9.5.10

अजीबोगरीब संख्याओं का शहर मुंबई

शिरीष खरे

 
‘‘शांति और हंसी-खुशी यहां से नहीं जा सकती हूं। यहां से जो तूफान उठा है, उसे यही छोड़कर नहीं जा सकती हूं। इस शहर ने मुझे दर्द और परेशानियों के जो लंबे-लंबे दिनरात दिए हैं, उनकी शिकायत किए बगैर, यहां से कैसे जा सकती हूं ?’’

मुंबई में ऐनी के दिनरात अब गिने जा रहे हैं। बहुत जल्द ही वह इस शहर को नमस्कार कहकर अपने देश फिनलेण्ड चली जाएगी। मगर जाने के पहले, उसे शहर से जुड़ी कुछ संख्याएं परेशान कर रही हैं। संख्याएं। मुंबई कई अजीबोगरीब संख्याओं से भरा शहर है। जैसे कि, यहां 1 करोड़ 25 लाख से भी ज्यादा लोगों के पास अपने सेल नम्बर हैं- इतने सेल नम्बर तो कई यूरोपियन देशों के पास भी नहीं हैं।



यह और बात है कि मुंबई के करीब 40 प्रतिशत लोगों को झोपड़पट्टियों में रहना पड़ता है- यहां 67 लाख 20 हजार लोग झोपड़पट्टियों में रहते हैं, जो फिनलेण्ड की कुल आबादी से करीब डेढ़ गुना ज्यादा है। फिनलेण्ड की कुल आबादी करीब 50 लाख है, जो वहां के 384 हजार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैली है, जबकि मुंबई के 67 लाख 20 हजार झोपड़पट्टी रहवासियों के पास ऐसा सौभाग्य कहां है- यहां की 40 प्रतिशत आबादी के पास तो यहां की 14 प्रतिशत जमीन ही है, जो कि 140 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा नहीं हो सकती है। यहां कुछ संख्याओं की गणना करने से एक बड़ा हैरतअंगेज आकड़ा यह भी निकलता है- फिनलेण्ड की जनसंख्या घनत्व के मुकाबले मुंबई की झोपड़पट्टियों की जनसंख्या का घनत्व करीब 28 हजार गुना ज्यादा है। दूसरी तरफ, मुंबई की झोपड़पट्टी के रहवासियों की आमदनी फिनलेण्ड के रहवासियों की आमदनी के मुकाबले 100 गुना कम है।

वैसे तो मुंबई देश का सबसे अमीर शहर कहा जाता है, मगर बड़ी अजीब सी बात है कि इस शहर का हर दूसरा आदमी झोपड़पट्टी में रहता है। मुंबई की प्रति व्यक्ति आय (करीब 7 हजार रूपए महीना) है, जो कि देश की प्रति व्यक्ति आय (करीब 3 हजार रूपए महीना) के मुकाबले दोगुनी से भी ज्यादा है। इसके बावजूद देश की आर्थिक राजधानी की 40 प्रतिशत आबादी गरीब रेखा के नीचे है, और इसमें से भी 10वां हिस्सा रोजाना 20 रूपए भी नहीं कमा पाता है।

मुंबई की तरक्की यहां के मजदूरों के कंधों से होकर गुजरती है। यहां 66 लाख 16 हजार घरेलू मजदूर हैं, जिसमें से भी 3 लाख 76 हजार सीमांत मजदूर हैं। इन्हीं मजदूरों की बदौलत राज्य सरकार को सलाना 40 हजार करोड़ रूपए टेक्स मिलता है। इसके बावजूद यहां के मजदूरों को सघन और मलिन झोपड़पट्टियों में रहना पड़ता है, जहां पीने का पानी, बिजली, नाली, रास्ता, शौचालय, स्कूल, अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाओं का घनघोर अभाव है। कायदे से तो मुंबई के इतने सारे मजदूरों को जमीन का कम-से-कम 25 प्रतिशत हिस्सा मिलना चाहिए। मगर बड़ी अजीब सी बात है कि उन्हें उनकी 14 प्रतिशत जमीन से भी हटाया जा रहा है। जबकि खुद सरकार यह मानती है कि हर आदमी के लिए 5 वर्ग मीटर और हर परिवार के लिए 25 वर्ग मीटर जमीन होनी ही चाहिए।

स्लमडाग मिलेनियर की कामयाबी के बाद, मुंबई दुनिया के सबसे दिलचस्प शहरों में से एक माना जाने लगा है। मगर शहर में जमीन का काला कारोबार भी कम दिलचस्प नहीं हैं जिसे एक उदाहरण से समझते हैं। बीते कुछ सालों में, राज्य सरकार ने शहर की 30 हजार एकड़ से भी ज्यादा जमीन प्राइवेट सेक्टर को दी है। 1986 के सीलिंग कानून के बावजूद उसने ऐसा किया है। यह कानून कहता है कि अतिरिक्त जमीनों का उपयोग कम लागत के घर बनाने के लिए किया जाए। किसी को 500 मीटर से ज्यादा जमीन तभी दी जाए, जब वह उसमें 40 से 80 वर्ग मीटर के फ्लेटस् बनाए। मगर देखिए : मुंबई के हिरानंदानी गार्डन में बिल्डर को 230 एकड़ की बेशकीमती जमीन सिर्फ और सिर्फ 40 पैसे प्रति एकड़ की दर से 80 सालों के लिए लीज पर दी गई है। इसके बाद हिरानंदानी गार्डन में ऐसा ‘स्विटजरलण्ड’ खड़ा किया गया है जिसमें कम लागत के एक फ्लेट की कीमत सिर्फ 5 करोड़ रूपए है। सोचिए : यहां गरीबों को घर देने का जो खेल खेला जाता है, उसका हर गरीब भी कितना करोड़पति होता है ?

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संपर्क : shirish2410@gmail.com

3 टिप्‍पणियां:

सुनील दत्त ने कहा…

क्या ये फिल्म भी काले कारोवारियों की उपज नहीं थी

Hindiblog Jagat ने कहा…

अच्छा लिखा है आपने.
क्या हिंदी ब्लौगिंग के लिए कोई नीति बनानी चाहिए? देखिए

Rajey Sha ने कहा…

आपने जो तस्‍वीर इस्‍तेमाल की है बहुत कुछ कहती है।