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12.4.10

समुदाय से दूर होता सामुदायिक रेडियो

शिरीष खरे


1991 के बाद जैसे ही उदारीकरण के नाम पर बाजार खुला वैसे ही मीडिया भी एक बड़े बाजार में बदला। पिछले एक दशक से अब तक के बदलते परिदृश्यों पर गौर किया जाए तो इसमें एक ‘विरोधाभाषी पहलू’ नजर आता है। एक तरफ मीडिया का बाजार बढ़ने की बातें चलती हैं और दूसरी तरफ गाँव में प्रिंट या इलेक्ट्रानिक मीडिया की पहुँच सीमित बनी हुई है। प्रिंट मीडिया के नजरिए से इसका खास कारण अशिक्षा है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिहाज से बिजली और संचार की खराब व्यवस्था। फिर ऐसे इलाकों में कुशल संवाददाता और पत्रकारों की तादाद भी कम ही रहती है। शहर में केरियर की नई संभावनाएं होने से योग्य मीडियाकर्मी गाँव में काम नही करना चाहते हैं। ग्रामीण पत्रकारिता में विशेषज्ञों की कमी बरकरार है। इन सुदूर इलाकों से मिलने वाली ज्यादातर सूचनाएं स्ट्रिंगरों द्वारा भेजी जाती हैं। यह अलग-अलग समाचार माध्यमों के लिए अस्थायी और आंशिक तौर पर तैनात होते हैं। आमतौर पर उनसे बेहतरीन रिपोर्टिंग की उम्मीद नहीं की जाती है।

इसी तरह कई लम्बी लड़ाईयों के बाद सूचना का जो हक हासिल हुआ है, ज्यादातर ग्रामीण अज भी उसका उपयोग नहीं जान पाए हैं। बहुत कम जानकार अपने धैर्य और विवेक की परीक्षा देकर इस कानून का फायदा उठा पाते हैं। कुछेक खास और गुप्त सूचनाएँ मीडिया से ही मिलती हैं। इसलिए इन ग्रामीण इलाकों के लिए मीडिया से दूरी का अर्थ है- जनहित की सूचनाओं से बेदखली।

प्रिंट, इलेक्ट्रानिक और सूचना का हक जैसे माध्यम गाँव तक बेअसर हो रहे हैं। इन्हें असरदार बनाने के उपायों पर सोचा जा रहा है। साथ ही बाजार के सामानान्तर दूसरे माध्यमों को भी खड़ा किया जा रहा हैं। इनमें रेडियो की भूमिका सशक्त बतलाते हुए सामुदायिक रेडियो पर जोर दिया गया है। इसके कई कारण भी हैं जैसे-बिजली की समस्या से निजात मिलना और रेडियो का हल्का, गतिशील, सस्ता तथा सरल उपकरण होना। फिर रेडियो कई दशकों से भारतीय जनता के दिल से जुड़ा रहा है। इसमें दोतरफा संवादों की पंरपरा भी बढ़ गई है। रेडिया पर फोन कर या स्टेशन पर खत भेजकर गाँव के लोग अपनी बात विशेषज्ञ, अधिकारी, नेता, मंत्री आदि किसी से भी कहते-सुनते रहे हैं।

समुदाय के इन्हीं हितों को ध्यान में रखकर सामुदायिक रेडियो की अवधारणा और योजना बनायी गई। सरकार या प्रशासन की मुख्य समस्या गाँव-गाँव जुड़ने की है और इस दिशा में सामुदायिक रेडियो योगदान दे सकता है। इसके लिए उसके पास स्थानीय बोली, साधन, लोग और समर्थन भी है। ऐसा कहा जाता है कि सामुदायिक रेडियो का मकसद ग्रामीण जनता की आवश्यकता, प्राथमिकता, समस्या, सुझाव और समाधान से होना चाहिए। लेकिन आज उसे केवल मंनोरजंन तक सीमित बनाया जा रहा है। ताज्जुब कि बात है कि सामुदायिक रेडियो के नाम पर ऐसी कई गतिविधियाँ बगैर समुदायिक सहयोग से चल रही हैं। मीडिया के दूसरे रुपों की तरह इसमें भी विकृfतयाँ दिखाई देने लगी हैं। सामुदायिक रेडियो में समुदाय की भागीदारी को नजरअंदाज बनाना सबसे खतरनाक है।

मीडिया के नए बाजार में सेटेलाईट और दृश्य रेडियो के साथ-साथ अब सामुदायिक रेडियो भी शामिल हो चुका है। इन दिनों रेडियो बाजार पर बड़े-बड़े व्यापारियों की नजर लगी हुई है। इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश के लिए मीडिया घरानों आगे आ रहे हैं। ऐसे में सामुदायिक रेडियो के नाम पर एफएम को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

