28.5.10

जंगल से कटकर सूख गये मालधारी

शिरीष खरे

पोरबंदर/ एशियाई शेरों के सुरक्षित घर कहे जाने वाले गिर अभयारण्य में बरसों पहले मालधारियों का भी घर था. ‘माल’ यानी संपति यानी पशुधन और ‘धारी’ का मतलब ‘संभालने वाले’. इस तरह पशुओं को संभाल कर, पाल कर मालधारी अपनी आजीविका चलाते थे. एक दिन पता चला कि अब इस इलाके में केवल शेर रहेंगे. फिर धीरे-धीरे मालधारियों को उनकी जड़ों से उखाड़कर फेंकने का सिलसिला शुरु हुआ.

आज की तारीख में वन्यजीव अभयारण्य के चलते गिरी के जंगलों से बेदखल हुए मालधारी समुदाय के पास जहां रोजीरोटी एक प्रश्नवाचक चिन्ह की तरह हो गया है, वहीं बुनियादी सुविधायें भी सिरे से लापता हैं. अपनी सामाजिक पहचान बनाने की जद्दोजहद के बीच उनके सामने शिक्षा और सेहत जैसे कई सवाल हैं, जिसका जवाब कोई नहीं देना चाहता.

मालधारियों का घर

गुजरात में शुष्क पर्णपाती जंगल, नम पर्णपाती जंगल, घास के बड़े-बड़े मैदान, समुद्र के लंबे-लंबे किनारे और बहुत सारे दलदली इलाके हैं. यहां 4 राष्ट्रीय उद्यान और 20 अभयारण्य हैं, जो 13 विकासखण्डों की 24 जगहों पर बसे हैं. प्रदेश के 4 राष्ट्रीय उद्यान जहां कुल 47,967 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में हैं, वहीं 20 अभयारण्य कुल 16,74,224 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैले हैं.

इन्हीं में एक गिर का अभयारण्य भी है, जो एशियाई शेरों का सुरक्षित घर कहलाता है. यह 1424 वर्ग किलोमीटर में फैला सघन जंगल, देश के सबसे बड़े शुष्क पर्णपाती जंगलों में से एक है. यही वह फैलाव है, जिसके आसपास मालधारी समुदाय का जीवन अपना विस्तार पाता था.

आरक्षित जंगल वाले इस इलाके को 70 के दशक में वन्य अभयारण्य के तौर पर अधिसूचित किया गया था. सबसे पहले 1972 में, सरकार ने यहां के 845 मालधारी परिवारों में से 580 परिवारों को जंगल से बाहर करने की कवायद शुरु की और देखते ही देखते 129 बस्तियों से तकरीबन 5000 आबादी को जंगल से उजाड़ दिया गया. तब से अब तक, यहां वन्य संरक्षण के नाम पर मालधारियों का शिकार बाकायदा जारी है.

बरदा एक ऐसा ही इलाका है, जो विस्थापन की सूची से फिलहाल तो छूटा हुआ है लेकिन वन विभाग का जंगल राज जब तब यह अहसास कराता रहता है कि मालधारियों की कोई औकात नहीं है और वन विभाग जब चाहे मालधारियों को जानवरों की तरह हकाल सकता है.

बरदा के जेसिंगभाई, हरिसिंग भाई, रामगुलाब, चंदाभामा जैसे लोगों से अगर आप बात करें तो सब के पास अब केवल पुराने दिनों की यादें शेष हैं. एक-एक आदमी के पास अपने-अपने किस्से हैं. वन-विभाग के आने के पहले तक उनका जीवन कितना मस्त, आजाद, आत्मनिर्भर, सरल, व्यवस्थित और हरा भरा था. लेकिन पिछले 40 सालों में सरकार ने मालधारियों को उनकी जड़ों से ऐसा काटा कि उनका जीवन सूख ही गया.

जानवरों के नाम पर

70 के दशक में विभाग ने यहां सर्वे किया, जंगलों को नापा और जमीनों की हदबंधी की. देखते ही देखते, उसने जंगल की जमीनों को राजस्व की जमीनों में बदलना चालू किया. इसके बाद विभाग ने पानी से लेकर कंदमूल और पेड़ की टहनियों, यहां तक कि जिन पत्थरों और गीली माटी से मालधारियों ने अपने घर बनाए , उनके इस्तेमाल तक पर पाबंदी लगा दी.

सरकार को जंगल के जीवों की देखभाल का तो ख्याल आता रहा, मगर पालतू पशुओं की चराई पर लगी रोक को हटाने का ख्याल एक बार भी नहीं आया. जबकि मालधारियों के पास तो बड़ी संख्या में गिर की मशहूर गाएं थीं, जो अब तेजी से घट रही हैं और जिनके घटने के सवाल पर सरकार भी अब चिंता प्रकट कर रही है.

यहां के लोगों पर चौतरफा मार पड़ी है. सरकार ने जहां उनके काम, धंधे और संसाधनों को उनसे छीना है, वहीं उनकी दुनिया में आए अभावों की ओर पलटकर भी नहीं देखा है. इन मालधारियों का जीवन जंगल पर ही निर्भर था और जब वे जंगल से बेदखल किये गये तो जैसे जिंदगी से ही बेदखल कर दिये गये. सरकार ने विस्थापन से पहले कई वायदे किये लेकिन एक बार जंगल से विस्थापित होने के बाद सरकारी महकमे ने इनकी ओर पलट कर नहीं देखा.

बरदा की पहाड़ियां, पोरबंदर से 15 किलोमीटर दूर हैं. अरब सागर के चेहरे को मानो चूमता सा यह इलाका पोरबंदर और जामनगर जिलों से जुड़ा हुआ है. यहां का जंगल कभी राणावाव और जामनगर के राजाओं के अधीन था, सो अभी भी यह पहाड़ियां राणाबरदा और जामबरदा के नाम से ही जानी जाती है.

पत्थर जैसे जिंदगी

राणाबर्दा और जामबर्दा पहाड़ियों पर कुल 61 बस्तियां बची हैं, जो एक-दूसरे से बहुत दूर-दूर और ऊंची नीची पथरीली जगहों पर हैं. यहां 1154 परिवारों के 6372 लोग रहते हैं, उनमें 14 साल तक के 2774 बच्चे हैं. अब दोनों पहाड़ियों की 61 बस्तियों के इतने बच्चों के सामने जो 14 प्राथमिक स्कूल हैं भी तो उनमें से 7 के भवन नहीं हैं. बाकी 7 प्राथमिक स्कूलों के भवन हैं, मगर उनमें भी छोटे-छोटे 15 कमरे ही हैं. मतलब यहां के सारे बच्चों को ध्यान में रखा जाए तो औसतन 185 बच्चों पर केवल एक कमरा ठहरता है.

दूसरी तरफ, राणाबर्दा के प्राथमिक स्कूलों में तो शिक्षकों की संख्या फिर भी ठीक है, मगर जामबर्दा के 1077 बच्चों के सामने जो 5 प्राथमिक स्कूल हैं, उनमें शिक्षकों की संख्या 6 हैं. मतलब यहां औसतन 180 बच्चों पर केवल एक शिक्षक ठहरते हैं. इन्हीं सबके चलते यहां 14 साल तक के 2774 बच्चों में से केवल 728 बच्चों के नाम स्कूली फाइलों में भरे जा सके हैं. बीते 1 अप्रेल से, केन्द्र सरकार ने देश भर के सारे बच्चों के लिए शिक्षा के अधिकार का कानून लागू किया है, मगर यहां के 2046 बच्चों के लिये तो कम से कम यह कानून नाकाफी है.

सरकारी दावे और उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के उलट यहां की 61 बस्तियों के भीतर 6 साल से नीचे के कुल 1354 बच्चे हैं. लेकिन उनकी देखभाल के लिए एक भी आंगनबाड़ी केन्द्र यहां नहीं है. इसी तरह 192 वर्ग मीटर तक फैली इन दो पहाड़ियों के बीच एक भी जगह ऐसी नहीं है, जहां सरकार ने स्वास्थ्य की कोई सेवा उपलब्ध करायी हो. इसलिए तबीयत बिगड़ जाने पर मरीजों को 25 किलोमीटर तक की दूरी तय करनी पड़ती है. कच्ची और खराब सड़क के कारण गंभीर बीमारी या दुर्घटना झेलने वाले बहुत सारे मरीजों और गर्भवती महिलाओं को दुर्गम रास्तों के बीच ही अपनी जान गंवानी पड़ती है.

केन्द्र सरकार ने मातृ मृत्यु-दर और शिशु मृत्यु-दर घटाने के लिए एनएचआरएम यानि ‘राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन’ चलाया है. इसी तर्ज पर गुजरात सरकार ने भी एसएचआरएम यानि ‘राज्य ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन’ छेडा हुआ है. मगर यहां से ऐसा लगता है जैसे न केवल स्वास्थ्य सेवा बल्कि बुनियादी सहूलियत से जुड़ी हर एक नीति, योजना और कार्यक्रम से मालधारियों का यह बरदा इलाका छूटा हुआ है. कुछ ऐसे, जैसे 21वी शताब्दी के 10 साल गुजरने के बाद भी यह इलाका 1970 के जमाने में ही छूट गया हो.

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13.5.10

शहर के भीतर कितने शहर

शिरीष खरे

आपने अली बाबा और चालीस चोर की कहानी तो देखी, पढ़ी या सुनी ही होगी। उसमें एक चोर जब अलीबाबा का घर पहचान लेता है तो उसके बाहर क्रॉस का निशान लगाकर चल देता है। अगली सुबह चालीस चोर आते हैं। मगर हर घर के आगे क्रॉस का निशान लगा रहता है। इसलिए चालीस चोर मिलकर भी एक अली बाबा का घर नहीं खोज पाते। ठीक यही कहानी इस देश के शहरों की होने वाली है। हो सकता है कि जब हम अपने शहर वापिस लौटे तो अपना ही चौराहा, मोहल्ला, या उनकी गलियां, दुकानें खोजते फिरें और हमें अपने ही यारों की महफ़िलें ना मिलें।




चाहे मुंबई हो या अहमदाबाद, सूरत हो या भोपाल। सबके मास्टर प्लॉन एक जैसे जो बन रहे हैं। इसलिए अब शहर के भीतर शहर है कि पहचान में नहीं आ रहे हैं। सबके सब शहर एक जैसे लगने लगे हैं। और आप माने चाहे ना माने मगर शहरों के रहवासियों की दशा अब दुर्दशा में बदल रही है। देश की तरक्की के केन्द्र में बड़े शहर हैं। यह शहर उत्पादन, बाजार और सम्पत्ति के केन्द्र भी हैं। यहां गांव के गरीब बेहतर काम और आमदनी की उम्मीद से आते हैं। इसलिए पूंजी की फितरत और आबादी के बोझ से शहर की सहभागी व्यवस्था के बहुत नीचे दब जाते हैं। एक शहर भी तो कई तरह की असमानताओं से भरा होता है। तो सवाल है कि क्या शहरों को बदलने के किसी मास्टर प्लॉन में भूख, गरीबी और बेकारी जैसी असमानताओं को मिटाने की कोई योजना भी शामिल है या नहीं ? अगर है तो शहरों के बदलने के साथ-साथ उसके कई हिस्सों में बड़ी तेजी से भूख, गरीबी और बेकारी क्यों जमा हो रही है ? इस तरह शहर का बड़ा भूगोल निरक्षर और बीमार क्यों दिखाई दे रहा है ? समझ क्यों नहीं आता है कि गांव की गरीबी ज्यादा उलझी है या शहर की ?

दरअसल, एक शहर के भीतर कई शहर बनते जा रहे हैं। पहले दृश्य में हमारे साफ-सुथरा, व्यवस्थित और महंगी कारों से दौड़ता शहर है। वहां के लोगों की सुरक्षित और अधिक आमदनी है। इसलिए उन्हें बेहतर सुविधाएं मिलती हैं। इसलिए उन्हें शहरी तरक्की में मददगार माना जाता है। दूसरे दृश्य में झोपड़पट्टी है। यह गंदा, तंग और भीड़ भरा शहर है। यहां न लोग ही सुरक्षित हैं, और न ही उनके काम या घर। झोपड़पट्टियों को तरक्की राह में रोड़ा समझा जाता है। सार्वजनिक जगहों पर ऐसी झोपड़पट्टियां बनती हैं इसलिए शहर के कई जगहों पर अलग-अलग कानून और विकास योजनाएं चलती हैं। यहां के रहवासियों की मेहनत से शहर का बाजार मुनाफा लेता है। बदले में उसका श्रेय और जायज पैसा नहीं देता। इससे शहरी गरीबी सुधरने की बजाय बिगड़ती है। एक शहर में शोषण के कई दृश्य उभरते हैं। शहरी गरीबी के पीछे- 1. गरीबों की समस्याएं और 2. सरकारी विफलताएं घुली-मिली हैं। गरीबों को 'काम' और 'घर' की तलाश रहती है। देश में असंगठित क्षेत्र से 93 फीसदी मजदूर जुड़े हैं। दूसरी तरफ औपचारिक अर्थव्यवस्था में कम हिस्सेदारी से गरीबी, योग्यता और रचनात्मकता पर बुरा असर पड़ता है। इससे औपचारिक अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी नहीं होती और बेकारी बढ़ती है। इसलिए देश के 5 करोड़ से भी अधिक लोग झोपड़पट्टी में रहते हैं। यह आर्थिक, कानूनी और सामाजिक सुरक्षाओं से दूर हैं। नतीजतन, पूरा भार शासन पर पड़ता है। क्योंकि ऐसी झोपड़पट्टियां गैरकानूनी कहलाती हैं इसलिए यहां नल और गटर की व्यवस्थाएं नहीं होतीं। यहां तक सार्वजनिक संसाधन और सेवाएं भी नहीं पहुंचतीं। इससे गरीब और अधिक असहाय तथा बीमार होते हैं। आखिरकार, गरीबों की बड़ी तादाद गरीबी के दायरे से बाहर नहीं आ पाती। शहरी गरीब शहर में रहकर भी उससे दूर रहता है। यह छोटी झुग्गी, फुटपाथ या रेल्वे पटरियों के किनारे होता है। शहरी ताकतों का गठजोड़ उसे एक तरफ धकेलता है। इस ढंग से उसका स्थान, काम और हक नजरअंदाज बनाया जाता है। यहां तक कि उसकी गतिविधियां भी संदेह के घेरे में रहती हैं। शहरी गरीबी मिटाने वाले भी कभी शहरी विकास तो कभी खूबसूरती के नाम पर चुप्पी को गहरा बनाया जाता है। इस तरह गरीबी की बजाय गरीबों को उखाड़ने की कार्रवाई सहज और शांतिपूर्ण ढंग से चलती है।

