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30.8.11

कम वेतन वाले परिवारों के बच्चे कुपोषित


कुपोषण और गरीबी दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और देश की प्रगति में बाधक हैं. जिन परिवारों में कुपोषित बच्चे हैं, उनमें से ज्यादा संख्या ऐसे परिवारों की है जिनके सदस्य बुनियादी न्यूनतम मजदूरी भी अर्जित नहीं करते हैं.

जैसा की क्राई भी मानता है कि जिन परिवारों में कुपोषित बच्चे हैं, उनमें से ज्यादा संख्या ऐसे परिवारों की है जिनके सदस्य न्यूनतम मजदूरी भी अर्जित नहीं करते हैं. क्राई और इसके दिल्ली, उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश में स्थित साझेदार संगठनों के अध्ययन में यह बात सामने आई है कि कुपोषण के अधिक मामले अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्गो में हैं. क्राई के मुताबिक़ "ऐसे परिवारों के ज्यादातर लोग दैनिक मजदूरी पाते हैं." अध्ययन के अनुसार दिल्ली की झुग्गियों में रहने वाले 60 प्रतिशत से अधिक बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. क्राई का अध्ययन बताता है, "दिल्ली की 20 प्रतिशत आबादी झुग्गियों में रहती है और इन झुग्गियों में रहने वाले 66 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं."

अध्ययन में सामने आया है कि मध्य प्रदेश में 60 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में 85 प्रतिशत बच्चों में खून की कमी पाई गई है, जबकि 41.6 प्रतिशत का वजन जरूरत से कम है. राष्ट्रीय आंकड़े के मुताबिक 40 प्रतिशत बच्चों का वजन जरूरत से कम है और 45 प्रतिशत की वृद्धि रुकी हुई है.
वर्मा ने सुझाव दिया कि जन वितरण प्रणाली, समेकित बाल विकास परियोजना एवं राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसी विभिन्न योजनाओं में सुधार लाने की जरूरत है तथा समस्या से निजात पाने के लिए कड़ी निगरानी की जरूरत है.

29.4.11

मप्र में 60 फीसदी से ज्यादा बच्चे कुपोषित: क्राई

नई दिल्ली/भोपाल. मध्य प्रदेश एक बार फिर गलत वजह से चर्चा में है। ताजा मामला राज्य में बच्चों के कुपोषण को लेकर है।

बच्चों के अधिकारों की वकालत करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) ने मध्य प्रदेश के दस जिलों में किए गए सर्वे के आधार पर दावा किया है कि यहां कुपोषित बच्चों की संख्या 60 फीसदी से ज्यादा है।

क्राई का कहना है कि पूरे राज्य में आदिवासी समुदाय के 74 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। चौंकाने वाला तथ्य तो यह है कि राजधानी भोपाल की पुनर्वास कॉलोनियों के 49 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार पाए गए हैं।

संस्था के प्रदेश में इस सर्वे को पूरा करने वाले विकास संवाद के प्रशांत दुबे का कहना है कि सिर्फ रीवा जिले में अकेले 83 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार पाए गए हैं।

रीवा में 2006 से 2009 के बीच करीब 15 हजार बच्चों की कुपोषण से मौत हो चुकी है जबकि अन्य जिलों में भी कुपोषित बच्चों का आंकड़ा सरकारी आंकड़े से बहुत अधिक है।

संस्था द्वारा राजधानी भोपाल की पुनर्वास कॉलोनियों में कराए गए शोध के आंकड़े और भी ज्यादा चौंकाने वाले मिले हैं। भोपाल के लगभग 11 रिसेटमेंट कॉलोनियों से इकट्ठा किए गए आंकड़ों से पता चला है कि यहां के 49 फीसदी बच्चे कुपोषण से ग्रसित हैं। जबकि इन्हीं इलाकों के 20 फीसदी बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार पाए गए हैं।

दिल्ली में क्राई की निदेशक योगिता वर्मा का कहना है कि भले राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान राज्य के सभी महिलाओं के मामा होने का दावा करें। लेकिन वे अभी भी राज्य के मासूम बच्चों को कुपोषण से निजात दिलाने में नाकाम साबित हुए हैं।

राज्य बच्चों के बेहतर देखभाल के लिए जरूरी आंगनबाड़ी का भी पूरी इंतजाम नहीं करा पाए हैं। अभी भी पूरे मध्य प्रदेश में लगभग 47 प्रतिशत आंगनबाड़ियों की कमी हैं।

क्राई की निदेशक ने आगे कहा कि राज्य सरकार को सबसे पहले यह कबूलने की जरूरत है कि यहां कुपोषित बच्चों की संख्या सरकारी आंकड़े से कहीं अधिक है, तभी इसे रोकने की सही शुरुआत हो सकेगी।

क्राई के एक अन्य सदस्य आरबी पाल का कहना है कि राज्य में रहने वाले आदिवासी समुदाय के लगभग 74 फीसदी बच्चे भी कुपोषण के शिकार पाए गए हैं।

आरबी का कहना है कि अगर राज्य में कुपोषण को हटाना है तो सरकार को तुरंत आंगनबाड़ी और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत चलने वाले योजनाओं को दुरुस्त करने की जरूरत है। इसके अलावा महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना को भी बेहतर ढंग से लागू करने की दरकार है।

4.11.10

सड़ता अनाज सड़ता तंत्र

शिरीष खरे

सरकार चंद पूंजीपतियों के लिए रियायतों का अंबार लगा रही है और करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा के लिए उसके पास न अनाज है और न पैसे का कोई बंदोबस्त. इंडिया शाइनिंग के इस दौर में सरकार को 50,000 करोड़ से अधिक का अनाज सड़ा देना मंजूर है. नहीं मंजूर है तो 8 करोड़ से ज्यादा लोगों की भूख को मिटाने के वास्ते उस सड़ते हुए अनाज में से गरीबों के लिए थोड़ा-सा हिस्सा बांटना. अकाल और कुपोषण के बीच पिसते किसी देश की जनता के लिए क्या उसकी सरकार इस तरह से भी अमानवीय हो सकती है ?



एक तरफ सरकार पूंजीपतियों के लिए 5 लाख करोड़ रूपए की रियायत देती है और दूसरी तरफ भूखे लोगों के लिए कोई इंतजाम नहीं करती है. उलटा भूखे देश की भूख पर परदे डालने के लिए उदाहरण के लिए मुंबई में 19 रूपए से ज्यादा रूपए कमाने वाले को गरीब नहीं मानती है. हकीकत यह है कि आजादी के 63 सालों में प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता बढ़नी चाहिए थी जो लगातार घटती ही जाती है. आजादी के समय से अबतक प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता 440 ग्राम से 436 ग्राम पर आ गई है और इसी तरह दाल की उपलब्धता भी आधी यानी 70 ग्राम से 35 ग्राम ही रह गई है.

दूसरी तरफ असुरक्षित परिस्थितियों में रखे अनाज के त्वरित वितरण से लाखों लोगों को राहत पहुंचाई जा सकती है. जबकि मौजूदा स्थिति यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के 35 किलो अनाज वितरित करने के आदेश को भी एक तरफ रखते हुए फिलहाल देश के कई इलाकों में अधिकतम 20 से 25 किलो अनाज ही वितरित किया जा रहा है. सर्वोच्च न्यायालय के एक और आदेश की अनदेखी करते हुए कई इलाकों में जनवितरण प्रणाली की दुकानें महीने-महीने भर नहीं खुलतीं हैं. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हर राज्य में एक बड़े गोदाम और जिले में पृथक गोदाम बनाने के लिए भी कहा जा चुका है. मगर खाद्य भंडारणों की क्षमता को बढ़ाने और गोदामों की मरम्मत को लेकर सरकार कभी गंभीर नजर नहीं आई है. लिहाजा देश के कई इलाकों में अनाज के भंडारण की समस्या उपजती जा रही है.

जिस देश में सालाना 6 करोड़ टन गेंहूं और चावल की खरीददारी होती है और जिसकी सयुंक्त भंडारण क्षमता 4 करोड़ 80 लाख टन है, उस देश में 6 साल के भीतर गोदामों में 10 लाख 37 हजार 738 टन अनाज सड़ चुका है. 190 लाख टन अनाज प्लास्टिक सीटों के नीचे रामभरोसे पड़ा हुआ है. हर साल गोदामों की सफाई पर करोड़ों रूपए खर्च करने पर भी 2 लाख टन अनाज सड़ जाता है और जब देश का सर्वोच्च न्यायालय अनाज के एक दाने के बर्बाद होने को अपराध मानते हुए अनाज के सड़ने से पहले उसे निशुल्क बांटने का आदेश देता है तो हमारे केंद्र के कृषि मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक 6,000 टन से भी ज्यादा अनाज के खराब होने के अपराध को नजरअंदाज बनाते हुए उल्टा सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की गलत व्याख्या करते हैं और उसकी मर्यादाओं पर ही सवाल खड़े करते हैं.

