर दूर, खेड़की गांव के खेत में एक ऐसी ही बस्ती में जाना हुआ. यह 12 घरों की एक अस्थायी बस्ती है जिसका हर घर पन्नी, कपड़ा और कुछ लकड़ियों की मदद से खड़ा भर है. क्योंकि सभी घर एक-दूसरे से दूर-दूर हैं इसलिए पूरी बस्ती अव्यवस्थित नजर आती है. घर में सबके लिए एक ही कमरा है. इस कमरे में पैर पसारने भर की जगह है. उबड़-खाबड खेत में न कोई गली है और न ही मैदान. बच्चे पानी के लिए काफी दूर जाते हैं और औरतों को भी खुले में ही नहाना होता है. सबकी रातें अंधेरे में ही कटती हैं. सुबह खेतों में जाते वक्त मजदूरों के हाथों में कोयना होता है. कोयना लोहे का बना वह धारदार हथियार है जिससे गन्ना काटा जाता है. हर मजदूर गन्ने की तरफ झुककर पहले उसकी जड़ों को काटता हैं, फिर उसे दो भागों में बांटकर पीछे फेंकता हैं. उसका जोड़ीदार गन्ने के इन टुकड़ों को बांधता हैं. इस तरह हर जोड़ा 2 टन गन्ना काटकर, फिर उन्हें बांधकर ट्रालियों में भरता है. कारखानों से ट्रालियों का आना-जाना देर रात तक चलता है. कई बार इन कामों में बच्चे भी शामिल हो जाते हैं. 6 से 14 साल के बच्चे-बिच्चयां घरों में खाना बनाने और सफाई का काम करते हैं. ऐसी ही एक बच्ची इशाका गोरे ने कहा कि वह तीसरी में है और यहां से जाने के बाद चौथी में बैठेगी. उसे नहीं मालूम कि जब वह स्कूल पहुंचेगी तो परीक्षा खत्म हो जाएगी. उसका परिवार सागली जिले के कराठ गांव से आया है. इशाका के पिता याविक गोरे का मानना है कि-`यह पढ़े तो ठीक, नहीं तो 4-5 साल में शादी करनी ही है. फिर जोड़ा बनाकर काम करेगी.´ यहां अधिकतर लोग अपने बच्चों की शादियां कम उम्र में ही कर देते हैं. इन्हें लगता है कि परिवार में जितने अधिक जोड़े रहेंगे, आमदनी उतनी ही अधिक होगी. अधिकतर रिश्तेदारियां काम की जगहों पर हो जाती हैं. इस तरह बाल-विवाह की प्रथा यहां नए रुप में उजागर होती है.

हमने जिन बस्तियों का अध्ययन किया उन बस्तियों में बच्चों से जुड़ी कई दिक्कते एक समान पायी गई, जैसे- बढ़ते बच्चों को पर्याप्त और समय पर भोजन नहीं मिलता जिससे कुपोषण के मामलों में बढ़ोतरी होती है. इन खेतों में बच्चे सर्दी के मौसम में बीमार होते हैं. इसी तरह गन्ना काटते वक्त कोयना लगने, सांप काटने और बावड़ियों में गिरने की घटनाएं होती रहती हैं. ऐसे खेतों से `प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र´ करीब 15-20 किलोमीटर दूर होते हैं इसलिए इमरजेंसी के दौरान अनहोनी का डर रहता है. बीड जिले के राक्षसबाड़ी निवासी सुभाष मोहते ने बताया कि- ``दो साल पहले `येनसाई चीनी कारखाना, राजनी´ के लिए काम करते वक्त जब मेरी बीबी बीमार हुई तो कुछ औरतों ने खेत में ही पर्दा लगाकर गर्भापात कराने की कोशिश की. अचानक उसकी हालत बिगड़ गई और वह मर गई.´´

`शंभु महाराज चीनी कारखाना, हवरगांव´ के लिए गन्ना काटने वाली शोभायनी कस्बे की चिंता अपने बच्चों को लेकर हैं-`हमारे बच्चे पास होकर भी दूर हैं. खेलने-पढ़ने के दिनों में कितना काम करते हैं. यह कभी चिड़चिड़ाते हैं तो कभी चुपचाप हो जाते हैं. गांव के बच्चों से बहुत अलग हैं यहां के बच्चे.´हमारे एक दोस्त ने पूछा-`तो इन्हें घर क्यों नहीं घुमा लाती ?´इसका जबाव मुद्रिका गोरे ने दिया-`जब चुनाव आते हैं तो उम्मीदवार वोट डलवाने के लिए घर ले जाते हैं, उसके बाद वापिस यहीं छोड़ देते हैं. फिर हमारा हाल पूछने कोई नहीं आता और न ही किसी को घर जाने दिया जाता है.´´ अधिकतर जोड़ों ने बताया कि मुकादम उनसे दिये गए रूपए के बदले बहुत काम लेता है. अनबन होने पर मारपीट तक करता है. बाभल गांव के शिवाजी बाग्मारे ने अपने यहां की ऐसी ही घटना का जिक्र किया-`बीते साल यहां गन्ना की पैदावार अधिक हुई थी इसलिए कई मुकादमों ने मियाद खत्म होने के बावजूद काम करवाया. हमारे यहां परवानी जिले के गंगाखेड़े गांव से आए 10 जोड़ों ने इसका विरोध किया और एक रात बिना बताए मिनी टेम्पो से भागना चाहा लेकिन 3 किलोमीटर दूर पहुंचते ही पकड़ा गए. इसके बाद उनके बच्चे और औरतों तक को खूब मारा. मुकादम के आदमियों ने मिनी टेम्पो भी तोड़-फोड़ दिया.´´

सरकार ने गांव में ही `हर हाथ को काम और काम का पूरा दाम´ देने के लिए `महाराष्ट्र ग्रामीण रोजगार गांरटी योजना´ चलाई है. इस योजना का सच जानने के लिए जब विकासखंड कलंब के कार्यालय गए तो कई हेरतअंगेज तथ्य उजागर हुए. `पंचायत विभाग´ के `विस्तार अधिकारी´ बसंत बाग्मारे ने बताया-`योजना को लागू हुए 1 साल बीत गया. इस ब्लॉक के 89 गांवों में से 7 में ही काम चालू है. कुल 35 कामों में से 1 ही पूरा हुआ है, बाकी 34 प्रगति पर हैं. इस ब्लॉक में 50,000 से भी अधिक मजदूर है लेकिन 2500 को ही काम मिल सका. इनमें से भी कईयों का भुगतान नहीं हुआ. इसके लिए जिले से करीब 5 लाख रूपए आने का इंतजार है.´´ जब इस निष्क्रियता के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा-`इस योजना में कागजी औपचारिकता अधिक है.´लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता बजरंग टाटे ने इसका दूसरा कारण बताया- `स्थानीय पंचायतों में ऊंची जातियों का राज है. यह खेती का मौसम है और सवर्णों को अपनी जमीन पर काम करने के लिए मजदूर चाहिए. यदि मजदूरों को ऐसी योजना का पता लग गया तो उनका काम बंद हो जाएगा. इसलिए ऐसी योजनाओं को छिपाया जाता है. सबकी मिलीभगत से यहां शोषण का जाल फैला है.´