सरकार की विफलता को तीन तरह से उजागर होती है। 1-जमीन की कमी 2-सब्सिडी में कमी और 3- संसाधनों में कमी। मुंबई के उदहारण से अगर हम देखें  तो जैसा कि सब जानते हैं कि मुंबई में जमीन बहुत कम और महंगी हैं। यहां कुल बस्ती का 60 फीसदी हिस्सा झोपड़पट्टी का है। मगर यह शहर की सिर्फ 14 फीसदी जमीन पर बसा है। सरकार के मुताबिक हर आदमी के लिए 5 वर्ग मीटर और हर परिवार के लिए 25 वर्ग मीटर जमीन होनी चाहिए। मतलब शहर के गरीब कम जमीन और ढेर सारी परेशानियों के साथ रहता है। इससे उनका काम या धंधा प्रभावित होता है। नागरिक सुविधाएं मुहैया कराने के लिए सरकार चुनी जाती है। मगर इस लिहाज से कई तजुर्बों से अब यह साफ हो गया है कि वह खुद को पीछे और निजी ताकतों को आगे कर रही है। दुनिया भर के कई तजुर्बों से यह साफ हुआ है कि निजी ताकतों का काम व्यवस्था में सुधार की आड़ में बाजार तैयार करना होता है। बाजार नागरिकों से नहीं उपभोक्ताओं से चलता है। गरीबों के पास अपनी उलझनों को सुलझाने के लिए न तो अधिक पैसा होता है और न ही तकनीकी सूझ या समझ। तकनीकी सूझ या समझ का मतलब यहां खास तौर से कागजी औपचारिकताओं से है। शहर के लिए तरक्की के मॉडल आम आदमी की भागीदारी से नहीं बनते। इन दिनों वैश्विक ताकतों की सलाह को अहम् माना जा रहा है, लेकिन नागरिकों के 'संवाद' और 'विरोध' को रोका जा रहा है। गरीबी कम करने के लिए सभी लोगों को आजादी और बराबरी से जीने का मौका देना चाहिए। 74 वें संविधान संशोधन में विकेन्द्रीकरण और जनभागीदारिता का जिक्र हुआ है। इसके लिए वार्ड-सभा और क्षेत्रीय-सभाओं के उल्लेख भी हुए हैं। मगर असलियत में शहरी विकास की मौजूदा योजनाओं में जनता की सीधी भागीदारिता न के बराबर है।

किसी शहर को 'लंदन', 'न्यूयॉर्क' या 'संघाई' बनाने की बातों भर से वहां का नजारा नहीं बदल जाएगा। इसके लिए तरक्की में सबका और सबको हिस्सा देना होगा। इसके बिना अमीरी-गरीबी के बीच की खाई नहीं भरी जा सकती। एक शहर का मतलब उसकी पूरी आबादी से है। इसमें एक छोटे तबके की तरक्की को शहर की तरक्की मान लिया जाता है। लेकिन शहर का बड़ा तबका ऐसी तरक्की से बर्बाद होता है। इस तबके से भी तरक्की की धारणाएं जाननी होगी। यह केवल घर बचाने और बनाने की बात नहीं हैं बल्कि बजट, कारोबार और प्रावधानों में शामिल होने की बात भी है।

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9.5.10

अजीबोगरीब संख्याओं का शहर मुंबई

शिरीष खरे

 
‘‘शांति और हंसी-खुशी यहां से नहीं जा सकती हूं। यहां से जो तूफान उठा है, उसे यही छोड़कर नहीं जा सकती हूं। इस शहर ने मुझे दर्द और परेशानियों के जो लंबे-लंबे दिनरात दिए हैं, उनकी शिकायत किए बगैर, यहां से कैसे जा सकती हूं ?’’

मुंबई में ऐनी के दिनरात अब गिने जा रहे हैं। बहुत जल्द ही वह इस शहर को नमस्कार कहकर अपने देश फिनलेण्ड चली जाएगी। मगर जाने के पहले, उसे शहर से जुड़ी कुछ संख्याएं परेशान कर रही हैं। संख्याएं। मुंबई कई अजीबोगरीब संख्याओं से भरा शहर है। जैसे कि, यहां 1 करोड़ 25 लाख से भी ज्यादा लोगों के पास अपने सेल नम्बर हैं- इतने सेल नम्बर तो कई यूरोपियन देशों के पास भी नहीं हैं।



यह और बात है कि मुंबई के करीब 40 प्रतिशत लोगों को झोपड़पट्टियों में रहना पड़ता है- यहां 67 लाख 20 हजार लोग झोपड़पट्टियों में रहते हैं, जो फिनलेण्ड की कुल आबादी से करीब डेढ़ गुना ज्यादा है। फिनलेण्ड की कुल आबादी करीब 50 लाख है, जो वहां के 384 हजार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैली है, जबकि मुंबई के 67 लाख 20 हजार झोपड़पट्टी रहवासियों के पास ऐसा सौभाग्य कहां है- यहां की 40 प्रतिशत आबादी के पास तो यहां की 14 प्रतिशत जमीन ही है, जो कि 140 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा नहीं हो सकती है। यहां कुछ संख्याओं की गणना करने से एक बड़ा हैरतअंगेज आकड़ा यह भी निकलता है- फिनलेण्ड की जनसंख्या घनत्व के मुकाबले मुंबई की झोपड़पट्टियों की जनसंख्या का घनत्व करीब 28 हजार गुना ज्यादा है। दूसरी तरफ, मुंबई की झोपड़पट्टी के रहवासियों की आमदनी फिनलेण्ड के रहवासियों की आमदनी के मुकाबले 100 गुना कम है।

वैसे तो मुंबई देश का सबसे अमीर शहर कहा जाता है, मगर बड़ी अजीब सी बात है कि इस शहर का हर दूसरा आदमी झोपड़पट्टी में रहता है। मुंबई की प्रति व्यक्ति आय (करीब 7 हजार रूपए महीना) है, जो कि देश की प्रति व्यक्ति आय (करीब 3 हजार रूपए महीना) के मुकाबले दोगुनी से भी ज्यादा है। इसके बावजूद देश की आर्थिक राजधानी की 40 प्रतिशत आबादी गरीब रेखा के नीचे है, और इसमें से भी 10वां हिस्सा रोजाना 20 रूपए भी नहीं कमा पाता है।

मुंबई की तरक्की यहां के मजदूरों के कंधों से होकर गुजरती है। यहां 66 लाख 16 हजार घरेलू मजदूर हैं, जिसमें से भी 3 लाख 76 हजार सीमांत मजदूर हैं। इन्हीं मजदूरों की बदौलत राज्य सरकार को सलाना 40 हजार करोड़ रूपए टेक्स मिलता है। इसके बावजूद यहां के मजदूरों को सघन और मलिन झोपड़पट्टियों में रहना पड़ता है, जहां पीने का पानी, बिजली, नाली, रास्ता, शौचालय, स्कूल, अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाओं का घनघोर अभाव है। कायदे से तो मुंबई के इतने सारे मजदूरों को जमीन का कम-से-कम 25 प्रतिशत हिस्सा मिलना चाहिए। मगर बड़ी अजीब सी बात है कि उन्हें उनकी 14 प्रतिशत जमीन से भी हटाया जा रहा है। जबकि खुद सरकार यह मानती है कि हर आदमी के लिए 5 वर्ग मीटर और हर परिवार के लिए 25 वर्ग मीटर जमीन होनी ही चाहिए।

स्लमडाग मिलेनियर की कामयाबी के बाद, मुंबई दुनिया के सबसे दिलचस्प शहरों में से एक माना जाने लगा है। मगर शहर में जमीन का काला कारोबार भी कम दिलचस्प नहीं हैं जिसे एक उदाहरण से समझते हैं। बीते कुछ सालों में, राज्य सरकार ने शहर की 30 हजार एकड़ से भी ज्यादा जमीन प्राइवेट सेक्टर को दी है। 1986 के सीलिंग कानून के बावजूद उसने ऐसा किया है। यह कानून कहता है कि अतिरिक्त जमीनों का उपयोग कम लागत के घर बनाने के लिए किया जाए। किसी को 500 मीटर से ज्यादा जमीन तभी दी जाए, जब वह उसमें 40 से 80 वर्ग मीटर के फ्लेटस् बनाए। मगर देखिए : मुंबई के हिरानंदानी गार्डन में बिल्डर को 230 एकड़ की बेशकीमती जमीन सिर्फ और सिर्फ 40 पैसे प्रति एकड़ की दर से 80 सालों के लिए लीज पर दी गई है। इसके बाद हिरानंदानी गार्डन में ऐसा ‘स्विटजरलण्ड’ खड़ा किया गया है जिसमें कम लागत के एक फ्लेट की कीमत सिर्फ 5 करोड़ रूपए है। सोचिए : यहां गरीबों को घर देने का जो खेल खेला जाता है, उसका हर गरीब भी कितना करोड़पति होता है ?

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8.5.10

सूरत जीरो स्लम आपदा : और 1650 झोपड़ियां टूटी

शिरीष खरे


सूरत/ बीते एक हफ़्ते में महानगर पालिका ने शहर के तीन इलाकों से 1650 झोपड़ियों को तोड़ा है। सूरत को झोपड़पट्टी रहित बनाने के मिशन ने अबकि 8500 से भी ज्यादा लोगों को बेघर बनाया है। इसके बदले, प्रशासन ने उन्हें शहर की सीमारेखा से कोसों दूर कोसाठ या अन्य इलाकों में बसाने का आश्वासन दिया है।

सुभाषनगर झोपड़पट्टी हटाने की बड़ी कार्रवाई को अंजाम तक पहुंचाने के बाद, सूरत महानगर पालिका ने अपने काम को जारी रखा और मैनानगर इलाके की तकरीबन 300 झोपड़ियों को तोड़ डाला। उसके बाद, उदना और सेंट्रल जोन में भी विध्वंस का यही नजारा देखने को मिला। यहां की तुलसीनगर और कल्याणनगर की तकरीबन 1100 झोपड़ियों को तोड़ा गया। इस इलाके में एक सड़क व्यवस्था को ठिकाने पर लाना था, जिसके चलते 5000 से ज्यादा गरीबों को ठिकाने लगाया गया। नतीजन, यहां से प्रशासन ने 24000 वर्ग मीटर की जगह खाली करवायी है। मगर दूसरी तरफ, यहां से उजड़े लोगों की शिकायत है कि- वैकल्पिक व्यवस्था के नाम पर, प्रशासन ने उनके लिए बमरोली और बेस्तान जैसे इलाकों में चले जाने का सुझाव भर दिया है, उसके आगे कुछ भी नहीं किया है।

इसी तरह, सेंट्रल जोन में सड़क को 80 फीट चौड़ा करने के लिए तकरीबन 550 झोपड़ियों को तोड़ा गया है। यहां से तकरीबन 2500 से ज्यादा लोगों को उजाड़ने के बाद प्रशासन ने दावा किया है कि- शुरू में तो रहवासियों ने डेमोलेशन का बहुत विरोध किया, मगर बाद में कोसाठ में बसाने की बात पर सब मान गए। जबकि यहां से उजाड़े गए लोग कहते हैं कि- उन्हें डेमोलेशन की सूचना तक नहीं दी गई थी और डेमोलेशन की कार्रवाई को बड़ी निर्दयतापूर्वक पूरा किया गया, जिसके चलते उन्होंने प्रशासन का विरोध भी किया।

प्रशासन की तरफ से यह साफ हुआ है कि उसका अगला निशाना अब बापूनगर कालोनी है, जहां तकरीबन 2700 घरों में 15000 से भी ज्यादा लोग रहते हैं। प्रशासन ने यह भी साफ किया है कि- फिलहाल स्लम डेमोलेशन का जो लक्ष्य उसके सामने है, उसे 15 दिनों के भीतर पूरा कर लिया जाएगा।


कैसे बनेगा सूरत जीरो स्लम :

  • सूरत को जीरो स्लम बनाने के लिए 1 लाख से ज्यादा झोपड़ियों को तोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। मगर सरकारी योजना में पुनर्वास के लिए केवल 42 हजार घर बनाये जाने हैं। ऐसे में 56 हजार से ज्यादा घरों का क्या होगा ?

  • एक तरफ झोपड़ियों को साफ करने का काम जोरो पर है, दूसरी तरफ उन्हें बसाने की बात तो बहुत दूर, अभी तक तो यही साफ नहीं हो पाया है कि बसेगा कौन, कैसे और कब तक ?

  • झोपड़पट्टियों को उजाड़ने के बाद उन्हें कोसाठ जैसी जगहों पर बसाने का अश्वासन दिया जा रहा है, यह जगह विस्थापितों की जगहों से 15 किलोमीटर तक दूर है। फिर यह बाढ़ प्रभावित इलाका भी है। इसलिए एक बात तो यह है कि शहर के बाहर उन्हें काम नहीं मिलेगा और अगर वह काम की तलाश में शहर आए-गए भी तो 150 रूपए प्रति दिन की दिहाड़ी मजदूरी में से कम-से-कम 40 रूपए प्रति दिन (क्योंकि यहां से बस नहीं मिलती, सिर्फ ऑटो मिलते हैं) का तो किराया ही जाएगा। ऐसे में अगर किसी दिन मजदूरी नहीं मिली तो उस दिन का किराया तो फालतू में ही जाएगा। दूसरी बात यह भी कि जब यहां का इलाका बाढ़ के चलते पानी से भर जाएगा तो यहां की स्थिति पहले से कहीं ज्यादा भंयकर हो जाएगी।

  • किसी भी प्रशासन को झोपड़ियां तोड़ने के पहले संयुक्त राष्ट्र की गाइडलाईन माननी होती है। मगर बहुत सारे तजुर्बों से यह जाहिर हुआ है कि सूरत महानगर पालिका ने संयुक्त राष्ट्र की गाइडलाईन खुला उल्लंघन हो रहा है।

  • सूरत महानगर पालिका पर आरोप हैं कि उसने झोपड़पट्टियों में गलत सर्वेक्षण किये हैं। इसके अलावा वह कागजातों को लेकर भी कई गंभीर अनियमिताओं से घिरी हुई हैं।
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7.5.10

आधी लड़कियों के लिए राइट विदाउट एजुकेशन

शिरीष खरे

भारत में 6 से 14 साल तक के बच्चों के लिए ‘राईट टू एजुकेशन’ है, मगर 6 से 14 साल की कुल लड़कियों में से 50 प्रतिशत लड़कियां तो स्कूल से ड्राप-आऊट हो जाती हैं।

यह आकड़ा मौटे तौर पर दो सवाल पैदा करता है, अव्वल तो यह कि इस आयुवर्ग की आधी लड़कियां स्कूल से ड्राप-आऊट क्यों हो जाती हैं, दूसरा यह कि इस आयुवर्ग की आधी लड़कियां अगर स्कूल से ड्राप-आऊट हो जाती हैं तो एक बड़े परिदृश्य में ‘राईट टू एजुकेशन’ का क्या अर्थ रह जाता है ?

