9.7.09

सूरत जाकर देखें, 50,000 बच्चे काम पर है....

शिरीष खरे, सूरत से लौटकर

सूरत। यह सच है, लेकिन अधूरा कि देश की टेक्स्टाइल इंडस्ट्री में सूरत ‘रीढ़ की हड्डी’ है। यह सच इस तथ्य के साथ पूरा होगा कि देश के अलग-अलग कोनों से आये ‘बाल-मज़दूरों की बदौलत’ टेक्स्टाइल इंडस्ट्री में सूरत ‘रीढ़ की हड्डी’ है। इसमें गुजरात के ही एक-चौथाई से ज्यादा बाल-मज़दूर काम करते हैं। सरकारी आंकडों के हिसाब से सूरत में 5,000 बाल-मजदूर हैं, जबकि गैर-सरकारी आंकडों को देखे तो यह संख्या 50,000 से भी ऊपर है। इसमें 15 से 18 साल के 68 प्रतिशत बाल-मजदूर हैं। ‘राष्ट्रीय बाल-अधिकार संरक्षण आयोग’ भी यह मानता है कि गुजरात के सूरत, भावनगर और बनासकंथा जिलों में बाल मज़दूरी के मामले सबसे ज्यादा उजागर हुए हैं। इन जिलों के कुल मजदूरों में से 28.51 प्रतिशत बच्चे हैं। इसे देखते हुए 2010 तक गुजरात को बाल-मजदूरी से मुक्त करने का ‘राज्य-सरकारी संकल्प’ एक ‘मजाक’ नहीं तो और क्या है ?