शुरूआती रूझानों से मालूम होता है कि एफएम रेडियो के ज्यादातर लाइसेंस प्राइवेट सेक्टर के चंद मीडिया घरानों को ही दिये गए हैं। बीते साल तक, सरकार ने एफएम चैनल चलाने के लिए अलग-अलग राज्यों के लगभग 100 शहरों में कंपनियों को 350 के आसपास लाइसेंस बांटे हैं। पिछले कुछेक सालों में ही (तथाकथित) सामुदायिक रेडियो की संभावनाएं बढ़ी हैं और उसी अनुपात में संख्या भी। जहाँ तक सामुदायिक रेडियो की बात है उसके लाइसेंस कुछेक बड़े संस्थानों की झोली में गए हैं और सामुदायिक रेडियो के संचालन में छोटे समूहों की प्रभावपूर्ण हिस्सेदारी नहीं बन पा रही है।

रेडिया के इस कारोबार में विशालकाय विदेशी कंपनियाँ अपना अधिकार स्थापित करने के लिए उतावली हैं। उदारीकरण की नीति के मुताबिक यह बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए सरकार पर दवाब बना सकती हैं। इसके लिए पहले स्तर का दवाब इस क्षेत्र से संबंधित नीति, योजना और कानूनों पर होगा। अगर यह दवाब असर करता है तो रेडियो का बाजार ज्यों-ज्यों बढ़ेगा, त्यों-त्यों विशाल कंपनियों की हिस्सेदारी भी बढ़ती जाएगी।

रेडियो का नया बाजार और उस पर पश्चिमी व्यावसायिकता की पहचान होने लगी है। आजकल भारतीय श्रोता अनेक विदेशी प्रसारण एंजेसियों से निकटता भी रख रहे हैं, जैसे-बीबीसी, वायस आफ अमेरिका, रेडियो जर्मन वगैरह। देश की जनता केवल आकाशवाणी तक सीमित नही रही। रेडियो में भी कार्यक्रमों की संख्या और प्रतिस्पर्धा बढ़ने से यहाँ ‘सबसे पहले’ या ‘सबसे तेज’ की दौड़ नजर आने लगी है। कई कंपनियाँ रेडियो आवार्ड कार्यक्रम को लोकप्रिय बनाने में लग गए हैं। आज भारत में विज्ञापन पर होने वाले कुल खर्च का 2% सिर्फ रेडियो में दिए जाने वाले विज्ञापन का हिस्सा है। कल रेडियो विज्ञापन का नया और सशक्त उपकरण बन जाएगा। मगर सामुदायिक रेडियो को शुरू करने की मूलभूत जरूरत और अवधारणा का हमेशा के लिए अंत हो जाएगा।

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संपर्क : shirish2410@gmail.com

7.4.10

मीडिया का यह कैसा फैलाव है ?

शिरीष खरे

आज से करीब 15 साल पहले, जब मीडिया की पहुंच महज महानगरों तक सीमित थी तब इसके विस्तार पर जोर दिया जाता था। अब हमारे देश में अनेक क्षेत्रीय समाचार माध्यमों के कारण खबरों की संख्या और पहुंच, दोनों ही तेजी से बढ़ी हैं जिससे स्थानीय खबरों को महत्व मिला। इसके साथ ही मीडिया के स्वरुप में विकृतियां भी आयी, जैसे-किसी छोटी घटना को बढ़ा-चढ़ाकर बताकर पेश करना, सनसनीखेज या मसाला शैली में बढ़ोत्तरी और खबरों में भाषाई हमला का तेज होना वगैरह। कई बार संवेदनशीलता की ऐसी अधिकता त्रासदी को कमजोर बना देती है। जब मीडिया सीमित था तब उस पर आम आदमी का भरोसा ज्यादा था। आज खबरों में अंतरविरोध बढ़ने के साथ ही मीडिया की विश्वसनीयता भी घटने लगी है। इसे एक ही खबर को जांचने के लिए लोगों द्वारा अलग-अलग माध्यम या चैनल बदलने के तौर पर देखा जा सकता है। इन दिनों खबरों के चुनाव और प्रस्तुतीकरण में अहम बातें या तो उजागर नही होती, अगर होती भी हैं तो अमर्यादित भाषाई हमला विकृति पैदा करता है। दूसरी तरफ, समाचारपत्रों में ‘संस्करणों’ का प्रचलन बढ़ने से अधिकतर खबरों का अपनी क्षेत्रीयता में सिमट जाना एक दुखद स्थिति है। इस प्रकार, एक क्षेत्र की खबर दूसरे क्षेत्र के लोगों तक नहीं पहुंच पा रही हैं और आसपास की जनता में खबरों का आपसी संबंध रूक सा रहा है। यही कारण मीडिया के वास्तविक विस्तार पर प्रश्नचिन्ह भी लगाता है।

