14.9.10

बालिका दिवस इसलिए मनाया जाए


26 सितंबर का दिन बेटियों के लिए खास है. इस बार 26 सितंबर को बालिका दिवस है. कुछ साल पहले तक मां, पिता और बेटे से लेकर दोस्त तक सभी के नाम पर साल में कोई न कोई एक दिन जरूर तय रहता था. मगर बेटियों के नाम पर कोई दिन नहीं होता था. इसी कमी को देखते हुए बेटियों के लिए भी एक दिन चुना गया, जिसे अब बालिका दिवस के रूप में मनाया जा रहा है. बालिका दिवस हर सितंबर के चौथे रविवार को मनाया जाता है. इस लिहाज से इस बार बालिका दिवस 26 सितंबर को है.

क्राई और यूनिसेफ ने पहली बार यह सितंबर के चौथे रविवार यानी 23 सितंबर 2007 को मनाया था. इस तरह बालिका दिवस की शुरुआत 2007 से हुई. यह दिन उन सभी लोगों के लिए खास दिन है, जिन्हें बेटियों से प्यार हैं. आज भी हमारे समाज में बेटियों के जन्म लेने पर खुशियां नहीं मनाई जाती हैं और बेटों मुकाबले उन्हें अच्छी परवरिश भी नहीं दी जाती है. इसी भेदभाव को दूर करने के लिए क्राई, यूनिसेफ और आर्चीज ने मिलकर बालिका दिवस की शुरुआत की थी. अब बालिका दिवस न सिर्फ भारत में बल्कि कई ऐसे देशों में मनाया जा रहा है, जहां बेटियों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता है. इस दिन को परिवार में बेटी के संबंधों को समर्पित किया गया है.

आज हजारों लड़कियों को जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है, या जन्म लेते ही लावारिस छोड़ दिया जाता है. आज भी समाज में कई घर ऐसे हैं जहां बेटियों को बेटे के मुकाबले अच्छा खाना और अच्छी पढ़ाई नहीं दी जा रही हैं. भारत में 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 44.5% (करीब आधी) औरतें ऐसी हैं जिनकी शादियां 18 साल के पहले हुईं हैं. इन 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 22% (करीब एक चौथाई) औरतें ऐसी हैं जो 18 साल के पहले मां बनीं हैं. इन कम उम्र की लड़कियों से 73% (सबसे ज्यादा) बच्चे पैदा हुए हैं. फिलहाल इन बच्चों में 67% (आधे से बहुत ज्यादा) कुपोषण के शिकार हैं.

1991 की जनगणना से 2001 की जनगणना तक, हिन्दु और मुसलमानों- दोनों की ही जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट आई है. मगर 2001 की जनगणना का यह तथ्य सबसे ज्यादा चौंकता है कि 0 से 6 साल के बच्चों के लिंग अनुपात में भी भारी गिरावट आई है. देश में बच्चों का लिंग अनुपात- 976:1000 है, जो कुल लिंग अनुपात- 992:1000 के मुकाबले बहुत कम है. यहां कुल लिंग अनुपात में 8 के अंतर के मुकाबले बच्चों के लिंग अनुपात में अब 24 का अंतर दर्ज है. यह उनके स्वास्थ्य और जीवन-स्तर में गिरावट का अनुपात भी है. यह अंतर भयावह भविष्य की सीधी गिनती भी दर्शाता है.

6 से 14 साल की कुल लड़कियों में से 50% लड़कियां तो स्कूल से ड्राप-आऊट हो जाती हैं. एशिया महाद्वीप में भारत की महिला साक्षरता दर सबसे कम है. गौरतलब है कि ‘नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रनस् राईटस्’ यानी एनसीपीसीआर की एक रिपोर्ट में बताया था कि भारत में 6 से 14 साल तक की ज्यादातर लड़कियों को हर दिन औसतन 8 घंटे से भी ज्यादा समय केवल अपने घर के छोटे बच्चों को संभालने में बीताना पड़ता है. इसी तरह, सरकारी आकड़ों में दर्शाया गया है कि 6 से 10 साल की जहां 25% लड़कियों को स्कूल से ड्राप-आऊट होना पड़ता है, वहीं 10 से 13 साल की 50% (ठीक दोगुनी) से भी ज्यादा लड़कियों को स्कूल से ड्राप-आऊट हो जाना पड़ता है. 2008 को एक सरकारी सर्वेक्षण में 42% लड़कियों ने यह बताया कि वह स्कूल इसलिए छोड़ देती हैं, क्योंकि उनके माता-पिता उन्हें घर संभालने और अपने छोटे भाई-बहनों की देखभाल करने को कहते हैं.


इस गैरबराबरी को बच्चियों की कमी नही बल्कि उनके खिलाफ मौजदू स्थितियों के तौर पर देखा जाना चाहिए. अगर लडक़ी है तो उसे ऐसा ही होने चाहिए, इस प्रकार की बातें उसके सुधार की राह में बाधाएं बनती हैं. इन्हीं सब स्थितियों और भेदभावों को मिटाने के मकसद से बालिका दिवस मनाने पर जोर दिया जा रहा है, जिसे बच्चियों की अपनी पहचान न उभर पाने के पीछे छिपे असली कारणों को सामने लाने के रूप में मनाने की जरुरत है. जो कि सामाजिक धारणा को समझने के साथ-साथ बच्चियों को बहन, बेटी, पत्नी या मां के दायरों से बाहर निकालने और उन्हें सामाजिक भागीदारिता के लिए प्रोत्साहित करने में मदद के तौर पर जाना जाए.

1 टिप्पणी:

अशोक बजाज ने कहा…

आपका पोस्ट सराहनीय है. हिंदी दिवस की बधाई