30.1.10

नाबालिग लड़कियों के बच्चों में कुपोषण सबसे ज्यादा

शिरीष खरे


18 साल से कम उम्र में मां बनने वाली लड़कियों से पैदा होने वाले बच्चों पर कुपोषण का खतरा सबसे ज्यादा मंडराता है। बीएमजे यानि बिट्रिश मेडीकल जनरल ने हाल में प्रकाशित अपने शोध अध्ययन से ऐसा जाहिर किया है।


बीते दशक की महत्वपूर्ण आर्थिक वृद्धि के इर्दगिर्द, सबसे ज्यादा होने वाली मौतों के हिसाब से दुनिया के 5 देशों में भारत भी शामिल है। भारत में 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 44.5% (करीब आधी) औरतें ऐसी हैं- जिनकी शादियां 18 साल के पहले हुईं हैं। इन 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 22% (करीब एक चौथाई) औरतें ऐसी हैं- जो 18 साल के पहले मां बनीं हैं। इन कम उम्र की लड़कियों से 73% (सबसे ज्यादा) बच्चे पैदा हुए हैं। फिलहाल इन बच्चों में 67% (आधे से बहुत ज्यादा) कुपोषण के शिकार हैं।


बोस्टन यूनिवर्सिटी के पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेन्ट की एसोशियट प्रोफेसर अनीता राज और उनके सहयोगियों का यह शोध अध्ययन मूलतः भारत में कम उम्र के शादीशुदा संबंधों, शिशु और बाल मृत्यु-दर से जुड़ा है। यह अध्ययन 15 से 49 साल की तकरीबन 1,25,000 भारतीय औरतों के प्रतिनिधि नमूने पर आधारित है। शोध के लिए एकत्रित जानकारियों को नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे (2005-06) से लिया गया है।


यह शोध बताता है कि कम उम्र में शादी करने, दो बच्चों के बीच अंतर न रखने, गर्भावस्था के समय पर्याप्त भोजन न मिलने, प्रसव के समय थोड़ा-सा भी आराम न मिलने और इसी दौरान चिकित्सा की सुविधाओं के अभाव में कुपोषण किस तरह से लहलहा उठता है। यह शोध ‘कम उम्र की किशोरियों और बच्चों’ को केन्द्र में रखकर भारत के कुपोषण की व्याख्या करता है। शोध यह भी मानता है कि कम उम्र में शादी करने वाली औरतों को अगर उनके पतियों या ससुराल वालों द्वारा दरकिनार किया जाता है तो ऐसी औरतों को अपने और अपने बच्चों के लिए भोजन जुटा पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसमें भारत की भुखमरी को पारिवारिक व्यवस्था से लेकर सामाजिक तंत्र, राजनीति से लेकर विचारधारा और व्यवहारिकता तक में मौजूद लैंगिक भेदभाव से जोड़कर देखा गया है।


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27.1.10

सूरत में जीरो स्लम आपदा

शिरीष खरे/सूरत से




एक जमाने में विकास के लिए ‘गरीबी हटाओ’ एक घोषित नारा था। मगर आज आलम यह है कि विकास के रास्ते से ‘गरीबों को हटाना’ एक अघोषित एंजेडा बन चुका है। बतौर एक शहर, सूरत के उदाहरणों से यह समझा जा सकता है कि ‘गरीबी की बजाय गरीबों को हटाने’ का यह व्यंग्यात्मक मुहावरा किस तरह से गंभीर हकीकत में तब्दील हुआ है।






सैकड़ों झोपड़ियों की तरह, झोपड़पट्टी तोड़ने वाले जब जलाराम नगर के 40 वर्षीय लक्ष्मण चंद्राकार उर्फ संतोष की झोपड़ी को तोड़ने लगे तो उसने केरोसिन डालकर अपनेआप को मौत के हवाले करना चाहा। इसके बाद उसे एक एम्बुलेंस से न्यू सिविल हास्पिटल भेजा गया। वहां पहुंचते-पहुंचते उसके शरीर का 75 प्रतिशत हिस्सा जल गया। उधर डाक्टरों ने संतोष की हालत को बेहद गंभीर बताया। इधर सूरत महानगर पालिका ने शाम होते-होते ताप्ती नदी के किनारे से तीन बस्तियों के कई बच्चे, बूढ़े और औरतों को खुली सड़क पर ला खड़ा किया। यह एक नजारा अब का है जब सूरत के गरीबों को न तो साम्प्रदायिक दंगों का सामना करना पड़ रहा है, न ही बाढ़ या भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं को ही सहना पड़ रहा है। इतना सब तो उन्हें सूरत को 0 स्लम बनाने वाली आपदा के चलते झेलना पड़ रहा है।

2 दिसम्बर, 2009 को सूरत महानगर पालिका ने सुबह 10 से शाम के 6 तक : सूरत को 0 स्लम बनाने के लक्ष्य का पीछा करते हुए जेपी नगर, जलाराम नगर और इकबाल नगर से कुल 502 झोपड़ियों को तोड़ने का रिकार्ड दर्ज किया। दोपहर होते-होते अगर स्थिति तनावपूर्ण न हो जाती तो महानगर पालिका के कुल स्कोर में और अधिक बढ़ोतरी हो जाती। वैसे पुलिस के भारी बंदोबस्त के बीचोंबीच, तनावपूर्ण स्थिति को नियंत्रण में बनाए रखते हुए- 4000 से अधिक रहवासियों से उनका पता ठिकाना छीन लिया गया। कुल मिलाकर ताप्ती नदी के आजू-बाजू कई दशक पुरानी इन तीन बस्तियों से 1700 से अधिक झोपड़ियों को साफ किया जाना है। अर्थात्- 14000 से अधिक रहवासियों से उनका पता ठिकाना छीना जाना है। जैसा कि महानगर पालिका के बस्ती उन्नयन विभाग से सी वाय भट्ट कहते भी हैं कि ‘‘नदी और खाड़ी के इर्द-गिर्द जमा झोपड़ियों को साफ करने के लिए डेमोलेशन की कार्रवाई जारी रहेगी।’’ डेमोलेशन की यह कार्रवाई अगले रोज भी जारी रही। मगर सूरत के बाकी इलाकों को तोड़े जाने के अगले चरणों और उनकी तारीखों के सवालों पर खामोशी का आलम है।


सुबह-सुबह, कोई सूचना दिए बगैर, एकाएक और अपने पूरे दल-बल के साथ झुग्गी बस्तियों को नेस्तानाबूत करने की प्रशासनिक रणनीति को सूरतवासी अब बाखूबी जानते हैं। रविवार की ठण्डी सुबह में भी प्रशासन की तरफ से इसी रणनीति को दोहराया जाने लगा। पुलिस ने शनिवार रात को ही उन सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं को हिरासत में ले लिया था जो महानगर पालिका की गरीबों को शहर से हटाए जाने वाली मुहिम के विरोधी हैं। इधर जेपी नगर, जलाराम नगर और इकबाल नगर के रहवासी यह कहने लगे कि घर के बदले घर दिए बगैर हमारे घरों को कैसे उजाड़ा जा रहा है ? उधर प्रशासन के लिए यह कोई नया सवाल नहीं था। उनका ध्यान तो झोपड़पट्टी तोड़ने के दौरान ‘अधिकतम नुकसान पहुंचाने’ के सिद्धांत पर टिका था। अंधियारा छाने के बहुत पहले ही बस्ती वालों के असंतोष ने आग पकड़ ली। देखते ही देखते एक भारी भीड़ पथराव करते हुए आगे बढ़ने लगी। हर एक के हाथों में उनके दुख, दर्द, उनकी आशंकाओं और हताशाओं से भरी भावनाओं में डूबे जनसैलाब के सिवाय कुछ न था। इसके बाद मुस्तैद पुलिस वाले आगे आएं और उन्होंने बस्तियों की तरह उनके जनसैलाब को भी लाठीचार्ज के जरिए कुचल डाला। उसके ऊपर आंसू गैस के दो गोले भी छोड़े गए।

सूरत में कुल 1 लाख से अधिक झोपड़ियों को तोड़ा जाना है। सरकारी कागजों पर पुनर्वास के लिए केवल 42 हजार घर बनाए जाने की बात है। जाहिर है करीब 56 हजार झोपड़ों का सवाल हवा में झूल रहा है। एक तरफ झोपड़ियों को तोड़े जाने का सिलसिला थम नहीं रहा है और दूसरी तरफ इतना भी सुनिश्चित नहीं हो पा रहा है कि घर मिलेंगे भी तो किन्हें, कैसे और कब तक। जबकि 2009 के पहले-पहले सूरत के सभी झोपड़पट्टी के परिवारों को नए घरों में स्थानांतरित करने का लक्ष्य रखा गया था। जबकि समय के छोटे-छोटे अन्तराल से शहर की बाकी झोपड़ियों की तरह रेलवे मेनलाइन की झोपड़ियों को तोड़कर गिराया जा रहा है और इस बात की जिम्मेवारी कोई नहीं ले रहा है कि किसने झोपड़ियां तोड़ी हैं ? इस सवाल का जवाब सब जगह से एक-सा आता है- ‘हमने नहीं उसने’. महापालिका के पास भी यही जवाब है और रेलवे के पास भी। जबकि आमतौर पर ऐसी बस्तियों के लोग नहीं जानते कि एक दिन उनके घर टूटेंगे। एक दिन उनसे यहां रहने के सबूत मांगे जाएंगे। इसलिए वह कागजों को इकट्ठा नहीं कर पाते। ऐसी बस्तियों के लोग किस कागज के टुकड़े का क्या मतलब है, यह भी नहीं जानते। सभी बस्तियों में रहने वाले लोगों का भी यही हाल है। अफसरों को जो कागज चाहिए उनमें से कुछ कागज यहां के ज्यादातर रहवासियों के पास नहीं हैं। यह रहवासी अफसरों को अपनी झुग्गी दिखाना चाहते हैं। लेकिन अफसरों को तो झुग्गी में रहने का कागज ही देखना है। फिलहाल लोगों के घर का हक सरकारी फाइलों से काफी दूर है। इस तरह पूरी कार्यप्रणाली आफिस-आफिस के खेल में उलझ चुकी है। जबकि सरकार लोगों से तो शहर में रहने के सबूत मांग रही है और खुद डेमोलेशन के लिए गैरकानूनी तरीके अपना रही है। जैसे कि डेमोलेशन के दौरान यूनाईटेड नेशन’ की गाईडलाईन निभानी जरूरी थी। जिन्हें उखाड़ना था, उनके साथ बैठकर पुनर्वास और राहत की बातें की जानी थी। गाईडलाईन कहती है कि विकलांग, बुजुर्ग और एसटी-एससी को उनके रोजगार के मुताबिक और पुराने झोपड़े के पास ही बसाया जाए। पीड़ित आदमी को पहले पुनर्वास वाली जगह दिखाई जाए, इसके बाद अगर वह मांग करता है तो उसे कोर्ट में जाने का हक भी है। इसके लिए कम से कम 90 दिनों का समय भी दिया जाए। लेकिन महानगर पालिका ने तो एक भी कायदा नहीं निभाया। जबकि महानगर पालिका के भीतर अनियमितताओं की कई हैरतंगेज कहानियां हैं। जैसे कि 1992 को टीना बेन 14 साल की थी, तब उन्हें घर के सामने खड़ा करके एक स्लेट पर उनका नाम, एनके परिवार वालों का नाम लिखवाकर फोटो ले लिया गया। 2005 को याने ठीक 12 साल बाद जब वह दो बच्चों की मां बनी तो भी उन्हें 1992 की फोटो के हिसाब से घर का मुआवजा मिला। समय के इतने बड़े अंतराल में घर तो क्या बस्ती की पूरी दुनिया ही बदल जाती है, लेकिन नहीं बदलती है तो मगनगर पालिका की मानसिकता।

माटी में मिली बस्तियों से जो ज्वंलत सवाल उठे हैं वो ‘रहने’ के अलावा ‘रोजीरोटी’ और ‘बुनियादी जरूरतों’ से भी जुड़े हैं। जैसे कि अगर यहां के कुछ विस्थापितों का पुनर्वास हुआ भी तो वह कोसाठ जैसी जगह में होगा, जो विस्थापितों की जगह से ‘12-15 किलोमीटर दूर’ और शहर की हदों को छूता ‘बाढ़ प्रभावित इलाका’ है। ऐसे में जो विस्थापित कोसाठ जैसी जगहों पर आएंगे भी है तो अपने साथ बेकारी भी लाएंगे। क्योंकि उन्हें शहर के भीतर 150 रूपए दिन की दिहाड़ी मजदूरी मिलती रही है। मगर शहर के बाहर तो कोई काम नहीं मिलेगा और काम ढ़ूढ़ने के लिए उन्हें रोजाना 40 रूपए तक खर्च करके शहर जाना पड़ेगा। इसके साथ-साथ जो औरतें चाय की दुकानें चलाती हैं या फिर घरेलू काम के लिए आसपास की सोसाइटी में जाती हैं, उन्हें कोसाठ जैसी जगहों में आकर हाथ पर हाथ रखे बैठना होगा। इन सबसे ऊपर यह सवाल भी है कि शहर के बाहर का यह हिस्सा जब बरसात के मौसम में बाढ़ के पानी से भरेगा तो यहां के रहवासी कहां जाएंगे ?

17.1.10

यह हमारा पता है

शिरीष खरे


बीड़/कभी एक्सट्रा आर्टिस्ट के तौर पर काम करने वाला अक्षय कुमार आज बालीवुड का सुपर स्टार कहलाता है। मगर सैय्यद मदारी नाम की जमात से एक भी स्टार नहीं उभरता, ऐसा क्यों ?

हो सकता है कि आपको मालूम हो कि आजादी के तीन दशक बीत जाने के बाद हिन्दी फिल्मों में जब जन आक्रोश को एक्शन का रंग-रूप दिया जाने लगा तो हीरो के ज्यादातर स्टण्ट सैय्यद मदारी ही किया करते। यह और बात है कि मायानगरी में 30 साल से ज्यादा बीताने पर भी इन्हें न शोहरत मिली, न दौलत। कुछ सैय्यद मदारी इसे अपनी बदकिस्मती मानते हैं तो बहुत से पहुंच न होने पर अफसोस जताते हैं।

बहरहाल अब्दुल, सैय्यद मदारी जमात का सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा नौजवान है। सैय्यद अब्दुल 10 वीं पार कर चुका है। वैसे तो देश के असंख्य बच्चे 10वीं पार कर चुके हैं। फिर भी अब्दुल की बात खास इसलिए है क्योंकि इससे पहले तक तो सैय्यद मदारियों ने काले अक्षर पढ़ने की सोची भी न थी। पर आज की पीढ़ी पढ़ना चाहती है। वह क,ख,ग की रस्सियों पर चलकर बदलाव के नए खेल दिखाना चाहती है। सैय्यद अब्दुल से आगे अब कई नाम जुड़ने को बेकरार हैं; मसलन- सैय्यद फातिमा, सैय्यद सिंकदर, सैय्यद फारूख, सैय्यद कंकर, सैय्यद शेख तय्यब, सैय्यद वंशी, सैय्यद वशीर........

