31.8.10

कितने असुरक्षित सुरक्षित देश के बच्चे

शिरीष खरे

क्या आप जानते हैं कि भारत के ग्रामीण इलाकों में तीन साल से कम उम्र के 40% बच्चों का वजन औसत से कम है, जबकि 45% का विकास सही तरीके से नहीं हो पाता है. बच्चों को पोषणयुक्त भोजन मुहैया कराने के मामले में भारत अपने पड़ोसी देश बांग्लादेश और नेपाल से भी पीछे है. बच्चों को पोषणयुक्त भोजन मुहैया कराने के मामले में 51 देशों के बीच भारत का स्थान 22वां है.

सरकारी आकड़ों के लिहाज से देश की 37.2% आबादी गरीबी रेखा के नीचे है. जो दर्शाती है कि देश में गरीबी बहुत तेजी से बढ़ रही है. यानी जितना हम सोचते हैं उससे कहीं ज्यादा बच्चे गरीबी में जीने को मजबूर हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के कुल कुपोषित बच्चों में से 49% भारत में हैं. अर्थव्यवस्था से जुड़े तमाम बड़े बड़े दावों के बावजूद भारत में बच्चों की कुपोषण से होने वाली मौतें बढ़ती ही जा रही हैं. देश में एक सेकेण्ड के भीतर 5 साल के नीचे का एक बच्चा कुपोषण के कब्जे में आ जाता है.

इसी तरह देश के 3.5 करोड़ बच्चे बेघर हैं जिनमें से 35000 बच्चों को ही आश्रय मिल सके हैं. इन आश्रयों में से भी बहुत सारे गैर सरकारी संगठनों द्वारा चलाये जा रहे हैं. मानवाधिकार संगठन के मुताबिक फुटपाथ पर रात बिताने वाले करीब 1 करोड़ बच्चों में से ज्यादातर को यौन-शोषण और सामूहिक हिंसा झेलनी पड़ती हैं. दिल्ली में जून 2008 से लेकर जनवरी 2009 तक 2210 बच्चे लापता हुए हैं. दिल्ली में एक दिन में औसतन 17 बच्चे गायब हो रहे हैं. गैर-सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में हर साल 72 लाख बच्चे गुलामी का शिकार हो रहे हैं. इनमें से एक तिहाई दक्षिण एशियाई देशों के होते हैं. गैर-सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर साल 45 हजार बच्चे गायब हो रहे हैं. अध्ययन कहते हैं कि गायब हुए बच्चों से मजदूरी कराई जाती है, या उन्हें सेक्स वर्कर बना दिया जाता है.

हालांकि केंद्र सरकार उन राज्य सरकारों के प्रति नाराजगी जताती रही है है जो केंद्र की समेकित बाल संरक्षण योजना पर हस्ताक्षर तो चुके हैं मगर उसके बाद से अपने यहां बाल संरक्षण आयोग का गठन तक नहीं कर सके हैं. कुपोषण, असुरक्षा जैसी तमाम समस्याओं की मार झेलते भारतीय बच्चों की एक बड़ी समस्या अनेक कारणों से की जाने वाली मजदूरी भी है. बाल अधिकारों से जुड़ी अनेक अंतरराष्ट्रीय संधियों का हस्ताक्षरकर्त्ता होने के बावजूद भारत बाल मजदूरों का गढ़ बन चुका है. पूरी दुनिया में 24.6 करोड़ बाल मजदूर हैं, जबकि केंद्र सरकार के अनुसार देश में 1.7 करोड़ बाल मजदूर हैं जिनमें से 12 लाख खतरनाक उघोगों में काम करते हैं. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के बाल मजदूरी से जुड़े आकड़ों के मुताबिक सेक्स इंडस्ट्री में खासतौर से लड़कियों की तस्करी विभिन्न यौन गतिविधियों के लिए हो रही है. इसी तरह घरेलू मजदूरी में भी लड़कियों की संख्या सबसे ज्यादा होती है.

तस्करी और लापता बच्चों के बीच गहरे रिश्ते का खुलासा एनएचआरसी की रिसर्च रिपोर्ट (2004) भी करती है जिसमें कहा गया है कि भारत में हर साल 30 हजार से ज्यादा बच्चों के लापता होने के मामले दर्ज होते हैं. इनमें से एक-तिहाई का पता नहीं चलता है. दक्षिण एशिया में दुनिया के किसी अन्य हिस्से के मुकाबले सर्वाधिक बाल-विवाह भारत में होते हैं. भारत में 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 44.5% (करीब आधी) औरतें ऐसी हैं जिनकी शादियां 18 साल के पहले हुईं हैं. इन 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 22% (करीब एक चौथाई) औरतें ऐसी हैं जो 18 साल के पहले मां बनीं हैं. इन कम उम्र की लड़कियों से 73% (सबसे ज्यादा) बच्चे पैदा हुए हैं. फिलहाल इन बच्चों में 67% (आधे से बहुत ज्यादा) कुपोषण के शिकार हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक बाल-विवाह बच्चियों का जीवन बर्बाद कर रहा है. देश में बच्चों का लिंग अनुपात 976:1000 है, जो कुल लिंग अनुपात 992:1000 के मुकाबले बहुत कम है.

शिक्षा के लिहाज से तो बच्चों की हालात कुछ ज्य़ादा ही पतली है. देश की 40% बस्तियों में तो स्कूल ही नहीं हैं. 48% बच्चे प्राथमिक स्कूलों से दूर हैं. 6 से 14 साल की कुल लड़कियों में से 50% लड़कियां तो स्कूल से ड्राप-आऊट हो जाती हैं.

इन सबके बाबजूद पिछले बजट में बच्चों के हकों से जुड़े कई शब्दों से लेकर ‘सर्व शिक्षा अभियान’ और ‘मिड डे मिल’ जैसे योजनाओं को अपेक्षित जगह नहीं दी गई. कुल बजट में 25% की बढ़ोतरी तो की गई है मगर बच्चों की शिक्षा पर महज 10% की ही बढ़ोतरी हुई. यानी आमतौर पर बढ़ोतरी दर में से बच्चों की शिक्षा में 15% की कमी हुई.

जहां बाल-कल्याण की विभिन्न योजनाएं असफल होती दिख रही हैं, वहीं बच्चों के कल्याण के लिए बजट (2009-10) में राशि का प्रावधान अपेक्षित अनुपात में घोषित नहीं किया जाता है. जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा को अनदेखा किया गया है. अमेरिका, इंग्लैंड और फ्रांस में कुल बजट का 6-7% हिस्सा सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है, मगर भारत में कुल बजट का मात्र 3% शिक्षा और सिर्फ 1% स्वास्थ्य पर खर्च होता है. अगर भारत सरकार यह दावा करती है कि वह बाल कल्याण और सुरक्षा के लिए प्रयासरत है तो उसे इस सवाल का जवाब भी देना होगा कि आखिर स्वास्थ्य की दृष्टि से भारत अपने से भी गरीब कहे जाने वाले पिछड़े देशों से भी पीछे क्यों खड़ा है ?

30.8.10

दिल्ली 2010 : शोषण का खेल चालू है

शिरीष खरे

राष्ट्रमंडल खेल दिल्ली को दुनिया के बेहतरीन खेल शहरों में शामिल कर जाएंगे. यह अभी तक के सबसे मंहगे राष्ट्रमंडल खेल होंगे. यह अभी तक के सबसे सुरक्षित राष्ट्रमंडल खेल भी होंगे. राष्ट्रमंडल खेलों के सफल आयोजन के साथ ही भारत को एक आर्थिक महाशक्ति के रुप में पेश कर सकेंगे.

रूकिए-रुकिए, बड़े-बड़े दावों के बीच कहीं यह उपलब्धि भी छूट न जाए कि मजदूरों के नाम पर उपकर के जरिए सरकार ने केवल राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ी परियोजनाओं से करीब 500 करोड़ रूपए उगाया है. और यह भी कि बदले में मजदूरों के कल्याण के लिए एक भी योजना को लागू नहीं किया है. और हां, यह जानकारी भी कि राष्ट्रमंडल खेल निर्माण स्थलों पर काम के दौरान अब तक सौ और श्रम संगठनों के मुताबिक दो सौ से ज्यादा मजदूर मारे जा चुके हैं और उनमें से एक को भी मुआवजे के रूप में एक रूपया भी नहीं मिला है. ऐसे और इससे भी भयावह कई तथ्य, आंकड़े और झूठ के खेल मजदूरों की छाती पर पसरे हुये हैं. आश्चर्य नहीं कि इन कारणों से यह राष्ट्रमंडल खेल अभी तक के सर्वाधिक शोषण वाले खेलों में भी शामिल हो जाये.

3 अगस्त, 2006 को दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में बुनियादी ढ़ांचे के विकास पर अलग-अलग एजेंसियों द्वारा व्यय की गई राशि का जिक्र करते हुए दिल्ली के वित्त एवं लोक निर्माण विभाग मंत्री एके वालिया ने कुल 26,808 करोड़ रूपए के खर्च का ब्यौरा दिया था. तब से अब तक दिल्ली को सुसभ्य राजधानी बनाने के चलते बजट में तो बेहताशा इजाफा होता रहा है, मगर मजदूरों को उनकी पूरी मजदूरी के लिए लगातार तरसना पड़ा है.

गुलाब बानो अपने शौहर मंजूर मोहम्मद के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय परिसर स्थित राष्ट्रमंडल खेल निर्माण स्थल में काम करती हैं. यहां आठ साल का बेटा चांद मोहम्मद भी उनके साथ है, और वहां पश्चिम बंगाल के चंचुल गांव में चांद से बड़े भाई-बहन हैं. गुलाब बानो कहती हैं, ‘‘यह इतना छोटा है कि खुद से खा-पी भी नहीं सकता है. कई जान-पहचान वालों ने हमें बताया था कि दिल्ली में काम मिल जाता है, सो चांद के अलावा बाकी सब कुछ वहीं छोड-छाड़ के हम चले आए हैं.’’

यहां ईंटों के ढ़ेर से गुलाब बानो एक बार में 10-12 ईंटें सिर पर उठाती हैं, फिर उन्हें स्टेडियम की ऊंची सीढ़ियों तक ले जाते हुए राजमिस्त्री के सामने उतारने के बाद लौटने का क्रम सैकड़ों बार दोहराती हैं. जहां गुलाब बानो को 125 रूपए प्रतिदिन मिलते हैं, वहीं उनके शौहर को उनसे थोड़ा ज्यादा 150 रूपए प्रतिदिन. मगर गुलाब बानो कहती है ‘‘ठेकेदार के आदमी ने तो हमसे कहा था कि औरतों को 250 रूपए रोजाना और मर्दों को 300 रूपए रोजाना दिया जाएगा.’’ यानी ठेकेदार के जिस एजेंट ने इस जोड़े से जितनी मजदूरी यानी 550 रुपये देने का वादा किया था, उसका आधा 275 रूपए प्रतिदिन भी इन्हें नहीं दिया जा रहा है.

पच्चीस साल के बिरजू का डेरा राष्ट्रमंडल खेल गांव से लगे अक्षरधाम मंदिर के पास है. बीरजू कहते हैं ‘‘जब तुम लोग साइट पर आए थे तो काम से निकाल दिए जाने के डर के मारे मैं बात नहीं कर सका था. वैसे बाहरी आदमियों को वहां कम ही भटकने दिया जाता है.’’

15 महीने पहले जब बिरजू मध्यप्रदेश के कटनी स्टेशन से ट्रेन के सामान्य डिब्बे में सवार होकर दिल्ली आये तो उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों के बारे में सुना भी नहीं था. वह बताते हैं "अगर कोई आदमी साइट पर आकर सुपरवाईजर से पूछे तो वह दिखावा करता है. कहता है कि हर मजदूर को 200 और राजमिस्त्री को 400 रूपए रोजाना दिया जाता है, जबकि हमारा आधा पैसा तो बीच वालों की जेबों में जाता है.’’

बिरजू के साथ के बाकी मजदूरों से भी पता चला कि मजदूरी के भुगतान में देरी होना एक आम बात है. अगर ठेकेदार के आदमियों से पूछो तो वह कहेंगे कि पूरा पैसा तो अधर में ही अटका पड़ा है, फिर भी घर लौटने से पहले-पहले सभी का पूरा हिसाब-किताब जरूर कर दिया जाएगा. खुद बिरजू का बीते दो महीने से 4000 रूपए से भी ज्यादा का हिसाब-किताब बकाया है. इसमें से पूरा मिलेगा या कितना, उसे कुछ पता नहीं है.

फरवरी, 2010 को हाईकोर्ट ने दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों के निर्माण स्थलों पर मजदूरों की स्थिति का आकलन करने के लिए संयुक्त राष्ट्र के पूर्व राजदूत अरूधंती घोष सहित कई सम्मानीय सदस्यों को लेकर एक समिति गठित की थी.

इस समिति ने कानूनों की खुलेआम अवहेलना करने वाले ठेकेदारों के तौर पर कुल 21 ठेकेदारों की पहचान की थी. तब समिति ने मजदूरों का भुगतान न करने वाले ठेकेदारों के खिलाफ कठोर दंड के प्रावधानों की सिफारिश की थी. इसी के साथ समिति ने कई श्रम कानूनों को प्रभावशाली ढंग से लागू करने की भी मांग की थी. समिति के रिपोर्ट के आधार पर दिल्ली हाइकोर्ट ने निर्देश भी जारी किए थे. इसके बावजूद यहां कानूनों के खुलेआम अवमानना का सिलसिला है जो रुकने का नाम नहीं ले रहा. 

25 मई, 2010 को दिल्ली हाईकोर्ट ने केन्द्र और राज्य सरकारों से कहा कि वह राजधानी की अलग-अलग निर्माण स्थलों में ‘दिल्ली भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड’ के तहत पंजीकृत किये गए मजदूरों के अधिकारों को सुनिश्चित करें. तब दिल्ली हाईकोर्ट का यह नोटिस नई दिल्ली नगर निगम, दिल्ली विकास प्राधिकरण और भारतीय खेल प्राधिकरण को भेजा गया था.

इसी से ताल्लुक रखने वाला दूसरा तथ्य यह है कि दिल्ली हाइकोर्ट में दायर एक जनहित याचिका के अनुसार, राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़े कुल 11 आयोजन स्थलों पर 4,15,000 दिहाड़ी मजदूर काम कर रहे हैं. जबकि ‘दिल्ली भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड’ के साथ पंजीकृत मजदूरों की संख्या 20,000 के आसपास दर्ज है. जाहिर है, लाखों की संख्या में मजदूरों को पंजीकृत नहीं किया गया है. यानी दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में लाखों की संख्या में मजदूरों के अधिकारों को सुनिश्चित किये जाने की जबावदारी से सीधे-सीधे बचा गया है.

बिरजू ने बताया कि उनका परिवार भी उनके साथ यही ठहरा हुआ है. जब देखा तो पाया कि उनका पूरा परिवार तो प्लास्टिक के मामूली से तम्बू में तंगहाल है, जिसमें एक भी दरवाजा और खिड़की होने का सवाल ही नहीं उठता है. पूरे परिवार को शौच से लेकर नहाने तक के रोजमर्रा के काम खुले में ही करने हैं. यह तंबू सुरक्षा के लिहाज से भी ठीक नहीं है. यह न बारिश से बचाव कर सकता है और न धूप से. बिरजू का परिवार ठेकेदार के जिस एजेंट के जोर पर यहां तक पहुंचा है, वह इन दिनों रहने के बंदोबस्त सहित बहुत सारे वायदों को लेकर ना-नुकर कर रहा है.