जेती, उम्र 10 साल, सुबह 5 के पहले उठ जाती है, वह इतनी जल्दी उठकर घर की साफ-सफाई और अपने माता-पिता के लिए दोपहर का खाना बनाती है। गिर अभयारण्य की जामबरदा पहाड़ी पर छपिया नाम की एक बस्ती है, जेती यही रहती है। यहां से पोरबंदर कम-से-कम 15 किलोमीटर दूर है, उसके माता-पिता को काम की तलाश में सुबह साढ़े 6 बजे के पहले पोरबंदर निकलना पड़ता है।

इसके बाद जेती अपने 4 से 7 साल के दो छोटे भाईयों को खाना खिलाती है, उन्हें तैयार कराती है, फिर पड़ोसियों के भरोसे छोड़कर स्कूल जाती है, मगर जैसे ही वह स्कूल की कक्षा में बैठती है, नींद से उठने के बाद पहली बार कुछ आराम पाती है, और उसकी आंखों में नींद भर जाती है। इस तरह, जेती के हिस्से से दिन के बहुत सारे पाठ छूट जाते हैं। जेती कहती है- ‘‘स्कूल अच्छा तो लगता है, पर पता नहीं कितना पढ़ पाऊंगी। हर कोई यही कहता है कि है कि घर पर रहो और बच्चे देखो।’’

मौजूदा शिक्षा के हक का कानून, देश के 192 मिलियन बच्चों के लिए मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा का हक तो देता है, मगर उनमें से जेती जैसी करोड़ों लड़कियां छूट रही हैं। माना कि यह लड़कियां अपने घर से लेकर छोटे बच्चों को संभालने तक के बहुत सारे कामों से भी काफी कुछ सीखती हैं। मगर यदि यह लड़कियां केवल इन्हीं कामों में रातदिन उलझीं हुई हैं, भारी शारारिक और मानसिक दबावों के बीच जी रही हैं, पढ़ाई के लिए थोड़ा-सा भी समय नहीं निकाल पा रही हैं, और एक स्टेज के बाद स्कूल से ड्राप-आऊट हो जाति हैं तो यह उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ ही हुआ।

1996 को ‘इंटरनेशलन लेबर आर्गेनाइजेशन’ की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि दुनियाभर में 33 मिलियन लड़कियां काम पर जाती हैं, जबकि काम पर जाने वाले लड़कों की संख्या 41 मिलियन हैं। मगर इन आकड़ों में पूरे समय घरेलू कामकाजों में जुटी रहने वाली लड़कियों की संख्या नहीं जोड़ी गयी थी। इसके बाद, ‘नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रनस् राईटस्’ यानी एनसीपीसीआर की एक रिपोर्ट ने बताया था कि भारत में 6 से 14 साल तक की ज्यादातर लड़कियों को हर रोज औसतन 8 घंटे से भी ज्यादा समय केवल अपने घर के छोटे बच्चों को संभालने में बीताना पड़ता है। इसी तरह, सरकारी आकड़ों में दर्शाया गया है कि 6 से 10 साल की जहां 25 प्रतिशत लड़कियों को स्कूल से ड्राप-आऊट होना पड़ता है, वहीं 10 से 13 साल की 50 प्रतिशत (ठीक दोगुनी) से भी ज्यादा लड़कियों को स्कूल से ड्राप-आऊट हो जाना पड़ता है। 2008 को, एक सरकारी सर्वेक्षण में 42 प्रतिशत लड़कियों ने यह बताया कि वह स्कूल इसलिए छोड़ देती हैं, क्योंकि उनके माता-पिता उन्हें घर संभालने और अपने छोटे भाई-बहनों की देखभाल करने को कहते हैं।

दूसरी तरफ, कानून में मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा कह देने भर से कुछ नहीं होगा, बल्कि यह भी देखना होगा कि मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा के मुताबिक खासतौर से लड़कियों के लिए देश में शिक्षा की बुनियादी संरचना है भी या नहीं। आज कई करोड़ भारतीय बच्चों की प्राथमिक शिक्षा के सामने पर्याप्त स्कूल, कमरे, प्रशिक्षित शिक्षक और गुणवत्तायुक्त सुविधाएं नहीं हैं। देश की 40 प्रतिशत बस्तियों में तो स्कूल ही नहीं हैं और इसी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि 46 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं हैं। अगर राइट टू एजुकेशन के प्रावधानों का ख्याल रखते हुए, बरदा पहाड़ियों में शिक्षा की बुनियादी संरचना की जमीनी पड़ताल की जाए तो यहां की 61 बस्तियों के बीच केवल 14 प्राइमरी स्कूल हैं, जिनमें से 7 भवन विहीन हैं, खुली हवाओं में चल रहे स्कूलों तक पहुंचने के लिए भी लड़कियों को ऊबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरना पड़ता है और 2 से 3 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है। मुख्य तौर से इन दो वजहों (पारिवारिक बाल-श्रम और प्राथमिक शिक्षा के बुनियादी व्यवस्था का अभाव) के चलते, हमारे देश की आधी लड़कियों के पास राईट तो है, मगर विथआऊट एजुकेशन। उनकी एजुकेशन से जुड़ी बाधाओं को तोड़े बगैर राईट टू एजुकेशन का मकसद पूरा नहीं हो सकता है।

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4.5.10

एक मीनार जो कानून से ऊंची है

शिरीष खरे

मुंबई के सबसे मंहगे इलाकों में से एक है बालकेश्वर, जहां 32 मंजिलों वाली यानी इलाके की सबसे ऊंची मीनार बन रही है, मगर उससे कहीं ऊंची खबर अपने पास यह है कि यह मीनार महाराष्ट्र के कायदे-कानूनों से अब बहुत ऊपर उठ चुकी है, और उसे उठाने वाला भी कोई मामूली आदमी नहीं है, बल्कि मशहूर डायमंड मर्चेण्ट और फिल्म फायनेंसर भरत शाह है।

मुंबई के तटीय क्षेत्र में जब भी कोई बिल्डिंग बनाई जाती है तो उसके पहले बिल्डर को ‘कोस्टल रेग्यूलेटरी जोन नोटिफिकेशन’ के तहत एमसीजेडएमए यानी ‘महाराष्ट्र कोस्टल जोन मेनेजमेंट अथोरिटी’ से मंजूरी लेनी पड़ती है। मगर भरत शाह है कि एमसीजेडएमए की मंजूरी लिए बगैर समुद्र के किनारे से अपनी बिल्डिंग को आसमान की ऊंचाई तक पहुंचा देना चाहते हैं।


उधर ‘कोस्टल इन्वायरमेंट अथोरिटी’ ने साफ कह दिया है कि बाल्केश्वर की इस 32 मंजिलों वाली निर्माणाधीन बिल्डिंग के बिल्डरों ने एमसीजेडएमए से कोई मंजूरी नहीं ली है और इस तरह से उन्होंने ‘कोस्टल रेग्यूलेटरी जोन नोटिफिकेशन’ का साफ-साफ उल्लंघन किया है।

एक जनहित याचिका के जवाब में एमसीजेडएमए द्वारा जो एफिडेबिट फाइल की गई है उसमें बताया गया है कि भरत शाह की कंपनी ‘लेयर्स एक्सपोर्ट कारर्पोरेशन’ ने ’लेजेण्ड’ नाम से इस बिल्डंग को बनाने के पहले अथोरिटी के सामने कोई प्लान सब्मिट नहीं किया।

31 जुलाई, 2009 को, ‘इन्वायरमेंट सेक्रेटरी’ वाल्सा आर नायर सिंह ने भरत शाह की कंपनी और उनकी बिल्डिंग के प्रोजेक्ट अर्किटेक्ट को पत्र भेज था और उन्हें एफिडेबिट के बारे में जरूरी जानकारी दी थी। उस पत्र के जरिए तब दोनों से कहा गया था कि उन्हें अभी तक की सारी कानूनी अनुमतियों (अगर एमसीजेडएमए की अनुमति भी ली गई है तो उससे भी) से जुड़े कागजातों को 15 दिनों के भीतर उपलब्ध कराना है। अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो ‘इन्वायरमेंट प्रोटेक्शन एक्ट, 1986’ के प्रावधानों के तहत भरत शाह की कंपनी और उनकी बिल्डिंग के प्रोजेक्ट अर्किटेक्ट के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। मगर आरोप है कि अबतक न तो भरत शाह की कंपनी और न ही उनकी बिल्डिंग के प्रोजेक्ट अर्किटेक्ट ने ‘इन्वायरमेंट सेक्रेटरी’ के पत्र का कोई जवाब भेजा है।

इस संबंध में जब भरत शाह से संपर्क साधा गया था तो पहले उन्होंने कहा कि ‘इन दिनों जनहित याचिका फाइल करना एक फैशन हो गया है’; मगर जब उनसे ‘कोस्टल रेग्यूलेटरी जोन’ में मंजूरी वाली बात पूछी गई तो बोले कि वह अपनी टीम से पेपर मंगवाकर ही कुछ बता पाएंगे। जबकि उनकी कंपनी के अधिकारियों का कहना था कि बीते साल की जुलाई से अबतक, उन्हें कानूनी अनुमतियों को उपलब्ध करवाने से जुड़ा अथोरिटी का कोई पत्र नहीं मिला है।

हाईकोर्ट में यह जनहित याचिका दायर करने वाले सिम्प्रीत सिंह ने बताया है कि ‘‘इसी एक बिल्डिंग में 24 तरह की कानूनी अनियमिताएं हैं।’’ उनके प्रतिनिधि एडवोकेट योगेश प्रताप सिंह कहते हैं कि ‘‘बिल्डिंग से जुड़ी हर तरह की अनुमति, जिसमें कोस्टल रेग्यूलेटरी जोन की अनुमति भी शामिल है, को लेना बिल्डर की जिम्मेदारी होती है, जो उसने नहीं निभायी है।’’

दूसरी तरफ, इस कहानी से बेखबर ऐसे कई लोग हैं, जिन्होंने समुद्र के आगे ’लेजेण्ड’ में अपार्टमेंट खरीदने के लिए एडवांस बुकिंग करायी है। अनुमान के मुताबिक एक अपार्टमेंट करोड़ों रूपए का है, यह अनुमान इस इलाके में अपार्टमेंट की वर्तमान कीमत के आधार पर लगाया गया है, जो फिलहाल 60,000 रूपए प्रति वर्ग फीट के हिसाब से बिक रहा है।

भरत शाह की कंपनी का यह प्लाट 4300 वर्ग मीटर में फैला है और राजभवन के एकदम बाजू में है। कभी यहां के टूटे-फूटे घरों में निम्न और मध्यम वर्गीय परिवार रहा करते थे। 1995 के आसपास, भरत शाह ने यहां के लिए एक ‘पुर्नविकास परियोजना’ का एलान किया था। 1997 में, उनके बिल्डर ने ‘मुंबई बिल्डिंग्स रिपेयर एण्ड रिकन्स्ट्रशन बोर्ड’ से एनओसी यानी ‘नो ओब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ पाया था। 1999 में, यहां आवास के लिए केवल 16 मंजिलों को बनाए जाने, पार्किंग और रिटेल मार्केट की जगह दिये जाने को ही मंजूरी दी गई थी। मगर आज देखिए- 32 मंजिलों का निर्माण किया जा रहा है।

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22.4.10

विश्व बैंक को इधर से देखिए

शिरीष खरे

विश्व बैंक की शर्तो के तहत गरीबी हटाने के नाम पर किए गए ढांचागत समायोजन कार्यक्रमों के परिणाम अब सर्वत्र दिखाई देने लगे हैं। भारत विश्व बैंक के 4 सर्वाधिक बड़े कर्जदारों में शामिल है। नव-उपनिवेशवादी नीतियों के कारण देश की 65 प्रतिशत आबादी का भरण-पोषण करने वाला कृषि क्षेत्र आज दयनीय हालत में है। हरित क्रांति की आत्ममुग्धता के बावजूद खाद्यान्न आत्मनिर्भरता लगातार कम हो रही है। विदेशी मुद्रा भण्डार का बड़ी मात्रा में उपयोग अनाज, दलहन और खाद्य तेलों के आयात में हो रहा है। निजी कंपनियों को खुली छूट देने से किसानों के लिए कृषि क्षेत्र घाटे का सौदा बनता जा रहा है। फुटकर बाजार में निजी क्षेत्र के प्रवेश ने छोटे-मोटे धंधों से रोजी कमाने वालों को बेकार कर दिया है। रियल एस्टेट में पैदा की गई बूम से आम आदमी के सिर पर छत भी सपना बन कर रह गई है। कुल मिलाकर, बड़े पैमाने पर लोगों को जमीन और रोजगार से बेदखल किया जा रहा है। एक लाख से अधिक अरबपतियों वाले देश में 30 करोड़ लोग दिन में 20 रूपये भी नहीं कमा पाते हैं।

वैसे तो विश्व बैंक का घोषित लक्ष्य दूसरे विश्व युद्ध से जर्जर देशों में ढांचागत सुविधाएं उपलब्ध करवाकर वहां का जीवन स्तर सुधारना था, लेकिन अब यह अपने बड़े निवेशक देशों जैसे अमेरिका, इंग्लैंड, जापान, जर्मनी और फ्रांस की निजी कंपनियों का हितसाधक बन गया है। ढांचागत समायोजन कार्यक्रम ने विश्व बैंक का काम बढ़ा दिया है। इसलिए उसने तीसरी दुनिया के देशों को अपने बाहुपाश में जकड़ने के लिए अंतर्राष्ट्रीय विकास संगठन, अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगमक, बहुपक्षीय निवेश गारंटी एजेंसी जैसी संस्थाएं गठित कर ली है। केवल इतना ही नहीं, उसने `अंतर्राष्ट्रीय निवेश विवाद निराकरण' नाम से अपना अलग न्यायालय भी बना लिया है, जहां देशों और कंपनियों के मध्य गुप्त् रूप से विवाद सुलझाए जाते हैं। जानकारी के मुताबिक, इन दिनों विश्व बैंक लगभग 90 देशों की अर्थव्यवस्थाओं को वहां के राजनीतिक और व्यावसायिक संपन्न वर्ग के सहयोग से काबू में करने में जुटा हुआ है।

अनुभव बताते हैं कि एक बार कोई गरीब देश विश्व बैंक समूह के जाल में फंस जाता है तो उसकी हालत बद से बदतर होती जाती है। मेक्सिको, अर्जेटाईना जैसे लातिनी अमेरिकी देश इसके उदाहरण है, जो अब इससे छुटकारा पाने के लिए कोशिशें कर रहे हैं । विश्व बैंक देश की नीति निर्धारण प्रक्रिया में अंदर तक घुस चुका है। भारत और विश्व बैंक के अधिकारियों की आपस में अदलाबदली आम है। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के अनुसार, विश्व बैंक में नौकरी कर चुके लोगों को देश में अत्यंत संवेदनशील और उच्च् पदों पर बैठाया जाता रहा है। पिछले वर्ष तो योजना आयोग में भी विदेशी फर्मो को अधिकृत रूप से सलाहकार बना दिया गया था। कहने के लिए तो विश्व बैंक खुलेपन का हिमायती है लेकिन व्यवहार में उसका चेहरा ऐसा नहीं है। सारे देश में लागू `सूचना का अधिकार कानून' भी विश्व बैंक की मजबूत चारदिवारी के सामने बेदम है। सामाजिक सरोकारों से उसका कोई इत्तेफाक नहीं रहा है। अपनी नीतियों के नकारात्मक परिणामों पर वह जनमत की उपेक्षा करता है। सन् 2002 में प्रकाशित `विश्व बांध आयोग' की रिपोर्ट को खारिज करते हुए उसने बड़े बांधो के लिए कर्ज देना जारी रखा है। भारत में निर्माणाधीन और प्रस्तावित कुछ बांधों में तो विश्व बैंक का वित्तपोषण है। लेकिन उसने आगे भी समर्थन का संकेत दिया है।

विश्व बैंक जिस तरह से देश की नीतियों को प्रभावित कर रहा है उससे आम आदमी का जीवन कष्टमय होता जा रहा है। विश्व बैंक की नीतियों से पीड़ित समाज के विभिन्न वर्गो ने विश्व बैंक को उसकी जनविरोधी नीतियों के प्रति खबरदार किया है। सितंबर 2007 को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर में विश्व बैंक के कामकाज को लेकर स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण (आईपीटी) की सुनवाई हुई थी। इसमें देश के विभिन्न स्थानों से आये प्रभावित समुदायों, लोक संगठनों के प्रतिनिधियों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों आदि ने हिस्सा लिया। इस दौरान विश्व बैंक की कार्यशैली पर प्रकाश डालते हुए 100 से अधिक वक्ताओं ने इसका इतिहास, मान्यता, एजेन्डा, भूमिका, अर्थव्यवस्था और राष्ट्र की संप्रभुता में हस्तक्षेप आदि के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, ऊर्जा, कृषि, वन, खनन, पर्यावरण, आवास, खाद्य-सुरक्षा, गरीबी और मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर अपने विश्लेषण प्रस्तुत किए। इस स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण का आयोजन विश्व बैंक समूह द्वारा वित्तपोषित परियोजनाओं पर निगरानी रखने के लिए किया गया था। इसे विश्व बैंक की नीतियों के प्रति बढ़ने प्रतिरोध के रूप में देखा जाना चाहिए। विश्व बैंक द्वारा न्यायाधिकरण के निष्कर्मो पर जवाब देना यह सिद्ध करता है कि जनआक्रोश की अवहेलना अब उसके लिए आसान नहीं है। उम्मीद करते हैं कि अब देश के प्रभावित समुदाय और बुद्धिजीवी विश्व बैंक की नीतियों पर लगाम लगाने की दिशा में लगातार प्रयासरत रहेंगे।

