19.3.10

भूख की पेट में भारत के बच्चे

शिरीष खरे


यह बीते साल नंबवर के आखिरी हफ्ते की बात है जब ग्राम-अगासिया, विकासखण्ड-मेघनगर, जिला-झाबुआ, मध्यप्रदेश के अर्जुन ने एक सर्द रात में कुपोषण के सामने दम तोड़ दिया था। उस सर्द समय में इसी आदिवासी इलाके के दर्जनों बच्चे भी मारे गए थे। अर्जुन सबसे कम उम्र के उन बच्चों में से एक ऐसा नाम था जो अपने हमउम्र साथियों के साथ फाइल की सूची में क्रमानुसार दर्ज हो चुका था। इस तरह एक और नाम भूखे भारत की सांख्यिकी में एक बड़े गुणनफल के बीचोंबीच कहीं दूर गुम हो चुका था।

यकीनन वित्त मन्त्री प्रणव मुखर्जी ने अपना तीर चिड़िया की उस आंख पर ही साधा हुआ है जिसके निशाने पर पड़ते ही सकल घरेलू उत्पाद की दर 9% तक सरक सकती है। मगर कुपोषण और भूख का विकराल रुप देश के एक बड़े हिस्से को जिस ढंग से खा अरह है उससे भी आंख नहीं चुराई जा सकती है।

अक्टूबर 2009 से दिसम्बर 2009 के बीच, मध्यप्रदेश के इसी हिस्से के 4 गांवों से- भूख की चपेट में 70 आदमी मारे गए थे जिसमें 43 बच्चे थे। बीते दो सालों में अखबारों की कतरनों को ही जोड़ों तो मध्यप्रदेश के खण्डवा, सतना, रीवा, झाबुआ, शियोपुरी और सीधी जैसे जिलों से 456 आदमियों की मौतों का पता चलता है। मध्यप्रदेश में 5 साल के नीचे वाले बच्चों का मृत्यु-दर 1000/70 तक पहुंच गया है।

ऐसा ही हाल उड़ीसा और उत्तरप्रदेश का भी है। यहां से भी बाल-मृत्यु दर के अनुमान चौंकाते हैं। 5 साल के नीचे मरने वाले प्रति हजार बच्चों के मद्देनज़र उड़ीसा की हालत भी बहुत नाजुक है। इस तटीय प्रदेश के 29 जिलों में बाल-मृत्यु की दर कम से कम 1000/66 है। कंधमाल जिले की बाल-मृत्यु दर 1000/136 है जबकि मलकानगिरि और गजपति जिलों की बाल-मृत्यु दर 1000/127 है। उत्तरप्रदेश में बाल-मृत्यु दर है 1000/58। यहां के कौशांबी, भदौही, प्रतापगढ़, जौनपुर, इलाहाबाद और बनारस सबसे बुरी तरह से प्रभावित जिलों के तौर पर पहचाने गए हैं। आकड़े बताते है कि मध्यप्रदेश में 5 साल के नीचे के 60% बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। इसके बाद उड़ीसा में 5 साल के नीचे के 50: बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। कुल मिलाकर कुपोषण के मामले में भारत के मध्यप्रदेश और उड़ीसा सबसे बुरी तरह से प्रभावित प्रदेशों के तौर पर पहचाने गए हैं। मगर कर्नाटक (44%), गुजरात (47%) और महाराष्ट्र (51%) भी बहुत ज्यादा पीछे नज़र नहीं आते।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 (एनएफएचएस-3) बताता है कि देशभर में 6 साल से नीचे के 8 करोड़ बच्चे कुपोषण की स्थिति (फूले पेट, अविकसित कदकाठी, झरते बाल और फीके रंग) में जी रहे हैं। 1 साल के बच्चे का वजन औसतन 10 किलोग्राम होता है और उसके वजन में सलाना 2 किलोग्राम के हिसाब से बढ़ोतरी होना जरूरी है। मगर जब बच्चे का वजन सामान्य से कम होने लगता है तो यह कुपोषण की स्थिति में आ जाता है। तब उसमें बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। ऐसे बच्चों को अधिक से अधिक प्रोट्रीन, कार्बोहाइड्रेड, आइरन, विटामिन बी, कैल्शियम आदि मिलना चाहिए। यहां गरीब तबके के नवजात शिशुओं में उचित पालन-पोषण का अभाव और उनके लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की गिरती स्थितियों को कुपोषण के पीछे के प्रमुख कारणों में गिना जा रहा है। उनके आसपास के माहौल में साफ-सफाई और पीने का स्वच्छ पानी न होने से यह संकट और अधिक गहराता जा रहा है।

यह एक कटु सत्य है कि देश में एक सेकेण्ड के भीतर 5 साल के नीचे का एक बच्चा कुपोषण के कब्जे में आ जाता है। मगर इतना सबकुछ होने के बावजूद सरकारी तन्त्र बच्चों के लिए एक जवाबदेह स्वास्थ्य नीति और योजना बनाने के बारे में सोच तक नहीं रहा है।

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16.3.10

पुष्पा के साथ स्कूल जा रहे हैं

शिरीष खरे

``मैं रात को ये सोचके जल्दी सो जाती हूं कि सुबह जल्दी उठूंगी, और एक और दिन स्कूल जाने को मिलेगा।´´- ऐसा कहना है पुष्पा का, 10 साल की पुष्पा उड़ीसा के कुमियापल्ली गांव से है। हम पुष्पा के साथ स्कूल जा रहे हैं और वह बता रही है- ``हमारी मेडम हमें ऐसी ऐसी बातें बताती हैं, जो हमें पता तक नहीं होती हैं। वो हर रोज नई खिड़की खोलती है, और उसमें से बाहर देखने को बोलती है। हम रात को जो बातें सोचके सोते हैं, दिन को वो पूरा-पूरा बता देती है। हम सोचते है कि यह तो इतना आसान है तो..... ´´

कुछ महीने पहले तक, पुष्पा इतनी खुशी-खुशी स्कूल नहीं जाती थी, न तो उसके दिन इतने महकते थे, न ही रात इतनी चमकती थी। अपने गांव की बहुत सारी लड़कियों की तरह वह तो घर के ढ़ेर सारे कामों से बंधी थी। मां के साथ हाथ बंटाने से लेकर छोटी बहन को सम्भालने तक, कई बड़े सवालों को अपने नन्हे कंधों पर लदे फिरती थी। जहां तक उसके स्कूल का सवाल है तो वहां का हाल यह था कि भवन तो अपनी जगह सही सलामत था, मगर कक्षा में न तो बच्चे हाजिर रहते थे और न ही टीचर। इसलिए हर साल 50 में से 15-20 बच्चे स्कूल छोड़ देते थे। पुष्पा बता रही है- ``मुझे तो इतना तक समझ नहीं आता था कि वहां पढ़ाया क्या जा रहा है, तभी तो मैंने स्कूल जाना छोड़ दिया था।´´ दोपहर के भोजन की बात सुनते ही उसने कहा `बहुत गन्दा था`।

और आज न केवल पुष्पा हमारे साथ स्कूल जा रही है, बल्कि उसके कुछ अरमान भी हैं जैसे आगे बहुत पढ़ना, लिखना, सीखना, समझना, कुछ कर गुजरना इत्यादि। जो उसे पहली बार देखता है वो उसके भीतर आए बदलाव को नहीं जान पाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि वो उसे पहली बार जो देख रहा होता है, जबकि उसे क्या पता कि इससे पहले तक यह लड़की क्या थी, उसे तो यह लड़की भी कक्षा की दूसरी लड़कियों जैसी ही हिन्दी-अंग्रेजी पढ़ती नज़र आती है। पर जो उसे शुरू से जानता है वो पुष्पा की वैसी से ऐसी दुनिया में आए अन्तर को भी जानता है। वो जानता है कि पुष्पा आर्थिक-सामाजिक तौर पर कभी न टूटने वाले बंधनों को कैसे तोड़कर आई है। तभी तो पुष्पा की यह कहानी मानो तो एक बड़े अन्तर की कहानी लगती भी है, और न मानों तो नहीं भी लगती है।

पुष्पा को शुरू से जानने वालों के नज़रिए से उसके घर से स्कूल के बीच का अन्तर अब कुछ भी नहीं बचा है और ऐसा `क्राई´ के सहयोग से काम करने वाली संस्था `आधार´ की हौंसलाअफ्जाई से सम्भव हुआ है। गांव के स्कूल की पढ़ाई-लिखाई दुरूस्त हो- गांव का हर आदमी यही तो चाहता था। फिर भी सबकी अपनी-अपनी और रोज-रोज जीने की जद्दोजहद ने इस ओर कुछ करने से रोके रखा था। `आधार´ के कार्यकर्ताओं ने पूरे गांव भर को इस ओर एक तारीख और एक चौपाल पर लाकर मिला भर दिया था। जहां पूरा गांव इस बिन्दु पर एकमत हुआ था कि जब तक स्कूल में कोई टीचर नहीं आएगा तब तक बच्चों की पढ़ाई-लिखाई सुधरने वाली नहीं है। सभी ने फैसला लिया कि जिले के अधिकारियों के सामने जाकर नए टीचरों के लिए मांग की जाएगी। उन्होंने ऐसा किया भी, जिसके चलते गांव के स्कूल में एक पढ़ी-लिखी लड़की मेडम(टीचर) बनकर आई। यहीं से गांव की शिक्षा व्यवस्था के रात-दिन दुरूस्त होने लगे। `आधार´ द्वारा मेडम के जरिए बच्चों के लिए सहभागिता पर आधारित शिक्षण की कई विधियां प्रयोग में लायी गईं। इसके सामानान्तर ज्यादातर परिवारों को शिक्षा के मायने बताने और उनके बच्चों से मित्रता की गांठे पिरोने का क्रम भी चलता रहा। नतीजा यह रहा कि यहां से पढ़ने-पढ़ाने के ऐसे पाठ शुरू हुए कि कुमियापल्ली के इतिहास में अब एक `आदर्श स्कूल´ का अध्याय जुड़ चुका है।

आज पुष्पा के स्कूल में दो टीचर हैं। इसलिए आज पुष्पा की सभी सहेलियां भी स्कूल जा रही है, इसी साल 85 बच्चों को भी स्कूल में दाखिल किया गया है। देश में 14 साल तक के बच्चों के लिए पढ़ने का कानून बन चुका है और कुमियापल्ली गांव में 14 साल तक का एक भी बच्ची-बच्चा ऐसा नहीं है जो स्कूल के रास्ते पर न चलता हो। उन सबके लिए ये रास्ते ये पल इतने हसीन हैं कि उनमें पूरी एक सदी और जिन्दगी की नरम उम्मीदें छिपी हैं। उसके ऊपर ताजा खबर यह है कि अगले साल उसके स्कूल की दो नई कक्षाओं को बनाये जाने और सामुदायिक टीचर चुने जाने को मंजूरी मिल चुकी है।

पुष्पा रोजाना स्कूल जाने वाली उन लड़कियों में से एक है जो अपनी कक्षा में बढ़चढ़कर हिस्सा लेती हैं। जो अपने पाठ्यक्रम की किताबों से जहां बहुत प्यार करती है वहीं खेलकूद में भी गहरी दिलचस्पी रखती है। तभी तो उसने सरकार द्वारा आयोजित कई क्षेत्रीय खेल प्रतियोगिताओं में बहुत से पुरस्कार जीते हैं। हमेशा पढ़ते रहने की बात पर वह कहती है- ``मैं पढ़ते-पढ़ते जब बड़ी हो जाऊंगी तो मेडम जैसे ही छोटे बच्चों को पढ़ाऊंगी।´´ तो सुना आपने चौथी में पढ़ने वाली यह बच्ची बड़े गर्व से मेडम (टीचर) बनने का ऐलान कर रही है।
भले ही पुष्पा इतनी ऊंचाई पर नहीं पहुंची हो कि स्कूल की दीवारे उसे नज़रें उठाके देखें। मगर उसके समय से रात के अंधेरे ढ़ल चुके हैं और उसके परिवार ने भी यह जान लिया है कि स्कूल की दुनिया बहुत प्यारी और खुशियों से भरी होती है। इसीलिए तो इस रफ़्तार से पुष्पा स्कूल जा रही है कि उसके परिवार की आर्थिक तंगी में उसे रोक नहीं पा रही है। कुमियापल्ली गांव में बहुत सारे समूह हैं जो समुदाय में लिंग, जाति और वर्ग से जुड़ी बाधाओं को दूर करने के लिए सक्रिय हैं। जो पुष्पा जैसी बच्चियों के परिवार वालों की आर्थिक तंगी दूर करने के लिए उन्हें मनरेगा और पंचायत की दूसरी योजनाओं से जोड़ रहे हैं। तो कुछ इस तरह से यहां के समूह कुमियापल्ली के सभी बच्चों के लिए समान अवसर जुटाने में तत्पर नज़र आ रहे हैं।

सवाल यह नहीं है कि कुमियापल्ली गांव उड़ीसा के किस जिले के किस प्रखण्ड में है, यह तो भारत के अनगिनत गांवों की तरह अंधेरे में डूबा एक ऐसा गांव है जहां सूरज के गर्म होते ही कुछ खाने के लिए कुछ करने का सवाल गर्म होने लगता है। यहां से सबक यह भर है कि कुमियापल्ली गांव में जिस तरीके से समुदाय के नजरिए और विचारों को बदलकर पुष्पा जैसी लड़कियों को स्कूल भेजा जा रहा है, तो उसी तरह के तरीकों से देश की बाकी लड़कियों को भी स्कूल भेजा जा सकता है।

चलते-चलते
पुष्पा के साथ स्कूल जाने वाली कहानियां हमारी आंखों में उम्मीद के दीये जलाती हैं, मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उसके पड़ोस के गांव सहित देश की 50% से भी अधिक स्कूल पुष्पाओं के नाम तक स्कूलों में दर्ज नहीं हो सके हैं। इनमें से कइयों को 12 साल की उम्र तक आते-आते स्कूल से ड्रापआऊट हो जाना पड़ता है। 2001 की जनगणना के मुताबिक 49.46 करोड़ महिलाओं में से 22.91 करोड़ महिलाएं (53.67%) अनपढ़ हैं। एशिया में अपने देश की महिला साक्षरता दर सबसे कम है। असल बात तो यह है कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था में `लड़कियों की शिक्षा´ को खास स्थान दिए बगैर उनकी स्थितियों में सामान्य बदलाव लाना तक मुमकिन नहीं होगा।

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12.3.10

अंधेरी गलियों के रौशन सितारे

शिरीष खरे

शहरी झोपड़पट्टियों में रहने वाले बच्चों की जिंदगी को बोझिल, बेबस और हताश जानकर अक्सर उनसे मुंह फेर लिया जाता है. मगर एक सूझबूझ भरे प्रयास के चलते उसी दुनिया की कुछ लड़कियां आज न केवल सामाजिक अनदेखियों और तमाम बाधाओं से आगे निकल रही हैं, बल्कि खेलने-कूदने और पढ़ने-लिखने के रास्तों से उजाला भी दिखा रही हैं. चेन्नई से शक्ति और दिल्ली से अस्मिना वंचित समुदाय की ऐसी ही लड़कियां हैं जो इस बदलाव को सिर्फ महसूस ही नहीं कर रही हैं बल्कि दूसरों के लिए प्रेरणा भी बन रही हैं.



शक्ति बदलाव की

दक्षिण भारत के सबसे तेज बढ़ते शहर चेन्नई का एक चेहरा यहां की अनगिनत झोपड़पट्टियां भी हैं, जिन्हें बदनुमा दाग समझा जाता है. मगर तमाम बाधाओं के बीच यहां सपने देखने का हौसला भी है और उसे हकीकत में बदलने का जज्बा भी. शहर के उत्तरी हिस्से की ऐसी ही एक गुमनाम-सी झोपड़पट्टी में शक्ति नाम की लड़की इसी बदलाव की इबारत लिख रही है.

