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4.11.10

सड़ता अनाज सड़ता तंत्र

शिरीष खरे

सरकार चंद पूंजीपतियों के लिए रियायतों का अंबार लगा रही है और करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा के लिए उसके पास न अनाज है और न पैसे का कोई बंदोबस्त. इंडिया शाइनिंग के इस दौर में सरकार को 50,000 करोड़ से अधिक का अनाज सड़ा देना मंजूर है. नहीं मंजूर है तो 8 करोड़ से ज्यादा लोगों की भूख को मिटाने के वास्ते उस सड़ते हुए अनाज में से गरीबों के लिए थोड़ा-सा हिस्सा बांटना. अकाल और कुपोषण के बीच पिसते किसी देश की जनता के लिए क्या उसकी सरकार इस तरह से भी अमानवीय हो सकती है ?



एक तरफ सरकार पूंजीपतियों के लिए 5 लाख करोड़ रूपए की रियायत देती है और दूसरी तरफ भूखे लोगों के लिए कोई इंतजाम नहीं करती है. उलटा भूखे देश की भूख पर परदे डालने के लिए उदाहरण के लिए मुंबई में 19 रूपए से ज्यादा रूपए कमाने वाले को गरीब नहीं मानती है. हकीकत यह है कि आजादी के 63 सालों में प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता बढ़नी चाहिए थी जो लगातार घटती ही जाती है. आजादी के समय से अबतक प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता 440 ग्राम से 436 ग्राम पर आ गई है और इसी तरह दाल की उपलब्धता भी आधी यानी 70 ग्राम से 35 ग्राम ही रह गई है.

दूसरी तरफ असुरक्षित परिस्थितियों में रखे अनाज के त्वरित वितरण से लाखों लोगों को राहत पहुंचाई जा सकती है. जबकि मौजूदा स्थिति यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के 35 किलो अनाज वितरित करने के आदेश को भी एक तरफ रखते हुए फिलहाल देश के कई इलाकों में अधिकतम 20 से 25 किलो अनाज ही वितरित किया जा रहा है. सर्वोच्च न्यायालय के एक और आदेश की अनदेखी करते हुए कई इलाकों में जनवितरण प्रणाली की दुकानें महीने-महीने भर नहीं खुलतीं हैं. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हर राज्य में एक बड़े गोदाम और जिले में पृथक गोदाम बनाने के लिए भी कहा जा चुका है. मगर खाद्य भंडारणों की क्षमता को बढ़ाने और गोदामों की मरम्मत को लेकर सरकार कभी गंभीर नजर नहीं आई है. लिहाजा देश के कई इलाकों में अनाज के भंडारण की समस्या उपजती जा रही है.

जिस देश में सालाना 6 करोड़ टन गेंहूं और चावल की खरीददारी होती है और जिसकी सयुंक्त भंडारण क्षमता 4 करोड़ 80 लाख टन है, उस देश में 6 साल के भीतर गोदामों में 10 लाख 37 हजार 738 टन अनाज सड़ चुका है. 190 लाख टन अनाज प्लास्टिक सीटों के नीचे रामभरोसे पड़ा हुआ है. हर साल गोदामों की सफाई पर करोड़ों रूपए खर्च करने पर भी 2 लाख टन अनाज सड़ जाता है और जब देश का सर्वोच्च न्यायालय अनाज के एक दाने के बर्बाद होने को अपराध मानते हुए अनाज के सड़ने से पहले उसे निशुल्क बांटने का आदेश देता है तो हमारे केंद्र के कृषि मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक 6,000 टन से भी ज्यादा अनाज के खराब होने के अपराध को नजरअंदाज बनाते हुए उल्टा सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की गलत व्याख्या करते हैं और उसकी मर्यादाओं पर ही सवाल खड़े करते हैं.

1947 के बाद से अब तक अगर हम किसानों की अथक मेहनत से उपजे अनाज का सही इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं और हर साल भारतीय खाद्य निगम की गोदामों में रखीं लाखों अनाज की बोरियां खुले में रखे जाने या बाढ़ आ जाने के चलते खराब हो रही हैं तो क्या सरकार को नहीं लगता कि भोजन से जुड़ी नीति, प्रबंधन और वितरण की व्यवस्थाओं पर नए सिरे से सोचे जाने की जरुरत है ?

देखा जाए तो खाद्य सुरक्षा दूसरा सवाल है. पहला सवाल पूंजीपतियों के लिए देश की आम जनता से उनके संसाधनों को छीने जाने से जुड़ा है. अगर संसाधनों को लगातार यूं ही छीना जाता रहा तो खाद्य के असुरक्षा की स्थितियां सुधरने की बजाय तेजी से बिगड़ती ही जाएंगी. जहां आदिवासियों को उनके जल, जंगल, जमीन से अलग करके उन्हें भूख और बेकारी की ओर ले जाया जा रहा है, वही सेज के नाम पर खुली लूट की जैसे छूट ही दे दी जा रही है. कहने का मतलब है नीतिगत और कानूनी तौर पर सभी लोगों को आजीविका की सुरक्षा को दिये बगैर भोजन के अधिकार की बात बेमतलब ही रहेगी. भोजन केअधिकार से जुड़े कार्यकर्ता मांग कर रहे हैं कि 5 सदस्यों के एक परिवार के लिए 50 किलो अनाज, 5.25 किलो दाल और 2.8 खाद्य तेल दिया जाए. बीपीएल और एपीएल को पात्रता का आधार नहीं बनाया जाए. सार्वजनिक वितरण की व्यवस्था के साथ-साथ सरकारी खरीदी और वितरण की विकेन्द्रीकृत व्यवस्था हो. व्यक्ति/एकल परिवार को इकाई माना जाए और राशन कार्ड महिलाओं के नाम पर हो. जल स्त्रोत पर पहला अधिकार खेती का हो. इसके साथ ही यह भी नहीं भुलाया जा सकता कि आजादी की बाद से अबतक विकास की विभिन्न परियोजनाओं और कारणों के चलते 6 करोड़ बच्चों का भी पलायन हुआ है. मगर बच्चों के मुद्दे अनदेखे ही रहे हैं और उनके लिए खाद्य सुरक्षा की गारंटी दिये बगैर विकास के तमाम दावे बेबुनियाद ही रहेंगे. इसे भी असंवेदनशीलता का चरम ही कहेंगे कि एक सेकेण्ड के भीतर 5 साल के नीचे का एक बच्चा कुपोषण की चपेट में आ जाने के बावजूद कोई नीतिगत फैसला लेने की बात तो दूर ठोस कार्यवाही की रूपरेखा तक नहीं बन पा रही है. अगर कुपोषण और भूख के चलते देश का आने वाला कल कहे जाने वाले 47 प्रतिशत बच्चों का अपनी उम्र के अनुपात में लंबाई और वजन नहीं बढ़ पाता है तो इसे किस विकास का सूचक समझा जाए ?

अंतत: अनाज का साद जाना एक अमानवीय और आपराधिक प्रवृति है और देश में अनाज भंडारण की उचित व्यवस्था और बेहतर विकल्प तलाशने लिए एक ऐसे संवेदनशील और पारदर्शी तंत्र विकसित करने की भी जरुरत है जो भूख से जुड़े विभिन्न पहलूओं पर कारगार ढ़ंग से शिनाख्त और कार्यवाही करने में सक्षम हो. अन्यथा हर साल लाखों टन अनाज खराब होने, अनाज की कीमत आसमान छूने, खेती के संकट, सूखे की मार और गरीबों के पेट खाली होने से जुड़े समाचारों पर परदे डालने के लिए हमारे पास आर्थिक शक्तियों का दिखावा करने वाली राष्ट्रमंडल खेलों की सुर्ख़ियों के अलावा कुछ नहीं होगा ?



15.9.10

गर्त में गये गांव

शिरीष खरे





गांवों की कहानी आकड़ों की जुबानी : 2021 तक भारत में महानगरों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा होगी और हर महानगर में 1 करोड़ से ज्यादा लोग रह रहे होंगे. अमेरिकन इंडिया फाऊंडेशन ऐसा मानता है और वहीं भारत सरकार की जनगणना के मुताबिक भी बीते एक दशक में गांवों से तकरीबन 10 करोड़ लोगों ने पलायन किया है. जबकि निवास स्थान छोड़ने के आधार पर 30 करोड़ 90 हजार लोगों ने अपना निवास स्थान छोड़ा है. योजना आयोग के मुताबिक 1999-2000 में अप्रवासी मजदूरों की कुल संख्या 10 करोड़ 27 हजार थी. जबकि मौसमी पलायन करने वालों की संख्या 2 करोड़ से ज्यादा अनुमानित की गई. कई जानकारों की राय में असली संख्या सरकारी आंकड़े से 10 गुना ज्यादा भी हो सकती है.

2000 की राष्ट्रीय कृषि नीति में कहा गया था कि कृषि अपेक्षाकृत लाभ का पेशा नहीं रह गया है. योजना आयोग के मुताबिक 1990 के दशक के मध्यवर्ती सालों में कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों की बढ़ोत्तरी घटती चली गई है. सिंचाई के साधन वाले भूमि क्षेत्र और सिंचाई के लिए बारिश के पानी पर निर्भर भूमि क्षेत्र के बीच आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है. विश्व-बाजार में मूल्यों का तेज उतार-चढ़ाव से नकदी फसलों का उत्पादन करने वाले क्षेत्रों को घाटा उठाना पड़ रहा है. इसके चलते बड़ी संख्या में किसानों द्वारा खेती का काम छोड़कर शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं. बीते लंबे अरसे से कृषि में लाभ की स्थितियों के मुकाबले लागत और जोखिम लगातार बढ़ रहे हैं और सरकारी सहायता लगातार कम होती जा रही है. 1960 में प्रति किसान भूस्वामित्व की ईकाई का आकार 2.6 हेक्टेयर था जो 2000 में घटकर 1.4 हेक्टेयर रह गया. कुलमिलाकर बीते चार दशकों में भूस्वामित्व की ईकाई का आकार 60% घटा है. भारत के किसानों को मिलने वाली सब्सिडी(66 डॉलर) विकसित देशों जैसे अमेरिका के किसानों को मिलने वाली सब्सिडी(21 हजार डॉलर) के मुकाबले न के बराबर है. 1995 में कुल आबादी का 54.6% हिस्सा खेतिहर आबादी का था जो 2005 में घटकर 49.9% रह गया.

