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5.5.11

गरीबी और बाल मजदूरी के बीच का रिश्ता


श्यामल मजूमदार

करीब एक पखवाड़ा पहले, मोइन नामक एक बच्चे को उसके चाचा ने पीट-पीटकर मार डाला। मोइन अपने चाचा की फैक्टरी में काम करता था। अगर टेलीविजन चैनलों ने उसकी दर्दनाक तस्वीरें न दिखाई होतीं तो शायद यह वाकया लोगों के जेहन में घर भी न कर पाता। अब भी इस बात में संदेह ही है कि एक बार चैनलों का ध्यान हटने के बाद कोई मोइन के साथ घटी घटना को कभी याद भी करेगा या नहीं।

ऐसा अनेक बार हो चुका है। महज एक वर्ष पहले की बात है, बेंगलुरू में  एक इंजीनियर दंपती को उनके यहां घरेलू काम करने वाली 14 वर्षीय बच्ची को प्रताडि़त करने के लिए गिरफ्तार किया गया था। उस लड़की ने पुलिस को बताया कि उसे काम के दौरान उसके कपड़े उतारने के लिए कहा गया था जब उसने विरोध किया तो उसे बुरी तरह मारा पीटा गया। दंपती को कुछ दिन के बाद जमानत मिल गई और जब मीडिया भी और अधिक सनसनीखेज मामलों की तलाश में आगे बढ़ गया तो लोगों में भी उसे लेकर जिज्ञासा कम हो गई।


चूंकि अंतराष्ट्रीय श्रमिक दिवस अभी हाल ही में बीता है तो यह देश में बाल श्रम के आंकड़ों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने का एकदम उचित समय है। बचपन बचाओ आंदोलन के मुताबिक देश भर में अभी भी 1.26 करोड़ बच्चे खतरनाक फैक्टरियों में काम करने के लिए विवश हैं। इतना ही नहीं दिल्ली की सड़कों से रोजाना लगभग पांच बच्चे खो जाते हैं। इन बच्चों को अंतरराज्यीय गैंग बंधुआ मजदूरी के लिए बाहर लेकर चले जाते हैं।

कुछ अन्य बच्चे अभी भी घरों के फर्श साफ करते, पत्थरों की खदानों में  गर्मियों में पसीना बहाते, दिन के 16 घंटे खेतों में काम करते, शहरों की गलियों में कचरा बीनते या फिर सड़क किनारे ढाबों में खाना परोसते दिख जाएंगे। ज्यादा बुरी बात यह है कि खतरनाक पेशों में उनके काम करने की प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है। क्या ये बच्चे मोइन के मुकाबले बेहतर हैं?


बात करते हैं बीड़ी उद्योग की। बाल श्रम के खिलाफ अनगिनत कानून होने के बावजूद आज भी हर दिन बीड़ी उद्योग के बाल श्रमिक हर रोज औसतन 9 रुपये के मेहनताने पर 1,500 बीडिय़ां बनाते हैं। यहां काम की परिस्थितियां बच्चों के स्वास्थ्य के लिए एकदम प्रतिकूल होती हैं। तंबाकू के बीच बहुत अधिक समय बिताने से उन्हें फेफड़ों की बीमारी समेत तमाम तरह की तकलीफें हो जाती हैं। बीड़ी उद्योग से संबंधित समुदायों में बड़े पैमाने पर तपेदिक की बीमारी पाई जाती है।


मानवाधिकार निगरानी संबंधी एक अध्ययन में दर्शाया गया है कि कैसे हर उद्योग में बाल श्रम अधिनियम का बड़े पैमाने पर उल्लंघन किया जाता है। जिन प्रावधानों का उल्लंघन किया जाता है उनमें हर तीन घंटे के काम के बाद एक घंटे के आराम, दिन में अधिकतम छह घंटे काम, सुबह 8 बजे के पहले और शाम 7 बजे के बाद बच्चों के काम पर रोक, हर सप्ताह एक दिन का अवकाश और विभिन्न प्रकार के स्वास्थ्य सुरक्षा संबंधी उपाय शामिल हैं।

क्राई (चाइल्ड राइट्स ऐंड यू) के एक शोध प्रपत्र में मुख्य कार्याधिकारी पूजा मारवाह कहती हैं कि 7,000 से अधिक गांवों और झुग्गियों में जहां उनका संगठन काम करता है, वहां इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण मिले हैं कि आसपास के इलाकों में निशुल्क और बेहतर सरकारी विद्यालयों की कमी से बाल श्रम का सीधा संबंध है। विद्यालयों में भवन की कमी, शिक्षकों की कमी, अनियमित शिक्षण, बच्चियों के लिए अलग शौचालय न होना आदि कुछ ऐसी बातें हैं जो बच्चों को विद्यालयों से इतर काम की ओर मोड़ देती हैं।


बहरहाल, पिछले कुछ दशकों के दौरान विद्यालयों में बच्चों के दाखिले की संख्या में उल्लेखनीय इजाफा हुआ है। ग्रॉस इनरोलमेंट रेशियो (जीईआर) के मुताबिक कक्षा एक से आठ तक यह अनुपात 94.9 फीसदी और कक्षा एक से 12 तक यह 77 फीसदी है। मारवाह कहती हैं कि जीईआर के इन आंकड़ों में बड़ी संख्या उन बच्चों की है जो या तो विद्यालय जाते नहीं या फिर बीच में ही पढ़ाइ्र्र बंद कर देते हैं।
सरकारी विद्यालयों में कक्षा 5 तक एक चौथाई बच्चे पढ़ाई बंद कर देते हैं और कक्षा आठ तक इनकी संख्या आधी हो जाती है। अनेक बच्चे महज इसलिए स्कूल नहीं जा पाते क्योंकि उनके आसपास स्कूल है ही नहीं। मारवाह बताती हैं कि देश में तकरीबन 17,282 ऐसी बस्तियां हैं जिनके एक किलोमीटर के दायरे में कोई प्राथमिक विद्यालय नहीं है।