बिरजू की पत्नी कलाबाई के पैरों का दाहीना तलुवा पट्टियों से बंधा हुआ है. पूछने पर वह बताती हैं ‘‘यह चोट तो काम करते समय लगी है. दवाई की बात सुनते ही ठेकेदार ने भगा दिया था. वहां साइट पर तो कोई न कोई घायल होता ही रहता है. मगर किसी तरह के मदद की कोई उम्मीद नहीं है.’’

ऐसे निर्माण स्थलों पर कई खतरनाक कामों को अंजाम देने वाले मजदूरों को सुरक्षा संबंधी बुनियादी चीजें जैसे दास्ताने या जूतों के बगैर काम करते हुए देखा जा सकता है. यहां मजदूरों की जिंदगी को दांव पर रखे जाने को भी क्या राष्ट्र सम्मान से जुड़ा मसला मान लिया जाए ?

दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों का समय जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे सभी तैयारियों को समय पर पूरा करने का सबसे ज्यादा दबाव मजदूरों पर पड़ रहा है. इसी क्रम में मजदूरों के काम के तयशुदा घंटे और सुरक्षा मानकों जैसे जरूरी पैमानों को नजरअंदाज बनाया जा रहा है और असुरक्षित तरीके से रात-दिन मजदूरों से काम कराया जा रहा है. इस बीच खेल मंत्री एमएस गिल द्वारा राज्यसभा में दिये गए कथन के मुताबिक "जल्द ही प्रधानमंत्री कुछ आयोजन स्थलों का दौरा कर सकते हैं."

तैयारियों में हो रही देरी और अनियमितताओं की खबरों के बीच वह यहां से देख सकते हैं कि कैसे अक्टूबर के पहले सप्ताह से शुरू होने वाले इस आयोजन के लिए मेजर ध्यानचंद्र नेशनल स्टेडियम, आरके खन्ना स्टेडियम, जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम और तालकटोरा इंडोर स्टेडियम सहित जगह-जगह फ्लाई ओवर, सब-बे, फुट ब्रिज, ओवर ब्रिज, जल निकासी लाईन, मेट्रो लाईन, रोड लाईन, पार्किंग लाईन, पावर प्लांट, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट तैयार करने के साथ-साथ मजदूरों के शोषण का कार्य भी युद्धस्तर पर चालू है.

राष्ट्रमंडल खेलों के निर्माण स्थलों पर बने अस्थायी शिविरों में रहने वाले मजदूर परिवारों को कई बुनियादी अधिकारों जैसे आवास, स्वच्छता, सुरक्षित वातावरण, गुणवत्तापूर्ण भोजन, स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य और स्कूली शिक्षा से बेदखल रखा गया हैं. गरीबी के चलते बड़ी संख्या में बच्चों को अपनी-अपनी जगहों से पलायन करके यहां आना पड़ा है, नतीजन उसी अनुपात में यह बच्चे स्कूलों से ड्राप आउट भी हुए हैं. देखा जाए तो मामला चाहे मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी मिलने का हो, या अस्थायी शिविरों के घटिया हालातों का हो, कुल मिलाकर यहां मजदूरों के बच्चों को भारी खामियाजा उठाना पड़ रहा है.

बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था 'क्राई' की डायरेक्टर योगिता वर्मा कहती हैं- ‘‘बच्चों को लेकर हमारे कई संवैधानिक दायित्व हैं, राष्ट्रमंडल खेलों को विश्वस्तरीय बनाने की कोशिश में इन संवैधानिक दायित्वों को अनदेखा नहीं किया जा सकता है.’’

क्राई ने सिरीफोर्ट साईट से ली गई अपनी सेम्पल स्टडी में पाया है कि

• इस साइट के बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं.

• यहां या आसपास में चाईल्डकेयर यानी बच्चे की देखभाल जैसे आंगनबाड़ी वगैरह की भी कोई सुविधा नहीं है.

• यहां रहने के स्थानों की हालत दयनीय है, खासतौर से बच्चों के लिए न खाने के इंतजाम हैं, न सोने के.

• यहां प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध नहीं है.

• शौचालय की सेवा भी लगभग न के बराबर हैं.

• यहां तकरीबन सभी मजदूर परिवार गरीबी रेखा से नीचे हैं.

• यहां 84% मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी दी जा रही है.

बारह साल का रौशन भी अपने परिवार के साथ बिहार के औरंगाबाद से दिल्ली चला आया है. उसके पिता एक राजमिस्त्री हैं, जो कि अक्षरधाम मंदिर स्थित निर्माण स्थल पर काम करते हैं. रौशन, अपने भाई-बहन और माता-पिता के साथ 8X8 फीट वाली टीन की चादरों के घेरे में रहता है. हैरत की बात है कि यहां हरेक परिवार चाहे वह कितना भी छोटा या बड़ा हो, के हिस्से में यह टीन के चादरों वाला एक ही आकार-प्रकार का एक ही सकरा घेरा आता है.

हालांकि इसमें एकमात्र दरवाजा भी है, जिसे बंद तो किया जा सकता है, मगर जिसके बंद करते ही सभी को सुरक्षा की कीमत भी चुकानी पड़ती है. टीन की चादरों वाली उस झोपड़ी में एक भी खिड़की जो नहीं है. भीतर बिजली भी नहीं है. इसलिए कोई बच्चा पढ़ना भी चाहे तो भी नहीं पढ़ सकता है. टीन के इन कथित आश्रयों के भीतर मजदूर महिलाएं अगर आग जलाकर रोटी सेंकना भी चाहें तो टीन के चलते वह भी नहीं सेंक सकती हैं.

जबकि पानी के बंदोबस्त के नाम पर यहां हर रोज इनके सामने गैरजिम्मेदाराना तरीके से टैंकर का पाइप खोल दिया जाता है. इसी तरह पचासों लोगों के सामने एक शौचालय होता है. कुलमिलाकर यहां रूके मजूदरों को ऐसे हालातों के बीच रहना पड़ रहा है, जिसमें बीमार पड़ने की आशंकाएं सबसे प्रबल रहती हैं.

रौशन की मां जब काम पर जाती है तो अपने साथ 6 महीने की बच्ची को भी ले जाती है. इस बच्ची को साइट पर जहां उसके लायक खाना मुमकिन नहीं है, वहीं यह धूल, गर्मी, शोर और अन्य तरह के जोखिमों के बीच रहने को मजबूर है. स्वभाविक तौर से घातक कारकों का ऐसा संयोजन बहुत सारे बच्चों को कुपोषण, उच्च रूग्णता और मृत्यु-दर की तरफ ले जाता है, और जिसका ठीक-ठीक आंकड़ा मिलना भी मुश्किल होता है.

यहां गौर करने लायक बात यह है कि तकरीबन 450 किलोमीटर लंबे मार्ग में रौशनी का बंदोबश्त करने के बावजूद 80% दिल्ली निवासी रौशनी सहित पानी, सड़क, सीवर, स्कूल और अस्पताल जैसी बुनियादी सहूलियतों से महरूम ही रहेंगे. और यहां गौर करने लायक बात यह भी है कि राष्ट्रमंडल खेलों के निर्माण स्थलों पर काम करने वाले ज्यादातर मजदूर परिवार उन गांवों से आए हुए हैं, जहां कई सालों से सूखा या सैलाब आ रहा है. सूखा और सैलाब से निपटने के हिसाब से जहां सरकार के पास पैसा न होने का रोना है, वहीं 12 दिनों के आयोजन के लिए सरकार यहां पानी की तरह पैसा बहा रही है. गौरतलब है अमेरिका की कुल आबादी से कहीं अधिक तो यहां भूख और कुपोषण से घिरे पीड़ितों की आबादी का आकड़ा है. यहां से सवाल उठता है कि सरकार द्वारा अपने दामन पर लगे ऐसे बहुत सारे दागों को अगर किसी चमकदार आयोजन या राष्ट्रीय स्मारकों को बनाने के मार्फत छिपाया भी जाएगा तो किस तरह से और कितनी देर तलक ?

जबकि भारत दुनिया के भूख सूचकांक में 66वें नम्बर है, जहां 77% लोग एक दिन में 20 रूपए भी नहीं कमा पाते हैं, जहां 83.7 करोड़ लोग अत्यंत गरीब और मलिन हैं, जहां 12 सालों में 2 लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्याएं की हैं, जहां 5 साल से कम उम्र के 48% बच्चे सामान्य से कमजोर जीवन जीते हैं, वहां झूठे गौरव का जयकारा लगाने मात्र के लिए पूरे देश भर का पैसा दिल्ली के कुछ इलाकों में न्यौछावर किया जाना कहीं से न्यायोचित नहीं लगता है.

यहां से यह सवाल भी उठता है कि खाद्य सुरक्षा अधिनियम के लिए जब सरकार के पास पर्याप्त पैसा नहीं है तो भारतीयों में खेलों के प्रति जागरूकता और खेल संस्कृति पैदा करने के नाम पर उसके पास इतना पैसा कहां से आया है ?

16.8.10

मुक्ति की बाट जोहते कतकरी

शिरीष खरे

हालांकि रायगढ़ के तुंजा कतकरी के पास अपनी संपत्ति के नाम पर शरीर पर लटके मटमैले कपड़ों के सिवाय बताने लायक कुछ भी नहीं है. इसके बावजूद चोरी के आरोप में पुलिस उसे दर्जनों बार गिरफ्तार कर चुकी है और आरोप साबित न हो पाने के चलते दर्जनों बार छोड़ भी चुकी है. हो सकता है, आप जब यह सब पढ़ रहे हों, उस समय पुलिस उसे एक बार फिर से गिरफ्तार करने की तैयारी कर रही हो. हो यह भी सकता है कि उसे एक बार फिर रिहा करने की तैयारी चल रही हो. यह सब कुछ तुंजा के साथ केवल इसलिये हो सकता है क्योंकि उसके नाम के साथ ‘कतकरी’ जुड़ा हुआ है.

तुंजा अपने नाम के साथ कतकरी जुड़े होने की सजा भुगतने वाले अकेले नहीं हैं. कुछ समय पुरानी एक खबर आपको याद है ? महाराष्ट्र के रायगढ़ में ही खेत के कुंए से पानी चुराने के आरोप में कतकरी जमात के चार लड़कों को आसपास के गांववालों ने पहले तो जमकर मारा-पीटा. उस पर भी जब मन न भरा तो उन्हें पेड़ों से बांधा और उनके गुप्तांगों को मिर्च-मसाले से भर दिया.

सूचना मिलने पर पुलिस घटनास्थल पर पहुंची और गंभीर रूप से घायल उन चारों कतकरी लड़कों को सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया. जहां उन्हें किसी तरह से मौत के मुंह से तो बचा लिया गया. मगर उनके घावों को भरे जाने का काम अब तक शुरू नहीं हुआ है.

दरअसल यहां सवरपदा, सिंधीबाड़ी, मुरमतबाड़ी, गोहे, मंदखिंद, अरधे, कुरकुलबाड़ी, कतकरबाड़ी जैसे गांव ऐसे हैं, जहां कतकरियों के माथे से अपराधी होने का कंलक अब तक नहीं धुला है.

यूं तो कतकरी महाराष्ट्र की एक शिकारी आदिम जनजाति कही जाती है लेकिन सच तो ये है कि सैकड़ों सालों से प्रणालीगत शोषण, नस्ली पूर्वाग्रह, घनघोर गरीबी के चलते अब खुद ही शिकार हो चुकी है. यह अपने लोकाचारों के चक्के पर अपनी पहचान की तलाश में घूमने वाली ऐसी जनजाति बन चुकी है, जो बदनामी के साथ-साथ अपनी पारंपरिक भूमि के लगातार छिनते जाने से अब गुमनामी के अंतिम छोर तक पहुंच चुकी है.

यूं तो ‘कतकरी’ दो मराठी शब्दों से मिलकर बना है, जिसका मतलब हैं ‘खैर नामक पेड़ से पेय पदार्थ बनाने वाले’. मगर समय के साथ आज इसका अर्थ बदल चुका है. अब चोर, डकैत, लुटेरे को ‘कतकरी’ मान लिया जाता है. मानो ‘कतकरी’ कोई जमात न हो, अपराध का एक पर्यायवाची शब्द हो.

इतिहास
गुमनामी के अंतिम छोर तक पहुंचीं ऐसी सैकड़ों जनजातियों की जड़ें, दरअसल 12 अक्टूबर, 1871 यानी किंगजेम्स स्टीफन के जमाने में बने ‘गुनहगार जनजाति अधिनियम’ से जुड़ी हुई हैं. गौरतलब है कि उस समय गुनहगार जनजातियों के तौर पर देश भर से जिन 150 से ज्यादा जनजातियों (ज्यादातर घुमंतू और अर्धघुमंतू) की पहचान की गई थी, उसमें से कतकरी भी एक थी. तब की सरकार ने ऐसी जनजातियों की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखने और ऐसे लोगों को गिरफ्तार किए जाने के लिए पुलिस को विशेष अधिकार दिए थे.

हालांकि 1949 को आयंगर की अध्यक्षता में गठित समिति की सिफारिशों के बाद, 1952 को सरकारी दस्तावेज से अंग्रेजों का वह काला अध्याय हमेशा के लिए समाप्त किया गया और उसके स्थान पर 1959 को दूसरा अधिनियम लागू किया गया, जो केवल उन व्यक्तियों को संज्ञान में लेता है जो कि आदतन अपराधी है, न कि पूरी जाति, जनजाति या समुदाय को.

यहां से 'अपराधी' कही जाने वाली जमातों को 'विमुक्त' कहा जाने लगा. मगर हकीकत आज भी वैसी की वैसी ही है. आज भी कतकरी जैसी जनजातियों को अघोषित तौर पर अपराधिक जनजातियों की तरह ही प्रताड़ित किया जाता है.

यह सच है कि 1871 के कानून के तहत, एक-साथ और एक-बार में 150 से ज्यादा जनजातियों की एक बड़ी आबादी को अपराधी के रुप में परिभाषित किया गया था. मगर जब यह कानून अपनी जमीनी हकीकत में आया, तो इसके आगे का काम दो तरह की प्रवृतियों ने किया. पहला साम्राज्यवादी व्यस्था के सिद्धांतों पर चलने वाली हमारी पुलिसिया प्रवृतियों ने और दूसरा काम के आधार पर परिभाषित भारतीय समाज में अनादिकाल से चली आ रही जातिगत प्रवृतियों ने.

अंधेरा कायम है
अंगेजों का वह कानून तो आजादी के बाद निरस्त कर दिया गया था. मगर खास तौर से भेदभाव की संस्थागत संस्कृति के चलते कतकरी जनजाति को कभी भी सिर उठाने का मौका नहीं दिया गया.

दरअसल कतकरी जैसी जितनी भी जमातें आज अपराधी हैं, वह कभी शिकारी या योद्धा जमातें थीं. एक तरफ, अंग्रेजों ने स्थानीय स्तर से उनकी सत्ता को उनसे छीना था और उन्हें अपराधी ठहराया था तो दूसरी तरफ, भारतीय समाज में अंग्रेजों के करीब आने वाली और वर्चस्व रखने वाली जो जमातें थीं, वह आजादी के बाद भी सत्ता में अपना स्थान सुरक्षित रखने और अपराधी कही जाने वाली जमातों को हाशिए पर ढ़केलने के लिए, बारम्बार यही दोहराती रहीं कि यह तो बस अपराधी ही होती हैं. जबकि ऐसी जमातों के सामने अपराध करने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं छोड़ा जाता रहा है. ऐसे में आप ही बतलाइए, क्या इस नजरिए के साथ अपराधीकरण की प्रक्रिया को समाप्त किया जा सकता है ?