सैय्यद मदारी एक बंजारा जमात है। गली-मोहल्लों में हैरतअंगेज खेल दिखाना इनका खानदानी पेशा रहा है। मगर सबसे हैरतअंगेज खेल जो हुआ वो यह कि ‘जाति शोध केन्द्र’ और ‘जाति आयोग’ की सूचियों में ‘सैय्यद मदारी’ जमात का जिक्र तक नहीं मिलता है। इसलिए महाराष्ट्र में इनकी कुल संख्या का आकड़ा भी लापता है। अनुमान है कि महाराष्ट्र में महज 700 सैय्यद मदारी परिवार होंगे। थोड़े-थोड़े अंतराल से यह अपने ठिकाने बदलते चलते हैं। याने यह अपने बुनियादी हकों से दूर होते चलते हैं। ऐसे में जिला बीड़ से 80 किलोमीटर दूर सैय्यद खेड़करी बस्ती में आने के बाद मेरे जैसे कईयों की धारणा टूट जाती है।

यहां सैय्यद मदारी के 52 छोटे-छोटे और सुंदर झोपड़ों में 354 लोग रहते हैं। सैय्यद रफाकत से पता चला कि यह जमीन पहले दरगाह की थी, जिसे 1998 को 99 साल के लिए लीज पर लिया गया। तब पहली मर्तबा इन्हें चिट्ठी मंगवाने का पता नसीब हुआ। आज हर घर में पीने का पानी और बिजली की रौशनी भी है।

1998 को ही बच्चों की बेहतर पढ़ाई के लिए ‘गैर-औपचारिक केन्द्र’ खुला था। उस समय पढ़ाई-लिखाई की स्थिति 0 थी। लेकिन इन दिनों 1 से 11 क्लास तक कुल 20 बच्चे पढ़ते हैं। यह बच्चे बचपन (स्कूल) से जवानी (कालेज) की सीढ़ी पर चढ़ने को हैं। और अब्दुल, इन्हीं में से एक है।

ऐसा संभव हुआ- ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ और ‘राजार्षि शाहु ग्रामीण विकास’ संस्थाओं की मिलीजुली कोशिशों से। सामाजिक कार्यकर्ता बाल्मीक निकालजे ने कहा- ‘‘जो काम हम करते थे, अब वही अब्दुल को करते हुए देखने से खुशी मिलती है। 11 साल पहले यहां के लोग शिक्षा के नाम पर 5 मिनिट भी नहीं बैठ पाते थे। इसलिए पढ़ाई-लिखाई को दिलचस्प बनाने और उसकी जरूरत का एहसास दिलाने में सालों खर्च हो गए। जब कुछ को शिक्षा की अच्छाईयां दिखने लगी तो वह अपने बच्चों को स्कूल भेजने लगे। आज इन बच्चों की समझ बड़ी है, जमात में पूछ-परख भी।’’


बिन कागज सब सून
जैसा की ऊपर कहा जा चुका है कि 'जाति शोध केन्द्र’ और ‘जाति आयोग’ की सूचियों में ‘सैय्यद मदारी’ जमात का जिक्र तक नहीं मिला, जिसके चलते अब्दुल जैसे बच्चे आगे नहीं बढ़ सकते थे। जाति प्रमाण-पत्र के बगैर सैय्यद मदारियों के यह बच्चे दूसरी जाति के बच्चों की तरह अधिकार और सुविधाएं नहीं पा सकते थे। इसलिए दोनों संस्थाओं ने सैय्यद मदारियों के साथ मिलकर जाति प्रमाण-पत्र के लिए लड़ाई लड़ी। सामाजिक कार्यकर्ता सतीश गायकबाड़ ने कहा- ‘‘हमने अपनी पहचान के कागज मांगने के लिए बहुत कोशिश की। यहां से 80 किलोमीटर दूर बीड़ जाकर कलेक्टर साहब को अपना हाल सुनाया। उन्हें तो जाति का सबूत ही चाहिए था। जिले के ज्यादातर अफसर सैय्यद मदारियों को नाम से जानने के बावजूद कुछ नहीं कर सके। वो हर बार कानून में बंधे होने का हवाला देते और हम बार-बार खाली हाथ लौटकर आते।’’ यहां से सवाल उठा कि जो सैय्यद मदारी सरकार के काम-काज से जुड़े ही नहीं, वो अपने लिए जाति का कागज लाएं भी तो कहां से ?

इसके बाद जाति प्रमाण-पत्र की यह लड़ाई प्रदेश के ‘सामाजिक कल्याण व न्याय विभाग’ तक पहुंची। इस विभाग के बड़े अफसरों ने संस्थाओं के तर्क को जायज माना। आखिरकार महाराष्ट्र सरकार ने बीते साल (2009) एक ऐसी व्यवस्था बनाने का फैसला लिया है जो सैय्यद मदारियों को जाति का प्रमाण-पत्र हासिल करने में मदद करेगी। फिलहाल यह व्यवस्था दस्तावेजों में दर्ज है, बस अब इसके प्रकाशन का इंतजार है।

इस खुशखबरी ने सैय्यद खेड़करी बस्ती में ईद जैसी खुशियां बिखेर दीं। इससे उन 60 बच्चों को भी स्कूल से जोड़ने में मदद मिलेगी जो मदारी का खेल दिखाने के लिए बाहर जाते हैं। ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ से अनिल जेम्स ने कहा- ‘‘यहां खेल में भी बेजोड़ प्रतिभाएं हैं। खासकर जिमनेस्टिक और एथलेटिक्स में। इन्हें सिर्फ सही मौका चाहिए है। अगर यह राष्ट्रीय खेल प्रतिस्पर्धाओं तक पहुंचे तो यकीन मानिए कमाल दिखाएंगे। इस तरह भी तो उनकी पहचान बदल सकती है।’’

सैय्यद अब्दुल ने बताया- ‘‘मेरा कोई दोस्त पांचवी में छूटा, कोई आठवीं में। इस तरह कई दोस्त स्कूल से बाहर हो गए। वो कहते कि पढ़ने-लिखने से दाल-रोटी नहीं चलती। उनके अब्बा-अम्मी भी यही कहते कि अगर जाति का प्रमाण-पत्र नहीं मिला तो नौकरी नहीं मिलने वाली।’’ सैय्यद अब्दुल के पड़ोस से फातिमा चाची ने बताया- ‘‘तब लगा था कि अगर किताबों में फंसकर बच्चे अपने खेल भूल गए तो वो न इत के रहेंगे न उत के, बेकाम हो जाएंगे।’’ मगर जाति प्रमाण-पत्र नहीं होने के बावजूद कुछ बच्चे पढ़ते रहे। इन्हें अपना घर और उसका पता तो मिल गया था, जाति की पहचान का हक नहीं मिला था। और अब इसके मिलते ही पढ़ाई-लिखाई की राह का सबसे बड़ा रोड़ा भी हट जाएगा।


यही वो फोटो है
सैय्यद सिंकदर जैसे कई बच्चों के पास बालीबुड के स्टार और बड़े नेताओं के दर्जनों एल्बम हैं। हमने एक के बाद एक फोटो को पलटा तो जाना कि जो हम सोच नहीं पाते, सैय्यद मदारी कर दिखाते हैं। मसलन- आग के गोले से पार होना, आंख की पलक से 10 किलो का पत्थर उठाना, साइकिल को बालों से बांधकर घुमाना, ट्रक या टेम्पों को चोटी से बांधकर सरकाना, हाथ से पत्थर फोड़ना, सिर से नारियल फोड़ना, दांत से कांच चटकाना आदि-आदि इत्यादि। जब तक खेल चलता है, सैय्यद मदारी का पेट भरता है। एक बार बुढ़ापा हावी हुआ या चूके तो समझो गए काम से। जाहिर है सबसे बड़ी चुनौती है उम्र और जिन्दगी की सुरक्षा। इनकी जिन्दगी की शब्दावली में 'हेल्थ आफ केयर ' या 'इन्शोरेंस' जैसे शब्द नहीं हैं। हर रोज खेल-खेल में मरने का डर है। कुछ मरते भी हैं, मगर बाकी लोगों की जिंदगी नहीं रूकती है। वह भीड़ के बीचोबीच, नए-नए खेल लेकर आती है। सैय्यद सिंकदर की सुने तो- "दो हाथ से मोटर साइकिल खींचने वाले दारासिंह को बच्चा बच्चा जानता है। पर एक हाथ से दो मोटर साइकिल रोकने वाले सैय्यद मदारियों को कोई नहीं जानता।"

इस बीच कुछ धुंधले पड़ गए एल्बमों में इनके पिता अपनी ब्लेक-एण्ड-व्हाइड इमेज लिए अमिताभ, विनोद खन्ना, जितेन्द्र और धमेन्द्र के साथ खड़े दिखे। अबके लड़के रंगीन कपड़ों में शाहरूख, सलमान, गोविन्दा, संजय दत्त से बतियाते हैं। हीरोइनों की फोटो कम ही हैं। जो हैं उनमें पुराने जमाने की रेखा, हेमामालिनी, जीनत अमान, नीतू सिंह दिखती हैं। एक फोटो ऐसा भी है जिसमें शो खत्म होने पर प्रियंका और राहुल गांधी हाथ मिलाते हैं। दूसरी फोटो में खुद सोनिया गांधी पीठ ठोंकती हैं। हर फोटो के पीछे एक कहानी है, जिसे सुनाना यह नहीं भूलते। ऐसे सारे फोटो जोड़ो तो हजारों कहानियों जुड़ जाए।

आखरी में सैय्यद फातिमा ने संस्था के कार्यकर्ताओं के साथ खिंचवाई एक फोटो निकाली और सबको बताते हुए कहा- ‘‘यही एक फोटो (कहानी) है, जो हमारे बदलाव से जुड़ी है।’’


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13.1.10

विधायक की 1 चिट्ठी ने 11 साल से गैंगरेप केस को दबाए रखा है

शिरीष खरे


बड़ोदरा/ इन दिनों रूचिका गिरहोत्रा की दुखद दास्तान से पूरे देश के लोग सकते में हैं और सरकार के कान कुछ खड़े हुए हैं; ऐसे में आइए एक दशक पुरानी उस दास्तान से भी धूल की परतें हटा लेते हैं जिसमें धूलेटी त्यौहार की रात को 13 साल की दलित लड़की के साथ, स्थानीय विधायक के रिश्तेदार और उसके साथी ने बलात्कार किया था।

11 सालों बाद, आज भी यह केस जहां से शुरू हुआ था वहीं अटका पड़ा है- यानि जब वह लड़की नाबालिग थी तो दबंगों ने अपना दम भरते हुए धरदबोचा था। तथ्यों के हिसाब से साफ होता है कि पुलिस ने किस तरह से पूरे मामले को अनदेखा किया था। हालांकि मामला अदालत भी पहुंचा, जो दशक भर से अपनी स्थिर अवस्था में विद्यमान है। अवस्था की स्थिरता को जानने के लिए यही तथ्य काफी है कि 4000 दिनों के गुजरने के बावजूद गवाहों को सम्मन भेजे जाने अभी बाकी हैं। जबकि अदालती लड़ाई में लड़की के दादा अपने हिस्से की ज्यादातर जमीन बेच चुके हैं। जबकि लड़की अब 24 साल की हो चुकी है और उसकी शादी के बाद दो बच्चे भी हैं।

11 साल पहले, विधायक खुमानसिंह चौहान ने कथित तौर पर उस रिश्तेदार को बचाने के लिए पुलिस सब-इंस्पेक्टर को अपने अधिकारिक लेटरहेड पर हाथ से लिखी हुई एक चिट्ठी भेजी थी। खुमानसिंह चौहान सावली विधानसभा क्षेत्र से लगातार कांग्रेस के विधायक रहे हैं।

13 मार्च, 1998 को रमेश बारिया और उसके साथी ने कथित तौर पर मोक्षी गांव की दलित लड़की को उसके घर से अगवा किया और फिर बारी-बारी से बलात्कार किया। अगली सुबह यह दोनों खून से लथपथ उस लड़की को पोण्ड गांव में ही छोड़कर भाग निकल थे। यह लड़की अपने मां-बाप के अलग-अलग हो जाने के बाद से दादा वशराम वंकर के साथ रहती थी। वारदात वाले दिन दादा के बाहर जाने की वजह से यह लड़की घर में अकेली थी।

लड़की के दादा वशराम वंकर ने बताया कि ‘‘जैसे ही मालूम चला, हम उसे पास की पुलिस चौकी ले गए। वहां के पुलिस वालों ने हमसे कहा कि उसे भदरवा पुलिस स्टेशन ले जाओ। जब हम भदरवा पुलिस स्टेशन ले गए तो वहां केस दर्ज करने से मना कर दिया गया। कहा गया कि उसे मेडीकल जांच के वास्ते अस्पताल ले जाओ।’’

एसएसजी अस्पताल के डाक्टर पहले तो यह सोचने लगे कि गहरे सदमे में डूबी यह कौन लड़की है, यहां से उसे मानसिक उपचार के लिए वडोदरा अस्पताल में रेफर किया गया। मगर जब वडोदरा अस्पताल के डाक्टरों को लगा कि इस लड़की के साथ बलात्कार हुआ है तो उसे वापस भेज दिया गया। इसके बाद मेडीकल जांच पड़ताल में उसके साथ बलात्कार होने की पुष्टि हुई। इसकी शिकायत चार दिनों बाद पुलिस स्टेशन में दर्ज हो सकी। वशराम वंकर ने बताया कि ‘‘जब पुलिस वाले लीपापोथी करने लगे तो हम वड़ोदरा जाकर पुलिस अधीक्षक साब से भी मिले, पर साब ने उल्टा यह ईल्जाम लगा दिया कि हम पैसा वसूलने के लिए ऐसा रहे हैं।’’

वशराम वंकर की लड़ाई को गैर सरकारी संस्था ‘कांउसिल फार सोशल जस्टिस’ की तरफ से गुजरात हाई कोर्ट तक ले जाया गया। इसके पहले तक पुलिस वालों का रूख बहुत सख्त और गैर जिम्मेदाराना ही रहा। लड़की के परिवार वालों का मानना है कि 14 मार्च, 1998 को विधायक के लेटरहेड पर हाथ से लिखी गई उस चिट्ठी का यह असर हुआ कि बदरवा पुलिस स्टेशन में बलात्कार का मामला दर्ज नहीं किया गया।

