सुरक्षा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सुरक्षा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

6.9.11

खोए बच्चों की वापसी का इंतजार


आगरा।बौद्ध नगर में एक छोटे से कमरे में रहने वाली सोमवती को अपने तीन बच्चों की वापसी का पिछले नौ साल से इंतजार है। वर्ष 2002 में सोमवती के 10 से 14 वर्ष की उम्र के तीन लड़के एक के बाद एक करके गायब हो गए। अपने बच्चों से बिछड़ने की पीड़ा झेलने वाली सोमवती अकेली नहीं है बल्कि ऐसे सैकड़ों मां-बाप हैं जो अपने खोए बच्चों की वापसी का आज भी इंतजार कर रहे हैं।

सोमवती के बच्चों के गायब होने की रिपोर्ट पुलिस ने पांच साल तक नहीं लिखी। इसके बाद वर्ष 2010 में इस मामले की फाइल बंद कर दी गई। पुलिस और प्रशासन के गलियारों में दर-दर भटक रही इस गरीब महिला ने स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से राष्ट्रपति से गुहार लगाई जहां से राज्य सरकार को इस मामले की जांच के निर्देश दिए गए। फाइल तो दोबारा खुल गई पर सोमवती आज भी बच्चों के इंतजार में पथराई आंखों से इन तंग गलियों को देखती है।

मध्य प्रदेश के मंडला जिले में जनजातीय परिवार की किशोरी सुनीता को वर्ष 2004 में उनके कुछ परिचित 17 साल की उम्र में दिल्ली में काम दिलवाने के बहाने ले गए थे। सुनीता के पिता कुंवर सिंह को दो साल तक उनके परिचित यह कहकर टालते रहे कि उनकी बेटी दिल्ली में काम कर रही है। पर कई बार दिल्ली जाने के बावजूद उन्होंने कुंवर सिंह को न तो उनकी बेटी से मिलवाया गया और न ही उससे बात करने दी।

दो वर्ष बाद 2006 में कुंवर सिंह ने प्रशासन और पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई। उन्हें शक है कि उनकी बेटी को किसी गिरोह के हाथों बेच दिया गया है। कुंवर सिंह की रिपोर्ट में वे लोग बाकायदा नामजद किए गए हैं जो उनकी बेटी को झूठा दिलासा लेकर दिल्ली ले गए थे। लेकिन सरकारी कार्यालयों और थानों में चक्कर काट रहे इस असहाय पिता की गुहार सुनने वाला कोई नहीं है।

गैर सरकारी संगठन चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) के अनुसार दिल्ली, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में बच्चे गायब हो रहे हैं। हालांकि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो द्वारा ऐसे मामलों का रिकार्ड रखा जाता है। पर दिलचस्प बात यह है कि क्राई और उसके सहयोगी संगठनों ने जब सूचना के अधिकार के तहत जानकारी एकत्र की तो पता चला कि बच्चों के गायब होने के मामलों की संख्या वास्तव में थाने में दर्ज मामलों से कहीं ज्यादा है।

समस्या की गम्भीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली में पिछले वर्ष प्रतिदिन 18 बच्चे गायब हुए। क्राई की रपट के अनुसार वर्ष 2010 में दिल्ली में पहले नौ महीनों में गायब हुए 2161 बच्चों में से 1102 लड़के और 962 लड़कियां थीं। इनमें से 1556 बच्चों को तो ढूंढ निकाला गया लेकिन 603 बच्चों को कुछ पता नहीं चला।

मध्यप्रदेश में वर्ष 2003 से 2009 के बीच 57253 बच्चे गायब हो गए। इनमें से लगभग 5350 बच्चों का आज तक पता नहीं चल पाया है।

उत्तर प्रदेश के आठ जिलों में अक्टूबर 2010 में सूचना का अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार 250 बच्चे गायब हो चुके थे। ये आठ जिले हैं-गोरखपुर, मऊ, बाराबंकी, मुजफ्फरनगर, आगरा, अम्बेडकर नगर, प्रतापगढ़ और आजमगढ़। इससे पहले उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा फरवरी 2008 में उपलब्ध करवाई गई जानकारी के अनुसार वर्ष 2006 में राज्य से 3649 बच्चे गायब हो गए थे जिनमें से 712 को तब तक प्रशासन ढूंढ नहीं पाया।

क्राई की रपट के अनुसार देश के नौनिहालों का बड़ी संख्या में गायब होना बदस्तूर जारी है। गायब बच्चों में से बड़ी तादाद गरीब और आर्थिक व सामाजिक रूप से कमजोर परिवारों की है। रपट के अनुसार इन बच्चों का इस्तेमाल बंधुआ मजदूर, बाल मजदूर, बाल विवाह और यौन शोषण के लिए किया जाता है। कई बच्चे ऐसे भी हैं जो घरेलू हिंसा और विभिन्न प्रकार के शोषण से परेशान होकर घरों से भाग जाते हैं और अंतत: किसी गिरोह या स्वार्थी तत्वों के हाथ पड़कर शोषण के शिकार हो जाते हैं।

क्राई की निदेशक योगिता वर्मा के अनुसार, "कई बार ये बच्चे भिखारियों और जेबकतरों के गिरोहों के हाथों शोषित होते हैं। नशीले पदाथरें के तस्कर भी इनका इस्तेमाल करते हैं।"

वर्मा के अनुसार, "खासतौर से सड़कों व चौराहों पर रहने वाले बच्चों को अगवा कर न केवल उनका शारीरिक और यौन शोषण होता है। चिंता की बात यह है कि अक्सर ऐसे मामले दर्ज नहीं हो पाते हैं। "

रपट के अनुसार इस समस्या से निपटने में दो बड़ी बाधाएं सामने आती हैं। पहली बाधा कानूनी है। क्राई के अनुसार यह बात चिंताजनक है कि देश में बच्चों की तस्करी से सम्बंधित कोई अलग कानून नहीं है, इसलिए बच्चों की खरीद-फरोख्त अथवा तस्करी को कानूनी नजरिए से भारत में एक अलग आपराधिक श्रेणी में नहीं रखा जाता है।

दूसरी समस्या है पुलिसकर्मियों में ऐसे मामलों से निपटने के लिए संवेदनशीलता और दक्षता का अभाव। रपट के अनुसार राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी यह पाया है कि ऐसे मामलों को पुलिस प्राथमिकता नहीं देती। पुलिसकर्मियों को ऐसे मामलों से निपटने के लिए विशेष प्रशिक्षण की जरूरत है।

14.8.11

दलदल में देश का भविष्य



बच्चों को देश का भविष्य कहा जाता है.
लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि देश के अधिसंख्य बच्चे अपना पेट भरने के लिए बाल श्रम, बंधुआ मजदूरी और खतरनाक उद्योगों में जान हथेली पर रख कर काम करने को मजबूर हैं; तो दूसरी तरफ बच्चों का अपहरण करके मानव तस्करी और वेश्यावृत्ति में धकेलने का धंधा भी धड़ल्ले से फल-फू ल रहा है. राजधानी दिल्ली में बच्चे लगातार गायब हो रहे हैं लेकिन किसी ने जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर उनके गायब होने की वजह क्या है.
गैर सरकारी संगठन क्राई को आरटीआई के तहत मिली सूचना में कुछ चौंकाने वाले तथ्य उभर कर सामने आए है. पिछले जनवरी से लेकर अप्रैल तक चार महीने में राजधानी के विभिन्न इलाकों से 1238 बच्चे गुम हुए हैं. जिसमें 690 लड़कियां और 570 लड़के गुम है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक गायब होने वाले बच्चों की उम्र 12 से 18 वर्ष होती है. राष्ट्रीय स्तर पर पिछले दो सालों में पंद्रह राज्यों से 1 लाख 17 हजार बच्चे गायब हुए हैं. आैसतन 60 हजार बच्चे हर साल गायब हो रहे हैं.  
जानकारों के मुताबिक गायब हुए बच्चों को संसार के तीन सबसे पुराने अवैध धंधों- अवैध हथियार का व्यापार, नशीली दवाओं के कारोबार और वेश्यावृत्ति में इस्तेमाल किया जाता है. पूरे विश्व में यह व्यापार सालाना 45 अरब डालर का है. विश्व के कई हिस्सों में तो मासूमों को जानवरों से भी सस्ती कीमत पर बेचा जा रहा है. यानी कहा जा सकता है कि बच्चों को वस्तु बना दिया गया है. देश के कई भागों में कानून के रखवालों द्वारा ऐसे बच्चों की खरीद-फरोख्त में लिप्त लोगों को पकड़ा भी जाता है तथा बच्चों की बरामदगी भी होती है लेकिन कागज के कुछ चंद नोटों के बदले इस जघन्य धंधे के सरगना आसानी से छूट जाते हैं. राजधानी और बड़े-बड़े महानगरों में हर साल अधिकांश बच्चे ट्रैफिकिंग करके लाए जाते हैं. उनके मां-बाप को उनके बेहतर भविष्य का सपना दिखाया जाता है. लेकिन हकीकत में उन्हें जलालत भरी जिंदगी जीने के  लिए विवश किया जाता है.
पूर्वोत्तर राज्यों, बिहार, ओडिसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ के बच्चे तस्करों का आसान शिकार होते हैं. नीति निर्धारक इन बच्चों को गरीबी के चलते पलायित मानते हैं लेकिन असल में ये बाल व्यापार के शिकार हैं. बाल व्यापार में बच्चों के अभिभावकों को थोड़ा-बहुत पैसा देकर उनकी सहमति हासिल की जाती है. ऐसे बच्चों के माता-पिता गरीबी की वजह से पैसे के लोभ में फंस जाते हैं. इसके अलावा अपहरण करके और बच्चों को बहला-फुसलाकर भी बाल व्यापार के दलदल में फंसाया जा रहा है.
बाल व्यापार की मार झेल रहे बच्चों से वेश्यावृत्ति के अलावा मजदूरी भी करवाई जाती है. दरअसल, ऐसे बच्चों को जबरिया मजदूर कहना ज्यादा वाजिब होगा. अंतरराष्ट्रीय कानूनों के मुताबिक इसे समकालीन दासता कहा गया है. पूरी दुनिया में हर साल तकरीबन 60 लाख बच्चे बाल व्यापार के शिकार हो रहे हंै. इसमें से एक तिहाई बच्चे दक्षिण एशियाई देशों से हैं. जहां तक भारत की बात है तो यहां बाल व्यापार में ढकेले जा रहे बच्चों की संख्या से जुड़े सही-सही आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. भारत बाल व्यापार का बहुत बड़ा केंद्र है.
बाल व्यापार के क्षेत्र में भारत स्रोत, गंतव्य और पारागमन केंद्र के रूप में काम कर रहा है. नेपाल और बांग्लादेश से बच्चे यहां लाए जा रहे हैं. यहां से बड़ी संख्या में बच्चे अरब देशों में ले जाए जा रहे हैं. अरब देशों में कम उम्र की मुस्लिम लड़कियां भी ले जाई जा रही हैं. वहां के शेख इनसे अपनी यौन इच्छाओं की पूर्ति कर रहे हैं. इसके अलावा अन्य देशों में घरेलू मजदूर के तौर पर भी मासूमों का इस्तेमाल भारत से ले जाकर किया जा रहा है.
देश में बाल व्यापार के कानून की जद में वेश्यावृत्ति और यौन शोषण ही हैं. कहना न होगा भारत के मौजूदा कानून बाल व्यापार पर लगाम लगाने में अक्षम हैं. इसलिए नए कानून की दरकार है. फरवरी-मार्च 2007 में बचपन बचाओ आंदोलन ने बाल व्यापार के खिलाफ यात्रा निकाली. जिसे संयुक्त राष्ट्र ने इस दिशा में अब तक की सबसे बड़ी यात्रा बताया था. इस यात्रा के परिणामस्वरूप सार्क देशों की बैठक में बाल व्यापार पर चर्चा हुई. सार्क सदस्यों ने इस दिशा में नीति बनाए जाने की वकालत तो की ही, साथ ही साथ एक कार्यदल गठित करने की भी घोषणा की.
उसके बाद संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधियों और केंद्रीय मंत्रियों के साथ एक बैठक में भी बाल व्यापार के खिलाफ कानून बनाए जाने पर सहमति बनी. लेकिन इसके बाद भी देश के कानून में बदलाव आएगा और आने वाले दिनों में इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे, यह कहा नहीं जा सकता है. सार्क देशों ने इसको रोकने के लिए टास्क फोर्स का गठन किया है. सदस्य देशों के सीमांत क्षेत्रों के बाल व्यापार पर लगाम लगाने की बात कही जा रही है. लेकिन क्या इस सारी कवायद के बाद इस अमानवीयता पर रोक लगेंगी? यह बड़ा प्रश्न है.

