9.7.09

आम आदमी के बजट से बच्चे गायब

क्राई के मुताबिक 40 करोड़ बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा को अनदेखा किया गया।

मुंबई: 10 जुलाई, 2009। ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ ने केन्द्रीय-बजट 2009-10 को बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिहाज से असंतोषजनक बताया है। उसके मुताबिक आम आदमी के लिए खास बताए जाने वाले इस बजट में बच्चों की तीन बातों को दरकिनार किया गया है :

 हर साल स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या को देखते हुए स्कूली शिक्षा पर उम्मीद से बेहद कम खर्च हुआ है।

 प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम को ध्यान में रखते हुए अलग से पैसा नहीं रखा गया है। इस तरह बच्चों के लिए भोजन की सुरक्षा की गारंटी को अनसुना किया गया है।

 लंबे समय से आईसीडीएस को ‘सर्वभौमिक’ याने सभी जगह लागू करना का वादा, वादा बनकर ही रह गया है। आईसीडीएस के लिए जो 6,705 करोड़ रूपए बढ़ाये भी गए हैं वह उसके स्वरूप के मुकाबले कम है।
देखा जाए तो बच्चों पर खर्च के लिए कुल 5,100 करोड़ रूपए बढ़ाये गए हैं। यह बढ़ोत्तरी, हर साल बच्चों की बढ़ती संख्या के हिसाब से कम है। जहां स्कूली शिक्षा पर होने वाले खर्च को पिछली साल की तरह ही रखा गया है, वहीं स्वास्थ्य और भोजन की सुरक्षा पर होने वाले खर्च को भी बढा़या नहीं गया है। जैसे कि केन्द्रीय बजट में ‘सर्व शिक्षा अभियान’ के लिए 13,100 करोड़ रूपए और मिड-डे-मिल के लिए 8,000 करोड़ रूपए रखे गए हैं।
जैसे कि अमेरिका, इंग्लैण्ड और फ्रांस में कुल बजट का 6-7 प्रतिशत हिस्सा सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है। लेकिन भारत में कुल बजट का सिर्फ 3 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा पर और सिर्फ 1 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है। वैसे तो हम दुनिया के बड़े देशों की अर्थव्यवस्थाओं से मुकाबले की बातें करते हैं, लेकिन देश के 70 प्रतिशत गरीबों को नजरअंदाज करके आर्थिक दर बढ़ाने की बातों का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।’’ बातचीत के दौरान उन्होंने यह भी बताया कि- ‘‘एक तरफ प्रगति पर बढ़ते भारत को दर्शाया जा रहा है, दूसरी तरफ 1999-2000 से शिक्षा और स्वास्थ्य में होने वाले खर्च पर लगातार कटौती हो रही है, जो कि देश की विरोधाभाषी स्थिति को बयान करती है।’’

‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ के नजरिए से भारत जैसे देश में ‘सकल घरेलू उत्पाद’ याने जीडीपी का कम-से-कम 10 प्रतिशत हिस्सा स्कूली शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च किया जाना जरूरी है। सार्वजनिक खर्च के रुप में बुनियादी हकों पर सार्वजनिक खर्चो में कटौतियां करना कोई अच्छी नीति नही है, यह अर्थव्यवस्था के लिए भी नुकसानदायक है। शिक्षित और स्वास्थ्य भारत के बिना एक मजबूत अर्थव्यवस्था का सपना देखना बेकार है।

दीपांकर मजूमदार के मुताबिक- ‘‘यूपीए जिस बजट को जनता के अनुकूल बता रहा है, उसमें ‘राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी’ से जुड़े कई बड़े सवालों को उपेक्षित रखा गया है। इसी तरह देश की कुल आबादी में से बच्चों की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत है, लेकिन केन्द्र सरकार ने अपने बजट का सिर्फ 5.09 प्रतिशत ही बच्चों पर खर्च किया है। जो उनकी संख्या और जरूरतों के लिहाज से प्र्याप्त नहीं है।’’

अगर यह आम आदमी का बजट है तो आम आदमी की जरूरतों के हिसाब से उसे खर्च का हिस्सा क्यों नहीं मिला ? ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ यह भी कहता है कि :

 ‘नियंत्रक व महालेख परीक्षक’ याने सीएजी के मुताबिक सरकार ने 2009 के पहले तक ‘सर्व शिक्षा अभियान’ में होने वाले खर्च को सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया। अगर खर्च को सही तरीके से इस्तेमाल किया जाता तो सरकार के कुछ वादे और नारे पूरे हो जाते।

 सिर्फ नई आंगनबाड़ियां खोलना काफी नहीं है। पिछले कई सालों से आंगनबाड़ियों के बेहतर संचालन के लिए न तो कोई कारगर व्यवस्था बनी और न ही प्रशिक्षित कर्मचारियों पर ध्यान दिया गया है। यहां तक कि विकसित कहे जाने वाले राज्यों जैसे गुजरात और महाराष्ट्र में भी जिन आंगनबाड़ियों को मंजूरी मिली है वह ठीक तरह से काम नहीं कर पा रही हैं।

1 टिप्पणी:

creativekona ने कहा…

्सवाल इस बात का नहीं है कि कितना बजट बच्चों के लिये रखा गया----मुख्य मुद्दा यह है कि जो बजट मिलता भी है उसमें से हम बच्चों के लिये कितना खर्च करते हैं?
मुझे याद है मैनें 92 में आई सी डी एस का एक प्रोजेक्ट फ़ुलबगिया किया था।इसमें तीन एजेन्सियां शामिल थीं । आई सी डी एस,एन सी ई आर टी,आकाश्वाणी।बच्चों के लिये एक कर्यक्रम रेडियो पर प्रसारित होना था।एन सी ई आर टी में वर्कशाप हुईऽअकाश्वाणी लखनऊ ने कार्य्क्रम बना कर प्रसारित भी कर दिया ………पर आई सी डी एस ने आंगन्बाड़ी केन्द्रों पर ----कर्यक्रम सुनाने के लिये टू इन वन बंटवाया ही नहीं । अब ऐसे में बजट का होना न होना बराबर ही है।मैं इस प्रोजेक्ट में बतौर स्क्रिप्ट राइटर शामिल था।
हेमन्त कुमार