1947 के बाद से अब तक अगर हम किसानों की अथक मेहनत से उपजे अनाज का सही इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं और हर साल भारतीय खाद्य निगम की गोदामों में रखीं लाखों अनाज की बोरियां खुले में रखे जाने या बाढ़ आ जाने के चलते खराब हो रही हैं तो क्या सरकार को नहीं लगता कि भोजन से जुड़ी नीति, प्रबंधन और वितरण की व्यवस्थाओं पर नए सिरे से सोचे जाने की जरुरत है ?

देखा जाए तो खाद्य सुरक्षा दूसरा सवाल है. पहला सवाल पूंजीपतियों के लिए देश की आम जनता से उनके संसाधनों को छीने जाने से जुड़ा है. अगर संसाधनों को लगातार यूं ही छीना जाता रहा तो खाद्य के असुरक्षा की स्थितियां सुधरने की बजाय तेजी से बिगड़ती ही जाएंगी. जहां आदिवासियों को उनके जल, जंगल, जमीन से अलग करके उन्हें भूख और बेकारी की ओर ले जाया जा रहा है, वही सेज के नाम पर खुली लूट की जैसे छूट ही दे दी जा रही है. कहने का मतलब है नीतिगत और कानूनी तौर पर सभी लोगों को आजीविका की सुरक्षा को दिये बगैर भोजन के अधिकार की बात बेमतलब ही रहेगी. भोजन केअधिकार से जुड़े कार्यकर्ता मांग कर रहे हैं कि 5 सदस्यों के एक परिवार के लिए 50 किलो अनाज, 5.25 किलो दाल और 2.8 खाद्य तेल दिया जाए. बीपीएल और एपीएल को पात्रता का आधार नहीं बनाया जाए. सार्वजनिक वितरण की व्यवस्था के साथ-साथ सरकारी खरीदी और वितरण की विकेन्द्रीकृत व्यवस्था हो. व्यक्ति/एकल परिवार को इकाई माना जाए और राशन कार्ड महिलाओं के नाम पर हो. जल स्त्रोत पर पहला अधिकार खेती का हो. इसके साथ ही यह भी नहीं भुलाया जा सकता कि आजादी की बाद से अबतक विकास की विभिन्न परियोजनाओं और कारणों के चलते 6 करोड़ बच्चों का भी पलायन हुआ है. मगर बच्चों के मुद्दे अनदेखे ही रहे हैं और उनके लिए खाद्य सुरक्षा की गारंटी दिये बगैर विकास के तमाम दावे बेबुनियाद ही रहेंगे. इसे भी असंवेदनशीलता का चरम ही कहेंगे कि एक सेकेण्ड के भीतर 5 साल के नीचे का एक बच्चा कुपोषण की चपेट में आ जाने के बावजूद कोई नीतिगत फैसला लेने की बात तो दूर ठोस कार्यवाही की रूपरेखा तक नहीं बन पा रही है. अगर कुपोषण और भूख के चलते देश का आने वाला कल कहे जाने वाले 47 प्रतिशत बच्चों का अपनी उम्र के अनुपात में लंबाई और वजन नहीं बढ़ पाता है तो इसे किस विकास का सूचक समझा जाए ?

अंतत: अनाज का साद जाना एक अमानवीय और आपराधिक प्रवृति है और देश में अनाज भंडारण की उचित व्यवस्था और बेहतर विकल्प तलाशने लिए एक ऐसे संवेदनशील और पारदर्शी तंत्र विकसित करने की भी जरुरत है जो भूख से जुड़े विभिन्न पहलूओं पर कारगार ढ़ंग से शिनाख्त और कार्यवाही करने में सक्षम हो. अन्यथा हर साल लाखों टन अनाज खराब होने, अनाज की कीमत आसमान छूने, खेती के संकट, सूखे की मार और गरीबों के पेट खाली होने से जुड़े समाचारों पर परदे डालने के लिए हमारे पास आर्थिक शक्तियों का दिखावा करने वाली राष्ट्रमंडल खेलों की सुर्ख़ियों के अलावा कुछ नहीं होगा ?



23.9.10

अपनी थाली कित्ती खाली

शिरीष खरे

भारत की भूख अब विकराल रुप ले चुकी है. यहाँ सामान्य (प्रोटीन ऊर्जा) कुपोषण की स्थिति अब गरीब अफ्रीकी देशों से भी बदतर हो चुकी है. आधिकारिक आकड़ों के हवाले से स्कूल जाने वाला देश का हर दूसरा बच्चा सामान्य या फिर अति कुपोषण का शिकार बन रहा है. देश की 44 प्रतिशत जनता अंतर्राष्ट्रीय मानक (1 डालर प्रतिदिन) से कम कमा पाती है. 70 प्रतिशत ग्रामीण आबादी में कुपोषण और भूख की मात्रा बहुत ज्यादा है. खासकर पिछड़ी अनुसूचित जातियों, जनजातियों, औरतों और 5 साल तक के बच्चों में. कुपोषण और भूख के चलते देश का आने वाला कल कहे जाने वाले 47 प्रतिशत बच्चों का अपनी उम्र के अनुपात में लंबाई और वजन नहीं बढ़ पाता है. कुपोषण के चलते ही 20 से 49 साल की 50 प्रतिशत औरतों में खून की कमी हो जाती है. अगर 200 लाख टन खाद्यान्न गोदामों में हो तो कहते हैं खाद्य की स्थिति काबू में रहती हैं. जबकि गोदामों में 608.79 टन खाद्यान्न है. इसके बावजूद 23 करोड़ यानी 21 प्रतिशत से कही ज्यादा भारतीय भूखे और कुपोषित हैं. मगर खाद्यान्न गोदामों से गरीबों की थाली तक नहीं पहुँच पा रहा है और सालाना प्रति व्यव्क्ति भोजन की उपलब्धता एक सौ पैंतालीस किलोग्राम से भी लगातार घटती जा रही है.

संयुक्त राष्ट्र की 'विश्व खाद्य कार्यक्रम' द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के ग्रामीण इलाकों में आहार-असुरक्षा की स्थिति अत्यंत गंभीर है. झारखंड के उदाहरण से अगर ग्रामीण इलाकों में आहार-असुरक्षा की स्थिति का जायजा लें तो 'न्यूट्रीशनल इनटेक इन इंडिया' के मुताबिक झारखंड के ग्रामीण इलाकों के 75 प्रतिशत आबादी को कैलोरी उपभोग का 75 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ अनाज से हासिल होता है. इस राज्य के संथाल परगना में आदिवासी समूहों को साल में कई बार भूख सताती है. ‘राष्ट्रीय प्रतिदर्श संस्थान’ के अनुमानों के मुताबिक यहाँ 10.4 प्रतिशत परिवारों को मौसमी भूख तथा 25 प्रतिशत परिवारों को लगातार भूख का सामना करना पड़ता हैं. पूरी खाद्य सुरक्षा 3 से 4 महीने तक ही रहती है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 के आकलन से पता चलता है कि उम्र के लिहाज से औसत लंबाई मगर कम वजन के बच्चों (तीन साल तक की उम्र वाले) की तादाद झारखण्ड में 31.1 प्रतिशत है. यहाँ भुखमरी के कारणों में वर्षा की अनिश्चितता, एक फसलीय खेती, सिंचाई की अल्प सुविधा, घटते हुए वन, बढ़ती आबादी और भूमि की कम उत्पादकता का जिक्र किया जाता है.

आमतौर पर सरकार भूख से होने वाली मौतों के मामलों को छिपाती है. जैसे कि मुझे याद है कि सितम्बर 2004 को मोहनपुर प्रखंड के विभिन्न गांवों में 7 दिनों के अंदर भूख से 3 लोगों की मौतें हुईं थीं. बतरूवाहीड गाँव वालों का कहना था कि मृतक चमरू सिंह चारवाहे का काम करता था. खेती लायक थोड़ी जमीन भी थी जो उसने अपनी बेटी की शादी के चलते गिरवी रख दी. उसके घर में दो जवान बेटिया और हैं. उन्हीं की शादी की चिंता में वह कमजोर होता गया. घरवालों ने बताया कि मरने के पहले तक वह ‘भूख-भूख’ कह कर तड़प रहा था. उस समय घर में खाने के लिए एक दाना तक नहीं था. वहीं चरकी पहड़ी में 60 साल की वंशी मांझी ने भूख से लड़ते हुए दम तोड़ दिया. वह नि-संतान था. घर में कमाने वाला कोई नहीं था. तीसरी मौत जगरनाथी गाँव में हुई थी. वहाँ जागेश्वर महतो पानी भरने का काम करता था. घटना के दिन वह चावल लाने गया था. बहुत भूख था इसलिए रास्ते में ही बेहोश होकर गिर गया. बाद में उसकी मौत हो गई. इन मौतों की खबर सुनते ही कई राजनैतिक दलों के नेता आए. सबने प्रशासन की लापरवाही बताया. उसी साल संताल परगना में 10 लोगों की मौतें हुईं थीं. मगर वह चुनावी साल नहीं था इसलिए मामला ठण्डे बस्ते में रहा.