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संपर्क : shirish2410@gmail.com

2.8.10

कामनवेल्थ खेलों से उजड़ रहा बचपन

दिल्ली/ भारत में बाल अधिकारों के लिए सक्रिय संस्था क्राई ने कहा है कि कामनवेल्थ गेम्स के निर्माण स्थलों पर रहने वाले मजदूर परिवारों के बच्चे कई बुनियादी अधिकारों जैसे आवास, स्वच्छता, गुणवत्तापूर्ण भोजन, स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य और स्कूली शिक्षा से बेदखल हो गए हैं। क्राई ने अपने अवलोकन में पाया है कि निर्माण कार्यों से जुड़े मजदूर परिवारों के बच्चों को कई गंभीर स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।

यह अवलोकन ध्यानचंद्र नेशनल स्टेडियम, आरके खन्ना स्टेडियम, तालकटोरा स्टेडियम, निजामुद्दीन नाला, नेहरू रोड, जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम का दौरा करके क्राई द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट और सिरी फोर्ट निर्माण स्थल से किये गए एक सेम्पल सर्वे के आधार पर किया गया है। क्राई की डायरेक्टर योगिता वर्मा कहती है कि ‘‘निर्माण कार्यो में लगे मजदूरों के बच्चे जिन अस्थायी शिविरों में रह रहे हैं, वहां हमने पाया कि उनके लिए न तो अच्छा भोजन है, न पीने का साफ पानी, न साफ-सफाई, न बारिश या धूप से बचने की सहूलियत, और न ही स्कूली शिक्षा या स्वास्थ्य जैसी बुनियादी अधिकार ही हैं।’’ उन्होंने आगे बताया कि ‘‘गरीबी के चलते बहुत सारे मजदूर परिवारों को अपनी-अपनी जगहों से पलायन करके दिल्ली के निर्माण स्थलों तक आना पड़ा है, नतीजन बड़ी संख्या में उनके बच्चे स्कूलों से ड्राप आउट हो गए हैं।’’

हाइकोर्ट में दायर एक जनहित याचिका के अनुसार, राष्ट्रमंडल खेलों के अलग-अलग निर्माण स्थलों में लगभग 4.15 लाख दिहाड़ी मजदूर काम कर रहे हैं। यहां मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी दी जा रही है। कुलमिलाकर, ऐसी तमाम गंभीर स्थितियों का सबसे ज्यादा खामियाजा मजदूरों के बच्चों को भुगतना पड़ रहा है।

योगिता वर्मा के मुताबिक ‘‘बच्चों की तरफ हमारे कई संवैधानिक दायित्व हैं, कामनवेल्थ गेम्स को विश्वस्तरीय बनाने की कोशिश में इन संवैधानिक दायित्वों को अनदेखा नहीं किया जा सकता है।’’ संस्था के मुताबिक दिल्ली में जो कामनवेल्थ गेम्स की तैयारी चल रही है, उसमें भारत सरकार अपने देश के बच्चों के लिए संवैधानिक दायित्व और अंतराष्ट्रीय मानवीय अधिकार वचनबद्धताओं को सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रावधान बनाएं। इसी तरह :

 निर्माण कार्यो से जुड़े मजदूरों और उनके बच्चों के लिए आवास, स्वच्छता, गुणवत्तापूर्ण भोजन, स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य और स्कूली शिक्षा जैसे बुनियादी अधिकार बहाल किये जाए।

 शिक्षा के अधिकार कानून को लागू करने को लेकर सरकार अगर वाकई गंभीर है तो उसे स्कूल से होने वाली ड्राप-आउट की इस समस्या को रोकने की पहल करनी होगी। आंगनबाड़ी और मिड डे मिल जैसी योजनाओं को तत्काल प्रभाव में लाया जाए।


 दिल्ली हाइकोर्ट के आदेश (11 फरवरी, 2010) अनुसार, सभी परिवारों का पुनर्वास नागरिक सुविधाओं के साथ किया जाए।

सिरी फोर्ट निर्माण स्थल से सेम्पल स्टडी के निष्कर्ष :

 इस निर्माण स्थल के बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। (भारत में 6 से 14 साल तक के 80,43,889 बच्चे स्कूल से बाहर हैं।)

 इस निर्माण स्थल में या इसके आसपास चाईल्डकेयर यानी बच्चे की देखभाल जैसे आंगनबाड़ी वगैरह की कोई सुविधा नहीं है।


 यहां आवास की स्थितियां बहुत खराब हैं। आवासीय सामग्री के तौर पर टीन और प्लास्टिक की चादरों को उपयोग में लाया जा रहा है, जो कि सुरक्षा के लिहाज से कतई ठीक नहीं कही जा सकती हैं। आश्रय के नाम पर मजदूर परिवारों के हिस्से में 7X7 फीट की टीन की चादरों का घेरा है। परिवार में चाहे कितने भी लोग हों, उनके हिस्से में एक ही सकरा घेरा है।

 यहां प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध नहीं है। शौचालय की सेवा भी लगभग न के बराबर हैं, कुछ जगहों पर मोबाइल शौचालय जरूर देखें गए हैं, जो कि साफ-सुथरे नहीं हैं।

 यहां 96% मजदूर गरीबी रेखा से नीचे हैं। 36% मजदूरो को अपनी-अपनी जगहों से खेती की विफलताओं के चलते दिल्ली की ओर पलायन करना पड़ा है।

 यहां 84% मजदूरों को 203 रूपए/प्रति दिन की न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी दी जा रही है।

निर्माण कार्यों से जुड़े यह मजदूर बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाके से दिल्ली आए हुए हैं। इनमें से ज्यादातर भूमिहीन मजदूर और सीमांत किसान हैं। कृषि क्षेत्र में आए संकट के चलते जिन परिवारों को पलायन करना पड़ा है, उनमें से ज्यादातर अनाज पैदा करने के लिए अप्रत्याशित वर्षा पर निर्भर रहते हैं। कई सालों से अपेक्षित वर्षा न होने से इनके सामने आजीविका का संकट गहराया है। निर्माण कार्यों से जुड़े यह मजदूर जिन गांवों से आए हैं, उनके उन गांवों के मुकाबले दिल्ली के निर्माण स्थलों में काम करने और रहने की स्थितियां बेहद खराब हैं। यहां कानूनी सुरक्षा से लेकर मजदूरों और उनके बच्चों के अधिकारों तक का उल्लंघन खुलेआम चल रहा है।  

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22.7.10

पारधी गुनहगार क्यों ?

शिरीष खरे


एक बार बीड़ जिले के पाथरड़ी तहसील में कहीं चोरी हुई. कई महीने बीते, मगर चोर का अतापता न चला. आष्टी तहसील से थोड़ी दूरी पर चीखली गाँव हैं. इसी गाँव के पास घूमते-फ़िरते रहवसिया नाम का पारधी परिवार आ ठहरा. बस फिर क्या था, पुलिस ने उसे ही इतनी दूर की वारदात में अंदर डाल दिया. जहाँ रहवसिया दो महीनों तक जेल में रहा, वहीं गाँव में ऊँची जाति वाले उसके परिवार को आकर धमकाते और बोलते कि ज़ल्द से ज़ल्द यहाँ की ज़गह ख़ाली कर दो. जब वह जेल से छूटकर अपने ठिकाने पर आया तो ऊंची ज़ाति वालों ने उसे रस्सियों से बांध दिया. उससे कहा गया कि तुम लोग चोर और गांव के लिए अपशगुन होते हो.

एक बार राजन गांव में वास्तुक काले की पत्नी विमल ख़ेत में काम कर रही थी. पास के थाने के इंस्पेक्टर ने आकर बताया कि उसने सोने की पट्टी चुराई है. थाने चलना पड़ेगा. विमल के विरोध करने पर इंस्पेक्टर बोला- यह औरत कुछ तेज मालूम देती है और सोने की पट्टी हो न हो उसकी साड़ी के पल्लू में है. आज के दुःशासन बने इंस्पेक्टर ने दोपद्री का पल्लू खींच डाला.


एक बार धिरणी के पारधी नौज़वान गोकुल को चोरी के शक में धर दबोचा गया. गोकुल समझ नहीं पाया कि आखिर उसे क्यों पकड़ा गया था. वह जिस सुबह छूटा, उसी शाम फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. इसे पारधी आदमी की मानसिक स्थिति के तौर पर देखा जा सकता है.



पारधी यानी गुनहगार
कभी पारधी यानी पारध का अर्थ शिकार करने वाला था. मगर अब पारधी का मतलब गुनहगार हो गया है. पारधी एक ज़माने में राजा के यहां शिकार के जानकार के तौर पर जाने जानी वाली ज़मात थी. लेकिन देखते ही देखते इसे इतिहास, मिट्टी, मिथकों, क़ायदे क़ानूनों और अख़बारों में एक ‘गुनहगार’ ज़मात में बदल दिया गया.

दरअसल, अंग्रेज जब यहाँ से गए तो बहुत कुछ छोड़कर गए और पारधियों से जुड़ा यह लेबल भी उन्हीं में से एक है. इतिहास के ज़ानकार बताते हैं कि पारधियों ने तो बाहरियों को सबसे पहली और सबसे कड़ी, सबसे बड़ी चुनौतियाँ दी थीं. मराठवाड़ा के राजा पहले निज़ाम से हारे और उसके बाद अंग्रेजों से हारे थे. मगर उन राजाओं के लिए लड़ने वाले पारधियों ने कभी हार नहीं मानी थी. क्रांतिगाथा की पंक्तियाँ बताती हैं कि यह जंगलों में इधर-उधर हो गए और इन्होंने एक नहीं, कई-कई छापामार लड़ाईयाँ लड़ीं और जीतीं थीं. इसलिए मराठवाड़ा के जनमानस में अब भी कहीं-कहीं पारधियों की वीरता से जुड़े कुछ-कुछ क़िस्से बिखरे पड़े हैं.

अंग्रेज जब पारधियों की छापामार लड़ाइयों से हैरान-परेशान हो गए तो उन्होंने ‘गुनहगार जनजाति अधिनियम’ के तहत पारधियों को भी ‘गुनहगार’ ज़मात की सूची में डाल दिया. अंग्रेज गये और देश में आज़ादी आई मगर आज़ादी के बाद भी कानून खास कर पुलिस का नज़रिया नहीं बदला.

नाकाम सरकार
1924 में अंग्रेज हुकूमत द्वारा कथित तौर से ऐसे गुनहगारों के लिए देशभर में 52 बसाहट बनी थीं. सबसे बड़ी गुनहगार बसाहट शोलापुर में थी. मगर 1949 में यानी आज़ाद हिन्दुस्तान में सबसे पहले बालसाहेब खेर ने शोलापुर सेंटलमेंट का तार तोड़ा. 1952 में बाबासाहेब अंबेडकर ने गुनहगार बताने वाले अंग्रेजों के कानून को रद्द किया. 1960 में खुद जवाहरलाल नेहरू शोलापुर आए और गुनहगार घोषित ज़मातों से जुड़े मिथकों को तोड़ने के मद्देनज़र काफ़ी-कुछ साफ़-साफ़ किया.

मगर उसके बावजूद पारधी से जुड़े मिथकों को तोड़ने के के नज़रिए से राज्य सरकार अब तक नाकाम ही रही है, और आज भी मराठवाड़ा के किसी गाँव में ज्यों ही कोई चोरी होती है, पुलिस वाले सबसे पहले पारधियों की ख़ोज शुरु कर देते हैं. पारधियों को हिरासत में लेने वाली पुलिस इतने गैरकानूनी तरीके अपनाती है कि जो पुलिस को खुद अपराधी की श्रेणी में खड़ा कर दे लेकिन आखिर पुलिस के आगे किसकी चले?

आम धारणा यही है कि पारधी तो बस 'चोर' ही होते हैं. अगर थोड़ी देर के लिए ऐसा मान भी लिया जाए तो भी क्या उन्हें चोरी के दलदल से निकालना व्यवस्था का काम नहीं होना चाहिए. इस काम में जनता के साथ-साथ पुलिस का ख़ास रोल हो सकता है. मगर यह दोनों तो पारधियों को 'चोर' से ऊपर देखना भी नहीं चाहते. यही नज़रिया अपराधीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा देता है, जो किसी भी सरल और ईमानदार आदमी को चोर' चोर' कहकर अपराधी ठहरा, बना सकता है. यह नज़रिया साफ़ किए बगैर अपराध के वर्चस्व का ख़ात्मा करना मुश्किल होगा.



इतिहास बस पन्नों में
हम थोड़ा सा फिर इतिहास में झाँके और सोचे कि अगर पारधी रखवाली के काम के नहीं होते तो राजा उन्हें अपना सुरक्षा सलाहकार क्यों बनाते ? जैसे राजा कहता कि मुझे शेर पर सव़ार होना है तो पारधी शेर को पकड़ते और उसे पालतू बनाते. एक तो शेर को ज़िंदा पकड़ना ही बहुत मुश्किल, ऊपर से उसे पालतू बनाना तो और भी मुश्किल था. मगर वक़्त का तकाज़ा देखिए, आज के पारधी शासन की दहशत से परेशान हैं. यह जंगल की तरफ़ आती गाड़ियों को देखकर भागते हैं. इन्हें लगता है कि आसपास कोई वारदात हुई होगी जो पुलिस पकड़ने आ रही है.

कथाओं से भरे इस विशाल देश में भले ही पारधी ज़मात का इतिहास गौरवगाथा का रहा हो, मगर फ़िलहाल तो उनकी पीड़ाओं का ऐसा ग्रन्थ लिखा जा सकता है जिसकी जवाबदारी कोई नहीं लेना चाहता और जिसमें संकट को हरने की खोज भी भविष्य में दूर-दूर तक कुछ नहीं दिखलाई देती है.

सबसे बुरा तो पारधी बच्चों का स्कूल से बाहर रहना है, जिसके चलते अगली पीढ़ी का आने वाला कल भी काले अंधियारे में डूबा हुआ लगता है. ऐसे में इन बच्चों को यह सपना दे पाना कैसे संभव है कि देखो- पुलिस और लोग तुम्हारे पीछे नहीं पड़े हैं, वह तो तुम्हारे साथ खड़े हैं, और यह देखो- वह तुमसे हाथ मिलाना चाहते हैं ?

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20.7.10

तिरूमली का पता ठिकाना कहां है ?

शिरीष खरे, मुंबई से



"क्या कह रहे हो, घर, बिजली, पानी के बारे में कभी सोचा है...अरे सोचने से सब मिल थोड़ी जाता है।" - ऊँची आवाज़ में सुनने वाली गुरिया गायकबाड़ ने ऐसा कहा था। तिरूमली ज़मात की यह बुजुर्ग औरत बीते साल सर्दी के मौसम की ज़ल्दी ढ़लती शाम को उस्मानाबाद के कलंब तहसील में टकराई थीं।






महाराष्ट्र के गाँवों और शहरों के रास्तों के बीच भटक रही तिरूमली ज़मात के पास अपना कोई पता ठिकाना नहीं होता है। यह अपने आराध्य देव यानी नंदी बैल के सिर पर महादेव-बाबा की मूर्ति, गले में घण्टी और कमर में रंग-बिरंगा कपड़ा बाँधने के बावजूद मटमैली ज़िन्दगी जी रहे हैं। विभागीय कार्यालयों और उसके भीतर बैठे कर्मचारियों के सामने हमेशा से अदृश्य रहने वाली ऐसी ज़मात वालों के नाम कभी मतदाता सूची में नहीं चढ़ पाते हैं...