देखा जाए तो उस लेटरहेड पर विधायक खुमानसिंह चौहान के दस्तखत भी हैं। वैसे खुद चौहान का यह दावा है कि उनके लेटरहेड का किसी ने ‘गलत इस्तेमाल’ किया है और वह किसी रमेश बरिया नाम के आदमी के बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं। खुमानसिंह चौहान के मुताबिक ‘‘मैं नियमित रुप से कई सिफारिश पत्रों को लिखता रहता हूं, मगर ऐसे किसी सिफारिश पत्र के बारे में मुझे तो याद नहीं आ रहा है।’’ उन्होंने आगे कहा कि ‘‘ऐसा मैं कभी नहीं कर सकता, बलात्कार जैसे गंभीर मुद्दे पर तो बिल्कुल भी नहीं।’’ दूसरी तरफ ‘कांउसिल फार सोशल जस्टिस’ के सचिव वालजी भाई पटेल के मुताबिक ‘‘चौहान साब सच नहीं कह रहे हैं, रमेश बरिया उनके खास रिश्तेदार हैं, उनके मां के पक्ष से।’’ इस केस के संबंध में वालजी भाई पटेल ‘सोऊ मोटू कांग्निसेंस (स्वतः संज्ञान)’ लिए जाने के पक्ष में हैं। जिससे मामले को और लंबा खींचने की बजाय तुरंत न्याय मिल सके।

पड़ताल से जान पड़ता है कि इस केस में पुलिस ही पहली बाधा बनी। उसने हर स्तर पर लापरवाही और उदासीनता बरती थी :

> पुलिस ने एक महीने की देरी से 25 अप्रेल, 1998 को सेशन कोर्ट के सामने चार्टशीट दाखिल की। इसमें रमेश बरिया और उसके साथी को आरोपी बनाया गया था।

> एक साल बाद, 14 अप्रेल, 1999 को एडिशनल सेशन जज ने कहा कि यह केस सेशन कोर्ट की बजाय लोक अदालत में जाना चाहिए। यह नाबालिग लड़की से सामूहिक बलात्कार का मामला है और इसमें दोनों पक्षों के बीच ‘समझौता’ होने की गुजांइश भी है। मगर लड़की के परिवार वालों ने समझौता करने से साफ मना कर दिया।

> आठ साल गुजरने के बाद, 30 मई, 2007 को, मुकदमा खत्म होने से पहले, कोर्ट को यह एहसास हुआ कि इस केस की सुनवाई के दौरान अपनाई गयी कार्यप्रणाली सही नहीं थी। इसमें पुलिस ने सीधे सेशन जज को ही चाटशीट दे दी थी। कायदे से उसे यह चार्टशीट ज्यूडीशियल फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट को सौंपनी चाहिए थी। इस केस के सारे दस्तावेज इंवेस्टीगेटिंग आफीसर को वापिस दिये गए। उससे कहा गया कि यह सारे दस्तावेज ज्यूडीशियल फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट तक पहुंचाए जाए।

> पुलिस ने 5 महीने का वक्त गुजारने के बाद, 9 अक्टूबर, 2007 को यह केस मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया।

> अब जो स्थिति है उसके मद्देनजर सेशन कोर्ट को और सुनवाई करनी पड़ेगी। इस केस की सुनवाई की अगली तारीख 23 जनवरी, 2010 है।

गुजरात हाई कोर्ट के भूतपूर्व जज जस्टिस एस एम सोनी के मुताबिक ‘‘यह एक बहुत गंभीर मामला है जिसे लोक अदालत में नहीं भेजा जाना चाहिए। यह सेशन कोर्ट कि गलती है कि उसने इस मामले को लोक अदालत में भेजे जाने की बात कही थी। साथ ही इस मामले से जुड़े सारे दस्तावेजों को इंवेस्टीगेटिंग आफीसर को नहीं लौटाए जाने चाहिए थे।’’

‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ के ‘विकास सहयोग’ विभाग की गुजरात टीम में मैनेजर प्रवीण सिंह के मुताबिक ‘‘यह तो प्रकाश में आने वाला एक मामला है। बहुत सारे मामले तो प्रकाश में ही नहीं आते। इसलिए हम वालजी भाई पटेल जैसे सामाजिक कार्यकताओं के अलावा बहुत सी संस्थाओं के साथ मिलकर ऐसी वारदातों के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। हम चाहते हैं कि न केवल दोषियों बल्कि ऐसे मामलों में लापरवाही करने वाले सभी अधिकारियों जैसे इंवेस्टीगेटिंग आफीसर, कोर्ट रजिस्टार्ड, चीफ पब्लिक प्रोस्टिक्यूटर और स्पेशल ट्रायल जज के खिलाफ भी कार्रवाई की जाए। जिससे ऐसे मामले हतोत्साहित हों।’’

लड़की के दादा वशराम वंकर की उम्र अब 70 को पार का चुकी है; उनके साथ इस अदालती लड़ाई में लड़की के मामा सुरेश वंकर भी भागीदार हैं। सुरेश वंकर कहते हैं ‘‘अभियुक्त के रिश्तेदारों ने हमें 50,000 रूपए देने की पेशकश की थी..... जिसे हमने ठुकरा दिया है।’....‘‘काश कोई हमारे दर्द को समझ सकता।’’ दादा वंशराम वंकर एक बात और जोड़ते हुए कहते हैं ‘‘हमारे हिस्से में इतनी राहत तो है कि बच्ची को बहुत प्यार देने वाला पति और ससुराल मिला है। ससुराल वालों को बच्ची के बार-बार अदालत आने-जाने पर भी कोई एतराज नहीं है।’’

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10.1.10

लड़कियां कहां गायब हो रही हैं ?

शिरीष खरे

2001 की जनगणना में हर समुदाय से जुड़ी हजारों संख्याओं का गुणा-भाग मौजूद है। नहीं मौजूद है तो इस सवाल का जवाब कि ऐसी संख्याओं के बीच से एक बड़ी संख्या में लड़कियां कहां गायब हो रही हैं ?

1991 की जनगणना से 2001 की जनगणना तक, हिन्दु और मुसलमानों- दोनों की ही जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट आई है। मगर 2001 की जनगणना का यह तथ्य सबसे ज्यादा चैंकाता है कि 0 से 6 साल के बच्चों के लिंग अनुपात में भी भारी गिरावट आई है। देश में बच्चों का लिंग अनुपात- 976:1000 है, जो कुल लिंग अनुपात- 992:1000 के मुकाबले बहुत कम है। यहां कुल लिंग अनुपात में 8 के अंतर के मुकाबले बच्चों के लिंग अनुपात में अब 24 का अंतर दर्ज है। असल में यह अंतर भयावह भविष्य की सीधी गिनती है।

सिख और जैन- देश के दो बहुत समृद्धशाली समुदाय हैं। मगर लिंग अनुपात के हिसाब से दोनों समुदाय सबसे पीछे खड़े मिलते हैं। सिख समुदाय में कुल लिंग अनुपात 893:1000 है और जैन समुदाय में कुल लिंग अनुपात 940:1000। 0 से 6 साल के बच्चों के लिंग अनुपात के मामले में तो दोनों की हालत और पतली नजर आती है- सिख समुदाय में 1000 लड़कों पर सिर्फ 786 लड़कियां हैं; मतलब 214 का अंतर। वहीं जैन समुदाय में 1000 लड़कों पर सिर्फ 870 लड़कियां हैं; 130 का अंतर। अगर महिला साक्षरता दर को देखें तो बाकी समुदायों के मुकाबले सिख और जैन समुदायों के आकड़े सबसे अच्छे हैं। इसके बावजूद दोनों समुदाय के बच्चों के बीच सबसे खराब लिंग अनुपात का होना एक विरोधाभाषी स्थिति पैदा करता है। एक ओर जैन समुदाय में महिला साक्षर की दर सबसे अच्छी है- 90.6%। दूसरी तरफ इसी समुदाय में महिलाओं के काम की भागीदारी सबसे कम है- 9.2%।

देखा जाए तो बौद्ध समुदाय में महिला साक्षरता दर 61.7% है, जो सिख समुदाय की महिला साक्षरता दर 63.1% से कम है। मगर बौद्ध समुदाय में बच्चों का लिंग अनुपात है- 942:1000, जो सिख और जैन समुदाय से बेहतर है। इसी तरह बौद्ध समुदाय में महिलाओं के काम की भागीदारी-31.7% है, जो न केवल जैन बल्कि सिख समुदाय में महिलाओं के काम की भागीदारी- 20.2% से काफी अच्छी है।

इसी तरह मुसलमान समुदाय में कुल लिंग अनुपात- 950:1000 और बच्चों का लिंग अनुपात- 936:1000 है, जो हिन्दू समुदाय के लिंग अनुपात- 925:1000 और बच्चों का लिंग अनुपात- 933:1000 से बेहतर है। जहां तक ईसाई समुदाय का सवाल है तो यह समुदाय कुल लिंग अनुपात- 1009:1000 और बच्चों का लिंग अनुपात- 964:1000 के लिहाज से देश में अव्वल है।

ऐसे ही देश के समृद्धशाली राज्यों जैसे गुजरात और पंजाब के कुछ आकड़े भी हैरत में डालते हैं। गुजरात के मद्देनजर यह बात थोड़ी अजीब लग सकती है कि यहां के मुसलमान कई मामलों में हिन्दुओं से बेहतर स्थिति में हैं। यहां मुसलमान समुदाय में महिला साक्षर की दर है- 63.5%, जो हिन्दू समुदाय की महिला साक्षरता दर- 56.7% से बहुत अच्छी है। अगर कुल साक्षरता दर के आकड़े की भी बात करें तो मुसलमान समुदाय में यह है- 73.5%, जो हिन्दू समुदाय की कुल साक्षरता दर- 68.3% से अच्छी है। इसी तरह गुजरात में मुसलमान समुदाय में बच्चों का लिंग अनुपात- 913:1000 है और यह भी हिन्दू समुदाय में बच्चों के लिंग अनुपात- 880:1000 से बहुत बेहतर है। मगर बच्चों के लिंग अनुपात के हिसाब से पंजाब देश का सबसे पिसड्डी राज्य है। यहां बच्चों में 900:1000 का लिंग अनुपात है।

आम धारणा यह है कि साक्षरता की दर आबादी पर सीधा असर डालती है, साक्षरता को बढ़ाकर आबादी पर लगाम कसी जा सकती है, पढ़े-लिखे लोगों में लड़कियों के प्रति पूर्वाग्रह कम होता है। देखा जाए तो कुछ मामलों में यह धारणा सही भी हो सकती है; जैसे कि मुसलमान समुदाय में साक्षरता की दर (59.1) सबसे कम है, इसलिए जनसंख्या की दर सबसे अधिक है। मगर यही धारणा कुछ मामलों में गलत भी हो सकती है; जैसे कि जैन समुदाय में साक्षरता की दर सबसे अधिक है, फिर भी बच्चों का लिंग-अनुपात बहुत कम है। कुलमिलाकर हैरानी और बैचैनी पैदा करने वाले आंकड़ों का यह ऐसा गणित है जिसके हर एक अंक के साथ मिथकों की अंर्तगाथा भी जुड़ी है। इसलिए अंको को हल करने से पहले अंको की इन अंर्तगाथाओं को समझना जरूरी है।

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5.1.10

लोक सूचना अधिकारियों पर दस हजार रूपए का जुर्माना

शिरीष खरे

महाराष्ट्र सूचना आयोग ने एक मामले की सुनवाई के बाद नंदुरबार जिला प्रशासन के दो लोक सूचना अधिकारियों पर 9,750 रूपए का जुर्माना लगाया है। मामला कुछ ऐसा है कि सरदार सरोवर बांध से प्रभावित आदिवासी सियाराम सिंगा ने जिला प्रशासन से सूचनाएं मांगने के लिए जो आवेदन दिया था उसे लोक सूचना अधिकारियों ने गंभीरता से नहीं लिया और सूचना देने में बेवजह देरी बरती। इसके बाद नर्मदा बचाओं आंदोलन की अगुवाई में प्रशासन की इस कार्यप्रणाली के खिलाफ राज्य सूचना आयोग का दरवाजा घटघटाया गया। आयोग ने दोनों पक्षों के साथ बैठकर सुनवाई की और अपने आदेश में लोक सूचना अधिकारियों को दोषी ठहराते हुए उन्हें आर्थिक दण्ड दिया।

यह किस्सा नंदुरबार जिले में अक्कालकुंआ तहसील के डेनेल गांव का है, जहां नरेगा के तहत कुदावीडुंगर से हिरापाड़ा तक एक सड़क बनायी जा रही है। सियाराम सिंगा ने अपने आवेदन में इस सड़क योजना की मंजूरी,उदघाटन, प्रकाशन पटल, मजदूरों की संख्या, हाजिरी रजिस्टर और नामांकन रजिस्टर से जुड़ी सूचनाएं मांगी थीं। उन्होंने 11 मई, 2009 को अपना आवेदन लोक सूचना अधिकारी, लोक निर्माण विभाग, मोलगी को दिया था। 15 मई, 2009 को पहला जवाब आया जो बहुत ही सीमित, अधूरा और भ्रामक था। इसके बाद जुलाई, 2009 की 6, 14 और 27 तारीखों में विभागीय अपील प्राधिकारी के साथ कागजी सिलसिला तो चला मगर सूचनाओं के पते-ठिकाने का कोई ओर-छोर नहीं मिला। इसे देखते हुए 22 अगस्त, 2009 को राज्य सूचना अधिकारी के नाम से दूसरी अपील दाखिल की गई। हालांकि 5 सितम्बर, 2009 को कुछ सूचनाएं दी भी गईं जो एक बार फिर से अधूरी, झूठी और गुमराह करने वाली ही थीं। दिलचस्प यह है कि सूचना देने वालों कागजातों में बाकायदा यह लिखा हुआ था कि मस्टर रोल नहीं दिया जाएगा क्योंकि वह बेवसाइट पर उपलब्ध है। यह कथन अपनेआप में दिलचस्प इसलिए है क्योंकि यहां के ग्रामीण और आदिवासी इलाके का लोक सूचना अधिकारी पहले से ही यह मान बैठा है कि हर एक आवेदक के पास कम्प्यूटर होगा ही और उसे कम्प्यूटर के साथ-साथ बखूबी इंटरनेट चलाना भी आता होगा!!

