17.2.14

दिग्विजय सिंह के सियासी दरवाजे

शिरीष खरे

वाकया कोई पांच साल पहले का है. कांग्रेस के दिग्गज नेता जब भोपाल में पत्रकारों के बीच बैठे तो अपनी आदत से मजबूर घंटों बैठे और उठे तभी जब हर एक पत्रकार के सारे सवाल पूरे नहीं हो गए. उन दिनों यह चर्चा गर्म थी कि दिग्विजय सिंह को केंद्र में गृहमंत्री बनाया जा सकता है. इसीलिए किसी ने उनसे जब यह जानना चाहा कि क्या वाकई वे देश के गृहमंत्री बनना चाहते हैं तो एक पल के लिए उन्होंने अपने चेहरे को रहस्यपूर्ण बना लिया. उन्होंने वहां उपस्थित पत्रकारों से ही यह जानना चाहा कि कोई आदमी सांसद बने बिना भला कैसे देश का गृहमंत्री बन सकता है. उन्हें जब राज्यसभा से भी संसद तक पहुंचने का मार्ग याद दिलाया गया तो हाजिर जवाबी में माहिर दिग्विजय सिंह ने तपाक से जवाब दिया कि वे चोर दरवाजे की राजनीति नहीं करेंगे. दिग्विजय सिंह के कहने का सीधा अर्थ यही था कि वे जनता के बीच से चुनकर संसद तक पहुंचेंगे. अगले रोज उनका यह कथन जब अखबारों की सुर्खियां बना तो राजनीति में मामूली दिलचस्पी रखने वालों ने भी यह जान लिया कि इस तीर से दिग्विजय सिंह ने मध्य प्रदेश कांग्रेस के उन प्रतिद्वंदी नेताओं पर निशाना साधा है जो राज्यसभा के दरवाजे से संसद तक पहुंचते रहे हैं. समझने वाले समझ गए कि दिग्विजय सिंह ने उन सुरेश पचौरी पर तंज कसा है जो दो दशकों से राज्यसभा के मार्फत दिल्ली में राजनीति करते रहे हैं.

किंतु सच्चाई अब यह है कि बीते दिनों कांग्रेस ने उन्हीं दिग्विजय सिंह को उनके गृह राज्य मप्र से ही राज्यसभा का सांसद बनाया है. सवाल है कि समय के इस पड़ाव पर आखिर वे कौन-सी परिस्थितियां हैं जिनकी वजह से दिग्विजय सिंह को भी अब संसद के उसी कथित पीछे के दरवाजे से जाना पड़ गया है. लेकिन यह जानने से पहले यह जानना दिलचस्प रहेगा कि दिग्विजय सिंह की राजनीति क्या है?

वाकया तीस साल पहले का है. उन्हें जब मप्र कांग्रेस कमेटी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया तो यह भी साफ हुआ कि युवा चेहरे के रुप में वे ही तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी की पहली पंसद हैं. महज 36 साल की उम्र में उन्होंने जब कांग्रेस जैसी पार्टी में क्षेत्रफल की दृष्टि से तब देश के सबसे बड़े राज्य की कमान संभाली तो राजनीति का बड़ा सबक हासिल किया. बताते हैं कि दिग्विजय सिंह को मप्र में जब कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया जा रहा था तो यह बात उन्होंने सबसे पहले अपने राजनीतिक गुरू स्वर्गीय अर्जुन सिंह को बतायी थी. तब अर्जुन सिंह ने राजीव गांधी के सामने स्वयं उन्हें (अर्जुन सिंह) ही इस कुर्सी पर बैठाने का निवेदन किया था. कहते हैं कि बाद में राजीव गांधी ने दिग्विजय सिंह को दिल्ली बुलाया और पूछा था कि यह बात अर्जुन सिंह तक कैसे पहुंची. इसके बाद दिग्विजय सिंह के बीते ढाई दशकों की राजनीतिक यात्रा को देंखे तो वे जहां भी जाते हैं अपनी मौजूदगी से अपने इर्द-गिर्द एक खुला माहौल तैयार करते हैं. लेकिन उन्हें जानने वाले तब यह जानते हैं कि उसी समय वे अपने चारों तरफ उतने ही रहस्यपूर्ण बन जाते हैं.