योजना आयोग के मुताबिक 1983 से 1994 के बीच रोजगार में बढ़ोत्तरी की दर 2.03 % थी जो साल 1994 से 2005 के बीच घटकर 1.85% हो गई. 2005 में असंगठित क्षेत्र में खेतिहर मजदूरों की संख्या 98% थी. तकरीबन खेतिहर मजदूरों में 64% का अपना रोजगार है जबकि 36% दिहाड़ी मजदूर हैं. 1983 से 1994 के बीच रोजगार की दर 1.04% थी जो 1994 से 2005 के बीच घटकर 0.08% हो गई. 1994 से 2005 के बीच बेरोजगारी की दर में 1% की बढ़ोतरी हुई. इसी तरह, 1983 से 1994 के बीच रोजगार की बढ़ोतरी की दर 2.03% थी जो 1994 से 2005 के बीच घटकर 1.85% हो गई. योजना आयोग के अनुसार एक किसान परिवार का औसत मासिक खर्च 2770 रुपये है जबकि खेती के अलावा दिहाड़ी मजदूरी सहित अन्य स्रोतों से उसकी औसत मासिक आमदनी 2115 रुपये होती है. जाहिर है एक किसान परिवार का औसत मासिक खर्च उसकी मासिक आमदनी से तकरीबन 25% ज्यादा है. इसीलिये भारतीय किसानों को कर्ज लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है.

बीते 12 सालों में 2 लाख किसानों ने आत्महत्याएं की हैं. इनमें से अधिकतर किसान कपास और सूरजमुखी जैसी नकदी फसल की खेती करने वाले रहे हैं. उत्पादन की लागत बढ़ने के चलते ऐसे किसानों को साहूकारों से ऊंचे ब्याज दर पर कर्ज लेना पड़ा है. कीटनाशक और उर्वरक बेचने वाली कंपनियों ने महाराष्ट्र और कर्नाटक में किसानों को कर्ज देना शुरु किया, जिससे किसानों के पर कर्ज का बोझ और बढ़ गया. एक तो गरीब किसानों की आमदनी बहुत कम है और कर्ज लेने के कारण (शादी ब्याह वगैरह) कहीं ज्यादा होने से वह भंवरजाल से निकल नहीं पा रहे हैं.

योजना आयोग द्वारा प्रस्तुत ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के मुताबिक ग्रामीण गरीबों की कुल संख्या का 41% हिस्सा खेतिहर-मजदूर वर्ग से है. जबकि ग्रामीण गरीबों की कुल संख्या का 80% हिस्सा अनसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग से हैं. खाद्य व कृषि संगठन द्वारा विश्व में आहार-असुरक्षा की स्थिति पर जारी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में तकरीबन 23 करोड़ यानी 21% लोगों को रोजाना भर पेट भोजन नहीं मिलता है. 1983 में ग्रामीण भारत के हर आदमी को रोजाना औसतन 2309 किलो कैलोरी का आहार हासिल था जो साल 1998 में घटकर 2011 किलो कैलोरी रह गया. 1990 के दशक में मजदूरों और किसानों की खरीददारी की क्षमता में काफी कमी आई. इससे जहां ग्रामीण भारत में खेतिहर संकट गहराया तो वहीं अनाज के सरकारी गोदामों में अनाज सड़ता रहा. न्यूट्रिशनल इंटेक इन इंडिया के मुताबिक 1993-94 में प्रतिव्यक्ति रोजाना औसत कैलोरी उपभोग की मात्रा 2153 किलो कैलोरी थी जो साल 2004-05 में घटकर 2047 किलो कैलोरी हो गई. इस तरह कुल 106 किलो कैलोरी की कमी आई. ग्रामीण इलाकों में तकरीबन 66% आबादी रोजाना 2700 किलो कैलोरी से कम का उपभोग करती है. विश्वबैंक के अनुसार औसत से कम वजन के सबसे ज्यादा बच्चे भारत में ही हैं. भारत में 5 राज्यों और 50% गांवों में कुल कुपोषितों की तादाद का 80% हिस्सा रहता है. 5 साल से कम उम्र के 75% बच्चों में आयरन की कमी है और 57% बच्चों में विटामिन ए की कमी से पैदा होने वाले रोग के लक्षण हैं. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के दौरान औसत से कम वजन के बच्चों की संख्या शहरों के(38%) मुकाबले गांवों में(50%) ज्यादा पाई गई. जबकि औसत से कम वजन के बच्चों की संख्या में लड़कों(45%) की तुलना में लड़कियों(53.2%) ज्यादा पाई गईं. अगर जातिगत आधार पर देखा जाए तो अनुसूचित जाति के बच्चों में 53% और अनुसूचित जनजाति के बच्चों में 56% बच्चे औसत से कम वजन के पाये गए. जबकि बाकी जातियों में उनकी संख्या 44% है. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार ग्रामीण भारत में 18.7% परिवारों के पास सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत जारी किया जाने वाला कोई भी कार्ड नहीं है.

एनुअल स्टेटस् ऑव एजुकेशन रिपोर्ट( असर) 2008 के मुताबिक ग्रामीण इलाकों के अनुसूचित जनजाति के तबके में साक्षरता दर सबसे कम(42%) पायी गई है. जबकि अनुसूचित जाति के के तबके में साक्षरता दर(47%) है. सबसे कम भूमि पर अधिकार रखने वाले वर्ग में साक्षरता दर 52% है. जबकि सबसे बड़े आकार की ज्यादा भूमि पर अधिकार रखने वाले वर्ग में साक्षरता दर 64% है. शिक्षा के हर पैमाने पर पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की मौजूदगी कम है. ग्रामीण इलाके की महिलाओं और पुरुषों के बीच साक्षरता दर क्रमशः 51.1% और 68.4%,पायी गई. 2009 में 5 साल की उम्र वाले 50% बच्चे ही स्कूलों में नामांकित पाये गए.

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के मुताबिक तकरीबन 25% भारतीय सिर्फ अस्पताली खर्चे के कारण गरीबी रेखा से नीचे हैं. महज 10% भारतीयों के पास कोई न कोई स्वास्थ्य बीमा है और ये बीमा भी उनकी जरुरतों के मुताबिक नहीं है. वॉलेंटेरी हैल्थ एसोशिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक डॉक्टरों की संख्या कम होना भी एक बड़ी समस्या है. देश में एक हजार की आबादी पर महज 0.6 एमबीबीएस डॉक्टर ही हैं. इसी तरह दवाइयों के दामों में तेज गति से बढ़ोतरी हुई है. मरीज को उपचार के लिए अपने खर्च का औसतन 75% हिस्सा दवाइयों पर न्यौछावर करना पड़ता है. दवाइयां मंहगी होने की मुख्य वजहों में नये पेटेंट कानून, दवा निर्माताओं के ऊपर कानूनों का उचित तरीके से लागू न होना और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक दवाओं का बाजार में प्रचलित होना है. यह भी दक्षिण के राज्यों या धनी राज्यों में ज्यादा हैं. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 के अनुसार गांवों में 43% महिलाओं को प्रसव से पहले कम से कम तीन बार अनिवार्य रूप से चिकित्सा की सुविधा मिल पाती है. शिशु-मृत्यु दर के मामले में प्रति हजार नवजात शिशुओं में से औसतन 60 काल के गाल में समा जाते हैं. 12-13 महीने के नवजात शिशुओं में से महज 44% को ही सभी प्रकार के रोग-प्रतिरोधी टीके लग पाते हैं.

भारत का मानव विकास सूचकांक 0.619 है. यह कुल 177 देशों के बीच 128 वां स्थान दर्शाता है. भारत का मानव-निर्धनता सूचकांक 31.3 है, जो 108 देशों के बीच 67वां स्थान स्थान दर्शाता है. मानवीय विकास का यह आकलन उजागर कर देता है कि कि भारत के नागरिक स्वस्थ और दीर्घायु जीवन जीने में कहां तक समर्थ हैं. इससे यह भी उजागर होता है कि भारत के नागरिक कहां तक शिक्षित हैं और मानव विकास के सूचकांक पर उनका जीवन स्तर कैसा है. 

26.9.09

हीरे की मण्डी में हारती जिन्दगी

शिरीष खरे, सूरत से लौटकर


मंदी की उठा-पटक के बीच सूरत का चेहरा भले कई लोगों के लिए अब भी चमकदार लग रहा हो लेकिन इस चमक के पीछे एक ऐसा अंधेरा फैलता जा रहा है, जिसमें जिंदगी हारती जा रही है. मंदी के तूफान ने हीरे की मण्डी सूरत की सूरत कुछ ऐसी बिगाड़ी कि पिछली दीवाली से इस जुलाई के पहले हफ्ते तक हीरा-कारखाने के 39 मजदूरों ने अपनी जान दे दी. हालांकि गैरसरकारी आकड़ों में यह संख्या 90 के पार ठहरती है.

मंदी के तूफान ने हीरे की मण्डी सूरत की सूरत कुछ ऐसी बिगाड़ी कि दीवाली से जुलाई के पहले हफ्ते तक हीरा-कारखाने के 39 मजदूरों ने अपनी जान दे दी. हालांकि गैरसरकारी आकड़ों में यह संख्या 90 के पार ठहरती है.

पिछले कुछ समय में गुजरात के सबसे चमकदार शहर सूरत में हीरे की 10,000 से ज्यादा यूनिट बंद हुई, जिससे आठ लाख से ज्यादा मजदूर बेकार हो गए. पिछले साल नंवबर-दिसम्बर के दो महीनों में ही कम से कम एक लाख मजदूर शहर छोड़ चुके थे. आज की तारीख में यह आंकड़ा चार लाख के बाहर पहुंच चुका है और मज़दूरों के पलायन का यह सिलसिला अब तक जारी है. जनवरी के पहले हफ्ते में ही 5 इलाकों से स्कूलों के 4,500 बच्चों को फीस न भरने के चलते निकाला जा चुका था.