उसकी हमउम्र दूसरी लड़कियां जहां तीन साल की उम्र में नर्सरी स्कूल जाने लगी थीं, वहीं 6 साल की उम्र में शक्ति मछली बेचने की एक दुकान पर काम करने लगी थी. मछलियां छांटते और नंगे हाथों से बर्फ फोड़ते हुए उसने जाना कि उसके लिए तमाम खेल सपने की तरह हैं फिर वह फुटबाल ही क्यों न हो जो कि उसे बेहद पसंद था.


छह घंटे के काम के बदले उसे रोजाना महज 15 रु. मिलते थे. काम से छुट्टी मिलते ही वह घर की तरफ दौड़ पड़ती और स्कूल जाने को मचल पड़ती. इसकी एक वजह यह भी थी कि उसे वहां के मैदान पर फुटबाल खेलने को जो मिलता था. वैसे तो उसके जैसी कुछ और लड़कियां भी फुटबाल खेलती थीं, मगर गरीबी उसे स्कूल की दूसरी लड़कियों से अलग कर देती थी. इसी गरीबी के चलते एक रोज उसे पढ़ाई, फुटबाल और दोस्तों को छोड़ना पड़ा था. इसके बाद वह 12 घंटे काम करके रोजाना 30 रू. कमाने लगी. शक्ति के पिता को रोज-रोज काम नहीं मिलता था, लिहाजा घर चलाने के लिए उसकी मां को दूसरों के घरों में काम करना पड़ता था.


बदली ज़िंदगी
शक्ति से फुटबाल का खेल क्या छूटा उसकी जिंदगी से खुशियां ही गायब हो गईं. मानो उसका बचपन ही उजड़ गया. मगर उसके चेहरे पर खुशियां तब लौट आई जब वह एससीएसटीईडीएस यानी `स्लम चिल्ड्रन स्पोर्ट्स टेलेंट एजुकेशन डेवल्पमेंट सोसाइटी´ से जुड़ गई.

एससीएसटीईडीएस एक सामुदायिक संस्था है जो वहां की झोपड़पट्टियों के बच्चों को इकट्ठा करती है और नगर-निगम के मैदान पर फुटबाल खेलने के लिए प्रेरित करती है. दरअसल यह बच्चों के व्यवहार को जानने का पहला कदम होता है. यहीं से स्कूल छोड़ने वाले बच्चों के बारे में भी पता चलता है और उन्हें स्कूल से जोड़ा जाता है. शक्ति भी कुछ इसी तरीके से जुड़ी और यहां से उसे एक स्टॉर फुटबाल खिलाड़ी के तौर पर जाने जाना लगा.

एससीएसटीईडीएस के थंगराज कहते हैं "जब शक्ति स्कूल जाती थी तो उसके टीचर उसे मछुआरा समुदाय की होने की वजह से अक्सर अपमानित करते थे." संस्था ने उसे हौसला दिया और शक्ति के माता-पिता को इस बात के लिए राजी किया कि वह अपनी बेटी को एक बार फिर से नगर-निगम के स्कूल में भेजे.

थंगराज याद करते हैं, "इस बार शक्ति के माता-पिता ने उसकी पढ़ाई की कमियों को देखा और उसके आने वाले कल में संभावनाएं तलाशी. अब वह अपनी बेटी की पढ़ाई फिर से शुरू करवाने को उत्सुक थे." इसी विश्वास के साथ शक्ति के बड़े और छोटे भाईयों को भी स्कूल में भर्ती कराया गया. उनके भीतर पढ़ाई से लेकर खेल जैसी तमाम प्रतिभाओं का मूल्यांकन किया गया और उसके मुताबिक सबको मौका दिया गया.


शानदार गोल
एससीएसटीईडीएस ने शक्ति की मजबूरियों और जरूरतों को ध्यान में रखकर कदम बढ़ाया. मसलन, स्कूल जाने के लिए बस का किराया, यूनीफार्म, दिन का खाना और फुटबाल खेलने से जुड़ी जरूरतें. शक्ति की खेल प्रतिभा को देखकर एससीएसटीईडीएस ने उसके नियमित तौर पर फुटबाल के अभ्यास की व्यवस्था की. धीरे-धीरे उसके भीतर छिपी खेल प्रतिभा उभरकर सामने आने लगी और उसके भीतर से स्कूल को लेकर पैदा हुए सारे डर भी दूर हो गए. कुछ टीचर तो शक्ति के प्रशंसक और सहयोगी तक बन गए.

उसे नियमित प्रशिक्षण मिला जिसके चलते शक्ति ने अंडर-14 की राज्य स्तरीय फुटबाल टीम में अपनी जगह बनाई. बीते 4 सालों में उसने जिला और राज्य स्तर के कई मैच खेले हैं.

अब वह 18 साल की हो चुकी है. पांच साल पहले कालेज जाना उसके लिए सपना ही था जो अब हकीकत में बदल रहा है. उसका बड़ा भाई अब नौकरी करता है और उसने अपनी छोटी बहन को कालेज भेजने का फैसला लिया है. शक्ति अब भारत की महिला फुटबाल टीम में शामिल होकर अंतरराष्ट्रीय स्तर के मैच खेलना चाहती है. वाकई उसने अपनी जिदंगी में मिले मौकों को शानदार गोल में बदला है.
 
 
 
अस्मिना ने ऐसा सोचा न था
 
दो साल की छोटी-सी उम्र में अस्मिना को अपने माता-पिता के साथ बिहार के पूर्णिया जिले से पलायन करना पड़ा था. उसका परिवार काम की तलाश में दिल्ली आया और यहां-वहां की जद्दोजहद के बाद रंगपुरी कबाड़ी बस्ती में बस गया. यह जगह कूड़ा बीनने वाले बच्चों की झोपड़पट्टी के तौर पर जानी जाती है. अस्मिना भी अपने पिता के साथ इसी धंधे में हाथ बटाते हुए बड़ी होने लगी. पता ही नहीं चला कि कैसे उसके दिन गलियों और नुक्कड़ों पर पड़े घूरे के ढ़ेरों को साफ करते हुए बीत रहे हैं. इन ढेरों से वह प्लास्टिक और रद्दी की ऐसी चीजें बीनती जिन्हें फिर से तैयार किया जा सके.


गरीबी की वजह से अस्मिना सहित उसके पांचों भाई-बहन कूड़ा बीनने का काम करने को मजबूर थे. हर सुबह काम पर जाते वक्त वह देखती कि उसकी उम्र के दूसरे बच्चे उजले कपड़े पहनकर स्कूल जाते हैं. उसके लिए स्कूल की बात मानो किसी और दुनिया की बात थी, एक ऐसी दुनिया जो कचरे से भरी उसकी मलिन दुनिया से बिल्कुल जुदा थी. उसकी दुनिया में स्लेट पेंसिल की जगह कांच के टुकड़े और जंग लगी धातु जैसी चीजें थीं जिससे वह कभी-कभी जख्मी भी हो जाती थी. अस्मिना जैसे बहुत से बच्चे ऐसे ही कूड़ों की वजह से त्वचा और आंख से जुड़ी कई गंभीर संक्रमित बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं. उनके आसपास अपनी सुरक्षा के मुनासिब बंदोबस्त की बात तो छोड़िए उनके पैरों में जूते तक नहीं होते.

एक सामुदायिक संस्था बाल विकास धारा ने जब अस्मिना और उसके दोस्तों के लिए काम शुरू किया तो सबसे पहले यहां गैर औपचारिक केंद्र खोला. यह ऐसे बच्चों को स्कूल से जोड़ने वाला पुल साबित हुआ जो गरीबी और मजबूरी के चलते स्कूल नहीं जा पाते. इससे जुड़ने वाले बच्चों को पहली बार कहने-सुनने-समझने और सीखने को मिला. अस्मिना को यहां एक सुरक्षित और सुविधायुक्त दुनिया नजर आई.

इतना-सा ख्वाब है
दरअसल पढ़ाई की दुनिया से जुड़ने के बाद अब उसके पास आगे बढ़ने के लिए खुद को समर्थ बनाने का रास्ता था. उसकी छोटी बहन भी उसके साथ पढ़ने आने लगी. संस्था के सभी साथियों की मदद से अस्मिना और उसके बहुत सारे दोस्तों को स्थानीय नगर-निगम के स्कूल में भर्ती करवाया गया. गौर करने वाली बात यह है कि उसकी उम्र और लगन को देखते हुए उसे दूसरी कक्षा में दाखिला दिलवाया गया.

अस्मिना जैसी बहुत-सी लड़कियों में पढ़ने-लिखने की चाहत को लगातार बढ़ावा देने के लिए बाल विकास धारा ने भरपूर साथ दिया है. यहां पर बच्चों में बदलाव लाने के लिए उनकी पसंद- नापसंद, ताकत-कमजोरियों और सहूलियतों के बारे में जानकारियां जुटाई जाती हैं. बच्चे, उनके माता-पिता और टीचर आपस में बैठकर उनकी उलझनों को सुलझाते हैं और फिर बच्चों को नगर-निगम के स्कूल में भर्ती करवाने की मुहिम छेड़ी जाती है.

आज अस्मिना पांचवी कक्षा में है और पढ़ने में उसकी खासी दिलचस्पी है. बदलाव का पहाड़ा पढ़ते-पढ़ते अब वह मोटी-मोटी किताबों तक आ पहुंची है. उसका परिवार यह देखकर बहुत खुश होता है कि वह कूड़ा बीनने के बजाय स्कूल में पढ़ने जाती है. अस्मिना अब कहती है "मैं जो कुछ पढ़ रही हूं वह दूसरों को भी पढ़ाऊंगी." उसकी ऐसी बातों से परिवार वालों को लगता है कि वह टीचर बनना चाहती है. वाकई वह जो भी बनना चाहती हो मगर इतना तो तय है कि अस्मिना अब एक ऐसी दुनिया में दाखिल है, जहां सपने देखना मुमकिन हो गया है.


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8.3.10

उनकी आधुनिकता को मैं धिक्कारती हूं

तसलीमा नसरीन

पश्चिमी नारीवाद तो क्या प्राच्य के नारीवाद की भी मेरी खास समझ नहीं थी, लेकिन फिर भी बचपन से ही परिवार और समाज के अनेक उपदेशों और बंधनों को मैंने मानने से इनकार कर दिया या उन पर सवाल किए। मुझे जब बाहर मैदान में खेलने नहीं दिया जाता और मेरे भाइयों को खेलने दिया जाता था। ऋतुधर्म के समय मुझे जब अपवित्र बोला जाता। मुझसे कहा जाता कि मैं बड़ी हो गई हूं और बाहर निकलते समय काले रंग का बुरका पहन कर निकलूं। ऐसे हर मौके पर मैंने प्रश्न किए हैं।

रास्तों पर चलते समय अनजान लड़के जब मुङो अपशब्द कहते, दुपट्टे को खींच लेते या छेड़खानी की कोशिश करते तो मैंने प्रतिवाद किया है। जब मैंने देखा कि घर-घर में पति अपनी पत्नियों को पीट रहे हैं, पुत्री के जन्म के बाद स्त्री आशंकित हो रही है, मुझसे यह सब बर्दाश्त नहीं होता था। बलात्कार पीड़ित लड़कियों के लज्जित मुख को देख कर मैं वेदना कातर हुई हूं। वेश्या बनाने के लिए लड़कियों को एक शहर से दूसरे शहर, एक देश से दूसरे देश में बेचने की खबर सुनकर रोई हूं मैं। सिर्फ दो वक्त की रोटी के लिए वेश्यालयों में लड़कियों को यौन-उत्पीड़न सहने के लिए बाध्य होना पड़ता है।

पुरुष चार-चार लड़कियों से विवाह कर उसे घर की नौकर बना रहे हैं। लड़की के रूप में जन्म लेने के कारण उत्तराधिकार के अधिकार से उसे वंचित किया जाता रहा है। मैं इसे नहीं मान सकी हूं। जब मैं देखती कि घर से निकलते ही लड़कियों को घर में घुसने की हिदायत दी जाती, पर पुरुष से प्रेम करने के अपराध में उसे जला कर मार दिया जाता, घर के आंगन में गड्ढा खोदकर उसे उस गड्ढे में डाल दिया जाता और उस पर पत्थर मारा जाता, तब मैं चीखती-चिल्लाती थी। किसी भी तर्क से, किसी भी बुद्धि से लड़कियों के ऊपर पुरुषों, परिवारों, समाज और राष्ट्र के अत्याचारों को मैं नहीं मान सकी हूं। उस समय मेरी इस वेदना, रुलाई, अस्वीकार, न मानना, स्तब्ध होना, न सोना और करुण चीत्कार को किसी ने नहीं देखा। देखा तब, जब मैंने लिखना शुरू किया।

मैं जिस समाज में बड़ी हुई हूं, वहां अनेक लोगों के मन में यह प्रश्न उठता था पर वे पुरुषवादियों के आगे नतमस्तक थे, परंतु मैं बाध्य नहीं हुई। मुझे किसी ने अबाध्य होना नहीं सिखाया। नारी अधिकारों की मांग के लिए बेटी फ्रिडान या रबीन मरम्यान पढ़ने की आवश्यकता नहीं होती है। अपनी चेतना ही काफी होती है। पूर्व की नारियों ने बंद दरवाजों को खोलकर जब भी बाहर निकलने की कोशिश की है तब पूर्व के पुरुषवादी विचारवालों ने उन्हें दोषी ठहराया है और कहा है कि वे पश्चिम के नारीवाद का अनुकरण कर रही हैं।

नारीवाद पश्चिम की संपत्ति नहीं है। अत्याचारित, असम्मानित, अवहेलित नारियों के संगठित होकर नारी के अधिकारों के लिए जीवन की बाजी लगाकर अदम्य संग्राम करने का नाम नारीवाद है। पश्चिमी लड़कियों के जीवन के बारे में जानने पर यह पता चला कि उन्हें जीवन में कम यातना नहीं सहनी पड़ी। पूर्व की लड़कियों की तरह पश्चिम की लड़कियां भी शताब्दियों तक पुरुष, धर्म, नारी विरोधी संस्कारों की शिकार हुई हैं। धर्मान्ध लोगों ने उन्हें जीवित जला कर मार डाला। नारी विरोधी संस्कारों ने उनके शरीर को दासता की जंजीरों में जकड़ दिया, उनको यौन वासना की कृतदासी बनाकर रख दिया।

लड़की होने का अपराध सभी लड़कियों को एक समान ही ङोलना पड़ता है, चाहे वह पूर्व की हो पश्चिम की, उत्तर की या दक्षिण की हो। पश्चिम की लड़कियों ने एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए आंदोलन शुरू किया था, उन्हें उस आंदोलन को एक लम्बे समय तक जारी रखना पड़ा था। वोट देने के अधिकार की मांग करने पर उन्हें अपमानित होना पड़ा है। पुरुषों ने उन पर थूका है, गाली दी है, तब उन्होंने बार-बार एक ही बात दोहराई है कि ‘इस वैषम्य को दूर कर जैसे भी हो, हमें हमारा अधिकार देना होगा’, लेकिन आंदोलन के बाद जो कुछ उन्हें मिला है वह पर्याप्त नहीं है।