क्राई यह भी बताता है कि कैसे बच्चों का स्वास्थ्य हमारी देश की प्राथमिकताओं से गायब हो चुका है। 1,000 पर 50 बच्चों की बाल मृत्युदर इसकी ओर सीधा संकेत करती है जबकि सरकार ने 2012 तक इसे कम करके 28 तक लाने का लक्ष्य तय कर रखा है। दुनिया के समस्त अल्पपोषित बच्चों में से 42 फीसदी हमारे देश में हैं। इतना सब होने के बावजूद सरकार सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का महज 1.27 फीसदी पूरे देश के स्वास्थ्य पर खर्च करती है।

हालांकि हमारा देश कानून बनाने के मामले में पीछे नहीं है। हाल ही में बच्चों के घरों में काम करने पर प्रतिबंध लगाया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि कानून का नाम मात्र का ही असर होगा क्योंकि बाल श्रम विकट गरीबी का सह उत्पाद मात्र है। ये बच्चे अपने गरीब परिवारों के लिए भोजन जुटाते हैं या कहें कि खुद को किसी तरह भुखमरी से बचाए हुए हैं। उदाहरण के लिए शिवकाशी के 60 फीसदी घरों के बच्चे काम करते हैं और इन परिवारों की दो तिहाई आय बच्चों के जरिए ही आती है।

9.11.10

बच्चों का जितना पलायन उतना उत्पीड़न

शिरीष खरे

इन दिनों बच्चों का पलायन तेजी से बढ़ रहा है और उसी अनुपात में उनके साथ उत्पीड़न की घटनाएं और आकड़े भी. खास तौर से मजदूरी के लिए बच्चों को एक राज्य से दूसरे राज्य में आदान-प्रदान किए जाने का सिलसिला जोर पकड़ता जा रहा है. विभिन्न शोध-सर्वेक्षणों और रपटों से यह जाहिर भी हो रहा है कि मुख्य तौर पर बिहार, पूर्वी उत्तर-प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश से महाराष्ट्र और गुजरात सहित पूरे देश भर में मजदूरी के लिए बच्चों की पूर्ति की जा रही है. इन बच्चों में ज्यादातर की उम्र 10 से 16 के बीच है. इनमें भी ज्यादातर लड़के ही हैं. कई सर्वेक्षणों और तजुर्बे यह भी बता रहे हैं कि मजदूरी में लगे ज्यादातर बच्चे स्कूल जरूर गए हैं, मगर वह नियमित नहीं हो सके हैं. बच्चों के बारम्बार पलायन होने के पीछे की मुख्य वजहों में बच्चों ने अपने घर की गरीबी, मारपीट, डर और दबाव को जिम्मेदार ठहराया है तो कभी मुंबई और सूरत जैसे बड़े शहरों की तड़क-भड़क को देखने की दबी चाहत को भी बाहर निकला है. इस दिशा में जो सर्वेक्षणों के आधार पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर कई कदम उठाए जाने की बात कही जाती रही है, मगर अभी तक इन मामलों के न रुकने से यथार्थ की गंभीरता को भलीभांति समझा जा सकता है.

दूसरी तरफ बालगृहों से लगातार बच्चों के भागने की घटनाएं बयान करती हैं कि मुंबई सहित देश भर के सरकारी बालगृहों में बच्चों की सही देखभाल की असलियत क्या है. बीते समय मुंबई के एक बालगृह से कुछ बच्चों के भागने और उनमें से एक के हादसे में मारे जाने घटना उजागर हुई थी. आम तौर पर देखा गया है कि ज्यादातर बालगृहों द्वारा भागने वाले बच्चों के बारे में पता लगाने जरुरत भी महसूस नहीं की जाती हैं. ऐसे बच्चों को ढूंढने की भी तमाम कोशिशें तो दूर महज एक रिपोर्ट तक नहीं लिखवाई जाती है. तजुर्बों से यह जाहिर हुआ है कि हफ्तों-हफ्तों बच्चों के गायब रहने के बावजूद बालगृहों की तरफ से चुप्पी साध ली जाती है. जबकि नियमानुसार इस तरह की घटनाओं की जानकारी फौरन थाने में और उच्च अधिकारियों को देना जरूरी है. यहां तक कि महिला और बाल कल्याण विभाग को भी इस तरह की ज्यादातर घटनाओं की प्राथमिक सूचना किसी अखबार या गैर-सरकारी संस्था के जरिए ही मिलती है. भागने वाले कुछ बच्चों के बारे में जब हमने खैर-खबर जाननी चाही तो पता लगा कि सामान्यत: बालगृहों की तरफ से इन बच्चों की गुमशुदगी के बारे में न तो पुलिस को ही सूचना दी जाती है और न ही विभाग को इस बारे में बताया जाता है. कई बार तो बच्चों के साथ होने वाली दुर्घटनाएं और अपराधिक मामले प्रकाश में आने के बाद ही बच्चों के भागने की रिपोर्ट दर्ज की जाती है. बच्चों के इस तरह से गायब होने की तुरंत रिपोर्ट न लिखवाना महज एक लापरवाही ही नहीं बड़ा अपराध भी है. मुंबई के सरकारी बालगृहों से बीते 6 सालों में तकरीबन तीन सौ से ज्यादा बच्चे भागे हैं, मगर इतना होने के बावजूद लापरवाही का आलम ज्यों का त्यों है. समाज कल्याण विभाग से मिली गैर-औपचारिक जानकारियों के मुताबिक बालगृहों में कर्मचारियों की कमी है. एक कर्मचारी पर सैकड़ों बच्चों को संभालने की जवाबदारी होती है. काम के दबाव में कई बार कर्मचारियों द्वारा जब बच्चों के साथ बुरा बर्ताव किया जाता है तो बच्चे भाग जाते हैं. उन्हें ठीक-ठाक खाना तक नहीं मिलता है. इस तरह से सरकार द्वारा ऐसे बच्चों के देखभाल उचित के लिए संचालित बालगृह बुरे बर्ताव और उत्पीड़न का केंद्र बन जाते हैं.