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19.4.10

अपने से यूं भी खड़े हो सकते हैं विकलांग साथी

शिरीष खरे

भूख से मौत और रोजीरोटी के लिए पलायन। ऐसा तब होता है जब लोगों के पास कोई काम नहीं होता। यकीनन गरीबी का यह सबसे भयानक रुप है। इससे निपटने के लिए भारत सरकार के पास ‘‘हर हाथ को काम और काम का पूरा दाम’’ देने वाली ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना’ है। यह योजना लोगों को उनके गांवों में ही काम देने की गांरटी भी देती है। योजना में श्रम पर आधारित कई तरह के कामों का ब्यौरा दिया गया है। इन्हीं में से बहुत सारे कामों से विकलांग साथियों को जोड़ा जा सकता है और उन्हें विकास के रास्ते पर साथ लाया जा सकता है। कैसे, नरेगा का यह तजुर्बा सामने है :

एक आदमी गरीब है, आदिवासी समुदाय से है, और विकलांग है तो उसका हाल आप समझ सकते हैं। उसे उसके हाल से उभारने के लिए आजीविका का कोई मुनासिब जरिया होना जरूरी है। इसलिए दिल्ली में जब गरीबी दूर करने के लिए नरेगा (अब मनरेगा) की बात उठी थी तो मध्यप्रदेश के आदिवासी जिले बड़वानी के ‘आशा ग्राम ट्रस्ट’ ने विकलांग साथियों का ध्यान रखा था और उन्हे रोजगार की गांरटी योजना से जोड़ने की पहल की थी। जहां तय हुआ था कि नरेगा में विकलांग साथियों को उनकी क्षमता और कार्यकुशलता के हिसाब से किस तरह के कामों में और किस तरीके से शामिल जा सकता है।

इसके लिए ब्लाक-स्तर पर एक चरणबद्ध योजना बनायी गई थी। योजना में विकलांग साथियों को न केवल भागीदार बनाया गया था बल्कि उन्हें निर्णायक मंडल में भी रखा गया। उन्होंने एक कार्यशाला के जरिए सबसे पहले वो सूची तैयार की जो बताती थी कि विकलांग साथी कौन-कौन से कामों को कर सकते हैं और कैसे-कैसे। इस सूची में कुल 25 प्रकार के कामों और उनके तरीकों को सुझाया गया था। बाद में सभी 25 प्रकार के कामों को वगीकृत किया गया और सूची को 'वगीकृत कार्यों वाली सूची' कहा गया। अब इस सूची की कई फोटोकापियों को ग्राम-स्तर पर संगठित विकलांग साथी समूहों तक पहुंचाया गया। इसके बाद विकलांग साथियों के लिए ‘जाब-कार्ड बनाओ आवेदन करो’ अभियान छेड़ा गया। दूसरी तरफ, इस अभियान में जन-प्रतिनिधियों की सहभागिता बढ़ाने के लिए ‘गांव-गांव की बैठक’ का सिलसिला भी चलाया गया। इसी दौरान विकलांग साथियों ने अपने जैसे कई और साथियों की पहचान करने के लिए एक सर्वे कार्यक्रम भी चलाया था। इससे जहां बड़ी तादाद में विकलांग साथियों की संख्या ज्ञात हो सकी, वहीं उन्हें जाब-कार्ड बनाने और आवेदन भरने के लिए प्रोत्साहित भी किया जा सका। नतीजन, अकेले बड़वानी ब्लाक के 30 गांवों में 100 से ज्यादा विकलांग साथियों को नरेगा से जोड़ा जा सका। तब यहां के विकलांग कार्यकर्ताओं ने कार्य-स्थलों पर घूम घूमके नरेगा की गतिविधियों का मूल्यांकन भी किया था। आज इन्हीं कार्यकर्ताओं द्वारा जिलेभर के हजारों विकलांग साथियों को नरेगा से जोड़ने का काम प्रगति पर है।

रोजगार के लिए विकलांग कार्यकर्ताओं के सामने बाधाएं तो आज भी आती हैं। मगर ऐसी तमाम बाधाओं से पार पाने के लिए इनके पास जो रणनीति है, उसके खास बिन्दु इस तरह से हैं: (1) रोजगार गारंटी योजना के जरिए ज्यादा से ज्यादा विकलांग साथियों को काम दिलाना। (2) पंचायत स्तर पर सरपंच और सचिवों को संवेदनशील बनाना। (3) जन जागरण कार्यक्रमों को बढावा देना। (4) निगरानी तंत्र को त्रि-स्तरीय याने जिला, ब्लाक और पंचायत स्तर पर मजबूत बनाना। (5) लोक-शिकायत की प्रक्रिया को पारदर्शी और त्वरित कार्यवाही के लिए प्रोत्साहित करना। यह तर्जुबा बताता है कि जब एक छोटे से इलाके के विकलांग साथी नरेगा के रास्ते अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं, तो प्रदेश या देश भर के विकलांग साथी भी यही क्रम दोहरा सकते हैं।

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14.4.10

सुभागलाल का सपना सच हो गया

शिरीष खरे


वैसे तो देश के असंख्य सुभागलालों का सपना सच नहीं होता है। मगर घोरवाल के सुभागलाल का सपना सच हो गया। उसके गांव के सारे बच्चे अब स्कूल जाते हैं। जब वह छोटा था तब ऐसा कतई नहीं था।

ग्राम घोरवाल, उत्तरप्रदेश के सोनभद्र जिले में हैं, जहां बेहतरीन कलीनों को बनाने का काम चलता है। यहां के सुभागलाल जब बच्चे थे तो अपने जैसे बहुत सारे आदिवासी बच्चों की तरह बुनाई के फंदो में उलझे थे। उन दिनों सुभागलाल अपने बचपन को बहुत सस्ते दामों में बेचते थे। गरीबी के चलते, उनके जैसे बहुत सारे बच्चे मानो अपने पिताओं का कर्ज चुकाने के लिए पैदा हुए हो। कारखानों में स्थाई भाव से काम करते रहना मानो उनकी नियति में हो। बकौल सुभागलाल तब से अब में अंतर है, अब इसी घोरवाल में पहली से पांचवीं तक के 98 बच्चे हैं, सारे के सारे स्कूल जाते हैं। यही बच्चे आसपास के 12 गांवों के प्राथमिक स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था को भी तंदुरूस्त बनाए रखना चाहते हैं।

सुभागलाल ग्रेजुएट हैं और घोरवाल गांव के प्रधान भी चुने गए हैं। इलाके में पहली बार ऐसा हुआ है कि जो कभी बंधुआ मजदूर था, वो आज ग्रामप्रधान है। यकीकन बंधुआ मजदूर से (वाया ग्रेजुएशन) ग्रामप्रधान बनने तक की उनकी यह कहानी अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। मगर उससे भी महत्वपूर्ण उनका वह सपना है, जो सच में बदल गया है।

सुभागलाल ने आज अपने आसपास के 12 गांवों के बच्चों को इकट्ठा करके इतना ताकतवर बना दिया है कि यहां के बच्चे जब-तब अपने हकों के लिए इकट्ठा होते हैं, आपस में बतियाते हैं और कई सवाल खड़े किया करते हैं। यह स्लेट, कापी, पेन, पट्टी, ब्लेकबोर्ड, साईकिल, होमवर्क से लेकर मास्टर साहब की छोटी-बड़ी बातों का पूरा ख्याल रखते हैं। यह हिन्दी और अंग्रेजी भी पढ़ते हैं और अपने-अपने, अलग-अलग सपनों का पीछा भी किया करते हैं।

जैसे कि यहां की उर्मिला कुमारी जब आठवीं की ओपेन स्कूल परीक्षा में बैठी तो उसकी बड़ी उम्र उसके सामने बड़ी बाधा थी। उसके लिए पास होना एक चमत्कार जैसा था। मगर उर्मिला ने यह चमत्कार कर दिखाया है। ग्यारह साल पहले, उर्मिला भी और लड़कियों के तरह कालीन कारखाने को जाती थी। तब उसकी बंधी बंधाई जिंदगी के आगे भी अगर आशा की जरा सी भी लौ बची थी तो वह उसकी पढ़ाई में ही थी। आज यह अपनी भलाई के बहुत सारे अध्याय खुलके पढ़ती है। एक गरीब घर की बेटी अपने खुले-खुले से दिनों के पीछे अपनी, माता-पिता और बाल कल्याण समिति की मेहनत को खास बताती है। असल में यह खासियत सालों की लगन, धीरज, दिलचस्पी और जूनून का मिलाजुला असर है।

बाल कल्याण समिति, क्राई के सहयोग से स्थानीय स्तर पर संचालित एक गैर-सरकारी संस्था है। यह संस्था कालीन कारखानों में काम करने वाले बच्चों की पहचान करती है, उनकी मजदूरी के पीछे छिपी मजबूरी को समझती है, फिर उनकी मजदूरी को दूर करने के हरसंभव उपाय ढ़ूढ़ती है। इस तरह से यह संस्था कालीन कारखानों के बाल-मजदूरों को शिक्षा के रास्ते पर ले जाने का काम करती है। जब यह संस्था नहीं थी तब यहां स्कूल का भवन तो था, नहीं था तो बच्चों में स्कूल जाने का जज्बा।

यह बच्चे भी अपने माता-पिताओं की तरह बंधुआ मजदूर जो थे। बंधुआ इसलिए क्योंकि खेती के लिए उनके पास खुद के खेत नहीं थे और न रोजगार के कोई स्थायी साधन ही। तभी तो उनके घर की गृहस्थी चलाने के लिए उनके बच्चे कारखानों की ओर जाया करते थे।

ऐसे में उन्हें स्कूल की ओर मोड़ना चुनौतियों से भरा काम था। इसलिए सबसे पहले तो यहां सुभागलाल जैसे कामकाजी बच्चों के लिए अनौपरिक शिक्षण केन्द्र खोले गए। इसकी कक्षाओं को कामकाजी बच्चों के समय और सहूलियतों के मुताबिक लगाया जाता। इससे यहां के बच्चों को पहली बार पढ़ाई-लिखाई से जुड़ने का मौका मिला। पहले-पहल बच्चे ऊंघते रहते। मगर धीरे-धीरे जब उनका रूझान पढ़ाई की तरफ बढ़ा तो इधर-उधर भागने की बजाय कई-कई घण्टे पढ़ते-पढ़ाते, हँसते और खेलते।

इसी के सामानांतर, कामकाजी बच्चों के माता-पिताओं की आमदनी में बढ़ोतरी के लिए कई स्तरों पर प्रयास शुरू किये गए। पहला तो यह कि, इसके लिए गांव के आसपास की सार्वजनिक जमीनों पर स्थानीय लोगों के कब्जों को पहचाना गया और फिर इन कब्जों को हटाने की मुहिम चालू हुई। जहां-जहां से कब्जे हटाये गए, वहां-वहां की जमीनों पर सामूहिक खेती को बढ़ावा दिया गया। हालांकि इन बंजर जमीनों से अनाज उगाना कोई आसान काम नहीं था। मगर सबके अपने-अपने समय, धन, ज्ञान और मेहनत के बराबर लगने से जो बड़ी कठिनाई थी वो भी कई हिस्सों में टूटकर हल हो गई। इसके बाद खेतों में जो पैदावार लहलहाई उसे भी सामूहिक तौर से बाजारों में लाया गया और बेचा गया। आखिरी में जो नफा हुआ वो बराबर हिस्सों में बट गया। इस तरह आजीविका का स्थाई हल मिलने से उनकी आमदनी में पहले से सुधार आया। दूसरा यह कि, यहां के ऐसे परिवारों को नरेगा जैसे योजनाओं का फायदा पहुंचाने के लिए जागरूकता अभियान चलाया गया। तीसरा यह कि, उनकी रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतों का ख्याल रखते हुए उन्हें ग्राम-सभा और पंचायत की गतिविधियों में हिस्सेदार बनाया गया। चौथा यह कि, उनके बीच पहले तो महिलाओं के स्वयं-सहायता समूह बनाए गए और उसके बाद लघु ऋण समितियां गठित हुईं। इन सबसे यहां की आर्थिक-सामाजिक स्थितियां जैसे-जैसे पलटने लगीं, वैसे-वैसे उनके बच्चों के कंधों से काम के बोझ भी हटने लगे। इसीलिए तो जिस पुरानी पीढ़ी ने पढ़ने-लिखने की कभी नहीं सोची थी, वो आज की पीढ़ी को पढ़ाने-लिखाने के बारे में सोचती है। आलम यह है कि बच्चे तो बच्चे बड़े-बुर्जग भी वर्णमाला के आकार, प्रकार और मायने बाखूबी जान रहे हैं। बड़े गर्व की बात है कि यह अपने बच्चों की अच्छी शिक्षा से ही अपनी बेहाली को काट देना चाहते हैं। जहां यह कहते हैं कि काफी कुछ बदला है, वहीं सुभागलाल कहते हैं ‘‘अभी काफी कुछ बदलना बाकी है। शिक्षा का स्तर अपने लड़कपन में है, जिसे अपने समय पर जवान भी तो होना है।’’


चलते-चलते

इसी तरह से क्राई देश के 6,700 गांवों और मलिन बस्तियों के साथ मिलकर काम कर रहा है। क्राई मानता है कि हर समुदाय के बच्चों को जो अधिकार देने जरूरी हैं, उनमें खास हैं - जीने के अधिकार, विकास के अधिकार, विभिन्न शोषणों के खिलाफ सुरक्षा के अधिकार और उनके भविष्य को प्रभावित करने वाली गतिविधियों में भागीदारी होने और फैसले लेने के अधिकार।


क्राई का असर (2008-09)


  • 1,376 सरकारी प्राथमिक स्कूलों को दोबारा चालू किया जा सका है।

  • 38,169 वंचित समुदाय के बच्चों को सरकारी प्राथमिक स्कूलों में दाखिल किया जा सका है।

  • 558 सरकारी प्राथमिक स्कूलों में छात्र उपस्थिति को शत-प्रतिशत तक बनाया जा सका है।

  • 80 पंचायतों की ग्राम शिक्षण समितियों को सक्रिय बनाया जा सका है।

  • 762 पंचायतों की ग्राम स्वास्थ्य समितियों को सक्रिय बनाया जा सका है।

  • 481 गांवों में एक भी बाल मजदूर नहीं है।

  • 1,641 बाल समूह बनाये गए हैं।

  • 76,1167 भारतीय बच्चे विभिन्न गतिविधियों के भागीदार बने हैं।

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12.4.10

समुदाय से दूर होता सामुदायिक रेडियो

शिरीष खरे


1991 के बाद जैसे ही उदारीकरण के नाम पर बाजार खुला वैसे ही मीडिया भी एक बड़े बाजार में बदला। पिछले एक दशक से अब तक के बदलते परिदृश्यों पर गौर किया जाए तो इसमें एक ‘विरोधाभाषी पहलू’ नजर आता है। एक तरफ मीडिया का बाजार बढ़ने की बातें चलती हैं और दूसरी तरफ गाँव में प्रिंट या इलेक्ट्रानिक मीडिया की पहुँच सीमित बनी हुई है। प्रिंट मीडिया के नजरिए से इसका खास कारण अशिक्षा है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिहाज से बिजली और संचार की खराब व्यवस्था। फिर ऐसे इलाकों में कुशल संवाददाता और पत्रकारों की तादाद भी कम ही रहती है। शहर में केरियर की नई संभावनाएं होने से योग्य मीडियाकर्मी गाँव में काम नही करना चाहते हैं। ग्रामीण पत्रकारिता में विशेषज्ञों की कमी बरकरार है। इन सुदूर इलाकों से मिलने वाली ज्यादातर सूचनाएं स्ट्रिंगरों द्वारा भेजी जाती हैं। यह अलग-अलग समाचार माध्यमों के लिए अस्थायी और आंशिक तौर पर तैनात होते हैं। आमतौर पर उनसे बेहतरीन रिपोर्टिंग की उम्मीद नहीं की जाती है।

