2.9.10

अब परदेश नहीं जाना

अपने ही देश में कुछ कर गुजरने के जज्बे ने लोहरदगा की मनोरमा एक्का को दोबारा उनकी जमीन से जोड़ दिया है. झारखण्ड की यह लड़की अपने गांवों की लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अमेरिका में अच्छी खासी नौकरी छोड़ कर स्वदेश लौट आई है. जो इनदिनों बाल मजदूरों और ग्रामीण महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने के लिए व्यवस्था से लड़ाई लड़ रही है.



इसे मनोरमा की मेहनत का ही नतीजा कहेंगे कि बदला नवाटोली की फूलमनी और शोभा ही नहीं दर्जनों ऐसी महिलाएं हैं जो आज आत्मनिर्भर बनी हैं और दूसरे को आत्मनिर्भर बनाने में भी जुटी हैं. ये वही महिलाएं हैं जो दो जून की रोटी के लिए दूसरे राज्यों में जाती थीं और ढ़ेर सारी परेशानियां सिर पर झेलती थीं. अब यही महिलाएं गांव में स्वयं सहायता समूह से जुड़ स्वावलंबी बनी हुई हैं. मनोरमा ने 12 गांवों में जागरूकता अभियान चलाकर लगभग डेढ़ सौ बच्चों को स्कूल से जोड़ने का काम किया है. यह बच्चे कभी बाल मजदूर थे.

मनोरमा रांची से पीजी डिप्लोमा इन रूरल डेवलपमेंट की शिक्षा ग्रहण कर अमेरिका चली गई. अमेरिका में उन्होंने जनवरी 2001 तक पढ़ाई के साथ-साथ प्री स्कूल में नौकरी भी की. 2001 के अंतिम महीने में वह अमेरिका से भारत लौट आई. इसके बाद यह फिर से 2005 में सोशल व‌र्क्स की शिक्षा के लिए अमेरिका चली गई. मगर अमेरिका की चमक-दमक भी उसे ज्यादा  देर नहीं रोक सकी और 2007 में वह वापस भारत आकर उरांव आदिवासी महिला के नेतृत्व पर शोध करने लगी. इसी दौरान जब मनोरमा ने महिलाओं और बच्चों की स्थितियों को करीब से देखा तो यही रहकर महिलाओं और बच्चों को अधिकार दिलाने का निर्णय लिया.

जब मनोरमा ने लोहरदगा में महिला और बाल अधिकार को लेकर व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई शुरू की तो पहली बार उसका हकीकत से वास्ता पड़ा. बहुत से राजनैतिक और सामाजिक पेचेदियां सामने आईं मगर वह उन्हें अपने अभ्यास का एक हिस्सा मानती रहीं. यहां तक कि जब यह बाल अधिकार से जुड़े मामलों को लेकर गांव में जाती थी तो गाँव वाले इसे कोई साजिश के तौर पर देखते-समझते थे. इस तरह अपने पहले पड़ाव में मनोरमा को आदिवासी समुदाय का ही पूरा समर्थन नहीं मिल पाया था. मगर अब धीरे-धीरे स्थितियां बहुत हद तक बदल चुकी हैं. बदल रही हैं.

बाल अधिकार पर कार्य करने वाली संस्था क्राई के सहयोग ने मनोरमा के हौसले को बुलंद किया है. मनोरमा ने होप संस्था की स्थापना कर महिला व अधिकार को अपना उद्देश्य बनाया है.

मनोरमा कहती है कि उसने अपनी जिंदगी को समाज में फैली गैर बराबरी मिटाने के नाम कर दी है. वह अपनी भूमिका को बच्चों और महिलाओं तक उनके अधिकार बताने और बेहतर समाज बनाने के रूप में देख रही है.

1 टिप्पणी:

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

मुझे गर्व है मनोरमाओं पर. यही हैं वे जिनके दम पर भारत सुनहरी कल के लिए अपने पैरों पर खड़ा होगा. बाक़ियों का क्या है, बहुत से पलायनवादी हैं हमारे यहां...