हक से बेखबर
एक तरफ़ जहाँ मतदाता कार्ड, बीपीएल कार्ड और राशन कार्ड के अभाव में यह देश के नागरिक नहीं कहलाये जा सकते हैं तो दूसरी तरफ़, गाँव वाले इन्हें एक जगह पर चार दिनों से ज्य़ादा न तो ठहरते देखते हैं, और न ही ठहरने देते हैं। इसलिए अपनी आबादी का पूरा पता न तो तिरूमलियों को पता रहता है, और न ही राज्य-सरकार को ही इसका थोड़ा-बहुत अंदाज़ा रहता है। कुल-मिलाकर इनके हिस्से के किस्से, तर्क, आकड़े भी किसी एक ठिकाने पर न मिलकर बिखरे-बिखरे पड़े रहते हैं।

तिरुमली ज़मात के आसपास बुने जिस पूर्वाग्रहों ने उन्हें परदेशी बनाया हुआ है, ज़रूरी है कि सबसे पहले उन पूर्वाग्रहों को तोड़कर देखा जाए- अव्वल तो एक आम आदमी की तरह देखा जाए और उसके बाद एक आम हिन्दुस्तानी की तरह देखा जाए। इन पूर्वाग्रहों में सबसे पहला सवाल देश की राजनीति में उनकी हिस्सेदारी का सवाल है।

कहते हैं कि देश चुनाव से बनता है, और जनता अपने मत से अपनी तक़दीर ख़ुद बना सकती है। मगर जब ज़्यादातर तिरूमली ज़मात वालों के नाम ही मतदाता सूची से लापता हैं तो यह अपनी तक़दीर बदले भी कैसे बदले, और बहुमत आधारित व्यवस्था की कोई भी पार्टी वाला इनके क़रीब आए भी तो क्यों आए, और इनके लिए न्याय के दरवाज़े तक पहुँचे भी तो क्यों पहुँचे ?

यह सीधा-सा साधा-सा सच है कि चुनाव के बाद भी तो बहुत सारे मुद्दे भुला दिए जाते हैं, और चुनाव का दायरा सिकुड़ कर रह गया है। मगर तिरूमली ज़मात वालों के मुद्दे तो चुनाव के वक़्त भी शामिल नहीं हो पाते हैं। जबकि शहर के मुकाबले गाँव में मतदान ज्य़ादा हो रहा है और हाशिए पर लेटा एक आम आदमी भी अपने मत का वजन जान रहा है, तो यहाँ पहला सवाल यही है कि अगर तिरुमली लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से ही बाहर बैठे रहेंगे, तो कौन से धरातल पर लोकतांत्रिक हकों को पाने की उम्मीद में खड़े हो सकेंगे ?

और ऐसे हर सवालिया निशान या धोखे के आगे का हाल यह है कि यहाँ तिरूमली ज़मात वालों की कहीं कोई सुनवाई नहीं है/इनके बच्चे पढ़-लिख नहीं सकते हैं/इनके हाथों में राशनकार्ड नहीं रहते हैं/ इनके नाम गरीबी रेखा के नीचे से कोरे रहते हैं/सरकारी अस्पताल में अपनी बीमारियों का इलाज या सहकारी बैंक से लोन लेने का सवाल दरअसल मीलों दूर का सवाल लगता है/ईज्जत, आत्मनिर्भर या बराबरी की दुनिया में जीने जैसी बातें कल्पना की ऊँची छलांगें मारने जैसी लगती हैं/और इनकी रज़ामंदी से ग्रामसभा का चलना तो किसी अतिशोयक्ति अंलकार से कम नहीं लगता है। सवाल-दर-सवाल लगता है जैसे इन्हें परदेशी समझना कोई सामाजिक मान्यता सी बन गई हो।

लालटेन की मद्धिम रोशनी में फ़टे-पुराने कपड़ों से लिपटी गृहस्थी लटकाने, गाना-बज़ाने के बीचोंबीच तिरुमली जितनी जगह/सहूलियतें अपने और अपने बच्चों और बूढों को देते हैं, उतनी ही जगह/सहूलियतें अपने साथ चलने वाले अपने गाय, बछड़े, कुत्ते, बकरियों को भी देते हैं। हमेशा साथ रहने वाली सादगी लिए, यह बहुत सारे झुण्डों के साथ, महाजीवन की छोटी-छोटी खुशियाँ लिए, बहुत पास-पास और पंक्तिनुमा तरीके से चलते हैं, और रोटीनुमा आटा-नमक तक को साझा करते हैं, यह तो इनकी आपसी जुड़ावों और हिलीमिली जीवनशैली से ओतप्रोत संस्कृति की तरफ़ एक इशारा भर है...

सफर के सन्नाटे में
मगर सच्चाई यह भी है कि आमतौर पर लोग दर-दर रोटी मांगकर पेट भरने को ही इनका काम समझ लेते हैं। जबकि दान देने-लेने के रिवाज़ को कमज़ोर किए बगैर तिरूमली तो क्या किसी ज़मात की तस्व़ीर नहीं बदली जा सकती है। इन भटके हुए लोगों को संवैधानिक रास्ते पर लाना और इन्हें इनका मुनासिब हक़ देना तो सरकार का काम है। मगर यह कोई हैरत की बात नहीं लगती कि मत-संतुलन की सांख्यिकी के सामने सरकार अपना फ़र्ज पूरा भी करे तो क्यों करे और किस तरह से करे ?

सच्चाई यह भी है कि नंदी बैल का खेल देखने वाले इनकी ज़िन्दगी को तमाशे से ज़्यादा कुछ नहीं समझते हैं। इसके बावजू़द आम तौर पर दुबले-पतले शरीर और हमेशा मुस्कुराते रहने वाले तिरुमलियों में एक संभावना दिखती है, वह यह है कि यह कहीं भी जाए- घूम फ़िरकर कुछ ज़गहों पर बार-बार और लगातार ज़रूर बने रहते हैं। इसकी वज़ह यह है कि यह गाय-भैंसों को ख़रीदने-बेचने का धंधा जो करते हैं। जब कोई गाय या भैंस पेट से होती तो यह उसे 15 हजार रूपए तक में खरीदते हैं और बड़े बाजार में 25, 30 हजार रूपए तक में बेच देते हैं। मगर बेचने से पहले यह उसे कुछ ज़गहों पर चराते रहते हैं। इन्हीं ज़गहों से चारे का धंधा भी करते हैं। इस काम के लिए इनके परिवार का कोई-न-कोई सदस्य ऐसी ज़गहों पर जरूर बना रहता है। यानी कि ऐसी ज़गहों से उनका रिश्ता लगातार बना रहता है। यही रिश्ता/संदर्भ इन्हें ‘महाराष्ट्र के गायरन जमीन कानून’ से जोड़ता है, जो कहता है कि 14 अप्रैल, 1991 के पहले तक जो लोग जिन ज़मीनों का इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें आजीविका के लिए उन ज़मीनों का पट्टा दे दिया जाए। दरअसल, इस कानून को अपनेआप में एक बड़ी संभावना के तौर पर देखा जा सकता है, जिसमें तिरूमली ज़मात वाले पथरीली ज़मीनों को खे़तों में बदल सकते हैं, और अगर वह ऐसा कर सकते हैं तो यह अपने बदलाव का एक कारगर रास्ता ख़ुद तैयार कर सकते हैं।

देखा जाए तो तिरुमली कोई ज़मीन से उजाड़े गए लोग नहीं हैं, बल्कि कल भी इनके नीचे से ज़मीन नदारद थी और आज भी इनके नीचे से ज़मीन नदारद ही है। मगर यह एक रास्ता उन्हें ज़मीन से छोड़कर, समाज और ख़ासतौर से ऊँची जाति वालों की ज़्यादतियों के खि़लाफ लड़ने और अपनी बात को दिल्ली-मुंबई तक बोलने वाला बना सकता है। दूसरा, यह रास्ता आजीविका का स्थायी और सुरक्षित साधन देकर उन्हें ईज्जत, आत्मनिर्भर या बराबरी की दुनिया में जीने के साथ-साथ पंचायत में उनका मुकाम़ भी दिलवा सकता है।

बिस्मिल्लाह खां ने जिस ‘सवई’ को बज़ाकर देश-विदेश में अपना नाम कमाया है, तिरूमली ज़मात वाले उस ‘सवई’ को कई पीढ़ियों से बज़ाते आ रहे हैं, मगर इन्हें कुछ नहीं मिला है।

इनके सामने तो यह सवाल भी है कि अपने घर में अपना चूल्हा जलाना और ख़ुद अपने बर्तनों में अपना ख़ाना पकाना- एक छाते से कहीं बढकर एक छट का होना, उसमें सबके साथ एकसाथ बैठना और हर एक फैसले में साझेदार हो जाना- सरपंच से लेकर बस कंडेक्टर, लाईनमेन, बैंक मैनेजर, नाकेदार, थानेदार, तहसीलदार, नेता से बतिया भर पाना क्या किसी के लिए इतना बड़ा सवाल भी हो सकता है ?

मगर यह तो हर सुबह कम से कम 20 से 40 किलोमीटर चलने का सवाल लिए उठते हैं। संघर्ष इन्हें दिनभर आटे जैसा तब तक गूँथता रहता है, जब तक की यह रोटी बनाने लायक न हो जाएं। कभी कमर तो कभी कंधों या सिरों पर 10 से 15 बच्चों को लटकाए इनका परिवार मधुमक्खी के छत्ते में लगी मधुमक्खियों सा भरा-पूरा दिखता है। और हमारे सामने नौ फीसदी की वृध्दि दर से चौतरफ़ा विकास की रेलगाड़ी बताने वाला जो समय चल है, क्या उसी समय की तरह सदा दौड़ते रहने वाले इनके नंगे पैरों के आगे, एकाध अल्पविराम का पहिया भी लगेगा ?

मगर सन्नाटा है कि अपने सवालिया निशान की बजाय पूर्ण विराम चाहता है।

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11.7.10

अपनी जाति खोजते सैय्यद मदारी

शिरीष खरे

"यह देखिए फोटो में सोनिया गांधी पीठ ठोंक रही हैं. और इसके पहले वाली फोटो में अब्बा लोग अमिताभ, जितेन्द्र और धर्मेन्द्र के साथ खड़े हैं..."

बीड़ जिले की खेड़करी बस्ती में, बीते साल गर्मियों की कोई ठहरी हुई दोपहर को कुछ धुंधले से पड़ गए एल्बमों के साथ सैय्यद मदारियों के यह बच्चे फोटो के पीछे छिपे और अपने अब्बा लोगों से सुने किस्से हमें सुनाते रहे.

बच्चा-बच्चा जानता है कि भारत गाँवों में बसता है, जो इनदिनों अदृश्य हो गए हैं. फ़िलहाल इन गाँवों से भी अदृश्य रहने और गली-मोहल्लों में हैरतअंगेज़ खेल दिखने वाले सैय्यद मदारियों के कई ख़ानदानी खेल भी तो अदृश्य हो गए हैं.

मगर क्या आप जानते हैं कि सबसे हैरतअंगेज़ खेल जो हुआ है, वह यह है कि ‘जाति शोध केन्द्र’ और ‘जाति आयोग’ की सूचियों में ‘सैय्यद मदारी’ ज़मात का ज़िक्र तक नहीं मिलता है. मगर वहाँ जाने से पहले मैं भी कहाँ जान पाया था कि इसीलिए महाराष्ट्र में इनकी कुल तादाद का आकड़ा भी कहीं नहीं मिलता है. ऐसे में केवल अनुमान लगाया जाता है कि शहरों की चकाचौंध, झुग्गी-बस्तियों और गाँव-देहातों की सरहदों के आरपार अपनी जिंदगियों की दुःख-तकलीफें लिए, महाराष्ट्र में यही कोई 700 सैय्यद मदारी परिवार होंगे.

प्रमाण लाओ कि...

जिनका आज नहीं उनका कल क्या..क्योंकि ‘जाति शोध केन्द्र’ और ‘जाति आयोग’ की सूचियों में ‘सैय्यद मदारी’ ज़मात का ज़िक्र तक नहीं मिलता हैं, सो जाति प्रमाण-पत्र के बगैर सैय्यद मदारियों के बहुत सारे बच्चे दूसरी जाति के बच्चों की तरह अधिकार और सुविधाएँ नहीं पा सकते हैं. यह बड़ी अज़ीब सी बात है कि एक तरफ़ सैय्यद मदारियों को अपनी जाति की पहचान का कागज़ चाहिए है, मगर दूसरी तरफ़ कलेक्टर साहब को पहले उनकी जाति का सबूत बताने वाला कागज़ चाहिए. अब दिक्कत तो यही है सैय्यद मदारी कौन से सरकारी कागज़ से और कैसे यह साबित करें कि वह भी इस देश के वासी हैं.

यहाँ के ज़्यादातर अफ़सर अगर सैय्यद मदारियों को नाम से जाने तो भी कुछ नहीं कर सकते हैं, वह नियमों से जो बॅंधे हैं, जो ऊपर से ही चला करते हैं. मगर इस सवाल का जवाब कोई नहीं देता है कि जो सैय्यद मदारी सरकार के काम-काज से कभी जुड़े ही नहीं हैं, वह सैय्यद मदारी अपने लिए जाति का कागज़ लाए भी तो कहाँ से लाएं ?

सोचिए, जहाँ ऊपर की दो ज़मातों के सिर पर घर के पते और बुनियादी सहूलियतों का सवाल ख़ुले आसमान सा पसरा हुआ है, वहीं सैय्यद मदारियों के सामने तो आज भी अपनी पहचान और उपस्थिति का सवाल ही पहला सवाल बनाकर हुआ तना है.

यहाँ जाति प्रमाण-पत्र एक ऐसा पतला-सा कागज़ है, जो मिल जाए तो संभावना है और न मिल पाए तो अंधियारा है. यह मामला महाराष्ट्र सरकार और सामाजिक कल्याण व न्याय विभाग जब तक नहीं सुलझाया जाएगा, तब तक सैय्यद मदारी बच्चों को स्कूल से जोड़ने का तार भी उलझा ही रहेगा.

एक मौका

देखा जाए तो यहाँ के बच्चों के बीच खेलों में बेजोड़ प्रतिभाएं मौजूद हैं. ख़ास तौर से जिमनेस्टिक और एथलेटिक्स में. अगर यह राष्ट्रीय खेल प्रतिस्पर्धाओं तक पहुँचे तो जरूर ही क़माल दिखा सकते हैं. इस तरह से भी तो इनकी पहचान बदल सकती है. इन्हें केवल एक मौका और सही दिशा ही तो चाहिए. मगर सब जानते हैं, जिस सफ़र में यह हैं, उसमे पड़ाव भर हैं, उसकी न तो कोई दिशा है, और न ही मंज़िल का कोई ठिकाना है. बिस्तरे पर थकान की सलवटें हमेशा ही रहती हैं, और ख़ुले आसमान के नीचे देश के नौनिहाल किसी तरह पलते-बढ़ते तो हैं, मगर पढ़ते नहीं हैं.

दिलचस्प है कि दिनों और महीनों के नामों से बेखबर यह सैय्यद मदारी बालीवुड में 30 से ज़्यादा साल बीताने के बाद भी न शोहरत पा सके हैं, न ही दौलत. कुछ सैय्यद मदारी इसे अपनी बदकिस्मती मानते हैं, वहीं बहुत से अपनी पहुँच न होने पर अफ़सोस जताते हैं. दरअसल, 70 के दशक में जब जन-आक्रोश को एक्शन का रंग रुप दिया जाने लगा तो स्टार या सुपरस्टार के ज्यादातर स्टंट सैय्यद मदारी ही करते थे. कभी एक्सट्रा आर्टिस्ट के तौर पर काम करने वाला अक्षय कुमार आज का सुपरस्टार कहलाता है, उसके संघर्ष की मनोरम कहानियाँ भी सबके सामने हैं, मगर न जाने क्यों सैय्यद मदारी नाम की ज़मात से एक भी स्टार नहीं चमकता है, और न जाने क्यों इनकी गढ़ी-गढ़ाई तस्वीरों, कहानियों के बीच छिपा पहचान का बड़ा सवाल पहचान में क्यों नहीं आता है ?