झारखंड सहित पूरे भारत में भूख का हाल इसलिए और विरोधाभाषी नजर आता है क्योंकि हर राज्य में अनाज के सरकारी गोदाम भरे हुए है मगर प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता में कमी आ रही है. इससे संकेत मिलते हैं कि ग्रामीण भारत के लोगों के पास खरीददारी की ताकत कम होती जा रही है और जिसके चलते न खरीदा हुआ अनाज गोदामों में पड़ा हुआ है. इससे एक तरफ ग्रामीण भारत में खेतिहर संकट गहराया और दूसरी तरफ अनाज के सरकारी गोदामों में अनाज सड़ता रहा है. वहीं राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण द्वारा प्रस्तुत 61वें दौर के आकलन के अनुसार 81 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों और 67 प्रतिशत शहरी परिवारों के पास ही राशन कार्ड है. बीपीएल कार्ड 26.5 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों और 10.5 प्रतिशत शहरी परिवारों को प्राप्त हैं. अंत्योदय योजना के अंतर्गत दिया जाने वाला कार्ड 1 प्रतिशत से भी कम ग्रामीण और शहरी परिवारों को प्राप्त हैं. ग्रामीण इलाके में अनुसूचित जनजाति के 5 प्रतिशत और अनुसूचित जाति के 4.5 प्रतिशत परिवारों के पास अंत्योदय कार्ड हैं. जबकि ग्रामीण इलाकों में अनुसूचित जाति के 40 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति के 35 प्रतिशत परिवारों के पास बीपीएल कार्ड हैं. इसी तरह ग्रामीण इलाकों में 57 प्रतिशत खेतिहर-मजदूर परिवारों के पास बीपीएल कार्ड नहीं हैं. जबकि खेती से अलग मजदूरी करने वाले 65 प्रतिशत परिवारों के पास बीपीएल कार्ड नहीं है. 22.7 प्रतिशत उचित मूल्य की दुकानें कुल लागत पूंजी पर 12 प्रतिशत लौटा पाने में सफल हो पा रही हैं. सरकार द्वारा बीपीएल परिवारों को मिलने 35 किलो अनाज में से कटौती करते हुए प्रति 20 परिवार किलो अनाज वितरित किया जा रहा है. जबकि गरीब परिवारों की पहचान ठीक तरह से न हो पाने के चलते बड़ी संख्या में गरीब परिवारों को टीडीपीएस यानी टारगेटेड पब्लिक डिस्ट्रब्यूशन से बाहर हो जाना पड़ा है. आकलन के मुताबिक सिर्फ 57 प्रतिशत गरीब परिवारों को टीडीपीएस की सुरक्षा हासिल हो पायी है. 2003-04 में टीडीपीएस के तहत 7258 करोड़ रुपए का अनुदान दिया गया. मगर सिर्फ 4123 करोड़ रुपए का ही अनुदान बीपीएल परिवारों के हाथ आया. बाकी का अनुदान ग्राहक तक न पहुँचते हुए आपूर्ति-तंत्र से जुड़ी कई एजेंसियों के बीच पहुँच गया.

इसी तरह झारखंड सहित पूरे भारत में भूख जुड़ी शब्दावली को लेकर कोई तर्कसंगत परिभाषाएं नहीं बनी हैं. यहाँ भूख से मौतों के वैज्ञानिक मापदंड खोजने और उन्हें तय करने की कोशिश भी नहीं हुई हैं. आज भुखमरी एक तकनीकि सवाल बन चुका है. मगर यह सामाजिक और आर्थिक असमानता से भी गहराई से जुड़ा हुआ है. जिसे समझने की जरूरत है. असल में आर्थिक विकास का संतुलित ढ़ांचा और उचित वितरण का तरीका ही भूख की समस्या को सुलझा सकता है. रोजगार के अवसरों, आर्थिक साधनों की प्राप्ति और भोजन की सामग्री पर रियायत बरतना जरूरी हो गया है. गरीबों को लक्ष्य बनाकर उनको फायदा पहुँचाने के लिए खाद्यान्न के वितरण के खास तरीकों को अपनाने की जरुरत है. 

15.9.10

गर्त में गये गांव

शिरीष खरे





गांवों की कहानी आकड़ों की जुबानी : 2021 तक भारत में महानगरों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा होगी और हर महानगर में 1 करोड़ से ज्यादा लोग रह रहे होंगे. अमेरिकन इंडिया फाऊंडेशन ऐसा मानता है और वहीं भारत सरकार की जनगणना के मुताबिक भी बीते एक दशक में गांवों से तकरीबन 10 करोड़ लोगों ने पलायन किया है. जबकि निवास स्थान छोड़ने के आधार पर 30 करोड़ 90 हजार लोगों ने अपना निवास स्थान छोड़ा है. योजना आयोग के मुताबिक 1999-2000 में अप्रवासी मजदूरों की कुल संख्या 10 करोड़ 27 हजार थी. जबकि मौसमी पलायन करने वालों की संख्या 2 करोड़ से ज्यादा अनुमानित की गई. कई जानकारों की राय में असली संख्या सरकारी आंकड़े से 10 गुना ज्यादा भी हो सकती है.

2000 की राष्ट्रीय कृषि नीति में कहा गया था कि कृषि अपेक्षाकृत लाभ का पेशा नहीं रह गया है. योजना आयोग के मुताबिक 1990 के दशक के मध्यवर्ती सालों में कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों की बढ़ोत्तरी घटती चली गई है. सिंचाई के साधन वाले भूमि क्षेत्र और सिंचाई के लिए बारिश के पानी पर निर्भर भूमि क्षेत्र के बीच आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है. विश्व-बाजार में मूल्यों का तेज उतार-चढ़ाव से नकदी फसलों का उत्पादन करने वाले क्षेत्रों को घाटा उठाना पड़ रहा है. इसके चलते बड़ी संख्या में किसानों द्वारा खेती का काम छोड़कर शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं. बीते लंबे अरसे से कृषि में लाभ की स्थितियों के मुकाबले लागत और जोखिम लगातार बढ़ रहे हैं और सरकारी सहायता लगातार कम होती जा रही है. 1960 में प्रति किसान भूस्वामित्व की ईकाई का आकार 2.6 हेक्टेयर था जो 2000 में घटकर 1.4 हेक्टेयर रह गया. कुलमिलाकर बीते चार दशकों में भूस्वामित्व की ईकाई का आकार 60% घटा है. भारत के किसानों को मिलने वाली सब्सिडी(66 डॉलर) विकसित देशों जैसे अमेरिका के किसानों को मिलने वाली सब्सिडी(21 हजार डॉलर) के मुकाबले न के बराबर है. 1995 में कुल आबादी का 54.6% हिस्सा खेतिहर आबादी का था जो 2005 में घटकर 49.9% रह गया.

योजना आयोग के मुताबिक 1983 से 1994 के बीच रोजगार में बढ़ोत्तरी की दर 2.03 % थी जो साल 1994 से 2005 के बीच घटकर 1.85% हो गई. 2005 में असंगठित क्षेत्र में खेतिहर मजदूरों की संख्या 98% थी. तकरीबन खेतिहर मजदूरों में 64% का अपना रोजगार है जबकि 36% दिहाड़ी मजदूर हैं. 1983 से 1994 के बीच रोजगार की दर 1.04% थी जो 1994 से 2005 के बीच घटकर 0.08% हो गई. 1994 से 2005 के बीच बेरोजगारी की दर में 1% की बढ़ोतरी हुई. इसी तरह, 1983 से 1994 के बीच रोजगार की बढ़ोतरी की दर 2.03% थी जो 1994 से 2005 के बीच घटकर 1.85% हो गई. योजना आयोग के अनुसार एक किसान परिवार का औसत मासिक खर्च 2770 रुपये है जबकि खेती के अलावा दिहाड़ी मजदूरी सहित अन्य स्रोतों से उसकी औसत मासिक आमदनी 2115 रुपये होती है. जाहिर है एक किसान परिवार का औसत मासिक खर्च उसकी मासिक आमदनी से तकरीबन 25% ज्यादा है. इसीलिये भारतीय किसानों को कर्ज लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है.

बीते 12 सालों में 2 लाख किसानों ने आत्महत्याएं की हैं. इनमें से अधिकतर किसान कपास और सूरजमुखी जैसी नकदी फसल की खेती करने वाले रहे हैं. उत्पादन की लागत बढ़ने के चलते ऐसे किसानों को साहूकारों से ऊंचे ब्याज दर पर कर्ज लेना पड़ा है. कीटनाशक और उर्वरक बेचने वाली कंपनियों ने महाराष्ट्र और कर्नाटक में किसानों को कर्ज देना शुरु किया, जिससे किसानों के पर कर्ज का बोझ और बढ़ गया. एक तो गरीब किसानों की आमदनी बहुत कम है और कर्ज लेने के कारण (शादी ब्याह वगैरह) कहीं ज्यादा होने से वह भंवरजाल से निकल नहीं पा रहे हैं.