29.7.11

मानव तस्करी के शिकार हो रहे हैं राजधानी के नौनिहाल

नई दिल्ली.‘साहब वो बोल नहीं सकती, सुन भी नहीं सकती,.उसे बचा लो साहब, मेरी बच्ची को बचा लो।’ पिछले चार हफ्तों से अपनी मूक-बधिर बेटी की तलाश में बसंतकुंज की रेहाना मदद की आस में दर-दर भटक रही है।

रेहाना की तरह राजधानी में सैकड़ों ऐसे परिवार हैं, जो अपने कलेजे के टुकड़े की तलाश में सालों से इधर-उधर भटक रहे हैं, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं। हद तो तब हो जाती है, जब इन दुखियारों की मदद करने से पुलिस भी मना कर देती है।

कलेजे के टुकड़े से बिछड़ने व पुलिस की उपेक्षा से आहत इन परिजनों के जख्मों में मरहम लगाने के लिए क्राई नामक संस्था ने एक कार्यक्रम आयोजित कर दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों सहित गैर सरकारी संस्थाओं के प्रमुखों के सामने उन्हें अपनी फरियाद सुनाने का अवसर मुहैया कराया।

रेहाना की तरह पिछले नौ साल से बेटे राहुल की तलाश कर रहे सुंदर के ने कहा कि बेटे की तलाश में जब पुलिस से मदद मांगने गए तो उन्होंने पहले खुद ही बेटे की तलाश करने की बात कह वहां से भगा दिया। बेटे के न मिलने पर जब दुबारा थाना पहुंचा तो पुलिस वालों ने उसे मरा बता दिया।

इसी तरह 2006 से लापता विकास की दादी कृष्णा बताती हैं कि बहुत भागदौड़ की, लेकिन वह नहीं मिला। पुलिस वाले आते है और यह कह कर चले जाते हैं कि जान पहचान में ढूंढो, वहीं कहीं होगा। उनका परिवार आज तक इस सदमे से उबर नहीं पाया है। आगरा जगदीशपुर की सोनबती की कहानी तो और भी दिल दहला देने वाली है।

उनके तीन बेटे 2002 में उसकी आंखों के सामने से गायब हो गए। तीनों की उम्र 12,10 और 14 थी। इस सदमे से उसका पति भी चल बसा। बच्चों की तलाश में थाने का चक्कर काटना अब उसकी दिनचर्या सी बन गई है। पांच साल बाद एक एनजीओ के प्रयास से इस मामले में रिपोर्ट दर्ज की गई। बावजूद इसके आज तक उनके बच्चे नहीं मिल पाए हैं।

क्राई द्वारा दिल्ली के आठ जिलों में कराए गए सर्वे के अनुसार, इस साल दिल्ली से करीब 1260 बच्चे लापता हुए हैं। इनमें 570 लड़के व 690 लड़कियां शामिल हैं। लापता होने वाले इन बच्चों में अधिकतर की उम्र 24 महीने से लेकर 18 साल के बीच है।

क्राई के अनुसार, इस साल सर्वाधिक 549 बच्चों के लापता होने की शिकायत बाहरी जिले से दर्ज कराई गई है। इनमें से 437 बच्चे सकुशल घर लौट आए, लेकिन 112 बच्चों का अभी तक कोई सुराग नहीं लगा है। वहीं उत्तर पश्चिम जिले से 465 लापता बच्चों में सिर्फ 203 का सुराग लग सका है।

पूर्व आईपीएस अधिकारी अमोद कंठ के अनुसार, बच्चों के अपहरण अब पैसों की जगह बाल मजदूरी के लिए किया जाता है। मानव तस्करी का 70 प्रतिशत कारोबार बच्चों के माध्यम से देश में सक्रिय है। बावजूद इसके अभी तक हमारे कानून में मानव तस्करी की परिभाषा में बाल मजदूर को शामिल नहीं किया गया है।

रोज गायब हो जाते हैं 20 बच्चे!


हाल ही में जारी चाइल्ड राइट्स एंड यू ( क्राई ) की एकरिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि दिल्ली सेरोजाना 18 से 20 बच्चे गुम हो जाते हैं , जिनमें सेज्यादातर की उम्र 12 से 18 साल के बीच होती है। इन गुमहोने वाले बच्चों में से 6.76 प्रतिशत की उम्र 0-6 साल , 6.76 प्रतिशत की 7-12 साल और 72.8 प्रतिशत की उम्र 12-18 सालके बीच होती है।

ये तो वे आंकड़े हैं जो पुलिस औरआरटीआई की मदद से मिले हैं लेकिन कई ऐसे केस भी हैं जिनके बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं हैं। अगर उन आंकड़ों को भी मिला लिया जाए तो ये आंकड़े और भी बढ़ जाएंगे। क्राई की इस रिपोर्ट को दिल्ली, उत्तर प्रदेश औरमध्य प्रदेश से मिले आंकड़ों के आधार पर तैयार किया गया है। 


इस रिपोर्ट पर बहस के लिए क्राई की ओर से शुक्रवार को चर्चा का आयोजन किया गया था। इस मौके पर खोए बच्चों के पैरंट्स के अलावा जूरी भी मौजूद थी। इस बहस में नांगलोई से आई खुरनारा ने बताया कि उनकी साल की बेटी नेहा घर से गायब हो गई थी। कई दिनों तक ढूंढने के बाद उसका कुछ भी पता नहीं चल पाया औरपुलिस की तरफ से भी इतना सहयोग नहीं मिल पाया था। लेकिन मैं किस्मत वाली थी कि मेरी बेटी मुझे कुछ दिनों बाद वापिस मिल गई। पर हर मां-बाप खुरनारा की तरह किस्मत वाले नहीं होते। ऐसे भी कई लोग वहांमौजूद थे जिनके बच्चों का आजतक कोई पता नहीं चल पाया कि वे कहां हैं। जूरी में संयुक्त पुलिस आयुक्त एस नृत्यनंजनएनसीपीसीआर के वरिष्ठ सलाहकार डॉ रमाकांत नायक ,डीसीपीसीआर के डॉ आमोद कंठसेंटर फॉर चाइल्ड की भारती अलीसुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज डी पी वधवा और दिल्ली हाई कोर्ट के रिटायर्ड चीफ जस्टिस ए पी शाह जैसी हस्तियां मौजूद थीं। क्राई की डायरेक्टरयोगिता वर्मा ने कहा कि बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए काफी जरूरी है कि सभी केसों के अपडेटेड रेकॉडर्स हों।

29.4.11

मप्र में 60 फीसदी से ज्यादा बच्चे कुपोषित: क्राई

नई दिल्ली/भोपाल. मध्य प्रदेश एक बार फिर गलत वजह से चर्चा में है। ताजा मामला राज्य में बच्चों के कुपोषण को लेकर है।

बच्चों के अधिकारों की वकालत करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) ने मध्य प्रदेश के दस जिलों में किए गए सर्वे के आधार पर दावा किया है कि यहां कुपोषित बच्चों की संख्या 60 फीसदी से ज्यादा है।

क्राई का कहना है कि पूरे राज्य में आदिवासी समुदाय के 74 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। चौंकाने वाला तथ्य तो यह है कि राजधानी भोपाल की पुनर्वास कॉलोनियों के 49 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार पाए गए हैं।

संस्था के प्रदेश में इस सर्वे को पूरा करने वाले विकास संवाद के प्रशांत दुबे का कहना है कि सिर्फ रीवा जिले में अकेले 83 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार पाए गए हैं।

रीवा में 2006 से 2009 के बीच करीब 15 हजार बच्चों की कुपोषण से मौत हो चुकी है जबकि अन्य जिलों में भी कुपोषित बच्चों का आंकड़ा सरकारी आंकड़े से बहुत अधिक है।

संस्था द्वारा राजधानी भोपाल की पुनर्वास कॉलोनियों में कराए गए शोध के आंकड़े और भी ज्यादा चौंकाने वाले मिले हैं। भोपाल के लगभग 11 रिसेटमेंट कॉलोनियों से इकट्ठा किए गए आंकड़ों से पता चला है कि यहां के 49 फीसदी बच्चे कुपोषण से ग्रसित हैं। जबकि इन्हीं इलाकों के 20 फीसदी बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार पाए गए हैं।

दिल्ली में क्राई की निदेशक योगिता वर्मा का कहना है कि भले राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान राज्य के सभी महिलाओं के मामा होने का दावा करें। लेकिन वे अभी भी राज्य के मासूम बच्चों को कुपोषण से निजात दिलाने में नाकाम साबित हुए हैं।

राज्य बच्चों के बेहतर देखभाल के लिए जरूरी आंगनबाड़ी का भी पूरी इंतजाम नहीं करा पाए हैं। अभी भी पूरे मध्य प्रदेश में लगभग 47 प्रतिशत आंगनबाड़ियों की कमी हैं।

क्राई की निदेशक ने आगे कहा कि राज्य सरकार को सबसे पहले यह कबूलने की जरूरत है कि यहां कुपोषित बच्चों की संख्या सरकारी आंकड़े से कहीं अधिक है, तभी इसे रोकने की सही शुरुआत हो सकेगी।

क्राई के एक अन्य सदस्य आरबी पाल का कहना है कि राज्य में रहने वाले आदिवासी समुदाय के लगभग 74 फीसदी बच्चे भी कुपोषण के शिकार पाए गए हैं।

आरबी का कहना है कि अगर राज्य में कुपोषण को हटाना है तो सरकार को तुरंत आंगनबाड़ी और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत चलने वाले योजनाओं को दुरुस्त करने की जरूरत है। इसके अलावा महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना को भी बेहतर ढंग से लागू करने की दरकार है।

27.4.11

संप्रेक्षण गृह में कई खामियां

आगरा : किशोर संप्रेक्षण गृह में बुधवार को पहुंची क्राई की टीम को खामियां मिलने के साथ ही कई चौंकाने वाली जानकारियां भी मिलीं।
क्राई (चाइल्ड राइट एंड यू) की सदस्य विनीका कारौली व मानवाधिकार कार्यकर्ता नरेश पारस अपराह्न लगभग दो बजे से शाम पांच बजे तक रहे। इस दौरान वहां रहने वाले किशोरों से बातचीत करके उनकी दिक्कतों के बारे में जानकारी की। टीम के सदस्य नरेश पारस ने बताया एक बच्चे ने अपनी उम्र आठ व दूसरे ने दस साल बताई। जबकि एक ने अपनी उम्र 20 साल बताई। गौरतलब है कि किशोर संप्रेक्षण गृह में 12 से 18 साल तक के बच्चों को रखा जाता है। नियमानुसार एक बच्चे को छह माह से अधिक वहां नहीं रखा जा सकता जबकि किशोर गृह में ऐसे भी बच्चे थे जो तीन साल से भी अधिक समय से वहां रह रहे थे। एक किशोर दहेज एक्ट का भी मिला। किशोर गृह की क्षमता 75 की है जबकि वहां 92 किशोर थे। जिसमें 10 से 14 साल तक के 17 बच्चे थे। जबकि 15 से 18 साल तक 77 किशोर थे। निरीक्षण के दौरान कर्मचारियों को व्यवहार के लिए खास हिदायत दी गयी। साथ किशोर गृह की पुरानी हो चुकी इमारत की जगह नई बिल्डिंग बनवाने की जरूरत भी बताई। इस दौरान जिला प्रोबेशन अधिकारी दिलीप कुमार, संप्रेक्षण गृह के सहायक अधीक्षक डा. सुभाषचंद मिश्रा आदि मौजूद थे।

22.12.10

बाल संप्रेक्षण गृह हैं या जेल

बीते दिनों क्राई और एमनेस्टी इंटरनेशनल के कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय बालक अधिकार संरक्षण आयोग को भेजी विस्तृत रिपोर्ट में आगरा और मथुरा जिलों के बाल संप्रेक्षण गृहों  को जेल बताते हुए कई अहम कमियों का खुलासा किया. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि स्टाफ को किशोर अधिनियम के बारे में ही पता नहीं है. बाल कल्याण समिति भंग है और कई बच्चों पर कई जघन्य अपराधों के आरोप में हैं. संप्रेक्षण गृहों में क्षमता से दो गुना अधिक तक बच्चे बंद हैं. 6 कमरों में 30 बच्चों को रखने की क्षमता होती है लेकिन यहां केवल 2 कमरों में ही 62 बच्चों को बंद किया हुआ हैं. बाकी के कमरे अन्य उपयोग के लिए काम में लिए जा रहे हैं. खेल का मैदान तो दूर पढ़ाई की कोई व्यवस्था भी नहीं है. रियाजुद्दीन वर्ष, पटवारी सिंह, कालू सिंह, अभिनिक सिंह और राबिन सिंह 12 साल से भी कम उम्र के बच्चे हैं. वही दूसरी तरफ मेघ सिंह और अकील पर 18 साल से अधिक की उम्र का आरोप  है. इनमें मेघ सिंह की एक साल की बच्ची भी है और कहा जा रहा है कि उसे 18 साल से कम दर्शाकर बंद किया गया है.

एक अन्य किशोर बीएसए कालेज में एलएलबी का छात्र है. उस पर अपहरण और बलात्कार का आरोप है. सवाल किया गया है कि क्या एलएलबी का छात्र और एक बच्ची का पिता 18 साल से कम उम्र के हो सकते हैं? साथ ही रिपोर्ट में कहा गया है कि कई बच्चे 3 माह से अधिक समय से बंद हैं जिनमें अकील 4 माह, अनीस 8 माह , विशाल 17 माह, संजीव 21 माह, पटवारी सिंह 1 साल और कृष्णा 2 साल से बंद हैं.

आयोग से अपील की गयी है कि आगरा व मथुरा के किशोर संप्रेक्षण ग्रहों में बंद किशोरों का मेडिकल परीक्षण कराया जाए. सुधार के लिए कड़े निर्देश जारी किए जाएं और उनका सख्ती से पालन हो. स्टाफ को किशोर न्याय अधिनियम से प्रशिक्षित किया जाए.

16.12.10

स्कूलों के असुरक्षित बच्चे

शिरीष खरे

यूं तो स्कूलों को बच्चों के वर्तमान और भविष्य गढ़ने का केन्द्र माना जाता है. लेकिन बीते कुछ सालों से स्कूलों के भीतर से बच्चों के शोषण और उत्पीड़न की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के मुताबिक बीते तीन सालों में स्कूलों के भीतर बच्चों के साथ होने वाले शारारिक प्रताड़ना, यौन शोषण, दुर्व्यवहार, हत्या जैसे मामलों में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है. मौजूदा परिस्थितियां भी कुछ ऐसी हैं कि बच्चों के लिए हिंसामुक्त और भयमुक्त माहौल में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का सवाल अब बहुत बड़ा सवाल बन चुका हैं.