कायदे से सूरत का यह हाल एक 'राष्ट्रीय मुद्दा' होना चाहिए लेकिन राज्य के सारे राजनैतिक दल इन दिनों खामोश हैं. लोकसभा-चुनाव की लहर जा चुकी है, अब सिर पर सूरत-कारर्पोरेशन का चुनाव है. फिर भी हीरा-कारखाने के मजदूरों को राहत देने के सवाल पर हर तरफ सन्नाटा है.

एक नजर सूरत की सूरत पर

सूरत में हीरे की छोटी-बड़ी कुल 14,310 यूनिट हैं, जिसमें से 10,017 याने 70 फीसदी बंद हो चुकी हैं. सभी 14,310 यूनिट में 9,70,000 मजदूर काम करते थे, जिसमें से करीब 8,000000 याने 80 फीसदी से भी ज्यादा बेकार हो चुके हैं. बाकी बचे मजदूरों को अगर काम मिलता भी है तो उनके महीने की आमदनी (12,000) से आधी से आधी से आधी (15,00) हो गई है.


जमीनी पड़ताल के लिए एक छोटे-सा सर्वे देखते हैं. शहर के वारछा रोड़ पर हीरे की 2,59 यूनिट में से 80 के दरवाजे बंद हो चुके हैं. यहां की 1 यूनिट में औसतन 63 मजदूर थे, इस लिहाज से जोड़े तो 5,040 से ज्यादा मजदूरों के हाथों से मजदूरी निकली है. इसी तरह कापोदरा विस्तार की 5,97 यूनिट में से 2,43 में काम बंद है. यहां की 1 यूनिट से औसतन 75 मजदूर थे, यहां भी 18,225 से ज्यादा मजदूर बेकार हुए. यह ऐसी छोटी-छोटी यूनिट थीं जिनके पास अब कच्चा हीरा खरीदने के लिए पैसा नहीं बचा है.


श्यामधाम चौकड़ी, देवीकृपा सोसायटी के सूरज पटेरिया का यह 36 वां साल चल रहा था. गए साल तक उन्होंने खुदखुशी करने के बारे में सोचा भी नहीं होगा. लेकिन दीवाली के बाद सूरज ने दो बार जहर पीकर मरना चाहा. दोनों बार उन्हें पड़ोसियों ने बचा लिया.

एक तो भूख, ऊपर से अपने ही इलाज के खर्च ने उन्हें दिमागी तौर से भी लाचार बना दिया. तीसरी बार उन्होंने अपने को जलाकर खुदखुशी कर ली. अब उनके पीछे उनकी पत्नी अंजू बेन और चौथी में पढ़ने वाला लड़का राहुल है. इन दोनों को अपने आने वाले कल के बारे में कुछ खबर नहीं. अंजू बेन और राहुल केवल नाम भर हैं, सूरज में तो ऐसे परिवारों की एक लंबी सूची हैं, जिसमें नए-नए नाम जुड़ते जा रहे हैं.

सूरत-ए-हाल

देश के हीरा निर्यात में सूरत की हिस्सेदारी 24 अरब डालर के आसपास है. दीवाली के पहले अफ्रीका के एटेन्पर्व से काले पत्थर सूरत के कारखानों में आते थे. ऐसे पत्थरों को सूरत के 'रत्न कलाकार' कहे जाने वाले मजदूर तरासते और चमकदार हीरे में बदल देते.

लेकिन मंदी के मारे बीते अक्टूबर से एटेन्पर्व के काले पत्थरों का आयात बंद हो गया. यही कारण है कि पिछले 9 महीनों से हज़ारों हीरा कारखानों में ताले लटक गये हैं और मज़दूरों के सामने दो जून की रोटी के लाले पड़ गये हैं. शहर की सूरत में कभी चार चांद लगाने वालों की दुनिया फिलहाल घुप्प अंधियारे में है, जहां उजाले की कोई किरण नज़र नहीं आ रही.

सूरत में जब मंदी का शोर कुछ और बढ़ा तो बड़े-बड़े साहूकार मौके की नजाकत भांप गए और छोटी-छोटी यूनिट चलाने वालों का करोड़ो रूपए लेकर भाग गए. जैसे कतारगाम के हर्षद महाजन और घनश्याम पटेल को ही लें. यह दोनों ब्याज के 7 करोड़ रूपए लेकर लापता हैं. इसी तरह साजन तालुका का एक और महाजन जो मिनी बाजार और राजहंस टावर में 1,00-1,50 लोगों के साथ लेन-देन करता था; कोई साढ़े 5 करोड़ रूपए के साथ रफू-चक्कर है. इसलिए छोटी-छोटी यूनिट चलाने वालों के कारोबार ठप्प हुए और फिर बड़ी संख्या में मज़दूर सड़कों पर आ गये.

हीरा-व्यापारियों का हाल सुने तो पालिश्ड हीरे नहीं बिकने से उन्हें नकद नहीं मिल रहा है. इसलिए वह कच्चा हीरा खरीद ही नहीं सकते. तभी तो मिनी बाजार में हीरे के हजारों व्यापारियों का एक साथ जमा होना जैसे बीते कल की बात लगती है.

एक पहेली जिंदगानी

लेकिन सारे आकड़ों के बीच ऐसा पहलू भी छिपा है जो आज नहीं तो कल हालात को और उलझा सकता है. सूरत में 'फेक्ट्री एक्ट' के मद्देनजर हीरे की केवल 4,27 फैक्ट्रियां ही निबंधित हैं. लेकिन यहां चलने वाली फैक्ट्रियों की संख्या 14,310 है. मतलब ये कि सूरत की 13,883 फैक्ट्रियां निबंधित ही नहीं हैं.

असल में ज्यादातर मालिक 'टैक्स' से बचने, मजदूरों को 'पीएफ' और 'ईएसआई' जैसी सुविधाएं न देने के लिए 'फेक्ट्री एक्ट' को अनदेखा करते हैं. इसलिए 13,883 यूनिट से जुड़े करीब 9,40,000 मजदूर 'फेक्ट्री एक्ट' के दायरे से बाहर हैं. अभी तो यहां के एक भी हीरा-मजदूर को मुआवजा नहीं मिला है, लेकिन कल अगर मुआवजे की बात उठती है तो 'अन-रजिस्टर्ड' कही जाने वाली 13,883 फैक्ट्रियों के कोई 9 लाख 40 हज़ार मज़दूरों का क्या होगा ? क्या उन्हें मुआवजे का पात्र समझा जाएगा ?

हार गई जिंदगी

आकार अपार्टमेंट, कुबेरनगर की 'संदवी डायमण्ड' जैसी बड़ी कंपनी से जुड़े 40 साल के कल्पेश जादव की घर-गृहस्थी ठीक-ठाक चल रही थी. लेकिन 6 महीने तक काम न मिलने से वह खाली हाथ घर लौटते थे. एक रात जब वह लौटे तो खाने का एक दाना न होने पर पत्नी से जमकर झगड़ा हुआ. इसके बाद वह कहीं से 5 किलो चावल, 5 किलो आटा और 1 किलो तेल तो लाए लेकिन किसी को अनुमान नहीं था कि कल्पेश के मन में किस तरह का द्वंद्व चल रहा है. कल्पेश उस रोज ताप्ती नदी में ऐसे डूबे कि वापिस नहीं आए. कल्पेश ने मुक्ति पा ली, उनकी पत्नी अब अकेली है, बच्चे अभी से संघर्ष के दिन देखने के लिए रह गए हैं.

पुणागांव, विक्रम सोसायटी के अशोक भाई घाट ने 30 वें साल में कदम रखा था. उनकी बिटिया उन्नति 1 साल की होने वाली थी. अशोक भाई 'शिवजी डायमंड' कंपनी में थे. जब बेरोजगारी की नौबत आई तो उसका सामना करना उन्हें मुश्किल लगा और उन्होंने जहर पी कर अपनी जान दे दी.

उवली रोड़, मोहनदास सोसायटी के भरत ठुमरे ने 35 साल देख लिए थे. फांसी की रस्सी उन्हें जिंदगी की तंगी से कही ढ़ीली लगी होगी. इसलिए तो पत्नी और 10 साल से भी कम उम्र के दो बच्चों को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़कर चले गए.

कतारगाम में 60 साल की जीबी बेन अपने 34 साल के बेटे सूर्य की बेकारी देख न सकी, उन्होंने केरोसिन डालकर खुदखुशी कर ली. सूर्य 'शीतल डायमंड' कंपनी में काम करता था.

वह औरतें सबसे ज्यादा प्रभावित हुई हैं जो जैसे-तैसे अपने घर संभाल रही थीं. पति की लम्बी बेकारी ने उन्हें मायके जाने पर मजबूर किया. इन दिनों सौराष्ट्र से कुछ औरतों की खुदखुशी के मामले जोर पकड़ने लगे हैं. सबसे ज्यादा मजदूर सौराष्ट्र से ही आए थे. दूसरी तरफ कई मजदूरों की शादियां भी टूट रही हैं.

जो जिंदा हैं

19 जनवरी को 'सूरत डायमण्ड एसोसिएशन' की तरफ से बच्चों की स्कूल-फीस माफ करने के लिए फार्म बंटने वाले थे. तब 12,000 की भीड़ जमा हुई. लेकिन अफरा-तफरी के माहौल में पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा.

पुलिस की लाठी से 35 साल की बसंती बेन बगाणी बुरी तरह घायल हो गई. नवी शक्ति, विजय सोसायटी की बसंती बेन से जाना कि वह अपने 3 बच्चों, 4 साल के शिवम, 5 साल के जेनल और 7 साल के सावंत के लिए रात 2 बजे से ही लाइन में लगी थी. जैसे ही उनका नंबर आने को हुआ, लाठी चार्ज हुआ और उनका माथा फूट गया. जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है जनवरी के पहले हफ्ते में ही 5 इलाकों से स्कूलों के 4,500 बच्चों को फीस न भरने के चलते निकाला जा चुका था.