हर साल मुंबई जैसे महानगर पहुंचने वाले हजारों बच्चे काम की तलाश में या काम की जगहों से भीख मंगवाने वाले नेटवर्क के हत्थे भी चढ़ जाते हैं. खास तौर से रेल्वे स्टेशनों के प्लेटफार्म और चौराहों पर ऐसे नेटवर्क से जुड़े दलालों की सरगर्मियों को समझा जा सकता है. यही बहुत सारे बच्चे बहुत ही गंदे माहौल में महज खाने-पीने के लिए जद्दोजहद करते रहते हैं. इसके अलावा बहुत से बच्चे नशे के आदी हो जाते हैं तो बहुत से जुर्म की दुनिया में भी दाखिल हो जाते हैं.

भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है, जो हर लिहाज से बाल- शोषण और उत्पीड़न को रोकने में मददगार हो. दूसरी तरफ कुछ जानकारों की राय में समस्या को दूर करने के लिए उसकी जड़ में पहुंचकर कानून के समानांतर गरीबी, विस्थापन, पलायन और विघटन से निपटने के प्रयास किए जाने की जरुरत है. साथ की जो प्रावधान लागू हैं उन्हें क्रियान्वित करने वाली एजेंसियों के सक्रिय और धनराशि के सही इस्तेमाल करने की जरुरत है और इसी के साथ बच्चों के यौन-उत्पीड़न सहित सभी तरह के उत्पीड़नों को ठीक से परिभाषित किए जाने की भी जरुरत है. दूसरी तरफ राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो में बच्चों के उत्पीड़न से जुड़े केवल ऐसे मामले शामिल रहते हैं, जिनकी रिपोर्ट पुलिस में दर्ज मिलती है. मगर असलियत जगजाहिर है कि ज्यादातर मामले तो पुलिस तक पहुंचते ही नहीं हैं. हालांकि सरकार की तरफ से 'बाल अपराध निरोधक बिल' संसद में लाने की बात की जाती रही है. बच्चों की सुरक्षा पर कुल बजट में से 0.03% की बढ़ोत्तरी और महिला व बाल विकास मंत्रालय द्वारा एकीकृत बाल सुरक्षा योजना शुरू करने जैसी घोषणाएं की भी की जाती रही हैं. इन सबके बावजूद इस तरह की नीतियां बनाने और इन नीतियों पर विमर्श का दौर तो खूब चलता है. नहीं चलता है तो उन्हें गर्म जोशी से लागू किए जाने की कोशिशों का दौर.

4.11.10

बारूद पर ढ़ेर है भारत का भविष्य

शिरीष खरे

एक बच्चा पटाखा बनाए और दूसरा उसे जलाकर दीपावली मनाए. ऎसी विडम्बना तमिलनाडु के शिवकाशी में आसानी से देखी जा सकती है. जहां एक ओर देश के हरेक कोने का बचपन रोशनी के पर्व को मनाने के अपने तरीके व योजना बना रहा है, वहीं शिवकाशी जो आतिशबाजी उद्योग के लिए प्रसिद्ध है, जहां करीबन 40 हजार बाल मजदूर उनकी खुशियों में चार चांद लगाने के लिए पटाखे बनाने में सक्रिय हैं.

शिवकाशी वह क्षेत्र है जिसे देश की आतिशबाजी राजधानी के रूप में जाना जाता है. यहां लगभग एक हजार छोटी-बड़ी इकाइयां बारूद व माचिस बनाने में बनाने में जुटी हैं जिनका सालाना कारोबार 1000 करोड़ रूपए है. इस उद्योग के चलते एक लाख लोगों की रोजी चलती हैं जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं व बच्चे भी शामिल हैं.

बाल श्रम नाम के अभिशाप की जहां बात चल ही गई है तो यह स्पष्ट कर दें कि शिवकाशी में इसका प्रमाण आसानी से देखा जा सकता है. मसलन, पंद्रह वर्षीय पोन्नुसामी जो यहां एक पटाखा निर्माणी इकाई में कार्यरत है, पांच साल पटाखे बना रहा है. जब उसने यह पेशा चुना तो उसकी समझ का स्तर क्या रहा होगा यह विचारणीय मसला है. उसके अनुसार वह छठी कक्षा का छात्र था जब उसे जबरन इस काम में उतार दिया गया. काम कराने की मंशा भी उनके माता-पिता की ही थी.प्रतिदिन नौ घंटे की कड़ी मेहनत के बाद वह 60 रूपए पाता है. यह बेगारी उसे वयस्क श्रमिकों को मिलने वाली मजदूरी का केवल चालीस फीसदी है. ऎसे कई उदाहरण हैं जिनसे यह स्पष्ट है कि शिवकाशी इलाके के किशोर-किशोरियों की पढ़ाई-लिखाई में गाज गिरने की आशंका रहती है. छोटी उम्र में ही ऎसे खतरनाक काम में झोंकने के मां-बाप के फैसले के पीछे उनकी गरीबी ही मूल कारण है.

कारखानों में हादसे सामान्यत: होते रहते हैं. ऎसे में मासूमों को घातक काम पर लगाने का सवाल जब उठता है तो श्रमिक संगठनों का जवाब होता है कि मृतकों में कोई भी किशोर नहीं है,जबकि दास्तां कुछ अलग ही है. जुलाई 2009 में हुई एक दुर्घटना में तीन बच्चे मर गए.

अगस्त 2010 में तो सरकारी अधिकारियों पर ही गाज गिरी जो अनाधिकृत पटाखा इकाइयों की जांच पर गए थे. बताया गया है कि 8 राजस्व और पुलिस अधिकारियों को इस तहकीकात के दौरान जान से हाथ धोना पड़ा. जब पोन्नुसामी से काम के जानलेवा होने के बारे में पूछा गया तो उसका जवाब यही था कि अगर मैं भाग्यशाली हूं तो कभी हादसा नहीं होगा.