सूरत के साउथ-ईस्ट जोन से बिजली की मशीनों वाली ‘खट-खट’ भरी आवाजे यूं ही नहीं आती हैं। 2001 की जनगणना के आकड़े बताते हैं कि यहां 4 लाख 50 हजार से ज्यादा पावरलूम हैं। 1951 के जमाने की रिपोर्ट में यह संख्या सिर्फ 2 हजार 2 सौ 82 ही थी। 1970 की रिपोर्ट में भी 19 हजार 25 की संख्या कोई खास नजर नहीं आती। लेकिन 1980 से 90 के बीच ऐसा क्या हुआ कि पावरलूम की संख्या 2 लाख के ऊपर पहुंच गयी और बीते एक दशक में तो यह संख्या दोगुनी से भी ज्यादा!! असल में बात यह है कि 70 के दशक से 1998 आते-आते यहां की 5 बड़ी टेक्स्टाइल मिलों में ‘एक के बाद एक’ ताला लगता गया, उनकी जगह पावरलूम की कई छोटी-छोटी इकाईयों ने ले ली। बड़ी-बड़ी मिलों के मजदूर-यूनियन एक तो मजबूत और संगठित होते थे, दूसरा उन्हें मोबीलाइजेशन में भी कोई परेशानी नहीं थी। लेकिन बड़ी मिलों में ताला लगने के हादसों ने मजदूरों की ऐसी कमर तोड़ी कि वह अपने-अपने यूनियनों के साथ दोबारा खड़े नहीं हो सके। वैसे तो सूरत में आज भी 1,60 यूनियन हैं, लेकिन कहने भर को। गली-गली में बिखरी पावरलूम फेक्ट्रियों के लगने से मजदूर एकता भी बिखर गई, उनसे उनके कानूनी हक और सुविधाएं छीन लिए गए, दिन-ब-दिन मजदूरों के शोषण में भी इजाफा हुआ। मालिकों ने मुनाफे के चक्कर में सस्ते और अकुशल मजदूरों के रूप में बच्चों की बड़ी तादाद को काम पर लगवाया। वह मजबूत यूनियनों की गैर मौजूदगी का फायदा उठाते हुए बाल-मजदूरी को लगातार पनाह देते गए। इन दिनों पावरलूम फेक्ट्रियों के मालिक पतले-पतले हजारों हाथों की मदद से 5 करोड़/रोज का टर्नओवर करते हैं, वह हर रोज 35 हजार से 1 लाख तक साड़िया बनवाते हैं। यह है एक खुशहाल उद्योग की खुशहाल कहानी, जो बदहाल बाल-मजदूरों की बदहाल तस्वीरों के बगैर पूरी नहीं होगी।
सूरत की टेक्स्टाइल इण्डस्ट्री के बाल-मजदूर 3 सेक्टर में बंटे हुए हैं। पहला, पावरलूम फेक्ट्री जहां कच्चा कपड़ा बनाया जाता है। यह कतारगाम, लिम्बायत, पाण्डेयसराय, उदना, फालसाबाड़ी, मफतनगर के आसपास के इलाके में ज्यादा हैं। पावरलूम फेक्ट्री के बच्चे मशीन में तेल डालने के अलावा मशीन ओपरेटर के हेल्पर बनते हैं। दूसरा सेक्टर है डाईंग फेक्ट्री। यहां कच्चे कपड़े को कलर किया जाता है। इसे खतरनाक इण्डस्ट्री इसलिए कहते है, क्योंकि इसमें नुकसानदायक केमीकल होते हैं, स्टीम के इस्तेमाल की वजह से आग लगने का डर रहता है और इसी से सूरत की ताप्ती नदी मटमैली हुई है। ताप्ती के किनारे-किनारे और पाण्डेयसराय के एक बड़े इलाके में 5,00 से ज्यादा डाईंग फेक्ट्री लगी हैं। डाईंग फेक्ट्री के बच्चे कपड़ा रंगने के बाद पक्के कहे जाने वाले कपड़े के भारी बण्डलों को उठाते हैं। डाईंग फेक्ट्री में किसी नए आदमी को घुसने नहीं दिया जाता। तीसरा सेक्टर है टेक्स्टाइल मार्केट। सूरत में टेक्स्टाइल मार्केट की 60 हजार से भी ज्यादा दुकाने हैं। यहां से देश-विदेश में कपड़ा बेचा जाता है। टेक्स्टाइल की ज्यादातर दुकाने बाम्बे मार्केट और न्यू बाम्बे मार्केट में हैं। इस मार्केट के बच्चे साड़ियों की कटिंग, धागों की बुनावट, पेकिंग, बोझा उठाना, उसे दो मंजिल ऊपर तक लाने-ले जाने के काम में लगे रहते हैं।
31 प्रतिशत बच्चे अकेले टेक्स्टाइल मार्केट में हैं, क्योंकि यहां उसे रोजाना 50 से 80 रूपए तक मिलते हैं जो पावरलूम फेक्ट्री के 20 से 25 रूपए से कहीं ज्यादा हैं। टेक्स्टाइल मार्केट में महीने के पूरे 30 दिन काम मिलता हैं और शिफ्ट बदलने की झंझट भी नहीं। दूसरी तरफ पावरलूम फेक्ट्री में कुशलता वाले मजदूर ही चाहिए, ऐसे में सस्ते हेल्पर बनकर रह जाने का डर हैं। टेक्स्टाइल मार्केट वाली पट्टी सूरत के रिंग-रोड़ के साथ-साथ बढ़ती चलती है, इधर काम करने वाले बच्चे 2 से 5 किलोमीटर दूर के इलाकों जैसे लिम्बायत, मीठी खाड़ी, संगम टेकरी, मफत-नगर और अंबेडकर-नगर से आते हैं। ऐसे बच्चे 2-3 किलोमीटर तक तो पैदल चलते हैं लेकिन 5 किलोमीटर के लिए रिक्शा शेयर करते हैं। ये बच्चे यहां सुबह 9 से रात को 10 तक काम करते हैं। टेक्स्टाइल मार्केट में राजस्थानी मारवाड़ियों का दबदबा है जो राजस्थान के गरीब परिवारों से कान्ट्रेक्ट करके उनके बच्चों को यहां ले आते हैं। ऐसे बच्चे बस्ती में नहीं, दुकान के आसपास ही ठिकाना बनाकर रहते हैं। इसलिए उन्हें काम के घण्टों का कोई अता-पता नहीं रहता।