इस मामले में 8 दिसम्बर, 2009 वह तारीख थी जिसमें आयोग के सामने सुनवाई शुरू हुई। इस दौरान महाराष्ट्र के मुख्य सूचना आयुक्त सुरेश जोशी के सामने आवेदक और लोक सूचना अधिकारी हाजिर हुए। तब आवेदक के पक्ष में नर्मदा बचाओ आंदोलन की कार्यकर्ता एडवोकेट योगनी कानोलकर ने बतलाया कि सूचना देने की यह पूरी प्रक्रिया किस तरह से गैरकानूनी और जानबूझकर उलझाने वाली है। दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद आयोग ने पाया कि लोक सूचना अधिकारियों की ओर से सूचना देने में कुल 39 दिनों की देरी हुई है। इसलिए 24 दिसम्बर, 2009 को आयोग ने अपने आदेश में दोनों अधिकारियों पर 250 रूपए प्रतिदिन के हिसाब से कुल 9,750 (250x39) रूपए का जुर्माना लगाया। मतलब अब दोनों को अपनी-अपनी जेब से 4,895-4,895 (आधे-आधे) रूपए देने पड़ेंगे। आदेश में आगे कहा गया है कि यह रकम दोनों लोक सूचना अधिकारियों को जनवरी, 2010 में मिलने वाली सेलरी से बसूल की जाए और इसी के साथ 15 फरवरी, 2010 तक राज्य सूचना आयोग के समक्ष जुर्माना भरे जाने की पुष्टि भी की जाए।

नर्मदा बचाओ आंदोलन ने आयोग के इस आदेश का स्वागत किया है। आंदोलन का मानना है कि नंदुरबार जैसे जिलों में, जहां लोक निर्माण कार्यों में होने वाली घूसखोरी पर नियंत्रण नहीं है, वहां अधिकारियों पर इस तरह की कार्रवाई से आमजनता में अच्छा संदेश पहुंचेगा। वैसे भी नरेगा जैसी परियोजना में बड़े पैमाने पर जो घूसखोरी व्याप्त है वो जगजाहिर है, लिहाजा आयोग द्वारा सुनाई गई यह सजा अपनेआप में खास महत्व रखती है।

इस मामले की अगर थोड़ी और पड़ताल की जाए तो महाराष्ट्र सूचना आयोग के आदेश पर थोड़ा और सोचा-विचारा जा सकता है। पहले विचार के मुताबिक, सूचना आयुक्त कानून में मौजूद अपनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए उचित मुआवजे के निर्देश भी दे सकते थे। ऐसा इसलिए भी क्योंकि आवेदक सियाराम सिंगा गरीबी रेखा के नीचे आने वाले उस आदिवासी परिवार से है जिसे बेवजह ही शारारिक और मानसिक परेशानियों से गुजरना पड़ा है। दूसरे विचार के मुताबिक, मई से लेकर अबतक मतलब कई महीनों के बीत जाने तक आवेदक को सूचनाएं देने के मामले में गुमराह किया जाता रहा है, इस हिसाब से लोक सूचना अधिकारियों पर 9,750 रूपए का जुर्माना तो बेहद मामूली है। कायदे से यह जुर्माना 25,000 रूपए के आसपास होना चाहिए था। तीसरे विचार के मुताबिक, आदेश में गुमराह करने वाले ऐसे अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनिक कार्रवाई भी जरूरी थी। इससे सभी लोक सूचना अधिकारियों को यह सबक तो मिलता कि उन्हें आवेदकों तक बगैर किसी देरी के सही, सटीक और पर्याप्त सूचनाएं पहुंचानी है।

चलते चलते
महाराष्ट्र सूचना आयोग के आडिट यह दर्शाता है कि 6 सूचना आयुक्त हर रोज करीब 5 सुनवाइयों का निपटारा करते हैं। इस तरह से एक आयुक्त हर महीने करीब 150 मामलों का निपटारा करता है। 2008 में नागपुर के सूचना आयुक्त विलास पाटिल ने सबसे ज्यादा 2003 मामलों को निपटारा किया था। इसके बाद मुंबई के सूचना आयुक्त सुरेश जोशी 1983 मामलों को निपटाया था। मगर नवी मुंबई के सूचना आयुक्त नवीन कुमार सबसे कम 1298 मामलों को ही निपटा सके थे। अनुमान है कि एक सूचना आयुक्त हर महीने कम से कम 300 मामलों को तो निपटा ही सकता है। इस आधार पर अगर दिसंबर, 2008 के आकड़े पर नजर डाले तो महाराष्ट्र सूचना आयोग में सुनवाई के लिए 15026 मामले लंबित थे। इससे पूरे राज्य में सूचना आयुक्तों द्वारा मामलों को निपटाने की गति का पता चलता है।


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28.12.09

शिक्षा से जुड़ी मांगों का चार्टर अब राष्ट्रपति के हाथों में

शिरीष खरे

क्राई के एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से मुलाकात कर बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 में व्याप्त कमियों पर चर्चा की। इस प्रतिनिधिमंडल ने भारत के सभी बच्चों को शिक्षा के अधिकार से जोड़ने के लिए अधिनियम में जरूरी संशोधन किए जाने की वकालत भी की।

इस दौरान राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को वह चार्टर भी सौंपा गया जिसमें देशभर से करीब 8 लाख नागरिकों ने शिक्षा के अधिकार अधिनियम में जरूरी संशोधन किए जाने की मांग का समर्थन किया था। क्राई का मानना है कि बच्चों को उनके मूलभूत अधिकारों से जोड़ने और उनके बीच की असमानताओं को घटाने के लिए अधिनियम में कुछ बातों को शामिल करना होगा। अगर अधिनियम और उसके प्रावधानों में यह संशोधन नहीं हुए तो भारत के बहुत सारे बच्चे शिक्षा जैसे मूलभूत अधिकार से बेदखल होते रहेंगे।

राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने प्रतिनिधिमंडल की बातों को गंभीरता से लेते हुए यह माना कि "शिक्षा तो मानवीय विकास की बुनियाद है और हर भारतीय बच्चे तक बेहतर शिक्षा पहुंचनी ही चाहिए।" क्राई की डायरेक्टर पूजा मारवाह के मुताबिक ‘‘हमने राष्ट्रपति के साथ 'सबको शिक्षा समान शिक्षा अभियान' से जुड़ी बहुत सारी बातों को साझा किया। हमने उन्हें बताया कि इस अभियान को देशभर में 18 राज्यों के करीब 8 लाख ऐसे नागरिकों का समर्थन मिला है जो चाहते हैं कि सभी भारतीय बच्चों के बीच एक समान और बेहतर गुणवत्ता वाली शिक्षा व्यवस्था कायम हो। अब हमारी कोशिश यह है कि सरकार हमारी मांगों को माने, जिससे शिक्षा का अधिकार महज कागजी शेर बनकर न रह जाए और यह जमीनी स्तर पर भी अपना असर दिखा पाए।’’ उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘भारतीय बच्चों के नजरिए से शिक्षा के अधिकार का यह अधिनियम मील का पत्थर साबित हो सकता है, बशर्ते इस अधिनियम में छिपी संभावनाओं को व्यापक स्तर पर देखा और समझा जाए तो।’’

क्राई के प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के सामने शिक्षा के अधिकार अधिनियम में जिन मांगों को शामिल किए जाने पर जोर दिया है, उनमें खास हैं : (एक) 6 साल से नीचे और 15 से 18 साल तक के बच्चों को भी मुख्य प्रावधान में लाया जाए। (दो) हर बस्ती से 1 किलोमीटर के भीतर योग्य शिक्षक और सुविधायुक्त स्कूल हों। (तीन) सकल घरेलू उत्पाद का 10 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च हो।

25.12.09

महाराष्ट्र में कई अख़बारों ने मीडिया को किया शर्मसार

लेखक : पी साईनाथ

मूलत : द हिंदू से

अनुवाद : समरेंद्र सिंह

हिन्दी प्रकाशन : जनतंत्र.कॉम से


आप सोचते होंगे कि अख़बारों में सिर्फ़ एक पेज 3 होता है? लेकिन महाराष्ट्र के अख़बार ऐसा नहीं मानते। हाल के चुनाव में उनके पास कई पेज 3 थे, जिन्हें वो लगातार कई दिनों तक छापते रहे। उन्होंने सप्लिमेंट के भीतर सप्लिमेंट छापे। इस तरह मुख्य अख़बार में भी आपको पेज 3 पढ़ने को मिले। फिर उन्होंने मेन सप्लिमेंट में अलग से पेज थ्री छापा। उसके बाद एक और सप्लिमेंट जिसके ऊपर रोमन में पेज थ्री लिखा था।


यह मतदान से ठीक पहले के दिनों में बहुत ज़्यादा हुआ क्योंकि व्यग्र उम्मीदवार “ख़बरों” को खरीदने के लिए हर क़ीमत चुकाने को तैयार थे। एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि “टेलीविजनों पर बुलेटिन्स की संख्या बढ़ गई और प्रिंट में पन्नों की संख्या।” मांगें पूरी करनी थीं। कई बार तो आखिरी पलों में अतिरिक्त पैकेज आए और उन्हें भी जगह देनी थी। उन्हें वापस लौटाने का कोई कारण नहीं था?

मराठी, हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू – राज्य के तमाम अख़बारों में चुनाव के दौरान आप ऐसी कई आश्चर्यजनक चीजें देखेंगे जिन्हें छापने से इनकार नहीं किया गया था। एक ही सामाग्री किसी अख़बार में “ख़बर” के तौर पर छपी तो किसी अख़बार में “विज्ञापन” के तौर पर। “लोगों को गुमराह करना शर्मनाक है” – यह शीर्षक है नागपुर (दक्षिण-पश्चिम) से निर्दयील उम्मीदवार उमाकांत (बबलू) देवताले की तरफ़ से खरीदी गई ख़बर की। यह ख़बर लोकमत (6 अक्टूबर) में प्रकाशित हुई थी। उसके आखिरी में सूक्ष्म तरीके से एडीवीटी (एडवर्टिजमेंट यानी विज्ञापन) लिखा हुआ था। द हितवाद (नागपुर से छपने वाले अंग्रेजी अख़बार) में उसी दिन यह “ख़बर” छपी और उसमें कहीं भी विज्ञापन दर्ज नहीं था। देवताले ने एक बात सही कही थी – “लोगों को गुमराह करना शर्मनाक है।”

मजेदार बात यह है कि चुनाव आचार संहिता (जिसके तहत पार्टी और सरकार का खर्च जांच के घेरे में आ जाता है) लागू होने से ठीक 24 घंटे पहले 30 अगस्त को एक विज्ञापन छपा। उसके बाद शब्द “विज्ञापन” ओझल हो गया और उसके साथ ही “रिस्पॉन्स फीचर” भी। उसके बाद सभी कुछ न्यूज़ में तब्दील हो गए।

उसके बाद विज्ञापनों की दूसरी खेप 18 सितंबर से ठीक पहले आई जब उन्होंने नामांकन भरना शुरू किया। नामांकन भरने के तुरंत बाद वो विज्ञापन भी बंद हो गए क्योंकि तब उम्मीदवारों के खर्चों पर नज़र रखी जाने लगी। इन हथकंडों ने सरकार, बड़े दलों और अमीर उम्मीदवारों को चुनावी खर्च में जोड़े बगैर बड़े पैमाने पर पैसा खर्च करने की सहूलियत दी। यही नहीं इन्होंने प्रचार का एक ऐसा तरीका भी खोच निकाला जो प्रचार खर्च में नहीं जुड़ा। उन्होंने थोक के भाव में एसएमएस और वॉयस मेल के जरिए मतदाताओं से वोट मांगे। इनके अलावा प्रचार के लिए खास वेबसाइट्स का निर्माण कराया। इन सब में पैसा काफी खर्च हुआ लेकिन खाते में नहीं जुड़ा।

30 अगस्त और 18 सितंबर के बाद न्यूज़ रिपोर्ट कई मायने में रोचक रहे। उन “ख़बरों” में कोई आलोचना और बुराई नहीं की जाती। सैकड़ों पन्ने उम्मीवारों की उपलब्धियों, प्रचार और तारीफ़ में भर दिए गए और मुद्दों की चर्चा तक नहीं हुई। जिनके पास पैसे नहीं थे उनका अख़बारों में जिक्र तक नहीं हुआ।

अगर आपने सही सौदा किया तो वही ख़बर प्रिंट, टेलीविजन और ऑनलाइन तीनों माध्यमों में उपलब्ध मिलेगी। यह पैकेज पत्रकारिता का विकसित रूप है और यह सभी माध्यमों में मौजूद है। इस तरह की ख़बरों की तरफ़ मुड़ने से चुनाव के दौरान कई बड़े अख़बारों की विज्ञापन आय घट गई – जबकि आम परिस्थितियों में ऐसा नहीं होता।

सबसे दुखद तो यह है कि कुछ बड़े पत्रकारों ने पेड न्यूज़ को अपनी बाइलाइन के साथ छपवाया। ऐसे पत्रकारों में कुछ चीफ़ रिपोर्टर और ब्यूरो चीफ़ रैंक के पत्रकार भी शामिल हैं। कुछ ने ऐसा स्वेच्छा से किया तो कुछ ने बताया कि “पत्रकारों के निजी भ्रष्टाचार के दौर में हमारे उसमें शामिल होने और उससे दूर रहने के विकल्प थे। लेकिन जब यह सब मालिकों की सहमति से एक संगठित उद्योग की शक्ल अख्तियार कर चुका है तो हमारे पास क्या विकल्प बचते हैं?”

1 अक्टूबर से 10 अक्टूबर 2009 के बीच महाराष्ट्र में छपने वाले कई अख़बारों को पढ़ना काफी मज़ेदार है। कई बार आप रहस्यम तरीके से “तय हुई चीजें” छपी हुई देखेंगे। मसलन दो कॉलम फोटो के साथ 125-150 शब्दों की स्टोरी। ये “तय हुई चीजें” काफी उत्सुकता जगाती हैं। ख़बर शायद ही कभी इन कठोर शर्तों के साथ छापी जाती हो, लेकिन विज्ञापन छापे जाते हैं। कुछ जगहों पर आपको एक ही पन्ने पर कई तरह के फॉन्ट और लेआउट देखने को मिलेंगे। ऐसा इसलिए कि लेआउट, फॉन्ट और प्रिंटआउट सब कुछ उम्मीदवार की तरफ़ से भेजा गया था।

कई बार व्यवस्थित तरीके से एक या दो पेज पर सिर्फ एक ही पार्टी से जुड़ी ख़बरें परोसी गईं। किसी और ख़बर को उन पन्नों पर छापने लायक नहीं समझा गया। 6 अक्टूबर को पुढारी अख़बार का तीसरा पन्ना कांग्रेस के लिए छापा गया। 10 अक्टूबर को सकाळ में तीसरे और चौथे पन्ने पर रणधुमली नाम का सप्लिमेंट छापा गया जिसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ एमएनएस से जुड़ी ख़बरें थीं। दूसरी बड़ी पार्टियों को कई दूसरे अख़बारों ने इसी तरह सम्मानित किया।

देशोन्नति में 11 अक्टूबर सिर्फ एनसीपी की ख़बर थी। 15 सितंबर को मुख्यमंत्री अशोक चाह्वाण पर विशेष छपा। हिंदी अख़बार नव भारत में 30 सितंबर से 13 अक्टूबर (इसके साथ ही चाह्वाण पर छपने वाले पूरे पन्नों की संख्या 89 हो गई) के बीच नव भारत में 12 पन्ने चाह्वाण को समर्पित किए गए। दूसरी तरफ, मतदान की तारीख़ जैसे-जैसे नजदीक आई पन्नों पर ख़बरों की भीड़ बढ़ती गई। कुछ पर तो 12 ख़बरें और 15 फोटो छपे।

चूंकि चुनावी दौर में उम्मीदवारों और उनकी पार्टियां ने ख़बरें वितरित कीं, इसलिए ज़्यादातर अख़बारों ने एक भी संशोधन नहीं किए। वरना ऐसा क्यों है कि अख़बारों ने बाइलाइन, स्टाइल और व्यवहार से समझौता किया और एक सी ख़बरें छापीं।


इससे कई परेशान करने वाले सवाल खड़े होते हैं।

उदाहरण के लिए, सकाळ आमतौर पर अपने रिपोर्टर की ख़बरों पर बटमिदार (रिपोर्टर) लिख कर क्रेडिट देता है। दूसरों की ख़बरों पर सकाळ वृतसेवा (न्यूज़ सर्विस) या फिर सकाळ न्यूज़ नेटवर्क लिखा होता है। लेकिन कांग्रेस की तरफ़ से भेजी गई सामाग्री पर “प्रतिनिधि” लिखा गया था। इसलिए आप पाएंगे कि सकाळ ने अपनी व्यावसायिक शर्तों को तोड़ते हुए “प्रतिनिधि” नाम से ख़बरें प्रकाशित कीं। ऐसी ही एक ख़बर – “राज्य की सत्ता कांग्रेस के ही हाथ में रहेगी” – 4 अक्टूबर को छापी गई। उसमें ऊपर “बटमिदार” लिखा हुआ था और नीचे “प्रतिनिधि”। यह ख़बर क्या थी? क्या यह एक विज्ञापन था?