ठक्करनगर की कोकिला बेन से मालूम हुआ कि उनके पति 9 महीने से खाली हैं. उनके सिर पर अब तक 25,000 का कर्ज चढ़ चुका है. चिंटू कहकर बुलाने वाले बड़े लड़के ने 12 वीं 67 प्रतिशत के साथ पास की थी. लेकिन पैसे की मजबूरी से कालेज की पढ़ाई रूकी हुई है. कोकिला बेन कहती हैं- “पहले औरतों को घर में हीरे के पैकेट बनाने का काम मिल जाता था. इससे वह अपने खर्च-पानी के लिए महीने भर में 12,000 से 15,000 रूपए कमा लेती थीं. हीरे के कारखानों के बंद होते ही उनके खर्च-पानी का पैसा भी चला गया.”

आपके पति दूसरा काम तलाश सकते हैं ? जबाव में कोकिला बेन ने बताया कि जो आदमी अपनी कलाकारी से 12,000 रूपए महीना कमाता हो, जिसकी आमदनी के मुताबिक ही घर की जरूरतें बन गई हो, ऐसे में बिल्कुल आमदनी नहीं होने पर जरूरतें पहाड़-सी लगेगी ही. रही बात दूसरे काम की, तो कोई भी हीरा-मजदूर ऐसा चाहकर भी नहीं कर पाएगा. जो मजदूर 15-20 साल से हीरा तराशने जैसा काम करता हो, उससे मेहनत वाली मजदूरी बनेगी भी नहीं. उसे रात-दिन मेहनत से महीने भर में 15,00 ही मिलेंगे, अगर वह मेहनत वाले काम करना भी चाहे तो उसे मेहनत वाले काम देने से पहले हर कोई हिचकिचाएगा.

जबाव के इंतजार में...

24 जनवरी को ठक्कर नगर, डायमंड पार्क में राधा बोरसे जैसी 1,000 औरतों ने राज्य के मुखिया नरेन्द्र भाई (मोदी) को 1,000 पोस्ट-कार्ड भेजे. इन औरतों ने लिखा था कि घर में न अनाज है, न केरोसिन. दो टाइम खाने को तरस गए हैं. एक महीने से कोई सब्जी नहीं आई है. बच्चों की पढ़ाई भी रोक दी है. जल्दी मदद भेजिए वरना हमको भी सुसाइड करना पड़ेगा.

उन्होंने राज्य के मुखिया को यह पोस्ट-कार्ड इसलिए लिखा क्योंकि गुजरे विधान-सभा चुनाव के वक्त महिला-सम्मेलन में नरेन्द्र भाई गरजे थे- “तुम्हें कभी कोई परेशानी हो, भाई जानकर एक पोस्ट-कार्ड भर भेजा देना.” अब रक्षाबंधन आने को है, लेकिन सूरत की बहनों को गांधीनगर के भाई का जवाब नहीं मिला.

14 फरवरी को लोक-सभा चुनाव में राहुल भैया (गांधी) भी पधारे थे. उन्होंने अपने ही अंदाज में हीरा-मजदूरों से सीधी बात साधी थी. लोगों ने उनसे पूछा कि चलिए गुजरात सरकार ने हमारे लिए कुछ नहीं किया, केन्द्र सरकार क्या करने वाली है ?

जनता में एक ने उन्हें याद दिलाया कि जब केन्द्र सरकार 'सत्यम' जैसी (7,000 करोड़ का घोटाला करने वाली) कंपनी को बचाने के लिए राहत पैकेज दे सकती है तो देश के जो आम लोग अपनी मौत मर रहे हैं, उन्हें बचाने में इतनी देर क्यों ? राहुल कोई जबाव नहीं दे पाए. कांग्रेस ने दिल्ली में झण्डा फहराते ही जीत की पगड़ी राहुल गांधी के सिर पर बांधी है. इसके बाद तो वह ‘लाजबाव’ हो चुके हैं.

लोकसभा-चुनाव में भाजपा ने कहा- “दिल्ली वाले जाग रहे होते तो ऐसे हालात नहीं होते.” कांग्रेस ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को नया विशेषण दिया- “ कुंभकरण न जाने कब जागेंगे.” कांग्रेस के कार्यकर्ता यह तर्क देते भी घूमते रहे कि- “मामला सेंटर से नहीं, गांधीनगर से सुलझेगा.” इस तरह चुनाव के साथ यह आरोप-प्रत्यारोप भी गुजर गये, नहीं गुजरे तो आत्महत्याओं के हादसे. सांसद चुने गए, नहीं चुनी गई तो मजदूरों की मजबूरियां. सरकार भी बनी, नहीं बंधी तो पहले जैसे हालात बनने की उम्मीदें. वैसे मजदूरों के पास उम्मीद के अलावा और कुछ है भी नही.

लेकिन शहर के कुछ लोग, यहां तक की मीडिया का एक हिस्सा हीरा-कारखाने के सेठ लोगों से खफा है. उनके नजरिए से जब तक मुनाफे का धंधा चल रहा था तब तक तो मजदूरों की मेहनत और कलाकारी से सेठ लाखो से करोड़ो, करोड़ो से अरबो कमाते रहे. लेकिन जैसे ही मंदी ने मुंह दिखाया, सेठ लोगों ने मुंह मोड़ लिया. मजदूरों की उम्मीदें या जरूरतें लाखों-करोड़ों की नहीं हैं. ऐसे में सेठ लोगों को मजदूरों की मामूली जरूरतों में मददगार बनना ही चाहिए था. लेकिन उनकी तरफ से मदद की हवा तो दूर, मदद का एक पत्ता भी नहीं हिलता.

आत्महत्याएं ठण्डे बस्ते में

सूरत में हीरे की चमक नहीं लौट रही है. दो-एक महीने से आत्महत्याओं के मामले में कमी जरूर देखी गई है. यह किसी के विशेष प्रयासों का नतीजा नहीं हैं, यह तो हर दिन करीब तीन सौ मजदूर परिवारों के सूरत छोड़ने का नतीजा है. ऐसे में आत्महत्याओं के किस्से सूरत के आसपास फैल गए हैं. शहर से जाने वाले एक परिवार के जमेश और महेश (भाई-भाई) ने हाथ हिलाते हुए कहा- “दोबारा सूरत ही लौटेंगे.”

लेकिन सूरत में छाये संकट के बादल बरसने भर से खत्म नही होने वाले.

23.9.09

थार का सरकारी अकाल

शिरीष खरे

थार में फिर अकाल के हालात बन पड़े हैं- इस समय की सबसे खतरनाक पंक्ति को सवाल की तरह कहा जाना चाहिए. दरअसल अकाल को बरसात से जोड़कर देखा जाता है और राजस्थान के अकालग्रस्त जिलों से लेकर जयपुर या दिल्ली तक नेताओं, अफसरों और जनता के बड़े तबके तक यही समझ बनी हुई है. कुछ तो जानबूझकर और कुछ मजबूरी में. लेकिन हकीकत यह भी है कि आस्ट्रेलिया या खाड़ी जैसे दुनिया के अनेक हिस्सों में तो और भी कम बरसात होती है मगर वहां अकाल का साया नहीं पड़ता. तो क्या भारत में अकाल की जड़े सरकारी अनदेखी से जुड़ी हैं ?

अंग्रेजी हुकूमत में अकाल से निपटने के लिए 'फेमिन कोड' (अकाल संहिता) बुकलेट बनी थी. हमारी सरकार आज तक उसी को लेकर बैठी है. आस्ट्रेलिया, अमेरिका, इंग्लैंड और सऊदी अरब जैसे देशों में अकालरोधी नीतियां हैं; भारत देश या राजस्थान प्रदेश में जहां 100 में से 90 साल सूखा पड़ता है, कोई नीति नहीं है.

बायतु, बाड़मेर के भंवरलाल चौधरी और उनके साथी कहते हैं- “पानी, अनाज और चारे का न होना ही अकाल है. अगर पीने के लिए पानी, लोगों को अनाज और पशुओं को चारा मिल जाए तो फिर पानी गिरे या न गिरे, काहे का अकाल.”

जाहिर है, अपनी सरकार लापरवाही छिपाने के लिए अकाल से बरसात को जोड़कर चलती है और जनता भी ‘लकीर की फकीर’ बनी हुई है.

जयपुर से 500 किलोमीटर दूर, पाकिस्तान की सरहद से 100 किलोमीटर पहले, पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तानी जिले बाड़मेर में बायतु ब्लाक के कई अनदेखे गांव इस हकीकत को बयां कर रहे हैं. बायतु, लाहौर जाने वाली थार एक्सप्रेस का छोटा-सा पड़ाव है. वैसे तो सूखे की ज्यादातर योजनाएं यही के लिए बनती हैं, जो जयपुर से जोधपुर आते-आते खप जाती हैं और यहां के लोगों के हिस्से में रह जाती हैं अगले साल के मानसून वाले बादलों की आस.

इस बार मानसून फिर दगा दे गया. बंगाल की खाड़ी में कम दबाव वाले क्षेत्र के कमजोर होने से राजस्थान के 27 जिले भंयकर सूखे से ग्रस्त घोषित किए गए हैं. केंद्रीय रुक्ष क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, काजरी के मुताबिक इस साल 2002 से भी खतरनाक अकाल के हालात हैं. बाड़मेर सहित 6 जिलों में औसत से 60 फीसदी कम बरसात हुई जिससे बाजरा, पानी, कितना सूखा, कितनी उपज, कितनी आमदनी, गरीबी, बेकारी, पलायन, कर्ज, योजनाएं गुहार और मोठ की फसलें फिर खड़ी-खड़ी सूख रही हैं. नतीजतन अभी से हिसाब लगाया जा रहा है- कितना, फायदे, दावे, कायदे..... और वायदे!