पहली बार मप्र के मुख्यमंत्री बनने से लेकर अपने लिए सबसे विकट परिस्थितियों में भी अखिल भारतीय स्तर पर स्थापित करने के बीच घटी उनकी ढेरों अप्रत्याशित कहानियां ने उन्हें राजनीति की अबूझ पहेली बना दिया है. राज्यसभा में सांसद बनने की हालिया घटना के ठीक पहले तक भी वे यही कहते रहे कि सागर, इंदौर और विदिशा लोकसभा सीट में से किसी एक से चुनाव लडेंगे. गौर करें तो सागर लोकसभा सीट का एक बड़ा हिस्सा राघौगढ़ रियासत के अधीन आता था. लिहाजा दिग्विजय सिंह के अति विश्वसनीय समर्थकों ने सागर संसदीय क्षेत्र में चुनाव की तैयारी शुरू भी कर दी थी. लेकिन नतीजा दिग्विजय सिंह के कथन से ठीक उलट ही आया. और आखिर पहली दफा कांग्रेस ने उन्हें चुनावी राजनीति के फेर में पड़ने की बजाय राज्यसभा के लिए चुन लिया. लेकिन इसकी वजह जानने से पहले यह जानना जरूरी रहेगा कि यह पूरा घटनाक्रम आखिर घटा कैसे और कैसे इसने मप्र की राजनीति को प्रभावित किया?

27 जनवरी, 2014 का दिन राज्य की राजनीति में और एक दिलचस्प दिन की तरह बीता. जैसा कि मालूम है कि बीते विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हालत यहां इस हद तक पतली हो गई है कि कुल 230 सीटों में से उसके साठ विधायक भी नहीं बन सके. ऐसी स्थिति में यहां कांग्रेस से केवल एक व्यक्ति ही राज्यसभा के लिए भेजा जा सकता था. और इसीलिए कांग्रेस में कई बड़े नेताओं के बीच इस इकलौती सीट के लिए रस्साकसी जहां चरम पर थी वहीं पार्टी के नौजवान नेताओं को यह उम्मीद थी की युवा कार्ड के तौर पर उनकी भी लाटरी खुल सकती है. जाहिर है एक अनार के लिए सौ बीमार जैसे हालात ने यहां राज्यसभा सीट का महत्व काफी बड़ा दिया था. लेकिन राज्यसभा के लिए नाम की घोषणा होने का आखिरी दिन यानी 27 जनवरी भी जब बीतने लगा तो पार्टी के विधायकों की बैचेनी कहीं ज्यादा बढ़ चुकी थी. दोपहर को भोपाल में पार्टी विधायक दल की बैठक हुई. लेकिन यहां दिल्ली से यह संदेश प्राप्त हुआ कि हाइकमान ने अपने स्तर पर ही किसी को चुन लिया है. तब यह जिज्ञासा और अधिक बढ़ गई कि भला वह व्यक्ति है कौन? लेकिन शाम ढलते ही जिस नाम का खुलासा किया गया उसका अंदाजा तो दूर-दू तक नहीं था. इस पूरे परिदृश्य में दिग्विजय सिंह के अवतरित होने के साथ ही कांग्रेस में बगावत का बिगुल बज गया. वहीं विरोधी दल भाजपा के नेताओं की ओर से भी कुछ ऐसी प्रतिक्रियाएं आईं कि राज्य की ठंडी पड़ी राजनीति में तपिश आ गई.

27 जनवरी की शाम सभी खबरिया चैनलों पर ज्यों ही दिग्विजय सिंह के राज्यसभा में जाने की ब्रेकिंग न्यूज चली त्यों ही देवास से सांसद सज्जन सिंह वर्मा ने टेलीविजन कैमरामेनों के सामने ही सिंह के खिलाफ जमकर भड़ास निकाली. उनका कहना था कि मप्र, छत्तीसगढ़ और गुजरात जैसे राज्यों में जिन बुजुर्ग नेताओं ने कांग्रेस की लुटिया डुबोयी है उन्हीं को दिल्ली में बढ़ावा दिया जा रहा है. गौर करें तो कांग्रेस ने मप्र से दिग्विजय सिंह के अलावा छत्तीसगढ़ मोतीलाल वोरा और गुजरात से मधुसूदन मिस्त्री को भी राज्यसभा से भेजा है. कमलनाथ समर्थक गुट के वर्मा ने दिग्विजय सिंह पर तीखा हमला बोलते हुए यहां तक कहा, ‘दिग्विजय सिंह को अपने से बीस साल बड़े भाजपा के लालकृष्ण अडवाणी से प्रेरणा लेनी चाहिए जो अब भी लोकसभा चुनाव लड़ने का दम रखते हैं.’ दरअसल दिग्विजय सिंह ने दलील दी थी, ‘उनकी उम्र 67 साल हो चुकी है और यह उनके लिए राज्यसभा में जाने का सही समय है.’ वर्मा से पहले भी कांग्रेस के कई बड़े नेता जैसे सत्यव्रत चतुर्वेदी और कल्पना परूलेकर ने भी प्रदेश में पार्टी की करारी शिकस्त के लिए दिग्विजय सिंह को ही दोषी ठहराया था.