गर्भपात के अधिकार के लिए लड़कियां आज भी लड़ रही हैं, बलात्कार के विरुद्ध वे आज भी प्रतिवाद कर रही हैं, समान मजदूरी की मांग कर रही हैं, और संसद में महिलाओं की संख्या बढ़ाने को लेकर आज भी आंदोलनरत हैं। आश्रय केन्द्रों में आज भी उत्पीड़ित लड़कियों की भीड़ लगी है। हां पश्चिम की गोरी और सुनहरे बालों वाली लड़कियों को भी प्रताड़ित होना पड़ता है और आज भी अभाव के कारण उन्हें देह बेचने के लिए रास्ते पर आना पड़ता है। समान अधिकार या मानवाधिकार का कोई पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण नहीं होता। लड़कियां सब देशों में, सब काल में उत्पीड़ित हुई हैं।

यह बात प्राय: उठती है कि मैंने धार्मिक संकीर्णता पर चोट की है। धर्म के साथ नारीवाद का विरोध बहुत पुराना है, नारी के अधिकार के संबंध में जिसको थोड़ी जानकारी है, वह भी यह जानता है कि धर्म मूल रूप से पुरुषवादी है। धर्म में वर्ण का उपयोग करके पुरुषसत्ता को बचाए रखने का षड्यंत्र बहुत पुराना है। बर्बरता के विरोध में हमेशा सभी सांस्कृतिक लोगों ने प्रतिवाद किया है। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर और राम मोहन राय को भी हिन्दू धर्म की अनुभूति पर आक्रमण करना पड़ा था।

कुछ कूपमंडूक लोगों का कहना है कि मैंने मुस्लिम धर्म को आघात पहुंचाया है। वे कहते हैं मेरा बयान पश्चिम का बयान है और पश्चिम की आंखों से प्राच्य को देखने का बयान है। सहिष्णुता के नाम पर मुस्लिम मौलवियों को इस अर्थहीन, तर्कहीन दावे को तथाकथित भारतीय संदर्भ में ‘सेकुलर’ नामधारी प्राय: उच्चारण करते हैं। उन लड़कियों की बातों को ‘पाश्चात्य का बयान’ कह कर जिन लोगों ने नीचा दिखाया है, उनकी आधुनिकता को मैं धिक्कारती हूं।

मैंने क्रिश्चियन, यहूदी धर्म तथा अन्य और भी नारी विरोधी धर्मो की निन्दा की है, लेकिन उसके बाद भी किसी ने इसे लेकर मेरे ऊपर किसी प्रकार का आरोप नहीं लगाया। गैर मुस्लिम धार्मिक अनुभूति पर आक्रमण करने के बावजूद किसी ने मेरी मृत्यु का फतवा जारी नहीं किया। मैंने मानवतावाद को अपने विश्वास के ऊपर चुन लिया है। हमें इस्लाम धर्म के सुधारवादी के रूप में देखा जाता है, लेकिन ऐसी भूल करना उचित नहीं है। मैं रिफार्मर नहीं हूं । मैं किसी समुदाय की नहीं हूं। मेरा समुदाय धर्ममुक्त मानवतावाद का है।

(लेखिका मशहूर कथाकार हैं। लेख में व्यक्त विचार लेखिका के निजी विचार हैं।)

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हिंदुस्तान से साभार।
http://epaper.hindustandainik.com/ArticleImage.aspx?article=08_03_2010_010_015&mode=1

6.3.10

सरकारी कागजों में स्लम का अकाल

शिरीष खरे, मुंबई से

अगर कोई पूछे कि मुंबई महानगर में झोपड़ बस्तियों को हटाने की दिशा में जो काम हो रहा है, उसका क्या असर पड़ा है तो इस सवाल का एक जवाब ये भी हो सकता है- आने वाले दिनों में झोपड़ बस्तियों की संख्या बढ़ सकती है.

मुंबई महानगर का कानून है कि जो बस्ती लोगों के रहने लायक नहीं है, उसे स्लम घोषित किया जाए और वहां बस्ती सुधार की योजनाओं को अपनाया जाए. मगर प्रशासन द्वारा बस्तियों को तोड़ने और हटाने का काम तो जोर-शोर से किया जा रहा है लेकिन इस कार्रवाई से पहले महानगर की हज़ारों बस्तियों को स्लम घोषित करने से सरकार लगातार बच रही है. ज़ाहिर है, ऐसे में सरकार बड़ी आराम से सुधार कार्रवाई से बच जा रही है. लेकिन बुनियादी सहूलियतों के अभाव में जीने वाली बस्तियों की हालत और बिगड़ती जा रही है और प्रशासन की यह अनदेखी जहां कई नई बस्तियों को स्लम बनाने की तरफ ढ़केल रही है, वहीं कुछ नए सवाल भी पैदा कर रही है.

महाराष्ट्र स्लम एरिया एक्ट, 1971 के कलम 4 के आधार पर मुंबई महानगर की बस्तियों को स्लम घोषित किया जाता रहा है. स्लम घोषित किए जाने के मापदण्ड बस्ती में रहने लायक हालतों पर निर्भर करते हैं. जैसे, घरों की सघनता, पानी, बिजली, रास्ता, नालियों और खुली आवोहवा का हाल कैसा है. लेकिन ये सारे मापदंड किनारे करके बस्तियों को तो़ड़ने की कार्रवाई जारी है.

यहां के मंडाला, मानखुर्द, गोवाण्डी, चेम्बूर, घाटकोपर, मुलुंद, विक्रोली, कुर्ला, मालवानी और अंबुजवाड़ी जैसे इलाकों की तकरीबन 3,000 स्लम बस्तियों की आबादी बेहाल है. लेकिन बस्ती वालों की लगातार मांग के बावजूद उन्हें स्लम घोषित नहीं किया जा रहा है.


कांक्रीट के जंगल में जंगल राज
महाराष्ट्र स्लम एरिया एक्ट, 1971 के कलम 5 ए के आधार पर जिन बस्तियों को स्लम घोषित किया जा चुका है, उनमें पीने का पानी, बिजली, गटर, शौचालय, स्कूल, अस्पताल, समाज कल्याण केन्द्र और अच्छे रास्तों की व्यवस्था होना अनिवार्य है. यहां गौर करने लायक एक बात यह भी है कि कानून में बुनियादी सहूलियतों को मुहैया कराने के लिए कोई कट-आफ-डेट का जिक्र नहीं मिलता है. मगर इन दिनों प्रशासन के बड़े अधिकरियों तक की जुबानों पर कट-आफ-डेट की ही चर्चा चलती है. जबकि यह अमानवीय भी है और गैरकानूनी भी.

इसके अलावा इसी कानून में यह भी दर्ज है कि बस्ती सुधार योजनाओं को रहवासियों की सहभागिता से लागू किया जाए. मगर ग्रेटर मुंबई, भिवण्डी, उल्लासनगर, विरार और कुलगांव-बदलापुर जैसे इलाकों की तकरीबन 15,00 स्लम घोषित बस्तियों के लाखों रहवासियों को ऐसी योजनाओं से बेदखल रखा जा रहा है.

‘घर बचाओ घर बनाओ आंदोलन’ के सिम्प्रीत सिंह कहते हैं कि ‘‘खानापूर्ति के लिए हर साल केवल 15-20 बस्तियों को स्लम घोषित कर दिया जाता है. जो यहां के झोपड़पट्टी परिदृश्य को देखते हुए न के बराबर है.’’

प्रशासन ऐसा क्यों कर रही है, के सवाल पर सिम्प्रीत सिंह कहते हैं ‘‘एक तो विस्थापन की हालत में पुनर्वास से बचने के लिए. दूसरा इसलिए क्योंकि अगर बड़ी तादाद में बस्तियों को स्लम घोषित किया जाता है, तो कानूनों में मौजूद बुनियादी सहूलियतों को भी तो उसी अनुपात में देना पड़ेगा. यहां के भारी-भरकम मंत्रालय, उनके विभाग, उनके बड़े-बड़े अधिकारी इतनी जिम्मेदारी लेना नहीं चाहते. फिर यह भी है कि प्रशासन अगर बस्तियों को स्लम घोषित करते हुए, जहां-तहां बस्ती सुधारों के कामों को शुरू करती भी है, तो बस्तियों में बुनियादी सहूलियतों को पहुंचाने वाले बिल्डरों का धंधा चौपट हो जाएगा. इसलिए यहां से बिल्डरों और भष्ट्र अधिकारियों के बीच गठजोड़ की आशंकाएं भी पनपती हैं.’’

2001 के आंकड़ों के मुताबिक मुंबई महानगर की कुल आबादी 1 करोड़ 78 लाख है, जिसके 20 इलाकों की झोपड़पट्टियों में 67 लाख 21 हजार से भी ज्यादा लोग रहते हैं, जो कुल आबादी का 37.96% हिस्सा है. इसी तरह यहां घरेलू मजदूरों की तादाद 66 लाख 16 हजार हैं, जो कुल आबादी का 37.07% हिस्सा है. कुल घरेलू मजदूरों में से यहां 3 लाख 76 हजार सीमान्त मजदूर हैं. इन तथ्यों की बुनियाद पर कहा जा सकता है कि मुंबई महानगर की इतनी बड़ी आबादी (37.96%) और इतने सारे घरेलू मजदूरों (37.07%) को आवास देने के लिए कम से कम 25% जगह का हक तो होना ही चाहिए.

यह गौरतलब है कि मुंबई जैसे महानगर का वजूद उन मजदूरों के कंधों पर है जिनके चलते राज्य सरकार को हर साल 40,000 करोड़ रूपए का टेक्स मिलता है. इसके बदले लाखों मजदूरों के पास घर, घर के लिए थोड़ी-सी जमीन, थोड़ा-सा दानापानी, थोड़ी-सी रौशनी भी नहीं है. जिनके पास है, उनसे भी इस हक़ से वंचित किया जा रहा है.

 
कानून दर कानून बस कानून
महाराष्ट्र लेण्ड रेवेन्यू कोड, 1966 के कलम 51 के आधार पर अतिक्रमण को नियमित किए जाने का प्रावधान है. एक तरफ इंदिरा नगर, जनता नगर, अन्नाभाऊ साठे नगर और रफीकनगर जैसी बहुत सी पुरानी बस्तियां हैं, जहां के रहवासियों ने यह इच्छा जाहिर की है कि उनके घर और बस्तियों को नियमित किया जाए. इसे लेकर जो भी मूल्यांकन तय किया जाएगा, बस्ती वाले उसे चुकाने को भी तैयार है. इसके बावजूद प्रशासन द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है. मगर कई रसूख और पैसे वालों की ईमारतों के अतिक्रमण को नियमित किया गया है और कल तक सरकारी नोटिसों के निशाने पर रही ये ईमारतें अब वैध हैं.

2007 को ‘घर बचाओ घर बनाओ आंदोलन’ के बैनर तले, मंडाला के रहवासियों ने जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन के तहत बस्ती विकास का प्रस्ताव महाराष्ट्र प्रशासन को सौंपा था. इसे लेकर म्हाडा(महाराष्ट्र हाऊसिंग एण्ड एरिया डेव्लपमेंट एथोरिटी), मंत्रालय और बृहन्मुंबई महानगर पालिका के बड़े अधिकारियों से कई बार बातचीत भी हुई है. मगर आज तक इस प्रस्ताव को न तो मंजूरी मिली है और न ही प्रशासनिक रवैया ही साफ हो पाया है.

इसी साल‘घर बचाओ घर बनाओ आंदोलन’ के बैनर तले, बांद्रा कलेक्टर के कमरे में कलेक्टर के साथ बैठक की गई थी. इसमें कलेक्ट्रर विश्वास पाटिल ने यह आदेश दिया था कि अंबुजवाड़ी के जो रहवासी 1 जनवरी, 2000 से पहले रहते हैं, उन्हें घर प्लाट देने के लिए उनकी पहचान की जांच जल्दी ही पूरी की जाएगी, जो अभी तक पूरी नहीं हो सकी है. दूसरी तरफ नई बसाहट के रहवासी आज भी पानी, शौचालय और बिजली के लिए तरस रहे हैं. विरोध करने पर उन्हे मालवणी पुलिस स्टेशन द्वारा जेल में डाल दिया जाता है.

2009 को ‘घर बचाओ घर बनाओ आंदोलन’ के बैनर तले, महाराष्ट्र लेण्ड रेवेन्यू कोड, 1966 के कलम 29 के आधार पर, जय अम्बेनगर जैसी कई बस्तियों में पारधी जमात के रहवासियों ने बांद्रा कलेक्टर को एक पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने जमीन के प्रावधान की मांग की और यह भी गुहार लगाई कि जब तक ऐसा नहीं होता तब तक उनकी बस्तियों को न तोड़ा जाए. दरअसल, इस बंजारा जमात को अलग-अलग जगह से बार-बार बेदखल किया जाता रहा है और अब वे इस तरह की जहालत से बचना चाहते हैं.

भ्रष्टन की जय हो
फिलहाल झुग्गी बस्ती पुनर्वास प्राधिकरण में ‘पात्र’ को ‘अपात्र’ और ‘अपात्र’ को ‘पात्र’ ठहरा कर भष्ट्राचार का खुला खेल चल रहा है. ऐसा बहुत सारे मामलों से उजागर हुआ है कि ‘पात्र’ की सहमति लिए बगैर झूठे सहमति पत्र भरे गए हैं. चेंबूर की अमीर बाग, अंधेरी की विठ्ठलवाड़ी और गोलीबार तो ऐसे भ्रष्टाचार के मामलों से भरे पड़े हैं. कई मामलों में तो अधिकारियों, राजनेताओं की दिलचस्पी और हस्तक्षेप भी जांच के विषय हो सकते हैं.

महानगर में पुनर्वास दिए बगैर कोई भी विस्थापित नहीं हो सकता- ऐसा महाराष्ट्र स्लम एरिया एक्ट, 1971 से लेकर राष्ट्रीय आवास नीति और महाराष्ट्र आवास नीति, 2007 तक में कहा गया है. इसके बावजूद जहां नेताजी नगर, म्हात्रे नगर और जय अम्बे नगर जैसी बस्तियों को तोड़ा गया है, वहीं अन्नाभाऊ साठे नगर को तोड़े जाने का नोटिस जारी हुआ है. उधर अंबुजवाड़ी बस्ती के रहवासियों को नोटिस दिए बगैर ही सब कुछ ध्वस्त कर दिये जाने का डर दिखाया गया है.


सपनों के शहर में घर के सपने
मुंबई में गरीबों के लिए आवास उनकी हैसियत से बहुत दूर हो चुके हैं. मुंबई में किराए के घरों की मांग और पूर्ति का अंतर ही इतना चौड़ा होता जा रहा है कि हर साल 84,000 अतिरिक्त घरों की मांग होती हैं, जिसकी पूर्ति के लिए खासतौर से बिल्डरों की फौज तैनात है, जो जैसे-तैसे हर साल केवल 55,000 घरों की व्यवस्था ही कर पाते हैं. इसके चलते यहां जमीनों और जमीनों से आसमान छूते आशियानों की कीमतों को छूना मुश्किल होता जा रहा है.

बांद्रा, जुहू, बर्ली, सांताक्रूज, खार जैसे इलाकों का हाल यह है कि एक फ्लेट कम से कम 4-10 वर्ग प्रति फीट प्रति महीने के भाड़े पर मिलता है, जो उच्च-मध्यम वर्ग के लिए भी किसी सपने से कम नही है. मगर बिल्डरों ने उच्च-मध्यम वर्ग के सपनों का पूरा ख्याल रखा है, उनके लिए नवी मुंबई, खाण्डेश्वर, कोपोली, पनवेल और मीरा रोड़ जैसे इलाकों में 25 से 45 लाख तक के घरों की व्यवस्था की है, जिनकी कीमत कमरों की संख्या और सहूलियतों पर निर्भर है.