बीते साल स्कूलों में बच्चों के उत्पीड़न के दर्ज हुए मामलों में अगर तमिलनाडू के 12 मामले अलग रखे जाए तो अधिकतर मामले हिंदी भाषी राज्यों से हैं. इसमें 27 मामलों के साथ जहां उत्तरप्रदेश अव्वल है, वहीं उसके बाद दिल्ली 9, मध्यप्रदेश 9, बिहार 4, राजस्थान 4 और हरियाणा 4 का स्थान आता है.

2007 में केन्द्रीय महिला व बाल विकास मंत्रालय द्वारा बच्चों की सुरक्षा की स्थिति को लेकर देश भर में किये गए सर्वेक्षण के मुताबिक हर दो बच्चों में से एक को स्कूल में यौन शोषण का शिकार बनाया जा रहा है. बीते साल राष्ट्रीय बाल अधिकार पैनल को स्कूलों में बच्चों के उत्पीड़न की तकरीबन 100 शिकायतें मिली. इसके बहुत बाद में केन्द्रीय महिला व बाल विकास मंत्री ने भी स्कूलों में बच्चों के बढ़ते उत्पीड़न के ग्राफ को स्वीकारते हुए चिंता जाहिर की.

अनुशासनात्मक कार्रवाई के नाम पर खास तौर से सरकारी स्कूलों में आज भी ‘गुरूजी मारे धम्म-धम्म विद्या आये छम्म-छम्म’ जैसी कहावतें प्रचलित हैं. गौर करने लायक तथ्य है कि अनुशासनात्मक कार्रवाई की आधी से अधिक घटनाएं केवल सरकारी स्कूलों में होती हैं. ऐसी घटनाओं को अंजाम देते समय इस बात को नजरअंदाज बना दिया जाता है कि किसी भी तरह के दुर्व्यवहार से बच्चे में झिझक, संकोच और घबराहट की भावना घर कर सकती है. बच्चों के भीतर की ऐसी भावनाओं को ड्राप आउट की दर अधिक होने के पीछे की एक बड़ी वजह के तौर पर देखा जाता है. लेकिन सामान्य तौर से हमारे आसपास बच्चों के साथ होने वाले दुराचारों को गंभीरता से नहीं लिए जाने की मानसिकता है. इस तरह से बच्चों पर होने वाले अत्याचारों पर चुप रहकर हम उसे जाने-अनजाने प्रोत्साहित कर रहे हैं. जबकि बच्चों को दिये जाने वाली तमाम शारारिक और मानसिक प्रताड़नाओं को तो उनके मूलभूत अधिकारों के हनन के रुप में देख जाने की जरूरत है, जिन्हें कायदे से किन्हीं भी परिस्थितियों में बर्दाश्त नहीं किए जाने चाहिए लेकिन क्या किया जाए आलम यह है कि सरकार ने स्कूलों में सुरक्षित बचपन से जुड़े कई तरह के सवालों के साथ-साथ उनसे जुड़ी मार्गदर्शिका को तैयार किये जाने की मांग को भी लगातार अनदेखा किया जाता रहा है.

वहीं बच्चों का भोलापन ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी समझी जाती है. एक तरफ बच्चे अपने डर, अवसाद और अकेलेपन को खुलकर कह नहीं पाते तो दूसरी तरफ बच्चों के परिवार वाले भी उनकी बातों को कोई खास अहमियत नहीं देते. बच्चों के भोलेपन के शिकारी ऐसी स्थिति का चुपचाप फायदा उठाते हुए अपनी कुंठाओं को पूरा करते हैं. अक्सर देखा गया है कि बच्चों के उत्पीड़न में वहीं लोग शामिल होते हैं जिनके ऊपर उनकी सुरक्षा की जवाबदारी होती है. ऐसे में बच्चों के परिवार वालों के लिए यह जरूरी है कि वह कुछ समय बच्चों के साथ बिताएं और उनसे खुलकर बातचीत करते रहें.

हालांकि स्कूलों में उत्पीड़न के मामले में पीड़ित बच्चों को किसी उम्र विशेष में नहीं बांधा जा सकता लेकिन दर्ज हुए अधिकतर मामलों से साफ हुआ है कि यौन उत्पीड़न से पीड़ित बच्चों में 8 से 12 साल तक आयु-समूह के बच्चों की संख्या सर्वाधिक रहती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक शारारिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक, दुर्व्यवहार, लैंगिक असामानता इत्यादि बाल उत्पीड़न के अंतर्गत आते हैं. फिर भी बच्चों के उत्पीड़न के कई प्रकार अस्पष्ट हैं और उन्हें परिभाषित करने की संभावनाएं अभी तक बनी हुई हैं. दूसरी तरफ राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो बच्चों के उत्पीड़न से जुड़े केवल वहीं मामले देखता है, जो पुलिस-स्टेशनों तक पहुंचते हैं. जबकि सर्वविदित है कि प्रकाश में आए मामलों के मुकाबले अंधेरों में रहने वाले मामलों की संख्या हमेशा से ही कई गुना तक अधिक रहती है.

हालांकि बच्चों के सुरक्षित बचपन के लिए सरकार ने जहां बजट में 0.03 प्रतिशत बढ़ोतरी की है वहीं इसके लिए देश में पर्याप्त कानून, नीतियां और योजनाएं हैं. लेकिन इन सबके बावजूद महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा किये गए सर्वेक्षण में 65 प्रतिशत बच्चे महज शारारिक प्रताड़नाएं भुगत रहे हैं. जाहिर है समस्या का निपटारा केवल बजट में बढ़ोतरी या सख्ती और सहूलियतों के प्रावधानों भर से मुमकिन नहीं हैं बल्कि इसके लिए मौजूदा शिक्षण पद्धतियों को नैतिकता और सामाजिकता के अनुकूल बनाये जाने की भी जरूरत है. इसी के साथ बच्चों के सीखने की प्रवृतियों में सुरक्षा के प्रति सचेत रहने की प्रवृति को भी शामिल किये जाने की जरूरत है.

14.12.10

भोपाल: यह कैसी प्रेतलीला ?

चिन्मय मिश्र 

साधो यह मुरदों का गांव
पीर मरै, पैगम्बर मर गए, मर गए जिंदा जोगी।
                                                            -कबीर

3 दिसम्बर 2010 को भोपाल गैस त्रासदी के 26 साल पूरे हो गए। इस दौरान बकौल ओबामा भारत एक विकासशील से विकसित देश बन गया। वह एक आर्थिक महाशक्ति और तीसरी दुनिया का तथाकथित प्रवक्ता भी बन गया। देश में विदेशी पूंजी निवेश में काफी बढ़ोत्तरी हुई और वह बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पसंदीदा भी बन गया।

मगर भोपाल में यूनियन कार्बाइड से रिसी गैस से पीड़ित समुदाय के लिए तो ढाई दशक का यह समय जैसे ठहरा ही हुआ है। भोपाल की ट्रायल कोर्ट से आए फैसले के बाद लगा था कि केंद्र और राज्य सरकारें चेतेंगी और कुछ सकारात्मक पहल करेंगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। केंद्र सरकार ने कुछ आधा-अधूरा सा उत्तरदायित्व निभाया और मंत्रियों के समूह ने खैरात बांटने के अंदाज में कुछ घोषणाएं कर दीं। लेकिन पीड़ितों का शारीरिक, मानसिक या कानूनी किसी भी तरह की कोई राहत नहीं मिली।

कबीर के शब्दों में कहें तो संभवतः नीति निर्धारक सोचते हैं,

राजा मर गए परजा मर गये, मर गये वैद्य औ रोगी।
चंदा मरिहैं सुरजो मरिहैं, मरिहैं धरती अकासा।

तो फिर शासन प्रशासन को कुछ भी करने की क्या आवश्यकता है ? वैसे इस त्रासदी के बाद हुई वारेन एंडरसन की गिरतारी के खिलाफ भारत के सर्वाधिक प्रतिष्ठित उद्योगपति ने एक ‘मर्मस्पर्शी’ लेख लिखा था। बाद में वे 100 करोड़ रुपए लगाकर ‘देशहित’ में यूनियन कार्बाइड का जहरीला कचरा हटवाने का असफल प्रयास भी कर चुके हैं और अब राडिया टेप कांड के उजागर होने के बाद इन ‘देशभक्त’ उद्योगपति की नाराजगी की वजहें भी सार्वजनिक होती जा रहीं हैं। कहने का अर्थ यह है कि भारत में हो रहे विदेशी पूंजी निवेश के पीछे भी संभवतः यही भावना कार्य कर रही है कि यदि किसी देश में विश्व की अब तक की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना के लिए 26 वर्ष पश्चात भी किसी को पूर्णतः उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सका है तो निवेश का उससे बेहतर स्थान और क्या हो सकता है ?

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के कार्यकाल के पांच वर्ष पूरे होने पर 29 नवम्बर को भोपाल में ‘कार्यकर्ता गौरव दिवस’ में हजारों-हजार लोग इकट्ठा हुए थे। इसमें हुई आमसभा के दौरान भोपाल गैस पीड़ितों को लेकर एक शब्द भी कहा गया हो, ऐसा सुनने में नहीं आया। 3 दिसम्बर को प्रतिवर्ष सभी धर्मों और राजनीतिक दलों द्वारा आयोजित प्रार्थना सभाएं महज रस्मी होकर रह गई हैं। आज कई राष्ट्र दूसरे महायुद्ध के बीत जाने के 60 वर्षों बाद भी अपने द्वारा किसी अन्य राष्ट्र के प्रति की गई अमानवीयता के लिए क्षमा मांगते नजर आते हैं। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपनी हालिया भारत यात्रा के दौरान इस संबंध में माफी मांगना तो दूर, इस दुर्घटना का उल्लेख करना तक जरुरी नहीं समझा।

भारतीय न्याय व्यवस्था भी एक गोल घेरे में रहकर लगातार दोहराव से ग्रसित हो गई है। ट्रायल कोर्ट से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक सब अपनी-अपनी भूमिका की समीक्षा की बात अवश्य करते नजर आते हैं लेकिन धरातल पर कुछ भी नजर नहीं आ रहा है। गैस पीड़ितों के साथ संघर्ष कर रहे संगठन और व्यक्ति लगातार सरकार की विरोधाभासी प्रवृत्तियों को उजागर कर रहे हैं।

प्रशासन तंत्र भी मामले और निपटारे को लगातार लंबित करता जा रहा है। गैस पीड़ितों के लिए बना अस्पताल श्रेष्ठी वर्ग के सुपर स्पेशयलिटी अस्पताल में बदल गया। गैस पीड़ितों के स्वास्थ्य पर बड़े प्रभावों के आकलन व उपचार के लिए गठित शोध समूह को कार्य करने से रोक दिया गया। आज तक इस बात को सार्वजनिक नहीं किया गया कि अंततः भोपाल कितने प्रकार के जहर का शिकार हुआ था।

इस नव उदारीकरण के युग में विकास का पैमाना महज आर्थिक ही रह गया है। लाखों करोड़ रुपए के भ्रष्टाचार की रकम भी जीडीपी में मिल जाएगी और आंकड़े बताने लगेंगे कि हम सब कितनी तेजी से गरीबी रेखा के पार आते जा रहे हैं। परंतु इसके पीछे अलिखित यह है कि गरीबी रेखा वास्तव में ऐसी लक्ष्मण रेखा है इसे जो भी पार करने का प्रयास करेगा वह भस्म हो जाएगा। गांवों से शहरों की ओर पलायन इसी का प्रतीकात्मक स्वरूप ही तो है। भोपाल के गैस पीड़ित अपनी आधी-अधूरी सांस के साथ पिछले ढाई दशक से संघर्ष कर रहे हैं। ये संघर्ष अब एक प्रतीक में बदल चुका है। ऐसा नहीं है कि भोपालवासी यह नहीं जानते कि,

तैतीस कोटी देवता मर गए, पड़ी काल की फांसी।

वे जानते हैं कि उनका संघर्ष संभवतः उन्हें स्वयं को न्याय नहीं दिलवा सके। लेकिन इसके परिणामस्व्रूप भारत व तीसरी दुनिया के अनेक देशों में जहर फैलाने वाले उद्योगों की स्थापना पर लगाम अवश्य लगी है।

आज यूनियन कार्बाइड या डाउ केमिकल्स को भारत में नया कारखाना लगाने में असफलता का सामना करना पड़ा है क्योंकि उनका पुराना ‘नाम’ और ‘काम’ आड़े आ रहा है। पुणे के निवासियों ने अपने शहर के पास डाउ केमिकल्स को कारखाना नहीं लगाने दिया। दरअसल भारतीय राजनीतिक तंत्र हमारी जनता की धैर्य की लगातार परीक्षा ले रहा है। स्थितियां बेकाबू होने पर वह विशेष सहायता पैकेज की घोषणा करता है। पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र में विदर्भ और मध्यप्रदेश में नर्मदा घाटी में ऐसे पैकेज भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुके हैं। इस क्रम में अब देश के नक्सल प्रभावित जिलों के लिए करोड़ो रुपए के विशेष सहायता पैकेज की घोषणा की गई है। इसका हश्र भी वहीं होना है।

भोपाल गैस पीड़ितों को भी लगातार भुलावे में रखकर रोज नई-नई घोषणाएं करना अर्थहीन है। भोपाल गैस त्रासदी को लेकर बरती जा रही लापरवाही अनजाने में नहीं हो रही है। यह एक घृणित प्रवृत्ति है जो कि उद्योगपतियों को यह दर्शा रही है कि उन्हें इस देश में कुछ भी करने की छूट है। इसी के समानांतर आम व्यक्ति को भी समझना होगा कि इस मामले में उसकी अरुचि स्वयं उसके लिए भी खतरनाक है। वैसे कबीर ने यह भी लिखा है,

मानुष तन पायौ बड़े भाग अब विचारी के खेलो फाग!