दूसरी तरफ, मजेदार यह भी है कि बात जब दिग्विजय सिंह की हो तो चुनावी लाभ उठाने के मामले में भाजपा कोई मौका नहीं चूकना चाहती. सिंह के राज्यसभा में जाने की खबर पुष्ट हो गई तो राज्य भाजपा में दूसरी पंक्ति के सभी बड़े नेताओं ने एक साथ और लगातार बयानबाजी तेज कर दी. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर और उमा भारती ने जो कहा उसका सार यही था कि हार के डर से दिग्विजय सिंह ने अपना इरादा बदल दिया है. उद्योगमंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘लोकसभा में जब कांग्रेस हारेगी तो संसद में पीछे के दरवाजे से गए दिग्विजय सिंह ही नेता प्रतिपक्ष बनेंगे.’ दरअसल लोकसभा का चुनाव नजदीक है और ऐसे में भाजपा की कोशिश है कि दिग्विजय सिंह के बहाने यह कहकर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ा जाए कि लड़ाई से पहले ही उनके सेनापति भाग गए हैं. वहीं भाजपा इसी बहाने जनता के बीच यह संदेश भी देना चाहती है कि कांग्रेस यहां इतनी बेदम हो चुकी है कि उनके बड़े नेता भी चुनाव में उतरने से बच रहे हैं.

इस पूरी सियासी पैंतरेबाजी के बीच दिग्विजय सिंह की राज्यसभा टिकट की यदि पड़ताल की जाए तो साफ होता है कि जैसा दिखता है वैसा है नहीं. यहां यह बात अहम नहीं है कि दिग्विजय सिंह क्या चाहते है. और न ही यह सवाल जायज है कि जैसा वे चाहते हैं वैसा पाने की हैसियत उनकी है या नही. बुनियादी सवाल यह है कि पार्टी उनका उपयोग किस प्रकार करना चाहती है. और दिग्विजय सिंह क्या उसके अनुरुप खुद को ढाल पाएंगे? पुराने तजुर्बे देंखे तो सिंह जैसे परिपक्व नेता जानते हैं कि पार्टी की लाइन असल में तलवार की ऐसी धार होती है जिससे फिसलते ही उनका कटना तय है. वे जानते हैं कि पार्टी हाइकमान नहीं चाहता कि दिग्विजय सिंह मप्र की राजनीति में सक्रिय दिखे. और यही वजह है कि खुद दिग्विजय सिंह भी सालों से यही दोहरा रहे हैं कि वे केंद्र की राजनीति में ही रहेंगे. यह सच है कि गृहराज्य होने की वजह से पार्टी के हर निर्णय के पीछे यहां उनकी भूमिका तलाशी जाती है. यह भी सच है कि उनके धुर समर्थक और विरोधी सियासी नफा-नुकसान के लिए उनका नाम मप्र की राजनीति में बार-बार घसीट लाते हैं. लेकिन दिग्विजय सिंह इस मामले में हमेशा से यह सर्तकता बरत रहे हैं कि यदि उन्होंने मप्र की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने में दिलचस्पी दिखायी तो यह उनके भविष्य की राजनीति के लिए ठीक नहीं रहेगा. यही वजह है कि बीते दस सालों से पार्टी ने भी उन्हें राज्य की राजनीति में कभी निर्णायक भूमिका नहीं सौंपी. 2008 का विधानसभा चुनाव जहां सुरेश पचौरी के नेतृव्य में लड़ा गया वहीं 2013 का चुनाव ज्योतिरादित्य सिंधिया को आगे करके लड़ा गया. 2013 के ही चुनाव प्रचार के दौरान भी कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी की मौजूदगी में उन्होंने सिंधिया के पीछे बैठते हुए यही जताना चाहा कि राज्य की राजनीति में या तो वे पीछे बैठे हुए हैं या उन्हें पीछे ही बैठाया गया है. और अब जबकि उन्हें राज्यसभा से चुना गया है तो सीधी-सी बात है कि पार्टी ने राष्ट्रीय स्तर पर ही उनकी भूमिका तय की है.