नियमानुसार रोज नई-नई बसने वाली बिल्डिंगों और ईमारतों के आसपास गरीबों के लिए आवास की जगह नहीं छोड़ी जा रही है. बिल्डरों द्वारा महानगर की शेष जगहों को भी मौटे तौर पर दो तरीके से हथियाया जा रहा है, एक तो अनगिनत विशालकाय अपार्टमेंट खड़े करके, दूसरा इनके आसपास कई सहूलियतों को उपलब्ध कराने का कारोबार करके, जैसे: बच्चों के लिए भव्य गार्डन, मंनोरंजन पार्क, कार पार्किंग, प्रभावशाली द्वार, बहुखण्डीय सिनेमाहाल इत्यादि. इन सबसे यहां की कुल जगह पर जहां एक मामूली सी आबादी के लिए एशोआराम का पूरा बंदोबस्त हो रहा है, वहीं बड़ी आबादी के बीच रहने की जगह का घनघोर संकट भी गहराता जा रहा है.

अब उस पर आफत ये है कि जो पहले से बसे हुए हैं, उन्हें भी हटाया जा रहा है. महानगर के कारोबारी हितों के लिए और ज्यादा जगह हथियाने के चक्कर में गरीबों के इलाकों को बार-बार तोड़ा जा रहा है. फिल्म और गानों तक को लेकर पूरे महाराष्ट्र को सर पर उठा लेने वाले राजनीतिज्ञों की लिस्ट में गरीबों के बेघर होने का मामला दूर-दूर तक नहीं है. हां, इन गरीबों के बल पर राजनीति की रोटी सेंकने वाले कानून की दुहाई देते ज़रुर नज़र आते हैं. ये और बात है कि इस क़ानून की परवाह किसी को नहीं है. न प्रशासन को और न ही सरकार को.

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3.3.10

बजट-2010 : प्राथमिक शिक्षा पर अपेक्षा से बहुत कम आवंटन

शिरीष खरे

बजट-2010 में प्राथमिक शिक्षा पर अपेक्षा से बहुत कम आंवटित हुआ है। अपेक्षा यह की जा रही थी कि इस बार कम से कम 71,000 करोड़ रूपए आंवटित होंगे, मगर प्राथमिक शिक्षा में 26,800 करोड़ रूपए से 31,300 करोड़ रूपए की ही बढ़ोतरी हुई है। चाईल्ड राईटस एण्ड यू द्वारा देश के सभी बच्चों के लिए निशुल्क और बेहतर गुणवत्ता वाली शिक्षा की मांग की जाती रही है, संस्था यह मानती है कि अभी तक बच्चों के लिए जो धन खर्च किया जाता रहा है वह जरूरत के हिसाब से बहुत कम है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि संस्था का 6700 समुदायों में काम करने का तर्जुबा यह कहता है कि देश में गरीबी का आंकलन वास्तविकता से बहुत कम हुआ है। बहुत से बच्चे ऐसे हैं जो गरीबी रेखा के ऊपर होते हुए भी हाशिए पर हैं। यानि एक तो हम गरीबी को वास्तविकता से बहुत कम आंक रहे हैं और उसके ऊपर आंकी गई गरीबी के हिसाब से भी धन खर्च नहीं कर रहे हैं, ऐसे में स्थितियां सुधरने की बजाय बिगड़ेगी ही।

हालांकि चाईल्ड राईटस एण्ड यू ने बजट 2010 में महिला और बाल विकास की योजनाओं के आंवटन में बढ़ोतरी करने और 1,000 करोड़ रूपए के राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा कोष बनाए जाने का स्वागत किया है। मगर संस्था के मुताबिक सरकार को बच्चों की गरीबी दूर करने के लिए और अधिक निवेश करने की जरूरत थी। ऐसा इसलिए क्योंकि सरकारी आकड़ों के लिहाज से देश की 37.2% आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। जो दर्शाती है कि देश में गरीबी बहुत तेजी से बढ़ रही है। यानि जितना हम सोचते हैं उससे कहीं ज्यादा बच्चे गरीबी में जीने को मजबूर हैं। चाईल्ड राईटस एण्ड यू की सीईओ पूजा मारवाह यह मानती है कि ``बच्चों की गरीबी उनका आज ही खराब नहीं करती है बल्कि ऐसे बच्चे बड़े होकर भी वंचित के वंचित रह जाते हैं।´´ इसलिए सरकार को अपने बजट में बच्चों की बढ़ती संख्या को ध्यान में रखते हुए उनके खर्च में उचित बढ़ोतरी करनी चाहिए थी। मगर भारत सरकार जीडीपी का तकरीबन 3% शिक्षा और तकरीबन 1% स्वास्थ्य पर खर्च करती है, जबकि विकसित देश जैसे अमेरिका, बिट्रेन और फ्रांस अपने राष्ट्रीय बजट का 6-7% सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च करते हैं।

हमारे देश में शिक्षा के अधिकार का कानून है जो देश के सारे बच्चों को निशुल्क और बेहतर गुणवत्ता वाली शिक्षा पहुंचाने के मकसद से तैयार हुआ है। मगर सार्वजतिक शिक्षा की बिगड़ती स्थितियों को देखते हुए, बहुत से गरीब बच्चे स्कूल से दूर हैं। ऐसे में अगर बजट में शिक्षा पर अपेक्षा से बहुत कम खर्च किया जाएगा तो शिक्षा के अधिकार का कानून बेअसर ही रहेगा। आज देश के बच्चों ही हालत यह है कि लगभग 40% बस्तियों में प्राथमिक स्कूल नहीं हैं। 48% बच्चे प्राथमिक स्कूलों से दूर हैं। 1.7 करोड़ बाल मजदूर हैं। 5 साल से कम उम्र के आधे बच्चे सामान्य से कमजोर हैं। 77% लोग एक दिन में 20 रूपए भी नहीं कमा पाते हैं। ऐसे में अगर सरकार बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा पर उचित खर्च नहीं करेगी तो एक शिक्षित और स्वस्थ्य भारत के भविष्य से जुड़ी उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा।

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24.2.10

सरकार बच्चों की गरीबी दूर करने के लिए निवेश करे

शिरीष खरे


मुम्बई। क्राई के मुताबिक सरकार को बच्चों की गरीबी दूर करने के लिर अधिक निवेश करने की जरूरत है। सरकारी तथ्यों के हवाले से 37.2% भारतीय गरीबी रेखा के नीचे हैं, जाहिर है कि देश में गरीबों की तादाद पहले से कहीं तेजी से बढ़ रही है। इससे यह भी जाहिर होता है कि पहले जितना सोचा जाता था, उससे कहीं ज्यादा बच्चे गरीबी और अभावों में जी रहे हैं।


ऐसे बच्चे जो गरीबी में पलते-बढ़ते हैं, वह अपने हर एक बुनियादी हक से भी अनजान रहते हैं। इस तबके के बच्चों में ही कुपोषण, असुरक्षित वातावरण, बीमारियां, अशिक्षा जैसी समस्याओं के पनपने की आशंकाएं रहती हैं। इसलिए इन वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए ही बजट का आंवटन किया जाना चाहिए।

क्राई की सीईओ पूजा मारवाह कहती हैं कि ``क्राई का 6700 वंचित समुदायों में काम करने का तजुर्बा यह साफ करता है कि देश में गरीबी का आंकलन वास्तविकता से बहुत कम किया गया है। देशभर में काम करने के दौरान हमने पाया है कि बच्चों के लिए पोषित भोजन का संकट बढ़ रहा है, उनके लिए स्कूल और आवास की स्थितियां भी बिगड़ रही हैं। फिर भी तकनीकी तौर पर बहुत सारे बच्चे ऐसे हैं जो वंचित होते हुए भी गरीबी रेखा के ऊपर हैं। जब हम गरीबी को ही वास्तविकता से कम आंक रहे हैं, तो सरकारी योजनाओं और बजट में खामियां तो होगी ही। ऐसे में हालात पहले से ज्यादा मुश्किल होते जा रहे हैं।´´

क्राई के साथ ऐसे कई समुदाय जुड़े हुए हैं जिन्होंने अपने आजीविका के साधन खोए हैं, जैसे कि जंगलों पर निर्भर रहने वाले आदिवासी, भूमिहीन, छोटे किसान वगैरह। ऐसे लोगों के लिए लोक कल्याण की योजनाएं जीने का आधार देती हैं। पूजा मारवाह के मुताबिक ``हम इस बात पर ध्यान खींचना चाहते हैं कि बच्चों की गरीबी सिर्फ उनका आज ही खराब नहीं करता, बल्कि ऐसे बच्चे बड़े होकर भी हाशिये पर ही रह जाते हैं। सरकार को चाहिए कि वह देश में बच्चों की संख्या के हिसाब से, सार्वजनिक सेवाओं जैसे प्राथमिक उपचार केन्द्र, आंगनबाड़ी, स्कूल, राशन की दुकानों के लिए और अधिक पैसा खर्च करे।´´


सरकार हर साल केन्द्रीय बजट में बच्चों की बढ़ती संख्या के मुकाबले उनके खर्च में बढ़ोतरी करने की बजाय कटौती करती जा रही है। (देखे टेबल 1- केन्द्रीय बजट में बच्चों की विशेष योजनाओं पर होने वाले खर्च का ब्यौरा।)



विकसित अर्थव्यवस्था वाले देश जैसे यूएस, यूके, फ्रांस अपने राष्ट्रीय बजट का 6-7% हिस्सा शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च करते हैं। जबकि अपने देश में 40 करोड़ बच्चों की शिक्षा पर राष्ट्रीय बजट का केवल 3% शिक्षा पर और 1% स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है। (देखे टेबल 2- शिक्षा और स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च का ब्यौरा : विकसित देशों के मुकाबले भारत की स्थिति।)



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भारत में बच्चों की स्थिति

• भारत में करीब 40% बस्तियों में प्राथमिक स्कूल नहीं हैं।

• भारत के आधे बच्चे प्राथमिक स्कूलों से दूर हैं।

• भारत के आधे बच्चे प्राथमिक स्कूलों से दूर हैं।

• भारत में 1.7 करोड़ बाल-मजदूर हैं।

• भारत में 5 साल से कम उम्र के 48% बच्चे सामान्य से कमजोर हैं।

• भारत के 77% लोग एक दिन में 20 रूपए से भी कम कमा पाते हैं।

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ऐसा देश जो कि आर्थिक विकास के रास्ते पर तेजी से बढ़ रहा है, वह अगर शिक्षा और स्वास्थ्य पर कम खर्च करेगा तो पिछड़ने लगेगा। क्राई और बच्चों के अधिकारों की वकालत करने वाली कई संस्थाओं की मांग है कि सरकार जीडीपी का १०% स्कूली शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च करे। बुनियादी अधिकारों के लिए सार्वजनिक खर्च में बढ़ोतरी करना न सिर्फ एक अच्छी नीति है, बल्कि यह अर्थव्यवस्था के लिए भी फायदेमन्द है। एक शिक्षित और स्वस्थ भारत ही तो अर्थव्यवस्था को मजबूती दे सकता है।

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18.2.10

शिक्षा के अधिकार का छलावा लागू होगा

शिरीष खरे


संसद की हरी झण्डी मिलने के बाद, शिक्षा के अधिकार कानून को सरकार ने 1 अप्रैल से लागू करने के लिए हरी झण्डी दे दी है। क्या इससे देशवासियों की उम्मीदों को भी हरी झण्डी मिल पाएगी।

बीते साल, नई सरकार के मानव संसाधन विकास मन्त्री कपिल सिब्बल ने शिक्षा के अधिकार विधेयक को जब संसद के पटल पर रखा, तो उसकी कुछ खासियतों का खूब जोर-शौर से प्रचार-प्रसार किया। अब जबकि आम जनता के हाथों में यह कानून आने को है, सवाल है कि आम जनता द्वारा इस कानून का फायदा उठाया भी जा सकेगा, या नहीं।

जो परिवार गरीबी रेखा के नीचे बैठे हैं, उनके भविष्य की उम्मीद शिक्षा पर टिकी है, जो उन्हें स्थायी तौर पर सशक्त भी बन सकती है। सरकारी आकड़े कहते हैं कि 1 अरब से ज्यादा आबादी वाले भारत में 27.5: लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। इस देश में 70% लोग ऐसे हैं, जो हर रोज जितना कमाते हैं उससे बहुत मुश्किल से अपना गुजारा कर पाते हैं। इसी तबके के तकरीबन 20 करोड़ बच्चे स्कूलों से बाहर हैं। इसलिए भारत में गरीबी और शिक्षा की बिगड़ती स्थितियों को देखते हुए, 2001 में एक संविधान संशोधन हुआ, जिसमें यह भी स्पष्ट हुआ कि सरकारी स्कूलों में सुधार के लिए राज्य और अधिक पैसा खर्च करेगी। मगर हुआ इसके ठीक उल्टा, राज्य ने गरीब बच्चों की जवाबदारी से बचने का रास्ता ढ़ूढ़ निकाला और सरकारी स्कूलों को सुधारने की बजाय गरीब बच्चों को प्राइवेट स्कूलों (२५% आरक्षण देकर) का रास्ता दिखाया। फिलहाल, राज्य सरकार एक बच्चे पर साल भर में करीब 2,500 रूपए खर्च करती है। अब खर्च की यह रकम राज्य सरकार प्राइवेट स्कूलों को देगी। मगर प्राइवेट स्कूलों की फीस तो साल भर में 2,500 रूपए से बहुत ज्यादा होती है। ऐसे में आशंका पनपती है कि प्राइवेट स्कूलों में गरीब बच्चों के लिए अलग से नियम-कानून बनाए जा सकते हैं और उनके लिए सस्ते पैकेज वाली व्यवस्थाएं लागू हो सकती हैं। यह आशंका केवल कागजी नहीं है, बल्कि भोपाल में एक प्राइवेट स्कूल ने ऐसा कर दिखाया है। जाहिर है, सरकारी स्कूलों के गरीब बच्चे जब प्राइवेट स्कूलों में दाखिल होंगे तो उनके लिए आत्मविश्वास और ईज्जतदार तरीके से पढ़ पाना मुश्किल होगा। ऐसे में यह कह पाना भी फिलहाल मुश्किल होगा कि इन प्राइवेट स्कूलों में गरीब बच्चे कितने दिन टिक पांऐगे, मगर तब तक शिक्षा का यह `अधिकार´, `खैरात´ में जरूर तब्दील हो जाएगा। दूसरी तरफ, बीते लंबे समय से प्राइवेट स्कूलों की फीस पर लगाम कसने की मांग की जाती रही है। मगर शिक्षा का ऐसा कानून तो प्राइवेट स्कूलों को अपनी मनमर्जी से फीस वसूलने की छूट को जारी रख रहा है। इस तरह से एक समान शिक्षा व्यवस्था, जो कि आत्म-सम्मान की बुनियाद पर खड़ी है, उसके बुनियादी सिद्धान्त को ही तोड़ने-मरोड़ने का मसौदा तैयार हुआ है।

जब शिक्षा के अधिकार के लिए विधेयक तैयार किया जा रहा था तब सरकारी स्कूलों में बिजली, कम्प्यूटर और टेलीफोन लगाने की बात भी थी। जिसे बाद में कतर दिया गया। ऐसे तो सरकारी स्कूलों की दशा सुधरने की बजाय और बिगड़ेगी। सरकारी स्कूलों को तो पहले से ही इतना बिगाड़ा जा चुका है कि इनमें केवल गरीब बच्चे ही पढ़ते हैं।