जाने-माने पब्लिक रिलेशन फर्म्स, प्रोफेशनल डिजाइनर्स और विज्ञापन एजेंसियां अमीर उम्मीदवारों और पार्टियों का काम संभालते हैं। वो ख़बरों को तय शब्दों और लहजों में अख़बारों के लिए तैयार करते हैं। कई बार तो अलग-अलग अख़बारों के लिए ख़बरें ऐसे तैयार की जाती हैं कि वो एक्सक्लूसिव लगें।

कुछ चुनिंदा उम्मीदवारों ने, जिनमें से ज़्यादातर बिल्डर थे, काफी अधिक ख़बरों में रहे। इसके विपरीत छोटी पार्टियों और कम पैसे वाले उम्मीदवारों का राज्य के कई अख़बारों ने पूरी तरह बहिष्कार कर दिया। कुछ ने मुझे ख़त लिख कर अपना दर्द बयां किया है। ऐसे ही एक शख़्स हैं शकील अहमद। पेशे से वकील शकील अहमद ने बतौर निर्दलीय मुंबई के सायन-कोलीवाडा से चुनाव लड़ा। उन्होंने बताया कि जिन अख़बारों ने उनको सामाजिक कार्यकर्ता बताते हुए उनके बारे में ख़बरें छापी थीं, “उन्होंने ने भी बतौर उम्मीदवार उनके बारे में कुछ भी छापने के लिए पैसे मांगे। मैंने पैसे देने से मना कर दिया तो किसी ने मेरे बारे में कुछ नहीं छापा।” शकील अहमद चुनाव आयोग और प्रेस काउंसिल के सामने अपनी बात रखने को उत्सुक हैं।

पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने महाराष्ट्र के कई जिलों से हमारे पास 21 अख़बारों की 100 से अधिक प्रतियां भेजी हैं। इनमें से अधिक सर्कुलेशन वाले बड़े अख़बारों के साथ छोटे स्थानीय अख़बार भी शामिल हैं। उन सभी में ऐसी ख़बरों से पन्ने भरे हुए हैं। टेलीविजन चैनलों पर कहीं इन्हें ख़बरों के तौर पर तो कहीं विज्ञापन के तौर पर दिखाया गया। ऐसी ही एक ख़बर दो चैनलों पर किसी गैर की आवाज़ में प्रसारित की गई। और एक तीसरे चैनल के माइक से साथ विरोधी चैनलों पर ख़बरें नज़र आईं।

मतदान का दिन नज़दीक आने पर कुछ कम पैसे वाले उम्मीदवारों ने कुछ पत्रकारों से संपर्क साधा, ताकि वो भ्रष्टाचार की इस बाढ़ में डूब न जाएं। उन्हें प्रोफेशनल्स की ज़रूरत थी। उन्होंने उन पत्रकारों से अपने बारे में लिखने के लिए गिड़गिड़ा कर कहा और अपनी हैसियत के हिसाब से पैसों का प्रस्ताव रखा। आखिरी चंद दिनों में ऐसे कुछ छोटे आइटम अख़बारों के पन्नों पर नज़र आए। ये आइटम उन उम्मीदवारों की माली हालत बयां करते थे।


और यह वो चुनाव रहा, जिसके बारे में न्यूज़ मीडिया ने हमें बताया कि इस बार चुनाव मुद्दों के आधार पर नहीं लड़े गए।

23.12.09

बच्चे खड़े बाजार में


शिरीष खरे


यह दृश्य बार-बार घटने से अब साधारण लगता है- मुंबई के मशहूर लियोपोर्ड की संगीतभरी रातों के सामने भीख मांगते 10 से 12 साल के 12 से 15 बच्चे खड़े मिलते हैं। ये उन शोषित बच्चों के समूह से हैं जो शहर के फुटपाथों पर जूते या कार चमकाते हैं, फूल, चाकलेट या फिर कई बार अपने आप को बेच देते हैं। ना जाने ये बच्चे इधर से किधर और कितनी बार बिकने वाले हैं। इनकी जिंदगी में वह दिन कभी न आए जब यह अपने परिवार वालों को देखने के लिए भी तरस जाएं। वैसे एक साल के भीतर इसी मुंबई से करीब 8 हजार बच्चे लापता हुए हैं। देखा जाए तो एक दशक से देश और दुनिया की ऐसी ज्ञात घटनाओं या संख्याओं को जोड़ना अब असाधारण हो चुका है। भूमण्डलीकरण के जमाने में बच्चों की तस्करी को नए-नए पंख जो लग गए हैं।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के एक आंकलन के हवाले से 2002 में दुनियाभर से करीब 12 लाख बच्चों की तस्करी हुई। वहीं युनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट आफ स्टेट के आकड़ों (2004) का दावा है कि दुनिया में तस्करी के शिकार कुल लोगों में से आधे बच्चे हैं। अकेले बच्चों की तस्करी से हर साल 10 अरब डालर के मुनाफे का अनुमान है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के बाल मजदूरी से जुड़े आकड़ों (2000) का अनुमान है कि सेक्स इंडस्ट्री में 18 लाख बच्चों का शोषण हो रहा है। इनमें भी खासतौर से लड़कियों की तस्करी विभिन्न यौन गतिविधियों के लिए हो रही है। इसी तरह अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का यह भी अनुमान है कि घरेलू मजदूरी में भी लड़कियों की संख्या सबसे ज्यादा होती है। ऐसे बच्चों की तस्करी करने के लिए इनके परिवार वालों को अच्छी पढ़ाई-लिखाई या नौकरी का झांसा दिया जाता है। युनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रंस फंड, फेक्ट शीट (2005) का अनुमान है कि दुनिया के 30 से ज्यादा सशस्त्र संघर्षों में बच्चों का इस्तेमाल किया जाता है। कुछ बच्चों को गरीबी तो कुछ को जबरन उठाकर सेना में भर्ती किया जाता है। 1990 से 2005 के बीच सशस्त्र संघर्षों में 20 लाख से ज्यादा बच्चे मारे गए। युनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रंस फंड, फेक्ट शीट (2005) ने यह भी कहा है कि अक्सर पिछड़े, अनाथ, विस्थापित, विकलांग या युद्ध क्षेत्र में रहने वाले बच्चों को सैन्य गतिविधियों में लगा दिया जाता है।

प्राकृतिक आपदाओं की ऊहापोह में बच्चों की तस्करी करने वाले गिरोहों की सक्रियता भी बढ रही है। इस दौरान यह गिरोह अपने परिवार वालों से बिछुड़े और गरीब परिवार के बच्चों को निशाना बनाते हैं। इसके अलावा गरीबी के चलते कई मां-बाप अपनी बेटी को आर्थिक संकट से उभरने का उपाय मानते हैं और पैसों की खातिर उसकी शादी किसी भी आदमी के साथ कर देते हैं। इन दिनों अधेड़ या बूढ़े आदमियों के लिए नाबालिग लड़कियों की मांग बढ़ती जा रही है। उन बच्चों के बीच तस्करी की आशंका बढ़ जाती है जिनके जन्म का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है। युनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रन्स फंड, बर्थ रजिस्ट्रेशन के मुताबिक 2000 में 41 प्रतिशत बच्चों के जन्म का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ। बच्चों की कानूनी पहचान न होने से उनकी तस्करी करने में आसानी हो जाती है। ऐसे में लापता बच्चों का पता-ठिकाना ढ़ूढ़ना मुश्किल हो जाता है। तस्करी और लापता बच्चों के बीच गहरे रिश्ते का खुलासा एनएचआरसी की रिसर्च रिपोर्ट (2004) भी करती है जिसमें कहा गया है कि भारत में एक साल 30 हजार से ज्यादा बच्चों के लापता होने के मामले दर्ज होते हैं, इनमें से एक-तिहाई का पता नहीं चलता है। तस्करी के बाद ज्यादातर बच्चों का इस्तेमाल खदानों, बगानों, रसायनिक और कीटनाशक कारखानों से लेकर खतरनाक मशीनों को चलाने के लिए किया जाता है। कई बार बच्चों को बंधुआ मजदूरी पर रखने के लिए उनके परिवार वालों को एडवांस पैसा दिया जाता है। इसके बाद ब्याज का पैसा जिस तेजी से बढ़ता है उसके हिसाब से बच्चों को वापिस खरीदना मुश्किल हो जाता है। इसके साथ-साथ अंग निकालने, भीख मांगने और नाजायज तौर से गोद लेने के लिए भी बच्चों की तस्करी के मामले बढ़ रहे हैं।

बाल तस्करी की हर अवस्था में हिंसा की सिलसिला जारी रहता है और ऐसे बच्चे आखिरी तक गुलामी का जीवन ढ़ोने को मजबूर रहते हैं। ऐसे बच्चे भरोसेमंद आदमियों के धोखा दिए जाने चलते खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। यह भी अजीब विडंबना है कि ऐसे बच्चे अपनी सुरक्षा, भोजन और आवास के लिए शोषण करने वालों के भरोसे रहते हैं। यह बच्चे तस्करी करने वाले से लेकर काम करवाने वाले, दलाल और ग्राहकों के हाथों शोषण सहते हैं। ऐसे बहुत सारी परेशानियों के चलते उनमें हताशा, बुरे सपने आने या नींद नहीं आने जैसे विकार पैदा होते हैं। तब कुछ बच्चे नशे की लत में पड़ जाते हैं और कुछ आत्महत्या की कोशिश तक करते हैं।

बाल तस्करी से जुडे़ सही और पर्याप्त आकड़े जमा कर पाना बहुत मुश्किल है। ऐसा इसलिए क्योंकि तस्करी के तार अंतर्राष्ट्रीय और संगठित अपराध की बहुत बड़ी दुनिया से जुड़े हैं। यह इतनी भयानक, विकराल और अदृश्य दुनिया है कि इसे ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेना आसान नहीं है। यह शारारिक और यौन शोषण के घने जालों से जकड़ी एक ऐसी दुनिया है जिसको लेकर सटीक नतीजे तक पहुंच पाना भी मुश्किल है। कई बार आकड़ों में से ऐसे लोग छूट जाते हैं जिनकी तस्करी देश के भीतर हो रही है। फिर यह भी है कि कई जगहों पर तस्करी के शिकार लोगों की आयु या लिंग का जिक्र नहीं मिलता।


तस्करी को पालेर्मो प्रोटोकाल (2000) के अनुच्छेद 3 और 5 में दी गई परिभाषा के मुताबिक : ‘‘व्यक्तियों की तस्करी का अर्थ धमकी या जबरन या अपहरण जालसाजी, धोखे, सत्ता के गलत इस्तेमाल, असहायता की स्थिति, किसी दूसरे व्यक्ति पर नियंत्रण रखने वाले व्यक्ति की सहमति पाने के लिए पैसे, लाभ के लेन-देन के लिए व्यक्तियों की भर्ती, परिवहन, स्थानांतरण, शरण या प्राप्ति है।’’


दुनिया भर में बच्चों की तस्करी सबसे फायदेमंद और तेजी से उभरता काला धंधा है। क्योंकि एक तो इसमें न के बराबर लागत है और फिर नशा या हथियारों की तस्करी के मुकाबले खतरा भी कम है। इस धंधे में बच्चे कीमती सामानों में बदलते हैं और मांग-पूर्ति के सिद्धांत के हिसाब से देश-विदेश के बाजारों में बिकते हैं। तस्करी में ऐसा जरूरी नहीं है कि बच्चों को अंतर्राष्ट्रीय सीमा के बाहर ही ले जाया जाए। एक बड़ी संख्या में बच्चों की तस्करी गांवों से शहरों में भी होती है। इसके अलावा पर्यटन से जुड़ी मांग और मौसमी पलायन के चलते भी तस्करी को बढ़ावा मिलता है। देश के भीतर या बाहर, दोनों ही प्रकार से बच्चों की तस्करी भयावह अपराध है। इसलिए बच्चों की तस्करी रोकने के लिए सार्वभौमिक न्याय का अधिकार देने वाले कानून की सख्त जरूरत है। फौजदारी कानूनों को न सिर्फ मजबूत बनाने होंगे बल्कि उन्हें कारगर ढ़ंग से इस्तेमाल भी करने होंगे। बच्चों की तस्करी से जुड़ी सभी गतिविधियों, लोगों और एंजेसियों पर फौजदारी कानून के तहत कार्रवाई हो। इसके अलावा शोषण से संरक्षण देने वाले ऐसे कानून और नीतियां हो जो बच्चों की तस्करी रोकने के लिए सीधे असर सकें। इनमें पलायन, बाल मजदूरी, बाल दुरुपयोग और पारिवारिक हिंसा से जुड़े कानून आते हैं। यहां एक और बात स्पष्ट है कि बच्चों की तस्करी रोकने के कानूनी उपाय तब तक बेमतलब रहेंगे जब तक कानूनों को इस्तेमाल करने और उनकी निगरीनी करने की उचित व्यवस्था नहीं रहेगी। साथ ही साथ तस्करी के शिकार बच्चों को तेजी से पहचानने के लिए कारगर तरीके बनाने और उन्हें अपनाने की भी जरुरत है।