मीडिया के भीतर भी मुख्यतः मीडिया की व्यावसायिकता को लेकर ही चर्चाएं हो रही हैं। एक वर्ग व्यवसायिकरण से परहेज नहीं करता। इसके पीछे उनके अपने तर्क हैं, जैसे-‘उदारीकरण के कारण जब पूरा परिदृश्य ही बदल रहा हो तब मीडिया में परिवर्तन आना स्वभाविक ही है’, ‘सभी क्षेत्रों की तरह अब मीडिया को भी कमाने दिया जाए’, ‘जहां तक नैतिकता का सवाल है तो इसमें भी केवल मीडिया से ही उम्मीद नहीं करनी चाहिए’ वगैरह। दरअसल, मीडिया के व्यवसायीकरण ने उसका फैलाव किया और इसी फैलाव ने मीडिया को नियंत्रण से बाहर कर दिया। सिक्के का दूसरा पक्ष आदर्शवाद पर टिका है। प्रेस लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है इसलिए उसकी अपनी जिम्मदारियां भी हैं। लोकत्रंत के पहले तीन स्तम्भों में से एक भी बाजार से सीधा नहीं जुड़ा है। व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका को बाजार से दूर रखने का जो भी कारण हो वहीं कारण मीडिया पर भी लागू होना चाहिए। अब विकास, विज्ञान, पर्यावरण और लोगों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर समाचार और कार्यक्रम गायब होने लगे है। इसके बचाव में अक्सर कहा जाता है कि जो देखा, सुना या पढ़ा जा रहा है दर्शक, पाठक या श्रोता वही तो चाहता है। लेकिन अभी तक लोगों की रूचियों को जानने का न तो कोई पुख्ता अध्ययन हुआ है और न ही सर्वेक्षण, फिर भी इस कथन को सच मान लिया गया है।

आजादी के बाद समाचार पत्रों में पूंजी का उपयोग बढ़ा और पत्रों की संख्या भी। पहले मात्र समाचारपत्रों को बेचकर उनका प्रकाशन कराते रहना मुश्किल था इसलिए विज्ञापनों का प्रयोग प्रचलन में आया। बाद में प्रेस कमीशन ने भी समाचार और विज्ञापनों का अनुपात 60/40 रख दिया। तब विज्ञापन लागतों की वापसी और आय का मुख्य साधन बन गए। धीरे-धीरे समाचार पत्रों में पूंजी की अधिकता बढ़ने से व्यवसायिकों का प्रवेश बढ़ने लगा। पहले यह उनका सहायक व्यवसाय था, जो बाद में मुख्य व्यवसाय बन गया। अब समाचार पत्र, समाचार के अलावा उत्पाद बेचने का सशक्त माध्यम भी बने। आपातकाल की समाप्ति के बाद प्रेस व्यवसायिकों को लगा कि अगर सरकार की मामूली आपत्ति पत्रकारों पर दबाव बना सकती है तो उनके हाथों में तो और बड़ा हथियार अर्थात रोजगार है। उन्होंने अपनी हितो को ध्यान में रखकर समाचारों को प्रकाश में लाने और छिपाने के निर्देश देने शुरू कर दिए। हालांकि आज भी इलेक्ट्रानिक मीडिया की तुलना में समाचार-पत्र सामग्री की गुणवत्ता और जनता के प्रति अपनी जवाबदारी को लेकर बेहतर स्थिति में बताया जाता है।

प्रिंट की तुलना में इलेक्ट्रानिक मीडिया नया है और इसकी कोई सामाजिक पृष्ठभूमि नहीं रही। आकाशवाणी के बाद क्रमशः दूरदर्शन, केबल, चौबीस घण्टों के न्यूज चैनल और इंटनरेट वगैरह आए। दूरदर्शन का सरकार के अधीन होने से उसकी अपनी सीमाएं थीं, अक्सर इन सीमाओं में बंधे रहने के कारण उसकी आलोचनाएं होतीं। जब-जब दूरदर्शन पर विरोध के स्वर को दबाने के आरोप लगता तब-तब इसे एक स्वायत्त संस्था बनाने पर विमर्श होता। मगर दूरदर्शन के कार्यक्रमों का स्तर था और विज्ञापनों की सीमा भी। इस बीच सूचना क्रांति का जो युग आया उसने मीडिया को बाजार का महज उपकरण बना दिया। आजकल इन्हीं विचारशून्य सूचनाओं पर समाज को दिग्भम्रित करने का आरोप लगाया जा रहा है।

समाज और बाजार के बीच मीडिया एक माध्यम होता है। मीडिया से ही बाजार और समाज आपस में एक-दूसरे से बंधे हैं। मीडिया में प्रसारित किसी उत्पाद का विज्ञापन दिखाने से उसकी विश्वसनीयता बढ़ती है। इसीलिए मीडिया की जिम्मेदारी दोहरी हो जाना चाहिए लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा होता नहीं दिखता। दरअसल, पश्चिमी देशों से मुकाबला और उसके असर के कारण भारत में स्थितियां तेजी से बदली हैं। अब हर वस्तु का बाजार है। बाजार में उपभोक्तावादी संस्कृति का मानवीय संवेदनाओं से मेल बैठना मुश्किल है। बाजारों को तैयार करने में पश्चिम से प्रभावित मीडिया ने आवश्यक उपकरण का काम किया। इस मीडिया का मकसद सारी दुनिया को ‘एक बाजार के लिए एक सभ्यता’ को प्रोत्साहित करना रहा ताकि उत्पादित माल को बेचना आसान हो सके। इस आधार पर आधुनिक मीडिया का विस्तार भी होना ही था। मीडिया के विकृति से चिंतित कुछ जन नए विकल्पों की बात करते हैं। मगर विकल्प कोई भी हो, बाजार के प्रभाव से बचना मुश्किल होगा। कुछ का मत है कि आधुनिक मीडिया ने पारंपरिक और लोक माध्यमों को कमजोर बनाया है जबकि आज का बाजार इन्हीं माध्यमों से अपनी उत्पादनों को बेचने की क्षमता भी रखता है। बात चाहे सामुदायिक रेडियो की हो या वेब दुनिया जैसे नए विकल्पों की, सभी इन दिनों मनोरंजन द्वारा और मंनोरंजन के लिए हाजिर हैं।