बंजारा जनजातियों की पहचान के लिए केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय विमुक्त घुमंतू एवं अर्धघुमंतू जनजाति आयोग बनाया है, जिसका मानना है कि देश भर में कोई 500 बंजारा जनजातियां हैं, जिनकी आबादी 10 करोड़ के आसपास है. लेकिन इन बंजारों को बुनियादी सुविधाओं से जोड़ने की कोई ईमानदार कोशिश अब तक नहीं हुई है.

कहने को पारधी, तिरुमली और सैय्यद मदारी अलग-अलग जमातें हैं, जिनकी अलग-अलग जुबानें हैं, मगर फिर भी सभी के दुःख-दर्दों में कोई ज्यादा भेद नहीं है. जाहिर है, सिद्धांत और व्यवहार के बीच इनके प्रति सरकार और जनता की स्वीकार्यता भी अब तक गहरे धुंध में है. एक ऐसी धुंध, जो आज़ादी के 63 साल बाद भी छंटने का नाम नहीं लेती.
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23.6.10

ये ट्रेन मिस कर दो विनय


पशुपति शर्मा

(माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय का पूर्व छात्र, दस्तक का साथी, हिंदुस्तान भागलपुर का पत्रकार और सबसे बढ़कर सबका प्यारा विनय तरुण चला गया, हमेशा-हमेशा के लिए…)


मंगलवार की रात नौ बजे फास्ट ट्रैक का बुलेटिन चल रहा था। मैं पीसीआर में बुलेटिन करवा रहा था, इसी दौरान प्रवीण का फोन आया, मैंने काट दिया। दूसरी बार, तीसरी बार घंटी बजी लेकिन मैंने फोन काट दिया। फिर मनोज भाई का फोन आया। वो फोन भी मैं नहीं उठा सका। बुलेटिन खत्म हुआ, तो संतोष का फोन आया कि विनय नहीं रहा। विनय हम सबको छोड़ कर चला गया। विनय तुम्हारी मौत की खबर भी इस न्यूज बुलेटिन ने मुझ तक पहुंचाने में आधे घंटे की देर कर दी। सुबह पता चला कि तुम भी ऑफिस पहुंचने की आपाधापी में ही…


पुष्य ने बताया कि ऑफिस में देर हो रही थी और शायद तुम्हारी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। पटना से तुम भागलपुर के लिए चले थे लेकिन नाथनगर में पता नहीं तुमने चलती ट्रेन से उतरने की कोशिश की या फिर कुछ और… लेकिन तुम ऑफिस नहीं पहुंच पाये। अब कभी नहीं पहुंच पाओगे। ऑफिस से लौटते हुए जो बात मुझे बहुत ज्यादा कचोट रही थी कि मैंने फोन क्यों नहीं उठाया – यह बात कुछ ज्यादा ही तकलीफ दे रही है। पता नहीं किस हालात और किन दबावों में हम काम करते हैं कि… खैर! ये वक्त इस बात का नहीं लेकिन पुष्य समेत अपने तमाम साथियों के जेहन में न जाने ऐसे ही कई सवाल उठ रहे हैं।

मेट्रो से घर पहुंचने तक कई मित्रों के फोन आये। किसी के पास कहने को कुछ नहीं था। सब एक दूसरे से एक-दो लाइनों में बात करते और फिर शब्द गुम हो जाते। अखिलेश्वर का मेरठ से फोन आया – भैया विनय नहीं… उसके बाद न वो कुछ बोल सका और न मैं। इसी तरह ब्रजेंद्र, उमेश… सभी इस खबर के बाद अजीब सी मन:स्थिति में थे। शिरीष से बात की और ये सूचना दी तो वो भी सन्न रह गया। विनय अब तुमसे तो कोई सवाल नहीं कर सकता लेकिन एक दूसरे से ताकत बटोरने की कोशिश कर रहे हैं। विनय ऐसी भी क्या जल्दी थी? एक दिन ऑफिस छूट ही जाता तो क्या होता? लेकिन हादसों के बारे में क्या कहा जा सकता है? तुमने भी तो शायद ये नहीं सोचा था कि चलती ट्रेन के पहिये तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं…

तुम्हारा चेहरा रात से बार-बार मेरे सामने घूम रहा है। सीधा, सपाट और बिल्‍कुल बेबाक विनय और उसकी उतनी ही प्यारी मुस्कुराहट अब कभी देखने को नहीं मिलेगी। वो विनय जो चंद मुलाकातों में ही बिलकुल अपना सा हो गया था, वो पता नहीं कहां गुम हो गया? बंदर मस्त कलंदर का गोडसे उड़न छू हो गया। विनय वो तुम ही तो थे जो बैक स्टेज पर हंसते मुस्कुराते और मंच पर जाते ही गोडसे के चरित्र में ढ़ल जाते थे। तुम्हीं ने राजकमल नायक के साथ एक अलग ही परसाई की कहानी के कैरेक्टर में कमाल की जान डाल दी थी। आज बेजान पड़े हो। बिना किसी रिहर्सल के जिंदगी के नाटक का पटाक्षेप कर दिया।

कई सारी बातें ध्यान में आ रही हैं। बिलकुल बेतरतीब। तुम्हारा भोपाल का कमरा, जहां तुमने मुझे खिचड़ी का न्योता दिया। हबीबगंज स्टेशन पर ट्रेन सीटी बजा रही थी लेकिन तुम्हारे कुकर की सीटी नहीं बज रही थी। बिना खिचड़ी खाये जाना मुमकिन नहीं था। जब तक हम स्टेशन की ओर बढ़ते तब तक ट्रेन जा चुकी थी। तुमने बड़े प्यार से कह दिया – ठीक है एक दिन और रुक जाइए… मेरा मन भी नहीं था कि आप जाएं…

ऐसी ही चंद मुलाकातें बार-बार जेहन में कौंध रही है… तुम्हारी प्रवीण के साथ नोक-झोंक, भागलपुर स्टेशन पर पुष्य के साथ खबरों को लेकर खींचतान…. भागलपुर का वो कमरा जो तुमने तीसरी या चौथी मंजिल पर ले रखा था… जिसका पूरा व्याकरण तुमने अपने मुताबिक गढ़ रखा था। विनय तुम सबसे जुदा थे। सबसे अलग। तुम्हारा स्नेह, तुम्हारा प्यार, तुम्हारी बहस और तुम्हारे सवाल सब तुम्हारे साथ ही गायब हो रहे हैं। कैसे कहूं – हो सके तो लौट आओ मेरे भाई… तुम्हारे हाथ की खिचड़ी खाने का फिर से मन हो रहा है… क्या तुम मौत की ट्रेन मेरे लिए मिस नहीं कर सकते।

20.6.10

खेतों में काम करना बाल मजदूरी क्यों नहीं ?

शिरीष खरे


बाल अधिकारों से जुड़ी लगभग सभी संधियों पर दस्तखत करने के बावजूद भारत बाल मजदूरों का सबसे बड़ा घर क्यों बन चुका है, और इसी से जुड़ा यह सवाल भी सोचने लायक है कि बाल श्रम निषेध एवं नियंत्रण कानून, 1986 के बावजूद हर बार जनगणना में बाल मजदूरों की तादाद पहले से कहीं बहुत ज्यादा क्यों निकल आया करती है ?

मगर हकीकत इससे कहीं भयानक है। दरअसल बाल मजदूरी में फसे केवल 15% बच्चे ही कानून के सुरक्षा घेरे में हैं। जबकि देश के 1.7 करोड़ बाल मजदूरों में से 70% बच्चे खेती के कामों से जुड़े हैं, जो कानून के सुरक्षा घेरे से बाहर ही रहते हैं। इसलिए जब तक खेती से जुड़े कामों को भी बाल मजदूरी मानकर उन पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाएगा, तब तक बाल मजदूरी को जड़ सहित उखाड़ फेंकना संभव नहीं हो पाएगा।

आजादी से 39 साल बाद और अबसे 24 साल पहले, बाल श्रम निषेध एवं नियंत्रण कानून, 1986 के जरिए भारतीय बच्चों को खतरनाक कामों से बाहर निकालने के लिए वैधानिक कार्रवाई शुरू हुई थी। इसके बाद, 2006 को इसी कानून में बाल मजदूरी के कई क्षेत्रों और घरेलू कामों को प्रतिबंधित किया गया। कुलमिलाकर, तब 16 व्यवसायों और 65 प्रक्रियाओं को भी खतरनाक कामों की सूची में शामिल किया गया। मगर इस सूची से खेती से जुड़े कई खतरनाक काम छूट ही गए।

खेत-खलिहानों में काम करने या पशुओं को चराने वाले बच्चों के पास अगर पढ़ने लायक समय भी नहीं बचेगा, तो जाहिर है उनके आने वाले समय को अंधकार ले डूबेगा। खासतौर से लड़कियों के साथ तो मुसीबतें ज्यादा हैं, क्योंकि उन्हें खेती के कामों के साथ-साथ घर और छोटे बच्चों को भी संभालना पड़ता है। इन बच्चों की हालत भी बाकी क्षेत्रों के बाल मजदूरों जैसी ही है। इसके बावजूद इन्हें बाल मजदूर क्यों नहीं कहा जा सकता है ?

हालांकि यह एक अजीब स्थिति है, मगर कहीं न कहीं एक सच भी है कि खेती के क्षेत्र में बाल मजदूरों की भारी संख्या के चलते ही इन्हें बाल मजदूर कहने या मानने में परहेज किया जा रहा है। बाल मजदूरों की इतनी भारी संख्या का दबाव कहीं न कहीं कानून और नीति बनाने वाले के ऊपर भी रहता है। यह एक असमंजस से भरा सवाल बना हुआ है कि ‘‘अगर बच्चों ने खेतों में काम करना बंद कर दिया तो फिर क्या होगा ?’’

यह भी एक कड़वा सच है कि परिवार वालों के पास उपयुक्त रोजगार का जरिया और पर्याप्त आमदनी नहीं होने के चलते वह अपने बच्चों को काम पर भेजते हैं। एक तबके के मुताबिक इसमें हर्ज भी नहीं है। मगर इसके आगे यह भी गौर करना जरूरी होगा कि अगर बाजारों में हमेशा से बच्चों की मांग बनी भी रहती है तो इसलिए कि उनकी मजदूरी बहुत अधिक सस्ती होती है। जबकि गरीब और बंधुआ परिवार वाले तो बाजारों की मांग के आगे हमेशा से झुके रहे हैं। यह परिवार वाले अपने बच्चों को दूर इलाकों में अच्छा पैसा दिलवाने की उम्मीद पर जिन ठेकेदारों के हाथों ‘‘बेचते’’ हैं, वह उन्हें शोषण के रास्ते पर ही धकेल रहे हैं।

कुछ महीने पहले राजस्थान के श्रम विभाग ने केन्द्र सरकार के श्रम मंत्रालय को बाकायदा एक पत्र लिखकर यह सिफारिश की थी कि बाल मजदूरी पर कारगर तरीके से पाबंदी लगाने के लिए श्रम निषेध एवं नियंत्रण कानून में खेती से जुड़े कार्यों को भी जोड़ा जाए। असल में राजस्थान से बहुत सारे बाल मजदूर गुजरात की तरफ पलायन करते हैं। मगर श्रम निषेध एवं नियंत्रण कानून में खेती से जुड़े कार्यों को शामिल नहीं किए जाने के चलते प्रदेश का श्रम विभाग यह मान रहा है कि जहां बाल मजदूरी को बढ़ावा देने वाली प्रवृतियों को कानूनी आड़ मिल रही है, वहीं वह कोई कार्रवाई नहीं कर सकता है। बीते साल केवल अगस्त महीने का हाल यह रहा कि उत्तरी गुजरात में कपास की खेती से जुड़े एक दर्जन से भी ज्यादा बाल मजदूर मारे गए। तब इन हादसों के पीछे बीटी कपास में जंतुनाशक दवा के रियेक्शन की आशंका जतलायी गई थी।

आमतौर पर यह भी कहने सुनने में आता है कि अगर काम खतरनाक नहीं है तो बच्चों से काम करवाने में कोई हर्ज नहीं है, जैसे कि खेती। मगर बच्चों के मामले में कौन-सा काम खतरनाक है या नहीं है, यह तो उन बच्चों को देने वाले काम पर ही निर्भर करता है। हमें यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि खेती से जुड़े काम मुश्किलों से भरे होते ही नहीं हैं। जबकि खेतों में भी तो खतरनाक मशीनों, औजारों, उपकरणों के इस्तेमाल से लेकर भारी-भरकम चीजों को उठाने और लाने-ले जाने तक के काम होते हैं। खेतों में भी तो स्वास्थ्य के लिए प्रतिकूल माहौल में काम करना होता है, जिसमें खतरनाक पदार्थों के मामले, दलाल या मालिकों के काम करने का तरीके, मौसम या तापमान और हिंसा के स्तर भी शामिल हैं। खेती में भी तो जटिल परिस्थितियों में काम के लिए रातदिनों और घंटों का समय तय नहीं होता है। एक बच्चे को खेत में एक दिन के कम-से-कम 10 से घंटे तो बिताने ही पड़ते हैं। फसल बुहाई और कटाई के मौसम में तो काम का कोई हिसाब-किताब भी नहीं रहता है।

बीड़ जिले की रूपल माने (13 साल) बताती है कि उसे सुबह 9 से शाम के 7 बजे तक खेतों में ही काम करना पड़ता है। इसी तरह, लातूर जिले के सुभाष तौर (14 साल) कहता है कि वह 12-13 घंटे खेतों में रहता है, और कई-कई हफ्तों तक ढंग से आराम नहीं कर पाता है। यहां तक कि महीनों-महीनों तक घर लौटने की इजाजत भी नहीं मिलती है। गौर करने वाला तथ्य यह भी है कि देशभर में 5 से 14 साल तक के 42% बच्चे इसी तरह के कामों में लगे हुए हैं। जब तक इस मामले में किसी नतीजे तक नहीं पहुंचा जाता है, तब तक ऐसे बच्चों से इसी तरह के काम करवाने वालों को खुली छूट मिलती रहेगी।

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संपर्क : shirish2410@gmail.com

14.6.10

कमाठीपुरा की गलियों से

शिरीष खरे, मुंबई से


यह शहर के उठने का वक़्त है. बोरीबली से मुंबई सेंट्रल आने वाली लोकल के ठहरने के बीच का यह वक़्त, हजारों लोगों के दौड़ने का भी वक़्त है. मुंबई सेंट्रल से यात्रियों को अपने में समाए बेस्ट यानी ‘बॉम्बे एलेक्ट्रिक सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट’ की लालधारी बसों ने भी चौतरफ़ा दौड़ना शुरू कर दिया है. मुझे भी यहाँ से पैदल अब 15-20 मिनट ही चलना है, सिटी सेंटर से होते हुए सीधे कमाठीपुरा की गलियों की तरफ़.




अटपटे-से एहसासों से जुड़े कुछ सवाल लिए हुए बढ़ रहा हूँ. क्या आप जानते हैं कि रेडलाईट की यह गलियाँ सारी रात जागी हैं और ग्राहकों के इंतजार में अभी भी सोई नहीं हैं ?


यहाँ की गलियों ने यहाँ को बनते हुए देखा है. अंग्रेजों ने अपने सैनिकों के लिए यहाँ कभी ‘कम्फर्ट जोन’ बनवाया था और विदेशों से बड़ी तादाद में यौनकर्मियों को बुलवाया था. 1928 में यौनकर्मियों को लाइसेंस जारी किए थे. मगर 1950 में सरकार ने यौन व्यापार को प्रतिबंधित कर दिया था. इसके बावज़ूद यह इलाक़ा आज भारतीय यौनकर्मियों का बहुत बड़ा घर कहलाता है. यहाँ 200 से ज्य़ादा पिंज़रानुमा कोठरियों में 5000 से भी ज्यादा यौनकर्मियों का रहवास है.