योजना आयोग द्वारा प्रस्तुत ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के मुताबिक ग्रामीण गरीबों की कुल संख्या का 41% हिस्सा खेतिहर-मजदूर वर्ग से है. जबकि ग्रामीण गरीबों की कुल संख्या का 80% हिस्सा अनसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग से हैं. खाद्य व कृषि संगठन द्वारा विश्व में आहार-असुरक्षा की स्थिति पर जारी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में तकरीबन 23 करोड़ यानी 21% लोगों को रोजाना भर पेट भोजन नहीं मिलता है. 1983 में ग्रामीण भारत के हर आदमी को रोजाना औसतन 2309 किलो कैलोरी का आहार हासिल था जो साल 1998 में घटकर 2011 किलो कैलोरी रह गया. 1990 के दशक में मजदूरों और किसानों की खरीददारी की क्षमता में काफी कमी आई. इससे जहां ग्रामीण भारत में खेतिहर संकट गहराया तो वहीं अनाज के सरकारी गोदामों में अनाज सड़ता रहा. न्यूट्रिशनल इंटेक इन इंडिया के मुताबिक 1993-94 में प्रतिव्यक्ति रोजाना औसत कैलोरी उपभोग की मात्रा 2153 किलो कैलोरी थी जो साल 2004-05 में घटकर 2047 किलो कैलोरी हो गई. इस तरह कुल 106 किलो कैलोरी की कमी आई. ग्रामीण इलाकों में तकरीबन 66% आबादी रोजाना 2700 किलो कैलोरी से कम का उपभोग करती है. विश्वबैंक के अनुसार औसत से कम वजन के सबसे ज्यादा बच्चे भारत में ही हैं. भारत में 5 राज्यों और 50% गांवों में कुल कुपोषितों की तादाद का 80% हिस्सा रहता है. 5 साल से कम उम्र के 75% बच्चों में आयरन की कमी है और 57% बच्चों में विटामिन ए की कमी से पैदा होने वाले रोग के लक्षण हैं. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के दौरान औसत से कम वजन के बच्चों की संख्या शहरों के(38%) मुकाबले गांवों में(50%) ज्यादा पाई गई. जबकि औसत से कम वजन के बच्चों की संख्या में लड़कों(45%) की तुलना में लड़कियों(53.2%) ज्यादा पाई गईं. अगर जातिगत आधार पर देखा जाए तो अनुसूचित जाति के बच्चों में 53% और अनुसूचित जनजाति के बच्चों में 56% बच्चे औसत से कम वजन के पाये गए. जबकि बाकी जातियों में उनकी संख्या 44% है. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार ग्रामीण भारत में 18.7% परिवारों के पास सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत जारी किया जाने वाला कोई भी कार्ड नहीं है.

एनुअल स्टेटस् ऑव एजुकेशन रिपोर्ट( असर) 2008 के मुताबिक ग्रामीण इलाकों के अनुसूचित जनजाति के तबके में साक्षरता दर सबसे कम(42%) पायी गई है. जबकि अनुसूचित जाति के के तबके में साक्षरता दर(47%) है. सबसे कम भूमि पर अधिकार रखने वाले वर्ग में साक्षरता दर 52% है. जबकि सबसे बड़े आकार की ज्यादा भूमि पर अधिकार रखने वाले वर्ग में साक्षरता दर 64% है. शिक्षा के हर पैमाने पर पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की मौजूदगी कम है. ग्रामीण इलाके की महिलाओं और पुरुषों के बीच साक्षरता दर क्रमशः 51.1% और 68.4%,पायी गई. 2009 में 5 साल की उम्र वाले 50% बच्चे ही स्कूलों में नामांकित पाये गए.

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के मुताबिक तकरीबन 25% भारतीय सिर्फ अस्पताली खर्चे के कारण गरीबी रेखा से नीचे हैं. महज 10% भारतीयों के पास कोई न कोई स्वास्थ्य बीमा है और ये बीमा भी उनकी जरुरतों के मुताबिक नहीं है. वॉलेंटेरी हैल्थ एसोशिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक डॉक्टरों की संख्या कम होना भी एक बड़ी समस्या है. देश में एक हजार की आबादी पर महज 0.6 एमबीबीएस डॉक्टर ही हैं. इसी तरह दवाइयों के दामों में तेज गति से बढ़ोतरी हुई है. मरीज को उपचार के लिए अपने खर्च का औसतन 75% हिस्सा दवाइयों पर न्यौछावर करना पड़ता है. दवाइयां मंहगी होने की मुख्य वजहों में नये पेटेंट कानून, दवा निर्माताओं के ऊपर कानूनों का उचित तरीके से लागू न होना और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक दवाओं का बाजार में प्रचलित होना है. यह भी दक्षिण के राज्यों या धनी राज्यों में ज्यादा हैं. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 के अनुसार गांवों में 43% महिलाओं को प्रसव से पहले कम से कम तीन बार अनिवार्य रूप से चिकित्सा की सुविधा मिल पाती है. शिशु-मृत्यु दर के मामले में प्रति हजार नवजात शिशुओं में से औसतन 60 काल के गाल में समा जाते हैं. 12-13 महीने के नवजात शिशुओं में से महज 44% को ही सभी प्रकार के रोग-प्रतिरोधी टीके लग पाते हैं.

भारत का मानव विकास सूचकांक 0.619 है. यह कुल 177 देशों के बीच 128 वां स्थान दर्शाता है. भारत का मानव-निर्धनता सूचकांक 31.3 है, जो 108 देशों के बीच 67वां स्थान स्थान दर्शाता है. मानवीय विकास का यह आकलन उजागर कर देता है कि कि भारत के नागरिक स्वस्थ और दीर्घायु जीवन जीने में कहां तक समर्थ हैं. इससे यह भी उजागर होता है कि भारत के नागरिक कहां तक शिक्षित हैं और मानव विकास के सूचकांक पर उनका जीवन स्तर कैसा है. 

13.9.10

बाल अधिकारों के बीस साल बाद

शिरीष खरे


आज से बीस साल पहले 1989 को सयुंक्त राष्ट्र द्वारा पारित बाल-अधिकारों के कन्वेंशन के जरिए बच्चों के लिए एक बेहतर, स्वस्थ्य और सुरक्षित दुनिया का लक्ष्य रखा गया था. मगर समय के दप दशक गुजर जाने के बाद आज बच्चों की यह दुनिया कहीं बदतर, असुरक्षित और बीमार दिखाई देती है. हालांकि इस दुनिया में उप-सहारीय अफ्रीका और दक्षिण-एशिया के देशों की हालत बहुत पतली है. मगर इन देशों के बीच भारत की हालत और भी खराब दिखाई देती है. मामले चाहे भूख, गरीबी, शोषण, रोग तथा बच्चों के साथ बरते जाने वाले दुर्व्यवहार से जुड़े हों या प्राथमिक स्वास्थ्य और शिक्षण सुविधाओं से ताल्लुक रखने वाले आकड़ों और तथ्यों से हों, कुलमिलाकर भारत की हालत अत्यंत दयनीय बन पड़ी है.

युनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि 5 साल तक की उम्र के बच्चों की मौतों के क्रम में भारत बहुत आगे खड़ा मिलता है. यह रिपोर्ट 5 साल तक की उम्र के बच्चों की मौतों को समग्र विकास का एक निर्णायक पैमाना मानते हुए जाहिर करती है कि इस पैमाने पर भारत का स्थान 49वां है. यह स्थान पड़ौसी देश बांग्लादेश(58वां स्थान) और नेपाल(60वां स्थान) से थोड़ा सा ही अच्छा है. जबकि दक्षिण एशिया में बाल-मृत्यु के पैमाने पर सबसे अच्छी स्थिति श्रीलंका (15वां स्थान) की है.

'द स्टेट ऑव द वर्ल्डस् चिल्ड्रेन' के नाम से जारी होने वाली युनिसेफ की इस रिपोर्ट का मकसद बाल-अधिकारों से जुड़े वैश्विक कंवेंशन का विकास, विस्तार, उपलब्धियों और चुनौतियों को जांचना होता है. इस रिपोर्ट में एक सकारात्मक तथ्य यह है कि साल 1990 के बाद से 5 साल तक की उम्र के बच्चों के बीच औसत से कम वजन वाले बच्चों की संख्या दुनियाभर में कम हुई है. यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है खासकर से तब जबकि 5 साल तक की उम्र के बच्चों के बीच मृत्यु-दर अब भी काफी ऊंची बनी हुई है. उप-सहारीय अफ्रीका तथा दक्षिण-एशिया बाल-विवाह और बाल-मजदूरी के मामले काफी गंभीर और बहुतायत में पाए जाते हैं. रिपोर्ट आगाह करती है कि अगर हम वाकई बाल-अधिकारों से जुड़ी हुईं समस्याओं का समाधान करना चाहते हैं तो इसके लिए हमें नए सिरे से सोचते हुए पुराने तौर-तरीकों को बदलने की जरुरत होगी. संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के मुताबिक बाल-अधिकारों का दायरा भी बढ़ाये जाने की जरुरत है.