9.11.10

बच्चों का जितना पलायन उतना उत्पीड़न

शिरीष खरे

इन दिनों बच्चों का पलायन तेजी से बढ़ रहा है और उसी अनुपात में उनके साथ उत्पीड़न की घटनाएं और आकड़े भी. खास तौर से मजदूरी के लिए बच्चों को एक राज्य से दूसरे राज्य में आदान-प्रदान किए जाने का सिलसिला जोर पकड़ता जा रहा है. विभिन्न शोध-सर्वेक्षणों और रपटों से यह जाहिर भी हो रहा है कि मुख्य तौर पर बिहार, पूर्वी उत्तर-प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश से महाराष्ट्र और गुजरात सहित पूरे देश भर में मजदूरी के लिए बच्चों की पूर्ति की जा रही है. इन बच्चों में ज्यादातर की उम्र 10 से 16 के बीच है. इनमें भी ज्यादातर लड़के ही हैं. कई सर्वेक्षणों और तजुर्बे यह भी बता रहे हैं कि मजदूरी में लगे ज्यादातर बच्चे स्कूल जरूर गए हैं, मगर वह नियमित नहीं हो सके हैं. बच्चों के बारम्बार पलायन होने के पीछे की मुख्य वजहों में बच्चों ने अपने घर की गरीबी, मारपीट, डर और दबाव को जिम्मेदार ठहराया है तो कभी मुंबई और सूरत जैसे बड़े शहरों की तड़क-भड़क को देखने की दबी चाहत को भी बाहर निकला है. इस दिशा में जो सर्वेक्षणों के आधार पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर कई कदम उठाए जाने की बात कही जाती रही है, मगर अभी तक इन मामलों के न रुकने से यथार्थ की गंभीरता को भलीभांति समझा जा सकता है.

दूसरी तरफ बालगृहों से लगातार बच्चों के भागने की घटनाएं बयान करती हैं कि मुंबई सहित देश भर के सरकारी बालगृहों में बच्चों की सही देखभाल की असलियत क्या है. बीते समय मुंबई के एक बालगृह से कुछ बच्चों के भागने और उनमें से एक के हादसे में मारे जाने घटना उजागर हुई थी. आम तौर पर देखा गया है कि ज्यादातर बालगृहों द्वारा भागने वाले बच्चों के बारे में पता लगाने जरुरत भी महसूस नहीं की जाती हैं. ऐसे बच्चों को ढूंढने की भी तमाम कोशिशें तो दूर महज एक रिपोर्ट तक नहीं लिखवाई जाती है. तजुर्बों से यह जाहिर हुआ है कि हफ्तों-हफ्तों बच्चों के गायब रहने के बावजूद बालगृहों की तरफ से चुप्पी साध ली जाती है. जबकि नियमानुसार इस तरह की घटनाओं की जानकारी फौरन थाने में और उच्च अधिकारियों को देना जरूरी है. यहां तक कि महिला और बाल कल्याण विभाग को भी इस तरह की ज्यादातर घटनाओं की प्राथमिक सूचना किसी अखबार या गैर-सरकारी संस्था के जरिए ही मिलती है. भागने वाले कुछ बच्चों के बारे में जब हमने खैर-खबर जाननी चाही तो पता लगा कि सामान्यत: बालगृहों की तरफ से इन बच्चों की गुमशुदगी के बारे में न तो पुलिस को ही सूचना दी जाती है और न ही विभाग को इस बारे में बताया जाता है. कई बार तो बच्चों के साथ होने वाली दुर्घटनाएं और अपराधिक मामले प्रकाश में आने के बाद ही बच्चों के भागने की रिपोर्ट दर्ज की जाती है. बच्चों के इस तरह से गायब होने की तुरंत रिपोर्ट न लिखवाना महज एक लापरवाही ही नहीं बड़ा अपराध भी है. मुंबई के सरकारी बालगृहों से बीते 6 सालों में तकरीबन तीन सौ से ज्यादा बच्चे भागे हैं, मगर इतना होने के बावजूद लापरवाही का आलम ज्यों का त्यों है. समाज कल्याण विभाग से मिली गैर-औपचारिक जानकारियों के मुताबिक बालगृहों में कर्मचारियों की कमी है. एक कर्मचारी पर सैकड़ों बच्चों को संभालने की जवाबदारी होती है. काम के दबाव में कई बार कर्मचारियों द्वारा जब बच्चों के साथ बुरा बर्ताव किया जाता है तो बच्चे भाग जाते हैं. उन्हें ठीक-ठाक खाना तक नहीं मिलता है. इस तरह से सरकार द्वारा ऐसे बच्चों के देखभाल उचित के लिए संचालित बालगृह बुरे बर्ताव और उत्पीड़न का केंद्र बन जाते हैं.

हर साल मुंबई जैसे महानगर पहुंचने वाले हजारों बच्चे काम की तलाश में या काम की जगहों से भीख मंगवाने वाले नेटवर्क के हत्थे भी चढ़ जाते हैं. खास तौर से रेल्वे स्टेशनों के प्लेटफार्म और चौराहों पर ऐसे नेटवर्क से जुड़े दलालों की सरगर्मियों को समझा जा सकता है. यही बहुत सारे बच्चे बहुत ही गंदे माहौल में महज खाने-पीने के लिए जद्दोजहद करते रहते हैं. इसके अलावा बहुत से बच्चे नशे के आदी हो जाते हैं तो बहुत से जुर्म की दुनिया में भी दाखिल हो जाते हैं.

भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है, जो हर लिहाज से बाल- शोषण और उत्पीड़न को रोकने में मददगार हो. दूसरी तरफ कुछ जानकारों की राय में समस्या को दूर करने के लिए उसकी जड़ में पहुंचकर कानून के समानांतर गरीबी, विस्थापन, पलायन और विघटन से निपटने के प्रयास किए जाने की जरुरत है. साथ की जो प्रावधान लागू हैं उन्हें क्रियान्वित करने वाली एजेंसियों के सक्रिय और धनराशि के सही इस्तेमाल करने की जरुरत है और इसी के साथ बच्चों के यौन-उत्पीड़न सहित सभी तरह के उत्पीड़नों को ठीक से परिभाषित किए जाने की भी जरुरत है. दूसरी तरफ राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो में बच्चों के उत्पीड़न से जुड़े केवल ऐसे मामले शामिल रहते हैं, जिनकी रिपोर्ट पुलिस में दर्ज मिलती है. मगर असलियत जगजाहिर है कि ज्यादातर मामले तो पुलिस तक पहुंचते ही नहीं हैं. हालांकि सरकार की तरफ से 'बाल अपराध निरोधक बिल' संसद में लाने की बात की जाती रही है. बच्चों की सुरक्षा पर कुल बजट में से 0.03% की बढ़ोत्तरी और महिला व बाल विकास मंत्रालय द्वारा एकीकृत बाल सुरक्षा योजना शुरू करने जैसी घोषणाएं की भी की जाती रही हैं. इन सबके बावजूद इस तरह की नीतियां बनाने और इन नीतियों पर विमर्श का दौर तो खूब चलता है. नहीं चलता है तो उन्हें गर्म जोशी से लागू किए जाने की कोशिशों का दौर.

4.11.10

बारूद पर ढ़ेर है भारत का भविष्य

शिरीष खरे

एक बच्चा पटाखा बनाए और दूसरा उसे जलाकर दीपावली मनाए. ऎसी विडम्बना तमिलनाडु के शिवकाशी में आसानी से देखी जा सकती है. जहां एक ओर देश के हरेक कोने का बचपन रोशनी के पर्व को मनाने के अपने तरीके व योजना बना रहा है, वहीं शिवकाशी जो आतिशबाजी उद्योग के लिए प्रसिद्ध है, जहां करीबन 40 हजार बाल मजदूर उनकी खुशियों में चार चांद लगाने के लिए पटाखे बनाने में सक्रिय हैं.

शिवकाशी वह क्षेत्र है जिसे देश की आतिशबाजी राजधानी के रूप में जाना जाता है. यहां लगभग एक हजार छोटी-बड़ी इकाइयां बारूद व माचिस बनाने में बनाने में जुटी हैं जिनका सालाना कारोबार 1000 करोड़ रूपए है. इस उद्योग के चलते एक लाख लोगों की रोजी चलती हैं जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं व बच्चे भी शामिल हैं.

बाल श्रम नाम के अभिशाप की जहां बात चल ही गई है तो यह स्पष्ट कर दें कि शिवकाशी में इसका प्रमाण आसानी से देखा जा सकता है. मसलन, पंद्रह वर्षीय पोन्नुसामी जो यहां एक पटाखा निर्माणी इकाई में कार्यरत है, पांच साल पटाखे बना रहा है. जब उसने यह पेशा चुना तो उसकी समझ का स्तर क्या रहा होगा यह विचारणीय मसला है. उसके अनुसार वह छठी कक्षा का छात्र था जब उसे जबरन इस काम में उतार दिया गया. काम कराने की मंशा भी उनके माता-पिता की ही थी.प्रतिदिन नौ घंटे की कड़ी मेहनत के बाद वह 60 रूपए पाता है. यह बेगारी उसे वयस्क श्रमिकों को मिलने वाली मजदूरी का केवल चालीस फीसदी है. ऎसे कई उदाहरण हैं जिनसे यह स्पष्ट है कि शिवकाशी इलाके के किशोर-किशोरियों की पढ़ाई-लिखाई में गाज गिरने की आशंका रहती है. छोटी उम्र में ही ऎसे खतरनाक काम में झोंकने के मां-बाप के फैसले के पीछे उनकी गरीबी ही मूल कारण है.

कारखानों में हादसे सामान्यत: होते रहते हैं. ऎसे में मासूमों को घातक काम पर लगाने का सवाल जब उठता है तो श्रमिक संगठनों का जवाब होता है कि मृतकों में कोई भी किशोर नहीं है,जबकि दास्तां कुछ अलग ही है. जुलाई 2009 में हुई एक दुर्घटना में तीन बच्चे मर गए.

अगस्त 2010 में तो सरकारी अधिकारियों पर ही गाज गिरी जो अनाधिकृत पटाखा इकाइयों की जांच पर गए थे. बताया गया है कि 8 राजस्व और पुलिस अधिकारियों को इस तहकीकात के दौरान जान से हाथ धोना पड़ा. जब पोन्नुसामी से काम के जानलेवा होने के बारे में पूछा गया तो उसका जवाब यही था कि अगर मैं भाग्यशाली हूं तो कभी हादसा नहीं होगा.

बच्चों के अधिकारों के क्षेत्र में काम करने वाली गैर सरकारी संस्था चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) के अधिकारी जॉन आर की मानें तो शिवकाशी में करीबन 1050 कारखाने हैं जिनमें से 500 बिना किसी लाइसेंस के चल रहे हैं. पटाखों के अलावा 3989 कारखानों में दियासलाई बनती है. वे मानते हैं देश-विदेश में हो रहे प्रयासों के नतीजतन बाल श्रम पर कुछ अंकुश लगा है. हादसों में इजाफा और बच्चों के काम पर लगाने की नौबत गैर लाइसेंसशुदा कारखानों की वजह से आती है जिनका संचालन घरों की असुरक्षित चारदीवारी में होता है.

इन लोगों को लाइसेंस वाली कंपनियां पटाखे बनाने का आदेश दे देती है. अधिक फायदे के लालच व शिक्षा के अभाव में ये लोग आसानी से कानून की दहलीज को लांघ जाते हैं. नाम न छापने की शर्त पर शिवकाशी की ही एक एनजीओ के कार्यकर्ता के अनुसार इस समस्या के बारे में समझ अभी अधूरी है. हम अभिभावकों को जाग्रत करने का प्रयास कर रहे हैं. उन्हें यह समझाया जा रहा है कि वे सीमित आमदनी में गुजर-बसर करते हुए बच्चों के स्वास्थ्य व शिक्षा पर ध्यान दें.

कहावत है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती और अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता. इसी तर्ज पर सरकार, प्रशासन व एनजीओ का प्रयास भी तब तक सफल नहीं हो जाता जब तक कि अन्य पक्षकार जिनमें आतिशबाजी निर्माण इकाइयों के मालिक व अभिभावक शामिल हैं, स्वेच्छा से पहल न करें. अन्यथा उनकी दीपावली कभी भी प्रकाशमान नहीं हो पाएगी. 

27.10.10

पहले पंचायत चले हम

शिरीष खरे



गांवों के बच्चे बड़ी संख्या में मजदूर बनते जा रहे हैं. अगर बच्चों की संख्या स्कूलों की बजाय काम की जगहों पर ज्यादा मिल रही है तो उनके लिए 'स्कूल चले हम' से पहले 'पंचायत चले हम' का नारा देना जरूरी लगता है.

चाहे गांवों के विकास का हवाला हो या गांवों के लगातार टूटे जाने का मौजूदा हाल हो बच्चों के मुद्दों को बहुत पीछे रखा जा रहा है. खास तौर से गांवों के लगातार टूटे जाने के मौजूदा संदर्भ में बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं. इसे देखते हुए नीतिगत प्रक्रियाओं में बच्चों को केन्द्रीय स्थान देने की जरुरत है. लेकिन विकराल स्वरूप लेते जाने के बावजूद बाल मजदूरी जैसी समस्या जहां मुख्यत: राजनैतिक तौर से नजरअंदाज बनी हुई है, वहीं स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक बच्चों से जुड़े तमाम सवालों को भी बहुत हल्के ढ़ंग से लिए जाने की मानसिकता घर बना चुकी है.