टेक्सटाइल मार्केट के कामों से कई बच्चियां भी जुड़ी हुई हैं। उन्हें एक साड़ी में स्टोन लगाने और धागा काटने के बदले सिर्फ 50 पैसे मिलते हैं। अगर 4-5 बच्चियां मिलकर पूरा दिन भी काम करें तो भी हरेक के हिस्से में 10-12 रूपए ही आते हैं। इस किस्म के काम में ज्यादातर हरपति जनजाति की लड़कियां लगी हुई हैं।
कतारगाम की कई पावरलूम फेक्ट्रियों में देखा गया कि वहां बुनियादी सहूलियतों जैसे टायलेट, पानी की टंकी, वेंटीलेशन और पंखे नहीं हैं। फेक्ट्री में दाखिल होते ही चारों तरफ हल्का अंधियारा और फर्श पर तेल की मोटी परते दिखाई देती हैं। फेक्ट्री के बाहर कुछ मजदूरों से बातचीत में मालूम हुआ कि यहां जरूरत से ज्यादा काम और कम पैसे को लेकर चुप्पी साध ली जाती है। कई फेक्ट्रियों के मालिक रजिस्ट्रेशन नहीं करवाते, इससे उन्हे टेक्स से बचने का मौका तो मिलता ही है, मजदूरों को सुविधाएं देने से भी बच जाते हैं। रजिस्ट्रेशन न होने से फेक्ट्रियों की सही संख्या और काम करने वाले कुल मजदूरों का पता तक नहीं चलता। मजदूरों को न पहचान-पत्र मिलता है, न पीएफ, न ईएसआई। यहां तक कि किसी मजदूर की दुघर्टना होने पर उसे मुआवजा देने का सवाल भी नहीं उठता। यहां एक मजदूर पुरानी मशीनों से काम तो चलाता ही है, वह 4 से 6 मशीनों पर एक साथ काम भी करता है। यहां ज्यादातर मजदूरों की मांग है कि कपड़े के हर मीटर पर 1.25 रूपए मिले जबकि उन्हें हर मीटर पर मिलता है 1 रूपए। उन्हें मासिक वेतन की बजाय पीस रेट के हिसाब से मेहनताना दिया जाता है। यह बड़े मजदूरों का हाल है, बच्चों की हालत तो बदत्तर है।
लिम्बायत और मीठी खाड़ी के कई घरों में उत्तर-प्रदेश और बिहार के मुस्लिम बच्चे साड़ी पर जरी का काम करते हैं। ये बच्चे मुंबई के गोवण्डी से यहां लाये गए हैं। उधर लेवर कमीश्नर का जब दबाव बढ़ जाता है तो ऐसे बच्चों को इधर भेज दिया जाता है। जरी के काम में कई छोटे-छोटे बच्चे, खासकर बच्चियों को 1 खटिया के इर्द-गिर्द बैठाते हैं। 1 हाल में 10-15 बच्चे या बच्चियों के लिए ज्यादा से ज्यादा 4-5 खटियां लगाते हैं। यहां काम करने वाले सारे बच्चे 25 रूपए में 8 से 10 घण्टे तक एक ही जगह बैठे, आंखे गड़ाए और हाथ चलाते नजर आते हैं। यह काम घर पर ही होता है इसलिए बगैर सांस लिए रात और दिन चलता रहता है।
सूरत टेक्स्टाइल इण्डस्ट्री को कभी रीढ़ की हड्डी’ तो कभी ‘लम्बी मीनार’ की तरह देखा जाता है। हमेशा ऊपर देखने वालों को ध्यान उस नींव की तरफ नहीं जाता जिसमें अब तक असंख्य ‘नन्हे भविष्य’ दफन हो चुके हैं। यही वजह है कि यहां टेक्स्टाइल इण्डस्ट्री से जुड़े हर आकड़े का हिसाब-किताब और उसका पूरा ब्यौरा तो मिलता है, नहीं मिलता है तो बच्चों को प्यार भरे सपने देखने, चांद छूने जैसी ख्वाहिशे पालने, चार किताबे पढ़ने और हम जैसे बनने से रोके जाने का आकड़ा।

2 टिप्‍पणियां:

बालसुब्रमण्यम ने कहा…

अत्यंत दुखद स्थिति है। सूरत ही नहीं, देश के अधिकांश शहरों में बच्चों का यही हाल है, मुरादाबाद के धातु के कारखाने, शिवकाशी के पटाखों के कारखाने, देश भर के ढाबे, सबमें बच्चें जुते हुए हैं।

इस समस्या पर प्रकाश डालने के लिए आभार।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

देश में बच्चे कहाँ काम पर नहीं हैं?
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