भारत में सरकारी आकड़ों के हवाले से देश की 37.2% आबादी गरीबी रेखा के नीचे है. यह दर्शाती है कि देश में गरीबी बहुत तेजी से बढ़ रही है. यही वजह है कि अर्थव्यवस्था से जुड़े तमाम बड़े दावों के बावजूद देश में 5 साल से कम उम्र के 48% बच्चे सामान्य से कमजोर जीवन जीने को मजबूर हो रहे हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया के कुल कुपोषित बच्चों में से 49% भारत में पाये गए हैं. कमरतोड़ मंहगाई के साथ-साथ यहां एक सेकेण्ड के भीतर 5 साल के नीचे का एक बच्चा कुपोषण की चपेट में आ जाता है. भारत में 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 44.5% (करीब आधी) औरतें ऐसी हैं जिनकी शादियां 18 साल के पहले हुईं हैं. इन 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 22% (करीब एक चौथाई) औरतें ऐसी हैं जो 18 साल के पहले मां बनीं हैं. इन कम उम्र की लड़कियों से 73% (सबसे ज्यादा) बच्चे पैदा हुए हैं. फिलहाल इन बच्चों में 67% (आधे से बहुत ज्यादा) कुपोषण के शिकार हैं. देश की 40% बस्तियों में तो स्कूल ही नहीं हैं. 48% बच्चे प्राथमिक स्कूलों से दूर हैं. 6 से 14 साल की कुल लड़कियों में से 50% लड़कियां तो स्कूल से ड्राप-आऊट हो जाती हैं. लड़कियों के लिए सरकार भले ही `सशक्तिकरण के लिए शिक्षा´ जैसे नारे देती रहे मगर नारे देना जितने आसान हैं, लक्ष्य तक पहुंचना उतना ही मुश्किल हो रहा है. क्योंकि आखिरी जनगणना के मुताबिक भी देश की 49.46 करोड़ महिलाओं में से सिर्फ 53.67% साक्षर हैं. मतलब 22.91 करोड़ महिलाएं निरक्षर हैं. एशिया महाद्वीप में भारत की महिला साक्षरता दर सबसे कम है. क्राई के मुताबिक भारत में 5 से 9 साल की 53 फीसदी लड़कियां पढ़ना नहीं जानती. इनमें से ज्यादातर रोटी के चक्कर में घर या बाहर काम करती हैं. इसी तरह जहां पूरी दुनिया में 24.6 करोड़ बाल मजदूर हैं, वहीं केंद्र सरकार के अनुसार अकेले अपने देश में 1.7 करोड़ बाल मजदूर हैं और जिनमें से भी 12 लाख खतरनाक उद्योगों में काम कर रहे हैं.

8.9.10

भूख की पेट में गए मध्य प्रदेश के 28 आदिवासी बच्चे

शिरीष खरे

एएचआरसी यानी एशियन ह्यूमन राइटस् कमीशन के अनुसार मध्यप्रदेश में 28 बच्चों ने कुपोषण के चलते दम तोड़ दिया है. पीडित बच्चों के परिवार सरकारी योजनाओं के तहत भोजन और स्वास्थ्य के मद में दी जाने वाली सहायता से भी दूर हैं.

एएचआरसी ने अपनी सूचना का आधार मध्यप्रदेश की एक संस्था लोक 'संघर्षमंच' और प्रदेश में चलाये जा रहे 'भोजन के अधिकार अभियान' की एक मौका मुआयना पर आधारित रिपोर्ट को बनाया है. इस रिपोर्ट के आधार पर एएचआरसी ने आशंका जतायी है कि आने वाले दिनों में मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाकों के कई और बच्चे भुखमरी के शिकार हो सकते हैं.

एएचआरसी ने भुखमरी की चपेट में आएं बच्चों की स्थिति को बयान करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश, संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा भोजन के अधिकार के संदर्भ में नियुक्त विशेष प्रतिनिधि और बाल अधिकारों की समिति को पत्र लिखा है और उनसे तुरंत हस्तक्षेप की मांग की है.

ज्यादातर मामलों के विवरणों से पता चला है कि बच्चे कुपोषण और चिकित्सीय देखरेख के अभाव में उन बीमारियों की चपेट में आएं हैं जिनका इलाज बहुत आसानी से हो सकता था. गौरतलब है कि प्रदेश में बीते दो महीने से कुपोषण से ज्यादातर आदिवासी बच्चों की मौतें हुई हैं. कुपोषण के शिकार ज्यादातर बच्चे आदिवासी बहुल जिले झाबुआ के मेघनगर प्रखंड से पाएं गए हैं.

प्रशासनिक असंवेदनशीलता की हद यह है कि पीड़ित बच्चों के परिवारों को बीपीएल कार्ड तक हासिल नहीं हो पाएं हैं. जबकि यह सारे परिवार सीमांत किसान हैं और उन्हें खेती के लिए सिंचाई की सुविधा या कोई अन्य राजकीय मदद भी नहीं मिल रही है. इस इलाके में जिस परिवार के पास थोड़ी सी भी जमीन है उसे बीपीएल से ऊपर दिखाया गया है, भले ही वह जमीन कितनी भी कम और बंजर ही क्यों न हो. जाहिर है ऐसा परिवार अब भी भोजन और स्वास्थ्य सुविधा के मामले में सरकारी मदद का हकदार नहीं बन सका है.

एएचआरसी के अनुसार पीड़ित बच्चों के परिवार वालों को काम के अभाव में गांव से पलायन करना पड़ा है और उन्हें मनरेगा के अधिकार से दूर रखा गया है. मनरेगा के तहत दिये जाने वाले जॉबकार्ड के हर धारक को गुजरे साल जहां बामुश्किल 15 दिनों का काम ही दिया गया है, वहीं ऐसे लोगों को अब भी उनकी मजदूरी नहीं मिली है. जबकि गांवों में सामाजिक अंकेक्षण की प्रकिया भी पूरी कर ली गई है. अजब है कि एक तरफ गांवों में बच्चों की कुपोषण से हो रही मौतें रुकती नहीं हैं और दूसरी तरफ मनरेगा के सामाजिक अंकेक्षण में एक भी कमी दिखाई नहीं देती है.

31.8.10

कितने असुरक्षित सुरक्षित देश के बच्चे

शिरीष खरे

क्या आप जानते हैं कि भारत के ग्रामीण इलाकों में तीन साल से कम उम्र के 40% बच्चों का वजन औसत से कम है, जबकि 45% का विकास सही तरीके से नहीं हो पाता है. बच्चों को पोषणयुक्त भोजन मुहैया कराने के मामले में भारत अपने पड़ोसी देश बांग्लादेश और नेपाल से भी पीछे है. बच्चों को पोषणयुक्त भोजन मुहैया कराने के मामले में 51 देशों के बीच भारत का स्थान 22वां है.

सरकारी आकड़ों के लिहाज से देश की 37.2% आबादी गरीबी रेखा के नीचे है. जो दर्शाती है कि देश में गरीबी बहुत तेजी से बढ़ रही है. यानी जितना हम सोचते हैं उससे कहीं ज्यादा बच्चे गरीबी में जीने को मजबूर हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के कुल कुपोषित बच्चों में से 49% भारत में हैं. अर्थव्यवस्था से जुड़े तमाम बड़े बड़े दावों के बावजूद भारत में बच्चों की कुपोषण से होने वाली मौतें बढ़ती ही जा रही हैं. देश में एक सेकेण्ड के भीतर 5 साल के नीचे का एक बच्चा कुपोषण के कब्जे में आ जाता है.

इसी तरह देश के 3.5 करोड़ बच्चे बेघर हैं जिनमें से 35000 बच्चों को ही आश्रय मिल सके हैं. इन आश्रयों में से भी बहुत सारे गैर सरकारी संगठनों द्वारा चलाये जा रहे हैं. मानवाधिकार संगठन के मुताबिक फुटपाथ पर रात बिताने वाले करीब 1 करोड़ बच्चों में से ज्यादातर को यौन-शोषण और सामूहिक हिंसा झेलनी पड़ती हैं. दिल्ली में जून 2008 से लेकर जनवरी 2009 तक 2210 बच्चे लापता हुए हैं. दिल्ली में एक दिन में औसतन 17 बच्चे गायब हो रहे हैं. गैर-सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में हर साल 72 लाख बच्चे गुलामी का शिकार हो रहे हैं. इनमें से एक तिहाई दक्षिण एशियाई देशों के होते हैं. गैर-सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर साल 45 हजार बच्चे गायब हो रहे हैं. अध्ययन कहते हैं कि गायब हुए बच्चों से मजदूरी कराई जाती है, या उन्हें सेक्स वर्कर बना दिया जाता है.