इन दिनों विभिन्न सामाजिक संस्थाओं द्वारा समाचार माध्यमों पर सेक्स, अपराध, अंधविश्वास आदि नकारात्मक प्रवृतियों को रोकने के लिए सरकार से कारगर राष्ट्रीय मीडिया नीति बनाने की मांग की जा रही है। ऐसी संस्थाओं का मानना है कि आजकल मीडिया में सामग्री का चयन सामाजिक सरोकारों के आधार पर नहीं बल्कि बाजार की विशुद्ध शक्तियों द्वारा निर्धारित होता हैं। लेकिन मीडिया की आलोचना का मतलब मीडिया के विरोध से नहीं बल्कि मीडिया में सुधार संबंधी चिंतन से होना चाहिए। आज हर समाचार माध्यम अपने लक्ष्य समूह तक अधिक से अधिक पहुंचना चाहता है तो यह ठीक भी है। लेकिन अगर उस लक्ष्य समूह की प्राथमिक समस्याओं को ध्यान में रखने की जरूरत महसूस हो रही है तो इस पर भी विचार करना चाहिए। बाजार से मीडिया को पूर्णतः अलग-थलग करने की बजाय इसे बाजार के दुष्प्रभावों से बचाना आसान होगा। इसीलिए मीडिया की एक सार्थक नीति बनाने की बात में संभावना दिखती है। हालांकि यह बहुत संवेदनशील मांग है क्योंकि प्रेस की अभिव्यक्ति पर रोक लगाने की लम्बी कहानियां भी हैं। इस नीति का लक्ष्य मीडिया पर प्रतिबंधों से नही बल्कि सामाजिक जिम्मेदारियों के संदर्भ में उसकी कारगर रणनीति से होना चाहिए। इसलिए मीडिया की नीति को मीडिया के लोगों द्वारा बनाने से इसकी लोकतांत्रिक संरचना ही मजबूत होगी। आज भी मीडिया में असंख्य लोग पूरी निष्ठा और ईमानदारी से कार्य करना चाहते हैं लेकिन जवाबदेही की कोई स्पष्ट रुपरेखा न होने से वह अपनी भूमिका का निर्वाहन नहीं कर पाते।

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1.4.10

मीडिया के मानक और लोग

पशुपति शर्मा

आम तौर पर यह कह दिया जाता है कि मीडिया के अब कोई मानक नहीं बचे तो इन पर बहस की गुंजाइश ही कहां बचती है। कुछ हद तक ये बात सही है, लेकिन क्या इसके उलट ऐसा नहीं लगता कि अब मानकों पर और ज्यादा गंभीरता से सोचने और विचारने की जरूरत आन पड़ी है। आप और हम सबसे ज्यादा मीडिया के बदलते मानकों से ही प्रभावित हो रहे हैं।

मीडिया के सैद्धांतिक मानकों और व्यावहारिक मानकों में काफी अंतर आ गया है। व्यावहारिक मानकों के कर्ता-धर्ता कामयाबी के शिखर पर खड़े हो जनता का मुंह चिढ़ा रहे हैं तो सैद्धांतिक मानकों के पक्षधर पाताल की खाइयों में खड़े जनता के हितों की दुहाई दे रहे हैं। इन दोनों के बीच अटका है 'लोग'। लोग, जो हर मानक के प्रयोग का आधार है। लोग, जो मानकों के नतीजों को प्रभावित करता है। लोग, जो चैनलों की टीआरपी तय करता है। लोग, जो अखबारों की प्रसार संख्या घटाने-बढ़ाने की शक्ति रखता है, लेकिन अफसोस उस लोग की भूमिका मीडिया के मानक तय करते वक्त कम से कमतर होती जा रही है।

बहरहाल, बात मीडिया की मानकों की करें तो सबसे बड़ा बदलाव तो ये है कि मानक-लोग, लोकहित से शिफ्ट कर गए हैं, अब बाजार और उपभोक्ता नए मानक बन गए हैं। नई परिभाषा-जो बाजार को भाए वही खबर है। जो मुनाफा दे, वही खबर है। जो विज्ञापनदाताओं के हितों का पोषण करे, वही खबर है। ऐसे में खबरों के मानक तय करने की शक्ति संपादकों के हाथ से फिसलकर मार्केटिंग डिवीजन के हाथ में जा रही है तो कैसा अचरज?