अकाल का घर


बाड़मेर जिले में 100 सालों के आकड़े देखें तो 80 साल सूखे के काले साए में बीते. बाकी 20 सालों में से 10 साल सुकाल और 10 साल 50-50 वाला हिसाब-किताब रहा.

फसलों का उत्पादन देखें तो 100 में से 30 साल 0 (शून्य) प्रतिशत और 20 साल 10-20 प्रतिशत (बेहद मामूली) उत्पादन रहा. बाकी बचे 50 में से 20 साल 20-30 प्रतिशत, 10 साल 30-40 प्रतिशत, 10 साल 50-60 प्रतिशत और 10 साल 70 प्रतिशत तक उत्पादन हुआ.

पानी की जरूरत को देखें तो कुल जरूरत का 10 प्रतिशत भी पूरा नहीं हो पाता, बाकी 90 प्रतिशत की पूर्ति के लिए निजी टांके से 40 प्रतिशत, सरकारी टैंकरों से 10 प्रतिशत और खारे पानी से 20 प्रतिशत तक की भरपाई होती है. फिर भी 30 प्रतिशत का भारी अंतर रहता है, जिसका कोई स्त्रोत नहीं.

निजी टांके से जो 40 प्रतिशत पानी की भरपाई होती है, वह भी बरसात के भरोसे है. अगर बूंदे न बरसीं तो निजी टांके की भरपाई का प्रतिशत 40 से लुढ़ककर 5 प्रतिशत तक आ जाता है. तब खारे पानी की भरपाई 20 से 40 प्रतिशत तक बढ़ाना एक मजबूरी है.

सूखे का फायदा

1947 के बाद, 62 सालों में एक बार सूखे का स्थायी हल खोजने की कोशिश हुई थी. राजीव गांधी के समय, पंजाब के हरिकेन बांध से जो इंदिरा-गांधी नहर गडरा (बाड़मेर) तक आनी थी, उसे भी केंद्रीय सत्ता में बैठी ताकतों ने अपने फायदे के लिए मोड़ लिया. नहर को गंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर से होकर करीब 800 किमी का रास्ता तय करना था, जैसे ही यह 300 किमी दूर बीकानेर पहुंची वैसे ही तत्कालीन कपड़ा मंत्री अशोक गहलोत (अबके मुख्यमंत्री) ने पाइपलाइन का रुख जोधपुर की कायलाना झील की तरफ करवा दिया. इससे पहला फायदा महाराजा गजोसिंह को हुआ और झील का पट्टा आज भी उन्हीं के नाम चढ़ा हुआ है. पानी पहुंचते ही पर्यटन का उनका धंधा लहलहा उठा, होटल तो था ही, हुजूर ने ‘वाटर रिसोर्स सेंटर’ के नाम पर महल भी बनवा लिया. अशोक गहलोत, जो खुद भी माली जाति और जोधपुर इलाके से हैं, उन पर ‘माली लॉबी’ के दबाव में काम करने का आरोप लगा क्योंकि पाइपलाइन मोड़ने का दूसरा फायदा माली जाति के कुओं को रिचार्ज करने में हुआ. लिहाजा असली प्रभावितों की आंखे बेवफा बादलों को घूरती रह गई.



1990 में सरकार ने पैसा बटोरने के लिए हरे-भरे खेतों से कलकल बहती नहर की तस्वीर दिखाई थी. अपनी जिंदगी में भी हरियाली लाने के लिए लोगों ने सरकार से नहर के आसपास की जमीनें खरीदी थीं. पनावड़ा, मनावड़ी, भियाड़ और भीमड़ा के गांव वाले अब बताते हैं कि जिनके पास पैसा नहीं था, उन्होंने घर की औरतों के गहने तक बेचे और बोली लगा-लगाकर जमीनें खरीदी थीं. उन्होंने पांच एकड़ की रूखी जमीन के टुकड़े को एक लाख से 5 लाख रु. तक में खरीदा, जंगली झाड़-पेड़ उखाड़े और फिर उन्हें पहले मैदानों में और खेतों में बदला. मगर यह विडंबना ही है कि उस समय भी उन जमीनों की कीमत कुछ नहीं थी, आज भी कुछ नहीं है. वहां रेतीली आंधियों से सिर्फ रेत की नहरें बनती और बिगड़ती रही.

अकाल का हाल

उन्हें पीने के पानी की हरेक बूंद का ख्याल रहता है. महंगा पानी खरीदने से मजूरी का बड़ा हिस्सा पानी में जाता है. कन्नौड़, कोल्हू, अकड़दरा, चिड़िया जैसे कई गांवों में खारे पानी के टयूवबेल दिखते हैं, जो केवल यहीं दिखते हैं और यदा-कदा, टयूवबेल में बाकायदा सरकार के बिजली कनेक्शन लगे हैं. रेतीली मिट्टी में साल्ट ज्यादा होने से पानी रिसते-रिसते अपनी मिठास खो देता है. इसके बावजूद रेतीली जमीन के 250-300 फीट नीचे से खारे पानी को बरसात के मीठे पानी में मिलाकर लोग अपना गला गीला करते हैं. इन्हीं दिनों असंख्य आवारा और घरेलू जानवर असमय मौत के शिकार बनते हैं.

पानी की कमी से गला ही नहीं पेट भी सूखता है. इसलिए मजूरी का दूसरा बड़ा हिस्सा अनाज संकट से उबरने में जाता है. कतरा, केसुमला और शहर के गांववाले बताते हैं कि उन्हें गेहूं, मक्का, ज्वार के बजाए मालाड़ी बाजरा खाने की आदत है. वास्तव में वे यूपी में जानवरों को खिलाने वाला बाजरा खाते हैं. सूखा की लपटों से परंपरागत बीजों की कई किस्में खत्म हो रही हैं. ऊन उत्पादन के लिए भेड़ पालने वाले गड़रिए भेड़ो को काट-काटकर भूख की आग मिटाते हैं.

रोजी-रोटी का दूसरा जरिया चारा है. नगाना और खेतिया का तला के लोगों से जाना कि भैंस के बजाए यहां के लोग गाय, ऊंट, भेड़, बकरी और गधा पालते हैं. बढ़ते तापमान के हिसाब से भैंस की काली चमड़ी ज्यादा पानी मांगती है. जिन चरवाहों के पास 500 से ज्यादा जानवर हैं, वे पंजाब, हरियाणा, यूपी और मध्य प्रदेश का रुख करते हैं.

यहां पलायन की स्थिति दूसरे इलाकों के मुकाबले एकदम जुदा है. पूरे परिवार के बजाए एकाध आदमी घर से बाहर जाता है. छीतर का पार और बायतु के ज्यादातर लोग मानते हैं, पलायन करने वालों की हालत फिर भी ठीक हैं, जो पलायन नहीं कर पाते वो बेहद गरीब हैं. यहां रह जाने वालों का सारा पैसा पानी, अनाज और चारा खरीदने में चला जाता है. एक तो इतनी बेकारी, ऊपर से काम का दूसरा विकल्प न होने से पलायन यहां बुरा नहीं माना जाता. कुल मिलाकर 90 फीसदी घरों से पलायन होता है, जिन 10 फीसदी घरों से पलायन नहीं होता उनमें से ज्यादातर के यहां कमाने वाले ही नहीं होते. यहां के हालात समझने के लिए इतना काफी है कि 1964 का अकाल देख चुकी रत्नीबाई अब 74 बरस की हो चली हैं- पोपले चेहरे में धंसी आंखें भुखमरी, कुपोषण और तपेदिक जैसे रोगों की प्रतीक बन चुकी हैं.

सरकार बताती है कारण


1. बहुत कम बरसात.
2. बरसात की अनियमित आवृत्तियां यानी बादल की पहली बूंदों के बाद दूसरी बूंदें 20-30 दिनों में नहीं गिरीं तो फसलों की बर्बादी, फिर 1000 मिलीमीटर बरसात भी हो तो कोई फायदा नहीं.
3. थार की रेतीली आंधियां.
4. तापमान, अगर मानसून के मुकाबले तापमान का पारा 45 से 50 डिग्री तक चढ़े तो फसल जल जाती है.
5. ओले, पाला और कई किस्म के रोगों से मिलजुलकर अकाल पनपता है.

राहत की राजनीति

राहत योजनाएं अप्रैल से जून यानी साल के तीन महीनों के लिए ही होती हैं. इस दरम्यान बगैर पाइपलाइन वाले इलाकों में टैंकरों से पानी पहुंचाने की कोशिश होती है. लेकिन फतेहपुर के खियाराम कहते हैं- “जहां-जहां पाइपलाइन हैं, उनमें से ज्यादातर इलाकों में पानी की व्यवस्थाएं ठप्प हैं.” यानी ऊपर से ही यह मानकर चला जाता है कि व्यवस्थाएं सुचारू ढ़ंग से चल रही हैं.

चूंकि ‘फेमिन कोड’ में गाय को ही पशु माना गया है इसलिए सरकार के पशु-शिविरों में गाय को ही चारा खिलाने का कायदा है. यूं तो अंग्रेजों के जमाने में तो ऊंट को भी चारा मिलता था, क्योंकि उस समय परिवहन के मुख्य साधन ऊंट ही थे. अबके अधिकारियों को लगता है कि ऊंट परिवहन के साधन नहीं रहे इसलिए ‘वोट बैलेंस’ की राजनीति के चलते सिर्फ गाय के मरने की चिंता व्यक्त कर ली जाती है. वह भी वहां-वहां, जहां-जहां राजनैतिक दबाव है यानी 10 में से इक्का-दुक्का जगह. अकड़दरा के हनुमान कई उदाहरण देते हुए कहते हैं, “इन शिविरों में जब गाय तक चारा नहीं पहुंचता तो वह मरती हैं.” मरी गायों के बारे में लिखा जाता है- बचाने के विशेष प्रयासों के दौरान मारी गई.