हालांकि केंद्र सरकार उन राज्य सरकारों के प्रति नाराजगी जताती रही है है जो केंद्र की समेकित बाल संरक्षण योजना पर हस्ताक्षर तो चुके हैं मगर उसके बाद से अपने यहां बाल संरक्षण आयोग का गठन तक नहीं कर सके हैं. कुपोषण, असुरक्षा जैसी तमाम समस्याओं की मार झेलते भारतीय बच्चों की एक बड़ी समस्या अनेक कारणों से की जाने वाली मजदूरी भी है. बाल अधिकारों से जुड़ी अनेक अंतरराष्ट्रीय संधियों का हस्ताक्षरकर्त्ता होने के बावजूद भारत बाल मजदूरों का गढ़ बन चुका है. पूरी दुनिया में 24.6 करोड़ बाल मजदूर हैं, जबकि केंद्र सरकार के अनुसार देश में 1.7 करोड़ बाल मजदूर हैं जिनमें से 12 लाख खतरनाक उघोगों में काम करते हैं. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के बाल मजदूरी से जुड़े आकड़ों के मुताबिक सेक्स इंडस्ट्री में खासतौर से लड़कियों की तस्करी विभिन्न यौन गतिविधियों के लिए हो रही है. इसी तरह घरेलू मजदूरी में भी लड़कियों की संख्या सबसे ज्यादा होती है.

तस्करी और लापता बच्चों के बीच गहरे रिश्ते का खुलासा एनएचआरसी की रिसर्च रिपोर्ट (2004) भी करती है जिसमें कहा गया है कि भारत में हर साल 30 हजार से ज्यादा बच्चों के लापता होने के मामले दर्ज होते हैं. इनमें से एक-तिहाई का पता नहीं चलता है. दक्षिण एशिया में दुनिया के किसी अन्य हिस्से के मुकाबले सर्वाधिक बाल-विवाह भारत में होते हैं. भारत में 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 44.5% (करीब आधी) औरतें ऐसी हैं जिनकी शादियां 18 साल के पहले हुईं हैं. इन 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 22% (करीब एक चौथाई) औरतें ऐसी हैं जो 18 साल के पहले मां बनीं हैं. इन कम उम्र की लड़कियों से 73% (सबसे ज्यादा) बच्चे पैदा हुए हैं. फिलहाल इन बच्चों में 67% (आधे से बहुत ज्यादा) कुपोषण के शिकार हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक बाल-विवाह बच्चियों का जीवन बर्बाद कर रहा है. देश में बच्चों का लिंग अनुपात 976:1000 है, जो कुल लिंग अनुपात 992:1000 के मुकाबले बहुत कम है.

शिक्षा के लिहाज से तो बच्चों की हालात कुछ ज्य़ादा ही पतली है. देश की 40% बस्तियों में तो स्कूल ही नहीं हैं. 48% बच्चे प्राथमिक स्कूलों से दूर हैं. 6 से 14 साल की कुल लड़कियों में से 50% लड़कियां तो स्कूल से ड्राप-आऊट हो जाती हैं.

इन सबके बाबजूद पिछले बजट में बच्चों के हकों से जुड़े कई शब्दों से लेकर ‘सर्व शिक्षा अभियान’ और ‘मिड डे मिल’ जैसे योजनाओं को अपेक्षित जगह नहीं दी गई. कुल बजट में 25% की बढ़ोतरी तो की गई है मगर बच्चों की शिक्षा पर महज 10% की ही बढ़ोतरी हुई. यानी आमतौर पर बढ़ोतरी दर में से बच्चों की शिक्षा में 15% की कमी हुई.

जहां बाल-कल्याण की विभिन्न योजनाएं असफल होती दिख रही हैं, वहीं बच्चों के कल्याण के लिए बजट (2009-10) में राशि का प्रावधान अपेक्षित अनुपात में घोषित नहीं किया जाता है. जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा को अनदेखा किया गया है. अमेरिका, इंग्लैंड और फ्रांस में कुल बजट का 6-7% हिस्सा सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है, मगर भारत में कुल बजट का मात्र 3% शिक्षा और सिर्फ 1% स्वास्थ्य पर खर्च होता है. अगर भारत सरकार यह दावा करती है कि वह बाल कल्याण और सुरक्षा के लिए प्रयासरत है तो उसे इस सवाल का जवाब भी देना होगा कि आखिर स्वास्थ्य की दृष्टि से भारत अपने से भी गरीब कहे जाने वाले पिछड़े देशों से भी पीछे क्यों खड़ा है ?

11.4.10

भारत की भूख के अर्थ

शिरीष खरे

आज के भारत में सबसे तेजी से बढ़ता सेक्टर कौन सा है- आईटी, मोबाइल टेलेफोनी, आटोमोबाइल, इन्फ्रास्ट्रक्चर, आईपीएल। जहां तक मेरा ख्याल है तो भूख की रफ़्तार के आगे ये सारे सेक्टर बहुत पीछे हैं। आजादी के 62+ सालों के बाद, भारत के पास दुनिया की दूसरी सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का दावा है। मगर अमेरिका की कुल आबादी से कहीं अधिक भूख और कुपोषण से घिरे पीड़ितों का आकड़ा भी यहीं पर है। अब चमचमाती अर्थव्यवस्था पर लगा यह काला दाग भला छिपाया जाए भी तो कैसे ?

वैसे भी अपनी सरकार मंहगाई को कम नहीं करने की बात जब खुलेआम कह रही है तो उसके मंशूबों से ताल्लुक रखने वाली चुप्पियों के भेद भी खुल्लमखुल्ला हो ही जाए। ‘राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम’ के होहल्ला से पहले, सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश को याद कीजिए, जो गरीबी रेखा के नीचे के हर भारतीय परिवार को 2 रूपए किलो की रियायती दर से 35 किलो खाद्यान्न दिये जाने की बात कहता है। इसके बाद केन्द्र की यूपीए सरकार के ‘राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम’ का मसौदा देखिए, जो गरीबी रेखा के नीचे के हर भारतीय परिवार को रियायती दर से महज 25 किलो खाद्यान्न की गारंटी ही देता है। मामला साफ है, मौजूदा खाद्य सुरक्षा का मसौदा तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ही कतरने (गरीबों के लिए रियायती दर से 10 किलो खाद्यान्न में कमी) वाला है।

अहम सवाल यह भी है कि मौजूदा मसौदा अपने भीतर कितने लोगों को शामिल करेगा ? इसके जवाब में जो भी आकड़े हैं, वो आपस में मिलकर भ्रम फैला रहे हैं। अगर वर्ल्ड-बैंक की गरीबी का बेंचमार्क देखा जाए तो जो परिवार रोजाना 1 यूएस डालर (मौजूदा विनियम दर के हिसाब से 45 रूपए) से कम कमाता है, वो गरीब है। भारत में कितने गरीब हैं, इसका पता लगाने के लिए जहां पीएमओ इकोनोमिकल एडवाईजरी कौंसिल की रिपोर्ट ने गरीबों की संख्या 370 मिलियन के आसपास बतलाई है, वहीं घरेलू आमदनी के आधार पर, सभी राज्य सरकारों के दावों का राष्ट्रीय योग किया जाए तो गरीब रेखा के नीचे 420 मिलियन लोगों की संख्या दिखाई देती है। यानि गरीबों को लेकर केन्द्र और राज्य सरकारों के अपने-अपने और अलग-अलग आकड़े हैं। इसके बावजूद गरीबों की संख्या का सही आंकलन करने की बजाय केन्द्र सरकार का यह मसौदा, केवल केन्द्र सरकार द्वारा बतलाये गए गरीबों को ही शामिल करेगा।

यहां अगर आप वर्ल्ड-बैंक की गरीबी का बेंचमार्क रोजाना 1 यूएस डालर से 2 यूएस डालर (45 रूपए से 90 रूपए) बढ़ाकर देंखे तो देश में गरीबों का आकड़ा 80 मिलियन तक पहुंच जाता है। यह आकड़ा यहां की कुल आबादी का तकरीबन 80% हिस्सा है। अब थोड़ा देशी संदर्भ में सोचिए, महज 1 यूएस डालर का फर्क है, जिसके कम पड़ जाने भर से आबादी के इतना भारी हिस्सा वोट देने भर का अधिकार तो पाता रहेगा, नहीं पा सकेगा तो भोजन का अधिकार।

केन्द्र सरकार ने 2010-11 में, भूख से मुकाबला करने के लिए 1.18 लाख करोड़ रूपए खर्च करने का वादा किया है। अगर यूपीए सरकार गरीबी रेखा के नीचे के हर भारतीय परिवार को रियायती तौर से 35 किलो खाद्यान्न दिये जाने पर विचार करती है तो उसे अपने बिल में अतिरिक्त 82,100 करोड़ रूपए का जोड़ लगाना होगा।

जब कभी देश को युद्ध या प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ता है तो हमारे देश के हुक्मरानों का दिल अचानक पसीज जाता है। उस दौरान के बुरे हालातों से निपटने के लिए बहुत सारा धन और राहत सुविधाओं को मुहैया कराया जाता है। मगर भूख की विपदा तो देश के कई बड़े इलाकों को खाती जा रही है। वैसे भी युद्ध और प्राकृतिक आपदाएं तो थोड़े समय के लिए आती हैं और जाती हैं, मगर भूख तो हमेशा तबाही मचाने वाली परेशानी है। इसलिए यह ज्यादा खतरनाक है। मगर सरकार है कि इतने बड़े खतरे के खिलाफ पर्याप्त मदद मुहैया कराने में कोई दिलचस्पी नहीं ले रही है।

भूख का यह अर्थशास्त्र न केवल हमारे सामाजिक ढ़ाचे के सामने एक बड़ी चुनौती है, बल्कि मानवता के लिए भी एक गंभीर खतरा है। जो मानवता को नए सिरे से समझने और उसे फिर से परिभाषित करने की ओर ले जा रहा है। उदाहरण के लिए, आज अगर भूखे माता-पिता भोजन की जुगाड़ में अपने बच्चों को बेच रहे हैं तो यह बड़ी अप्राकृतिक स्थिति है, जिसमें मानव अपनी मानवीयता में ही कटौती करके जीने को मजबूर हुआ है। यह दर्शाती है कि बुनियादी तौर पर भूख किस तरह से मानवीयता से जुड़ी हुई है। इसलिए क्यों न भूख को मिटाने के लिए यहां बीपीएल (गरीबी रेखा से नीचे) की बजाय बीएचएल (मानवीय रेखा से नीचे) शब्द को उपयोग में लाया जाए ?