खुशहाल, स्वस्थ्य और रचनात्मक बचपन का सूत्र गांवों के भविष्य का आधार है लेकिन बच्चों के मुद्दों को पंचायत की नीतियों से भी अलग-थलग करने या वरीयता की सूची में निचले पायदान पर रखे जाने से ग्रामीण बच्चों की तस्वीर दिन-ब-दिन बदसूरत देखी जा रही है. जाहिर है कि ग्राम पंचायतों में पंच-सरपंचों और सचिवों से सकारात्मक रुख की अपेक्षा किए बगैर यह तस्वीर नहीं सुधरने वाली है. ऐसे में स्थानीय समुदायों का महत्व बढ़ जाता है जो बाल अधिकारों और संरक्षणों को लेकर अपने-अपने जन-प्रतिनिधियों के साथ लगातार बैठकों को आयोजित करके उन्हें संवेदनशील बना सकते हैं. इसके लिए स्थानीय स्तर पर खास तौर से वंचित समूह के बच्चों की समस्याओं, उनकी जरूरतों और ताकतों की पहचान करके, स्थानीय स्तर पर संचालित विभिन्न योजनाओं के भीतर उन्हें और उनके परिवारजनों के लिए विकल्प तलाशे जा सकते हैं. इसके दूसरे सिरे के रूप में निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों को अपनी प्रशासन अकादमियों से संपर्क बढ़ाने की जरुरत है जिसके जरिए जरूरी जानकारियों को लेते हुए कार्यवाही करने में सहूलियत हो सके.

ग्रामीण इलाकों में बच्चों के लिए काम करने के दौरान बाल अधिकारों से जुड़े मुद्दों को केवल ग्रामीण परिवेश में ही देखने से काम नहीं चलेगा बल्कि उससे जुड़ी कुछ बुनियादी घटनाओं, नीतियों और पहलूओं को भी समझना जरूरी होगा. इससे सभी बच्चों के अधिकारों को सुनिश्चित किया जाना संभव हो सके. उदाहरण के लिए 2 सितम्बर, 1990 को सयुंक्त राष्ट्र के बाल अधिकार समझौता पर विश्व के दो देशों (अमेरिका एवं सोमालिया) को छोडक़र सभी ने हस्ताक्षर किए तथा बच्चों के अधिकारों और संरक्षणों को लेकर पहल की. भारत ने 11 दिसम्बर, 1992 को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए. बाल अधिकार समझौते में 18 साल की आयु तक के बच्चों के अधिकारों और संरक्षणों की बात कही गई है. जबकि भारत में 0 से 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों को ही बच्चा मानकर उनके अधिकारो के संरक्षण के लिये कानूनी प्रावधान किये गये हैं. यही नहीं अलग-अलग अधिनियमों के मुताबिक बच्चों की उम्र भी बदलती जाती है. जैसे किशोर-न्याय अधिनियम, 2000 में 18 साल, बाल-श्रम अधिनियम, 1886 में 14 साल, बाल-विवाह अधिनियम में लड़के के लिए 21 साल और लड़की के लिए 18 साल की उम्र तय की गई है. खदानों में काम करने की उम्र 15 और वोट देने की उम्र 18 साल है. इसी तरह शिक्षा के अधिकार कानून में बच्चों की उम्र 6 से 14 साल रखी गई है. इससे 6 से कम और 14 से अधिक उम्र वालों के लिए शिक्षा का बुनियादी हक नहीं मिल सकेगा. इसी तरह भारत में बच्चों की उम्र को लेकर भी अलग-अलग परिभाषाएं हैं. इसी तरह विभिन्न विभागों और कार्यक्रमों में भी बच्चों की उम्र को लेकर उदासीनता दिखाई देती है. 14 साल तक के बच्चे ‘युवा-कल्याण’ मंत्रालय के अधीन रहते हैं. लेकिन 14 से 18 साल वाले बच्चे की सुरक्षा और विकास के सवाल पर चुप्पी साध ली जाती है. बच्चों के अधिकारों में प्रमुख रूप से चार अधिकार- जीने का अधिकार, विकास का अधिकार, सुरक्षा का अधिकार और विचारों की सहभागिता का अधिकार आते हैं.

बच्चों को सुरक्षित माहौल देने के लिए ग्राम सभा की बैठकों में बच्चों के साथ बाल अधिकारों के बारे में अलग से चर्चा का सिलसिला शुरू किया जा सकता है. बच्चों को सुरक्षित माहौल देने के संबंध में उनका शोषण रोकने, उन्हें बाल मजदूरी से मुक्त रखने और हिंसा से बचाव करने जैसे मामले प्रमुख हैं. हर बच्चा स्कूल जाये, उसे अच्छा खाना मिले, बच्चा अपराधी न बने इसके लिये समुदायों द्वारा चाइल्ड लाईन भी अपनी अहम भूमिका निभा सकते हैं. इस दिशा में मध्य-प्रदेश के भोपाल में चाइल्ड लाईन 1098 को उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है. जिसके जरिए बीते 1 दशक में तकरीबन 1 लाख बच्चों की मदद की जा सकी है. इस तरह समुदायों के आपसी सहयोग से संचालित बाल अधिकारों के हनन की सूचना चाइल्ड लाईन पर दी जा सकती है. कानून में बच्चों को प्रताड़ित करने वालों में से किसी को भी नहीं छोड़ा गया है और परिवारजनों सहित सभी लोगों के लिए सजा का प्रावधान रखा गया है.

पंचायतों में गठित समितियों को सशक्त बनाकर बाल अधिकारों का संरक्षण किया जा सकता है. इसके तहत कई महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान देने की जरुरत है, जैसे बच्चे के पैदा होते ही उसके जन्म पंजीयन का अधिकार है जिसे गांवों में ग्राम पंचायतें पूरा करती हैं. विकलांग एवं परिवारविहीन बच्चों के भी अपने अधिकार हैं जिसे जिला स्तर पर गठित बाल कल्याण कमेटी के माध्यम से पूरा कराया जा सकता हैं वगैरह.

सभी बच्चों खास तौर से बालिकाओं को शिक्षा दिलाने के लिए ग्रामीण परिवेश में भी जागरूकता लाने की जरूरत है. गैरबराबरी को बच्चियों की कमी नही बल्कि उनके खिलाफ मौजदू स्थितियों के तौर पर देखा जाना चाहिए. अगर लडक़ी है तो उसे ऐसा ही होने चाहिए, इस प्रकार की बातें उसके सुधार की राह में बाधाएं बनती हैं. इसके चलते समाज में कन्या भ्रूण हत्या, बाल दुर्व्यवहार और बाल विवाह जैसी समस्याएं पलती-बढ़तीं हैं. सामाजिक धारणा को समझने के साथ-साथ बच्चियों को बहन, बेटी, पत्नी या मां के दायरों से बाहर निकालने और उन्हें सामाजिक भागीदारिता के लिए प्रोत्साहित करने में मदद के तौर पर जाना जाए. समाज में जागरूकता आने के बावजूद अब भी लोग बेटी नहीं बेटे चाहते हैं जबकि क्राई के अध्ययनों में यह साफ् हुआ है कि लडकियां व्यक्तिगत और सामूहिक रूप में समाज की पुरानी परंपराओं को तोड़कर आगे बढ़ रही हैं और भेदभाव को स्वीकार नहीं कर रही हैं. वे मंजिल हासिल करने की दिशा में बढ़ने लगी हैं.

18.10.10

बच्चों का लापतागंज

शिरीष खरे

देश में एक बार फिर से बच्चों के गायब होने की घटनाएं सामने आ रही हैं. सामने आ रहीं घटनाओं के आधार पर गौर किया जाए तो बड़े शहरो में स्थिति ज्यादा भयावह है. गैर-सरकारी संस्थाओं का अनुमान है कि भारत में हर साल 45000 बच्चे गायब हो रहे हैं. 2007 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि देश में सबसे अधिक बच्चे झारखंड, छत्तीसगढ़, आध्र प्रदेश, बिहार और उड़ीसा से गायब हो रहे हैं.

2001 की जनगणना के आकड़ों के जोड़-घटाने में 7.2 करोड़ बच्चे लापता पाए गए हैं. एक आकड़े के मुताबिक 8.5 करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जाते. दूसरे आकड़े में 5 से 14 साल के 1.3 करोड़ बच्चे मजदूर हैं. अगर 8.5 करोड़ में से 1.3 करोड़ घटा दें तो 7.2 करोड़ बचते हैं. यह उन बच्चों की संख्या है, जो न छात्र हैं, न ही मजदूर. तो फिर यह क्या हैं, कहां हैं और कैसे हैं? इसका हिसाब भी किसी किताब या रिकार्ड में दर्ज नहीं मिलता है. इस 7.2 करोड़ के आकड़े में 14 से 18 साल तक के बच्चे नहीं जोड़े गए हैं. अगर इन्हें भी जोड़ दें तो देश के बच्चों की हालत और भी बदतर नजर आएगी.

भारत में बच्चों की उम्र को लेकर अलग-अलग परिभाषाएं हैं. संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में बच्चों की उम्र 0 से 18 साल रखी गई है. भारत में बच्चों के उम्र की सीमा 14 साल ही है. मगर अलग-अलग अधिनियमों के मुताबिक बच्चों की उम्र बदलती जाती है. जैसे किशोर-न्याय अधिनियम, 2000 में अधिकतम 18 साल, बाल-श्रम अधिनियम, 1886 में अधिकतम 14 साल, बाल-विवाह अधिनियम में लड़के के लिए न्यूनतम 21 साल और लड़की के लिए न्यूनतम 18 साल की उम्र तय की गई है. खदानों में काम करने की उम्र 15 और वोट देने की न्यूनतम उम्र 18 साल रखी गई है. इसी तरह शिक्षा के अधिकार कानून में बच्चों की उम्र 6 से 14 साल रखी गई है.

इस तथ्य को 2001 की जनगणना के उस आकड़े से जोड़कर देखना चाहिए, जिसमें 5 साल से कम उम्र के 6 लाख बच्चे घरेलू कामकाज में उलझे हुए हैं. कानून के ऐसे भेदभाव से अशिक्षा और बाल मजदूरी की समस्याएं उलझती जाती हैं. सरकारी नीति और योजनाओं में भी बच्चों की उम्र को लेकर उदासीनता दिखाई देती है. 14 साल तक के बच्चे युवा-कल्याण मंत्रालय के अधीन रहते हैं. मगर 14 से 18 साल वाले बच्चे की सुरक्षा और विकास के सवाल पर चुप्पी साध ली जाती है. किशोर बच्चों की हालत भी बहुत खराब है. 2001 की जनगणना में किशोर बच्चों की संख्या 22 करोड़ 50 लाख है. यह कुल जनसंख्या का 22 प्रतिशत हिस्सा है. इसमें भी 53 प्रतिशत लड़के और 47 प्रतिशत लड़किया हैं. यह सिर्फ संख्या का अंतर नहीं है, असमानता और लैंगिक-भेदभाव का भी अंतर है.

2001 की जनगणना में 0 से 5 साल की उम्र वालों का लिंग-अनुपात 100-879 है, जबकि 15 से 19 साल वालों में यह 1000-858 है. जिस उम्र में लिंग-अनुपात सबसे खराब है, उसके लिए अलग से कोई रणनीति बननी थी. मगर हमारे देश में उम्र की जरूरत और समस्याओं को अनदेखा किया जा रहा है. बात साफ है कि बच्चियां जैसे-जैसे किशोरिया बन रही हैं, उनकी हालत बद से बदतर हो रही है. देखा जाए तो बालिका शिशु बाल-विभाग, महिला व बाल-विकास के अधीन आता है, मगर एक किशोरी न तो बच्ची है न ही औरत. इसलिए इसके लिए कोई विभाग या मंत्रालय जिम्मेदार नहीं होता. इसलिए देश की किशोरियों को सबसे ज्यादा उपेक्षा सहनी पड़ रही है.

ऐसा नहीं है कि बच्चों के गुम होने जैसी समस्या से अकेले भारत ही जूझ रहा है. दुनिया के विकासशील देशों से लेकर विकसित देशों से भी हर साल लाखों की संख्या में बच्चे गायब हो रहे हैं. ब्रिटेन में हर साल करीब 13000 बच्चों के लापता होने की घटनाएं सामने आईं हैं. चीन में 2000 में हुई जनगणना के दौरान बीते 10 सालों में 3.7 करोड़ बच्चे गायब पाए गए. अफ्रीकी देशों की हालत भी इससे अलग नहीं है. रिकार्ड बताते हैं कि बेल्जियम में हर साल 2928 और रोमानिया में 2354 बच्चे गायब होते हैं. जबकि फ्रांस में सालाना 706 बच्चे गायब हो जाते हैं. अमेरिकी बच्चे भी इससे अछूते नहीं हैं और अमेरिकी सरकार की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2007 में यहां 4802 बच्चों के गायब होने की सूचना पुलिस को थी. यहां कई हाई प्रोफाइल बच्चे भी गायब हुए और सालों बाद भी उनका कोई अता-पता नहीं चला. बच्चों के गायब होने के ये सारे आंकड़े पुलिस द्वारा दिए जाते हैं. मगर ज्यादातर मामलों को पुलिस दर्ज ही नहीं करती या उन तक पहुंचती ही नहीं है.

ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बच्चे गायब हो रहे है बल्कि सवाल यह भी है कि बच्चे कहां जा रहे हैं ? रिकार्ड बताते हैं कि ज्यादातर गायब हुए बच्चों से या तो मजदूरी कराई जाती है या उन्हें सेक्स वर्कर बना दिया जाता है. बड़े शहरों के भीतर खेलने-कूदने की उम्र वाले बच्चों को बड़ी संख्या में भीख मांगने के लिए भी मजबूर किया जा रहा है.

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन भले ही जून 1999 से ही बाल श्रम को खत्म करने के लिए कमर कस चुका हो मगर अब भी करोड़ों बच्चे जीविका चलाने के लिए बाल मजदूरी कर कर रहे हैं. भारत में दुनिया भर के मुकाबले सबसे ज्यादा बाल श्रमिक हैं. देश में 5 से 14 साल के तकरीबन 1 करोड़ बच्चे घातक और जानलेवा पेशे में लगे हुए हैं. 12 जून को बाल श्रम के खिलाफ विश्व दिवस मनाया गया. संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने अपनी रिपोर्ट में माना है कि 1999 से आर्थिक गतिविधियों में लिप्त बच्चों की संख्या भले ही घटी हो मगर अब भी 5 से 14 साल के 16.5 करोड़ बच्चे मजदूर हैं. इनमें से ज्यादातर बच्चे शिक्षा से वंचित हैं और खतरनाक स्थितियों में काम करते हैं. इनमें से कुछ के साथ गुलामों से भी बदतर व्यवहार किया जाता है, जिन्हें उनके गरीब माता-पिता के ऋणों को चुकाने के बदले बेच दिया जाता है.