बच्चों के अधिकारों के क्षेत्र में काम करने वाली गैर सरकारी संस्था चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) के अधिकारी जॉन आर की मानें तो शिवकाशी में करीबन 1050 कारखाने हैं जिनमें से 500 बिना किसी लाइसेंस के चल रहे हैं. पटाखों के अलावा 3989 कारखानों में दियासलाई बनती है. वे मानते हैं देश-विदेश में हो रहे प्रयासों के नतीजतन बाल श्रम पर कुछ अंकुश लगा है. हादसों में इजाफा और बच्चों के काम पर लगाने की नौबत गैर लाइसेंसशुदा कारखानों की वजह से आती है जिनका संचालन घरों की असुरक्षित चारदीवारी में होता है.

इन लोगों को लाइसेंस वाली कंपनियां पटाखे बनाने का आदेश दे देती है. अधिक फायदे के लालच व शिक्षा के अभाव में ये लोग आसानी से कानून की दहलीज को लांघ जाते हैं. नाम न छापने की शर्त पर शिवकाशी की ही एक एनजीओ के कार्यकर्ता के अनुसार इस समस्या के बारे में समझ अभी अधूरी है. हम अभिभावकों को जाग्रत करने का प्रयास कर रहे हैं. उन्हें यह समझाया जा रहा है कि वे सीमित आमदनी में गुजर-बसर करते हुए बच्चों के स्वास्थ्य व शिक्षा पर ध्यान दें.

कहावत है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती और अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता. इसी तर्ज पर सरकार, प्रशासन व एनजीओ का प्रयास भी तब तक सफल नहीं हो जाता जब तक कि अन्य पक्षकार जिनमें आतिशबाजी निर्माण इकाइयों के मालिक व अभिभावक शामिल हैं, स्वेच्छा से पहल न करें. अन्यथा उनकी दीपावली कभी भी प्रकाशमान नहीं हो पाएगी. 

27.10.10

पहले पंचायत चले हम

शिरीष खरे



गांवों के बच्चे बड़ी संख्या में मजदूर बनते जा रहे हैं. अगर बच्चों की संख्या स्कूलों की बजाय काम की जगहों पर ज्यादा मिल रही है तो उनके लिए 'स्कूल चले हम' से पहले 'पंचायत चले हम' का नारा देना जरूरी लगता है.

चाहे गांवों के विकास का हवाला हो या गांवों के लगातार टूटे जाने का मौजूदा हाल हो बच्चों के मुद्दों को बहुत पीछे रखा जा रहा है. खास तौर से गांवों के लगातार टूटे जाने के मौजूदा संदर्भ में बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं. इसे देखते हुए नीतिगत प्रक्रियाओं में बच्चों को केन्द्रीय स्थान देने की जरुरत है. लेकिन विकराल स्वरूप लेते जाने के बावजूद बाल मजदूरी जैसी समस्या जहां मुख्यत: राजनैतिक तौर से नजरअंदाज बनी हुई है, वहीं स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक बच्चों से जुड़े तमाम सवालों को भी बहुत हल्के ढ़ंग से लिए जाने की मानसिकता घर बना चुकी है.

खुशहाल, स्वस्थ्य और रचनात्मक बचपन का सूत्र गांवों के भविष्य का आधार है लेकिन बच्चों के मुद्दों को पंचायत की नीतियों से भी अलग-थलग करने या वरीयता की सूची में निचले पायदान पर रखे जाने से ग्रामीण बच्चों की तस्वीर दिन-ब-दिन बदसूरत देखी जा रही है. जाहिर है कि ग्राम पंचायतों में पंच-सरपंचों और सचिवों से सकारात्मक रुख की अपेक्षा किए बगैर यह तस्वीर नहीं सुधरने वाली है. ऐसे में स्थानीय समुदायों का महत्व बढ़ जाता है जो बाल अधिकारों और संरक्षणों को लेकर अपने-अपने जन-प्रतिनिधियों के साथ लगातार बैठकों को आयोजित करके उन्हें संवेदनशील बना सकते हैं. इसके लिए स्थानीय स्तर पर खास तौर से वंचित समूह के बच्चों की समस्याओं, उनकी जरूरतों और ताकतों की पहचान करके, स्थानीय स्तर पर संचालित विभिन्न योजनाओं के भीतर उन्हें और उनके परिवारजनों के लिए विकल्प तलाशे जा सकते हैं. इसके दूसरे सिरे के रूप में निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों को अपनी प्रशासन अकादमियों से संपर्क बढ़ाने की जरुरत है जिसके जरिए जरूरी जानकारियों को लेते हुए कार्यवाही करने में सहूलियत हो सके.