फिर भी मिस्टर सिब्बल अगर कहते है कि प्राइवेट की साझेदारी से ही देश में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार आ सकता है, तो उनका यह तर्क ठीक नहीं लगता। वह भूल रहे हैं कि अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा तो भारतीय सरकार की मुख्य विशेषता रही है। तभी तो तमाम आईआईटी और आईआईएम से जो बड़े-बड़े इंजीनियर और प्रबंधक निकल रहे हैं, वो पूरी दुनिया में अपनी जगह बना रहे हैं। जबकि हम जानते है कि यह दोनों संस्थान सरकारी हैं। इसी तरह केन्द्रीय विद्यालय और नवोदय विद्यालय के उदाहरण भी हमारे सामने हैं- जिनसे निकलने वाले बच्चे, बाद में देश के बड़े-बड़े नेता, प्रशासनिक अधिकारी, सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं से जुड़कर अच्छे जानकार साबित हुए हैं।

इसी तरह, शिक्षा का यह अधिकार केवल 6 से 14 साल तक के बच्चों के लिए है। जबकि हमारा संविधान 6 साल के नीचे के 17 करोड़ बच्चों को भी प्राथमिक शिक्षा, पूर्ण स्वास्थ्य और पोषित भोजन का अधिकार देता रहा है। अर्थात यह कानून तो शिक्षा के अधिकार के नाम पर संविधान में पहले से ही दर्ज अधिकारों को काट रहा है। दूसरी तरफ, 15 से 18 साल तक के बच्चों को भी कानून में जगह नहीं दे रहा है। वैश्विक स्तर पर बचपन की सीमा 18 साल तक रखी गई है, जबकि अपनी सरकार बचपन को लेकर अलग-अलग परिभाषाओं और आयु-वर्गों में विभाजित है। इन सबके बावजूद वह 18 साल तक के बच्चों से काम नहीं करवाने के सिद्धान्त पर चलने का दावा करती है। मगर जब उस सिद्धान्त को कानून या नीति में शामिल करने की बारी आती है, वह पीछे हट जाती है। अगर कक्षाओं के हिसाब से देखे, तो यह अधिकार कम से कम पहली और ज्यादा से ज्यादा आठवीं तक के बच्चों के लिए है। अर्थात जहां यह आंगनबाड़ी जाने वाले बच्चों को छोड़ रहा है, वहीं बच्चों को तकनीकी और उच्च शिक्षा का मौका भी नहीं दे रहा है। क्येंकि आमतौर से तकनीकी पाठयक्रम बारहवीं के बाद से ही शुरू होते हैं, मगर यह कानून तो उन्हें केवल साक्षर बनाकर छोड देने भर के लिए है। कुलमिलाकर, शिक्षा के अधिकार का यह कानून न तो `सभी बच्चों को शिक्षा का अधिकार´ देता है, न ही पूर्ण शिक्षा की गांरटी ही देता है।

दुनिया का कोई भी देश सरकारी स्कूलों को सहायता दिए बगैर सार्वभौमिक शिक्षा का लक्ष्य नहीं पा सकता है। विकसित अर्थव्यवस्था वाले देश जैसे यूएस, यूके, फ्रांस अपने राष्ट्रीय बजट का 6-7% हिस्सा शिक्षा पर खर्च करते हैं। जबकि अपने देश में 40 करोड़ बच्चों की शिक्षा पर राष्ट्रीय बजट का केवल 3% हिस्सा ही खर्च किया जाता है। जबकि देश की करीब 40% बस्तियों में प्राथमिक स्कूल नहीं हैं। जबकि देश के आधे बच्चे प्राथमिक स्कूलों से दूर हैं। जबकि देश में 1.7 करोड़ बाल-मजदूर हैं। जबकि यह देश 2015 तक स्कूली शिक्षा का लक्ष्य पूरा करने की हालत में भी नहीं हैं। ऐसे में तो हमारी सरकार को बच्चों की शिक्षा में और ज्यादा खर्च करना चाहिए। मगर वह तो केन्द्रीय बजट (2009-10) से `सर्व शिक्षा अभियान´ और `मिड डे मिल´ जैसी योजनाओं को ही दरकिनार करने पर तुली है।

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10.2.10

पत्थरों की खदानों से लौटा बचपन

कभी बाल मजदूरी करने वाला महेन्द्र अब बच्चों के अधिकारों से जुड़ी कई लड़ाईयों का नायक है। महेन्द्र के कामों से जाहिर होता है कि छोटी सी उम्र में मिला एक छोटा सा मौका भी किसी बच्चे की जिंदगी को किस हद तक बदल सकता है।

महेन्द्र रजक, इलाहाबाद जिले के गीन्ज गांव से है- जहां की भंयकर गरीबी अक्सर ऐसे बच्चों को पत्थरों की खदानों की तरफ धकेलती है। महेन्द्र रजक भी अपनी उम्र से कुछ ज्यादा ही बड़ा हो चुका था। इतना बड़ा कि 6 साल की दहलीज पार करके उसने खदानों में जाने का मतलब का जाना था। इतना बड़ा कि 6 दूनी 12, 12 दूनी 24, 24 दूनी 48 जानने की बजाय उसने हमउम्र बच्चों के साथ पत्थर तोड़ने का पहाड़ा जाना था।

‘‘....तब कुछ बच्चों को स्कूल जाते देखते तो लगता कि वो हमारे जैसे नहीं हैं, वो हमसे कहीं अच्छे हैं।’’- अपने बचपने को इस तरह याद करने वाला महेन्द्र अब 16 की उम्र छूने को है। वह बताता है ‘‘मेरे लिए पत्थर तोड़ना तो बहुत मेहनत का काम था। सुबह 7 से शाम के 5 तक, तोड़ते रहो, खाने के लिए घंटेभर की छुट्टी भी नहीं मिलती थी। ठेकेदार आराम नहीं करने देता था, बार-बार पैसे काटने की धमकी अलग देता था।’’ इस तरह महेन्द्र को घर, मैदान और स्कूल से दूर, 9 घंटे के काम के बदले 70 रूपए/रोज मिलते थे।

संचेतना, जो कि क्राई के सहयोग से चलने वाली एक गैर-सरकारी संस्था है, ने जब महेन्द्र के गांव में अनौपचारिक शिक्षण केन्द्र खोला तो जैसे-तैसे करके महेन्द्र के पिता उसे पढ़ाने-लिखाने को राजी हुए। वैसे तो यहां एक प्राइवेट नर्सरी स्कूल भी था, जो बहुत मंहगा होने के चलते महेन्द्र जैसे ज्यादातर पिताओं की पहुंच से बहुत दूर था।

क्राई के पंकज मेहता बीते दिनों को कुछ ताजा करते हैं ‘‘हमारे सामने पत्थर तोड़ने वाले बहुत सारे बच्चे थे, उनके बचपन को बचाने के लिए हमने बस्तियों के पास सरकारी स्कूल खोले जाने का अभियान चलाया। इसके लिए राज्य की शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई बड़े अधिकारियों से मिले-जुले, उनके साथ बैठे-उठे, उनके सामने बार-बार अपनी जरूरतें दोहराते रहे। आखिरकार, 2002 को गीन्ज गांव में भी एक प्राथमिक स्कूल खोला जा सका।’’

संचेतना के सामाजिक कार्यकर्ताओं बताते हैं कि स्कूल भवन तो खड़ा कर दिया था, मगर इसी से तो सबकुछ सुलझने वाला नहीं था। असली चुनौती ऐसे बच्चों को स्कूल तक लाने और उनमें शिक्षा की समझ जगाने की थी। यह बहुत दिक्कत वाली बात थी, क्योंकि यहां बच्चों को कमाने वाले सदस्य के तौर पर देखने का चलन जो था। गरीब मां-बाप की जुबान पर यही सवाल होता था कि चलिए आप कहते हैं तो हम अपने बच्चों को आज काम पर नहीं भेजते हैं, अब आप बताइए कल से गृहस्थी की गाड़ी कैसे चलेगी ? इस बुनियादी सवाल से जूझना आसान न था। इसलिए सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनी पूरी ताकत महेन्द्र जैसे बच्चों के परिवार वालों के बीच आपसी समझ बनाने में लगाई थी। उन्होंने स्कूल के रास्ते पर बच्चों को रोकने वाले कारणों को भी समझा और यह भी समझाया कि बच्चों के भविष्य के लिए इतना तो खर्च किया ही जा सकता है!! क्योंकि महेन्द्र का बड़ा भाई भी काम पर जाता था, इसलिए उसके पिता अपने इस छोटे बेटे को काम की बजाय स्कूल भेजने के लिए तैयार हो गए।’’ इस तरह 9 साल की उम्र से महेन्द्र के स्कूल वाले दिन शुरू हुए।

‘‘अब मैं बाल पंचायत का नेता हूं, पंचायत के बच्चों ने मुझे चुनकर यहां तक भेजा है’’- महेन्द्र के लहजे के ये जवाबदारी भरे अंदाज हैं : ‘‘गांव में ऐसा क्या चल रहा है, जो हमें आगे बढ़ने से रोक रहा है, ऐसी बातों पर बतियाते हैं। अगर किसी बात को लेकर, कुछ हो सकता है तो बाल पंचायत उसमें क्या कर सकती हैं, कैसे कर सकती है, ऐसी चर्चाएं चलती हैं, कभी-कभी किसी बात पर हम सारे बच्चे गांव वालों के साथ हो जाते हैं, जरूरत पड़े तो जिले के अधिकारियों से भी मिल आते हैं।’’ बाल पंचायत का कोई औपचारिक ढ़ांचा नहीं है, यह तो अपनी आपसी सहूलियतों को देखते हुए कहीं भी, किसी भी समय लग सकती है। गांव के सारे बच्चे इसके सदस्य हैं, जो अपने अधिकारों से जुड़े अभियानों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

11 दिसम्बर, 2009 को, नई दिल्ली में सबको शिक्षा समान शिक्षा अभियान के मौके पर, जब महेन्द्र ने देशभर से जुटे एक हजार से भी ज्यादा सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच अपने अनुभवों को साझा किया तो सभी ने इस छोटे से नायक के बड़े कामों को जाना और उसकी चौतरफा सरहना की।

गीन्ज गांव में बच्चे-बच्चे को बाल पंचायत बनने का किस्सा मालूम है। हुआ यह कि- तब बहुत सारे बच्चों ने गांव में खेल के मैदान का मुद्दा उठाया था। इसके लिए उन्होंने बाल दिवस पर इलाहाबाद जाने का मन बनाया। यह बच्चे उस रोज इलाहाबाद की मुख्य सड़कों पर पहुंचे और जमकर खेले। ‘‘यह देख वहां के बहुत सारे लोग आ गए, गुस्से से बोले कि यहां के रास्ते क्यों रोक रहे हो ?’’- तब महेन्द्र ने कहा था - ‘‘यह तो पण्डित नेहरू का शहर है, आज तो बाल दिवस है, आज तो हमें यहां खेलने दो।’’ लगे हाथ उसने यह भी कह दिया कि ‘‘हमारे गांव में तो खेल का मैदान भी नहीं है। यहां तो देखो कितनी चौड़ी-चौड़ी सड़के हैं।’’ उस रोज बच्चों ने विरोध की ऐसी गेंदबाजी की थी कि प्रशासन से जुड़े अधिकारियों को क्लीन बोल्ड होना पड़ा था। मैच का नतीजा यह निकला था कि इलाहाबाद जिले से ही गीन्ज गांव के लिए खेल के मैदान का रास्ता साफ हो गया। खेल-खेल से शुरू हुए बच्चों के ऐसे अभियान समय के साथ गंभीर होते चले गए। फिर बच्चों को यह भी लगा कि अगर गांव के बड़े-बूढ़े की पंचायत हो सकती है तो बच्चों की भी अपनी पंचायत हो सकती है। कुछ इस तरह से बाल पंचायत का वजूद खड़ा हुआ। जो गीन्ज जैसे एक साधारण गांव में, गांव भर के सहयोग के चलते अब बहुत खास बन चुकी है।

महेन्द्र और उसके नन्हें दोस्तों के हिस्से में अब ऐसे दर्जनों किस्से हैं, जो बताते हैं कि बड़े कारनामों को अंजाम तक पहुंचाने के लिए, उतनी बड़ी उम्र भी हो तो ऐसा जरूरी नहीं है। जैसे कि पहले गीन्ज गांव में पांचवीं तक ही स्कूल था। लिहाजा महेन्द्र जैसे बच्चों के लिए आगे पढ़ने का मतलब था कि पहले तो एक साईकिल की जुगाड़ करो, उसके बाद उससे रोजाना 6 किलोमीटर दूर के स्कूल आओ-जाओ। तब बाल पंचायत ने जिले के शिक्षा अधिकारियों के साथ बैठक आयोजित की थी। बाल पंचायत ने इन अधिकारियों के सामने अपने गांव में ही एक सेकेण्डरी स्कूल खोले जाने की वकालत की थी। तब महेन्द्र ने कहा था- ‘‘अगर ऐसा हुआ तो यहां के बहुत सारे बच्चे आगे भी पढ़ सकते हैं।’’ आखिरकार, यहां सेकेण्डरी स्कूल भी खोला गया, जहां आज पास वाले गांवों के भी बहुत सारे बच्चे पढ़ने आते हैं। अगर यह कहा जाए कि यहां के बच्चों ने हर परेशानी का हल खोज लिया है तो यह सही नहीं होगा। मगर यह तो है कि उन्होंने अपने हालातों को पहले से कहीं बेहतर बनाया है। यही वजह है कि जो कामकाजी बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं वो संस्थाओं द्वारा खोले गए गैर-औपचारिक शिक्षण केन्द्रों में पढ़ने आते हैं। यहां ऐसे बच्चों की भारी तादाद यह बताती है कि पत्थर तोड़ने के काम से टूट जाने के बावजूद इनके दिलोदिमाग में पढ़ने की ललक कितनी बकाया है। यहां बैठे-उठे कभी पहाड़ा तो कभी बारहखड़ी पढ़ते ये बच्चे दुनिया में जीने की समझ बढ़ाने के लिए यहां आते हैं। दूसरी तरफ यहां सक्रिय गैर-सरकारी संस्थाओं ने ऐसे गरीब परिवारों की आमदनी में सुधार लाने के लिए उन्हें राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के फायदे उठाने के लिए भी संगठित किया है। यह लोग अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए अब पंचायत की दूसरी योजनाओं से भी जुड़ रहे हैं।

यह कोई तीन हजार आबादी वाले गीन्ज से महेन्द्र के छोटे से गांव का हाल है, जहां बेहतर जीने के लिए लड़ने और लड़ने के लिए पढ़ने के महत्व का पता चला है। मगर महेन्द्र का गांव उसी दुनिया का हिस्सा है, जिसमें सबसे ज्यादा बाल मजदूर भारत के हैं। सरकारी आकड़ों के हिसाब से यहां 14 साल तक के 1 करोड़, 70 लाख बाल मजदूर हैं। इसमें भी 80% बाल मजदूर खेती या कारखानों में लगे हैं। बाकी के पत्थरों की खदानों, चाय के बागानों, ढ़ाबों, दुकानों या घरेलू कामों से जुड़े हैं। बच्चों से मजदूरी कराने वाले ऐसे कई गिरोह सक्रिय हैं जो उन्हें या तो सस्ती मजदूरी या फिर तस्करी के चलते काम की जगहों तक लाते हैं।

क्राई अपने 30 सालों के तजुर्बों से यह मानता है कि बच्चों की समस्या के जो तार उनके समुदाय से जुड़े हैं, जब तक उनकी पहचान नहीं की जाएगी, जब तक उनकी रोकधाम के उपाय नहीं ढ़ूढ़े जाएंगे, तब तक बाल मजदूरी के हालातों में स्थायी बदलाव नहीं आएगा। असल बात तो यह है कि बाल मजदूरी की जड़े भूख, गरीबी, शोषण, बेकारी और अत्याचारों से जुड़ी हैं। अगर बाल मजदूरी से लड़ना है तो सबसे पहले बच्चों की शिक्षा और बड़ों की आजीविका से ताल्लुक रखने वाली सरकारी नीतियों को प्रभावित करना होगा। इसके सामानान्तर ऐसी नीतियों को जमीनी हकीकत में साकार करने की जद्दोजहद को भी जारी रखना होगा।