सरकार की सुनें तो नरेगा ( राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना) में 100 रु. ‘न्यूनतम मजदूरी’ है लेकिन मांग के मुताबिक भुगतान न होने से 100 रु. भी नहीं मिलते. ऐसे में 100 रु. को ‘अधिकतम मजदूरी’ कहना चाहिए. वैसे 100 रु. को भी घटाने की तैयारियां चल रही हैं. स्थानीय स्थितियों को देखते हुए यह सवाल बड़े काम का है, काम के बदले आखिर करवाया क्या? जैसे कि जिन गांवों में नाड़ियां (तालाब) नहीं हैं, हो भी नहीं सकते, क्योंकि वहां न पानी आता है, न रेतीली जमीनों में ठहरता है, वहां नालियां बनवाने से कोई फायदा नहीं. इसके बावजूद नालियां बनवाकर लाखों रु. राहत वाली फाइलों में चढ़ जाते हैं.

पनावड़ा के करणराम कहते हैं- “कुछ लोगों को तो रोजगार मिलता ही है, कुछ अधिकारियों को भी राहत मिल जाती है.”

आइए इसे एक किस्से से समझते हैं. जोधपुर के पास एक बड़ा पुराना तालाब था. क्योंकि अधिकारियों को नरेगा के तहत इसकी मरम्मत करवानी ही थी इसलिए उसे एक, दो, तीन साल तक खोदते रहे. जिस चिकनी मिट्टी से पानी ठहरता था, उसे ही उखाड़ते हुए आजू-बाजू में बड़े-बड़े टीले खड़े किए. जब बरसात का पानी उसमें आया तो 15 दिनों से ज्यादा नहीं ठहरा. अब अधिकारियों के सामने यह विपदा आन पड़ी कि टीले के वजूद में पड़ी मिट्टी को वापस तालाब में डलवाएं भी तो पैमेन्ट कहां से शो करेंगे, क्योंकि यह टॉस्क की कल्पना से परे था. यानी तालाब के तमाम काम निपटाने के नाम से तालाब का ही काम तमाम कर दिया गया.

इसी तरह विधानसभा क्षेत्र में कुल 25 हेडपंप लगने थे, क्योंकि दो सरपंच विधायक के खास थे इसलिए कोल्हू और अकड़दरा गांवों में 20 हेडपंप लग गए. यहां हेडपंप सफल नहीं माने जाते, लेकिन राहत के छोटे-छोटे बटवारों में भी दलगत, जातिगत, इलाकागत जैसे समीकरणों की भूमिका तो रहती ही है.

एक ओर राजस्व विभाग की गिरदावरी रिपोर्ट ने “बायतु ब्लाक के 47 गांवों में सूखा” बताया, दूसरी तरफ सरकार की ही बीमा कंपनी ने कहा- वह “6 खेतों के मूल्यांकन के बाद बताएगी कि यहां सूखा है या नहीं.”

चलते-चलते

मामला महज बाड़मेर का नहीं है, थार यानी देश के 61 फीसदी रेगिस्तान का जर्रा-जर्रा सूखे की कहानी खुद कहता है. यहां सरकारी उम्मीद की अकाल मौत तो बहुत पहले ही हो चुकी है, इसलिए भूखे, प्यासे और बीमार लोगों को बादलों से ही राहत का इंतजार है. अप्रैल की आखिरी तारीखों में मुख्यमंत्री जी ने बाड़मेर भ्रमण का कार्यक्रम बनाया था. तब पंचायत समिति सिणधरी के चबा गांव में अकाल राहत कार्य के 60 मजदूरों ने हाथ खड़े करके एक महीने से मजदूरी नहीं मिलने की व्यथा कहनी चाही थी. लेकिन दौरे के एक दिन पहले ही प्रशासन ने मुख्यमंत्री को भ्रमित करते हुए नेशनल हाइवे पर पानी के लबालब हौद भरे, चारे के टैंकर खड़े करवा दिए. सूखे को सरकारी आंखों से दिखा दिया गया.

घंटे भर में मुख्यमंत्री जी यहां से वहां हुए, हालात जहां के तहां रहे. हालात इन दिनों सूखे से अकाल में बदल रहे हैं, इसलिए सरकारी महकमों में मुख्यमंत्री जी के वहां से यहां होने की गर्मागर्म चर्चाएं हैं.

10.8.09

ऐसे सूरत की कैसी सूरत?