इसी तरह कई लम्बी लड़ाईयों के बाद सूचना का जो हक हासिल हुआ है, ज्यादातर ग्रामीण अज भी उसका उपयोग नहीं जान पाए हैं। बहुत कम जानकार अपने धैर्य और विवेक की परीक्षा देकर इस कानून का फायदा उठा पाते हैं। कुछेक खास और गुप्त सूचनाएँ मीडिया से ही मिलती हैं। इसलिए इन ग्रामीण इलाकों के लिए मीडिया से दूरी का अर्थ है- जनहित की सूचनाओं से बेदखली।

प्रिंट, इलेक्ट्रानिक और सूचना का हक जैसे माध्यम गाँव तक बेअसर हो रहे हैं। इन्हें असरदार बनाने के उपायों पर सोचा जा रहा है। साथ ही बाजार के सामानान्तर दूसरे माध्यमों को भी खड़ा किया जा रहा हैं। इनमें रेडियो की भूमिका सशक्त बतलाते हुए सामुदायिक रेडियो पर जोर दिया गया है। इसके कई कारण भी हैं जैसे-बिजली की समस्या से निजात मिलना और रेडियो का हल्का, गतिशील, सस्ता तथा सरल उपकरण होना। फिर रेडियो कई दशकों से भारतीय जनता के दिल से जुड़ा रहा है। इसमें दोतरफा संवादों की पंरपरा भी बढ़ गई है। रेडिया पर फोन कर या स्टेशन पर खत भेजकर गाँव के लोग अपनी बात विशेषज्ञ, अधिकारी, नेता, मंत्री आदि किसी से भी कहते-सुनते रहे हैं।

समुदाय के इन्हीं हितों को ध्यान में रखकर सामुदायिक रेडियो की अवधारणा और योजना बनायी गई। सरकार या प्रशासन की मुख्य समस्या गाँव-गाँव जुड़ने की है और इस दिशा में सामुदायिक रेडियो योगदान दे सकता है। इसके लिए उसके पास स्थानीय बोली, साधन, लोग और समर्थन भी है। ऐसा कहा जाता है कि सामुदायिक रेडियो का मकसद ग्रामीण जनता की आवश्यकता, प्राथमिकता, समस्या, सुझाव और समाधान से होना चाहिए। लेकिन आज उसे केवल मंनोरजंन तक सीमित बनाया जा रहा है। ताज्जुब कि बात है कि सामुदायिक रेडियो के नाम पर ऐसी कई गतिविधियाँ बगैर समुदायिक सहयोग से चल रही हैं। मीडिया के दूसरे रुपों की तरह इसमें भी विकृfतयाँ दिखाई देने लगी हैं। सामुदायिक रेडियो में समुदाय की भागीदारी को नजरअंदाज बनाना सबसे खतरनाक है।

मीडिया के नए बाजार में सेटेलाईट और दृश्य रेडियो के साथ-साथ अब सामुदायिक रेडियो भी शामिल हो चुका है। इन दिनों रेडियो बाजार पर बड़े-बड़े व्यापारियों की नजर लगी हुई है। इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश के लिए मीडिया घरानों आगे आ रहे हैं। ऐसे में सामुदायिक रेडियो के नाम पर एफएम को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

शुरूआती रूझानों से मालूम होता है कि एफएम रेडियो के ज्यादातर लाइसेंस प्राइवेट सेक्टर के चंद मीडिया घरानों को ही दिये गए हैं। बीते साल तक, सरकार ने एफएम चैनल चलाने के लिए अलग-अलग राज्यों के लगभग 100 शहरों में कंपनियों को 350 के आसपास लाइसेंस बांटे हैं। पिछले कुछेक सालों में ही (तथाकथित) सामुदायिक रेडियो की संभावनाएं बढ़ी हैं और उसी अनुपात में संख्या भी। जहाँ तक सामुदायिक रेडियो की बात है उसके लाइसेंस कुछेक बड़े संस्थानों की झोली में गए हैं और सामुदायिक रेडियो के संचालन में छोटे समूहों की प्रभावपूर्ण हिस्सेदारी नहीं बन पा रही है।

रेडिया के इस कारोबार में विशालकाय विदेशी कंपनियाँ अपना अधिकार स्थापित करने के लिए उतावली हैं। उदारीकरण की नीति के मुताबिक यह बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए सरकार पर दवाब बना सकती हैं। इसके लिए पहले स्तर का दवाब इस क्षेत्र से संबंधित नीति, योजना और कानूनों पर होगा। अगर यह दवाब असर करता है तो रेडियो का बाजार ज्यों-ज्यों बढ़ेगा, त्यों-त्यों विशाल कंपनियों की हिस्सेदारी भी बढ़ती जाएगी।

रेडियो का नया बाजार और उस पर पश्चिमी व्यावसायिकता की पहचान होने लगी है। आजकल भारतीय श्रोता अनेक विदेशी प्रसारण एंजेसियों से निकटता भी रख रहे हैं, जैसे-बीबीसी, वायस आफ अमेरिका, रेडियो जर्मन वगैरह। देश की जनता केवल आकाशवाणी तक सीमित नही रही। रेडियो में भी कार्यक्रमों की संख्या और प्रतिस्पर्धा बढ़ने से यहाँ ‘सबसे पहले’ या ‘सबसे तेज’ की दौड़ नजर आने लगी है। कई कंपनियाँ रेडियो आवार्ड कार्यक्रम को लोकप्रिय बनाने में लग गए हैं। आज भारत में विज्ञापन पर होने वाले कुल खर्च का 2% सिर्फ रेडियो में दिए जाने वाले विज्ञापन का हिस्सा है। कल रेडियो विज्ञापन का नया और सशक्त उपकरण बन जाएगा। मगर सामुदायिक रेडियो को शुरू करने की मूलभूत जरूरत और अवधारणा का हमेशा के लिए अंत हो जाएगा।

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11.4.10

भारत की भूख के अर्थ

शिरीष खरे

आज के भारत में सबसे तेजी से बढ़ता सेक्टर कौन सा है- आईटी, मोबाइल टेलेफोनी, आटोमोबाइल, इन्फ्रास्ट्रक्चर, आईपीएल। जहां तक मेरा ख्याल है तो भूख की रफ़्तार के आगे ये सारे सेक्टर बहुत पीछे हैं। आजादी के 62+ सालों के बाद, भारत के पास दुनिया की दूसरी सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का दावा है। मगर अमेरिका की कुल आबादी से कहीं अधिक भूख और कुपोषण से घिरे पीड़ितों का आकड़ा भी यहीं पर है। अब चमचमाती अर्थव्यवस्था पर लगा यह काला दाग भला छिपाया जाए भी तो कैसे ?

वैसे भी अपनी सरकार मंहगाई को कम नहीं करने की बात जब खुलेआम कह रही है तो उसके मंशूबों से ताल्लुक रखने वाली चुप्पियों के भेद भी खुल्लमखुल्ला हो ही जाए। ‘राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम’ के होहल्ला से पहले, सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश को याद कीजिए, जो गरीबी रेखा के नीचे के हर भारतीय परिवार को 2 रूपए किलो की रियायती दर से 35 किलो खाद्यान्न दिये जाने की बात कहता है। इसके बाद केन्द्र की यूपीए सरकार के ‘राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम’ का मसौदा देखिए, जो गरीबी रेखा के नीचे के हर भारतीय परिवार को रियायती दर से महज 25 किलो खाद्यान्न की गारंटी ही देता है। मामला साफ है, मौजूदा खाद्य सुरक्षा का मसौदा तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ही कतरने (गरीबों के लिए रियायती दर से 10 किलो खाद्यान्न में कमी) वाला है।

अहम सवाल यह भी है कि मौजूदा मसौदा अपने भीतर कितने लोगों को शामिल करेगा ? इसके जवाब में जो भी आकड़े हैं, वो आपस में मिलकर भ्रम फैला रहे हैं। अगर वर्ल्ड-बैंक की गरीबी का बेंचमार्क देखा जाए तो जो परिवार रोजाना 1 यूएस डालर (मौजूदा विनियम दर के हिसाब से 45 रूपए) से कम कमाता है, वो गरीब है। भारत में कितने गरीब हैं, इसका पता लगाने के लिए जहां पीएमओ इकोनोमिकल एडवाईजरी कौंसिल की रिपोर्ट ने गरीबों की संख्या 370 मिलियन के आसपास बतलाई है, वहीं घरेलू आमदनी के आधार पर, सभी राज्य सरकारों के दावों का राष्ट्रीय योग किया जाए तो गरीब रेखा के नीचे 420 मिलियन लोगों की संख्या दिखाई देती है। यानि गरीबों को लेकर केन्द्र और राज्य सरकारों के अपने-अपने और अलग-अलग आकड़े हैं। इसके बावजूद गरीबों की संख्या का सही आंकलन करने की बजाय केन्द्र सरकार का यह मसौदा, केवल केन्द्र सरकार द्वारा बतलाये गए गरीबों को ही शामिल करेगा।

यहां अगर आप वर्ल्ड-बैंक की गरीबी का बेंचमार्क रोजाना 1 यूएस डालर से 2 यूएस डालर (45 रूपए से 90 रूपए) बढ़ाकर देंखे तो देश में गरीबों का आकड़ा 80 मिलियन तक पहुंच जाता है। यह आकड़ा यहां की कुल आबादी का तकरीबन 80% हिस्सा है। अब थोड़ा देशी संदर्भ में सोचिए, महज 1 यूएस डालर का फर्क है, जिसके कम पड़ जाने भर से आबादी के इतना भारी हिस्सा वोट देने भर का अधिकार तो पाता रहेगा, नहीं पा सकेगा तो भोजन का अधिकार।

केन्द्र सरकार ने 2010-11 में, भूख से मुकाबला करने के लिए 1.18 लाख करोड़ रूपए खर्च करने का वादा किया है। अगर यूपीए सरकार गरीबी रेखा के नीचे के हर भारतीय परिवार को रियायती तौर से 35 किलो खाद्यान्न दिये जाने पर विचार करती है तो उसे अपने बिल में अतिरिक्त 82,100 करोड़ रूपए का जोड़ लगाना होगा।

जब कभी देश को युद्ध या प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ता है तो हमारे देश के हुक्मरानों का दिल अचानक पसीज जाता है। उस दौरान के बुरे हालातों से निपटने के लिए बहुत सारा धन और राहत सुविधाओं को मुहैया कराया जाता है। मगर भूख की विपदा तो देश के कई बड़े इलाकों को खाती जा रही है। वैसे भी युद्ध और प्राकृतिक आपदाएं तो थोड़े समय के लिए आती हैं और जाती हैं, मगर भूख तो हमेशा तबाही मचाने वाली परेशानी है। इसलिए यह ज्यादा खतरनाक है। मगर सरकार है कि इतने बड़े खतरे के खिलाफ पर्याप्त मदद मुहैया कराने में कोई दिलचस्पी नहीं ले रही है।

भूख का यह अर्थशास्त्र न केवल हमारे सामाजिक ढ़ाचे के सामने एक बड़ी चुनौती है, बल्कि मानवता के लिए भी एक गंभीर खतरा है। जो मानवता को नए सिरे से समझने और उसे फिर से परिभाषित करने की ओर ले जा रहा है। उदाहरण के लिए, आज अगर भूखे माता-पिता भोजन की जुगाड़ में अपने बच्चों को बेच रहे हैं तो यह बड़ी अप्राकृतिक स्थिति है, जिसमें मानव अपनी मानवीयता में ही कटौती करके जीने को मजबूर हुआ है। यह दर्शाती है कि बुनियादी तौर पर भूख किस तरह से मानवीयता से जुड़ी हुई है। इसलिए क्यों न भूख को मिटाने के लिए यहां बीपीएल (गरीबी रेखा से नीचे) की बजाय बीएचएल (मानवीय रेखा से नीचे) शब्द को उपयोग में लाया जाए ?

एक तरफ भूखा तो दूसरी तरफ पेटू वर्ग तो हर समाज में होता है। मगर भारत में इन दोनों वर्गों के बीच का अंतर दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। एक ही अखबार के एक साईड में कुपोषण से बच्चों की मौत की काली हेडलाईन हैं तो उसी के दूसरी साईड में मोटापन कम करने वाले क्लिनिक और जिमखानों के रंगीन विज्ञापन होते हैं। भारत भी बड़ा अजीब देश है, जहां आबादी के एक बड़े भाग को भूखा रहना पड़ता है, वहीं डायबटीज, कोरोनरी और इसी तरह की अन्य बीमारियों के मरीज भी सबसे अधिक यही पर हैं, जिनकी बीमारियां सीधे-सीधे ज्यादा खाने-पीने से जुड़ी हुई हैं।

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7.4.10

मीडिया का यह कैसा फैलाव है ?

शिरीष खरे

आज से करीब 15 साल पहले, जब मीडिया की पहुंच महज महानगरों तक सीमित थी तब इसके विस्तार पर जोर दिया जाता था। अब हमारे देश में अनेक क्षेत्रीय समाचार माध्यमों के कारण खबरों की संख्या और पहुंच, दोनों ही तेजी से बढ़ी हैं जिससे स्थानीय खबरों को महत्व मिला। इसके साथ ही मीडिया के स्वरुप में विकृतियां भी आयी, जैसे-किसी छोटी घटना को बढ़ा-चढ़ाकर बताकर पेश करना, सनसनीखेज या मसाला शैली में बढ़ोत्तरी और खबरों में भाषाई हमला का तेज होना वगैरह। कई बार संवेदनशीलता की ऐसी अधिकता त्रासदी को कमजोर बना देती है। जब मीडिया सीमित था तब उस पर आम आदमी का भरोसा ज्यादा था। आज खबरों में अंतरविरोध बढ़ने के साथ ही मीडिया की विश्वसनीयता भी घटने लगी है। इसे एक ही खबर को जांचने के लिए लोगों द्वारा अलग-अलग माध्यम या चैनल बदलने के तौर पर देखा जा सकता है। इन दिनों खबरों के चुनाव और प्रस्तुतीकरण में अहम बातें या तो उजागर नही होती, अगर होती भी हैं तो अमर्यादित भाषाई हमला विकृति पैदा करता है। दूसरी तरफ, समाचारपत्रों में ‘संस्करणों’ का प्रचलन बढ़ने से अधिकतर खबरों का अपनी क्षेत्रीयता में सिमट जाना एक दुखद स्थिति है। इस प्रकार, एक क्षेत्र की खबर दूसरे क्षेत्र के लोगों तक नहीं पहुंच पा रही हैं और आसपास की जनता में खबरों का आपसी संबंध रूक सा रहा है। यही कारण मीडिया के वास्तविक विस्तार पर प्रश्नचिन्ह भी लगाता है।