अब बात एक दो उदाहरणों से की जाए तो शायद परिदृश्य और स्पष्ट हो। विकास संवाद के मीडिया सम्मेलन के लिए इंदौर आ रहा था कि रास्ते में नई दुनिया का अखबार खरीदा। 12 मार्च 2010 की नई दुनिया की लीड खबर- अखबारों में छपने से कुछ नहीं होता। मध्यप्रदेश के आदिम जाति व अनुसूचित जाति कल्याण मंत्री विजय शाह से जुड़ी खबर लीड बनी थी। मुद्दा बस इतना था कि मलगांव मेले में बेले डांस को लेकर मीडिया ने उन पर चौतरफा हमला किया तो वो भी मीडिया की औकात बनाने पर उतारू हो गये। मीडिया और मंत्रीजी की टशन में लीड खबर बन गई। यहां मानक न तो लोग था, न लोक हित। यहां दो सत्ता प्रतिष्ठानों के ईगो की लड़ाई थी। मीडिया की सत्ता को
मंत्री ने चुनौती दी तो लीड खबर बन गई।

इसी क्रम में एक खबर मुझे पिछले दिनों बिहार के सीवान जिले (जीरादेई) के विधायक के ठुमके वाली ध्यान में आ रही है। इसे चैनल वालों ने बार-बार दिखाया। बार बालाओं के साथ ठुमके लगाते विधायक श्याम बहादुर सिंह के विजुअल में बड़ा दम था, बिकाउ था सो खूब चला। अगले दिन विधायक जी ने माफी मांगी- फिर वही डांस के विजुअल चले। तीसरे दिन श्याम बहादुर सिंह ने कहा- नाच कर मैंने कोई गलती नहीं की, मैं फिर ठुमके लगाऊंगा। खबर तीसरी बार भी चली- क्योंकि खबर से ज्यादा दम और रस बार बालाओं के ठुमकों में था। मीडिया में ऐसे में कई बार विधायक या मंत्रीजी के हाथ का एक खिलौना बस नजर आता है। वो जब चाहें खबर चलवा लें। आप ऊपर के दो उदाहरणों में खुद ही तय करें कि खबर के मानक क्या हैं?

तमिलनाडु पत्रकार यूनियन ने पेड न्यूज को लेकर एक सर्वेक्षण किया। सर्वेक्षण के मुताबिक लोकसभा चुनावों के दौरान तमिलनाडु के अखबारों ने पेड न्यूज के नाम पर 350 करोड़ रुपयों का वारा-न्यारा किया। लोक सभा चुनावों में राजनेताओं और राजनीतिक दलों से मार्केटिंड डिवीजन ने डील की और खबरें धड़ल्ले से छपती रहीं। कभी-कभी तो एक ही संस्करण में एक ही क्षेत्र के दो प्रतिद्वंद्वियों को एक साथ कागज में जिता दिया गया। लोगों और लोक हित के लिहाज से उम्मीदवारों का विश्लेषण नहीं हुआ, पैसों के लिहाज से हार-जीत तय हो गई।

मार्च महीने (2010) में कुछ संगठनों ने प्रेस क्लब में एक प्रेस वार्ता रखी। इस प्रेस वार्ता में जस्टिस राजेंद्र सच्चर, अरुंधति राय समेत कई लोगों ने अपनी बात रखी। अरुंधति राय ने इस बात पर हैरानी जाहिर की कि मीडिया नक्सलवाद के मामले में सरकारी वर्जन को ही अंतिम मानकर खबरों का प्रसारण कर रहा है। इतना ही नहीं, दूर-दराज के इलाकों के उन सभी जन संगठनों को नक्सलवादियों की कतार में खड़ा कर दिया गया है जो जनता के हितों की बात करते हैं। जहां मीडिया को ज्यादा जिम्मेदार भूमिका निभानी चाहिए वहां वो अगर सरकार के हाथ की कठपुतली बन जाए तो फिर कहना ही क्या?

ऐसे में मानकों का सवाल बार-बार उठता है और जरूरी भी है, लेकिन सवाल है कि क्या इन मानकों को कोई मानेगा? जिन लोगों ने मीडिया के मानकों को दफन कर दिया है क्या वो फिर से मानकों की रूह को कब्र से बाहर आने देंगे?

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पशुपति शर्मा संवेदनशील मीडियाकर्मी है.