ग्रामीण इलाकों में बच्चों के लिए काम करने के दौरान बाल अधिकारों से जुड़े मुद्दों को केवल ग्रामीण परिवेश में ही देखने से काम नहीं चलेगा बल्कि उससे जुड़ी कुछ बुनियादी घटनाओं, नीतियों और पहलूओं को भी समझना जरूरी होगा. इससे सभी बच्चों के अधिकारों को सुनिश्चित किया जाना संभव हो सके. उदाहरण के लिए 2 सितम्बर, 1990 को सयुंक्त राष्ट्र के बाल अधिकार समझौता पर विश्व के दो देशों (अमेरिका एवं सोमालिया) को छोडक़र सभी ने हस्ताक्षर किए तथा बच्चों के अधिकारों और संरक्षणों को लेकर पहल की. भारत ने 11 दिसम्बर, 1992 को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए. बाल अधिकार समझौते में 18 साल की आयु तक के बच्चों के अधिकारों और संरक्षणों की बात कही गई है. जबकि भारत में 0 से 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों को ही बच्चा मानकर उनके अधिकारो के संरक्षण के लिये कानूनी प्रावधान किये गये हैं. यही नहीं अलग-अलग अधिनियमों के मुताबिक बच्चों की उम्र भी बदलती जाती है. जैसे किशोर-न्याय अधिनियम, 2000 में 18 साल, बाल-श्रम अधिनियम, 1886 में 14 साल, बाल-विवाह अधिनियम में लड़के के लिए 21 साल और लड़की के लिए 18 साल की उम्र तय की गई है. खदानों में काम करने की उम्र 15 और वोट देने की उम्र 18 साल है. इसी तरह शिक्षा के अधिकार कानून में बच्चों की उम्र 6 से 14 साल रखी गई है. इससे 6 से कम और 14 से अधिक उम्र वालों के लिए शिक्षा का बुनियादी हक नहीं मिल सकेगा. इसी तरह भारत में बच्चों की उम्र को लेकर भी अलग-अलग परिभाषाएं हैं. इसी तरह विभिन्न विभागों और कार्यक्रमों में भी बच्चों की उम्र को लेकर उदासीनता दिखाई देती है. 14 साल तक के बच्चे ‘युवा-कल्याण’ मंत्रालय के अधीन रहते हैं. लेकिन 14 से 18 साल वाले बच्चे की सुरक्षा और विकास के सवाल पर चुप्पी साध ली जाती है. बच्चों के अधिकारों में प्रमुख रूप से चार अधिकार- जीने का अधिकार, विकास का अधिकार, सुरक्षा का अधिकार और विचारों की सहभागिता का अधिकार आते हैं.

बच्चों को सुरक्षित माहौल देने के लिए ग्राम सभा की बैठकों में बच्चों के साथ बाल अधिकारों के बारे में अलग से चर्चा का सिलसिला शुरू किया जा सकता है. बच्चों को सुरक्षित माहौल देने के संबंध में उनका शोषण रोकने, उन्हें बाल मजदूरी से मुक्त रखने और हिंसा से बचाव करने जैसे मामले प्रमुख हैं. हर बच्चा स्कूल जाये, उसे अच्छा खाना मिले, बच्चा अपराधी न बने इसके लिये समुदायों द्वारा चाइल्ड लाईन भी अपनी अहम भूमिका निभा सकते हैं. इस दिशा में मध्य-प्रदेश के भोपाल में चाइल्ड लाईन 1098 को उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है. जिसके जरिए बीते 1 दशक में तकरीबन 1 लाख बच्चों की मदद की जा सकी है. इस तरह समुदायों के आपसी सहयोग से संचालित बाल अधिकारों के हनन की सूचना चाइल्ड लाईन पर दी जा सकती है. कानून में बच्चों को प्रताड़ित करने वालों में से किसी को भी नहीं छोड़ा गया है और परिवारजनों सहित सभी लोगों के लिए सजा का प्रावधान रखा गया है.

पंचायतों में गठित समितियों को सशक्त बनाकर बाल अधिकारों का संरक्षण किया जा सकता है. इसके तहत कई महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान देने की जरुरत है, जैसे बच्चे के पैदा होते ही उसके जन्म पंजीयन का अधिकार है जिसे गांवों में ग्राम पंचायतें पूरा करती हैं. विकलांग एवं परिवारविहीन बच्चों के भी अपने अधिकार हैं जिसे जिला स्तर पर गठित बाल कल्याण कमेटी के माध्यम से पूरा कराया जा सकता हैं वगैरह.

सभी बच्चों खास तौर से बालिकाओं को शिक्षा दिलाने के लिए ग्रामीण परिवेश में भी जागरूकता लाने की जरूरत है. गैरबराबरी को बच्चियों की कमी नही बल्कि उनके खिलाफ मौजदू स्थितियों के तौर पर देखा जाना चाहिए. अगर लडक़ी है तो उसे ऐसा ही होने चाहिए, इस प्रकार की बातें उसके सुधार की राह में बाधाएं बनती हैं. इसके चलते समाज में कन्या भ्रूण हत्या, बाल दुर्व्यवहार और बाल विवाह जैसी समस्याएं पलती-बढ़तीं हैं. सामाजिक धारणा को समझने के साथ-साथ बच्चियों को बहन, बेटी, पत्नी या मां के दायरों से बाहर निकालने और उन्हें सामाजिक भागीदारिता के लिए प्रोत्साहित करने में मदद के तौर पर जाना जाए. समाज में जागरूकता आने के बावजूद अब भी लोग बेटी नहीं बेटे चाहते हैं जबकि क्राई के अध्ययनों में यह साफ् हुआ है कि लडकियां व्यक्तिगत और सामूहिक रूप में समाज की पुरानी परंपराओं को तोड़कर आगे बढ़ रही हैं और भेदभाव को स्वीकार नहीं कर रही हैं. वे मंजिल हासिल करने की दिशा में बढ़ने लगी हैं.

19.10.10

मजदूरी की कीमत पर

शिरीष खरे

खेलने कूदने के दिनों में कोई बच्चा अगर मजदूरी करने को मजबूर हो जाए तो.. और हमारे सामने तो बाल मजदूरी की मजबूरी गांवों से लेकर शहरों और महानगरों में एक मकड़जाल के जैसी फैल रही है. जबकि बाल मजदूरी से परिवारों को आमदनी के स्रोतों का केवल एक रेशा ही मिलता है जिसके लिए गरीब अपने बच्‍चों के भविष्‍य को इस गर्त में झोंक देते है. इसलिए 'क्राई' बाल मजदूरी से निपटने के लिए उसकी जड़ों में जाने और बच्‍चों में स्‍वास्‍थ्‍य, सुरक्षा, शिक्षा, पोषण प्रदान करने को लेकर बीते 30 सालों से कोशिशें करता रहा है.