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5.2.10

चेन्या के बदलाव के चित्र

शिरीष खरे



‘‘मुंबई तेरी फुटपाथ पर/अनगिनत काम करते ये बच्चे/रात और दिन पसीना बहाते हुए/दौड़ते, भागते/ठहरते, हांफते/फिर भी हंसते हुए/मुसकुराते हुए/रंगीन गुब्बारे या प्लास्टिक की गाड़ी/फिल्मी अखबार या रेल की चौपड़ी/कंघियां काली और लाल, छोटी बड़ी/बच्चे कहने को सामान यह लाए हैं/सच तो यह है कि खुद बिकने को आए हैं।’’

‘मुंबई तेरी फुटपाथ पर’- जावेद अख्तर की इस कविता के उलट, एक बच्चा ऐसा भी है, जो तंग झोपड़पट्टियों और बंद गलियों से पढ़ते हुए, अपने पैरों से चार कदम आगे चलते हुए, कागजों पर नए-नए चित्रों को गढ़ता है। जहां दूसरे बच्चे, गलियों जैसे मोड़ों या मोड़ों जैसी गलियों से गुजरते हुए- गाड़ियों के कई-कई शीशों को धोते हैं, उम्र के मुकाबले ढ़ेरों जख्मों को सहते हैं, वहीं से अपने सीने में जख्मों की बजाय ढ़ेरों मेडल लटकाए, देखो चेन्या नाम का यह बच्चा भी आया है।

चेन्या मुंबई के उस इलाके से है, जिसमें रोज-रोज की छोटी-छोटी ख्वाहिशों की सांसे इन दिनों कुछ ज्यादा ही फूलने लगी हैं- यहां की <5 झोपड़पट्टियों में> <5000 से ज्यादा झोपड़ियों के> <35000 से ज्यादा लोगों> और <उनके बीच 15000 से भी ज्यादा बच्चे> रहते हैं। इतने बड़े और घने हिस्से में <केवल 7 आंगनबाड़ियां> हैं। यानि औसतन <715 झोपड़ियों की> <7000 से ज्यादा आबादी के बीच> <2000 से भी ज्यादा बच्चों> के हिस्से में <केवल 1 आंगनबाड़ी> है। इसके अलावा <बाम्बे महानगर पालिका का 1 स्कूल> है भी तो यहां से <3 किलोमीटर दूर>। मुंबई की ज्यादातर झोपड़पट्टियों में ऐसा ही असंतुलन है। चेन्या मुंबई के उस इलाके से है, जिसमें बच्चों के माता-पिताओं का हाल यह है कि उन्हें <हर रोज खाने के लिए हर रोज काम मिल ही जाए-ऐसा जरूरी नहीं>। ऐसे में <परिवार के गुजारे के लिए बच्चों को काम पर भेजना> जरुरी मान लिया जाता है। इसलिए यहां चेन्या जैसे बच्चों को बेहतर शिक्षा की सहूलियतें पाने के लिए पथरीले रास्तों से गुजरना पड़ता है। कुल मिलाकर एक तरफ <गहरी नींद में डूबी व्यवस्था> है, तो दूसरी तरफ है <गृहस्थी ढ़ोने की भारी जवाबदारी>- और इन दोनों हालातों के बीच बचा है <चेन्या जैसे बच्चे का बचपन>। जो बेवजह खो जाने की बजाय <इंजीनियर बनने का ख्वाब> लिए है, यहां के लिए यह ख्वाब <साधारण नहीं> है।

वैसे तो देश के करोड़ों बच्चों की तरह चेन्या के भी स्कूल जाने में कुछ खासियत नजर नहीं आती। मगर यहां से स्कूल के रास्ते रोकने वाली ताकतों के मजबूत गठजोड़ को देखते हुए चेन्या का स्कूल जाना असाधारण लगता है। 11 साल का चेन्या फिलहाल कक्षा 3 में है। यह वाशीनाका झोपड़पट्टी के बंजारटंडा, भरतनगर में रहता है। यहां से 3 किलोमीटर दूर- नेशनल केमीकल फर्टीलाइजर कालोनी के कैंपस में बाम्बे महानगर पालिका का स्कूल है। इसलिए चेन्या स्कूल आने-जाने के लिए रोजाना कम से कम 6 किलोमीटर का रास्ता पैदल ही पार करता है। उसके परिवार में उसके माता-पिता के अलावा एक बड़ा भाई भी है। उसके माता-पिता दिहाड़ी मजदूरी करते हैं, जो हमेशा से अनिश्चिताओं पर टिकी होती है। चेन्या का बड़ा भाई अभी 13 साल का ही है, उसके नन्हें कंधों पर परिवार का आर्थिक बोझा है, जिसे उठाने के लिए उसे पास के रेस्टोरेंट में जाना पड़ता है। उसके चेहरे पर, चेन्या के चेहरे की तरह न तो सुकून झलकता है, न जुनून। 10 साल पहले, यह परिवार रोजीरोटी के चलते कर्नाटक के छोटे से गांव गुलबर्गा से मुंबई आया था।



चेन्या के आजकल
चेन्या के भीतर सुंदर संदेश देने वाले बहुत सुंदर-सुंदर चित्रों को बनाने की बेजोड़ कला है। बीते 2 सालों में उसने बहुत सारी इंटर स्कूल प्रतियोगिताओं में भागीदारी करके बहुत सारे पुरस्कार और मेडल पाए हैं। इस साल भी उसने इंटर स्कूल प्रतियोगिताओं में भागीदारी करते हुए 3 पुरस्कार पा लिए हैं। उसके शिक्षकों का कहना है कि चेन्या के भीतर चित्रकला की ही तरह पढ़ने-लिखने की भी खूब लगन है। इस स्कूल का वह एक अच्छा और होनहार छात्र है।

चेन्या के ज्यादातर चित्रों में उसके आसपास की दुनिया के दृश्यों के साथ-साथ कल्पना के पुट भी दिखाई देते हैं- जैसे घर के चित्र को ही लो तो ज्यादातर बच्चे घपड़ों की छत और घासपूस की दीवारों वाला ऐसा घर बनाते हैं जो गांव से दूर एक पहाड़ी पर होता है, जिसके आसपास कोई दूसरा घर होने की बजाय एक नदी, एक जंगल, एक मंदिर, एक सड़क और सूरज का नजारा मिलता है। जबकि चेन्या अपने झोपड़े और उसके आसपास की पट्टी को हू-ब-हू उभार देता है। ऐसा करते हुए वह अपनी कल्पना के घोड़े को दौड़ाता है और कुछ दृश्यों को अनुपात से बड़ा, तो कुछ दृश्यों को अनुपात से छोटा कर देता है, जैसे कि एक जगह पर रेड लाईट से टकराता चांद, लगता है मानो दोनों के बीच किसी बात को लेकर धक्कामुक्की चल रही हो। चेन्या के चित्रों में शहरी सभ्यता का हर रुप और उसमें शामिल चीजें जैसे ऊंची ईमारतें, मोटर, कार, रेल, हवाईजहाज, सिनेमाहाल, होर्डिंग्स, लाइटिंग, ट्राफिक और भीड़ दिखाई तो देती हैं, मगर जब वह अपनी रचनात्मकता से ऐसी चीजों के आकार या आकृतियों को बदलता है तो लगता है कि उनमें कोई गहरे भाव छिपे हैं। उसे अपने हुनर में रंगों की भी अच्छी मिलावट करना आता है। तेजी से चित्र बनाने वाले चेन्या के नन्हें हाथों को देखकर सुखद आश्चर्य होता है।

चेन्या के चित्रों की और एक खासियत है- उनमें कई बार तरह-तरह की मशीनें दिखाई देती हैं। दिलचस्प यह भी है कि वो ऐसी मशीनों के चित्र बनाते वक्त उनमें अपने हिसाब से कुछ जोड़ता-घटाता है। वह कहता है कि बड़ा होकर मशीनों का इंजीनियर बनना चाहता है। वह घर की गरीबी दूर करने और अपने दोस्तों की मदद करने की बात भी कहता है। फिलहाल चेन्या के गालों पर पड़ती मुसकुराहट से उदासी और अंधरे किनारे लगते हैं। यहां के लिए वह हकीकत के पंखों पर सवार एक सपना जैसा है, जो आजकल बार-बार अपने पंख फड़फड़ाने को बेताब रहता है।


चेन्या जैसे दोस्तों के लिए
चेन्या के पीछे छिपे कलाकार को सामने लाने और उसे लगातार बढ़ावा देने के लिए ‘समता मित्र मंडल’ और ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ जैसी संस्थाओं ने भरपूर साथ दिया है। यह दोनों संस्थाएं मिलकर- यहां की 3 झोपड़पट्टियों में, बच्चों के अधिकार और उन्हें प्रभावित करने वाले मानवीय अधिकारों के लिए काम करती हैं। इन संस्थाओं ने ऐसे इलाकों में ‘बाल सक्ष्म केन्द्र’ तैयार किए हैं, यहां बच्चों को पढ़ने-लिखने का मौका देने और विभिन्न कलाओं मे उनकी दिलचस्पियों को प्रोत्साहित किया जाता है। यहां चेन्या जैसे ही कई दोस्तों में बदलाव लाने के लिए उनकी पसंदगी/नापसंदगी और ताकत/कमजोरियों के बारे में पूछा जाता है। यहां बच्चे, उनके परिवार वाले और शिक्षक एक साथ बैठकर- आपसी समस्याओं पर चर्चा करते हैं। यहां से ही बड़ी तादाद में बस्ती के बच्चों को बाम्बे महानगर पालिका के स्कूल में दाखिल करवाने का अभियान चलाया जा रहा है।

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2.2.10

12 साल में 2 लाख किसानों ने आत्महत्याएं की हैं

किसान आत्महत्याओं के मामले में सबसे आगे है महाराष्ट्र


राष्ट्रीय अपराध लेखा ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 1997 से अबतक कुल 1,99,132 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। जबकि 2008 में 16,196 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं।

जाने माने पत्रकार पी साईनाथ ने ‘द हिंदू’ में प्रकाशित अपने लेख में भी यह खुलासा किया है कि 2008 में 5 बड़े राज्यों-महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जिन्हें ‘आत्महत्या-क्षेत्र’ कहा जाता है, में सबसे ज्यादा 10,797 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। यानि 2008 में देश भर से जिन 16,196 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं, उसका 66.7 प्रतिशत हिस्सा अकेले ‘आत्महत्या-क्षेत्र’ से है। इसमें भी महाराष्ट्र सबसे आगे है, जहां 3,802 किसानों ने मौत को गले लगाया हैं। महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 1997 से अब तक 41,404 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। यह देशभर में हुई कुल किसान आत्महत्याओं की संख्या का 1/5वां से अधिक भाग है।

राष्ट्रीय अपराध लेखा ब्यूरो की यह रिपोर्ट कहती है कि 1997 से 2002 के बीच ‘आत्महत्या-क्षेत्र’ से 55,769 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। जबकि 2003 से 2008 के बीच यह आकड़ा 67,054 तक पहुंच गया। जिसमें किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं में औसतन सलाना 1,900 की बढ़ोतरी दर्ज हुई। सालाना औसत के मद्देनजर 2003 से हर 30 मिनट में एक किसान आत्महत्या करता है। यह रिपोर्ट कहती है कि हालांकि 2007 के मुकाबले आत्महत्याओं में थोड़ी कमी तो आई है, मगर कोई उल्लेखनीय बदलाव दिखाई नहीं देता है।

मद्रास इंस्टीट्यूट आफ डेवलपमेंट स्टडीज से जुड़े रहे जानेमाने अर्थशास्त्री प्रोफेसर के नागराज कहते हैं कि ‘‘अगर 2008 में 70,000 करोड़ रुपए के कर्ज की माफी और खेती के लिए दी जाने वाली सहायता के बाद यह हालात है तो सूखाग्रस्त 2009 के बाद के हालात तो और भी भयावह हो सकते हैं। कुल मिलाकर किसानों की यह समस्या बेहद गंभीर हो चुकी है।’’

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30.1.10

नाबालिग लड़कियों के बच्चों में कुपोषण सबसे ज्यादा

शिरीष खरे


18 साल से कम उम्र में मां बनने वाली लड़कियों से पैदा होने वाले बच्चों पर कुपोषण का खतरा सबसे ज्यादा मंडराता है। बीएमजे यानि बिट्रिश मेडीकल जनरल ने हाल में प्रकाशित अपने शोध अध्ययन से ऐसा जाहिर किया है।


बीते दशक की महत्वपूर्ण आर्थिक वृद्धि के इर्दगिर्द, सबसे ज्यादा होने वाली मौतों के हिसाब से दुनिया के 5 देशों में भारत भी शामिल है। भारत में 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 44.5% (करीब आधी) औरतें ऐसी हैं- जिनकी शादियां 18 साल के पहले हुईं हैं। इन 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 22% (करीब एक चौथाई) औरतें ऐसी हैं- जो 18 साल के पहले मां बनीं हैं। इन कम उम्र की लड़कियों से 73% (सबसे ज्यादा) बच्चे पैदा हुए हैं। फिलहाल इन बच्चों में 67% (आधे से बहुत ज्यादा) कुपोषण के शिकार हैं।


बोस्टन यूनिवर्सिटी के पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेन्ट की एसोशियट प्रोफेसर अनीता राज और उनके सहयोगियों का यह शोध अध्ययन मूलतः भारत में कम उम्र के शादीशुदा संबंधों, शिशु और बाल मृत्यु-दर से जुड़ा है। यह अध्ययन 15 से 49 साल की तकरीबन 1,25,000 भारतीय औरतों के प्रतिनिधि नमूने पर आधारित है। शोध के लिए एकत्रित जानकारियों को नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे (2005-06) से लिया गया है।


यह शोध बताता है कि कम उम्र में शादी करने, दो बच्चों के बीच अंतर न रखने, गर्भावस्था के समय पर्याप्त भोजन न मिलने, प्रसव के समय थोड़ा-सा भी आराम न मिलने और इसी दौरान चिकित्सा की सुविधाओं के अभाव में कुपोषण किस तरह से लहलहा उठता है। यह शोध ‘कम उम्र की किशोरियों और बच्चों’ को केन्द्र में रखकर भारत के कुपोषण की व्याख्या करता है। शोध यह भी मानता है कि कम उम्र में शादी करने वाली औरतों को अगर उनके पतियों या ससुराल वालों द्वारा दरकिनार किया जाता है तो ऐसी औरतों को अपने और अपने बच्चों के लिए भोजन जुटा पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसमें भारत की भुखमरी को पारिवारिक व्यवस्था से लेकर सामाजिक तंत्र, राजनीति से लेकर विचारधारा और व्यवहारिकता तक में मौजूद लैंगिक भेदभाव से जोड़कर देखा गया है।


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27.1.10

सूरत में जीरो स्लम आपदा

शिरीष खरे/सूरत से




एक जमाने में विकास के लिए ‘गरीबी हटाओ’ एक घोषित नारा था। मगर आज आलम यह है कि विकास के रास्ते से ‘गरीबों को हटाना’ एक अघोषित एंजेडा बन चुका है। बतौर एक शहर, सूरत के उदाहरणों से यह समझा जा सकता है कि ‘गरीबी की बजाय गरीबों को हटाने’ का यह व्यंग्यात्मक मुहावरा किस तरह से गंभीर हकीकत में तब्दील हुआ है।