25.10.09

मीडिया में मुस्लिम औरतें दिखती भी हैं मगर इस तरह

शिरीष खरे


कहते हैं कि "मीडिया में जो सच नहीं होता, कई बार वह सच से भी बड़ा सच लगने लगता है।" कहते हैं ऐसे हालत से बचने के लिए "जो दिख रहा है वो क्यों दिख रहा है को लेकर चलो" तो कुछ ज्यादा पता चलता है। ऐसे ख्यालों से बेदखल दिलोदिमाग के बीच मेरी नजर यूट्यूब में कुछ और सर्च करते-करते कहीं और जा अटकी। मैंने देखा मुस्लिम औरत को इस्लाम की कट्टरता से जोड़ने वाला यह कोई अकेला वीडियो नहीं था, मीडिया के कई सारे किस्सों से भी जान पड़ता है कि मुस्लिम औरतों के हक किस कदर ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘लोकत्रांतिकता’ की बजाय ‘साम्प्रदायिकता’ और ‘राष्ट्रीयता’ के बीचोबीच झूल रहे हैं।

बीते दिनों बिट्रेन के मशहूर अखबार ‘द गार्जियन’ ने मोबाइल से दो मिनिट का ऐसा वीडियो बनाया जिसमें पाकिस्तान की स्वात घाटी के कट्टरपंथियों ने 17 साल की लड़की पर 34 कोड़े बरसाए थे। इसी तरह के अन्य वीडियो के साथ अब यह भी यूटयूब में अपलोड है, जो संदेश देता है कि वहां कोई लड़की अगर पति को छोड़ दूसरे लड़के के साथ भागती है तो उसका अंजाम आप खुद देख लीजिए। वैसे तो अपने देश के विभिन्न समुदायों में भी ऐसी घटनाएं कम नहीं है मगर इधर की मीडिया ने उधर की घटना को कुछ ज्यादा ही जोर-शोर के साथ जगह दी। यह अलग बात है कि उन्हीं दिनों के आसपास, उत्तरप्रदेश के अमरोड़ा जिले से खुशबू मिर्जा चंद्रयान मिशन का हिस्सा बनी तो ज्यादातर मीडिया वालों को इसमें कोई खासियत दिखाई नहीं दी। देश की एक प्रतिष्ठित पत्रिका ने इस स्टोरी को हाईलाईट किया भी तो ऐसी भूमिका बांधते हुए कि ‘उसने मुस्लिम महिलाओं की सभी नकारात्मक छवियों को तोड़ा है।’ अब नकारात्मक छवियां को लेकर कई सवाल हो सकते हैं मगर उन सबसे ऊपर यह सवाल है कि क्या एक औरत की छवि को, उसके मजहब की छवियों से अलग करके भी देखा जा सकता है या नहीं ? आमतौर से जब ‘मुस्लिम औरतों’ के बारे में कुछ कहने को कहा जाता है तो जवाबों के साथ ‘इस्लाम’, ‘आतंकवाद’, ‘जेहाद’ और ‘तालीबानी’ जैसे शब्दों के अर्थ जैसे खुद-ब-खुद चले आते हैं। पूछे जाने पर ज्यादातर अपनी जानकारी का स्त्रोत अखबार, पत्रिका या चैनल बताते हैं। उन्हें लगता है कि मीडिया जो कहता है वो सच है। इस तरह मुस्लिम औरतों के मुद्दे पर ‘धर्मनिरपेक्ष’ चर्चा की बजाय ‘राष्ट्रवाद’ के क्रूर चहेरे उभर आते हैं।

यह सच है कि दूसरे समुदायों जैसे ही मुस्लिम समुदाय के भीतर का एक हिस्सा भी दकियानूसी रिवाजों के हवाले से प्रगतिशील विचारों को रोकता रहा है। इसके लिए वह ‘आज्ञाकारी औरत’ की छवि को ‘पाक साफ औरत’ का नाम देकर अपना राजनैतिक मतलब साधता रहा है। दूसरी तरफ, यह भी कहा जाता है कि पश्चिम की साम्राज्यवादी ताकतें दूसरे समुदाय की नकारात्मक छवियों को अपने फायदे के लिए प्रचारित करती रही हैं। ऐसे में इस्लाम की दुनिया में औरत की काली छाया वाली तस्वीरों का बारम्बार इस्तेमाल किया जाना जैसे किसी छुपे हुए एजेंडे की तरफ इशारा करता है। जहां तक भारतीय मीडिया की बात है, तो ऐसा नहीं है कि वह पश्चिप के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर-तरीकों से प्रभावित न रहा हो।

अन्यथा भारतीय मीडिया भी मुस्लिम औरतों से जुड़ी उलझनों को सिर्फ मुस्लिम दुनिया के भीतर का किस्सा बनाकर नहीं छोड़ता रहता। ज्यादातर मुस्लिम औरतें मीडिया में तभी आती हैं जब उनसे जुड़ी उलझनें तथाकथित कायदे कानूनों से आ टकराती हैं। मीडिया में ऐसी सुर्खियों की शुरूआत से लेकर उसके खात्मे तक की कहानी, मुसलमानों की कट्टर पहचान को जायज ठहराने से आगे बढ़ती नहीं देखी जाती। इस दौरान देखा गया है कि कई मजहबी नेताओं या मर्दों की रायशुमारियां खास बन जाती हैं। मगर औरतों के हक के सवालों पर औरतों के ही विचार अनदेखे रह जाते हैं। जैसे एक मुस्लिम औरत को मजहबी विरोधाभास से बाहर देखा ही नही जा सकता हो। जैसे भारतीय समाज के सारे रिश्तों से उसका कोई लेना-देना ही न हो। विभिन्न आयामों वाले विषय मजहबी रंगों में डूब जाते हैं। इसी के सामानान्तर मीडिया का दूसरा तबका ऐसा भी होता है जो प्रगतिशील कहे जाने वाली मुस्लिम संस्थानों के ख्यालातों को पेश करता है और अन्तत : मुस्लिम औरतों से हमदर्दी जताना भी नहीं भूलता।