शिरीष खरे, सूरत से लौटकर
थेम्स नदी से लगे लंदन वाली तस्वीर के हू-ब-हू सूरत को लंदन जैसा बनाने की कवायद जोर पकड़ चुकी है। इसलिए ताप्ती के किनारे से हजारों झापड़ियों को साफ किया जा रहा है। सरकार के मुताबिक इसके बाद सूरत आबाद हो जाएगा। क्या सचमुच सूरत आबाद हो पाएगा? सूरत में स्लम एरिया हटाने के लिए केन्द्र (यूपीए) और राज्य (बीजेपी) सरकारों ने मिलकर 2,157 करोड़ की रणनीति बना ली है। दोनों (यूपीए-भाजपा) इन दिनों एक साथ 1 लाख से ज्यादा झोपड़ियां तोड़ रहे हैं। सूरत महापालिका का काम जमीने खाली करवाना और बिल्डरों को सस्ते दामों में बेचना है।
हालांकि शहर में ‘रहने’ और ‘रोजी-रोटी’ के कई सवाल गहरा गए हैं, जबाव हैं कि मिलतें नहीं। मिलतें हैं तो उन टूटी बस्तियों के बेरहम किस्से, जो सूरत के नए नक्शे से गायब हैं। आपके सामने है कतारगाम इलाके से गायब एक ऐसी ही बस्ती का किस्सा, वैसे यह व्यवस्था के गायब होने का किस्सा भी है : चंद्रकांत भाई रोज की तरह काम पर गए थे, शाम को लौटे तो पूरी बस्ती ही लापता थी। फिर उन्होंने पता किया कि बाकी लोग शहर से बाहर कोसाठ नाम की जगह पर गए हैं। घरवालों से मिलने के लिए उन्हें रिक्शा करके फौरन कोसाठ जाना पड़ा।
15 जून 04’ का यह किस्सा अकेले चंद्रकांत भाई का नहीं है, तब सूरत के बीचो बीच कतारगाम बस्ती के 155 घर शहर की खूबसूरती की भेंट चढे़ थे। बाकी के 55 कच्चे घरों का टूटना भी पक्का है, बस तारीख फाईनल नहीं हुई है। यहां की 2 एकड़ जमीन पर कभी 2,50 घरों की 2,000 आबादी बसती थी। 90 साल पुरानी इस बस्ती की जमीन ने करोड़ों का भाव पार किया तो यहां के असली मालिकों को सस्ते घरों समेत उखाड़ फेंका गया। गायत्री बेन बताती हैं- ‘‘न सूचना दी, न सुनवाई की। वैसे भनक लग गई थी कि खूबसूरती के लिए तालाब फैलेगा, हमारी जगह पिकनिक स्पाट में बदलेगी, पार्किंग और गार्डन को जगह मिलेगी, सुबह-शाम टहलने वालों का ‘स्पेशल-रुट’ बनेगा, बिल्डरों की दुकाने खुलेगी, बस्ती की बजाय मार्केट होगा।...आप तो वहीं से आ रहे हैं, हमारी बातें सच साबित हुईं ना!’’
कोसाठ, जहां हम खड़े हैं, यह कतारगाम से उजड़े रहवासियों का अगला ठिकाना बना। यह कतारगाम से ‘12 किलोमीटर’ दूर, शहर के उत्तरी तरफ का ‘आऊटसाइड’ और नक्शे के हिसाब से ‘बाढ़ प्रभावित’ इलाका है। कौशिक भाई बताते हैं- ‘‘यहां बसाए जाने का विरोध सुनकर महापालिका का अफसर बड़े ठण्डे दिमाग से बोला कि तुम्हें बस्ती बनाने की बजाय ऊंची मंजिलों में रहना चाहिए। बारिश का पानी भरे भी तो दूसरी, नहीं तो तीसरी मंजिल में चढ़ जाना।’’ तारीखे गवाह हैं कि 2004 की बाढ़ से सूरत के 30,000 लोग प्रभावित हुए थे। तब इन्हें न मंजिल नसीब हुई, न जमीन। एक साल बाद महापालिका से जगह (12 गुणा 35 वर्ग फीट/2 लाख) के बदले जगह (माटी के दाम जैसी) तो मिली लेकिन घर के बदले घर नहीं। न ही तोड़े गए लाखों के घरों और हजारों की गृहस्थियों का मुआवजा। एक साथ इनसे बिजली, पानी, नालियां, टायलेट, रास्ते, मैदान, बाजार, आंगनबाड़ी, स्कूल, राशनकार्ड, वोटरलिस्ट के नाम ऐसे छूटे कि अभी तक नहीं लौटे। इनके बगैर भी काम चल जाता, जब काम की छूट गए तो जिंदगी कैसे चले ?
काम छूट गए
‘‘जमीन, घर, गृहस्थी का नुकसान तो सबने देखा। लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान तो बेकारी से हुआ।’’ ऐसा कहना है नरोत्तम महापात्र का, कोसाठ में उनकी तरह ही दर्जन भर औरत-मर्द अपने-अपने ठिकानों के बाहर बैठे हैं। बातों ही बातों में मालूम पड़ता है कि पहले इन्हें ‘कतारगाम इण्डस्ट्रियल एरिया’ के ‘पावरलूम्स’ में दिहाड़ी मजदूरी मिल जाती थी। एक दिन में 1,50 और महीने भर में 3,500 से 4,000 रूपए तो बनते ही थे। कुछ लोग मजदूरों की छोटी-छोटी जरूरतों जैसे चाय, नाश्ता या खाने-पीने के धंधों से जुड़े थे। औरते, घरेलू काम के लिए आसपास की सोसाइटियों में जातीं और महीने भर में 6,00 रूपए कमाती थीं। इस तरह हर घर का हाल-चाल बहुत अच्छा तो नहीं, फिर भी चल रहा था। यहां आकर तो इनकी दुनिया ठहर ही गई है।
अज्जू मियां बताते हैं- ‘‘कतारगाम आओ-जाओ तो 40 रूपए अकेले आटो के। इसके बाद मजदूरी न मिले तो आफत। तब कारखानों के आसपास थे, मजदूरी मिलती ही थी। अब आसपास के दूसरे लोगों को ही रख लेते हैं।’’ यही हाल औरतों का है, घरों में काम करने से जितना (6,00 रूपए) मिलेगा उससे दोगुना तो अब भाड़े (12,00 रूपए) में जाएगा। रक्षा बेन बोली- ‘‘मालकिनों से जरूरत की चीजे और उधार के पैसे तो मिलते थे। यहां तो ऊंचे ब्याज-दर पर पैसे उठाने पड़ते हैं।’’ महीना भर पहले ही हेमंत भाई की बीबी टीबी के चलते खत्म हुईं हैं, उन्होंने ईलाज के लिए 12 रूपए/महीने के हिसाब से 10,000 उठाए थे। एक तो आमदनी नहीं, ऊपर से कर्ज का बढ़ता बोझ। यहां हरके कम से कम 25,000 रूपए का कर्जदार तो बना ही रहता है। इनमें से ज्यादातर ने घर बनाने के लिए कर्ज लिया था, जिसका ब्याज अब तक नहीं छूट रहा है।
राजेश भाई रिक्शा चलाते हैं। उन्होंने अधूरे खड़े घरों का इतिहास बताने के लिए 4 साल पुरानी बात छेड़ी- ‘‘तब 29 दिनों तक तो ऐसे ही पड़े रहे। बीच में जोर की बारिश हुई तो सबने चंदा करके यहां एक टेंट लगवाया। कईयों ने अपने टूटे घरों की लकड़ी, पनी और बांस से अस्थायी घर बनाए, जो भारी बाढ़ में बह गए। मेरी 90 साल की नानी और एक पैर से कमजोर मौसी ने जो तकलीफ झेली उसे कैसे सुनाऊं, बीबी टीबी की मरीज थी, उसे बच्ची को लेकर मायके जाना पड़ा।’’ यहां की हालत देखकर तो लगता है कि कच्चे-पक्के आशियाने एक बार बनने के बाद खड़े नहीं रहते, हर साल की बाढ़ से टूटते, फूटते, गिरते या बहते ही हैं। इस तरह मानसून के साथ आशियाने बनाने और सामान खरीदने की जद्दोजहद जारी रहती है। इस साल भी भारी बूंदों के साथ तबाही के बादल बरसने लगे हैं।
एसएमसी का (स्व)राज
सूरत महापालिका (प्र)शासन तरीके को टीना बेन के किस्से से समझते हैं। 1992 को टीना बेन 14 साल की थी, तब उन्हें घर के सामने खड़ा करके एक स्लेट पर उनका नाम, एनके परिवार वालों का नाम लिखवाकर फोटो ले लिया गया। 2005 को याने ठीक 12 साल बाद जब वह दो बच्चों की मां बनी तो भी उन्हें 1992 की फोटो के हिसाब से घर का मुआवजा मिला। समय के इतने बड़े अंतराल में घर तो क्या बस्ती की पूरी दुनिया ही बदल जाती है, लेकिन नहीं बदलती है तो सूरत महापालिका की मानसिकता।
कतारगाम में किसी का घर 30 तो किसी का 60 फीट की जगह पर था, लेकिन कोसाठ में सभी को 12 गुणा 35 वर्ग फीट के फार्मूले से जगह बांटी गई। अब आप ही बताइए 12 गुणा 35 वर्ग फीट में कोई क्या बनाएगा, जो बनेगा उसे चाहे तो किचन कह लो, नहीं तो टायलेट, बाथरूम, बेडरूम, हाल या गेलरी, कुछ भी कह लो। ऐसी बस्तियों में लम्बे समय से काम करने वाले अल्फ्रेड भाई बताते हैं- ‘‘महापालिका जिन मकानों को तोड़ने की ठान लेती है उनसे टेक्स वसूलना बंद कर देती है। जिससे टेक्स नहीं लिया जाता वह डर जाता है, अगला नम्बर उसका भी हो सकता है! बुलडोजर आने से पहले पुलिस के पास बस्ती में कड़ा विरोध करने वालों की वाकायदा एक लिस्ट होती है। उन्हें डेमोलेशन से पहले ही धर दबोचा जाता है। कुल मिलाकर सूरत में तोड़-फोड़ की ज्यादातर कार्यवाहियों को तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण भरे माहौल में निपटा लिया जाता है।’’
लौटते वक्त नानदीप मिला। इतनी बड़ी बसाहट में अकेला यही लड़का पढ़ने जाता है, वह भी 2 किलोमीटर दूर के एक मंहगे प्राइवेट स्कूल में। 9 वीं में पढ़ने वाले नानदीप ने बताया- ‘‘जिन महीनों में स्कूल की फीस और टेम्पो का पैसा रहता है, उन्हीं महीनों में ही स्कूल जाता हूं। कतारगाम वाले स्कूल (महापालिका) में इतने हाई-फाई बच्चे नहीं थे। लेकिन यहां के बच्चों के साथ बैठने, पढ़ने में अच्छा नहीं लगता। क्लास 6 में वहां मेरी ‘बी’ ग्रेड थी, और यहां ‘सी’।’’ यह है एसएमसी और प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा और सभ्यता के बीच की खाई। नानदीप जैसे बच्चों से खाई भरने की उम्मीद पालना नाइंसाफी होगी।
काहे के कायदे, वायदे
डेमोलेशन की कानूनी लड़ाईयों में उलझने वाले भरत भाई से यह मालूम हुआ कि इस दौरान ‘यूनाईटेड नेशन’ की गाईडलाईन निभानी जरूरी थी। यहां डेमोलेशन के पहले और बाद में ‘मानव-अधिकारों’’ का खुला अपमान हुआ। जिन्हें उखाड़ना था, उनके साथ बैठकर पुनर्वास और राहत की बातें की जानी थी। गाईडलाईन कहती है कि विकलांग, बुजुर्ग और एसटी-एससी को उनके रोजगार के मुताबिक और पुराने झोपड़े के पास ही बसाया जाए। पीड़ित आदमी को पहले पुनर्वास वाली जगह दिखाई जाए, इसके बाद अगर वह मांग करता है तो उसे कोर्ट में जाने का हक भी है। इसके लिए कम से कम 90 दिनों का समय भी दिया जाए। लेकिन सूरत महापालिका ने तो एक भी कायदा नहीं निभाया।
मावजी भाई, 62 साल के दलित नेता है। कतारगाम बस्ती में डेमोलेशन (2004) के वक्त वहीं थे, पुलिस ने उन्हें भी खूब पीटा, दो दिनों तक जेल में भी रखा। मावजी भाई बताते हैं- ‘‘हमारे नामों को अभी तक वोटरलिस्ट में नहीं लाना, संयोग नहीं, एक साजिश है। महापालिका के चुनाव फिर आ गए, ऐसे में हर एक का राजनैतिक वजूद भी तोड़ा गया है।’’ डेमोलेशन के वक्त आप लोग कारर्पोरेटर (महापालिका का मेम्बर) के पास गए थे ?’ मेरे इस औपचारिक भरे सवाल पर ममता आपा अपनी हंसी नहीं रोक सकीं, वह बोलीं- ‘‘गए थे, वह बोला कि बहुत तेज बुखार आया है, उठने में महीना भर तो लगेगा। 5 साल होने को हैं, न उसका बुखार उतरा, न ही कोई विधायक, मंत्री, सांसद इस तरफ आया।
जैसा कि सब जानते हैं महात्मा गांधी को ‘कालेपन’ की वजह से एक रात साऊथ-अफ्रीका में चलती ट्रेन से फेंका गया था। उन्हीं महात्मा को अपना बताने वाले गुजरात के सूरत में हजारों भारतीयों को ‘झोपड़पट्टी-वाला’ होने की वजह से 25 किलोमीटर दूर फेंका गया है। 120 साल पहले हुए अन्याय का किस्सा इतिहास नहीं वर्तमान है, जो भविष्य में भी बार-बार दोहराया जाएगा। हां यह और बात हैं कि कल कतारगाम जैसी बस्तियों का उल्लेख खोजने से भी नहीं मिलेगा। लेकिन शायद कातरगाम के निवासी नहीं जानते हैं कि सूरत चमकाने के लिए कोई न कोई कीमत अदा करता ही है. यहां, इस शहर में यह कीमत उनसे वसूली जा रही है.

30.6.09

हरीबत्ती के इंतजार में



शिरीष खरे
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मुंबई के फुटपाथों पर न जाने कितनी बार लालबत्ती हरीबत्ती में बदलती है और हरीबत्ती लालबत्ती में. पर इनके नीचे खड़ी लाखों औरतों को आज भी अपनी जिंदगी में एक हरीबत्ती का इंतजार हैं


‘मुझ जैसी कईयों को अपना शरीर बार-बार बेचना पड़ता है.’ एक औरत की मुंह से पहली बार ऐसा सुन कोई भी झिझक सकता है. सपना ने बेझिझक आगे कहा, ‘पेट की खातिर करना पड़ता है. इज्जत के मारे घर बैठ सकती हूं लेकिन...’ उसके बाद वह चुपचाप एक गली में गई और ओझल हो गई.
देश के कोने-कोने से हजारों मजदूर सपनों के शहर मुंबई आते हैं. इनमें से अधिकतर असंगठित क्षेत्र से हैं. यह शहर के उठने का वक्त है. मुंबई सेंट्रल से बोरीबली आने वाली लोकल के ठहरने के बीच का यह वक्त हजारों लोगों के दौड़ने का भी वक्त है. ठीक इसी वक्त नाकों पर मजदूर औरतें भी खासी संख्या में दिखाई देती हैं. इनमें से कइयों को काम नहीं मिलता और इसलिए कइयों को ‘सपना’ बन जाना पड़ता है. तो क्या पलायन के रास्ते ये बेकारी से होते हुए सीधे देह-व्यापार को जा रही हैं?