आंध्रप्रदेश के कमाठी मजदूरों के नाम पर यह इलाक़ा कमाठीपुरा कहलाता है. एक ज़माने में गुजरात के वाघरी लोगों की भी यहाँ खासी तादाद थी. मगर अब तो बँगाल, नेपाल, कर्नाटक, तमिलनाडू, उड़ीसा, असम से आए लोग भी ख़ूब मिल जाया करते हैं.

कमाठीपुरा का यह पूरा इलाक़ा मौटे तौर से 16 गलियों में बटा है, 9 गलियों में सेक्स का कारोबार चलता है, ब़ाकी 5 गलियां रेसीडेंटल और बिज़नेस के लिए हैं. यह गलियाँ आगे जाकर नार्थबुक गार्डन, बैलेसिस रोड़, फाकलेंड रोड़ से जुड़कर अपनी पहचान ख़ोने लगती हैं.

बहरहाल, यहाँ की गलियों में भारी भीड़ के बीच से पैदल चलते हुए आदमी कुछ ज्य़ादा ही ठहर रहे हैं, वह चलते-चलते टकरा भी जाते हैं. हो सकता है कि मेरी तरह आपका दिल भी यहाँ धकधक की आवाज़ पर काबू पाने के चक्कर में बैठता जाए, और ज़ुबान अपनेआप सिलती जाए, दर्ज़नो आँखें उम्मीद लिए आपके ऊपर भी अटक जाएं, और मेरी तरह आपका बदन भी पीला पड़ता जाए.


कतरा-कतरा ज़िंदगी
मौसम तो ख़ुशनुमा है, मगर ख़ुली नालियों से आने वाली बदबू चारों ओर फैली रहती है. एक गली से दूसरी और तीसरी से चौथी में मुड़ता हूँ, मगर पूरा इलाक़ा इतना तंग और फ़ैला हुआ है कि दो-चार बार घूमने के बाद भी यह शायद ही समझ में आए.

इन्हीं गलियों में यौनकर्मियों की अनगिनत और अंतहीन कहानियाँ हैं. यहाँ से यौनव्यापार मौटे तौर पर चार तरीकों से चलते हुए देख रहा हूँ- एक तो अपने को सीधे बेचने वाली औरतों से, दूसरा पिंज़रानुमा कोठरियों की मालकिनों यानी घरवालियों से, तीसरा पिंज़रानुमा कोठरियों में कैद लड़कियों से और चौथा दारू के अड्डों से.

यह एक भरा पूरा बाज़ार है- नीचे दुकानें और ऊपर औरतें खड़ी हैं. शहर की ब़ाकी लड़कियां जब प्यार का खु़शनुमा एहसास लिए सोती-जागती हैं, यहाँ की लडकियाँ अपने को किसी के साथ भी किराए पर खुल्ला छोड़ देती हैं. शहर की ब़ाकी औरतों के लिए सुबह, शाम, रात होने के अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं, मगर यहाँ की औरतों के लिए सुबह, शाम, रात का एक ही अर्थ है- ग्राहकों को पकड़ना और उनसे पैसा कमाना. यह अपने ऊपर बेहिस़ाब पाऊडर, लिपिस्टिक, काजल, पर्स, सेंडल, जूड़े, सस्ती जेव्लरी क्या-क्या नहीं लादे हैं. इनके जींस, टीशर्ट, फ़िराक, सलवार-शूट, ब्लाउस, स्कर्ट, साड़ी में हर आकार और प्रकार के कट लगे हुए हैं. ऐसे में एक ग्राहक का काम यहाँ से वह माल छांटना है, जिसे तोड़मरोड़ कर अपने को हल्का कर सके, और कुछ और रातों तक आराम से सो तो सके.

आप यहाँ से देखिए- यह औरतें रंग-ढ़ंग और चाल-ढ़ाल से अपने ग्राहक को किस तरह से पहचान लेती है. दूसरी तरफ, आपको यहाँ आने वालों से भी यह पता लग सकता हैं कि यहाँ कौन-सी गलियाँ कितनी सही हैं, और क्यों हैं, उनमें कौन सी ज़मात वालों का असर ज्य़ादा है, उनका हिसाब-किताब क्या है, उनका धंधापानी कैसा है, कभी-कभार क्या-क्या लफड़ा हो सकता है, और उनसे कैसे-कैसे निपटा जा सकता है, वगैरह-वगैरह.

आप यहाँ से देखिए- एक जगह पर खड़ी होने के बावजूद यह पिंज़रानुमा कोठरी की दुनिया लोकल ट्रेन जैसी नहीं दिखती है, जो कुछ यात्रियों को उतारती है, और नए यात्रियों को चढ़ाकर एक मशीन सी चलती रहती है.

हां भाई सुनिए... एकदम नया आया है.. गलत नहीं ले जाऊंगा चलिए... नेपाली, बंगाली, साऊथ इंडियन सब हैं... पहले देख लीजिए... 12 से 16 का है... गोरा है देखने में क्या जाता है... इधर तो धंधा चलता है... उधर भी सस्ता ही है...

पिंज़रानुमा कोठरी के सामने खड़े हुए नहीं कि एक-एक करके बहुत सारे दलाल आपको घेरने लगते हैं. यहाँ तक कि फ़ोन नम्बर वाली पर्चियां भी देने लगते हैं. इनसे बगैर उलझे आगे बढ़ना ठीक है. वैसे इनकी भी अपनी कहानियाँ हैं. मगर अभी आगे बढ़ना ठीक है.

खै़र पिंज़रानुमा कोठरी के भीतर जैसे ही जाएंगे, वैसे ही आप दूसरी दुनिया में घुस जाएंगे. यहाँ लकड़ी की सीढ़ियों से लगे कुछ कोने, कोनों से दरवाजे, दरवाजों से ताबूतनुमा कमरे और कमरों के अंधियारे से बहुत सारी औरतें दिखाई देती हैं. यहाँ तक़रीबन 25 से 30 औरतों के साथ उनकी एक घरवाली भी दिखेगी. यहाँ औरतों की तादाद और उनकी उम्र से किसी घरवाली की सत्ता और उसकी संपत्ति का पता चलता है. यहाँ तक़रीबन आधी तो 22 साल से ज्य़ादा की नहीं हैं. यहाँ का बड़ा सीधा हिसाब है- 12 से 22 साल तक को ऊँचे दामों पर बेचो, और 30 से 35 साल के बाद घरवाली बन जाओ.


अब मेरी तरह आपको भी यहाँ किसी से सीधे-सीधे यह पूछना मुश्किल हो सकता है कि- "आप यहाँ तक कैसे पहुंचीं"... "वो कौन था जिसने आपसे पहली बार कहा कि पैसे कमाने का यह भी एक तरीका हो सकता है", इसलिए मेरी तरह आप भी यहाँ पहुँचकर हो सकता है कि- ‘आपका नाम...’ ‘आप कैसे हो’ से आगे न बढ़ पाएं.


मगर दिन के उजाले में एक इज्ज़तदार कहलवाने वाला आदमी जहाँ आने से कतराता है, वहाँ से मुझे लगता है कि सुबह से शाम तक का वक़्त ज़रूर बिताया जाए. यहाँ की कुछ सच्चाईयों से दो-चार हो जाया जाए और कोई नैतिक बहस छेड़े बगैर अपना ताज़ातरीन तजुर्बा बांट लिया जाए.


बड़ी बहन, छोटी बहन और...
‘याद आ रही है, तेरी याद आ रही है...’- ‘‘सुबह-सुबह पता नहीं क्यों आ रही है’’ कहते हुए जूही ने रेडियो बंद कर दिया है. आज के दिन पता नहीं कितनों दिनों के बाद वह पूरी नींद सो जाना चाहती है. दिन को जागना उसे कभी भी अच्छा नहीं लगा है. मगर उससे तो हरदम चुस्त रहने की उम्मीद की जाती है. इस उम्मीद के बगैर भी दुनिया चल सकेगी- वह सोच भी नहीं सकती है. शहर के बहुत से ठिकाने बदलने के बाद ही तो वह यहाँ तक आई है, और अब यही की होकर रह गई है.

यहाँ उम्र के पच्चीसवें साल में भी उसने अपने सीधेपन को संभाले रखा है. उसकी सुने तो उसमें अब पहले जैसी बात नहीं है. बचपना तो बहुत पहले ही ख़त्म हो चुका था, जवानी भी ख़त्म होने ही वाली है. असल में जूही की बड़ी बहन चंपा की शादी होने वाली है, इसलिए वह यहाँ हैं. इससे पहले चंपा भी यहाँ बैठ चुकी है. जुही कहती है कि उसके घर में अब कोई फूल (छोटी बहन) नहीं बचा है, इसलिए उसकी शादी के लिए यहाँ कौन बैठने वाली है, पता नहीं है. मगर ऐसा उसने मज़ाक में कहा है या वाकई संज़ीदगी से, यह भी तो पता नहीं चलता है.

वैसे भी उसके हिस्से में दिन और रात का अंतर नहीं बचा है. मौसम के मिजाज़, छुट्टी वाले दिनों या चौपाटी जाने जैसे ख़्यालों से भी जूही का कोई लेना-देना नहीं है. ग्राहक कितना सही है-यह भी उसे नहीं जानना है. शहर के नक़्शे की बजाय उसकी दुनिया के तार तो घनी बस्ती से भी सघन उस नेटवर्क से जुड़े हुए हैं जिसमें हजार रूपए का ग्राहक ढ़ूढ़ लेना सबसे बड़ी बात मान ली जाती है.


मां की तलाश में गोमती
इधर से सबसे आख़िरी के कमरे तक अगर नज़र पहुँचे तो कोई भी यह पूछ सकता है कि उधर रौशनी क्यों नहीं है- यह बात गोमती से अच्छा भला कौन जान सकता है, जिसे 8 साल की उम्र में यहां कैद किया गया था. दरअसल, नेपाल के काठमांडू की गोमती की मम्मी बचपन में मर चुकी थी. इसलिए वह अक्सर स्कूल के बाहर ही बैठी रहती थी. इतनी नाज़ुक उम्र में उसे क्या पता था कि स्कूल या मेले की ऐसी अकेली और गुमसुम बच्चियों पर दलालों की नज़र रहती है.

एक दलाल भी गोमती को कई दिनों से बतियाता और उसे बहलाता-फुसलाता था. उसने यह भी कहा था कि वह उसकी मम्मी को भी जानता है, और अगर वह किसी को कुछ न बताए तो एक दिन मिला भी सकता है. मगर एक दिन उसने गोमती को खाने में ऐसा कुछ दिया कि वह नेपाल से मुंबई तक होश में नहीं आई. यहाँ उसे घरवाली के हाथों बेच दिया गया. घरवाली ने उसे बहुत प्यार-दुलार दिया. उसने कहा मम्मी तुझे मेरे लिए ही तो छोड़ गई है, एक दिन आएगी. मगर गोमती की मम्मी है कि आज तक नहीं आई है.


गोमती बता रही है कि ऐसी लड़कियों को सालों तक कैद करके रखा जाता है. फिर कुछ सालों बाद उसकी बोली लगायी जाती है. अगर लड़की न माने तो उसे कई दिनों तक भूखा और नंगा रखा जाता है, मारा, पीटा और तड़पाया जाता है. मगर जैसे ही लड़की एक बार तैयार हो जाती है तो उसे हाथों हाथ लिया जाता है. जब तक वह कुछ जानती-समझती नहीं है, तब तक तो उससे होने वाली कमाई केवल घरवाली के हाथों में जाती है, मगर जैसे-जैसे लड़की सियानी होती है तो वह खाने, कपड़े, लत्ते के अलावा ग्राहक के पैसे से भी अपना हिस्सा मांगने लगती है.


हर एक बाज़ार में नई और आर्कषक चीज़ों की माँग हमेशा बनी रहती है. सेक्स का बाज़ार भी इसी सिद्धांत पर चलता है, यहाँ भी तो ज्य़ादातर ग्राहकों को कमसिन देह ही चाहिए. इसलिए यहाँ बच्चियों के देह व्यापार में हमेशा तेजी बनी रहती है. मगर बच्चियां भी कोई दिमागी तैयारी के साथ तो देह व्यापार में उतरती नहीं हैं, जो पहले से ही उन्हें सेक्स से जुड़ी जानकारियों का ज्ञान हो. इसलिए उनमें सेक्स से जुड़ी गंभीर बीमारियों की आशंकाए बढ़ जाती हैं. लिहाजा, न जाने कितनी गोमतियां एड्स नामक हालात की गिरफ़्त में आ जाती हैं.



बची रहना बिटिया
वैसे दुर्गा जैसी कई औरतें अपनी बच्चियों को ऐसे धंधे से दूर ही रखना चाहती हैं. इसके लिए वह यहाँ से दूर भिमंडी या मीरा रोड़ जैसी जगहों में रहती हैं. दुर्गा बता रही है कि बहुत कम माँएं अपनी बच्चियों को पढ़ा पा रही हैं. एक तो उनकी आधी से ज्यादा कमाई घरवाली, दलाल, डॉक्टर और साहूकार खा जाते हैं. दूसरा यह भी कि जैसे ही वह 30 की होती हैं, तो अक्सर कई तरह की बीमारियों से घिर जाती हैं, उनके सिर पर जब तक बहुत सारा क़र्ज़ भी चढ़ चुका होता है, और जब तक उनकी बच्चियां भी 12-13 साल की हो जाती हैं, जो कभी अपनी माँओं की बीमारियों, तो कभी उनके कर्जों को उतारने के लिए उन्हीं के नक़्शे-कदमों पर चल रही होती हैं.

वैसे बच्चियां जो देखती हैं, वही करती हैं. वह बचपन से मां के जैसा मेक़अप और व्यवहार देख-देखकर उनसे काफ़ी कुछ सीखा करती हैं. इस तरह उनमें आने वाली आदतें ताज़िंदगी आसानी से नहीं जाती हैं. दूसरी तरफ, कुछ बच्चियों को अपनी माँओं का ग्राहकों के साथ जाना अच्छा नहीं लगता है. कई तो पढ़ने में भी तेज होती हैं, मगर उन्हें सही रास्ता कोई नहीं बताता है, और अगर बताए भी तो घर से उतना सहयोग भी नहीं मिलता है. अक्सर घरवाली और दलाल भी उनसे उल्टी-सीधी बातें करके हतोत्साहित किया करते हैं. इसके अलावा, माँओं के ग्राहक भी उनका यौन-शोषण करना चाहते हैं.

अपनी बच्चियों को बचाने के लिए कुछ माँएं उन्हें अपने रिश्तेदारों के पास भेज देती हैं. कुछ माँएं 14-15 साल की उम्र में शादियाँ करा देती हैं. जबकि कुछ माँएं एनजीओ के पुनर्वास केन्द्रों में भेज देती हैं. मगर अपनी बच्चियों को पुनर्वास केन्द्रों तक भेजने वाली माँओं को यह डर भी रहता है कि अगर उनकी बच्ची सब जानने-समझने के बाद उनके पास नहीं आयी तो ? इसलिए यह माँएं बीच-बीच में अपनी बच्चियों को पुनर्वास केन्द्रों से बुलाती रहती हैं.


पुनर्वास के बजाय फिर धंधे में
कई पुनर्वास केन्द्रों की एक दिक्कत यह भी है कि उनमें केवल 7 से 12 साल तक के बच्चों को ही रखा जाता है. जया नाम की लड़की जैसे ही 13 की हुई, वैसे ही एक एनजीओ ने उसे यह कहकर अपने पुनर्वास केन्द्र से निकाल दिया कि तुम्हारी उम्र की लड़कियों को रखने की कोई व्यवस्था नहीं है. जया को उस समय पुनर्वास केन्द्र की सबसे ज्यादा ज़रुरत थी, क्योंकि उसकी मां का अपना कोई घर नहीं था और न ही वह उसे कहीं भेज सकती थी. इसलिए जया अपनी माँ के साथ रहने लगी और धीरे-धीरे उसी के धंधे में हाथ बटाने लगी. आज जया को एनजीओ वालों से नफ़रत हैं, वह एनजीओ के बारे में कहती है- "उनका काम तो सब ओर अपना काम दिखाना भर है, कोण्डम या गोली-दवाई देने के अलावा उनका कोई काम नहीं हैं."