14.12.09

सबको शिक्षा समान शिक्षा अभियान को उम्मीद से ज्यादा जनसमर्थन

शिरीष खरे

मुंबई / चाईल्ड राईटस एण्ड यू ने बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम में संशोधन किए जाने को लेकर जो हस्ताक्षर अभियान छेड़ा था उसे उम्मीद से ज्यादा जनसमर्थन मिला है। सबको शिक्षा समान शिक्षा के नाम से चलाया गया यह देशव्यापी अभियान अब अपने आखिरी पड़ाव पर है। जैसे कि उम्मीद की जा रही थी कि इस अभियान से देशभर के करीब 5 लाख लोग जुड़ेंग मगर जो नतीजा मिला है उसके मुताबिक 11 दिसम्बर तक 18 राज्यों के 20 शहरों, 6700 मलिन बस्तियों और गांवों से करीब 8 लाख लोगों ने चार्टर पर हस्ताक्षर किए हैं।


14 नंवबर याने बालदिवस के मौके पर चाईल्ड राईटस एण्ड यू ने सबको शिक्षा समान शिक्षा अभियान की शुरूआत की थी। इस अभियान का मकसद देश के नागरिकों की भागीदारी से बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम-2009 में संशोधन करवाना और खास तौर से 3 मांगों को मनवाने के लिए दबाव बनवाना था। इस अभियान को अपनी शुरुआत से ही भारी जनसमर्थन मिलने लगा था।


इस दौरान चार्टर पर हस्ताक्षर करवाने के साथ-साथ बच्चों से संबंधित अनेक गतिविधियां की आयोजित की गईं जैसे- हैदराबाद, बैंगलौर और चेन्नई में बच्चों द्वारा अपनी समस्याओं पर जनसुनवाईयां हुईं। मुंबई में बसों के जरिए कई जगहों पर पहुंचकर, बसों में ही बच्चों की कार्यशालाएं हुईं । कलकत्ता और भुवनेश्वर में नुक्कड़ नाटक हुए। दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान से करीब 1 हजार नागरिकों ने सबको शिक्षा के अधिकार के समर्थन में पैदल मार्च किया। इस कार्यक्रम में बाल समूह के अध्यक्ष 13 वर्षीय महेन्द्र रजक, कभी बाल मजदूर करने वाली 12 वर्षीय अस्मिना शाह, भोजन के अधिकार अभियान के जिआन द्रेज, बिराज पटनायक, सामाजिक कानूनविद अशोक अग्रवाल और क्राई की पूजा मारवाह शामिल हुए। इस मौके पर मोमबत्तियों को जलाकर गीत गाये गए। इसी तरह देशभर से बाकी हिस्सों में भी रैली और जनजागरण से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम हुए।


चाईल्ड राईटस एण्ड यू द्वारा हस्ताक्षर चार्टर को अब राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केन्द्र सरकार के मंत्रियों, राज्य के मुख्यमंत्रियों और सभी महत्वपूर्ण अधिकारियों के सामने रखा जाएगा और उनसे  > 6 साल से नीचे और 15 से 18 साल तक के बच्चों को भी अधिनियम में जगह देने,  >> हर बस्ती से 1 किलोमीटर के भीतर योग्य शिक्षक और सुविधाजनक स्कूल होने और  >>> सकल घरेलू उत्पाद का 10 % शिक्षा पर खर्च करने के लिए कहा जाएगा।


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6.12.09

अपने ही देश में परदेशी हैं पारधी

मराठवाड़ा के बंजारा जमातों को संगठित करने के लिए अभियान चला रहे बाल्मीक निकालजे से शिरीष खरे की बातचीत।


अंग्रेज जब यहां से गए तो बहुत कुछ छोड़कर गए।  उनका छोड़ा वो बहुत कुछ हमने आजतक संभाले रखा है। पारधी जमात से चिपका मिथक उन्हीं में से एक है। पारधी अपने ही अतीत और रिवाजों में कैद एक जमात है। जो अंग्रेजों के ‘गुनहगार जनजाति अधिनियम, 1871’ का शिकार होते  ही हमेशा के लिए ‘गुनाहगार’ हो गई।


आजादी के बाद भी कितने तख्त बदले, ताज बदले, नहीं बदले तो पारधी जमात के हालात। तभी तो महाराष्ट्र में पारधी लोग आज भी गांव से दूर रहते हैं, या रखे जाते हैं। तभी तो उनके सामने बुनियादी हकों से जुड़ा हर सवाल मुंबई, 724 किलोमीटर की दूरी बताने वाले पत्थर सा बनकर रह जाता है।


आष्टी, जिला बीड़, महाराष्ट्र। इसके ऊपर राजर्षि शाहु ग्रामीण विकास संस्थान और इसके ऊपर बाल्मीक निकालजे का नाम लिखते ही चिट्ठी जिस ठिकाने पर पहुंचती है, वही बैठे हैं हम। आखा मराठवाड़ा जानता है कि पारदी जैसी बंजारा जमातों के बीच बीते दो दशक से बाल्मीक निकालजे का नाम कितना लोकप्रिय है। नाम में न पड़ते हुए आइए उनसे कुछ काम की बातें जानते हैं। ऐसी बातें जो पारधी जमात से चाहे अनचाहे गुथ्थमगुथ्था हो चुकी हैं :



- पारधी जमात यहां एक उलझी हुई गुथ्थी है...

इतनी उलझी है कि सुलझाना मुश्किल हो रहा है। वैसे जानकार यह भी जानते हैं कि पारधी असल में तो लोगों की रखवाली करने वाले होते थे। इतिहास में पारधियों ने तो गुलामी के खिलाफ सबसे पहली और उग्र प्रतिक्रियाएं दी हैं। यहां के राजा निजाम से हारे, अंग्रेजों से हारे, मगर उन राजाओं के लिए लड़ने वाले पारधियों ने हार नहीं मानी। उन्होंने कई छापामार लड़ाईयां लड़ीं, और जीतीं भी। खुद शिवाजी भी उनकी युद्धशैली से प्रभावित थे। यह और बात है कि अब उनकी वीरता के वो किस्से यहां कम ही कहने सुनने को मिलते हैं।

अंग्रेज भी जब बार-बार और छापामारी अंदाज वाले हमलों से हैरान परेशान हो गए तो उन्होंने पारधियों को गुनहगार घोषित कर दिया। मगर आजादी के बाद तो अपनी सरकार, उसके पुलिस विभाग को यह तरीका बदलना चाहिए था। जो उन्होंने नहीं बदला।

1924 को देशभर में 52 गुनहगार बसाहट बनी। सबसे बड़ी गुनहगार बसाहट अपने शोलापुर में बनी। इसमें तार के भीतर कैदियों को रखा जाता था। 1949 को बाल साहेब खेर ने शोलापुर सेटलमेंट का तार तोड़ा। 52 को अंबेडकर साहब ने गुनहगार बताने वाले अंगेजी कानून को रद्द किया। 60 को नेहरू जी खुद शोलापुर भी आए। मगर आज भी यहां जब चोरी होती है तो पुलिस वाले सबसे पहले पारधी को ही पकड़ते हैं। वह अपने देश में आज भी परदेशी हैं। यहां पहला सवाल उनकी पहचान का ही बना हुआ है।

- उनकी पहचान से क्या मतलब है ?

हम थोड़ा सा शुरू से जान लेते हैं। पारधी, पारध शब्द से निकला है। पारध याने शिकार करने वाला। अब पारधी भी कई तरह के होते हैं। जैसे राज, बाघरी, गाय, हिरन शिकारी, गांव पारधी। राजा के पास जो शिकार का जानकार था, वे राज पारधी कहलाया। राजा बोले कि अब मुझे बाघ पर सवार होना है, उसके लिए बाघरी पारधी रखे जाते। वे ही बाघ पकड़ते, फिर उसे पालतू बनाते। एक तो बाघ को जिंदा पकड़ना ही बहुत मुश्किल है, ऊपर से उसे पालतू बनाना तो और भी मुश्किल। ऐसे ही गाय पारधी की खास सवारी गाय होती। आज भी उनके यहां एकाथ गाय तो होती ही है। गाय भी ऐसी-वैसी नहीं, बाकायदा ट्रेंड गाय। वे बाजार से गाय खरीदने की बजाय अपनी ही गाय के बछड़े को ट्रेंड करते हैं। उनकी गाय सधी होती है, इतनी कि शरीर के जिस हिस्से पर पारधी हाथ रख दे, वो जान जाती है कि अब उसे आगे क्या करना है। यही गाय उनके धंधे की मां है। इसलिए पारधी कभी गाय का मांस नहीं खाते। किसी भी शिकारी के लिए हिरन के पीछे दौड़ना, उसे मारना बड़ा टेढ़ा काम है। मगर पारधी लोग गाय की मदद से शिकार के तरीके को सीधा बना लेते हैं। जैसे हिरन का शिकार करते समय, जब गाय चरती हुई आगे बढ़ती है, उसके पीछे पीछे पारधी छिपा छिपा आता है। हिरन के नजदीक आने पर, वह उसके ऊपर अचानक छलांग मार देता है और शिकार को अपने हाथ में ले लेता है। ऐसी कई शैलियां हैं पारधियों के पास।

वैसे यकीन करना मुश्किल है मगर पारधी पंछियों की बोलियां भी खूब जानते हैं। जैसे पारधी के तीतर जंगलों के तीतरों को गाली देते हैं, तो कई जंगली तीतर लड़ने के लिए उनके पास आ जाते हैं, वो सारे बीच में लगे जाल में फंस जाते हैं। ऐसे शिकार के कई और ढ़ंग भी हैं उनके पास। शिकार के बारे में जितनी बातें पारधियों को पता है, शायद ही कोई जानता हो।

- पारधी कभी लोगों की रखवाली किया करते थे। यह समझाना कितना मुश्किल है...

अगर नई पीढ़ी पारधियों के पीछे छिपे सच जानने लगे तो शायद ही कोई उन्हें गुनाहगार कहेगा। पारधी लोगों की रखवाली के काबिल नहीं होते तो राजा उन्हें अपने सुरक्षा सलाहकार कभी नहीं बनाते। यह दुनिया की सबसे खुफिया और ईमानदार जमातों में से भी एक है। आप उसे एनएसजी कमाण्डो कह सकते हैं। आज भी आप देखिए, अपने यहां कहीं-कहीं एक पारधी के हिस्से में 25 से 50 खेतों की रखवाली आती है। फिर वे आपस में तय करते हैं कि एक दूसरे के खेतों में नहीं जाएंगे। अगर किसी के खेत में चोरी हुई तो उसका नुकसान उस खेत का पारधी भरता है। उसके बाद वह अपने खुफिया नेटवर्क से चोरी का पता लगाता है। अगर पता लगा तो मामले को अपनी जात पंचायत में उठाता है। पंचायत में बात सच साबित हो जाने का मतलब है, कसूरवार को नुकसान से 5 गुना ज्यादा तक दण्ड भरना। पारधी को रखवाली के बदले साल भर का अनाज मिलता है। मतलब यह कि वह गांव की अर्थव्यवस्था का जरूरी हिस्सा रहा है।

उसके जीने का रंग-ढ़ग, उसके धंधे के हिसाब से चलता है। आपने देखा होगा कि जैसे वे कमर में छोटी, एकदम कसी हुई धोती पहनता हैं। छाती पर कई जेबो वाली बण्डी, सिर पर रंग-बिरंगी पगड़ी पहनते हैं। कुल मिलाकर ऐसा पहनावा होता है जो दौड़-भाग में आवाज न करे, न ही किसी और तरह की अड़चन दे।

- समाज के बीच किस तरह की अड़चनों में फंसे हैं पारधी ?

इसे यहां के एक किस्से से समझिए। एक बार पाथरड़ी तहसील में कहीं चोरी हुई। कई महीने बीते, चोर का पता न चला। उसी समय आष्टी तहसील के चीखली से थोड़ी दूरी पर, घूमते फिरते रहवसिया नाम के पारधी परिवार वहां आ ठहरा। पुलिस ने उसे ही चोरी के केस में अंदर डाल दिया। उधर रहवसिया दो महीनों तक जेल में रहा। इधर गांव में ऊंची जात वाले उसके परिवार को धमकाते, बोलते जगह खाली कर दो वरना ऐसा-वैसा। जब वह जेल से छूटकर अपने ठिकाने पर आया तो ऊंची जात वालों ने उसे, और उसके 12 साथियों को भी रस्सियों से बांध दिया। उनसे बोला गया कि तुम लोग चोर हो, गांव के लिए अपशगुन हो। कुछ लोग वहां से किसी तरह छूटे, और 4 किलोमीटर दौड़ते हुए अपने कार्यालय पहुंचे। खबर मिलते ही हम यहां से 7 टेम्पों में 300 कार्यकर्ता बैठे, दलित पेंथर का नारा लगाते हुए वहां पहुंचे। तब ऊंची जात वाले अपने घरों में ताला लगाकर छिपे रहे।

यहां के ऊंची जात वाले तो पारधियों को हटाने के लिए राजीव गांधी तक पहुंच गए। तब वह प्रधानमंत्री थे, वो बोले कि पारधी देश के नागरिक हैं, उन्हें हटाया नहीं जा सकता। इसके बाद पूरे इलाके में ऊंची जात वालों और बंजारा जमातों के बीच, 5 साल तक संघर्ष चला। जगह जगह पर बंजारों की बस्तियों में कई कई बार हमले हुए। मगर हमारे पास भी पक्की योजना थी, हम ऐसे मामले बार-बार थाने, कचहरी तक ले जाते। धीरे धीरे जहां तहां ऊंची जात वाले भी ठण्डे पड़ते गए।

- तो क्या ऊंची जात वालों के खिलाफ संघर्ष करने भर से ऐसी धरणाएं बदल सकती हैं ?