मीडिया के सिद्धांत के मुताबिक मीडिया से प्रसारित धारणाएं उसके लक्षित वर्ग पर आसानी से न मिटने वाला असर छोड़ती हैं। खास तौर पर बाबरी मस्जिद विवाद के समय से भारतीय समाज के धर्मनिरपेक्ष तेवर अपेक्षाकृत तेजी से बदले और उसी हिसाब से मीडिया के तेवर भी। नतीजन, खबरों में चाहे तेहरा तलाक आए या बुर्का पहनने की जबर्दस्ती, उन्हें धार्मिक-राजनैतिक चश्मे से बाहर देखना नहीं हो पाया। यकीनन जबर्दस्ती बुर्का पहनाना, एक औरत से उसकी आजादी छिनने से जुड़ा हुआ मामला है, उसका विरोध अपनी जगह ठीक भी है। मगर दो कदम बढ़कर, उसे तालीबानी नाम देने से तो बुनियादी मुद्दा गुमराह हो जाता है। यह समझने की जरूरत है कि मुस्लिम औरतों के हकों से बेदखली के लिए पूरा इस्लाम जिम्मेदार नहीं है, वैसे ही जैसे कि गुजरात नरसंहार का जिम्मेदार पूरा हिन्दू समुदाय नहीं है। मगर अपने यहां इस्लाम ऐसा तवा है जो चुनाव के आसपास चढ़ता है, जिसमें मुस्लिम औरतों के मामले भी केवल गर्म करने के लिए होते हैं।

मामले चाहे मुस्लिम औरतों के घर से हो या उनके समुदाय से, भारतीय मीडिया खबरों से रू-ब-रू कराता रहा है। मुस्लिम औरतों के हकों के मद्देनजर ऐसा जरूरी भी है, मगर इस बीच जो सवाल पैदा होता है वह यह कि खबरों का असली मकसद क्या है, क्या उसकी कीमत सनसनीखेज या बिकने वाली खबर बनाने से ज्यादा भी है या नहीं ?? मामला चाहे शाहबानो का रहा हो या सानिया मिर्जा का, औरतों से जुड़ी घटनाओं के बहस में उनके हकों को वरीयता दी जानी चाहिए थी। मगर ऐसे मौकों पर मीडिया कभी शरीयत तो कभी मुस्लिम पासर्नल ला के आसपास ही घूमता रहा है। इसके पक्ष-विपक्ष से जुड़े तर्क-वितर्क भाषा की गर्म लपटों के बीच फौरन हवा होते रहे। नई सुर्खियां आते ही पुरानी चर्चाएं बीच में ही छूट जाती हैं, मामले ज्यादा जटिल बन जाते हैं और धारणाओं की नई परतें अंधेरा गहराने रह जाती हैं।

अक्सर मुस्लिम औरतों की हैसियत को उनके व्यक्तिगत कानूनों के दायरों से बाहर आकर नहीं देखा जाता रहा। इसलिए बहस के केन्द्र में ‘औरत’ की जगह कभी ‘रिवाज’ तो कभी ‘मौलवी’ हावी हो जाते रहे। इसी तरह नौकरियों के मामले में, मुस्लिम औरतों के पिछड़ेपन को लेकर कभी ‘धार्मिक’ तो कभी ‘सांस्कृतिक’ जड़ों में जाया जाता रहा, जबकि मुनासिब मौकों या सहूलियतों की बातें जाने कहां गुम होती रहीं। असल में मुस्लिम औरतों के मामलों की पड़ताल के समय, उसके भीतरी और बाहरी समुदायों के अंतर्दन्द और अंतर्सबन्धों को समझने की जरूरत है। जाने-अनजाने ही सही मीडिया में मुस्लिम औरतों की पहचान जैसे उसके मजहब के नीचे दब सी जाती है।

जिस तरह डाक्टर के यहां आने वाला बीमार किसी भी मजहब से हो उसकी बीमारी या इलाज कर तरीका नहीं बदलता- इसी तरह मीडिया भी तो मुस्लिम औरतों को मजहब की दीवारों से बाहर निकालकर, उन्हें बाकी औरतों के साथ एक पंक्ति में ला खड़ा कर सकता है। जहां डाक्टर के सामने इलाज के मद्देनजर सारी दीवारें टूट जाती हैं, सिर्फ बीमारी और इलाज का ही रिश्ता बनता है जो प्यार, राहत और भरोसे की बुनियाद पर टिका होता है- ऐसे ही मीडिया भी तो तमाम जगहों पर अलग-थलग बिखरीं मुस्लिम औरतों की उलझनों को एक जगह जमा कर सकता है।