एक तरफ भूखा तो दूसरी तरफ पेटू वर्ग तो हर समाज में होता है। मगर भारत में इन दोनों वर्गों के बीच का अंतर दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। एक ही अखबार के एक साईड में कुपोषण से बच्चों की मौत की काली हेडलाईन हैं तो उसी के दूसरी साईड में मोटापन कम करने वाले क्लिनिक और जिमखानों के रंगीन विज्ञापन होते हैं। भारत भी बड़ा अजीब देश है, जहां आबादी के एक बड़े भाग को भूखा रहना पड़ता है, वहीं डायबटीज, कोरोनरी और इसी तरह की अन्य बीमारियों के मरीज भी सबसे अधिक यही पर हैं, जिनकी बीमारियां सीधे-सीधे ज्यादा खाने-पीने से जुड़ी हुई हैं।

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संपर्क : shirish2410@gmail.com

19.3.10

भूख की पेट में भारत के बच्चे

शिरीष खरे


यह बीते साल नंबवर के आखिरी हफ्ते की बात है जब ग्राम-अगासिया, विकासखण्ड-मेघनगर, जिला-झाबुआ, मध्यप्रदेश के अर्जुन ने एक सर्द रात में कुपोषण के सामने दम तोड़ दिया था। उस सर्द समय में इसी आदिवासी इलाके के दर्जनों बच्चे भी मारे गए थे। अर्जुन सबसे कम उम्र के उन बच्चों में से एक ऐसा नाम था जो अपने हमउम्र साथियों के साथ फाइल की सूची में क्रमानुसार दर्ज हो चुका था। इस तरह एक और नाम भूखे भारत की सांख्यिकी में एक बड़े गुणनफल के बीचोंबीच कहीं दूर गुम हो चुका था।

यकीनन वित्त मन्त्री प्रणव मुखर्जी ने अपना तीर चिड़िया की उस आंख पर ही साधा हुआ है जिसके निशाने पर पड़ते ही सकल घरेलू उत्पाद की दर 9% तक सरक सकती है। मगर कुपोषण और भूख का विकराल रुप देश के एक बड़े हिस्से को जिस ढंग से खा अरह है उससे भी आंख नहीं चुराई जा सकती है।

अक्टूबर 2009 से दिसम्बर 2009 के बीच, मध्यप्रदेश के इसी हिस्से के 4 गांवों से- भूख की चपेट में 70 आदमी मारे गए थे जिसमें 43 बच्चे थे। बीते दो सालों में अखबारों की कतरनों को ही जोड़ों तो मध्यप्रदेश के खण्डवा, सतना, रीवा, झाबुआ, शियोपुरी और सीधी जैसे जिलों से 456 आदमियों की मौतों का पता चलता है। मध्यप्रदेश में 5 साल के नीचे वाले बच्चों का मृत्यु-दर 1000/70 तक पहुंच गया है।

ऐसा ही हाल उड़ीसा और उत्तरप्रदेश का भी है। यहां से भी बाल-मृत्यु दर के अनुमान चौंकाते हैं। 5 साल के नीचे मरने वाले प्रति हजार बच्चों के मद्देनज़र उड़ीसा की हालत भी बहुत नाजुक है। इस तटीय प्रदेश के 29 जिलों में बाल-मृत्यु की दर कम से कम 1000/66 है। कंधमाल जिले की बाल-मृत्यु दर 1000/136 है जबकि मलकानगिरि और गजपति जिलों की बाल-मृत्यु दर 1000/127 है। उत्तरप्रदेश में बाल-मृत्यु दर है 1000/58। यहां के कौशांबी, भदौही, प्रतापगढ़, जौनपुर, इलाहाबाद और बनारस सबसे बुरी तरह से प्रभावित जिलों के तौर पर पहचाने गए हैं। आकड़े बताते है कि मध्यप्रदेश में 5 साल के नीचे के 60% बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। इसके बाद उड़ीसा में 5 साल के नीचे के 50: बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। कुल मिलाकर कुपोषण के मामले में भारत के मध्यप्रदेश और उड़ीसा सबसे बुरी तरह से प्रभावित प्रदेशों के तौर पर पहचाने गए हैं। मगर कर्नाटक (44%), गुजरात (47%) और महाराष्ट्र (51%) भी बहुत ज्यादा पीछे नज़र नहीं आते।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 (एनएफएचएस-3) बताता है कि देशभर में 6 साल से नीचे के 8 करोड़ बच्चे कुपोषण की स्थिति (फूले पेट, अविकसित कदकाठी, झरते बाल और फीके रंग) में जी रहे हैं। 1 साल के बच्चे का वजन औसतन 10 किलोग्राम होता है और उसके वजन में सलाना 2 किलोग्राम के हिसाब से बढ़ोतरी होना जरूरी है। मगर जब बच्चे का वजन सामान्य से कम होने लगता है तो यह कुपोषण की स्थिति में आ जाता है। तब उसमें बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। ऐसे बच्चों को अधिक से अधिक प्रोट्रीन, कार्बोहाइड्रेड, आइरन, विटामिन बी, कैल्शियम आदि मिलना चाहिए। यहां गरीब तबके के नवजात शिशुओं में उचित पालन-पोषण का अभाव और उनके लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की गिरती स्थितियों को कुपोषण के पीछे के प्रमुख कारणों में गिना जा रहा है। उनके आसपास के माहौल में साफ-सफाई और पीने का स्वच्छ पानी न होने से यह संकट और अधिक गहराता जा रहा है।

यह एक कटु सत्य है कि देश में एक सेकेण्ड के भीतर 5 साल के नीचे का एक बच्चा कुपोषण के कब्जे में आ जाता है। मगर इतना सबकुछ होने के बावजूद सरकारी तन्त्र बच्चों के लिए एक जवाबदेह स्वास्थ्य नीति और योजना बनाने के बारे में सोच तक नहीं रहा है।

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30.1.10

नाबालिग लड़कियों के बच्चों में कुपोषण सबसे ज्यादा

शिरीष खरे


18 साल से कम उम्र में मां बनने वाली लड़कियों से पैदा होने वाले बच्चों पर कुपोषण का खतरा सबसे ज्यादा मंडराता है। बीएमजे यानि बिट्रिश मेडीकल जनरल ने हाल में प्रकाशित अपने शोध अध्ययन से ऐसा जाहिर किया है।


बीते दशक की महत्वपूर्ण आर्थिक वृद्धि के इर्दगिर्द, सबसे ज्यादा होने वाली मौतों के हिसाब से दुनिया के 5 देशों में भारत भी शामिल है। भारत में 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 44.5% (करीब आधी) औरतें ऐसी हैं- जिनकी शादियां 18 साल के पहले हुईं हैं। इन 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 22% (करीब एक चौथाई) औरतें ऐसी हैं- जो 18 साल के पहले मां बनीं हैं। इन कम उम्र की लड़कियों से 73% (सबसे ज्यादा) बच्चे पैदा हुए हैं। फिलहाल इन बच्चों में 67% (आधे से बहुत ज्यादा) कुपोषण के शिकार हैं।


बोस्टन यूनिवर्सिटी के पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेन्ट की एसोशियट प्रोफेसर अनीता राज और उनके सहयोगियों का यह शोध अध्ययन मूलतः भारत में कम उम्र के शादीशुदा संबंधों, शिशु और बाल मृत्यु-दर से जुड़ा है। यह अध्ययन 15 से 49 साल की तकरीबन 1,25,000 भारतीय औरतों के प्रतिनिधि नमूने पर आधारित है। शोध के लिए एकत्रित जानकारियों को नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे (2005-06) से लिया गया है।


यह शोध बताता है कि कम उम्र में शादी करने, दो बच्चों के बीच अंतर न रखने, गर्भावस्था के समय पर्याप्त भोजन न मिलने, प्रसव के समय थोड़ा-सा भी आराम न मिलने और इसी दौरान चिकित्सा की सुविधाओं के अभाव में कुपोषण किस तरह से लहलहा उठता है। यह शोध ‘कम उम्र की किशोरियों और बच्चों’ को केन्द्र में रखकर भारत के कुपोषण की व्याख्या करता है। शोध यह भी मानता है कि कम उम्र में शादी करने वाली औरतों को अगर उनके पतियों या ससुराल वालों द्वारा दरकिनार किया जाता है तो ऐसी औरतों को अपने और अपने बच्चों के लिए भोजन जुटा पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसमें भारत की भुखमरी को पारिवारिक व्यवस्था से लेकर सामाजिक तंत्र, राजनीति से लेकर विचारधारा और व्यवहारिकता तक में मौजूद लैंगिक भेदभाव से जोड़कर देखा गया है।


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1.12.09

कितना भूखा है मध्यप्रदेश

शिरीष खरे


झाबुआ, मध्यप्रदेश । कुपोषण ने दो दर्जन से ज्यादा बच्चों को निगला है- यह हाल आदिवासी जिले झाबुआ का है, जहां मेघनगर ब्लाक के अगासिया और मदारानी गांवों में बच्चों की मौत का सिलसिला है कि टूटता ही नहीं। फिलहाल पूरा मध्यप्रदेश ही इतना भूखा है कि यहां न जाने क्यों भूख का नामोनिशान  है कि मिटता ही नहीं ?