दूसरी बात यह है कि हाइकमान के काफी निकट होने की वजह से दिग्विजय सिंह जैसे सधे हुए नेता जानते हैं कि पार्टी का अगला कदम क्या होगा. उनका अपने पुत्र जयवर्धन सिंह को राघौगढ़ विधानसभा सीट से लड़ाने के साथ ही यह स्पष्ट हो चुका था कि अब उनके लिए मप्र में कोई बड़ी संभावना नहीं बची है. दरअसल सभी दलों ने खास तौर से युवा मतदाताओं को रिझाने के लिए कई प्रकार की मुहिम चलायी हुई हैं. ऐसे में राहुल गांधी ने मप्र में भी युवा नेतृव्य को ही मौका दिया है. यही वजह है कि उन्होंने खंडवा से युवा सांसद अरूण यादव को जहां पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया है वहीं कई बुजुर्ग विधायकों की मौजूदगी के बावजूद सत्यदेव कटारे को नेता प्रतिपक्ष बनाया है. जाहिर है कि लोकसभा का चुनाव पार्टी युवाओं को आगे करके लड़ना चाहती है. और इसीलिए हाइकमान ने दिग्विजय सिंह को राज्यसभा से ले जाना मुनासिब समझा. यही वजह है कि विधानसभा चुनाव के काफी पहले ही दिग्विजय सिंह ने भी अपने पुत्र जयवर्धन सिंह को राजनीति में लाने का रास्ता साफ कर दिया था. अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के एक पदाधिकारी के मुताबिक, ‘सिंह के विरोधियों ने राहुल गांधी तक ऐसी बातें पहुंचा दी थीं कि जब तक राज्य में सिंह जैसे बरगद रहेंगे तब तक पार्टी के भीतर नये पौधे पनप पहीं पाएंगे.’ इसीलिए हाइकमान ने सिंह को राज्यसभा में ससम्मान ले जाकर उनकी जिम्मेदारी बढ़ा दी है.

वहीं दिग्विजय सिंह के राज्यसभा में जाने के कुछ अलग मायने भी हैं. जैसा कि वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक गिरजा शंकर बताते हैं कि भाजपा और कांग्रेस सहित सभी दलों में अब यह परंपरा-सी बन गई है कि जो नेता पार्टी के लिए अनिवार्य हैं उन्हें राज्यसभा से चुन लिया जाए. वहीं जिन नेताओं के बिना भी पार्टी का काम चल सकता है उन्हें लोकसभा से लड़ने का मौका दिया जाए. यदि वे लोकसभा चुनाव जीतकर संसद तक पहुंचे तो अच्छी बात है, अन्यथा कोई बात नहीं. यदि भाजपा में ही देंखे तो अरूण जेटली और वेंकैया नायडू के अलावा राज्यसभा से पहुंचाये गए कई जरूरी नेताओं की एक लंबी सूची मिलेगी. गिरजा शंकर के मुताबिक, ‘यदि दिग्विजय सिंह को राज्यसभा से ले जाया गया है तो सीधी बात है कि बाकी नेताओं के मुकाबले पार्टी में उनका महत्व अधिक है. साथ ही इसका मतलब यह भी है कि पार्टी के लिए अब वे एक अनिवार्य नेता भी बन चुके हैं.’ इसके इतर देखा जाए तो कांग्रेस की तरफ से उनके पास कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्यों का प्रभार भी है. कर्नाटक में कांग्रेस की जहां नई-नवेली सरकार बनी है वहीं तेलंगाना राज्य की मांग के चलते आंध्र प्रदेश अत्यंत संवेदनशील राज्य बन चुका है. जाहिर है कि मप्र के बाहर ही दिग्विजय सिंह के कंधों पर पहले से ही इतनी अधिक जिम्मेदारियां डाल दी गई हैं कि उन्हें निभाना ही अपनेआप में बड़ी चुनौती रहेगी.