मुस्लिम महिलाओं के कानूनों में सुधार की बातें, औरतों के हक और इस्लाम पर विमर्श से जुड़ी हैं। इसलिए मीडिया ऐसी बहसों में मुस्लिम औरतों को हिस्सेदार बना सकता है। वह ऐसा माहौल बनाने में भी मददगार हो सकता है जिसमें मुस्लिम औरतें देश के प्रगतिशील समूहों से जुड़ सकें और मुनासिब मौकों या सहूलियतों को फायदा उठा सकें। कुल मिलाकर मीडिया चाहे तो मजहब के रंगों में छिपी मुस्लिम औरतों की पहचान को रौशन कर सकता है।

15.5.09

कच्ची उम्र के खट्टे-मीठे अनुभव



फिल्म : कैरी
अवधि : 96 मिनिट
निर्देशक : अमोल पालेकर
कलाकार : योगिता देशमुख, शिल्पा नवलकर, मोहन गोखले और लीना भागवत
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यह फिल्म इंसानी रिश्तों का मार्मिक ताना-बाना है. जो सीधी-साधी कहानी को सहज ढ़ंग से कहती है. इसमें संगीत और कैमरे के जरिए दृश्यों को खूबसूरत रंग-रुप दिया गया है. हर दृश्य बीती यादों का फ्रेम दिखता है. हर कलाकार आसपास का आदमी लगता है. इसलिए फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शक कुछ देर के लिए कुछ सोचता है. वह कुर्सी से तुरंत नहीं उठता पाता.
यह तानी मौसी और उसकी नन्ही भांजी की कहानी है. इस कहानी में 10 साल की बच्ची अपने मां-बाप के मरने पर श्रीपू मामा के साथ तानी मौसी के घर आती है. तानी की कोई संतान नहीं है. वह बच्ची को हर खुशी देने का भरोसा देती है. लेकिन वह खुद खुशियों से दूर है. तानी के पति भाऊराव को उसकी जरा भी फ्रिक नहीं. भाऊराव और घर की नौकरानी तुलसा का नाजायज रिश्ता है. तुलसा भी भाऊराव की आड़ से मालकिन को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं चूकती. इन हालातों से परेशान तानी जिदंगी को अपने हाल पर छोड़ देती है. लेकिन भांजी के आने के बाद वह फिर से जीना चाहती है.
यह मराठी के लोकप्रिय लेखक जी. ए. कुलकर्णी की कहानी है. इसे अमोल पालेकर ने फिल्म ‘कैरी’ में पेश किया. यहां ‘कैरी’ का मतलब एक बच्ची के बड़े बनने के अनुभवों से है. इसमें एक औरत के जीने की तमन्ना को भी पंख लगे हुए हैं. तानी एक घरेलू औरत है. वह घर की चार दीवारी के हर सुख और दुख से खुश है. तानी अपनी भांजी को सुरक्षा और ममता का ऐसा आंचल देना चाहती है जिससे उसका बचपन बचा रहे. तानी अपने बचपन की उम्मीदों को ताजा करना चाहती है. वह प्यार के इस एहसास को संवारना चाहती है. वह पूरे जोश से मासूम बच्ची की एक-एक चाहत को बचाना चाहती है. तानी ने अपनी जिंदगी पर होने वाले अत्याचारों पर चुप्पी साध ली है. लेकिन वह बच्ची को लेकर उठने वाली छोटी अंगुली को बर्दाश्त नहीं कर सकती. ऐसी किसी आशंका की आहट सुनते ही वह समाज के तयशुदा पैमानों के खिलाफ बोलने लगती है. उस वक्त एक औरत के अंदर की ताकत का पता चलता है.
लेकिन तानी अपने पति की मार से टूट जाती है. बच्ची के मन पर बिखरते हुए घर का असर न पड़े इसलिए तानी उसे श्रीपू मामा को लौटा देती है. विदाई के समय तानी मौसी अपनी भांजी से आसपास देखने, पूछने और जानने की बातें कहती हैं. कहते हैं कच्ची उम्र की खट्टी-मीठी घटनाओं का असर उम्र भर रहता है. बच्ची ने तानी मौसी की आंखों में एक सुंदर कल की झलक देखी थी. उसने तानी मौसी की गर्म गोद से हौसला पाया था. उसके मन में तानी मौसी के होने का एहसास बना रहा. उसने तानी मौसी की नर्म अंगुलियों से मर्दों की दुनिया में आगे बढ़ने का रास्ता ढ़ूढ़ लिया. आखिरकार तानी मौसी के व्यक्तित्व के असर ने उस बच्ची को बड़ी लेखिका बना दिया.
इस फिल्म को एक कहानी की तरह ज्यों का त्यों रख दिया गया है. इससे एक पाठक की तरह दर्शक को भी अपनी तरह से सोचने और समझने का मौका मिलता है. अंत में संदेश देने की औपचारिकता से फिल्म अपना असर खो सकती थी.