यौनकर्मी बनने की बहुत सारी कहानियाँ पारिवारिक हिंसा-दुत्कार, अपराध, बलात्कार और ख़रीद-फ़रोख्त से भी जुड़ी हैं. मगर बाज़ार की फ़ितरत के हिसाब से यहाँ भी शोषण के लिए ज्य़ादातर उन लड़कियों को चुन लिया जाता है, जो पिछड़े और गरीब तबक़े से आती हैं. उनकी मज़बूरियों के ख़िलाफ उनके सारे सपने बहुत सस्ते और थोक में जो ख़रीद लिए जाते हैं.

भारत में यौनव्यापार को रोकने के लिए ‘भारतीय दण्ड विधान, 1860’ से लेकर ‘वेश्यावृत्ति उन्मूलन विधेयक, 1956’ बनाये गए हैं. इनदिनों कानून में बदलाव की चर्चाएं भी ज़ोरों पर चल रही हैं. मगर इस स्थिति की जड़ें तो बेकारी और पलायन से जुड़ी हुई हैं. इन उलझनों के आपसी जुड़ाव को अनदेखा किया जा रहा है. असलियत यह है कि यहाँ की औरतें घर पर बहुत सारा पैसा भेजने की बजाय दो टाइम की रोटी के लिए जूझ रही हैं. इसलिए नीतियों में इनके जीवन-स्तर को उठाने की बजाय इन्हें जीने के मौके देने वाले नियमों की बात हो तो बात बने भी.

कमाठीपुरा की गलियों से गुज़रते हुए आप कुछ और पिंज़रानुमा कोठरियों में भी घुस सकते हैं, कुछ और चरित्रों से भी बतिया सकते हैं. यहाँ के इन भागों को उनकी संपूर्णता में भी देख सकते हैं. दृश्यों को केवल दृश्य भर न मानकर, उनका विश्लेषण भी कर सकते हैं. बहुत सारे बिन्दुओं के मेलजोल से, एक कहानी को उपन्यास में भी बदल सकते हैं. मगर मेरे भीतर से कागज के फ़ूल, पाक़ीजा, उमराव ज़ान जैसी ओल्ड और गोल्ड फ़िल्मों की हिरोइनें हवा हो चुकी हैं... मेरे सामने केवल मंटो की काली सलवारें लटकी हैं.

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28.5.10

जंगल से कटकर सूख गये मालधारी

शिरीष खरे

पोरबंदर/ एशियाई शेरों के सुरक्षित घर कहे जाने वाले गिर अभयारण्य में बरसों पहले मालधारियों का भी घर था. ‘माल’ यानी संपति यानी पशुधन और ‘धारी’ का मतलब ‘संभालने वाले’. इस तरह पशुओं को संभाल कर, पाल कर मालधारी अपनी आजीविका चलाते थे. एक दिन पता चला कि अब इस इलाके में केवल शेर रहेंगे. फिर धीरे-धीरे मालधारियों को उनकी जड़ों से उखाड़कर फेंकने का सिलसिला शुरु हुआ.

आज की तारीख में वन्यजीव अभयारण्य के चलते गिरी के जंगलों से बेदखल हुए मालधारी समुदाय के पास जहां रोजीरोटी एक प्रश्नवाचक चिन्ह की तरह हो गया है, वहीं बुनियादी सुविधायें भी सिरे से लापता हैं. अपनी सामाजिक पहचान बनाने की जद्दोजहद के बीच उनके सामने शिक्षा और सेहत जैसे कई सवाल हैं, जिसका जवाब कोई नहीं देना चाहता.

मालधारियों का घर

गुजरात में शुष्क पर्णपाती जंगल, नम पर्णपाती जंगल, घास के बड़े-बड़े मैदान, समुद्र के लंबे-लंबे किनारे और बहुत सारे दलदली इलाके हैं. यहां 4 राष्ट्रीय उद्यान और 20 अभयारण्य हैं, जो 13 विकासखण्डों की 24 जगहों पर बसे हैं. प्रदेश के 4 राष्ट्रीय उद्यान जहां कुल 47,967 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में हैं, वहीं 20 अभयारण्य कुल 16,74,224 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैले हैं.

इन्हीं में एक गिर का अभयारण्य भी है, जो एशियाई शेरों का सुरक्षित घर कहलाता है. यह 1424 वर्ग किलोमीटर में फैला सघन जंगल, देश के सबसे बड़े शुष्क पर्णपाती जंगलों में से एक है. यही वह फैलाव है, जिसके आसपास मालधारी समुदाय का जीवन अपना विस्तार पाता था.

आरक्षित जंगल वाले इस इलाके को 70 के दशक में वन्य अभयारण्य के तौर पर अधिसूचित किया गया था. सबसे पहले 1972 में, सरकार ने यहां के 845 मालधारी परिवारों में से 580 परिवारों को जंगल से बाहर करने की कवायद शुरु की और देखते ही देखते 129 बस्तियों से तकरीबन 5000 आबादी को जंगल से उजाड़ दिया गया. तब से अब तक, यहां वन्य संरक्षण के नाम पर मालधारियों का शिकार बाकायदा जारी है.

बरदा एक ऐसा ही इलाका है, जो विस्थापन की सूची से फिलहाल तो छूटा हुआ है लेकिन वन विभाग का जंगल राज जब तब यह अहसास कराता रहता है कि मालधारियों की कोई औकात नहीं है और वन विभाग जब चाहे मालधारियों को जानवरों की तरह हकाल सकता है.

बरदा के जेसिंगभाई, हरिसिंग भाई, रामगुलाब, चंदाभामा जैसे लोगों से अगर आप बात करें तो सब के पास अब केवल पुराने दिनों की यादें शेष हैं. एक-एक आदमी के पास अपने-अपने किस्से हैं. वन-विभाग के आने के पहले तक उनका जीवन कितना मस्त, आजाद, आत्मनिर्भर, सरल, व्यवस्थित और हरा भरा था. लेकिन पिछले 40 सालों में सरकार ने मालधारियों को उनकी जड़ों से ऐसा काटा कि उनका जीवन सूख ही गया.

जानवरों के नाम पर

70 के दशक में विभाग ने यहां सर्वे किया, जंगलों को नापा और जमीनों की हदबंधी की. देखते ही देखते, उसने जंगल की जमीनों को राजस्व की जमीनों में बदलना चालू किया. इसके बाद विभाग ने पानी से लेकर कंदमूल और पेड़ की टहनियों, यहां तक कि जिन पत्थरों और गीली माटी से मालधारियों ने अपने घर बनाए , उनके इस्तेमाल तक पर पाबंदी लगा दी.

सरकार को जंगल के जीवों की देखभाल का तो ख्याल आता रहा, मगर पालतू पशुओं की चराई पर लगी रोक को हटाने का ख्याल एक बार भी नहीं आया. जबकि मालधारियों के पास तो बड़ी संख्या में गिर की मशहूर गाएं थीं, जो अब तेजी से घट रही हैं और जिनके घटने के सवाल पर सरकार भी अब चिंता प्रकट कर रही है.

यहां के लोगों पर चौतरफा मार पड़ी है. सरकार ने जहां उनके काम, धंधे और संसाधनों को उनसे छीना है, वहीं उनकी दुनिया में आए अभावों की ओर पलटकर भी नहीं देखा है. इन मालधारियों का जीवन जंगल पर ही निर्भर था और जब वे जंगल से बेदखल किये गये तो जैसे जिंदगी से ही बेदखल कर दिये गये. सरकार ने विस्थापन से पहले कई वायदे किये लेकिन एक बार जंगल से विस्थापित होने के बाद सरकारी महकमे ने इनकी ओर पलट कर नहीं देखा.

बरदा की पहाड़ियां, पोरबंदर से 15 किलोमीटर दूर हैं. अरब सागर के चेहरे को मानो चूमता सा यह इलाका पोरबंदर और जामनगर जिलों से जुड़ा हुआ है. यहां का जंगल कभी राणावाव और जामनगर के राजाओं के अधीन था, सो अभी भी यह पहाड़ियां राणाबरदा और जामबरदा के नाम से ही जानी जाती है.

पत्थर जैसे जिंदगी

राणाबर्दा और जामबर्दा पहाड़ियों पर कुल 61 बस्तियां बची हैं, जो एक-दूसरे से बहुत दूर-दूर और ऊंची नीची पथरीली जगहों पर हैं. यहां 1154 परिवारों के 6372 लोग रहते हैं, उनमें 14 साल तक के 2774 बच्चे हैं. अब दोनों पहाड़ियों की 61 बस्तियों के इतने बच्चों के सामने जो 14 प्राथमिक स्कूल हैं भी तो उनमें से 7 के भवन नहीं हैं. बाकी 7 प्राथमिक स्कूलों के भवन हैं, मगर उनमें भी छोटे-छोटे 15 कमरे ही हैं. मतलब यहां के सारे बच्चों को ध्यान में रखा जाए तो औसतन 185 बच्चों पर केवल एक कमरा ठहरता है.

दूसरी तरफ, राणाबर्दा के प्राथमिक स्कूलों में तो शिक्षकों की संख्या फिर भी ठीक है, मगर जामबर्दा के 1077 बच्चों के सामने जो 5 प्राथमिक स्कूल हैं, उनमें शिक्षकों की संख्या 6 हैं. मतलब यहां औसतन 180 बच्चों पर केवल एक शिक्षक ठहरते हैं. इन्हीं सबके चलते यहां 14 साल तक के 2774 बच्चों में से केवल 728 बच्चों के नाम स्कूली फाइलों में भरे जा सके हैं. बीते 1 अप्रेल से, केन्द्र सरकार ने देश भर के सारे बच्चों के लिए शिक्षा के अधिकार का कानून लागू किया है, मगर यहां के 2046 बच्चों के लिये तो कम से कम यह कानून नाकाफी है.

सरकारी दावे और उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के उलट यहां की 61 बस्तियों के भीतर 6 साल से नीचे के कुल 1354 बच्चे हैं. लेकिन उनकी देखभाल के लिए एक भी आंगनबाड़ी केन्द्र यहां नहीं है. इसी तरह 192 वर्ग मीटर तक फैली इन दो पहाड़ियों के बीच एक भी जगह ऐसी नहीं है, जहां सरकार ने स्वास्थ्य की कोई सेवा उपलब्ध करायी हो. इसलिए तबीयत बिगड़ जाने पर मरीजों को 25 किलोमीटर तक की दूरी तय करनी पड़ती है. कच्ची और खराब सड़क के कारण गंभीर बीमारी या दुर्घटना झेलने वाले बहुत सारे मरीजों और गर्भवती महिलाओं को दुर्गम रास्तों के बीच ही अपनी जान गंवानी पड़ती है.

केन्द्र सरकार ने मातृ मृत्यु-दर और शिशु मृत्यु-दर घटाने के लिए एनएचआरएम यानि ‘राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन’ चलाया है. इसी तर्ज पर गुजरात सरकार ने भी एसएचआरएम यानि ‘राज्य ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन’ छेडा हुआ है. मगर यहां से ऐसा लगता है जैसे न केवल स्वास्थ्य सेवा बल्कि बुनियादी सहूलियत से जुड़ी हर एक नीति, योजना और कार्यक्रम से मालधारियों का यह बरदा इलाका छूटा हुआ है. कुछ ऐसे, जैसे 21वी शताब्दी के 10 साल गुजरने के बाद भी यह इलाका 1970 के जमाने में ही छूट गया हो.

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13.5.10

शहर के भीतर कितने शहर

शिरीष खरे

आपने अली बाबा और चालीस चोर की कहानी तो देखी, पढ़ी या सुनी ही होगी। उसमें एक चोर जब अलीबाबा का घर पहचान लेता है तो उसके बाहर क्रॉस का निशान लगाकर चल देता है। अगली सुबह चालीस चोर आते हैं। मगर हर घर के आगे क्रॉस का निशान लगा रहता है। इसलिए चालीस चोर मिलकर भी एक अली बाबा का घर नहीं खोज पाते। ठीक यही कहानी इस देश के शहरों की होने वाली है। हो सकता है कि जब हम अपने शहर वापिस लौटे तो अपना ही चौराहा, मोहल्ला, या उनकी गलियां, दुकानें खोजते फिरें और हमें अपने ही यारों की महफ़िलें ना मिलें।




चाहे मुंबई हो या अहमदाबाद, सूरत हो या भोपाल। सबके मास्टर प्लॉन एक जैसे जो बन रहे हैं। इसलिए अब शहर के भीतर शहर है कि पहचान में नहीं आ रहे हैं। सबके सब शहर एक जैसे लगने लगे हैं। और आप माने चाहे ना माने मगर शहरों के रहवासियों की दशा अब दुर्दशा में बदल रही है। देश की तरक्की के केन्द्र में बड़े शहर हैं। यह शहर उत्पादन, बाजार और सम्पत्ति के केन्द्र भी हैं। यहां गांव के गरीब बेहतर काम और आमदनी की उम्मीद से आते हैं। इसलिए पूंजी की फितरत और आबादी के बोझ से शहर की सहभागी व्यवस्था के बहुत नीचे दब जाते हैं। एक शहर भी तो कई तरह की असमानताओं से भरा होता है। तो सवाल है कि क्या शहरों को बदलने के किसी मास्टर प्लॉन में भूख, गरीबी और बेकारी जैसी असमानताओं को मिटाने की कोई योजना भी शामिल है या नहीं ? अगर है तो शहरों के बदलने के साथ-साथ उसके कई हिस्सों में बड़ी तेजी से भूख, गरीबी और बेकारी क्यों जमा हो रही है ? इस तरह शहर का बड़ा भूगोल निरक्षर और बीमार क्यों दिखाई दे रहा है ? समझ क्यों नहीं आता है कि गांव की गरीबी ज्यादा उलझी है या शहर की ?