बाल सैनिकों की समस्या को भी बाल श्रम के खिलाफ विश्व दिवस पर पहचाना गया है, जो बाल श्रम के सबसे बुरे रूपों में से एक है. सयुंक्त राष्ट्र संघ बाल कोष के अनुसार दुनिया भर में करीब तीन लाख बच्चे 30 सशस्त्र संघर्षो में शामिल हैं, जिनमें 7 या 8 साल के छोटे बच्चे भी हैं. हालांकि ज्यादातर बाल सैनिकों को जबरन लड़ाई में झोंका जा रहा है. कई से खानसामों, चौकीदारों, संदेशवाहकों या जासूसों का काम लिया जाता है. लड़का हो या लड़की दोनों का ही बाल मजदूर के तौर पर अक्सर यौन शोषण किया जाता है और बहुधा इसका परिणाम अवांछित गर्भधारण और यौन रोगों में होता है.

4.10.10

पंचायती व्यवस्था का बलात्कार

शिरीष खरे राजस्थान से लौटकर

बाड़मेर और अजमेर. राजौ और गीता. एक ही दुनिया के दो अलग-अलग किस्सों के दो किरदार हैं. इधर है अपनी अस्मत गंवा चुकी राजौ, जो गांव के विरोध पर भी अपनी अर्जी अदालत तक दे तो आती है, मगर लौटकर गांव से छूट जाती है. उधर है कमजोर दलित महिला होने का दर्द झेलनी वाली गीता, जो डर के मारे अपनी गुहार अदालत से वापिस ले आती है, और गांव से दोबारा जुड़ जाती है. दोनों ही मानते हैं कि थाने के रास्ते अदालत आना-जाना और इंसाफ की लड़ाई लड़ना तो फिर भी आसान है, मगर समाज के बगैर रह पाना बड़ा मुश्किल है.

एक को अदालत की लड़ाई मंजूर है, दूसरे को गांव में रहना. दोनों का हाल आपके सामने है. मगर कौन ज्यादा अंधेरे में है, और कौन कम उजाले में. चलिए आप ही तय कीजिए- गांव....थाने....अदालत....पंचायत....समाज के बीच मौजूद इनके फासलों, अंधेरे, उजाले से होकर.

राजौ के यहां जाने से पहले, उस रोज का अखबार भरतपुर जिले के गढ़ीपट्टी में ‘बंदूक की नोंक पर पांच लोगों के दलित औरत से बलात्कार’ की खबर दे रहा था. राजौ का गांव सावऊ, बाड़मेर जिले के गोड़ा थाने से 12 किलोमीटर दूर है. वहां तक पहुंचने में 30 मिनिट भी नहीं लगे, मगर राजौ के भीतर की झिझक ने उसे 45 मिनिट तक बाहर आने से रोके रखा.

राजौ के साथ जो हुआ वो घटना के चार रोज बाद यानी 9 जून, 2003 की एफआईआर में दर्ज था : "श्रीमान थाणेदार जी, एक अरज है कि मैं कुमारी राजौ पिता देदाराम, उम्र 15 साल, जब गोड़ा आने वाली बस से सहरफाटा पर उतरकर घर जा रही थी, तब रास्ते में टीकूराम पिता हीराराम जाट ने पटककर नीचे गिराया, दांतों से काटा, फिर.......और उसने जबरन खोटा काम किया. इसके बाद वह वहां से भाग निकला. मैंने यह बात सबसे पहले अपनी मां को बतलाई. मेरे पिता 120 किलोमीटर दूर मजूरी पर गए थे, पता चलते ही सबेरे लौट आएं. जब गांव वालों से न्याय नहीं मिला तो आज अपने भाई जोगेन्दर के साथ रिपोर्ट लिखवाने आई हूं. साबजी से अरज है कि जल्द से जल्द सख्त से सख्त कार्यवाही करें."

मुंह मोड़ने वाला समाज
राजौ अब 20 साल की हो चुकी है. उसकी मां से मालूम चला कि बचपन में उसकी सगाई अपने ही गांव में पाबूराम के लड़के हुकुमराम से हो चुकी है. मगर वह परिवार अब न तो राजौ को ले जाता है, न ही दूसरी शादी की बात करता है. गांव वालों से किसी मदद की तो पहले ही कोई गुंजाइश नहीं है, मगर 2 किलोमीटर दूर पुनियो के तला गांव में जो ताऊ है, 60 किलोमीटर दूर बनियाना में जो चाचा है, 80 किलोमीटर दूर सोनवा में जो ननिहाल है, वहां से भी कोई खैर-खबर नहीं आती है. उसका झोपड़ा भी गांव से 2 किलोमीटर दूर उसके खेत में आ पहुंचा है, और गृहस्थी का हाल पहले से ज्यादा खराब है. पंचों में चाहे खेताराम जाट हो या रुपाराम, खियाराम हो या अमराराम, सारे यही कहते हैं कि चिड़िया जब पूरा खेत चुग जाए तो उसके बाद पछताने से क्या फायदा है ?

राजौ के पिता देदाराम यह खोटी खबर लेकर सबसे पहले गांव के पंच खियाराम जाट के पास पहुंचे थे. पंच खियाराम जी ने पहले तो इसे अंधेर और जमाने को घोर कलयुगी बतलाया, फिर देदाराम से पूछे बगैर दोषी टीकूराम के पिता के यहां यह संदेशा भी भिजवा दिया कि 20,000 रूपए देकर मामला निपटा लेने में ही भलाई है. मगर टीकूराम के पिता हीराराम जाट ने साफ कह दिया कि वह न तो एक फूटी कोड़ी देने वाला है, न निपटारे के लिए कहीं आने-जाने वाला है. फिर मजिस्ट्रेट की दूसरी पेशी पर बाड़मेर कोर्ट के सामने दोषी समेत गांव के सारे पंच-प्रधान जमा हुए. सबने मिलके राजौ को समझाया कि केस वापिस ले लो, कोर्ट-कचहरी का खर्चापानी भी दे देंगे. पर टीकूराम को साथ देखकर राजौ बिफर पड़ी. उसने राजीनामा के तौर पर लाये गए 50, 000 रूपए जमीन पर फेंक दिए और ऐसी खरी-खोटी सुनाई कि वहां एक न ठहरा.

लड़ाई जारी है
इसके बाद जिस चाचा ने राजौ का नाता जोड़ा था, उसी के जरिए पंचों ने बातें भेजीं कि- राजीनामा कर लो तो हम साथ रहकर गौना भी करवा दें. छोटे भाई की भी शादी करवा दें. नहीं तो सब धरा रह जाएगा. कोर्ट कचहरी के चक्कर में पड़ने से अच्छा है आपस में निपट लेना. वो तो लड़का है, उसका क्या है, जितना तुम्हें पैसा देगा, उतना कचहरी में लुटाकर छूट जाएगा, तुम लड़की हो, उम्र भी क्या है, बाद में कोई साथ नहीं देता बेटी. फिर बदनामी बढ़ाने में अपना और अपनी जात का ही नुकसान होता है.

जब राजौ पर ऐसी बातों का भी असर नहीं हुआ तो कभी राजौ की जान की फिक्र की गई, तो कभी उसके छोटे भाई जोगेन्दर की जान की.

राजौ आज तक केस लड़ रही है. यह अलग बात है कि टीकूराम को जमानत पर रिहाई चुकी है, और उसके बाद उसकी शादी भी हो चुकी है. राजौ को अदालत में लड़ने का फैसला कभी गलत नहीं लगा है, उसे अदालत से फैसले का अब भी इंतजार है. राजौ को गांव में आने-जाने के लिए सीधे तो कोई भी नहीं रोकता, मगर पीठ पीछे तरह-तरह की बातों को वह महसूस करती हैं.


वैसे पंचों को छोड़कर गांव के बाकी लोगों के साथ उसके रिश्ते धीरे-धीरे सुधर रहे हैं. राजौ के यहां से उठते वक्त उससे जब कहा गया कि रिपोर्ट में उसका नाम और फोटो छिपा ली जाएगी तो उसने बेझिझक कहा "मेरा असली नाम और फोटो ही देना. जिनके सामने लाज शरम से रहना था, उनके सामने ही जब ईज्जत उतर गई तो. तो दुनिया में जिन्हें हम जानते तक नहीं, उनसे बदनामी का कैसा डर ?"

इस रात की सुबह कब ?
थानाधिकारी सतीश यादव टेबल पर रखे ‘सत्यमेव जयते’ की प्लेट और पीछे की दीवार पर लटकी गांधीजी की फोटो के बीचोंबीच मानो 180 डिग्री का कोण बनाते हुए बैठे हैं. उन्होंने दूसरी तरफ निगाह टिकाते हुए कहा- "आपकी तारीफ". मगर बगैर जबाव सुने ही चल दिए.

मेरा सवाल यह नहीं कि केस कितना छोटा या बड़ा है, या आप बड़ा किसे मानते हैं, सवाल है कि जब कभी गांवों में दलित और खासकर दलित महिला पर अत्याचार होता है तो न्याय के हर पड़ाव तक कैसी मानसिकता अपनाई जाती है ? आगे की किस्सा इसी मानसिकता को केन्द्र में रखकर लिखा जा रहा है.

रसूलपुरा गांव से दलित-महिला अत्याचारों के एक हफ्ते में ही तीन-तीन केस आने पर थानाधिकारी महोदय क्रोधित है. ‘महिला जन अधिकर समिति’ का आरोप है कि वह दलित-महिलाओं को कानून में दिये गए विशेष अधिकारों पर अमल करना तो दूर शिकायत दर्ज करवाने वाले को ही हवालात की हवा खिलाने लगे हैं.

रसूलपुरा के सुआलाल भाम्बी, उसकी पत्नी गीतादेवी और पुत्री रेणु ने जब बीरम गूजर के खिलाफ जर्बदस्ती गाय हथियाने और मारपीट का मामला अलवर थाने में दर्ज करवाना चाहा तो सुआलाल भाम्बी को ही यह कहते हुए बंद कर लिया गया कि जांच के बाद पता करेंगे कि कसूरवार है कौन ?

रसूलपुरा, अजमेर से जयपुर जाने वाली सड़क पर बामुश्किल 10 किलोमीटर दूर है. यहां करीब 800 मतों में से 600 मुस्लिम, 150 गूजर और 50 दलितों के हैं. 15 साल पहले दलितों की संख्या ठीक-ठाक थी. तब से अब तक करीब 20 दलित परिवारों को अपनी जमीन-जायदाद कौड़ियों के दाम बेचकर अजमेर आना पड़ा है. बचे दलितों को भी गांव से आधा किलोमीटर दूर अपने खेतों में आकर रहना पड़ रहा है.

दलित हो तो नीचे रहो
यहां आज भी चबूतरे पर दलितों का बैठना मना है. वह साइकिल पर सवार होकर निकल तो सकते हैं, मगर जब-तब रोकने-टोकने का डर भी है. पहले तो दलित दूल्हा घोड़े पर चढ़ नहीं सकता था, पर 10 साल पहले हरकिशन मास्टर ने घोड़े पर चढ़कर पुराना रिवाज तोड़ा डाला था. 15 साल पहले छग्गीबाई भील सामान्य सीट से जीतकर सरपंच भी बनी थी. तब गांव की ईज्जत का वास्ता देकर सारे पंचों को एक किया गया और अविश्वास प्रस्ताव के जरिए छग्गीबाई को 6 महीने में ही हटा दिया गया. छग्गीबाई का सामान्य सीट से जीतना करिश्मा जैसा ही था.

छग्गीबाई कहती हैं "तब सामान्य जाति के इतने उम्मीदवार खड़े हो गए कि दलितों के कम मत ही भारी पड़ गए. नतीजा सुनकर उंची जात वालों ने रसूलपुरा स्कूल घेर लिया, ऐसे में पीछे की कमजोर दीवार से लगी खिड़की तोड़कर मुझे पुलिस की गाड़ी से भगाया गया. पुराने सरपंच श्रवण सिंह रावत फौरन पंचायत की तरफ दौड़े, कुर्सी पर बैठकर बोले ‘ई भीली को कोड़ पूछै, कौड़ पैदा नी होय ऐसो, जो जा पंचायती में राज करै’."

यानी एक गांव के ऐसे दो उदाहरणों से बीते 10-15 सालों के भीतर आपसी टकराहटों के कारण साफ समझ में आते हैं. तकरीबन 15 साल पहले ही इलाके की महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए समिति बनायी और नाम रखा ‘महिला जन अधिकार समिति’. तब 2-2 रूपए देकर 10-12 महिलाएं जुड़ी. केसर, तोला, सोहनी, सरजू, सकुंतला, रेनू, जूली, लीला, गंगा, रिहाना, संपत, भंवरीबाई जैसी महिलाएं अपनी छोटी-छोटी दिक्कतों और निपटारे के लिए चर्चाएं करतीं. भंवरीबाई बताती हैं "5 साल के बाद जब हम बालविवाह, मृत्युभोज और जातिप्रथा जैसी बुराईयों के विरोध में बोलने लगे तो हमारा भी विरोध बढ़ने लगा. दलित महिलाएं जब जातिसूचक शब्दों और गालियों पर ऐतराज जताने लगीं तो सवर्ण कहते कि हम तो तुम्हें रोज ही गालियां देते थे, पहले भी तुम्हारे बच्चों को बिगड़े नामों से ही बुलाते थे, तब तो तुम्हें बुरा नहीं लगता था, अब क्यों लग रहा है ?"