जैसा कि आप सब जानते हैं कि बाल मजदूरी मानवाधिकारों का घनघोर हनन है और मानवाधिकारों के तहत शारीरिक, मानसिक से लेकर सामाजिक विकास तक का अवसर पाने का अधिकार हर बच्चे को दिया गया है. मगर यह जानकर और अचरज होता है कि खनन उद्योग, निर्माण उद्योगों के साथ-साथ्‍ा कृषि क्षेत्र भी ऐसा क्षेत्र है, जहां बड़ी संख्या में बच्‍चे मजदूरी करते हुए देखे जाते हैं. इन बच्‍चों को पगार के रूप में मेहनताना भी आधा या उससे भी कम दिया जाता है. ऐसा नहीं है कि बाल मजदूरी के निराकरण के लिए सरकारें चिन्तित न हों, मगर यह चिन्‍ता समाधान में कितनी सहयोगी साबित हुई है, यह मूल्‍याकंन का सवाल बना हुआ है.

इस समय उत्‍तर प्रदेश में 2001 की जनगणना के आधार पर 1927997 बाल मजदूरों की पहचान हुई है. इसके एबज में सरकार ने 10वी पंचवर्षीय योजना में 602 करोड़ रूपया आवंटित किया है. जबकि पंचवर्षीय नवीं योजना में 178 करोड़ रूपये खर्च किया गया था. सरकार ने बाल मजदूरी कानून-1986 के अन्‍तर्गत ऐसे क्षेत्रों को चुना है जहां ज्यादा संख्‍या में बाल मजदूर रह रहें हों और जो हानिकारक उद्योगों में काम कर रहें हो. सरकार ने लगभग देश के 250 जिलों में राष्‍ट्रीय बाल मजदूरी परियोजना  द्वारा और 21 जिलों में इण्‍डस प्रोजेक्‍ट द्वारा जिलाधिकारियों को आदेश दे रखें है कि वे बाल मजदूरी को दूर करने के लिए हरसम्‍भव प्रयास करें. इसके लिए विशेष स्‍कूल संचालित किये जाएं, बालश्रमिकों के परिवारों के लिए आर्थिक सहायता उपलब्‍ध करायी जाए  और 18 साल के पहले किसी भी दशा में उनसे मजदूरी न करायी जाए. इस सम्‍बन्‍ध में 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने भी श्रम विभाग को यह आदेश दिया है कि बच्चों को सामान्‍य कार्यो में 6 घण्‍टे से अधिक न लगाया जाए. उन्‍हें निर्धारित अवकाश के साथ्‍ा कम से कम दो घण्‍टे जरूर पढ़ाया जाए. अगर नियोजक ऐसे आदेशों की लापरवाही करें तो उस पर कम से कम 20000 रूपये का जुर्माना लगाया जाए. इस जुर्माने को बच्‍चे के भविष्‍य के लिए उपयोग में लाया जाए.

अब आप जरा देखिये कि सरकार, सुप्रीम कोर्ट, जागरूक जनता के प्रयासों के बावजूद पूरे देश में 58962 नियोजकों के विरूद्ध बालश्रम कराने के लिए मुकदमे दायर किये गये हैं और उत्‍तर प्रदेश में ऐसे अभियोग 6885 हैं. अगर यह सोचा जाए कि सब कुछ कानूनों और सजा से सुधर जाएगा तो यह मुमकिन नहीं है. कानूनों और सजा के प्रावधानों के बावजूद हमें घरों में, ढ़ाबों मे, होटलों में असंख्य बाल मजदूर मिल जाते हैं जो कड़ाके की ठण्‍ड या तपती धूप की परवाह किये बगैर काम करते है. मजदूर कार्यालय या रेलवे स्‍टेशन के बाहर चाय पहुंचाने का काम यह छोटे छोटे हाथ ही करते हैं और मालिक की गालियां भी खाते है. सभ्‍य कहे जाने वाले समाज में यह अभिशाप बरकरार है और जिसे हम नजरअंदाज बनाए हुए हैं. दरअसल तथाकथित अच्‍छे परिवारों में नौकरों के रूप में छोटे बच्‍चों को पसन्‍द किया जाता है और आर्थिक रूप से सशक्‍त होते परिवारों को अपने बच्चे, खिलाने और घर के कामकाज के लिए गरीबों के बच्चे ही पसन्‍द आते हैं.


इन छोटे मजदूरों के छोटे-छोटे कंधों पर बिखरे हुए परिवारों के बड़े बोझ हैं. असल में ऐसे कई समुदाय हैं जिन्होंने अपने आजीविका के साधन खोए हैं, जैसे कि जंगलों पर निर्भर रहने वाले आदिवासी, भूमिहीन, छोटे किसान वगैरह. जबकि देश में गरीबी का आंकलन वास्तविकता से बहुत कम किया गया है. देशभर में काम करने के दौरान हमने पाया है कि बच्चों के लिए पोषित भोजन का संकट बढ़ रहा है, उनके लिए स्कूल और आवास की स्थितियां भी बिगड़ रही हैं. फिर भी तकनीकी तौर पर बहुत सारे बच्चे ऐसे हैं जो वंचित होते हुए भी गरीबी रेखा के ऊपर हैं. जब हम गरीबी को ही वास्तविकता से कम आंक रहे हैं, तो सरकारी योजनाओं और बजट में खामियां तो होगी ही. ऐसे में हालात पहले से ज्यादा मुश्किल होते जा रहे हैं. ऐसे लोगों के लिए लोक कल्याण की योजनाएं जीने का आधार देती हैं. हम इस बात पर ध्यान खींचना चाहते हैं कि बच्चों की गरीबी सिर्फ उनका आज ही खराब नहीं करता, बल्कि ऐसे बच्चे बड़े होकर भी हाशिये पर ही रह जाते हैं. सरकार को चाहिए कि वह देश में बच्चों की संख्या के हिसाब से, सार्वजनिक सेवाओं जैसे प्राथमिक उपचार केन्द्र, आंगनबाड़ी, स्कूल, राशन की दुकानों के लिए और अधिक पैसा खर्च करे.