मीडिया के भीतर भी मुख्यतः मीडिया की व्यावसायिकता को लेकर ही चर्चाएं हो रही हैं। एक वर्ग व्यवसायिकरण से परहेज नहीं करता। इसके पीछे उनके अपने तर्क हैं, जैसे-‘उदारीकरण के कारण जब पूरा परिदृश्य ही बदल रहा हो तब मीडिया में परिवर्तन आना स्वभाविक ही है’, ‘सभी क्षेत्रों की तरह अब मीडिया को भी कमाने दिया जाए’, ‘जहां तक नैतिकता का सवाल है तो इसमें भी केवल मीडिया से ही उम्मीद नहीं करनी चाहिए’ वगैरह। दरअसल, मीडिया के व्यवसायीकरण ने उसका फैलाव किया और इसी फैलाव ने मीडिया को नियंत्रण से बाहर कर दिया। सिक्के का दूसरा पक्ष आदर्शवाद पर टिका है। प्रेस लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है इसलिए उसकी अपनी जिम्मदारियां भी हैं। लोकत्रंत के पहले तीन स्तम्भों में से एक भी बाजार से सीधा नहीं जुड़ा है। व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका को बाजार से दूर रखने का जो भी कारण हो वहीं कारण मीडिया पर भी लागू होना चाहिए। अब विकास, विज्ञान, पर्यावरण और लोगों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर समाचार और कार्यक्रम गायब होने लगे है। इसके बचाव में अक्सर कहा जाता है कि जो देखा, सुना या पढ़ा जा रहा है दर्शक, पाठक या श्रोता वही तो चाहता है। लेकिन अभी तक लोगों की रूचियों को जानने का न तो कोई पुख्ता अध्ययन हुआ है और न ही सर्वेक्षण, फिर भी इस कथन को सच मान लिया गया है।

आजादी के बाद समाचार पत्रों में पूंजी का उपयोग बढ़ा और पत्रों की संख्या भी। पहले मात्र समाचारपत्रों को बेचकर उनका प्रकाशन कराते रहना मुश्किल था इसलिए विज्ञापनों का प्रयोग प्रचलन में आया। बाद में प्रेस कमीशन ने भी समाचार और विज्ञापनों का अनुपात 60/40 रख दिया। तब विज्ञापन लागतों की वापसी और आय का मुख्य साधन बन गए। धीरे-धीरे समाचार पत्रों में पूंजी की अधिकता बढ़ने से व्यवसायिकों का प्रवेश बढ़ने लगा। पहले यह उनका सहायक व्यवसाय था, जो बाद में मुख्य व्यवसाय बन गया। अब समाचार पत्र, समाचार के अलावा उत्पाद बेचने का सशक्त माध्यम भी बने। आपातकाल की समाप्ति के बाद प्रेस व्यवसायिकों को लगा कि अगर सरकार की मामूली आपत्ति पत्रकारों पर दबाव बना सकती है तो उनके हाथों में तो और बड़ा हथियार अर्थात रोजगार है। उन्होंने अपनी हितो को ध्यान में रखकर समाचारों को प्रकाश में लाने और छिपाने के निर्देश देने शुरू कर दिए। हालांकि आज भी इलेक्ट्रानिक मीडिया की तुलना में समाचार-पत्र सामग्री की गुणवत्ता और जनता के प्रति अपनी जवाबदारी को लेकर बेहतर स्थिति में बताया जाता है।

प्रिंट की तुलना में इलेक्ट्रानिक मीडिया नया है और इसकी कोई सामाजिक पृष्ठभूमि नहीं रही। आकाशवाणी के बाद क्रमशः दूरदर्शन, केबल, चौबीस घण्टों के न्यूज चैनल और इंटनरेट वगैरह आए। दूरदर्शन का सरकार के अधीन होने से उसकी अपनी सीमाएं थीं, अक्सर इन सीमाओं में बंधे रहने के कारण उसकी आलोचनाएं होतीं। जब-जब दूरदर्शन पर विरोध के स्वर को दबाने के आरोप लगता तब-तब इसे एक स्वायत्त संस्था बनाने पर विमर्श होता। मगर दूरदर्शन के कार्यक्रमों का स्तर था और विज्ञापनों की सीमा भी। इस बीच सूचना क्रांति का जो युग आया उसने मीडिया को बाजार का महज उपकरण बना दिया। आजकल इन्हीं विचारशून्य सूचनाओं पर समाज को दिग्भम्रित करने का आरोप लगाया जा रहा है।

समाज और बाजार के बीच मीडिया एक माध्यम होता है। मीडिया से ही बाजार और समाज आपस में एक-दूसरे से बंधे हैं। मीडिया में प्रसारित किसी उत्पाद का विज्ञापन दिखाने से उसकी विश्वसनीयता बढ़ती है। इसीलिए मीडिया की जिम्मेदारी दोहरी हो जाना चाहिए लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा होता नहीं दिखता। दरअसल, पश्चिमी देशों से मुकाबला और उसके असर के कारण भारत में स्थितियां तेजी से बदली हैं। अब हर वस्तु का बाजार है। बाजार में उपभोक्तावादी संस्कृति का मानवीय संवेदनाओं से मेल बैठना मुश्किल है। बाजारों को तैयार करने में पश्चिम से प्रभावित मीडिया ने आवश्यक उपकरण का काम किया। इस मीडिया का मकसद सारी दुनिया को ‘एक बाजार के लिए एक सभ्यता’ को प्रोत्साहित करना रहा ताकि उत्पादित माल को बेचना आसान हो सके। इस आधार पर आधुनिक मीडिया का विस्तार भी होना ही था। मीडिया के विकृति से चिंतित कुछ जन नए विकल्पों की बात करते हैं। मगर विकल्प कोई भी हो, बाजार के प्रभाव से बचना मुश्किल होगा। कुछ का मत है कि आधुनिक मीडिया ने पारंपरिक और लोक माध्यमों को कमजोर बनाया है जबकि आज का बाजार इन्हीं माध्यमों से अपनी उत्पादनों को बेचने की क्षमता भी रखता है। बात चाहे सामुदायिक रेडियो की हो या वेब दुनिया जैसे नए विकल्पों की, सभी इन दिनों मनोरंजन द्वारा और मंनोरंजन के लिए हाजिर हैं।

इन दिनों विभिन्न सामाजिक संस्थाओं द्वारा समाचार माध्यमों पर सेक्स, अपराध, अंधविश्वास आदि नकारात्मक प्रवृतियों को रोकने के लिए सरकार से कारगर राष्ट्रीय मीडिया नीति बनाने की मांग की जा रही है। ऐसी संस्थाओं का मानना है कि आजकल मीडिया में सामग्री का चयन सामाजिक सरोकारों के आधार पर नहीं बल्कि बाजार की विशुद्ध शक्तियों द्वारा निर्धारित होता हैं। लेकिन मीडिया की आलोचना का मतलब मीडिया के विरोध से नहीं बल्कि मीडिया में सुधार संबंधी चिंतन से होना चाहिए। आज हर समाचार माध्यम अपने लक्ष्य समूह तक अधिक से अधिक पहुंचना चाहता है तो यह ठीक भी है। लेकिन अगर उस लक्ष्य समूह की प्राथमिक समस्याओं को ध्यान में रखने की जरूरत महसूस हो रही है तो इस पर भी विचार करना चाहिए। बाजार से मीडिया को पूर्णतः अलग-थलग करने की बजाय इसे बाजार के दुष्प्रभावों से बचाना आसान होगा। इसीलिए मीडिया की एक सार्थक नीति बनाने की बात में संभावना दिखती है। हालांकि यह बहुत संवेदनशील मांग है क्योंकि प्रेस की अभिव्यक्ति पर रोक लगाने की लम्बी कहानियां भी हैं। इस नीति का लक्ष्य मीडिया पर प्रतिबंधों से नही बल्कि सामाजिक जिम्मेदारियों के संदर्भ में उसकी कारगर रणनीति से होना चाहिए। इसलिए मीडिया की नीति को मीडिया के लोगों द्वारा बनाने से इसकी लोकतांत्रिक संरचना ही मजबूत होगी। आज भी मीडिया में असंख्य लोग पूरी निष्ठा और ईमानदारी से कार्य करना चाहते हैं लेकिन जवाबदेही की कोई स्पष्ट रुपरेखा न होने से वह अपनी भूमिका का निर्वाहन नहीं कर पाते।

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6.4.10

पानी की कालाबाजारी में अतराई मुम्बई

शिरीष खरे

मुंबई/ मुम्बईकरों को पानी की परेशानी के बीच सूचना के अधिकार से एक हैरतअंगेज सूचना निकली है कि बृहन्मुम्बई महानगर पालिका द्वारा कम से कम 18 पानी कंपनियों को उनकी मुनाफाखोरी के लिए लाखों लीटर पानी दिया जा रहा है। एक तरफ जहां शहर के रहवासियों के सामने पानी का घनघोर संकट छाया हुआ है वहीं दूसरी तरफ इन 18 कंपनियों को हर रोज 8,10,000 लीटर पानी दिया जा रहा है और बदले में उनसे पूरे साल भर के लिए सिर्फ 1 करोड़ 55 लाख रूपए लिए जा रहे हैं। जबकि इतने पानी में करीब 8,000 से ज्यादा रहवासियों की पानी की जरूरत पूरी की जा सकती है। मगर ऐसा न करते हुए पानी कंपनियों को 1,000 लीटर पानी सिर्फ 40 रूपए के हिसाब से दिया जा रहा है। इसके बाद यह कंपनियां 1 लीटर पानी को 40 रूपए तक बेचकर भारी मुनाफा कमा रही हैं।

'घर बचाओ घर बनाओ आन्दोलन ' ने सूचना के अधिकार के मार्फत जो दूसरी सूचना निकाली है वह यह कि मुंबई में ऐसे कई पानी उपभोक्ता है जो पानी का इस्तेमाल तो कर रहे हैं मगर बिल जमा नहीं कर रहे हैं। ऐसे पेण्डिंग बिल का जोड़ 700 करोड़ रूपए से ज्यादा बन रहा है।

'घर बचाओ घर बनाओ आन्दोलन ' के सिम्प्रीत सिंह ने बताया है कि "बीएमसी कानून 1988 की कलम 61बी के मुताबिक सभी नागरिकों के लिए पानी का इन्तजाम करना महापालिका की जिम्मेदारी है मगर यह बड़े खेद ही बात है कि वह खुद ही हजारों नागरिकों को पीने का पानी देने की बजाय कंपनियों को मुनाफाखोरी के लिए पानी सप्लाई करता है।" बातचीत के दौरान सिम्प्रीत सिंह ने बताया कि "इस देश का संविधान और सुप्रीम कोर्ट तक यह कह रहा है कि हर नागरिक को जीने के अधिकार के भीतर स्वच्छ पानी का अधिकार भी दिया गया है। इसके बावजूद बीएमसी ने 01.01.1995 की कट आफ डेट लगाते हुए कई नागरिकों को पानी से वंचित रखा है। भला अमीर और गरीब के बीच ऐसे दोहरे मापदण्ड क्यों अपनाए जा रहे हैं ?"

देखा जाए तो खासतौर से मुम्बई की झोपड़ियों में रहने वाली महिलाओं को पानी हासिल करना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है। यह महिलाएं पानी के लिए हर रोज 2 से 3 घण्टे बिताती हैं और कई बार तो वह 2 से 3 किलोमीटर पैदल भी चलती हैं। फिर भी बीएमसी द्वारा एक तो कंपनियों के फायदे के लिए पानी देना और दूसरा करोड़ों रूपए बकाया होते हुए भी पानी की सप्लाई बन्द न करना बताता है मुंबई का पानी कालाबाजार में किस हद तक डूबा है।

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5.4.10

सरदार सरोवर का सबक

शिरीष खरे

यह सच है कि सरदार सरोवर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बांध है, जो 800 मीटर नदी में बनी अहम परियोजना है। सरकार कहती है कि वह इससे पर्याप्त पानी और बिजली मुहैया कराएगी। मगर सवाल है कि भारी समय और धन की बर्बादी के बाद वह अब तक कुल कितना पानी और कितनी बिजली पैदा कर सकी है और क्या जिन शर्तों के आधार पर बांध को मंजूरी दी गई थी वह शर्तें भी अब तक पूरी हो सकी हैं ?

साल 2000 और 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा है कि सरदार सरोवर की ऊंचाई बढ़ाने के छह महीने पहले सभी प्रभावित परिवारों को ठीक जगह और ठीक सुविधाओं के साथ बसाया जाए। मगर 8 मार्च, 2006 को ही बांध की ऊंचाई 110 मीटर से बढ़ाकर 121 मीटर के फैसले के साथ प्रभावित परिवारों की ठीक व्यवस्था की कोई सुध नही ली गई। हांलाकि 1993 में, जब इसकी ऊंचाई 40 मीटर ही थी तभी बडे पैमाने पर बहुत सारे गांव डूबना शुरू हो गए थे। फिर यह ऊंचाई 40 मीटर से 110 मीटर की गई और प्रभावित परिवारों को ठीक से बसाया नहीं गया।

तत्कालीन मध्य प्रदेश सरकार ने भी स्वीकारा था कि वह इतने बड़े पैमाने पर लोगों का पुनर्वास नहीं कर सकती। इसीलिए 1994 को राज्य सरकार ने एक सर्वदलीय बैठक में बांध की ऊंचाई कम करने की मांग की थी ताकि होने वाले आर्थिक, सामाजिक, भौगोलिक और पर्यावरणीय नुकसान को कम किया जा सके। 1993 को विश्व बैंक भी इस परियोजना से हट गया था। इसी साल केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय के विशेषज्ञ दल ने अपनी रिपोर्ट में कार्य के दौरान पर्यावरण की भारी अनदेखी पर सभी का ध्यान खींचा था। इन सबके बावजूद बांध का काम जारी रहा और जो कुल 245 गांव, कम से कम 45 हजार परिवार, लगभग 2 लाख 50 हजार लोगों को विस्थापित करेगा। अब तक 12 हजार से ज्यादा परिवारों के घर और खेत डूब चुके हैं। बांध में 13,700 हेक्टेयर जंगल डूबना है और करीब इतनी ही उपजाऊ खेती की जमीन भी। मुख्य नहर के कारण गुजरात के एक लाख 57 हजार किसान अपनी जमीन खो देंगे।

अगर सरदार सरोवर परियोजना में लाभ और लागत का आंकलन किया जाए तो बीते 20 सालों में यह परियोजना 42000 करोड़ रूपए से बढ़कर 45000 करोड़ रूपए हो चुकी है। इसमें से अब तक 2500 करोड़ रूपए खर्च भी हो चुके हैं। अनुमान है कि आने वाले समय में यह लागत 70000 करोड़ रूपए पहुंचेगी। गौर करने वाली बात है कि साल 2010-11 के आम बजट में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने सरदार सरोवर परियोजना के लिए 3000 करोड़ रूपए से ज्यादा की रकम आंवटित करने की घोषणा की है। इसके अलावा सरकार के मुताबिक परियोजना की पूरी लागत गुजरात के सिंचाई बजट का 80% हिस्सा है। इसके बावजूद अकेले गुजरात में ही पानी का लाभ 10% से भी कम हासिल हुआ है। जबकि मध्यप्रदेश को भी अनुमान से कम बिजली मिलने वाली है। ऐसे में पूरी परियोजना की समीक्षा होना जरूरी है।

पर्याप्त मुआवजा न मिलना, मकानों व जमीनों का सर्वे नहीं होना, या तो केवल मकानों को मुआवजा देना या फिर केवल खेती लायक जमीन को ही मुआवजा देना, पुनर्वास स्थलों पर बुनियादी सुविधाओं का अभाव, कई प्रभावित परिवार को पुनर्वास स्थल पर भूखण्ड न देने आदि के चलते हजारों डूब प्रभावित अपना गांव छोड़ने को तैयार नहीं हैं। जहां-जहां गांव का पुर्नवास स्थल बनाया गया है वहां-वहां पूरे गांव के प्रभावित परिवारों को एक साथ बसाने की व्यवस्था भी नहीं है। गांव में लोगों की खेती की सिंचित जमीन के बदले सिंचित जमीन कहां देंगे, यह उचित तौर पर बताया नहीं जा रहा है।