बदलाव की कई योजनाएं हो सकती हैं। मकसद सिर्फ यह बात समझाना है कि पारधी चोर नहीं हैं, इंसान हैं। फिर भी आम धारणा है कि पारधी बस चोर ही हैं, अगर ऐसा है भी तो हम लोगों से कहते हैं- क्या उन्हें चोरी के दलदल से निकालाना नहीं चाहिए। इस काम में लोगों के साथ पुलिस का खास रोल हो सकता है। मगर यह दोनों (पब्लिक और पुलिस) तो पारधियों को चोर से ऊपर देखने की कोशिश नहीं कर रहे हैं।

मुझे लगता है हम सबका पहला काम यह बनता है कि, उनके भीतर के डर को पहले बाहर निकालें। इसके लिए जरूरी है सबसे पहले तो उन्हें ही एकजुट करना। वे अपने कानूनों को जानें। और वोट को हक से कहीं ज्यादा एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना सीखें। उन्हें रोजगार के वो साधन मिलें जो स्थानीय भी हों, और स्थायी भी। जैसे जिन बंजर जगहों पर वो अपने जानवर चराते रहे हैं, उन्हीं जगहों से उनसे अन्न पैदा करवाने की मुहिम को बढ़ावा मिले। यहां हमने दलित, बंजारों जमातों के 1420 परिवारों को खेती से जोड़ा है। इसलिए वो स्कूल से लेकर पंचायतों में अपनी जगह खुद बना पा रहे हैं।

पढ़ेलिखे, जागरूक लोग व्यवस्था की गलतियों से लड़ सकते हैं। इसलिए पारधी बच्चों को एक सपना देना होगा, वह यह कि पुलिस या बाकी लोग तुम्हारे पीछे नहीं हैं। देखो, वो तो तुम्हारे साथ है। ऐसा सपना देखने वाले बच्चों को स्कूलों में लाना होगा। उन्हें भरोसा देना होगा कि तुम्हारे खेल, तुम्हारी संस्कृति, तुम्हारी प्रतिभाएं किसी से कम नहीं हैं। ऐसी प्रतिभाओं को मौका देकर भी उनकी पहचान बदली जा सकती है।
 
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1.12.09

कितना भूखा है मध्यप्रदेश

शिरीष खरे


झाबुआ, मध्यप्रदेश । कुपोषण ने दो दर्जन से ज्यादा बच्चों को निगला है- यह हाल आदिवासी जिले झाबुआ का है, जहां मेघनगर ब्लाक के अगासिया और मदारानी गांवों में बच्चों की मौत का सिलसिला है कि टूटता ही नहीं। फिलहाल पूरा मध्यप्रदेश ही इतना भूखा है कि यहां न जाने क्यों भूख का नामोनिशान  है कि मिटता ही नहीं ?

केवल अक्टूबर में ही झाबुआ के इन 2 गांवों से 25 बच्चों की मौत दर्ज होना- यह तो मौत के ताण्डव की एक झलक भर है। एक तरफ पास के ही खण्डवा में आंतकवादी बतलायी गई वारदात के तुरंत बाद से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह अपने साहस का परिचय पेश कर रहे हैं और दूसरी तरफ महीनों से कुपोषण नाम का जो आंतक झाबुआ के कई दुबले, पतले, रक्तहीन शरीर वाले बच्चों को मलेरिया जैसी बीमारियों की चपेट में आते ही 4 रोज के भीतर खा रहा है, उसके खिलाफ ठोस कार्रवाई की बात तो दूर जबावदारी लेने का साहस तक कोई नहीं करता है। मालूम नहीं यह बात भोपाल तक पहुंची है या नहीं कि कुपोषण के गले उतर चुके ऐसे बच्चों में से ज्यादातर 0-6 साल के हैं। पता किया है तो पता चला है कि यह बच्चे तो क्या इनके नाम तक स्थानीय आंगनबाड़ी केन्द्रों में कभी नहीं पहुंचे हैं। आखिर किससे पूछे कि जिले के 75 % पोषण केन्द्रों में ताले लटके हैं तो क्यों ?

इसके पहले महिला बाल विकास विभाग की रिपोर्ट भी कह चुकी है कि झाबुआ जिले में 36 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। फिर भी प्रशासन कुपोषण से बच्चों की मौतों को रोकने की बजाय जवाबदारी से बचने के रास्ते तलाश रहा है। फिलहाल 25 बच्चों की मौत को लेकर कहा जा रहा है कि इन्हें मलेरिया जैसी बीमारियां तो थीं ही, इनमें रक्त की भारी कमी भी थी। पूरे इलाके में कुपोषण के खतरनाक स्तर को देखते हुए कुपोषण को बच्चों की मौत का मुख्य कारण बतलाया जा रहा है। जैसे कि मेघनगर के ब्लाक मेडीकल आफीसर विक्रम वर्मा भी कहते हैं कि- ‘‘हमने अभी तक 14 बच्चों की मौत के कारणों को ढ़ूढ़ा है, प्राथमिक तौर पर देखने के बाद तो यही लगता है कि उन्हें कुपोषण, एनीमिया और मलेरिया ने बुरी तरह जकड़ लिया था।’’ यह और बात है कि स्वास्थ्य विभाग के ज्वाइंट डायरेक्टर केके विजयवर्गीय कुछ और कहते हैं- ‘‘अक्टूबर में वहां सिर्फ चारेक मौतें हुई हैं। मैंने पर्यवेक्षक और एएनएम के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया है, इसके अलावा ब्लाक मेडीकल आफीसर को रिपोर्ट में देरी किये जाने पर कारण बताओ नोटिस भी भेजा दिया है।’’ ज्वाइंट डायरेक्टर कुपोषण को बच्चों की मौत का कारण नहीं मानते हैं। उनके हिसाब से- ‘‘हालांकि अभी तक कोई कारण स्पष्ट नहीं हो पाया है, फिर भी एक बात तो पक्की है कि कुपोषण नहीं ही है। शायद उन्हें मौसमी बुखार था।‘‘

इस तरह जहां स्वास्थ्य विभाग की गंभीरता स्पष्ट होती है वहीं समाज कल्याण के लिए बनी योजनाएं का असर भी साफ समझ आता है। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि अगासिया के जिन 4 बच्चों की मौत को मौत मान लिया गया है, उनके घरवाले रोजीरोटी के लिए अपने घरों से पलायन करते हैं। कहने को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना 5 साल पहले आई है मगर इनके हाथों में जाब-कार्ड आजतक नहीं आए हैं।

देखा जाए तो झाबुआ जिले के अगासी और मदारानी जैसे गांव तो कुपोषण नाम के नक़्शे पर छोटे-छोटे से बिन्दु भर हैं। हकीकत तो यह है कि मध्यप्रदेश के बड़े हिस्से में कुपोषण अब महामारी की तरह फैल रहा है। प्रदेश के ही एक और जिले सीधी का रुख करें तो यहां भी अगस्त से अबतक 22 बच्चों की मौतें दर्ज हुई हैं। इस बीच एशियन हयूमन राईटस कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि रीवा जिले के जेबा ब्लाक में कोल आदिवासियों के 80 % से ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं। सुप्रीम कोर्ट और यूनाइटेड नेशन इंटरनेशनल चिल्ड्रनर्स इमरजंसी फण्ड की रिपोर्ट के मुताबिक यहां के हालात तो उप-सहारा अफ्रीका देशों से भी खराब हैं। इसी तरह नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे-3 के मुताबिक मध्यप्रदेश में 12 लाख से ज्यादा बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं। यहां 0-3 साल के 60 % बच्चे कुपोषित हैं, जबकि इसी श्रेणी के 82.6 % बच्चे रक्तहीनता के शिकार हैं। प्रदेश में शिशु मृत्यु दर 1000/70 है, जबकि आदिवासी इलाकों में शिशु मृत्यु दर है 95.6/1000!!

ऐसे में सवाल उठता है कि 2015 तक शिशु मृत्यु दर में दो-तिहाई की कमी लाने वाले प्रदेश सरकार के लक्ष्य का क्या होगा ? वह भी तब जब 1.2 करोड़ बच्चों की आबादी वाले इस प्रदेश में शिशु रोग विशेषज्ञ की संख्या है केवल 117। और तो और 30 जिलों की जनता को आज भी शिशु स्वास्थ्य से जुड़ी बुनियादी सहूलियतों का इंतजार है। मगर सेंटर फार बजट गवेर्नेंस एंड अकाउंटबिलिटी के मुताबिक मध्यप्रदेश सरकार जीडीपी का केवल 0.1 % हिस्सा बच्चों के स्वास्थ्य पर खर्च करती है। इसी तरह आजीविका के लिए तैयार हुई राष्ट्रीय रोजगार गांरटी की चाल यह है कि प्रदेश सरकार बीते 4 सालों में इस योजना की पूरी राशि ही खर्च नहीं कर सकी है। इस योजना के तहत वित्तीय वर्ष 2005-06 से वित्तीय वर्ष 2008-09 के बीच कुल 9739 करोड़ 23 लाख रूपए आंवटित हुए जिसमें से खर्च हुए 8191 करोड़ 34 लाख रूपए ही। जिसमें से 3 साल तो ऐसे भी रहे कि जब वह केन्द्र सरकार के खाते की राशि तक खर्च नहीं कर सकी। सरकार कहती है कि इस योजना में 1 करोड़ 11 लाख 40 हजार जाब-कार्ड बन गए हैं मगर अबतक केवल 11 लाख लोगों को ही रोजगार मिल पाने के सवाल पर वह चुप है। जुलाई 2008 में सेंटर फार एन्वायरमेंट एण्ड फूड सेक्यूरिटी ने झाबुआ सहित प्रदेश के 5 जिलों के 125 गांवों में सर्वे किया और कहा कि सरकार के बहुत सारे दावे झूठे हैं। उसके मुताबिक यहां साल में औसतन 16 दिन ही रोजगार मिल पाता है। सीधी बात है कि सरकार की मंशा जो भी हो मगर योजनाएं शोषण या घूसखोरी पर जाकर दम तोड़ रही हैं।

कुल मिलाकर मध्यप्रदेश के अलग-अलग हिस्सों के नाम अलग-अलग हो सकते हैं मगर यहां शोषण...बेकारी...गरीबी...भूख...रोग...मौत का पहिया अपनी चाल से लगातार घूम रहा है। अंतत: इन अलग-अलग हिस्सों में स्वास्थ्य और आजीविका की ज्ञात स्थितियों को भी एक साथ जोड़कर देखें तो हमारे सामने आदिवासी आबादी पर कुपोषण के कहर की भयानक तस्वीर पेश होती है। जिसमें उसकी शक्ल भूख से होने वाली मौतों के लिए कुख्यात उड़ीसा, झारखण्ड और गुजरात की शक्लों से काफी मिलती-जुलती है।

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संपर्क :  shirish2410@gmail.com

25.11.09

सबको शिक्षा समान शिक्षा अभियान से जुड़ते लोग

शिरीष खरे


मुंबई। चाईल्ड राईटस एण्ड यू द्वारा मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम में संशोधन को लेकर छेड़े गए अभियान को अब महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड और बिहार सहित देशभर से जनसमर्थन मिल रहा है। इसके तहत 17 राज्यों से लगभग 200 एनजीओ और 6700 समुदायों के बीच बच्चों के संवैधानिक अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए मांगपत्र पर नागरिकों से हस्ताक्षर लिए जा रहे हैं। सबको शिक्षा समान शिक्षा नाम के इस अभियान में बच्चों के लिए जनजागरण, कार्यशालाओं और नुक्कड़ नाटकों का सिलसिला भी चल रहा है। इस अभियान से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि देश के हर बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देना सरकार की जवाबदारी है मगर मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के नाम से बनाये गए मौजूदा अधिनियम में बहुत सारी खामियां हैं। इस अभियान का आखरी पड़ाव 11 दिसम्बर है, जब हस्ताक्षरों वाली एक पुस्तिका राष्ट्रपति को सौंपते हुए उनसे 0 से 18 साल तक के बच्चों को मुख्य प्रावधान में लाने, सकल घरेलू उत्पाद का 10 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने और बस्ती से 1 किलोमीटर के भीतर सुविधायुक्त स्कूलों के साथ-साथ योग्य शिक्षकों के लिए भी मांग की जाएगी। क्राई ने इस अभियान से करीब 5 लाख नागरिकों के जुड़ने की संभावना जतायी है।


अभियान से जुड़ते लोग
अकेले मुंबई में 4 दिनों के भीतर 34 जगहों से करीब 20 हजार नागरिकों ने अपने हस्ताक्षर करके इस अभियान को समर्थन दिया है। इसके अलावा राजस्थान के पोकरन में जन मोर्चा राजस्थान और क्राई के संयुक्त तत्वावधान तथा स्थानीय जनसमूहों के सहयोग से शिक्षा के मौलिक अघिकार अधिनियम के भीतर जनपक्षीय बदलाव के लिए राजस्थान भर में अभियान शुरू किया गया है। इस मौके पर पंचायत समिति सांकड़ा के प्रधान अब्दुल रहमान मेहर ने कहा कि शिक्षा में गुणात्मक सुधार हो, हर बच्चे को समान शिक्षा के अवसर मिले तभी प्रतिभाएं निकलकर सामने आएगी और देश आगे बढ़ेगा। जनमोर्चा राजस्थान के कलाकारों सीपी व्यास, पवनकुमार, प्रकाश पन्नु, मुकेश द्विवेदी, जयदीप बीकानेरी, गोविंद, मोइनुद्दीन और उनके बहुत सारे साथियों ने आज की शिक्षा-राजनीति की वास्तविक स्थिति, विद्यालयों में शिक्षकों की कमी, पोषाहार घोटालों पर एक नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत किया।


उत्तरप्रदेश के लखनऊ में 40 करोड़ भारतीय बच्चों में से 20 करोड़ स्कूल नहीं जा पाते हैं- यह बात क्राई के शुभेंदु भट्टाचार्य ने प्रदेश के सभी जिलों में सबको शिक्षा समान शिक्षा अभियान चालाते हुए कही। उन्होंने आगे कहा कि आज से 20 साल पहले भारत सरकार ने देश के बच्चों को एक समान शिक्षा देने की बात कही थी। मगर आज 20 साल बीतने के बाद भो हाल जैसा का तैसा ही है। संसद ने तीन बार 1968, 1982 और 1992 में कामन स्कूल सिस्टम सर्वमान्य पाठशाला व्यवस्था लागू की है। मगर अभी तक बच्चों को समान शिक्षा नहीं मिल पा रही है। बच्चे इससे वंचित हैं। आज सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी है और प्राइवेट स्कूलों की संख्या बढ़ती जा रही, इससे अमीर घर के बच्चे तो वहां पढ़ रहे हैं मगर गरीब घर के बच्चों को सरकारी स्कूलों में ही पढना पढ़ रहा है। जहां पढ़ाई बस नाम की ही हो रही है। क्राई के मुताबिक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम में संशोधन करके इसे भारत का सबसे महत्वपूर्ण अधिनियम बनाया जा सकता है। इसके पहले शिक्षा समानता पद मार्च में बच्चे 'रोटी खेल पढाई प्यार, हर बच्चे का है अधिकार/जैसा बच्चा हुजूर का, वैसा मजूर का/राष्टपति का बेटा हो या चपरासी की हो संतान, सबको शिक्षा एक समान' जैसे नारे लगाकर लोगों से हस्ताक्षर करने की अपील की।


उत्तराखंड के गोपेश्वर में शिक्षा के अधिकार अधिनियम में संशोधन को लेकर चल रहे अभियान पर क्राई के उत्तराखंड प्रभारी मोहम्मद सलाम खान ने कहा कि स्कूलों में ही प्राइवेट स्कूल जैसी ही पढ़ाई हो और बच्चों को बाहरवीं तक शिक्षा की गारंटी दी जाए। इससे गरीब बच्चे न केवल बेहतर बल्कि आत्मविश्वास और ईज्जतदार तरीके से भी पढ़ सकेंगे। बिहार में भागलपुर के कला केन्द्र में क्राई के पूर्वी क्षेत्र के मैनेजर शरदेंदु बनर्जी ने बताया कि 6 साल से नीचे ही 6 करोड़ 70 लाख बच्चे हैंए जिन्हें 1993 में सर्वोच्च न्यायालय ने मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की गांरटी दी थी। जबकि इस विधेयक में उनका हक़ कट हो गया है। यह तो सभी बच्चों को शिक्षा के हक देने की बजाय पूर्ण शिक्षा की गारंटी में कटौती करने वाला विधेयक है। इस मौके पर परिधि संस्था के निदेशक उदय ने कहा कि या कि बिहार के 25 सौ से ज्यादा गांवों एवं 30 जिलों में हस्ताक्षर अभियान चलाया जाएगा।



चलते-चलते
क्राई के मुताबिक भारत की 53 प्रतिशत बस्तियों में स्कूल न होने के बावजूद इस बार के बजट पर बच्चों की शिक्षा पर कटौती की गई है। वह भी तब जब भारत 2015 तक स्कूली शिक्षा का लक्ष्य पूरा नहीं कर सकता है।

22.11.09

रेल के लिए ज़िंदगी रोक दी

शिरीष खरे



सूरत/ मीराबेन को अब नींद नहीं आती. क्यों? उनके पास इसका सीधा जवाब है, 'अगर आदमी को फांसी पर लटकाना तय हो, पर तारीख तय न हो तो उसे नींद कैसे आएगी?'