दलितों को सरकारी जमीन से होकर अपने खेत आना-जाना होता था. मगर जून की घनी दोपहरी में तेजा गूजर ने उसी रास्ते पर गड्डा खुदवाया, और तार और कांटे की बागड़ लगवा दी. इसके बाद दलित महिलाओं की तरफ से भंवरीबाई ने तेजा गूजर से बात की- "लालजी (देवरजी) डब्बो थाओ बात करणी है." जबाव में उन्हें अश्लील गालियां और गड्डे में ही गाड़ देने जैसी धमकियां मिलीं.

ऐसो पुलिस वालो से तो...
इसके बाद दलित महिलाओं ने उनके बड़े भाई और वार्ड के पंच अंबा गूजर को बताया कि आपको वोट दिया तो इस उम्मीद पर कि सुख-दुख बांटोंगे, आप तो खुद ही दुख दे रहे हैं. जबाव में अंबा गूजर ने थाने घूम आने की नसीहत दी.

रसूलपुरा के दलित परिवारों ने बताया कि यह दोनों भाई कई गांवों जैसे बेड़िया, गूगरा, बुडोल और गगबाड़ा के दलितों की जमीनों को सस्ते दामों में खरीदने में लगे हुए हैं. अगले दिन दलित महिलाएं जब नारेती पुलिस चौकी गईं तो पुलिस वाले बोले कि पहले जांच करेंगे, तब केस लेंगे. जांच के लिए जब कैलाश (दलित) कांस्टेबल आया तो तेजाभाई-अंबाभाई ऊपर बैठे और कैलाश कांस्टेबल आंगन के बाहर नीचे बैठा.

यह नजारा देखते ही दलित महिलाएं अलवर गेट थाने पहुंची, जहां थानाधिकारी ऐसे मामलों के चलते पहले से ही हैरान-परेशान पाये गए. उन्होंने ऐसी वारदातों में कमी लाने की बात पर जोर दिया.

गांव के दलित व्यक्ति कल्याणजी पूरे भरोसे के साथ बताते हैं ‘‘ऊंची जात के हमारे 30 एकड़ के खेतों के अलावा 4 एकड़ की सरकारी जमीन भी हथियाना चाहते हैं. यहां 1 एकड़ खेत की कीमत 1 लाख के आसपास चल रही है. हमारे पास गृहस्थी चलाने का मुख्य जरिया खेती ही है. 10-15 सालों से सूखा पड़ने से खेती वैसे ही चौपट है. मजूरी के लिए पलायन करना पड़ता है. ऐसे में ऊंची जात वालों की नीयत बिगड़ने से थाने-कचहरी के चक्कर भी लगाने पड़ रहे हैं.’’

मौसेरे भाई
इसी साल के कुछ मामलों पर नजर दौडाएं तो जमीन के विवाद में 12 फरवरी को मामचंद रावत और उसके लोगों ने शंकरलाल रेंगर, उसकी पत्नी कमला, बेटी संगीता, बहू ललिता, बेटे विनोद और गोपाल के साथ घर में घुसकर मारपीट की. ‘दलित अधिकार केन्द्र’ के हस्तक्षेप करने से अलवर गेट थाने में तीन महीने बाद रिपोर्ट दर्ज हो सकी. अभी तक चलान पेश नहीं हुआ.

इसके बाद तेजाभाई-अंबाभाई गूजर ने रास्ता रोकने का विरोध करने वाली गीता और सोहनी को पीटा. एसपी साब के हस्तक्षेप के बाद ही रिपोर्ट लिखी जा सकी. बहुत दिनों से कार्यवाही का इंतजार है. जिन दलितों के दिलों में अपनी जमीन खो देने का डर हैं, उनमें हैं कल्याण, कैलाश, ओमप्रकाश, रतन, सोहन, छोटू, नाथ, मोहन, सुआंलाल, गोगा, घीसू, किशन, दयाल, रामचंद, रामा, हरिराम ने अपने नाम लिखवाए हैं.

रसूलपुरा का राजनैतिक-आर्थिक ताना-बाना ऐसा है कि वर्चस्व की लड़ाई में गूजरों के साथ मुस्लिमों ने हाथ मिला लिया है. लाला शेराणी और लाला सलीम जैसे दो मुस्लिम व्यापारियों ने तो गूजरों का खुला समर्थन किया है. इसमें से लाला सलीम ने तो यहां तक कह दिया है कि "पूरा गांव उलट-पुलट हो जाएगा, अगर एक भी गूजर थाने में गया तो." मुस्लिम और सवर्ण-हिन्दूओं की एकता का इससे बेहतरीन उदाहरण और कहां मिलेगा ?

इधर अलवर गेट थाने के थानाधिकारी महोदय की परेशानी समझ नहीं आती है. शंकरलाल रेंगर जब रिपोर्ट लिखाने पहुंचे तो थानाधिकारी महोदय ने स्वयं समझाने की कोशिश की थी कि यह थाना केवल दलितों या रसूलपुरा के लिए नहीं खोला गया है. इलाके में और भी तो लोग हैं, और भी परेशानियां हैं.

उधर रसूलपुरा में शाम 7 बजे तक जब सुआलाल भाम्बी की गाय न लौटी तो उसकी पत्नी गीता और बेटी रेणु पता लगाने गांव में घूमने लगीं. उन्हें पता चला कि बीरम सिंह ने उनकी गाय बांध रखी है. इसके बाद जिसका अंदेशा था, वही हुआ. गाय मांगने पर गाली-गलौज और विरोध करने पर मारपीट. उस वक्त एक भी बीच-बचाव में न आया. ऐसे में जब सुआंलाल भाम्बी, उसकी पत्नी गीता और बेटी रेणु रिपोर्ट लिखवाने आए तो सुआलाल को बंद कर लिया गया. मगर ‘महिला जन अधिकार समिति’ और ‘दलित अधिकार केन्द्र’ के विरोध के बाद पुलिस सुआलाल से कहती है कि "गांव चलते हैं, अगर एक भी आदमी यह कह दे कि यह तेरी गाय है तो रख लेना."

सुआलाल बोला "गवाह तो एक नहीं कई हैं, पर मामला केवल गाय का नहीं है, गाय तो मेरी है ही, सवाल मेरी पत्नी और बेटी को बेवजह पीटने और गाली-गलौज का है, उसका न्याय चाहिए." पुलिस वालों के हिसाब से "ऐसे तो मामला सुलझने से रहा." इसलिए अगली सुबह गीता और रेणु को जिला एवं सेशन न्यायधीश, अजमेर का रास्ता पकड़ना है. रात उन्हें अजमेर ही ठहरना है. सुबह होने के पहले गांव के पंच उन्हें कचहरी की हकीकत बताने के लिए आते हैं. वह बाकायदा गाय लौटा देने का वादा भी करते हैं. मारपीट और ईज्जत के सवाल पर अस्पताल में लगा खर्चापानी दिलवाने की गांरटी भी देते हैं. दोषी बीरम सिंह माफी भी मांगता है, यह अलग बात है कि केवल ऊंची जाति वालों के सामने.

गांव का वास्ता
गीता और रेणु के शरीर पर चोट के निशान ज्यादा हैं. मगर गांव के पंचों के बढ़ते जोर के सामने उन्हें मारपीट का भंयकर दर्द हमेशा के लिए भूलना पड़ेगा. सुआलाल के हिसाब से यह राजीनामा उसकी खुशी के लिए नहीं गांववालों की खुशी के लिए करना पड़ेगा. बड़े-बड़े लोग जब अपनी ईज्जत की खातिर आ जाएं तो उनका अड़ी ठुकराते भी तो नहीं बनती. खेत का पानी, आंगन का गोबर, चूल्हे की लकड़ियां, कर्ज के पैसे, आटे की चक्की, मजूरी, हर रोज हर एक चीज के लिए तो उन्हीं का आसरा है.

गीता मान रही है कि इस बार ईज्जत से कोई समझौता नहीं होना चाहिए. हालांकि सुबह होने में अभी बहुत देर है , मगर उसके पहले यह भी जानना चाह रही है कि वह गांव और घरबार छोड़कर भी कहीं जी सकती है ?

कहते हैं ‘‘पांच पंच मिल कीजै काज। हारे जीते होय न लाज।।’’ मगर जहां के पंच अपनी ताकत से सत्य को अपने खाते में रखते हो, वहां के कमजारों के पास हार और लाज ही बची रह जाती है. ऐसे में कोई कमजोर जीतने की उम्मीद से कचहरी के रास्ते जाए भी तो उसे जाती हुई 'राजौ 'और लौटी हुई 'गीता' मिलती है. तब यह सवाल इतना सीधा नहीं रह जाता है कि वह किसके साथ चले, किसके साथ लौटे ?

8.9.10

भूख की पेट में गए मध्य प्रदेश के 28 आदिवासी बच्चे

शिरीष खरे

एएचआरसी यानी एशियन ह्यूमन राइटस् कमीशन के अनुसार मध्यप्रदेश में 28 बच्चों ने कुपोषण के चलते दम तोड़ दिया है. पीडित बच्चों के परिवार सरकारी योजनाओं के तहत भोजन और स्वास्थ्य के मद में दी जाने वाली सहायता से भी दूर हैं.

एएचआरसी ने अपनी सूचना का आधार मध्यप्रदेश की एक संस्था लोक 'संघर्षमंच' और प्रदेश में चलाये जा रहे 'भोजन के अधिकार अभियान' की एक मौका मुआयना पर आधारित रिपोर्ट को बनाया है. इस रिपोर्ट के आधार पर एएचआरसी ने आशंका जतायी है कि आने वाले दिनों में मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाकों के कई और बच्चे भुखमरी के शिकार हो सकते हैं.

एएचआरसी ने भुखमरी की चपेट में आएं बच्चों की स्थिति को बयान करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश, संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा भोजन के अधिकार के संदर्भ में नियुक्त विशेष प्रतिनिधि और बाल अधिकारों की समिति को पत्र लिखा है और उनसे तुरंत हस्तक्षेप की मांग की है.

ज्यादातर मामलों के विवरणों से पता चला है कि बच्चे कुपोषण और चिकित्सीय देखरेख के अभाव में उन बीमारियों की चपेट में आएं हैं जिनका इलाज बहुत आसानी से हो सकता था. गौरतलब है कि प्रदेश में बीते दो महीने से कुपोषण से ज्यादातर आदिवासी बच्चों की मौतें हुई हैं. कुपोषण के शिकार ज्यादातर बच्चे आदिवासी बहुल जिले झाबुआ के मेघनगर प्रखंड से पाएं गए हैं.

प्रशासनिक असंवेदनशीलता की हद यह है कि पीड़ित बच्चों के परिवारों को बीपीएल कार्ड तक हासिल नहीं हो पाएं हैं. जबकि यह सारे परिवार सीमांत किसान हैं और उन्हें खेती के लिए सिंचाई की सुविधा या कोई अन्य राजकीय मदद भी नहीं मिल रही है. इस इलाके में जिस परिवार के पास थोड़ी सी भी जमीन है उसे बीपीएल से ऊपर दिखाया गया है, भले ही वह जमीन कितनी भी कम और बंजर ही क्यों न हो. जाहिर है ऐसा परिवार अब भी भोजन और स्वास्थ्य सुविधा के मामले में सरकारी मदद का हकदार नहीं बन सका है.

एएचआरसी के अनुसार पीड़ित बच्चों के परिवार वालों को काम के अभाव में गांव से पलायन करना पड़ा है और उन्हें मनरेगा के अधिकार से दूर रखा गया है. मनरेगा के तहत दिये जाने वाले जॉबकार्ड के हर धारक को गुजरे साल जहां बामुश्किल 15 दिनों का काम ही दिया गया है, वहीं ऐसे लोगों को अब भी उनकी मजदूरी नहीं मिली है. जबकि गांवों में सामाजिक अंकेक्षण की प्रकिया भी पूरी कर ली गई है. अजब है कि एक तरफ गांवों में बच्चों की कुपोषण से हो रही मौतें रुकती नहीं हैं और दूसरी तरफ मनरेगा के सामाजिक अंकेक्षण में एक भी कमी दिखाई नहीं देती है.

2.9.10

हिंसा की आग में धधकता मणिपुरी बच्चों का कल

शिरीष खरे


मणिपुर में उग्रवाद और उग्रवाद के विरोध में जारी हिंसक गतिविधियों के चलते बीते कई दशकों से बच्चे हिंसा की कीमत चुके रहे हैं. यह सीधे तौर से हिंसक गतिविधियों तो कहीं-कहीं गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण की तरफ धकेले जा रहे हैं. राज्य में स्थितियां तनावपूर्ण होते हुए भी कई बार नियंत्रण में तो बनी रह जाती हैं, मगर स्कूल और स्वस्थ्य सेवाओं जैसे बुनियादी ढ़ांचे कुछ इस तरह से चरमराए हुए हैं कि लोगों का विरोध प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता है.

बच्चों के हकों के लिए काम करने वाली संस्था क्राई हिंसा से सबसे ज्य़ादा प्रभावित तीन जिलों चन्देल, थौंबल और चुराचांदपुर में सक्रिय है. इसके द्वारा जगह-जगह बच्चों के सुरक्षा समूह बनाये जा रहे हैं. यहां की आदिवासी दुनिया के भीतर मौजूद अलग-अलग समुदायों में आपसी तनाव बहुत ज्यादा हैं, ऐसे बहु जातीय समूहों में रहने वाले बच्चों के बीच से डर और भेदभाव दूर करने और उनमें आत्मविश्वास जगाने के लिए कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है. क्राई से असीम घोष ने बताया कि ‘‘यहां के बच्चे डर, अनहोनी, अनिश्चिता और हिंसा के साए में लगातार जी रहे हैं, यहां जो माहौल है उसमें बच्चे अपने बुनियादी अधिकारों से वंचित हैं. इसलिए कार्यशालाओं के पहले स्तर में हमारी कोशिश बच्चों के लिए सुरक्षित महौल बनाने की रहती है, जहां वह बेझिझक होकर अपनी बात कह सकें और दूसरे आदिवासी समुदायों के बच्चों के साथ घुल-मिल पाएं. इन कार्यशालाओं को पूरे प्रदेश भर में फैले हिंसा और उसके चलते होने वाले तनावों से उभरने के लिए एक शांतिपूर्ण प्रक्रिया के रुप में भी देखा जा सकता है.’’