सैकड़ों झोपड़ियों की तरह, झोपड़पट्टी तोड़ने वाले जब जलाराम नगर के 40 वर्षीय लक्ष्मण चंद्राकार उर्फ संतोष की झोपड़ी को तोड़ने लगे तो उसने केरोसिन डालकर अपनेआप को मौत के हवाले करना चाहा। इसके बाद उसे एक एम्बुलेंस से न्यू सिविल हास्पिटल भेजा गया। वहां पहुंचते-पहुंचते उसके शरीर का 75 प्रतिशत हिस्सा जल गया। उधर डाक्टरों ने संतोष की हालत को बेहद गंभीर बताया। इधर सूरत महानगर पालिका ने शाम होते-होते ताप्ती नदी के किनारे से तीन बस्तियों के कई बच्चे, बूढ़े और औरतों को खुली सड़क पर ला खड़ा किया। यह एक नजारा अब का है जब सूरत के गरीबों को न तो साम्प्रदायिक दंगों का सामना करना पड़ रहा है, न ही बाढ़ या भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं को ही सहना पड़ रहा है। इतना सब तो उन्हें सूरत को 0 स्लम बनाने वाली आपदा के चलते झेलना पड़ रहा है।

2 दिसम्बर, 2009 को सूरत महानगर पालिका ने सुबह 10 से शाम के 6 तक : सूरत को 0 स्लम बनाने के लक्ष्य का पीछा करते हुए जेपी नगर, जलाराम नगर और इकबाल नगर से कुल 502 झोपड़ियों को तोड़ने का रिकार्ड दर्ज किया। दोपहर होते-होते अगर स्थिति तनावपूर्ण न हो जाती तो महानगर पालिका के कुल स्कोर में और अधिक बढ़ोतरी हो जाती। वैसे पुलिस के भारी बंदोबस्त के बीचोंबीच, तनावपूर्ण स्थिति को नियंत्रण में बनाए रखते हुए- 4000 से अधिक रहवासियों से उनका पता ठिकाना छीन लिया गया। कुल मिलाकर ताप्ती नदी के आजू-बाजू कई दशक पुरानी इन तीन बस्तियों से 1700 से अधिक झोपड़ियों को साफ किया जाना है। अर्थात्- 14000 से अधिक रहवासियों से उनका पता ठिकाना छीना जाना है। जैसा कि महानगर पालिका के बस्ती उन्नयन विभाग से सी वाय भट्ट कहते भी हैं कि ‘‘नदी और खाड़ी के इर्द-गिर्द जमा झोपड़ियों को साफ करने के लिए डेमोलेशन की कार्रवाई जारी रहेगी।’’ डेमोलेशन की यह कार्रवाई अगले रोज भी जारी रही। मगर सूरत के बाकी इलाकों को तोड़े जाने के अगले चरणों और उनकी तारीखों के सवालों पर खामोशी का आलम है।


सुबह-सुबह, कोई सूचना दिए बगैर, एकाएक और अपने पूरे दल-बल के साथ झुग्गी बस्तियों को नेस्तानाबूत करने की प्रशासनिक रणनीति को सूरतवासी अब बाखूबी जानते हैं। रविवार की ठण्डी सुबह में भी प्रशासन की तरफ से इसी रणनीति को दोहराया जाने लगा। पुलिस ने शनिवार रात को ही उन सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं को हिरासत में ले लिया था जो महानगर पालिका की गरीबों को शहर से हटाए जाने वाली मुहिम के विरोधी हैं। इधर जेपी नगर, जलाराम नगर और इकबाल नगर के रहवासी यह कहने लगे कि घर के बदले घर दिए बगैर हमारे घरों को कैसे उजाड़ा जा रहा है ? उधर प्रशासन के लिए यह कोई नया सवाल नहीं था। उनका ध्यान तो झोपड़पट्टी तोड़ने के दौरान ‘अधिकतम नुकसान पहुंचाने’ के सिद्धांत पर टिका था। अंधियारा छाने के बहुत पहले ही बस्ती वालों के असंतोष ने आग पकड़ ली। देखते ही देखते एक भारी भीड़ पथराव करते हुए आगे बढ़ने लगी। हर एक के हाथों में उनके दुख, दर्द, उनकी आशंकाओं और हताशाओं से भरी भावनाओं में डूबे जनसैलाब के सिवाय कुछ न था। इसके बाद मुस्तैद पुलिस वाले आगे आएं और उन्होंने बस्तियों की तरह उनके जनसैलाब को भी लाठीचार्ज के जरिए कुचल डाला। उसके ऊपर आंसू गैस के दो गोले भी छोड़े गए।

सूरत में कुल 1 लाख से अधिक झोपड़ियों को तोड़ा जाना है। सरकारी कागजों पर पुनर्वास के लिए केवल 42 हजार घर बनाए जाने की बात है। जाहिर है करीब 56 हजार झोपड़ों का सवाल हवा में झूल रहा है। एक तरफ झोपड़ियों को तोड़े जाने का सिलसिला थम नहीं रहा है और दूसरी तरफ इतना भी सुनिश्चित नहीं हो पा रहा है कि घर मिलेंगे भी तो किन्हें, कैसे और कब तक। जबकि 2009 के पहले-पहले सूरत के सभी झोपड़पट्टी के परिवारों को नए घरों में स्थानांतरित करने का लक्ष्य रखा गया था। जबकि समय के छोटे-छोटे अन्तराल से शहर की बाकी झोपड़ियों की तरह रेलवे मेनलाइन की झोपड़ियों को तोड़कर गिराया जा रहा है और इस बात की जिम्मेवारी कोई नहीं ले रहा है कि किसने झोपड़ियां तोड़ी हैं ? इस सवाल का जवाब सब जगह से एक-सा आता है- ‘हमने नहीं उसने’. महापालिका के पास भी यही जवाब है और रेलवे के पास भी। जबकि आमतौर पर ऐसी बस्तियों के लोग नहीं जानते कि एक दिन उनके घर टूटेंगे। एक दिन उनसे यहां रहने के सबूत मांगे जाएंगे। इसलिए वह कागजों को इकट्ठा नहीं कर पाते। ऐसी बस्तियों के लोग किस कागज के टुकड़े का क्या मतलब है, यह भी नहीं जानते। सभी बस्तियों में रहने वाले लोगों का भी यही हाल है। अफसरों को जो कागज चाहिए उनमें से कुछ कागज यहां के ज्यादातर रहवासियों के पास नहीं हैं। यह रहवासी अफसरों को अपनी झुग्गी दिखाना चाहते हैं। लेकिन अफसरों को तो झुग्गी में रहने का कागज ही देखना है। फिलहाल लोगों के घर का हक सरकारी फाइलों से काफी दूर है। इस तरह पूरी कार्यप्रणाली आफिस-आफिस के खेल में उलझ चुकी है। जबकि सरकार लोगों से तो शहर में रहने के सबूत मांग रही है और खुद डेमोलेशन के लिए गैरकानूनी तरीके अपना रही है। जैसे कि डेमोलेशन के दौरान यूनाईटेड नेशन’ की गाईडलाईन निभानी जरूरी थी। जिन्हें उखाड़ना था, उनके साथ बैठकर पुनर्वास और राहत की बातें की जानी थी। गाईडलाईन कहती है कि विकलांग, बुजुर्ग और एसटी-एससी को उनके रोजगार के मुताबिक और पुराने झोपड़े के पास ही बसाया जाए। पीड़ित आदमी को पहले पुनर्वास वाली जगह दिखाई जाए, इसके बाद अगर वह मांग करता है तो उसे कोर्ट में जाने का हक भी है। इसके लिए कम से कम 90 दिनों का समय भी दिया जाए। लेकिन महानगर पालिका ने तो एक भी कायदा नहीं निभाया। जबकि महानगर पालिका के भीतर अनियमितताओं की कई हैरतंगेज कहानियां हैं। जैसे कि 1992 को टीना बेन 14 साल की थी, तब उन्हें घर के सामने खड़ा करके एक स्लेट पर उनका नाम, एनके परिवार वालों का नाम लिखवाकर फोटो ले लिया गया। 2005 को याने ठीक 12 साल बाद जब वह दो बच्चों की मां बनी तो भी उन्हें 1992 की फोटो के हिसाब से घर का मुआवजा मिला। समय के इतने बड़े अंतराल में घर तो क्या बस्ती की पूरी दुनिया ही बदल जाती है, लेकिन नहीं बदलती है तो मगनगर पालिका की मानसिकता।

माटी में मिली बस्तियों से जो ज्वंलत सवाल उठे हैं वो ‘रहने’ के अलावा ‘रोजीरोटी’ और ‘बुनियादी जरूरतों’ से भी जुड़े हैं। जैसे कि अगर यहां के कुछ विस्थापितों का पुनर्वास हुआ भी तो वह कोसाठ जैसी जगह में होगा, जो विस्थापितों की जगह से ‘12-15 किलोमीटर दूर’ और शहर की हदों को छूता ‘बाढ़ प्रभावित इलाका’ है। ऐसे में जो विस्थापित कोसाठ जैसी जगहों पर आएंगे भी है तो अपने साथ बेकारी भी लाएंगे। क्योंकि उन्हें शहर के भीतर 150 रूपए दिन की दिहाड़ी मजदूरी मिलती रही है। मगर शहर के बाहर तो कोई काम नहीं मिलेगा और काम ढ़ूढ़ने के लिए उन्हें रोजाना 40 रूपए तक खर्च करके शहर जाना पड़ेगा। इसके साथ-साथ जो औरतें चाय की दुकानें चलाती हैं या फिर घरेलू काम के लिए आसपास की सोसाइटी में जाती हैं, उन्हें कोसाठ जैसी जगहों में आकर हाथ पर हाथ रखे बैठना होगा। इन सबसे ऊपर यह सवाल भी है कि शहर के बाहर का यह हिस्सा जब बरसात के मौसम में बाढ़ के पानी से भरेगा तो यहां के रहवासी कहां जाएंगे ?

17.1.10

यह हमारा पता है

शिरीष खरे


बीड़/कभी एक्सट्रा आर्टिस्ट के तौर पर काम करने वाला अक्षय कुमार आज बालीवुड का सुपर स्टार कहलाता है। मगर सैय्यद मदारी नाम की जमात से एक भी स्टार नहीं उभरता, ऐसा क्यों ?

हो सकता है कि आपको मालूम हो कि आजादी के तीन दशक बीत जाने के बाद हिन्दी फिल्मों में जब जन आक्रोश को एक्शन का रंग-रूप दिया जाने लगा तो हीरो के ज्यादातर स्टण्ट सैय्यद मदारी ही किया करते। यह और बात है कि मायानगरी में 30 साल से ज्यादा बीताने पर भी इन्हें न शोहरत मिली, न दौलत। कुछ सैय्यद मदारी इसे अपनी बदकिस्मती मानते हैं तो बहुत से पहुंच न होने पर अफसोस जताते हैं।

बहरहाल अब्दुल, सैय्यद मदारी जमात का सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा नौजवान है। सैय्यद अब्दुल 10 वीं पार कर चुका है। वैसे तो देश के असंख्य बच्चे 10वीं पार कर चुके हैं। फिर भी अब्दुल की बात खास इसलिए है क्योंकि इससे पहले तक तो सैय्यद मदारियों ने काले अक्षर पढ़ने की सोची भी न थी। पर आज की पीढ़ी पढ़ना चाहती है। वह क,ख,ग की रस्सियों पर चलकर बदलाव के नए खेल दिखाना चाहती है। सैय्यद अब्दुल से आगे अब कई नाम जुड़ने को बेकरार हैं; मसलन- सैय्यद फातिमा, सैय्यद सिंकदर, सैय्यद फारूख, सैय्यद कंकर, सैय्यद शेख तय्यब, सैय्यद वंशी, सैय्यद वशीर........

सैय्यद मदारी एक बंजारा जमात है। गली-मोहल्लों में हैरतअंगेज खेल दिखाना इनका खानदानी पेशा रहा है। मगर सबसे हैरतअंगेज खेल जो हुआ वो यह कि ‘जाति शोध केन्द्र’ और ‘जाति आयोग’ की सूचियों में ‘सैय्यद मदारी’ जमात का जिक्र तक नहीं मिलता है। इसलिए महाराष्ट्र में इनकी कुल संख्या का आकड़ा भी लापता है। अनुमान है कि महाराष्ट्र में महज 700 सैय्यद मदारी परिवार होंगे। थोड़े-थोड़े अंतराल से यह अपने ठिकाने बदलते चलते हैं। याने यह अपने बुनियादी हकों से दूर होते चलते हैं। ऐसे में जिला बीड़ से 80 किलोमीटर दूर सैय्यद खेड़करी बस्ती में आने के बाद मेरे जैसे कईयों की धारणा टूट जाती है।

यहां सैय्यद मदारी के 52 छोटे-छोटे और सुंदर झोपड़ों में 354 लोग रहते हैं। सैय्यद रफाकत से पता चला कि यह जमीन पहले दरगाह की थी, जिसे 1998 को 99 साल के लिए लीज पर लिया गया। तब पहली मर्तबा इन्हें चिट्ठी मंगवाने का पता नसीब हुआ। आज हर घर में पीने का पानी और बिजली की रौशनी भी है।

1998 को ही बच्चों की बेहतर पढ़ाई के लिए ‘गैर-औपचारिक केन्द्र’ खुला था। उस समय पढ़ाई-लिखाई की स्थिति 0 थी। लेकिन इन दिनों 1 से 11 क्लास तक कुल 20 बच्चे पढ़ते हैं। यह बच्चे बचपन (स्कूल) से जवानी (कालेज) की सीढ़ी पर चढ़ने को हैं। और अब्दुल, इन्हीं में से एक है।

ऐसा संभव हुआ- ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ और ‘राजार्षि शाहु ग्रामीण विकास’ संस्थाओं की मिलीजुली कोशिशों से। सामाजिक कार्यकर्ता बाल्मीक निकालजे ने कहा- ‘‘जो काम हम करते थे, अब वही अब्दुल को करते हुए देखने से खुशी मिलती है। 11 साल पहले यहां के लोग शिक्षा के नाम पर 5 मिनिट भी नहीं बैठ पाते थे। इसलिए पढ़ाई-लिखाई को दिलचस्प बनाने और उसकी जरूरत का एहसास दिलाने में सालों खर्च हो गए। जब कुछ को शिक्षा की अच्छाईयां दिखने लगी तो वह अपने बच्चों को स्कूल भेजने लगे। आज इन बच्चों की समझ बड़ी है, जमात में पूछ-परख भी।’’


बिन कागज सब सून
जैसा की ऊपर कहा जा चुका है कि 'जाति शोध केन्द्र’ और ‘जाति आयोग’ की सूचियों में ‘सैय्यद मदारी’ जमात का जिक्र तक नहीं मिला, जिसके चलते अब्दुल जैसे बच्चे आगे नहीं बढ़ सकते थे। जाति प्रमाण-पत्र के बगैर सैय्यद मदारियों के यह बच्चे दूसरी जाति के बच्चों की तरह अधिकार और सुविधाएं नहीं पा सकते थे। इसलिए दोनों संस्थाओं ने सैय्यद मदारियों के साथ मिलकर जाति प्रमाण-पत्र के लिए लड़ाई लड़ी। सामाजिक कार्यकर्ता सतीश गायकबाड़ ने कहा- ‘‘हमने अपनी पहचान के कागज मांगने के लिए बहुत कोशिश की। यहां से 80 किलोमीटर दूर बीड़ जाकर कलेक्टर साहब को अपना हाल सुनाया। उन्हें तो जाति का सबूत ही चाहिए था। जिले के ज्यादातर अफसर सैय्यद मदारियों को नाम से जानने के बावजूद कुछ नहीं कर सके। वो हर बार कानून में बंधे होने का हवाला देते और हम बार-बार खाली हाथ लौटकर आते।’’ यहां से सवाल उठा कि जो सैय्यद मदारी सरकार के काम-काज से जुड़े ही नहीं, वो अपने लिए जाति का कागज लाएं भी तो कहां से ?