दरअसल, एक शहर के भीतर कई शहर बनते जा रहे हैं। पहले दृश्य में हमारे साफ-सुथरा, व्यवस्थित और महंगी कारों से दौड़ता शहर है। वहां के लोगों की सुरक्षित और अधिक आमदनी है। इसलिए उन्हें बेहतर सुविधाएं मिलती हैं। इसलिए उन्हें शहरी तरक्की में मददगार माना जाता है। दूसरे दृश्य में झोपड़पट्टी है। यह गंदा, तंग और भीड़ भरा शहर है। यहां न लोग ही सुरक्षित हैं, और न ही उनके काम या घर। झोपड़पट्टियों को तरक्की राह में रोड़ा समझा जाता है। सार्वजनिक जगहों पर ऐसी झोपड़पट्टियां बनती हैं इसलिए शहर के कई जगहों पर अलग-अलग कानून और विकास योजनाएं चलती हैं। यहां के रहवासियों की मेहनत से शहर का बाजार मुनाफा लेता है। बदले में उसका श्रेय और जायज पैसा नहीं देता। इससे शहरी गरीबी सुधरने की बजाय बिगड़ती है। एक शहर में शोषण के कई दृश्य उभरते हैं। शहरी गरीबी के पीछे- 1. गरीबों की समस्याएं और 2. सरकारी विफलताएं घुली-मिली हैं। गरीबों को 'काम' और 'घर' की तलाश रहती है। देश में असंगठित क्षेत्र से 93 फीसदी मजदूर जुड़े हैं। दूसरी तरफ औपचारिक अर्थव्यवस्था में कम हिस्सेदारी से गरीबी, योग्यता और रचनात्मकता पर बुरा असर पड़ता है। इससे औपचारिक अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी नहीं होती और बेकारी बढ़ती है। इसलिए देश के 5 करोड़ से भी अधिक लोग झोपड़पट्टी में रहते हैं। यह आर्थिक, कानूनी और सामाजिक सुरक्षाओं से दूर हैं। नतीजतन, पूरा भार शासन पर पड़ता है। क्योंकि ऐसी झोपड़पट्टियां गैरकानूनी कहलाती हैं इसलिए यहां नल और गटर की व्यवस्थाएं नहीं होतीं। यहां तक सार्वजनिक संसाधन और सेवाएं भी नहीं पहुंचतीं। इससे गरीब और अधिक असहाय तथा बीमार होते हैं। आखिरकार, गरीबों की बड़ी तादाद गरीबी के दायरे से बाहर नहीं आ पाती। शहरी गरीब शहर में रहकर भी उससे दूर रहता है। यह छोटी झुग्गी, फुटपाथ या रेल्वे पटरियों के किनारे होता है। शहरी ताकतों का गठजोड़ उसे एक तरफ धकेलता है। इस ढंग से उसका स्थान, काम और हक नजरअंदाज बनाया जाता है। यहां तक कि उसकी गतिविधियां भी संदेह के घेरे में रहती हैं। शहरी गरीबी मिटाने वाले भी कभी शहरी विकास तो कभी खूबसूरती के नाम पर चुप्पी को गहरा बनाया जाता है। इस तरह गरीबी की बजाय गरीबों को उखाड़ने की कार्रवाई सहज और शांतिपूर्ण ढंग से चलती है।

सरकार की विफलता को तीन तरह से उजागर होती है। 1-जमीन की कमी 2-सब्सिडी में कमी और 3- संसाधनों में कमी। मुंबई के उदहारण से अगर हम देखें  तो जैसा कि सब जानते हैं कि मुंबई में जमीन बहुत कम और महंगी हैं। यहां कुल बस्ती का 60 फीसदी हिस्सा झोपड़पट्टी का है। मगर यह शहर की सिर्फ 14 फीसदी जमीन पर बसा है। सरकार के मुताबिक हर आदमी के लिए 5 वर्ग मीटर और हर परिवार के लिए 25 वर्ग मीटर जमीन होनी चाहिए। मतलब शहर के गरीब कम जमीन और ढेर सारी परेशानियों के साथ रहता है। इससे उनका काम या धंधा प्रभावित होता है। नागरिक सुविधाएं मुहैया कराने के लिए सरकार चुनी जाती है। मगर इस लिहाज से कई तजुर्बों से अब यह साफ हो गया है कि वह खुद को पीछे और निजी ताकतों को आगे कर रही है। दुनिया भर के कई तजुर्बों से यह साफ हुआ है कि निजी ताकतों का काम व्यवस्था में सुधार की आड़ में बाजार तैयार करना होता है। बाजार नागरिकों से नहीं उपभोक्ताओं से चलता है। गरीबों के पास अपनी उलझनों को सुलझाने के लिए न तो अधिक पैसा होता है और न ही तकनीकी सूझ या समझ। तकनीकी सूझ या समझ का मतलब यहां खास तौर से कागजी औपचारिकताओं से है। शहर के लिए तरक्की के मॉडल आम आदमी की भागीदारी से नहीं बनते। इन दिनों वैश्विक ताकतों की सलाह को अहम् माना जा रहा है, लेकिन नागरिकों के 'संवाद' और 'विरोध' को रोका जा रहा है। गरीबी कम करने के लिए सभी लोगों को आजादी और बराबरी से जीने का मौका देना चाहिए। 74 वें संविधान संशोधन में विकेन्द्रीकरण और जनभागीदारिता का जिक्र हुआ है। इसके लिए वार्ड-सभा और क्षेत्रीय-सभाओं के उल्लेख भी हुए हैं। मगर असलियत में शहरी विकास की मौजूदा योजनाओं में जनता की सीधी भागीदारिता न के बराबर है।

किसी शहर को 'लंदन', 'न्यूयॉर्क' या 'संघाई' बनाने की बातों भर से वहां का नजारा नहीं बदल जाएगा। इसके लिए तरक्की में सबका और सबको हिस्सा देना होगा। इसके बिना अमीरी-गरीबी के बीच की खाई नहीं भरी जा सकती। एक शहर का मतलब उसकी पूरी आबादी से है। इसमें एक छोटे तबके की तरक्की को शहर की तरक्की मान लिया जाता है। लेकिन शहर का बड़ा तबका ऐसी तरक्की से बर्बाद होता है। इस तबके से भी तरक्की की धारणाएं जाननी होगी। यह केवल घर बचाने और बनाने की बात नहीं हैं बल्कि बजट, कारोबार और प्रावधानों में शामिल होने की बात भी है।

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9.5.10

अजीबोगरीब संख्याओं का शहर मुंबई

शिरीष खरे

 
‘‘शांति और हंसी-खुशी यहां से नहीं जा सकती हूं। यहां से जो तूफान उठा है, उसे यही छोड़कर नहीं जा सकती हूं। इस शहर ने मुझे दर्द और परेशानियों के जो लंबे-लंबे दिनरात दिए हैं, उनकी शिकायत किए बगैर, यहां से कैसे जा सकती हूं ?’’

मुंबई में ऐनी के दिनरात अब गिने जा रहे हैं। बहुत जल्द ही वह इस शहर को नमस्कार कहकर अपने देश फिनलेण्ड चली जाएगी। मगर जाने के पहले, उसे शहर से जुड़ी कुछ संख्याएं परेशान कर रही हैं। संख्याएं। मुंबई कई अजीबोगरीब संख्याओं से भरा शहर है। जैसे कि, यहां 1 करोड़ 25 लाख से भी ज्यादा लोगों के पास अपने सेल नम्बर हैं- इतने सेल नम्बर तो कई यूरोपियन देशों के पास भी नहीं हैं।



यह और बात है कि मुंबई के करीब 40 प्रतिशत लोगों को झोपड़पट्टियों में रहना पड़ता है- यहां 67 लाख 20 हजार लोग झोपड़पट्टियों में रहते हैं, जो फिनलेण्ड की कुल आबादी से करीब डेढ़ गुना ज्यादा है। फिनलेण्ड की कुल आबादी करीब 50 लाख है, जो वहां के 384 हजार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैली है, जबकि मुंबई के 67 लाख 20 हजार झोपड़पट्टी रहवासियों के पास ऐसा सौभाग्य कहां है- यहां की 40 प्रतिशत आबादी के पास तो यहां की 14 प्रतिशत जमीन ही है, जो कि 140 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा नहीं हो सकती है। यहां कुछ संख्याओं की गणना करने से एक बड़ा हैरतअंगेज आकड़ा यह भी निकलता है- फिनलेण्ड की जनसंख्या घनत्व के मुकाबले मुंबई की झोपड़पट्टियों की जनसंख्या का घनत्व करीब 28 हजार गुना ज्यादा है। दूसरी तरफ, मुंबई की झोपड़पट्टी के रहवासियों की आमदनी फिनलेण्ड के रहवासियों की आमदनी के मुकाबले 100 गुना कम है।

वैसे तो मुंबई देश का सबसे अमीर शहर कहा जाता है, मगर बड़ी अजीब सी बात है कि इस शहर का हर दूसरा आदमी झोपड़पट्टी में रहता है। मुंबई की प्रति व्यक्ति आय (करीब 7 हजार रूपए महीना) है, जो कि देश की प्रति व्यक्ति आय (करीब 3 हजार रूपए महीना) के मुकाबले दोगुनी से भी ज्यादा है। इसके बावजूद देश की आर्थिक राजधानी की 40 प्रतिशत आबादी गरीब रेखा के नीचे है, और इसमें से भी 10वां हिस्सा रोजाना 20 रूपए भी नहीं कमा पाता है।

मुंबई की तरक्की यहां के मजदूरों के कंधों से होकर गुजरती है। यहां 66 लाख 16 हजार घरेलू मजदूर हैं, जिसमें से भी 3 लाख 76 हजार सीमांत मजदूर हैं। इन्हीं मजदूरों की बदौलत राज्य सरकार को सलाना 40 हजार करोड़ रूपए टेक्स मिलता है। इसके बावजूद यहां के मजदूरों को सघन और मलिन झोपड़पट्टियों में रहना पड़ता है, जहां पीने का पानी, बिजली, नाली, रास्ता, शौचालय, स्कूल, अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाओं का घनघोर अभाव है। कायदे से तो मुंबई के इतने सारे मजदूरों को जमीन का कम-से-कम 25 प्रतिशत हिस्सा मिलना चाहिए। मगर बड़ी अजीब सी बात है कि उन्हें उनकी 14 प्रतिशत जमीन से भी हटाया जा रहा है। जबकि खुद सरकार यह मानती है कि हर आदमी के लिए 5 वर्ग मीटर और हर परिवार के लिए 25 वर्ग मीटर जमीन होनी ही चाहिए।

स्लमडाग मिलेनियर की कामयाबी के बाद, मुंबई दुनिया के सबसे दिलचस्प शहरों में से एक माना जाने लगा है। मगर शहर में जमीन का काला कारोबार भी कम दिलचस्प नहीं हैं जिसे एक उदाहरण से समझते हैं। बीते कुछ सालों में, राज्य सरकार ने शहर की 30 हजार एकड़ से भी ज्यादा जमीन प्राइवेट सेक्टर को दी है। 1986 के सीलिंग कानून के बावजूद उसने ऐसा किया है। यह कानून कहता है कि अतिरिक्त जमीनों का उपयोग कम लागत के घर बनाने के लिए किया जाए। किसी को 500 मीटर से ज्यादा जमीन तभी दी जाए, जब वह उसमें 40 से 80 वर्ग मीटर के फ्लेटस् बनाए। मगर देखिए : मुंबई के हिरानंदानी गार्डन में बिल्डर को 230 एकड़ की बेशकीमती जमीन सिर्फ और सिर्फ 40 पैसे प्रति एकड़ की दर से 80 सालों के लिए लीज पर दी गई है। इसके बाद हिरानंदानी गार्डन में ऐसा ‘स्विटजरलण्ड’ खड़ा किया गया है जिसमें कम लागत के एक फ्लेट की कीमत सिर्फ 5 करोड़ रूपए है। सोचिए : यहां गरीबों को घर देने का जो खेल खेला जाता है, उसका हर गरीब भी कितना करोड़पति होता है ?

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8.5.10

सूरत जीरो स्लम आपदा : और 1650 झोपड़ियां टूटी

शिरीष खरे


सूरत/ बीते एक हफ़्ते में महानगर पालिका ने शहर के तीन इलाकों से 1650 झोपड़ियों को तोड़ा है। सूरत को झोपड़पट्टी रहित बनाने के मिशन ने अबकि 8500 से भी ज्यादा लोगों को बेघर बनाया है। इसके बदले, प्रशासन ने उन्हें शहर की सीमारेखा से कोसों दूर कोसाठ या अन्य इलाकों में बसाने का आश्वासन दिया है।

सुभाषनगर झोपड़पट्टी हटाने की बड़ी कार्रवाई को अंजाम तक पहुंचाने के बाद, सूरत महानगर पालिका ने अपने काम को जारी रखा और मैनानगर इलाके की तकरीबन 300 झोपड़ियों को तोड़ डाला। उसके बाद, उदना और सेंट्रल जोन में भी विध्वंस का यही नजारा देखने को मिला। यहां की तुलसीनगर और कल्याणनगर की तकरीबन 1100 झोपड़ियों को तोड़ा गया। इस इलाके में एक सड़क व्यवस्था को ठिकाने पर लाना था, जिसके चलते 5000 से ज्यादा गरीबों को ठिकाने लगाया गया। नतीजन, यहां से प्रशासन ने 24000 वर्ग मीटर की जगह खाली करवायी है। मगर दूसरी तरफ, यहां से उजड़े लोगों की शिकायत है कि- वैकल्पिक व्यवस्था के नाम पर, प्रशासन ने उनके लिए बमरोली और बेस्तान जैसे इलाकों में चले जाने का सुझाव भर दिया है, उसके आगे कुछ भी नहीं किया है।

इसी तरह, सेंट्रल जोन में सड़क को 80 फीट चौड़ा करने के लिए तकरीबन 550 झोपड़ियों को तोड़ा गया है। यहां से तकरीबन 2500 से ज्यादा लोगों को उजाड़ने के बाद प्रशासन ने दावा किया है कि- शुरू में तो रहवासियों ने डेमोलेशन का बहुत विरोध किया, मगर बाद में कोसाठ में बसाने की बात पर सब मान गए। जबकि यहां से उजाड़े गए लोग कहते हैं कि- उन्हें डेमोलेशन की सूचना तक नहीं दी गई थी और डेमोलेशन की कार्रवाई को बड़ी निर्दयतापूर्वक पूरा किया गया, जिसके चलते उन्होंने प्रशासन का विरोध भी किया।

प्रशासन की तरफ से यह साफ हुआ है कि उसका अगला निशाना अब बापूनगर कालोनी है, जहां तकरीबन 2700 घरों में 15000 से भी ज्यादा लोग रहते हैं। प्रशासन ने यह भी साफ किया है कि- फिलहाल स्लम डेमोलेशन का जो लक्ष्य उसके सामने है, उसे 15 दिनों के भीतर पूरा कर लिया जाएगा।


कैसे बनेगा सूरत जीरो स्लम :

  • सूरत को जीरो स्लम बनाने के लिए 1 लाख से ज्यादा झोपड़ियों को तोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। मगर सरकारी योजना में पुनर्वास के लिए केवल 42 हजार घर बनाये जाने हैं। ऐसे में 56 हजार से ज्यादा घरों का क्या होगा ?

  • एक तरफ झोपड़ियों को साफ करने का काम जोरो पर है, दूसरी तरफ उन्हें बसाने की बात तो बहुत दूर, अभी तक तो यही साफ नहीं हो पाया है कि बसेगा कौन, कैसे और कब तक ?

  • झोपड़पट्टियों को उजाड़ने के बाद उन्हें कोसाठ जैसी जगहों पर बसाने का अश्वासन दिया जा रहा है, यह जगह विस्थापितों की जगहों से 15 किलोमीटर तक दूर है। फिर यह बाढ़ प्रभावित इलाका भी है। इसलिए एक बात तो यह है कि शहर के बाहर उन्हें काम नहीं मिलेगा और अगर वह काम की तलाश में शहर आए-गए भी तो 150 रूपए प्रति दिन की दिहाड़ी मजदूरी में से कम-से-कम 40 रूपए प्रति दिन (क्योंकि यहां से बस नहीं मिलती, सिर्फ ऑटो मिलते हैं) का तो किराया ही जाएगा। ऐसे में अगर किसी दिन मजदूरी नहीं मिली तो उस दिन का किराया तो फालतू में ही जाएगा। दूसरी बात यह भी कि जब यहां का इलाका बाढ़ के चलते पानी से भर जाएगा तो यहां की स्थिति पहले से कहीं ज्यादा भंयकर हो जाएगी।

  • किसी भी प्रशासन को झोपड़ियां तोड़ने के पहले संयुक्त राष्ट्र की गाइडलाईन माननी होती है। मगर बहुत सारे तजुर्बों से यह जाहिर हुआ है कि सूरत महानगर पालिका ने संयुक्त राष्ट्र की गाइडलाईन खुला उल्लंघन हो रहा है।

  • सूरत महानगर पालिका पर आरोप हैं कि उसने झोपड़पट्टियों में गलत सर्वेक्षण किये हैं। इसके अलावा वह कागजातों को लेकर भी कई गंभीर अनियमिताओं से घिरी हुई हैं।
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