कुछेक लोगों को बंजर जमीन दी गई है और कुछेक को गुजरात में उनकी इच्छा के विरूद्ध प्लॉट दिये गए। गुजरात में जहां कुछ परिवारों को बसाने का दावा किया गया है वहां भी स्थिति डूब से अलग नहीं है। करनेट, थुवावी, बरोली आदि पुनर्वास स्थल जलमग्न हो जाते हैं, उनके पहुंच के रास्ते बंद हो जाते हैं। यदि किसी व्यक्ति की जीविका का आधार यानी उसकी खेती लायक जमीन बांध से प्रभावित है और उसका घर पास के गांव में है तो उसे बाहरी बताकर पुनर्वास लाभ से वंचित किया जा रहा है।

डूब प्रभावितों के अनुसार आवल्दा, भादल, तुअरखेड़ा, घोघला आदि गांवों के तो पुर्नवास ही नहीं बनाये गए हैं। गांव भीलखेड़ा साल 1967 और 1970 में दो बार नर्मदा नदी में आई भारी बाढ़ से उजड़कर बसा है। बांध की ऊंचाई बढ़ाने से यह तीसरी बार उजड़ने की कगार पर है। भादल का राहत केम्प 7 किमी दूर ग्राम सेमलेट में बनाया गया है। भादल से सेमलेट सिर्फ पहाड़ी रास्तों से पैदल ही पहुंचा जा सकता है। एकलरा के प्राथमिक स्कूल को गांव से करीब ढ़ाई किलोमीटर दूर पुनर्वास करने से 53 में से केवल 8-10 बच्चे ही पहुंच पा रहे हैं। शिक्षकों को रिकॉर्ड रखने में परेशानी हो रही है और मध्यान्ह भोजन योजना का उचित संचालन नहीं हो पा रहा है।

यह तो महज एक सरदार सरोवर परियोजना के चलते इतने बड़े पैमाने पर चल रहे विनाशलीला का हाल है। मगर 1200 किलोमीटर लंबी नर्मदा नदी पर छोटे, मझोले और बड़े करीब 3200 बांध बनाना तय हुआ है। यहां से आप सोचिए कि नर्मदा नदी को छोटे-छोटे तालाबों में बांटकर किस तरह से पूरी घाटी को असंतुलित विकास, विस्थापन और अनियमितताओं की तरफ धकेला जा रहा है।

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3.4.10

विकलांगता : एक स्थिति बनाम सामाजिक चश्मा

शिरीष खरे


हमारे अतीत के हिस्से में ऐसे बहुत सारे बच्चे हैं जिनका नाम उनकी विकलांगता के आधार पर दर्ज हैं। अब नाम भले दूसरे बच्चों की तरह रखे जाने लगे हो मगर समाज की जुबान से ऐसे अपशब्द पूरे तरह से गए भी नहीं हैं। आज भी कई जगहों पर ऐसे अपशब्द ही उनकी पहचान बने हुए हैं। आज भी समाज की नजर में विकलांगता जैविक या जन्मजात विकृति से ज्यादा कुछ भी नहीं। महज एक रोग, एक अभिशाप है। जबकि यह रोग या अभिशाप नहीं बल्कि एक स्थिति है जो कि सामाजिक पूर्वाग्रह और तरह-तरह की बाधाओं के कारण और जटिल बन चुकी है। जवाबदेही के नाम पर इससे जुड़े हर सवाल को मेडीकल से जोड़कर देख लिया जाता है। फिर मेडीकल में ही पुर्नवास करने-कराने की दलीलें दे दी जाती हैं। विकलांग लोगों के संपूर्ण पुर्नवास पर आवाज लगाने वालों की तादाद देश में अब भी गिनी-चुनी और अनसुनी है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि वह आर्थिक और राजनैतिक स्तर पर कम भी हैं और कमजोर भी। दरअसल विकलांगता को उसकी व्यापकता और वास्तविकता में समझने के लिए एक जमीन चाहिए। एक ऐसी जमीन जिस पर विकलांगता के कारण और उसकी स्थितियों पर प्रकाश डाला जा सके। तो आइए बड़वानी चलते हैं :

बड़वानी- मध्य-प्रदेश का एक गरीब, आदिवासी और विकास के मामले में बहुत पिछड़ा जिला है। जल, जंगल, जमीन के बावजूद दाने-दाने को मोहताज। जो बिखरा-बिखरा, असंगठित, उबड-खाबड़ पहाड़ी, जंगली और नदी-नालों से भरा है। जहां प्रशासन की सुविधाएं भी बहुत दूर-दूर हैं। अंधविश्वास की भावनाएं विकलांगता की स्थिति को कितना बिगाड़ देती हैं, आइए आप ही देख लीजिए :

(एक) प्रदेश में विकलांग समुदाय की कुल आबादी है : 14,77,708। जिसमें 11,08281 ग्रामीणजन हैं। यह कुल आबादी का 75 % भाग है। बड़वानी में कुल 17,782 जन विकलांग हैं, जिसमें 15,427 ग्रामीण अंचल से ताल्लुक रखते हैं।

(दो) प्रदेश में कुल 11,65,703 विकलांग जन गरीबी रेखा से नीचे हैं। बड़वानी का जिक्र किया जाए तो यहां 14,679 विकलांग जन इस अभावग्रस्त रेखा के नीचे जीवन-यापन कर रहे हैं, जिसमें 13,052 ग्रामीण हैं। प्रतिशत में यह 89 % है।

(तीन) प्रदेश में कुल विकलांग आबादी में 51,5929 लोग आजीविका या रोजगार से दूर हैं। मतलब, प्रतिशतता के आधार पर 34.91%। तुलना के लिहाज से बड़वानी में कुल 12,828 में से 3,561 विकलांग जन तो पूरी तरह बेकार है। मतलब, 28 % लोग काम की तलाश में यहां से वहां भटकते हैं।

(चार) प्रदेश में साक्षरता के मद्देनजर विकलांग जन की गणना की जाए तो 87,8310 निरक्षर हैं जो कि 59.44 % बोलता है। इसी तरह बड़वानी में कुल 12,064 निरक्षर हैं, मतलब 68 %। मतलब कुल संख्या का एक बहुत बड़ा हिस्सा 'क' 'ख' 'ग' 'घ' से परिचित नहीं है। इस पर भी 10989 ग्रामीण हैं। यहाँ की प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर हालत को नाजुक ही बताया जाएगा क्योंकि इस तरह के तुलना 1,874 लोग ही कक्षा 5 तक शिक्षा पा सके हैं। देखा आपने यह सफेद कागज पर विकलांग साथियों के खिलाफ जाता कैसा गणित है ?

यह महज संख्याएं नहीं हैं, इनसे बहुर सारी कहानियां भी जुडी हैं। इन कहानियों का सार गरीबी है। गरीबी के खिलाफ पहली लड़ाई भोजन को पाने से है। भोजन की कमी और कठोर मेहनत की वजह से अनगिनित माओं के पेट में पल रहा विकास यहां भी प्रभावित है। यहां आने वाली तकदीर को कुपोषित, मंदबुध्दि और विकलांग बनाने का क्रम जारी है। यहां भी भोजन की कमी को कम करने के लिए अकसर जहरीला या गंदा खाना खाया जाता है। जिससे शरीर असक्ष्म और मरने की स्थिति तक पहुंच जाता है। या कई तरह की बीमारियों से घिर जाता है। अफसोस, विकलांगता को भी इन्ही बीमारियों में से एक मान लिया जाता है। बाकी का कुकर्म जानकारी और सुविधाओं के अ-भाव के माथे चढ़ता है।


ठीकरी ब्लाक के सुराना गांव की सरिता की बात ही ले। यह बच्ची बचपन से ही मंदबुध्दि है। वह जैसे-जैसे बड़ी हुई घरवालों को उसमें असमानता और कमियां दिखाई देने लगीं। जैसा कि होता है, परिवार वालों का व्यवहार भी बदल गया। सरिता, क्योंकि कम दिमाग की बच्ची है इसलिए वह कुछ समझ न पायी। उल्टा इस बदले व्यवहार ने उसके लिए बहुत-सी समस्यां पैदा कर दी। अब परिवार वाले उसकी जिद और तरह-तरह की हरकतों से और ज्यादा नाराज रहने लगे। हालात यह हो गई कि उन्होंने उसे एक कोने में बांधकर रख दिया।

अनिल अभी 12 साल का है। जिला मुख्यालय से 4 किलोमीटर दूर उसका घर बिलावा गांव में है। उसके दोनों पैरों में जन्मजात विकृति है। समय रहते सुधार की गुजांइश थी लेकिन परिवार की आर्थिक हालात बहुत ही खराब थी। मां-बाप खेतों में काम कर किसी तरह दो वक्त की रोटी का बंदोबस्त कर लेते हैं। सही वक्त पर उचित परामर्श और चिकित्सा न मिलने से अनिल के जीवन की चाल रुक सी गई है।

राम जिला मुख्यालय से सटा गांव कसरावद का है। 7 साल का राम एक भील परिवार का बच्चा है। बचपन में ही वह अपनी मां से बिछड़ गया। वह जन्मजात विकलांगता से ग्रसित है और थोड़ा बड़ा होते ही परिवार वाले भी उसकी इस कमजोरी को समझ गए। उसके पिता ने कई बार डाक्टरों दिखाया। हासिल कुछ भी न हो सका। पिता ने दूसरी शादी कर ली। उनकी दूसरी पत्नी से पहली संतान हुई। सबका ध्यान उसी की ओर हो गया। अब उसकी बूढ़ी दादी ही उसका एकमात्र सहारा है। पैर पर पैर रखकर वह घसीट-घसीटकर चलता है। नतीजन, उसकी रीढ़ के निचले हिस्से में घाव हो गया है।

जब तक बच्चा गोदी में है अच्छा लगता है। गोदी के बाहर अनगिनत बाधाएं हैं। ऐसे बच्चे पर समुदाय ध्यान नहीं देता। उसे बोझ तथा पूर्व जन्मों के पाप समझकर परजीवी बना दिया जाता है। दूसरी तरफ कुछ परिवार ऐसे भी होते हैं जो कि अपने लाड़ले की विकलांगता को दूर करने के लिए बहुत पैसा और समय खर्च करते हैं। इसके बावजूद जब उसकी स्थिति में खास सुधार नही होता तो बर्बादी की सारी जिम्मेदारी घर के ऐसे ही सदस्य के सिर फोड़ी जाती है। इस तरह एक ही परिवार के दूसरे लोग जो किसी वजह से अपने जीवन मे नाकामयाब होते हैं, वह भी अपनी कमियों को छिपाने के लिए इसी भाई या बहन को जिम्मेदार ठहराते है।

निर्मला बरेला, 14 साल की ऐसी बच्ची है जिसने कक्षा तीन तक पढ़ने के बाद कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा। वह तकरीबन 15 किलोमीटर दूर सिलावद (नदी पार) की है। एक पैर से विकलांग होने के कारण अक्सर बीमार रहती है। वह पंजे के बल एड़ी को उठाकर, लचकती-सी चलती है तो कई बार गिर भी जाती है। जब पहली बार उसको देखने यहां की महिला कार्यकर्ता पहुंची तो वह भाग गई। धीरे-धीरे इस कार्यकर्ता ने उसे स्कूल में लाने कोशिश की। अब वह बच्ची कार्यकर्ता के पास तो आने लगी, मगर माता-पिता के कहने पर। और एक दिन जब बच्ची के घर पर कोई नहीं था तो खुद बच्ची ने महिला कार्यकर्ता को बहुत भला बुरा कहा।

दरअसल एक खास बाधा स्कूल का गेट या उसकी सीढ़ी से जुड़ा है। कहने की जरूरत नहीं कि जिन्दगी के 1,2,3 और 4,5 जाने बगैर सुंदर भविष्य की कल्पना बेमानी है। मगर पढ़ाई लिखाई में भी विकलांग बच्चों को लगातार उपेक्षित किया जाता है। राम के साथ भी ऐसा ही हुआ। जब एक गैर सरकारी संस्था के स्थानीय-कार्यकर्ता ने उसे स्कूल भेजने का जिम्मा लिया तो इसके लिए उसकी प्यारी दादी से बात हुई। दादी किसी तरह मान भी मगर शिक्षक ने एडमीशन देने को मना कर दिया। कार्यकर्ता ने बात को यही समाप्त करने की बजाय पंचायत में बात की। अभी वह पहली में पढ़ने के लिए किसी तरह स्कूल जा जरूर रहा है। मगर अधिकतर ऐसे बच्चे तरह-तरह की समस्याओं के कारण 'मेरे दोस्त को स्कूल भेजो' नहीं कहते। बल्कि वह खुद ही बीच में पढ़ाई छोड़ देते हैं। यहां शिक्षकों की संवेदनशीलता और अध्ययन के तरीकों पर बात उठनी लाजमी है। ज्यादातर शिक्षक इसके पीछे काम काज में अतिरिक्त भार को कारण बताते हैं। सहपाठियों का अ-संवेदनशील रवैया और हतोत्साहन भी विकलांग बच्चों को स्कूल से बाहर का दरवाजा दिखाता है। स्कूल में संदवेनशील और एक समान व्यवहार का माहौल तैयार करना शिक्षक का काम होता है। वह विद्यार्थियों में सहयोगात्मक भावना जगा सकता है। ऐसे विद्यार्थियों को स्कूल जाने मे जिन बाधाओं का सामना करना पड़ता है उन पर विचार करना चाहिए। जैसे : कक्षा तक जाने के लिए सीढ़िया, मैदान, बैठक व्यवस्था, ब्लैक-बोर्ड, उस पर लेखन प्रणाली, शिक्षक की आवाज, रौशनी, पेयजल और शौचालय तक पहुंचने का मार्ग आदि।

विकलांग बच्चियों के साथ तो स्थिति और खराब हो जाती है। बच्ची होने से उसे घर की चारदीवारी में कैद हो जाना पड़ता है और विकलांगता के चलते उसे शर्मिंदा होना पढता है। जब वह ही अपनी विकलांगता को छिपाना चाहेगी तो फिर वह अपने अगले कदम मतलब अधिकार की बात कैसे करेगी ?