आखिर सवाल यही आता है कि कांग्रेस हाइकमान ने दिग्विजय सिंह को बीते एक दशक से मप्र की राजनीति से बाहर क्यों रखा है? इस कहानी को जानने के लिए इसी के साथ दिग्विजय सिंह की कहानी को भी जान लेना ठीक रहेगा. काबलेगौर है कि 1977 में जब हर जगह से कांग्रेस हारी तब दिग्विजय सिंह ने राघौगढ़ विधानसभा जीता था. 1993 का विधानसभा चुनाव उन्हीं के नेतृव्य में लड़ा और जीता गया था. जब वे पहली दफा मुख्यमंत्री बने तो 46 साल के युवा मैकेनिकल इंजीनियर को इस पद पर देखकर लोगों ने कुछ ज्यादा ही उम्मीदें पाल ली थीं. लेकिन इंजीनियरिंग जैसी आधुनिक शिक्षा पाने के बावजूद वे राजनीति के परंपरागत रुप में ही नजर आए. वे उन तमाम सियासी हथकंडों को अपनाते नजर आएं जिन्हें नेता किया करते हैं. उनकी छवि को तब और धक्का लगा जब सरकारी नौकरियों में भर्ती अभियानों पर रोक लगा दी गई. दिग्विजय सिंह ने सोशल इंजीनियरिंग में तो खूब हाथ बटाया लेकिन आधुनिक विकास की पटरी से मप्र औंधे मुंह गिर गया. खास तौर पर बिजली, पानी और सड़क की हालत इस हद तक बिगड़ गईं कि तब उन्हें लेकर भांति-भांति के चुटकुलें गढ़े गए. ऐसा ही एक चुटकुला तब खूब चला कि यदि आप हवाई जहाज से जा रहे हैं और बीच रास्ते में आपको झटका लगे तो समझ जाना कि मप्र आ गया है. यही वजह थी कि 2003 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को यहां महज 38 सीटें मिली थीं. इसके बाद भाजपा ने हर विधानसभा चुनाव में दिग्विजय सिंह के कार्यकाल को याद दिलाया और यह डर दिखाया कि यदि कांग्रेस लौटी तो वे फिर आ जाएंगे. वहीं कांग्रेस भी उनके नाम को लेकर इतनी हतोत्साहित दिखी कि सत्ता के विकेंद्रीकरण और शिक्षा के लोक-व्यापीकरण जैसी उनकी उपलब्धियों को भी चुनावी मुद्दा नहीं बना सकी.

कांग्रेस के भीतर दिग्विजय सिंह के विरोधियों ने भी उनकी इसी कमजोरी का फायदा उठाते हुए दिल्ली में हाइकमान को यह डर दिखाया कि यदि दिग्विजय सिंह को मप्र के किसी भी चुनाव में आगे किया गया तो समझो पार्टी की हार पक्की है. लेकिन दिग्विजय सिंह के पास अपनी कमजोरी को ताकत में बदलने का हुनर भी है. लेकिन अपनी कमजोरी को ताकत बनाने में माहिर दिग्विजय सिंह को इसका फायदा भी मिलता रहा. नतीजा यह हुआ कि जैसे-जैसे उन्हें मप्र से दूर रखा गया वैसे-वैसे उन्हें दिल्ली में और अधिक मजबूत होने का स्वाभाविक मौका मिलता गया.

अपनी कमजोरी को ताकत बनाने में माहिर दिग्विजय सिंह की कई कहानियां हैं. उन्होंने 2003 विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेसियों के भड़ास सम्मेलन आयोजित किए. इनमें कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को खुलकर बोलने की इजाजत थी. ऐसे ही एक सम्मेलन में उन्होंने सोनिया गांधी के सामने ही वरिष्ठ नेता रामेश्वर नीखरा को अपनी ही सरकार के एक मुख्यमंत्री के खिलाफ बोलने का मौका दिया. जब नीखरा ने अपनी बात पूरी कर ली तब सिंह ने अकेले में सोनिया गांधी को भी सारी बातें स्पष्ट कर दीं. इसका फायदा यह हुआ कि तब वे बाकी विधायकों द्वारा बनाए जा रहे सभी दवाबों से बच गए. कुल मिलाकर, मप्र की राजनीति में दिग्विजय सिंह को ऐसा अमीबा कहा जाता है जिसे जितना काटो-छांटो वह उतना अधिक फलता-फूलता है.

1 टिप्पणी:

Mr Vadhiya ने कहा…

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