मणिपुर में बच्चों के हिंसा के प्रभाव से बचाने के लिए नागरिक समूहों के आगे आने की संभावनाएं प्रबल हो रही है. इन दबाव समूहों ने बीते लंबे अरसे से राष्ट्रीय स्तर पर जैसे कि बच्चों के अधिकारों के सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग और संबंधित मंत्रालयों पर इस बात के लिए दबाव बढ़ाया है कि वह मणिपुर में हिंसा से प्रभावित बच्चों की समस्याओं और जरूरतों को वरीयता दें. अहम मांगों में यह भी शामिल है कि अतिरिक्त न्यायिक शक्ति प्राप्त सेना यह सुनिश्चित करे कि हिंसा और आघातों के बीच किसी भी कीमत पर बच्चों को निशाना नहीं बनाया जाएगा. इसी के साथ राज्य में किशोर अधिनियम से प्रावधानों (Juvenile Justice Care and Protection Act, 2000 and its amendments enacted in 2006) के अनुसार किशोर न्याय प्रणाली को प्रभावपूर्ण ढंग से लागू किया जाएगा. इसके अलावा यहां राज्य के अधिकारियों पर सार्वजनिक सुविधाओं पर निवेश बढ़ाने, योजनाओं के क्रियान्वयन को सुदृढ़ बनाने और अधिकारों से संबंधित सेवाओं जैसे प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं, बच्चों के लिए ART यानी एंटी रेट्रोविरल थेरेपी और स्कूल की व्यवस्थाओं को दुरुस्त बनाने के लिए भी दबाव बढ़ाया जा रहा है. असल में यहां प्राथमिकता के स्तर पर अधिकारों से संबंधित सेवाओं को दुरुस्त बनाने के दृष्टिकोण को सैन्य आधारित दृष्टिकोण से ऊपर रखे जाने की जरूरत है.

मणिपुर में आंतकवाद से संबंधित घातक परिणामों के चलते 1992-2006 तक 4383 लोग भेट चढ़ गए हैं. जम्मू-काश्मीर और असम के बाद मणिपुर देश के सबसे हिंसक संघर्ष का इलाका बन चुका है. अन्तर जातीय संघर्ष और विद्रोह की वजह से 1950 को भारत सरकार ने इस राज्य में (Armed Forces Special Power Act) यानी सशक्त्र बलों के विशेष शक्ति अधिनियम लागू किया. इस अधिनियम ने विशेष बलों को पहली बार नागरिकों पर सीधे-सीधे हमले की शक्ति दी गई, जो कि सुरक्षा बलों के लिए प्रभावी ढंग से व्यापक शक्तियों में रूपान्तरित हो गईं. यहां जो सामाजिक सेवाएं हैं, वह भी फिलहाल अपनी बहाली के इन्तजार में हैं, जहां स्कूल और आंगनबाड़ियां सही ढ़ंग से काम नहीं कर पा रही हैं, वहीं जो थोड़े बहुत स्वास्थ्य केन्द्र हैं वह भी संसाधनों से विहीन हैं. प्रसव के दौरान चिकित्सा व्यवस्था का अकाल पड़ा रहता है. न जन्म पंजीकरण हो रहा है और न जन्म प्रमाण पत्र बन रहा है. अनाथ बच्चों की संख्या में बेहताशा बढ़ोतरी हो रही है, बाल श्रम और तस्करी को नए पंख लग गए हैं और बर्बादी की कगार तक पहुंच गए परिवारों के बच्चे वर्तमान हिंसक संघर्षों का हिस्सा बन रहे हैं. जबकि बच्चों के लिए खेलने और सार्वजनिक तौर पर आपस में मिलने के सुरक्षित स्थानों का पता तो बहुत पहले ही खो चुका था.

गैर सरकारी संगठनों के अनुमान के मुताबिक मणिपुर में व्याप्त हिंसा के चलते 5000 से ज्यादा महिलाएं विधवा हुई हैं, और 10000 से ज्यादा बच्चे अनाथ हुए हैं. अकेले जनवरी- दिसम्बर 2009 के आकड़े देखें जाए तो सुरक्षा बलों द्वारा 305 लोगों को कथित तौर पर मुठभेड़ में मार गिराए जाने का रिकार्ड दर्ज है. बंदूकी मगर गैर राजकीय हिंसक गतिविधि में 139 लोगों के मारे जाने का रिकार्ड मिलता है. विभिन्न हथियारबन्द वारदातों के दौरान 444 लोगों के मारे जाने का रिकार्ड मिलता है. जबकि नवम्बर 2009 तक कुल 3348 मामले दर्ज किए गए हैं. लड़कियों के खिलाफ अपराध के मामले देखें तो 2007 से 2009 तक कुल 635 मामले दर्ज किए गए हैं, जिसमें 24 हत्याओं और 86 बलात्कार के मामले हैं. बाल तस्करी का हाल यह है कि जनवरी 2007 से जनवरी 2009 तक अखबारों में प्रकाशित रिपोर्ट आधार पर 198 बच्चे तस्करी का शिकार हुए हैं. बाल श्रम के आकड़ों पर नज़र डाले तो 2007 को श्रम विभाग, मणिपुर द्वारा कराये गए सर्वे में 10329 बाल श्रमिक पाए गए हैं. जहां तक स्कूली शिक्षा की बात है तो सितम्बर 2009 से जनवरी 2010 तक 4 लाख से ज्यादा बच्चे स्कूलों में हाजिर नहीं हो सके हैं. दरअसल लंबे अरसे से यहां हिंसा को रोकने और राजकीय सेवाओं के दोबारा बहाल किये जाने के लिए सरकार पर गैर सैन्य उपायों पर सोचने के लिए दबाब बनाया जा रहा है.

मणिपुर सेना से मुक्त कब होगा इस बारे में अभी कुछ भी नहीं कहा जा सकता है मगर सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में राज्य में तैनात सेना को स्कूल खाली करने का आदेश जरूर दिया है. गौर करने लायक बात यह है कि मणिपुर के असंख्य स्कूलों का उपयोग सेना द्वारा सराय के रुप में किया जा रहा है. अगर सेना सुप्रीम कोर्ट के दिये गए आदेश को ही माने तो भी यहां के बहुत सारे बच्चों के लिए कम से कम पढ़ने-लिखने की जगह तो खाली होगी.
 
- - - - -
संपर्क : shirish2410@gmail.com

31.8.10

कितने असुरक्षित सुरक्षित देश के बच्चे

शिरीष खरे

क्या आप जानते हैं कि भारत के ग्रामीण इलाकों में तीन साल से कम उम्र के 40% बच्चों का वजन औसत से कम है, जबकि 45% का विकास सही तरीके से नहीं हो पाता है. बच्चों को पोषणयुक्त भोजन मुहैया कराने के मामले में भारत अपने पड़ोसी देश बांग्लादेश और नेपाल से भी पीछे है. बच्चों को पोषणयुक्त भोजन मुहैया कराने के मामले में 51 देशों के बीच भारत का स्थान 22वां है.

सरकारी आकड़ों के लिहाज से देश की 37.2% आबादी गरीबी रेखा के नीचे है. जो दर्शाती है कि देश में गरीबी बहुत तेजी से बढ़ रही है. यानी जितना हम सोचते हैं उससे कहीं ज्यादा बच्चे गरीबी में जीने को मजबूर हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के कुल कुपोषित बच्चों में से 49% भारत में हैं. अर्थव्यवस्था से जुड़े तमाम बड़े बड़े दावों के बावजूद भारत में बच्चों की कुपोषण से होने वाली मौतें बढ़ती ही जा रही हैं. देश में एक सेकेण्ड के भीतर 5 साल के नीचे का एक बच्चा कुपोषण के कब्जे में आ जाता है.

इसी तरह देश के 3.5 करोड़ बच्चे बेघर हैं जिनमें से 35000 बच्चों को ही आश्रय मिल सके हैं. इन आश्रयों में से भी बहुत सारे गैर सरकारी संगठनों द्वारा चलाये जा रहे हैं. मानवाधिकार संगठन के मुताबिक फुटपाथ पर रात बिताने वाले करीब 1 करोड़ बच्चों में से ज्यादातर को यौन-शोषण और सामूहिक हिंसा झेलनी पड़ती हैं. दिल्ली में जून 2008 से लेकर जनवरी 2009 तक 2210 बच्चे लापता हुए हैं. दिल्ली में एक दिन में औसतन 17 बच्चे गायब हो रहे हैं. गैर-सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में हर साल 72 लाख बच्चे गुलामी का शिकार हो रहे हैं. इनमें से एक तिहाई दक्षिण एशियाई देशों के होते हैं. गैर-सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर साल 45 हजार बच्चे गायब हो रहे हैं. अध्ययन कहते हैं कि गायब हुए बच्चों से मजदूरी कराई जाती है, या उन्हें सेक्स वर्कर बना दिया जाता है.

हालांकि केंद्र सरकार उन राज्य सरकारों के प्रति नाराजगी जताती रही है है जो केंद्र की समेकित बाल संरक्षण योजना पर हस्ताक्षर तो चुके हैं मगर उसके बाद से अपने यहां बाल संरक्षण आयोग का गठन तक नहीं कर सके हैं. कुपोषण, असुरक्षा जैसी तमाम समस्याओं की मार झेलते भारतीय बच्चों की एक बड़ी समस्या अनेक कारणों से की जाने वाली मजदूरी भी है. बाल अधिकारों से जुड़ी अनेक अंतरराष्ट्रीय संधियों का हस्ताक्षरकर्त्ता होने के बावजूद भारत बाल मजदूरों का गढ़ बन चुका है. पूरी दुनिया में 24.6 करोड़ बाल मजदूर हैं, जबकि केंद्र सरकार के अनुसार देश में 1.7 करोड़ बाल मजदूर हैं जिनमें से 12 लाख खतरनाक उघोगों में काम करते हैं. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के बाल मजदूरी से जुड़े आकड़ों के मुताबिक सेक्स इंडस्ट्री में खासतौर से लड़कियों की तस्करी विभिन्न यौन गतिविधियों के लिए हो रही है. इसी तरह घरेलू मजदूरी में भी लड़कियों की संख्या सबसे ज्यादा होती है.

तस्करी और लापता बच्चों के बीच गहरे रिश्ते का खुलासा एनएचआरसी की रिसर्च रिपोर्ट (2004) भी करती है जिसमें कहा गया है कि भारत में हर साल 30 हजार से ज्यादा बच्चों के लापता होने के मामले दर्ज होते हैं. इनमें से एक-तिहाई का पता नहीं चलता है. दक्षिण एशिया में दुनिया के किसी अन्य हिस्से के मुकाबले सर्वाधिक बाल-विवाह भारत में होते हैं. भारत में 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 44.5% (करीब आधी) औरतें ऐसी हैं जिनकी शादियां 18 साल के पहले हुईं हैं. इन 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 22% (करीब एक चौथाई) औरतें ऐसी हैं जो 18 साल के पहले मां बनीं हैं. इन कम उम्र की लड़कियों से 73% (सबसे ज्यादा) बच्चे पैदा हुए हैं. फिलहाल इन बच्चों में 67% (आधे से बहुत ज्यादा) कुपोषण के शिकार हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक बाल-विवाह बच्चियों का जीवन बर्बाद कर रहा है. देश में बच्चों का लिंग अनुपात 976:1000 है, जो कुल लिंग अनुपात 992:1000 के मुकाबले बहुत कम है.

शिक्षा के लिहाज से तो बच्चों की हालात कुछ ज्य़ादा ही पतली है. देश की 40% बस्तियों में तो स्कूल ही नहीं हैं. 48% बच्चे प्राथमिक स्कूलों से दूर हैं. 6 से 14 साल की कुल लड़कियों में से 50% लड़कियां तो स्कूल से ड्राप-आऊट हो जाती हैं.

इन सबके बाबजूद पिछले बजट में बच्चों के हकों से जुड़े कई शब्दों से लेकर ‘सर्व शिक्षा अभियान’ और ‘मिड डे मिल’ जैसे योजनाओं को अपेक्षित जगह नहीं दी गई. कुल बजट में 25% की बढ़ोतरी तो की गई है मगर बच्चों की शिक्षा पर महज 10% की ही बढ़ोतरी हुई. यानी आमतौर पर बढ़ोतरी दर में से बच्चों की शिक्षा में 15% की कमी हुई.

जहां बाल-कल्याण की विभिन्न योजनाएं असफल होती दिख रही हैं, वहीं बच्चों के कल्याण के लिए बजट (2009-10) में राशि का प्रावधान अपेक्षित अनुपात में घोषित नहीं किया जाता है. जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा को अनदेखा किया गया है. अमेरिका, इंग्लैंड और फ्रांस में कुल बजट का 6-7% हिस्सा सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है, मगर भारत में कुल बजट का मात्र 3% शिक्षा और सिर्फ 1% स्वास्थ्य पर खर्च होता है. अगर भारत सरकार यह दावा करती है कि वह बाल कल्याण और सुरक्षा के लिए प्रयासरत है तो उसे इस सवाल का जवाब भी देना होगा कि आखिर स्वास्थ्य की दृष्टि से भारत अपने से भी गरीब कहे जाने वाले पिछड़े देशों से भी पीछे क्यों खड़ा है ?