केवल अक्टूबर में ही झाबुआ के इन 2 गांवों से 25 बच्चों की मौत दर्ज होना- यह तो मौत के ताण्डव की एक झलक भर है। एक तरफ पास के ही खण्डवा में आंतकवादी बतलायी गई वारदात के तुरंत बाद से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह अपने साहस का परिचय पेश कर रहे हैं और दूसरी तरफ महीनों से कुपोषण नाम का जो आंतक झाबुआ के कई दुबले, पतले, रक्तहीन शरीर वाले बच्चों को मलेरिया जैसी बीमारियों की चपेट में आते ही 4 रोज के भीतर खा रहा है, उसके खिलाफ ठोस कार्रवाई की बात तो दूर जबावदारी लेने का साहस तक कोई नहीं करता है। मालूम नहीं यह बात भोपाल तक पहुंची है या नहीं कि कुपोषण के गले उतर चुके ऐसे बच्चों में से ज्यादातर 0-6 साल के हैं। पता किया है तो पता चला है कि यह बच्चे तो क्या इनके नाम तक स्थानीय आंगनबाड़ी केन्द्रों में कभी नहीं पहुंचे हैं। आखिर किससे पूछे कि जिले के 75 % पोषण केन्द्रों में ताले लटके हैं तो क्यों ?

इसके पहले महिला बाल विकास विभाग की रिपोर्ट भी कह चुकी है कि झाबुआ जिले में 36 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। फिर भी प्रशासन कुपोषण से बच्चों की मौतों को रोकने की बजाय जवाबदारी से बचने के रास्ते तलाश रहा है। फिलहाल 25 बच्चों की मौत को लेकर कहा जा रहा है कि इन्हें मलेरिया जैसी बीमारियां तो थीं ही, इनमें रक्त की भारी कमी भी थी। पूरे इलाके में कुपोषण के खतरनाक स्तर को देखते हुए कुपोषण को बच्चों की मौत का मुख्य कारण बतलाया जा रहा है। जैसे कि मेघनगर के ब्लाक मेडीकल आफीसर विक्रम वर्मा भी कहते हैं कि- ‘‘हमने अभी तक 14 बच्चों की मौत के कारणों को ढ़ूढ़ा है, प्राथमिक तौर पर देखने के बाद तो यही लगता है कि उन्हें कुपोषण, एनीमिया और मलेरिया ने बुरी तरह जकड़ लिया था।’’ यह और बात है कि स्वास्थ्य विभाग के ज्वाइंट डायरेक्टर केके विजयवर्गीय कुछ और कहते हैं- ‘‘अक्टूबर में वहां सिर्फ चारेक मौतें हुई हैं। मैंने पर्यवेक्षक और एएनएम के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया है, इसके अलावा ब्लाक मेडीकल आफीसर को रिपोर्ट में देरी किये जाने पर कारण बताओ नोटिस भी भेजा दिया है।’’ ज्वाइंट डायरेक्टर कुपोषण को बच्चों की मौत का कारण नहीं मानते हैं। उनके हिसाब से- ‘‘हालांकि अभी तक कोई कारण स्पष्ट नहीं हो पाया है, फिर भी एक बात तो पक्की है कि कुपोषण नहीं ही है। शायद उन्हें मौसमी बुखार था।‘‘

इस तरह जहां स्वास्थ्य विभाग की गंभीरता स्पष्ट होती है वहीं समाज कल्याण के लिए बनी योजनाएं का असर भी साफ समझ आता है। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि अगासिया के जिन 4 बच्चों की मौत को मौत मान लिया गया है, उनके घरवाले रोजीरोटी के लिए अपने घरों से पलायन करते हैं। कहने को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना 5 साल पहले आई है मगर इनके हाथों में जाब-कार्ड आजतक नहीं आए हैं।

देखा जाए तो झाबुआ जिले के अगासी और मदारानी जैसे गांव तो कुपोषण नाम के नक़्शे पर छोटे-छोटे से बिन्दु भर हैं। हकीकत तो यह है कि मध्यप्रदेश के बड़े हिस्से में कुपोषण अब महामारी की तरह फैल रहा है। प्रदेश के ही एक और जिले सीधी का रुख करें तो यहां भी अगस्त से अबतक 22 बच्चों की मौतें दर्ज हुई हैं। इस बीच एशियन हयूमन राईटस कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि रीवा जिले के जेबा ब्लाक में कोल आदिवासियों के 80 % से ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं। सुप्रीम कोर्ट और यूनाइटेड नेशन इंटरनेशनल चिल्ड्रनर्स इमरजंसी फण्ड की रिपोर्ट के मुताबिक यहां के हालात तो उप-सहारा अफ्रीका देशों से भी खराब हैं। इसी तरह नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे-3 के मुताबिक मध्यप्रदेश में 12 लाख से ज्यादा बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं। यहां 0-3 साल के 60 % बच्चे कुपोषित हैं, जबकि इसी श्रेणी के 82.6 % बच्चे रक्तहीनता के शिकार हैं। प्रदेश में शिशु मृत्यु दर 1000/70 है, जबकि आदिवासी इलाकों में शिशु मृत्यु दर है 95.6/1000!!

ऐसे में सवाल उठता है कि 2015 तक शिशु मृत्यु दर में दो-तिहाई की कमी लाने वाले प्रदेश सरकार के लक्ष्य का क्या होगा ? वह भी तब जब 1.2 करोड़ बच्चों की आबादी वाले इस प्रदेश में शिशु रोग विशेषज्ञ की संख्या है केवल 117। और तो और 30 जिलों की जनता को आज भी शिशु स्वास्थ्य से जुड़ी बुनियादी सहूलियतों का इंतजार है। मगर सेंटर फार बजट गवेर्नेंस एंड अकाउंटबिलिटी के मुताबिक मध्यप्रदेश सरकार जीडीपी का केवल 0.1 % हिस्सा बच्चों के स्वास्थ्य पर खर्च करती है। इसी तरह आजीविका के लिए तैयार हुई राष्ट्रीय रोजगार गांरटी की चाल यह है कि प्रदेश सरकार बीते 4 सालों में इस योजना की पूरी राशि ही खर्च नहीं कर सकी है। इस योजना के तहत वित्तीय वर्ष 2005-06 से वित्तीय वर्ष 2008-09 के बीच कुल 9739 करोड़ 23 लाख रूपए आंवटित हुए जिसमें से खर्च हुए 8191 करोड़ 34 लाख रूपए ही। जिसमें से 3 साल तो ऐसे भी रहे कि जब वह केन्द्र सरकार के खाते की राशि तक खर्च नहीं कर सकी। सरकार कहती है कि इस योजना में 1 करोड़ 11 लाख 40 हजार जाब-कार्ड बन गए हैं मगर अबतक केवल 11 लाख लोगों को ही रोजगार मिल पाने के सवाल पर वह चुप है। जुलाई 2008 में सेंटर फार एन्वायरमेंट एण्ड फूड सेक्यूरिटी ने झाबुआ सहित प्रदेश के 5 जिलों के 125 गांवों में सर्वे किया और कहा कि सरकार के बहुत सारे दावे झूठे हैं। उसके मुताबिक यहां साल में औसतन 16 दिन ही रोजगार मिल पाता है। सीधी बात है कि सरकार की मंशा जो भी हो मगर योजनाएं शोषण या घूसखोरी पर जाकर दम तोड़ रही हैं।

कुल मिलाकर मध्यप्रदेश के अलग-अलग हिस्सों के नाम अलग-अलग हो सकते हैं मगर यहां शोषण...बेकारी...गरीबी...भूख...रोग...मौत का पहिया अपनी चाल से लगातार घूम रहा है। अंतत: इन अलग-अलग हिस्सों में स्वास्थ्य और आजीविका की ज्ञात स्थितियों को भी एक साथ जोड़कर देखें तो हमारे सामने आदिवासी आबादी पर कुपोषण के कहर की भयानक तस्वीर पेश होती है। जिसमें उसकी शक्ल भूख से होने वाली मौतों के लिए कुख्यात उड़ीसा, झारखण्ड और गुजरात की शक्लों से काफी मिलती-जुलती है।

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