मीरा बेन और उनके जैसे सूरत शहर के हजारों लोग इन दिनों परेशान हैं. परेशानी का सबब है उनका आशियाना, जिसे कभी भी, कोई भी सरकारी अमला तोड़ कर चल देता है.

समय के छोटे-छोटे अन्तराल से शहर की बाकी झोपड़ियों की तरह मुंबई-अहमदाबाद मेनलाइन की झोपड़ियों को तोड़कर गिराया जाना आम बात है लेकिन इस बात की जिम्मेदारी कोई नहीं लेना चाहता कि उसने झोपड़ियां तोड़ी हैं. शहर की झोपड़ियों के तोड़े जाने पर पुनर्वास और राहत जैसे मुद्दे जुड़ जाते हैं और इस बार झोपड़ियों को गिरानेवालों ने नया तरीका निकाला. झोपड़ी किसने तोड़ी, इस सवाल का जवाब सब जगह से एक-सा आता है, ‘हमने नहीं उसने’. महापालिका के पास भी यही जवाब है और रेलवे के पास भी.

सवाल सिर्फ एक सूरत का नहीं है, देशभर में रेलवे पट्टियों के दाएं-बाएं बसी असंख्य झोपड़ियों का यही हाल है. इन्हें भी पुनर्वास की वाजिब व्यवस्था चाहिए, जो कि न रेलवे की नीति में दर्ज है और न राष्ट्रीय पुनर्वास की नीति में.

यहां कतारगांव से लगे 18 से ज्यादा झोपड़पट्टियों के 12 हजार से ज्यादा रहवासी जब माटी में मिले झोपड़े का सवाल उठाकर महापालिका और रेलवे के पास पहुंचते हैं तो दोनों पहले तो डेमोलेशन की जानकारी नहीं होने की बात कहते हैं. पर जब मालूम चलता है तो एक-दूसरे को कसूरवार ठहराते हैं. इस तरह, डेमोलेशन के दौरान दोनों आफिस वालों के आपसी कोर्डिनेशन' जैसे अगले सवाल लोगों की जवाब पर ही अटके रह जाते हैं.

जाहिर है, अगर दोनों ने ही डेमोलेशन नहीं किया तो उनमें से एक भी मुआवजा क्यों देगा? और यह कोई प्राकृतिक आपदा भी नहीं कि उम्मीदों को 'सरकारी पंख' ही लग जाए?


सवाल दर सवाल हैं
यहां रेलवे और महापालिका की जमीन के बीच में कम से कम 150 झोपड़ियां ऐसी भी हैं जिन्हें रेलवे का दावा है कि वह महापालिका की जमीन पर हैं, महापालिका का दावा  है कि वह रेलवे की जमीन पर हैं.यानी जब तक साबित नहीं होता तब तक के लिए सारे 'भगवान भरोसे' हैं. और साबित होने की कोई तारीख तय नहीं है.

हालांकि अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए रेलवे और महापालिका दोनों ही इस कोशिश में हैं कि अपने को इससे कितना अधिक दूर रखा जाए. महापालिका का कहना है कि झोपड़पट्टी वाला हिस्सा रेलवे की जमीन पर है इसलिए हम  बिजली और पानी भी नहीं दे सकते. लेकिन थोड़े से फासले पर मफतनगर और संगम टेकरी के लिए महापालिका बिजली-पानी पहुंचाता है. और जब मफतनगर और संगम टेकरी से शौचालय, आंगनबाड़ी, स्कूल के सवाल उठते हैं तो फिर वही जवाब होता है, 'आप रेलवे की जमीन पर हो'.

यह और बात है कि महापालिका के चुनाव में वोट लेने का जब सवाल आता है तो इस तरह के सारे जवाब  गायब हो जाते हैं. दिलचस्प यह भी है कि यहां के ज्यादातर रहवासी बुनियादी सहूलियतों की लालसा में टैक्स देना चाहते हैं लेकिन महापालिका लेना नहीं चाहता. यानी केवल वोट के सवाल पर इन झोपड़पट्टी के लोग ‘महापालिका के लोग’ हैं, अन्यथा ‘रेलवे के लोग’. देखा जाए तो झोपड़ियों तक रोशनी पहुंचाना, कायदे से महापालिका का फर्ज है मगर फायदे के मद्देनजर यह काम प्राइवेट कंपनी संभाले हुए हैं. इसी प्रकार, इन इलाकों में सरकार के बजाय स्वैच्छिक संस्थाएं आंगनबाड़ियां चलाती हैं.

11 फरवरी 2009 को, सरकारी कामकाज के समय यानी सुबह 10 से 1 और दोपहर 2 से 5 तक, रेलवेपट्टी के दोनों तरफ की 400 झोपड़ियां तोड़ी गईं. अंबेडकरनगर के ठाकुरभाई बताते हैं, 'डेमोलेशन दस्ते में 3 बुल्डोजर, 125 के आसपास पुलिस के जवान, 50 के आसपास रेलवे सुरक्षा गार्ड, बहुत सारे रेलवे के अधिकारी, कर्मचारी थे. आगे-आगे डेमोलेशन, उसके पीछे-पीछे महापालिका वाले नल, गटर के पाईप और बिजली के तार काटते जाते थे.'

लोग इस बात को लेकर उत्सुक थे कि अगले दिन झोपड़ियां कहां तोड़ी जाएंगी. लेकिन यह सवाल अनुत्तरित रह गया. अंबेडकरनगर जैसी झोपड़पट्टी के तमाम रहवासियों की तरह अंजू बेन भी इस उम्मीद में थीं कि कोई-न-कोई आएगा, तोड़-फोड़ रोक ही देगा. हर साल वोट लेने वालों से यह उम्मीद तो थी ही. लेकिन अगले दिन की सुबह के साथ तमाम उम्मीदों की भी उम्र टूटी और अंबेडकरनगर का ठिकाना उखाड़ फेका गया. सैकड़ों सिर के ऊपर से दुनिया, दुनिया की चाहरदीवारी में रखी मामूली सुख देने वाली सुविधाएं एक झटके में मिट्टी में मिल गईं.

कोई हमदम ना रहा
अंजू बेन के घर-गृहस्थी के तार तो टूटे ही, घरवाला भी टूट गया. अंजू बेन का पति सूरज यादव अच्छा खासा आटो चालक था, सप्ताह भर पहले ही उसने कोई 1500 रुपये लगाकर आटो की मरम्मत भी करवाई थी. लेकिन उस रोज झोपड़पट्टी तोड़ने वालों ने उसके साथ मारपीट की और आटो भी ले उड़े. सूरज ने अगली सुबह पुलिस की टेबल पर अपने आटो का सवाल रखा, जबाव मिला- अब वह एक सरकारी संपत्ति है. सूरज तब से अब तक लापता है.

मुसलमान परिवार की अंजू बेन ने 20 नंवबर, 1991 को सूरज यादव के साथ नई दुनिया बसायी थी. अंजू बेन 10 की उम्र में भारूच जिले के भाखोदरा से पिता की पान की टपरी के साथ सूरत चली आई थी, 10वीं पढ़ने के बाद वह सेठों के घरों में काम पर लगी. नई दुनिया बसाते ही उसे भाड़े के अलग-अलग मकानों को बदलना पड़ता था. बदलते हुए मकानों के बीच ही काजल हुई, और जब वह बड़ी होने लगी तो 1995 में अंजू बेन ने बराछा-कापुदरा पुलिस-स्टेशन के पीछे 30000 रूपए में झोपड़ा खरीदा. 2001 में उसने वह झोपड़ा डेढ़ लाख में इन उम्मीदों के साथ बेचा कि सस्ता झोपड़ा मिलेगा, बचे हुए पैसे से मजूरी की जगह कोई धंधा-पानी शुरू होगा.

इसी साल आटो तो आया लेकिन बाकी का पैसा चोरी हो गया. हादसे के 4 रोज बाद दिमागी असंतुलन बिगड़ने के चलते अंजू बेन को नवी सिविल अस्पताल लाया गया, सारी दवाईयां सदमे के सामने बेअसर-सी ही रहीं. ऐसी नाजुक घड़ी में अगला ठिकाना कोसाठ के भाड़े का झोपड़ा बना. 2006 की बाढ़ में वह भी साथ छोड़ गया.

दर-दर की ठोकर खाने के बाद आखिरी आशियाना अंबेडकरनगर रहा, यहां कुछेक महीने बीतते ही डेमोलेशन का पहला कहर झेला. लंबी खामोशी के बाद डेमोलेशन का दूसरा कहर अब ऐसा बरपा है कि घरबार तो दूर, घरवाला ही अलग हो चुका है.

इस बच्चे का हत्यारा कौन है ?
11 फरवरी को ही संगम टेकरी की मीरा बेन सहित कुल 168 रहवासियों की झोपड़ियां भी देखते-देखते जमींदोज कर दी गईं. मीरा बेन की झोपड़ी महापालिका की जमीन पर थी और पड़ोस की गोटी बेन की रेलवेकी जमीन पर. अभी भी मीरा बेन-गोटी बेन के सवाल जवाब मांगते हैं कि ‘झोपड़ियां तोड़ी किसने’, ‘मुआवजा देगा कौन’? जबाव में महापालिका ने रेलवे आफिस का पता बताया है, रेलवे के आफीसर ने महापालिका का ठिकाना.

मीरा बेन कहती हैं, 'अगर आदमी को फांसी पर लटकाना तय हो, मगर तारीख तय न हो तो उसे नींद कैसे आएगी? ऐसे ही है हमारी जिंदगी. बार-बार हमें हमारी झोपडियों सहित उजाड़ना है, बार-बार नुकसान सहना है, मगर कब- तारीख कोई नहीं जानता. इसलिए इधर कोई चाहकर भी न तो अपना झोपड़ा सजाता है, न ही झोपड़े का सामान बढ़ाता है. हमारे भीतर से तो बड़ी बिल्डिंग और कारों वाली तस्वीर चिपकाने की चाहत उड़ चुकी है. ‘कल भी आबाद रहेंगे’- इसी चाहत में राहत भरी नींद आ जाए, अब यही बहुत है.'

संगम टेकरी बांस के खूबसूरत फर्नीचर और माटी की मूर्तियां बनाने वाले भील, बसावा और मुसलमानों की बस्ती है. डेमोलेशन की मार से श्रीराम का पक्का मंदिर भी टूट चुका था. यहां के हिन्दू-मुसलमान कलाकारों ने बांस-लकड़ी की शानदार कलाकारी से मंदिर को तो दोबारा खड़ा कर लिया है लेकिन मंजू बेन के 2 दिन के लड़के को कौन लौटाएगा?

वह खाना बनाने-खाने का समय था, अचानक बुल्डोजर चलते ही पूरा समय हर तरफ अफरा-तफरी के माहौल में बदल गया. मंजू बेन को 5 किलो आटा बचाने के लिए 5 मिनट का भी समय नहीं मिला. वह हड़बड़ाहट में उसी खटिया पर गिरीं, जिस पर उनका 2 दिनों का बच्चा सो रहा था. 2 दिन पहले इस दुनिया में आया बच्चा दबा और हमेशा के लिए उसने आंखें मूंद ली. मगर बुल्डोजर न रूका.

बंटे हुए लोग
सामाजिक कार्यकर्ता भरत भाई कंथारिया कहते हैं, 'डेमोलेशन की ज्यादातर कार्यवाहियों मौसम के मिजाज को बिगड़ते हुए देखकर की जाती हैं. सारे झोपड़े एक साथ न तोड़कर, कभी 200 तो कभी 400 की संख्या में तोड़े जाते हैं, जिससे लोग संगठित न हो सकें. ऐसे हमले अचानक और बहुत जल्दी-जल्दी होते हैं.’

ऐसा नहीं है रेलवे पट्टी के लोगों का पुनर्वास महापालिका नहीं कर सकती. मुंबई में जब रेलवे पट्टी के लोगों को हटाया गया तो स्थानीय महापालिका ने बाशी और उससे लगे एक बड़े इलाके में पुनर्वास करवाए. जो बीते 2-3 सालों से लगातार चल भी रहे हैं. लेकिन देश भर की रेलवे पट्टियों के आसपास मौजूद बसाहटों के पुनर्वास की कोई ठोस रूपरेखा नहीं है. इससे जुड़े तमाम तथ्यों, उम्मीदों, संवेदनाओं और हकों से जुड़े सवाल भी फिलहाल रूके हुए हैं.

पचासों सालों से अपनी जगहों पर रूके लोगों के दिलों-दिमाग में ‘अस्थायी’ और ‘पराया’ होने का एहसास बरकरार है. रेलवे पट्टी की जनता कहीं अलग-अलग राज्य, जुबान, तो कहीं अलग-अलग जाति, धर्म, पार्टी जैसे धड़ों में बिखरी है, भटकी है. कुल मिला कर रेलवे पट्टी की बड़ी तादाद एक साथ होकर भी ‘एक’ नहीं है. उनके हिस्से में वोट भी हैं, उलझने भी. उनकी जिंदगी में पुनर्वास और बुनियादी सहूलियतों की उम्मीदें रेलवे की दो पटरियों की तरह हो चुकी हैं. जो सामानांतर चलती तो हैं, लेकिन मिलती कभी नहीं.