जिला मुख्यालय से तकरीबन 20 किलोमीटर दूर गाँव तलवाड़ा बुर्जग में दाएं पैर से विकलांग लक्ष्मण सिंह चलते समय लकड़ी का सहारा लेता है। पांचवी फेल यह 27 साल का अविवाहित युवक है। लक्ष्मण निराश्रित पेंशन-योजना के तहत 150 रूपए प्रतिमाह पाता है। आजीविका के लिए वह अपनी सिलाई मशीन से थोड़ा-बहुत पैसा कमाता रहा था, मगर अब यह मशीन खराब पड़ी है, जिसे सुधरवाने में 300 रूपए का खर्च आएगा। एक गरीबी-रेखा के नीचे गुजर-बसर करने वाले व्यक्ति के लिए यह एक भारी रकम है। रकम की व्यवस्था न हो पाने के कारण लम्बे समय से उसका काम ठप्प है। बेकारी ने उसकी मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। अपनी छोटी सी झुग्गी में मटमैले कपड़े, बिखरे बाल और चहरे पर जमा गंदगी के साथ जैसे उसकी जिन्दगी में निराशाओं ने भी जड़े जमा ली हैं।

समाज का नकारात्मक सोच और खुद का कोई काम कर पाने को लेकर गिरा भरोसा बेकारी से निकलने नहीं देता। जब वह किसी और के भरोसे हो जाता है तो उसकी भावना, इच्छा और फैसलों को कोई महत्त्व नहीं रह जाता है। यह तो एक लक्ष्मण की बात है। बाकी के न जाने कितने लक्ष्मण भीख मागने को अपना एकमात्र उपाय समझ लेते है। हमारा समाज भी धार्मिक या सामाजिक तौर पर दान देने की गलत पंरपरा को निभाता है। इस तरह समुदाय की एक खासी तादाद अर्थव्यवस्था में अपनी भागीदारी नहीं निभा पाता है। जो लोग ऐसा नहीं कर पाते वह फैसले की प्रक्रिया में भी कही कोई स्थान नहीं पाते हैं।

गरीब आदमी हमेशा मानसिक तनाव में रहता है। मानसिक तनाव मानसिक रोग में बदल जाता है। गरीबी के कारण ही उचित उपचार नहीं हो पाता है। लेखराम 17 किलोमीटर दूर ओसाड़ा गांव का निवासी है। उसे पिता की बीमारी और मौत ने मानसिक रूप से परेशान कर दिया। अंतिम-संस्कार के समय ढ़ोल-बाजे सुनकर वह कांप उठा था। फिर सीटी बजाना, घर से भागना, पत्थरों को फेंकना,गाली-गलौच करना, बड़बड़ना और ताली बजा-बजाकर हंसना उसकी फितरत बन गई।

इसी तरह अगर विकलांग समुदाय की मानवीय स्वभाव से जुड़ी अन्य जरूरतों पर बात की जाए तो सेक्स को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मगर इस बीच आने वाली विकलांगतारूपी पीड़ाएं बाधा बनती हैं। जब उनकी इस प्रकार की जरूरतें पूरी नहीं हो पाती तो मानसिक संतुलन की स्थिति बिगड़ जाती है। पुरूष तो किसी तरह अपने हिस्से की जिन्दगी जी लेते हैं मगर महिलाओं के लिए जिंदगी बद से बदतर बन जाती है। क्योंकि उसके लिए तो बंधन हैं, मर्यादाओं की एक दहलीज है। दहलीज के बाहर निकलने में ऐतराज है, दहलीज के भीतर रहने में समस्याएं हैं। फिर गरीबों का रेनबसेरा बहुत छोटा होता है। जिसमें एकाध कमरा और तंग दीवारें होती हैं। इन तंग दीवारों में परिवार के दूसरे सदस्यों की सेक्स गतिविधियां उनकी भावनाओं को भड़काती हैं। अगर वह अपनी भावनाओं को दबाएं भी तो इससे मानसिक हालत बिगड़ने का खतरा रहता है। कई बार समाज के दबंग मर्द विकलांग और कमजोर महिला को यौन शोषण का शिकार बनाने से नही चूकते। ऐसे में उनके द्वारा किए गए अत्याचार से जो गर्भ ठहरता है उसके लिए वहीं जिम्मेदार ठहराई जाती है। उल्टा उसे ही असामाजिक घोषित कर नर्क के द्वार खोल दिए जाते हैं। कुछ परिवार यह सोचकर कि इनमें सेक्स संबंधी भावनाएं होती ही नही हैं, उनकी तरफ ध्यान नहीं देते। यही सोच उनके शोषण की एक मुख्य वजह भी बनता है।

आज के व्यक्तिवादी समाज में बूढ़ों की हालत वैसे ही कमजोर हो गई है। ऐसे में विकलांग समुदाय के बूढ़ों की बात करें तो स्थिति ज्यादा नाजुक बन जाती है। देखा जाए तो इस उम्र तक आते-आते विकलांग व्यक्ति या तो जी ही नही पाते या आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाते हैं। और जो दोनो स्थितियो से बच निकलते हैं वह अकेलापन लिए होते हैं। अभावग्रस्त जीवन को ढ़ोने और केवल दुख को महसूस करने के लिए जिंदा रहते हैं। सखाराम 65 साल के आदिवासी बुजुर्ग और अपने दोनों पैरों से लाचार है। गांव राजघाट में उनका घर एक छोटी-सी बेड़ी पर पड़ता है। अन्दर को नालियों से जाता गंदा पानी और कीचड़ से लथ-पथ गलियों से गुजरता हुआ उनका जीवन असंमजस में अटका पड़ा है।

असल में सामाजिक स्तर पर विकलांगता के शिकार व्यक्ति विकलांगता से ज्यादा समाज में फैले भ्रम और अनदेखियों से जूझते हैं। एक तरफ सरकार समाज से कहती है कि विकास में सबका साथ चाहिए। मगर इस तबके को जब तक मौका नहीं मिलेगा तब तक यह समाज में अपनी रचनात्मक भागीदारी नहीं निभा सकता। यह तो हताशा से घिरा ऐसा तबका है जो अपने भीतर भरोसा कायम नहीं कर पा रहा है।

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1.4.10

मीडिया के मानक और लोग

पशुपति शर्मा

आम तौर पर यह कह दिया जाता है कि मीडिया के अब कोई मानक नहीं बचे तो इन पर बहस की गुंजाइश ही कहां बचती है। कुछ हद तक ये बात सही है, लेकिन क्या इसके उलट ऐसा नहीं लगता कि अब मानकों पर और ज्यादा गंभीरता से सोचने और विचारने की जरूरत आन पड़ी है। आप और हम सबसे ज्यादा मीडिया के बदलते मानकों से ही प्रभावित हो रहे हैं।

मीडिया के सैद्धांतिक मानकों और व्यावहारिक मानकों में काफी अंतर आ गया है। व्यावहारिक मानकों के कर्ता-धर्ता कामयाबी के शिखर पर खड़े हो जनता का मुंह चिढ़ा रहे हैं तो सैद्धांतिक मानकों के पक्षधर पाताल की खाइयों में खड़े जनता के हितों की दुहाई दे रहे हैं। इन दोनों के बीच अटका है 'लोग'। लोग, जो हर मानक के प्रयोग का आधार है। लोग, जो मानकों के नतीजों को प्रभावित करता है। लोग, जो चैनलों की टीआरपी तय करता है। लोग, जो अखबारों की प्रसार संख्या घटाने-बढ़ाने की शक्ति रखता है, लेकिन अफसोस उस लोग की भूमिका मीडिया के मानक तय करते वक्त कम से कमतर होती जा रही है।

बहरहाल, बात मीडिया की मानकों की करें तो सबसे बड़ा बदलाव तो ये है कि मानक-लोग, लोकहित से शिफ्ट कर गए हैं, अब बाजार और उपभोक्ता नए मानक बन गए हैं। नई परिभाषा-जो बाजार को भाए वही खबर है। जो मुनाफा दे, वही खबर है। जो विज्ञापनदाताओं के हितों का पोषण करे, वही खबर है। ऐसे में खबरों के मानक तय करने की शक्ति संपादकों के हाथ से फिसलकर मार्केटिंग डिवीजन के हाथ में जा रही है तो कैसा अचरज?

अब बात एक दो उदाहरणों से की जाए तो शायद परिदृश्य और स्पष्ट हो। विकास संवाद के मीडिया सम्मेलन के लिए इंदौर आ रहा था कि रास्ते में नई दुनिया का अखबार खरीदा। 12 मार्च 2010 की नई दुनिया की लीड खबर- अखबारों में छपने से कुछ नहीं होता। मध्यप्रदेश के आदिम जाति व अनुसूचित जाति कल्याण मंत्री विजय शाह से जुड़ी खबर लीड बनी थी। मुद्दा बस इतना था कि मलगांव मेले में बेले डांस को लेकर मीडिया ने उन पर चौतरफा हमला किया तो वो भी मीडिया की औकात बनाने पर उतारू हो गये। मीडिया और मंत्रीजी की टशन में लीड खबर बन गई। यहां मानक न तो लोग था, न लोक हित। यहां दो सत्ता प्रतिष्ठानों के ईगो की लड़ाई थी। मीडिया की सत्ता को
मंत्री ने चुनौती दी तो लीड खबर बन गई।

इसी क्रम में एक खबर मुझे पिछले दिनों बिहार के सीवान जिले (जीरादेई) के विधायक के ठुमके वाली ध्यान में आ रही है। इसे चैनल वालों ने बार-बार दिखाया। बार बालाओं के साथ ठुमके लगाते विधायक श्याम बहादुर सिंह के विजुअल में बड़ा दम था, बिकाउ था सो खूब चला। अगले दिन विधायक जी ने माफी मांगी- फिर वही डांस के विजुअल चले। तीसरे दिन श्याम बहादुर सिंह ने कहा- नाच कर मैंने कोई गलती नहीं की, मैं फिर ठुमके लगाऊंगा। खबर तीसरी बार भी चली- क्योंकि खबर से ज्यादा दम और रस बार बालाओं के ठुमकों में था। मीडिया में ऐसे में कई बार विधायक या मंत्रीजी के हाथ का एक खिलौना बस नजर आता है। वो जब चाहें खबर चलवा लें। आप ऊपर के दो उदाहरणों में खुद ही तय करें कि खबर के मानक क्या हैं?

तमिलनाडु पत्रकार यूनियन ने पेड न्यूज को लेकर एक सर्वेक्षण किया। सर्वेक्षण के मुताबिक लोकसभा चुनावों के दौरान तमिलनाडु के अखबारों ने पेड न्यूज के नाम पर 350 करोड़ रुपयों का वारा-न्यारा किया। लोक सभा चुनावों में राजनेताओं और राजनीतिक दलों से मार्केटिंड डिवीजन ने डील की और खबरें धड़ल्ले से छपती रहीं। कभी-कभी तो एक ही संस्करण में एक ही क्षेत्र के दो प्रतिद्वंद्वियों को एक साथ कागज में जिता दिया गया। लोगों और लोक हित के लिहाज से उम्मीदवारों का विश्लेषण नहीं हुआ, पैसों के लिहाज से हार-जीत तय हो गई।

मार्च महीने (2010) में कुछ संगठनों ने प्रेस क्लब में एक प्रेस वार्ता रखी। इस प्रेस वार्ता में जस्टिस राजेंद्र सच्चर, अरुंधति राय समेत कई लोगों ने अपनी बात रखी। अरुंधति राय ने इस बात पर हैरानी जाहिर की कि मीडिया नक्सलवाद के मामले में सरकारी वर्जन को ही अंतिम मानकर खबरों का प्रसारण कर रहा है। इतना ही नहीं, दूर-दराज के इलाकों के उन सभी जन संगठनों को नक्सलवादियों की कतार में खड़ा कर दिया गया है जो जनता के हितों की बात करते हैं। जहां मीडिया को ज्यादा जिम्मेदार भूमिका निभानी चाहिए वहां वो अगर सरकार के हाथ की कठपुतली बन जाए तो फिर कहना ही क्या?

ऐसे में मानकों का सवाल बार-बार उठता है और जरूरी भी है, लेकिन सवाल है कि क्या इन मानकों को कोई मानेगा? जिन लोगों ने मीडिया के मानकों को दफन कर दिया है क्या वो फिर से मानकों की रूह को कब्र से बाहर आने देंगे?

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पशुपति शर्मा संवेदनशील मीडियाकर्मी है.

19.3.10

भूख की पेट में भारत के बच्चे

शिरीष खरे


यह बीते साल नंबवर के आखिरी हफ्ते की बात है जब ग्राम-अगासिया, विकासखण्ड-मेघनगर, जिला-झाबुआ, मध्यप्रदेश के अर्जुन ने एक सर्द रात में कुपोषण के सामने दम तोड़ दिया था। उस सर्द समय में इसी आदिवासी इलाके के दर्जनों बच्चे भी मारे गए थे। अर्जुन सबसे कम उम्र के उन बच्चों में से एक ऐसा नाम था जो अपने हमउम्र साथियों के साथ फाइल की सूची में क्रमानुसार दर्ज हो चुका था। इस तरह एक और नाम भूखे भारत की सांख्यिकी में एक बड़े गुणनफल के बीचोंबीच कहीं दूर गुम हो चुका था।

यकीनन वित्त मन्त्री प्रणव मुखर्जी ने अपना तीर चिड़िया की उस आंख पर ही साधा हुआ है जिसके निशाने पर पड़ते ही सकल घरेलू उत्पाद की दर 9% तक सरक सकती है। मगर कुपोषण और भूख का विकराल रुप देश के एक बड़े हिस्से को जिस ढंग से खा अरह है उससे भी आंख नहीं चुराई जा सकती है।

अक्टूबर 2009 से दिसम्बर 2009 के बीच, मध्यप्रदेश के इसी हिस्से के 4 गांवों से- भूख की चपेट में 70 आदमी मारे गए थे जिसमें 43 बच्चे थे। बीते दो सालों में अखबारों की कतरनों को ही जोड़ों तो मध्यप्रदेश के खण्डवा, सतना, रीवा, झाबुआ, शियोपुरी और सीधी जैसे जिलों से 456 आदमियों की मौतों का पता चलता है। मध्यप्रदेश में 5 साल के नीचे वाले बच्चों का मृत्यु-दर 1000/70 तक पहुंच गया है।

ऐसा ही हाल उड़ीसा और उत्तरप्रदेश का भी है। यहां से भी बाल-मृत्यु दर के अनुमान चौंकाते हैं। 5 साल के नीचे मरने वाले प्रति हजार बच्चों के मद्देनज़र उड़ीसा की हालत भी बहुत नाजुक है। इस तटीय प्रदेश के 29 जिलों में बाल-मृत्यु की दर कम से कम 1000/66 है। कंधमाल जिले की बाल-मृत्यु दर 1000/136 है जबकि मलकानगिरि और गजपति जिलों की बाल-मृत्यु दर 1000/127 है। उत्तरप्रदेश में बाल-मृत्यु दर है 1000/58। यहां के कौशांबी, भदौही, प्रतापगढ़, जौनपुर, इलाहाबाद और बनारस सबसे बुरी तरह से प्रभावित जिलों के तौर पर पहचाने गए हैं। आकड़े बताते है कि मध्यप्रदेश में 5 साल के नीचे के 60% बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। इसके बाद उड़ीसा में 5 साल के नीचे के 50: बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। कुल मिलाकर कुपोषण के मामले में भारत के मध्यप्रदेश और उड़ीसा सबसे बुरी तरह से प्रभावित प्रदेशों के तौर पर पहचाने गए हैं। मगर कर्नाटक (44%), गुजरात (47%) और महाराष्ट्र (51%) भी बहुत ज्यादा पीछे नज़र नहीं आते।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 (एनएफएचएस-3) बताता है कि देशभर में 6 साल से नीचे के 8 करोड़ बच्चे कुपोषण की स्थिति (फूले पेट, अविकसित कदकाठी, झरते बाल और फीके रंग) में जी रहे हैं। 1 साल के बच्चे का वजन औसतन 10 किलोग्राम होता है और उसके वजन में सलाना 2 किलोग्राम के हिसाब से बढ़ोतरी होना जरूरी है। मगर जब बच्चे का वजन सामान्य से कम होने लगता है तो यह कुपोषण की स्थिति में आ जाता है। तब उसमें बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। ऐसे बच्चों को अधिक से अधिक प्रोट्रीन, कार्बोहाइड्रेड, आइरन, विटामिन बी, कैल्शियम आदि मिलना चाहिए। यहां गरीब तबके के नवजात शिशुओं में उचित पालन-पोषण का अभाव और उनके लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की गिरती स्थितियों को कुपोषण के पीछे के प्रमुख कारणों में गिना जा रहा है। उनके आसपास के माहौल में साफ-सफाई और पीने का स्वच्छ पानी न होने से यह संकट और अधिक गहराता जा रहा है।

यह एक कटु सत्य है कि देश में एक सेकेण्ड के भीतर 5 साल के नीचे का एक बच्चा कुपोषण के कब्जे में आ जाता है। मगर इतना सबकुछ होने के बावजूद सरकारी तन्त्र बच्चों के लिए एक जवाबदेह स्वास्थ्य नीति और योजना बनाने के बारे में सोच तक नहीं रहा है।

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