इसके बाद जाति प्रमाण-पत्र की यह लड़ाई प्रदेश के ‘सामाजिक कल्याण व न्याय विभाग’ तक पहुंची। इस विभाग के बड़े अफसरों ने संस्थाओं के तर्क को जायज माना। आखिरकार महाराष्ट्र सरकार ने बीते साल (2009) एक ऐसी व्यवस्था बनाने का फैसला लिया है जो सैय्यद मदारियों को जाति का प्रमाण-पत्र हासिल करने में मदद करेगी। फिलहाल यह व्यवस्था दस्तावेजों में दर्ज है, बस अब इसके प्रकाशन का इंतजार है।

इस खुशखबरी ने सैय्यद खेड़करी बस्ती में ईद जैसी खुशियां बिखेर दीं। इससे उन 60 बच्चों को भी स्कूल से जोड़ने में मदद मिलेगी जो मदारी का खेल दिखाने के लिए बाहर जाते हैं। ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ से अनिल जेम्स ने कहा- ‘‘यहां खेल में भी बेजोड़ प्रतिभाएं हैं। खासकर जिमनेस्टिक और एथलेटिक्स में। इन्हें सिर्फ सही मौका चाहिए है। अगर यह राष्ट्रीय खेल प्रतिस्पर्धाओं तक पहुंचे तो यकीन मानिए कमाल दिखाएंगे। इस तरह भी तो उनकी पहचान बदल सकती है।’’

सैय्यद अब्दुल ने बताया- ‘‘मेरा कोई दोस्त पांचवी में छूटा, कोई आठवीं में। इस तरह कई दोस्त स्कूल से बाहर हो गए। वो कहते कि पढ़ने-लिखने से दाल-रोटी नहीं चलती। उनके अब्बा-अम्मी भी यही कहते कि अगर जाति का प्रमाण-पत्र नहीं मिला तो नौकरी नहीं मिलने वाली।’’ सैय्यद अब्दुल के पड़ोस से फातिमा चाची ने बताया- ‘‘तब लगा था कि अगर किताबों में फंसकर बच्चे अपने खेल भूल गए तो वो न इत के रहेंगे न उत के, बेकाम हो जाएंगे।’’ मगर जाति प्रमाण-पत्र नहीं होने के बावजूद कुछ बच्चे पढ़ते रहे। इन्हें अपना घर और उसका पता तो मिल गया था, जाति की पहचान का हक नहीं मिला था। और अब इसके मिलते ही पढ़ाई-लिखाई की राह का सबसे बड़ा रोड़ा भी हट जाएगा।


यही वो फोटो है
सैय्यद सिंकदर जैसे कई बच्चों के पास बालीबुड के स्टार और बड़े नेताओं के दर्जनों एल्बम हैं। हमने एक के बाद एक फोटो को पलटा तो जाना कि जो हम सोच नहीं पाते, सैय्यद मदारी कर दिखाते हैं। मसलन- आग के गोले से पार होना, आंख की पलक से 10 किलो का पत्थर उठाना, साइकिल को बालों से बांधकर घुमाना, ट्रक या टेम्पों को चोटी से बांधकर सरकाना, हाथ से पत्थर फोड़ना, सिर से नारियल फोड़ना, दांत से कांच चटकाना आदि-आदि इत्यादि। जब तक खेल चलता है, सैय्यद मदारी का पेट भरता है। एक बार बुढ़ापा हावी हुआ या चूके तो समझो गए काम से। जाहिर है सबसे बड़ी चुनौती है उम्र और जिन्दगी की सुरक्षा। इनकी जिन्दगी की शब्दावली में 'हेल्थ आफ केयर ' या 'इन्शोरेंस' जैसे शब्द नहीं हैं। हर रोज खेल-खेल में मरने का डर है। कुछ मरते भी हैं, मगर बाकी लोगों की जिंदगी नहीं रूकती है। वह भीड़ के बीचोबीच, नए-नए खेल लेकर आती है। सैय्यद सिंकदर की सुने तो- "दो हाथ से मोटर साइकिल खींचने वाले दारासिंह को बच्चा बच्चा जानता है। पर एक हाथ से दो मोटर साइकिल रोकने वाले सैय्यद मदारियों को कोई नहीं जानता।"

इस बीच कुछ धुंधले पड़ गए एल्बमों में इनके पिता अपनी ब्लेक-एण्ड-व्हाइड इमेज लिए अमिताभ, विनोद खन्ना, जितेन्द्र और धमेन्द्र के साथ खड़े दिखे। अबके लड़के रंगीन कपड़ों में शाहरूख, सलमान, गोविन्दा, संजय दत्त से बतियाते हैं। हीरोइनों की फोटो कम ही हैं। जो हैं उनमें पुराने जमाने की रेखा, हेमामालिनी, जीनत अमान, नीतू सिंह दिखती हैं। एक फोटो ऐसा भी है जिसमें शो खत्म होने पर प्रियंका और राहुल गांधी हाथ मिलाते हैं। दूसरी फोटो में खुद सोनिया गांधी पीठ ठोंकती हैं। हर फोटो के पीछे एक कहानी है, जिसे सुनाना यह नहीं भूलते। ऐसे सारे फोटो जोड़ो तो हजारों कहानियों जुड़ जाए।

आखरी में सैय्यद फातिमा ने संस्था के कार्यकर्ताओं के साथ खिंचवाई एक फोटो निकाली और सबको बताते हुए कहा- ‘‘यही एक फोटो (कहानी) है, जो हमारे बदलाव से जुड़ी है।’’


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संपर्क : shirish2410@gmail.com

13.1.10

विधायक की 1 चिट्ठी ने 11 साल से गैंगरेप केस को दबाए रखा है

शिरीष खरे


बड़ोदरा/ इन दिनों रूचिका गिरहोत्रा की दुखद दास्तान से पूरे देश के लोग सकते में हैं और सरकार के कान कुछ खड़े हुए हैं; ऐसे में आइए एक दशक पुरानी उस दास्तान से भी धूल की परतें हटा लेते हैं जिसमें धूलेटी त्यौहार की रात को 13 साल की दलित लड़की के साथ, स्थानीय विधायक के रिश्तेदार और उसके साथी ने बलात्कार किया था।

11 सालों बाद, आज भी यह केस जहां से शुरू हुआ था वहीं अटका पड़ा है- यानि जब वह लड़की नाबालिग थी तो दबंगों ने अपना दम भरते हुए धरदबोचा था। तथ्यों के हिसाब से साफ होता है कि पुलिस ने किस तरह से पूरे मामले को अनदेखा किया था। हालांकि मामला अदालत भी पहुंचा, जो दशक भर से अपनी स्थिर अवस्था में विद्यमान है। अवस्था की स्थिरता को जानने के लिए यही तथ्य काफी है कि 4000 दिनों के गुजरने के बावजूद गवाहों को सम्मन भेजे जाने अभी बाकी हैं। जबकि अदालती लड़ाई में लड़की के दादा अपने हिस्से की ज्यादातर जमीन बेच चुके हैं। जबकि लड़की अब 24 साल की हो चुकी है और उसकी शादी के बाद दो बच्चे भी हैं।

11 साल पहले, विधायक खुमानसिंह चौहान ने कथित तौर पर उस रिश्तेदार को बचाने के लिए पुलिस सब-इंस्पेक्टर को अपने अधिकारिक लेटरहेड पर हाथ से लिखी हुई एक चिट्ठी भेजी थी। खुमानसिंह चौहान सावली विधानसभा क्षेत्र से लगातार कांग्रेस के विधायक रहे हैं।

13 मार्च, 1998 को रमेश बारिया और उसके साथी ने कथित तौर पर मोक्षी गांव की दलित लड़की को उसके घर से अगवा किया और फिर बारी-बारी से बलात्कार किया। अगली सुबह यह दोनों खून से लथपथ उस लड़की को पोण्ड गांव में ही छोड़कर भाग निकल थे। यह लड़की अपने मां-बाप के अलग-अलग हो जाने के बाद से दादा वशराम वंकर के साथ रहती थी। वारदात वाले दिन दादा के बाहर जाने की वजह से यह लड़की घर में अकेली थी।

लड़की के दादा वशराम वंकर ने बताया कि ‘‘जैसे ही मालूम चला, हम उसे पास की पुलिस चौकी ले गए। वहां के पुलिस वालों ने हमसे कहा कि उसे भदरवा पुलिस स्टेशन ले जाओ। जब हम भदरवा पुलिस स्टेशन ले गए तो वहां केस दर्ज करने से मना कर दिया गया। कहा गया कि उसे मेडीकल जांच के वास्ते अस्पताल ले जाओ।’’

एसएसजी अस्पताल के डाक्टर पहले तो यह सोचने लगे कि गहरे सदमे में डूबी यह कौन लड़की है, यहां से उसे मानसिक उपचार के लिए वडोदरा अस्पताल में रेफर किया गया। मगर जब वडोदरा अस्पताल के डाक्टरों को लगा कि इस लड़की के साथ बलात्कार हुआ है तो उसे वापस भेज दिया गया। इसके बाद मेडीकल जांच पड़ताल में उसके साथ बलात्कार होने की पुष्टि हुई। इसकी शिकायत चार दिनों बाद पुलिस स्टेशन में दर्ज हो सकी। वशराम वंकर ने बताया कि ‘‘जब पुलिस वाले लीपापोथी करने लगे तो हम वड़ोदरा जाकर पुलिस अधीक्षक साब से भी मिले, पर साब ने उल्टा यह ईल्जाम लगा दिया कि हम पैसा वसूलने के लिए ऐसा रहे हैं।’’

वशराम वंकर की लड़ाई को गैर सरकारी संस्था ‘कांउसिल फार सोशल जस्टिस’ की तरफ से गुजरात हाई कोर्ट तक ले जाया गया। इसके पहले तक पुलिस वालों का रूख बहुत सख्त और गैर जिम्मेदाराना ही रहा। लड़की के परिवार वालों का मानना है कि 14 मार्च, 1998 को विधायक के लेटरहेड पर हाथ से लिखी गई उस चिट्ठी का यह असर हुआ कि बदरवा पुलिस स्टेशन में बलात्कार का मामला दर्ज नहीं किया गया।

देखा जाए तो उस लेटरहेड पर विधायक खुमानसिंह चौहान के दस्तखत भी हैं। वैसे खुद चौहान का यह दावा है कि उनके लेटरहेड का किसी ने ‘गलत इस्तेमाल’ किया है और वह किसी रमेश बरिया नाम के आदमी के बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं। खुमानसिंह चौहान के मुताबिक ‘‘मैं नियमित रुप से कई सिफारिश पत्रों को लिखता रहता हूं, मगर ऐसे किसी सिफारिश पत्र के बारे में मुझे तो याद नहीं आ रहा है।’’ उन्होंने आगे कहा कि ‘‘ऐसा मैं कभी नहीं कर सकता, बलात्कार जैसे गंभीर मुद्दे पर तो बिल्कुल भी नहीं।’’ दूसरी तरफ ‘कांउसिल फार सोशल जस्टिस’ के सचिव वालजी भाई पटेल के मुताबिक ‘‘चौहान साब सच नहीं कह रहे हैं, रमेश बरिया उनके खास रिश्तेदार हैं, उनके मां के पक्ष से।’’ इस केस के संबंध में वालजी भाई पटेल ‘सोऊ मोटू कांग्निसेंस (स्वतः संज्ञान)’ लिए जाने के पक्ष में हैं। जिससे मामले को और लंबा खींचने की बजाय तुरंत न्याय मिल सके।

पड़ताल से जान पड़ता है कि इस केस में पुलिस ही पहली बाधा बनी। उसने हर स्तर पर लापरवाही और उदासीनता बरती थी :

> पुलिस ने एक महीने की देरी से 25 अप्रेल, 1998 को सेशन कोर्ट के सामने चार्टशीट दाखिल की। इसमें रमेश बरिया और उसके साथी को आरोपी बनाया गया था।

> एक साल बाद, 14 अप्रेल, 1999 को एडिशनल सेशन जज ने कहा कि यह केस सेशन कोर्ट की बजाय लोक अदालत में जाना चाहिए। यह नाबालिग लड़की से सामूहिक बलात्कार का मामला है और इसमें दोनों पक्षों के बीच ‘समझौता’ होने की गुजांइश भी है। मगर लड़की के परिवार वालों ने समझौता करने से साफ मना कर दिया।

> आठ साल गुजरने के बाद, 30 मई, 2007 को, मुकदमा खत्म होने से पहले, कोर्ट को यह एहसास हुआ कि इस केस की सुनवाई के दौरान अपनाई गयी कार्यप्रणाली सही नहीं थी। इसमें पुलिस ने सीधे सेशन जज को ही चाटशीट दे दी थी। कायदे से उसे यह चार्टशीट ज्यूडीशियल फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट को सौंपनी चाहिए थी। इस केस के सारे दस्तावेज इंवेस्टीगेटिंग आफीसर को वापिस दिये गए। उससे कहा गया कि यह सारे दस्तावेज ज्यूडीशियल फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट तक पहुंचाए जाए।

> पुलिस ने 5 महीने का वक्त गुजारने के बाद, 9 अक्टूबर, 2007 को यह केस मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया।

> अब जो स्थिति है उसके मद्देनजर सेशन कोर्ट को और सुनवाई करनी पड़ेगी। इस केस की सुनवाई की अगली तारीख 23 जनवरी, 2010 है।

गुजरात हाई कोर्ट के भूतपूर्व जज जस्टिस एस एम सोनी के मुताबिक ‘‘यह एक बहुत गंभीर मामला है जिसे लोक अदालत में नहीं भेजा जाना चाहिए। यह सेशन कोर्ट कि गलती है कि उसने इस मामले को लोक अदालत में भेजे जाने की बात कही थी। साथ ही इस मामले से जुड़े सारे दस्तावेजों को इंवेस्टीगेटिंग आफीसर को नहीं लौटाए जाने चाहिए थे।’’

‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ के ‘विकास सहयोग’ विभाग की गुजरात टीम में मैनेजर प्रवीण सिंह के मुताबिक ‘‘यह तो प्रकाश में आने वाला एक मामला है। बहुत सारे मामले तो प्रकाश में ही नहीं आते। इसलिए हम वालजी भाई पटेल जैसे सामाजिक कार्यकताओं के अलावा बहुत सी संस्थाओं के साथ मिलकर ऐसी वारदातों के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। हम चाहते हैं कि न केवल दोषियों बल्कि ऐसे मामलों में लापरवाही करने वाले सभी अधिकारियों जैसे इंवेस्टीगेटिंग आफीसर, कोर्ट रजिस्टार्ड, चीफ पब्लिक प्रोस्टिक्यूटर और स्पेशल ट्रायल जज के खिलाफ भी कार्रवाई की जाए। जिससे ऐसे मामले हतोत्साहित हों।’’

लड़की के दादा वशराम वंकर की उम्र अब 70 को पार का चुकी है; उनके साथ इस अदालती लड़ाई में लड़की के मामा सुरेश वंकर भी भागीदार हैं। सुरेश वंकर कहते हैं ‘‘अभियुक्त के रिश्तेदारों ने हमें 50,000 रूपए देने की पेशकश की थी..... जिसे हमने ठुकरा दिया है।’....‘‘काश कोई हमारे दर्द को समझ सकता।’’ दादा वंशराम वंकर एक बात और जोड़ते हुए कहते हैं ‘‘हमारे हिस्से में इतनी राहत तो है कि बच्ची को बहुत प्यार देने वाला पति और ससुराल मिला है। ससुराल वालों को बच्ची के बार-बार अदालत आने-जाने पर भी कोई एतराज नहीं है।’’

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