मुंबई के उत्तरी तरफ, बोरावली में संजय गांधी नेशनल पार्क के पास दिहाड़ी मजदूरों की एक बस्ती है. यहां पीने के पानी के बाद अब रोजीरोटी के लिए दिन कि शुरुआत एक लंबी लाइन के साथ शुरु हो चुकी है. बुनियादी योजनाओं यहां से होकर नहीं गुजरतीं. इन्होंने अपने हाथों से कई आकाश चूमती इमारतें बनायी हैं. खास तौर से नवी मुंबई को बनाने में कम अवधि के ठेकों पर अंगूठे लगाए हैं. इन्होंने ही कई गिरती इमारतों को दुबारा खड़ा भी किया है. यहां आमतौर पर औरत को 120 और मर्द को 180 रूपये दिन के हिसाब से मजदूरी मिलती है. ठेकेदार और मजदूरों के आपसी रिश्तों से भी मजदूरी तय होती है. एक मजदूर का 3,500 रूपये महीने से कम में गुजारा नहीं होता. मतलब एक दिन के लिए सौ रूपये चाहिए ही चाहिए. इतनी आमदनी पाने के लिए परिवार की औरत भी मजदूरी को जाती है. उसे महीने में कम से कम पंद्रह दिन काम चाहिए. मगर उसे हर दिन काम मिले ही तो यह जरुरी नहीं. कुल मिलाकर, एक औरत के लिए 1,800 रुपए महीना कमाना भी मुश्किल हो जाता है.

यह मलाड नाके का दृश्य है. सड़क किनारे और मेडिकल स्टोर के ठीक सामने मजदूरों के दर्जनों समूह हैं. यहां औरत-मर्द एक-दूसरे के आजू-बाजू बैठे बतियाते हैं. यह काम पाने की सूचनाओं का अहम अड्डा है. यहां सुबह ग्यारह बजे तक भीड़ रहती है. और उसके बाद जिन्हें काम मिलता है वे काम पर जाते हैं और जिन्हें काम नहीं मिलता वे घर लौट आते हैं. पर सेवंती खाली नहीं लौट सकती. इसलिए उसकी सुबह देर रात में बदल जाती है. और उसे नाके से लगी गलियों में पहुंचकर देह के ग्राहक ढूंढने पड़ते हैं.

रविवार होने के बावजूद उसे तीन घंटे से कोई ग्राहक नहीं मिला. इस व्यापार में दलाल कुल कमाई का बड़ा हिस्सा निगल जाता है इसलिए सेवंती दलाल की मदद नहीं लेना चाहती. सेवंती जैसी दूसरी औरतों को भी ग्राहक के एक इशारे का इंतजार है. इनकी उम्र चौदह से पैंतीस है. यह अस्सी से 150 रुपये में सौदा पक्का कर सकती हैं. अगले 24 घंटों में चार ग्राहक भी मिल गये तो बहुत हैं. ये अपने ग्राहकों से दोहरे अर्थो वाली भाषा में बात करती हैं. ऐसा शायद पुलिस और रहवासियों से बचने के लिए कर रही हैं. ये अपने असली नाम भी नहीं बतातीं. जाहिर है इन्हें यहां सुरक्षा का एहसास नहीं है. शारारिक और मानसिक यातनाओं का डर सता रहा है. यहां से किसी को गर्भवती तो किसी को गंभीर बीमारी के शिकार बनने का डर भी सता रहा है.

देह कारोबार से जुड़ी तारा बताती है कि इस कारोबार में सौ में सत्तर 30 साल से कम की है. इसमें से भी पच्चीस बामुश्किल अठारह की हैं. इनदिनों कम उम्र की लड़कियों की संख्या बढ़ रही है. पैंतीस तक आते-आते औरत की आमदनी कम होने लगती है. एक औरत अपने को बीस साल से ज्यादा नहीं बेच पाती. आधे से अधिक औरतें पैसों की कमी के चलते इन गलियों में आती हैं. पीछे खड़ी कुसुम कहती है कि मुझे तो बच्चे और घर-बार भी संभालना होता है. यहां अधिकतर की अंतहीन कहानियां हैं. मसलन, माधुरी का पिता उसे मजदूरी के लिए भेजता है लेकिन वह मजदूरी के साथ अपने शरीर से भी पैसे कमा लाती है. गिरिजा अपने भाई की बेकारी के दिनों का बरकत है. सुब्बा ने पति के एक्सीडेंट के बाद गृहस्थी का बोझ संभाल लिया है. जोया ने छोटी बहिन की शादी के लिए थोड़ा-थोड़ा पैसा बचाना शुरू कर दिया है. पर अब उसकी बहन पढ़ाई के लिए मुंबई आना चाहती है. जोया अपनी सच्चाई छिपाना चाहती है. उसे अपनी इज्जत के तार-तार होने का आशंका है. नगमा पैंतालीस पार हो चुकी है और अब उसकी चौदह साल की बेटी बड़की कमाती है. बड़की बाल यौन-शोषण का जीता जागता रूप है.

और यहां कदम-कदम पर ‘बड़कियां’ खड़ी हैं. ये चोरी-छिपे इस कारोबार में लगी हैं लिहाजा कुल लड़कियों का असली आकड़ा कोई नहीं जानता. कोई बंगाल से है तो कोई नेपाल से तो कोई महाराष्ट्र से. पर इनके दुख-दुविधाओं में अधिक अंतर नहीं दिखता. इन्होंने अपनी चिंताओं को मेकअप की गहरी परतों से ढंक लिया है. मोनी ने बताया कि इस पेशे से हमारा शरीर जुड़ता है, मन नहीं. हम पैसों के लिए अलग-अलग मर्दों को अपना शरीर बेचते हैं लेकिन कई मर्द ऐसे भी हैं जो जिस्मफरोशी के लिए बार-बार ठिकाने बदलते हैं. अगर हमें गलत समझा जाता है तो उन्हें क्यों नही? मोनी का सवाल देह कारोबार के उन अनछुएं पहलुओं पर शिनाख्त करने की मांग करता है जिन्हें समाज की तरह सरकार ने भी अनदेखा किया हुआ है और जब तब ये उठते भी हैं तो इन्हें नैतिकता, अपराध या स्वास्थ्य के दायरों से बांध दिया जाता है. इस क्षेत्र से जुड़े एक वर्ग का मानना है कि यौनकर्मी बनने की बहुत सारी बातें पारिवारिक हिंसा, दुत्कार, अपराध, बलात्कार और खरीद-फरोख्त से भी जुड़ी होती हैं. मगर बाजार की फितरत के चलते यहां भी शोषण के लिए अधिकतर उन्हीं लड़कियों को चुन लिया जाता है जो पिछड़े और गरीब तबके से आती हैं. उनकी मजबूरियों के विरूद्ध उनके सारे सपने बहुत सस्ते और थोक में जो बिक जाते हैं. जाहिर है देह कारोबार का ताल्लुक गरीबी-बेकारी-पलायन जैसी कडि़यों से है. मगर इन कडि़यों के आपसी गठजोड़ की ओर ध्यान नहीं जाता.

भारत में देह कारोबार की रोकथाम के लिए ‘भारतीय दंडविधान, 1860’ से लेकर ‘वेश्यावृत्ति उन्मूलन विधेयक, 1956’ बनाये गये. फिलहाल कानून के फेरबदल पर भी विचार चल रहा है. मगर इस स्थिति की जड़ें तो समाज की भीतरी परतों में छिपी हैं. मुंबई से सांसद प्रिय दत्त के मुताबिक, 'इनकी जिंदगी में फेरबदल तो गरीबी, बेकारी या पलायन में से किसी एक समस्या को हल करने से होगा. इस व्यापार से जुड़ी औरतें दो वक्त की रोटी के लिए लड़ रही हैं. इसलिए ऐसी नीतियां हों जिनमें इन औरतों के जीवन-स्तर को उठाने की बजाय इन्हें जीने के सही मौके दिये जाने को वरीयता दी जाए.'
देखा जाए तो सरकार ने पलायन रोकने के लिए मनरेगा चलाई है जिसके तहत देश के दो सौ जिलों में साल में सौ दिनों के लिए 'हर हाथ को काम और पूरा दाम' का प्रावधान है. मगर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने खुलासा किया है कि यह योजना फ्लॉप साबित हुई है. वहीं 365 दिनों के काम की तलाश में मजदूरों का मुंबई जैसे महानगरों की तरफ पलायन जारी है. दूरदर्शन के कार्यक्रम के बीच ‘रुकावट के लिए खेद’ जैसा संदेश चर्चा का विषय रहा है. मुंबई जैसी महानगरी में कमाठीपुरा जैसी गलियों के भीतर बढ़ते देह के सौदागरों को देखते हुए क्या 'हर हाथ को काम और पूरा दाम' के आगे भी यही संदेश नहीं चिपका देना चाहिए?

पलायन की रफ्तार के बराबर मुंबई का देह कारोबार भी तेजी से फल-फूल रहा है. बात चाहे आजादी के पहले की हो या बाद की. यह किस्सा चाहे कलकत्ता का हो या मुंबई का. मुंबई में सड़क चाहे ग्रांट रोड की हो या मीरा रोड की. चौराहे पर मूर्ति चाहे अंबेडकर की लगी हो या गांधी की. यहां आपको रूकमणी (हिन्दू) भी मिलेगी और रूहाना (मुसलमान) भी. मगर जिन्हें अपने धर्म, क्षेत्र, जुबान या जाति पर नाज है, वे कहीं नहीं दिखते. यहां के लालबत्ती पर रुकी औरतों की जिंदगी बदलाव चाहती है. तस्करी के तारों से जुड़ने के पहले इन्हें एक हरीबत्ती का इंतजार है.
स्टोरी में देह-व्यापार के लिए मजबूर औरतों की पहचान छिपाने के लिए उनके नाम बदल दिये गए हैं.