18.10.10

बच्चों का लापतागंज

शिरीष खरे

देश में एक बार फिर से बच्चों के गायब होने की घटनाएं सामने आ रही हैं. सामने आ रहीं घटनाओं के आधार पर गौर किया जाए तो बड़े शहरो में स्थिति ज्यादा भयावह है. गैर-सरकारी संस्थाओं का अनुमान है कि भारत में हर साल 45000 बच्चे गायब हो रहे हैं. 2007 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि देश में सबसे अधिक बच्चे झारखंड, छत्तीसगढ़, आध्र प्रदेश, बिहार और उड़ीसा से गायब हो रहे हैं.

2001 की जनगणना के आकड़ों के जोड़-घटाने में 7.2 करोड़ बच्चे लापता पाए गए हैं. एक आकड़े के मुताबिक 8.5 करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जाते. दूसरे आकड़े में 5 से 14 साल के 1.3 करोड़ बच्चे मजदूर हैं. अगर 8.5 करोड़ में से 1.3 करोड़ घटा दें तो 7.2 करोड़ बचते हैं. यह उन बच्चों की संख्या है, जो न छात्र हैं, न ही मजदूर. तो फिर यह क्या हैं, कहां हैं और कैसे हैं? इसका हिसाब भी किसी किताब या रिकार्ड में दर्ज नहीं मिलता है. इस 7.2 करोड़ के आकड़े में 14 से 18 साल तक के बच्चे नहीं जोड़े गए हैं. अगर इन्हें भी जोड़ दें तो देश के बच्चों की हालत और भी बदतर नजर आएगी.

भारत में बच्चों की उम्र को लेकर अलग-अलग परिभाषाएं हैं. संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में बच्चों की उम्र 0 से 18 साल रखी गई है. भारत में बच्चों के उम्र की सीमा 14 साल ही है. मगर अलग-अलग अधिनियमों के मुताबिक बच्चों की उम्र बदलती जाती है. जैसे किशोर-न्याय अधिनियम, 2000 में अधिकतम 18 साल, बाल-श्रम अधिनियम, 1886 में अधिकतम 14 साल, बाल-विवाह अधिनियम में लड़के के लिए न्यूनतम 21 साल और लड़की के लिए न्यूनतम 18 साल की उम्र तय की गई है. खदानों में काम करने की उम्र 15 और वोट देने की न्यूनतम उम्र 18 साल रखी गई है. इसी तरह शिक्षा के अधिकार कानून में बच्चों की उम्र 6 से 14 साल रखी गई है.

इस तथ्य को 2001 की जनगणना के उस आकड़े से जोड़कर देखना चाहिए, जिसमें 5 साल से कम उम्र के 6 लाख बच्चे घरेलू कामकाज में उलझे हुए हैं. कानून के ऐसे भेदभाव से अशिक्षा और बाल मजदूरी की समस्याएं उलझती जाती हैं. सरकारी नीति और योजनाओं में भी बच्चों की उम्र को लेकर उदासीनता दिखाई देती है. 14 साल तक के बच्चे युवा-कल्याण मंत्रालय के अधीन रहते हैं. मगर 14 से 18 साल वाले बच्चे की सुरक्षा और विकास के सवाल पर चुप्पी साध ली जाती है. किशोर बच्चों की हालत भी बहुत खराब है. 2001 की जनगणना में किशोर बच्चों की संख्या 22 करोड़ 50 लाख है. यह कुल जनसंख्या का 22 प्रतिशत हिस्सा है. इसमें भी 53 प्रतिशत लड़के और 47 प्रतिशत लड़किया हैं. यह सिर्फ संख्या का अंतर नहीं है, असमानता और लैंगिक-भेदभाव का भी अंतर है.

2001 की जनगणना में 0 से 5 साल की उम्र वालों का लिंग-अनुपात 100-879 है, जबकि 15 से 19 साल वालों में यह 1000-858 है. जिस उम्र में लिंग-अनुपात सबसे खराब है, उसके लिए अलग से कोई रणनीति बननी थी. मगर हमारे देश में उम्र की जरूरत और समस्याओं को अनदेखा किया जा रहा है. बात साफ है कि बच्चियां जैसे-जैसे किशोरिया बन रही हैं, उनकी हालत बद से बदतर हो रही है. देखा जाए तो बालिका शिशु बाल-विभाग, महिला व बाल-विकास के अधीन आता है, मगर एक किशोरी न तो बच्ची है न ही औरत. इसलिए इसके लिए कोई विभाग या मंत्रालय जिम्मेदार नहीं होता. इसलिए देश की किशोरियों को सबसे ज्यादा उपेक्षा सहनी पड़ रही है.

ऐसा नहीं है कि बच्चों के गुम होने जैसी समस्या से अकेले भारत ही जूझ रहा है. दुनिया के विकासशील देशों से लेकर विकसित देशों से भी हर साल लाखों की संख्या में बच्चे गायब हो रहे हैं. ब्रिटेन में हर साल करीब 13000 बच्चों के लापता होने की घटनाएं सामने आईं हैं. चीन में 2000 में हुई जनगणना के दौरान बीते 10 सालों में 3.7 करोड़ बच्चे गायब पाए गए. अफ्रीकी देशों की हालत भी इससे अलग नहीं है. रिकार्ड बताते हैं कि बेल्जियम में हर साल 2928 और रोमानिया में 2354 बच्चे गायब होते हैं. जबकि फ्रांस में सालाना 706 बच्चे गायब हो जाते हैं. अमेरिकी बच्चे भी इससे अछूते नहीं हैं और अमेरिकी सरकार की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2007 में यहां 4802 बच्चों के गायब होने की सूचना पुलिस को थी. यहां कई हाई प्रोफाइल बच्चे भी गायब हुए और सालों बाद भी उनका कोई अता-पता नहीं चला. बच्चों के गायब होने के ये सारे आंकड़े पुलिस द्वारा दिए जाते हैं. मगर ज्यादातर मामलों को पुलिस दर्ज ही नहीं करती या उन तक पहुंचती ही नहीं है.

ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बच्चे गायब हो रहे है बल्कि सवाल यह भी है कि बच्चे कहां जा रहे हैं ? रिकार्ड बताते हैं कि ज्यादातर गायब हुए बच्चों से या तो मजदूरी कराई जाती है या उन्हें सेक्स वर्कर बना दिया जाता है. बड़े शहरों के भीतर खेलने-कूदने की उम्र वाले बच्चों को बड़ी संख्या में भीख मांगने के लिए भी मजबूर किया जा रहा है.

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन भले ही जून 1999 से ही बाल श्रम को खत्म करने के लिए कमर कस चुका हो मगर अब भी करोड़ों बच्चे जीविका चलाने के लिए बाल मजदूरी कर कर रहे हैं. भारत में दुनिया भर के मुकाबले सबसे ज्यादा बाल श्रमिक हैं. देश में 5 से 14 साल के तकरीबन 1 करोड़ बच्चे घातक और जानलेवा पेशे में लगे हुए हैं. 12 जून को बाल श्रम के खिलाफ विश्व दिवस मनाया गया. संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने अपनी रिपोर्ट में माना है कि 1999 से आर्थिक गतिविधियों में लिप्त बच्चों की संख्या भले ही घटी हो मगर अब भी 5 से 14 साल के 16.5 करोड़ बच्चे मजदूर हैं. इनमें से ज्यादातर बच्चे शिक्षा से वंचित हैं और खतरनाक स्थितियों में काम करते हैं. इनमें से कुछ के साथ गुलामों से भी बदतर व्यवहार किया जाता है, जिन्हें उनके गरीब माता-पिता के ऋणों को चुकाने के बदले बेच दिया जाता है.

बाल सैनिकों की समस्या को भी बाल श्रम के खिलाफ विश्व दिवस पर पहचाना गया है, जो बाल श्रम के सबसे बुरे रूपों में से एक है. सयुंक्त राष्ट्र संघ बाल कोष के अनुसार दुनिया भर में करीब तीन लाख बच्चे 30 सशस्त्र संघर्षो में शामिल हैं, जिनमें 7 या 8 साल के छोटे बच्चे भी हैं. हालांकि ज्यादातर बाल सैनिकों को जबरन लड़ाई में झोंका जा रहा है. कई से खानसामों, चौकीदारों, संदेशवाहकों या जासूसों का काम लिया जाता है. लड़का हो या लड़की दोनों का ही बाल मजदूर के तौर पर अक्सर यौन शोषण किया जाता है और बहुधा इसका परिणाम अवांछित गर्भधारण और यौन रोगों में होता है.

21.9.10

बाल-अधिकारों का उल्लघंन : आयोजन समिति को नोटिस

शिरीष खरे

दिल्ली बाल संरक्षण आयोग राष्ट्रमंडल खेलों के निर्माण स्थलों पर काम करने वाले प्रवासी मजदूरों के बच्चों के बचाव में आया है. इसके लिए आयोग ने बाल अधिकारों के घोर उल्लंघन को देखते हुए खेल आयोजन समिति सहित विभिन्न सरकारी एजेंसियों को नोटिस भेजा है. पिछले दिनों क्राई द्वारा जारी रिपोर्ट पर गंभीर चिंता जताते हुए आयोग ने भी यह माना है कि प्रवासी मजदूरों के बच्चों के अधिकारों का घोर उल्लंघन किया जा रहा है.

क्राई द्वारा जारी रिपोर्ट में निर्माण स्थलों पर रहने वाले बच्चों के कई बुनियादी अधिकारों जैसे आवास, स्वच्छता, गुणवत्तापूर्ण भोजन, स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य और स्कूली शिक्षा से बेदखल किए जाने से जुड़े पहलुओं को उजागर किया गया था. इस रिपोर्ट में श्रम कानूनों और संविदा श्रम अधिनियम के प्रावधानों सहित विभिन्न नियमों की खुलेआम अवमानना के साथ-साथ दिल्ली श्रम कल्याण बोर्ड की कई परियोजनाओं के निर्माण स्थलों में बच्चों के शोषण को नजरअंदाज बनाए जाने का भी खुलासा किया गया था.

दिल्ली बाल संरक्षण आयोग ने विभिन्न सरकारी एजेंसियों को जांच रिपोर्ट भेजते हुए प्रभावित बच्चों के उचित पुनर्वास और शिक्षा सहित सभी बुनियादी अधिकारों को जल्द से जल्द बहाल करने पर जोर दिया है.

क्राई का यह अवलोकन अध्ययन ध्यानचंद्र नेशनल स्टेडियम, आरके खन्ना स्टेडियम, तालकटोरा स्टेडियम, निजामुद्दीन नाला, नेहरू रोड, जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम के दौरों और सिरी फोर्ट निर्माण स्थल से जताए गए आंकड़ों पर आधारित था. क्राई की डायरेक्टर योगिता वर्मा के मुताबिक ‘‘हमने पाया कि इन कंस्ट्रक्शन साइट्स के बच्चे अस्थाई कैम्पों में रहते हैं. इन्हें स्तरीय भोजन, साफ पानी, स्वच्छता, शिक्षा और यहां तक कि किसी प्रकार का अच्छा माहौल नहीं मिल रहा है. कुल मिलाकर इन बच्चों के बाल अधिकारों का हनन हो रहा है.’’ योगिता वर्मा मानती है ‘‘गरीबी की वजह से कंस्ट्रक्शन साइट्स पर मजदूरों का माइग्रेशन हो रहा है और बच्चे स्कूल छोड़ रहे हैं. स्टडी में पाया गया कि कंस्ट्रक्शन साइट पर मौजूद कोई भी बच्चा स्कूल नहीं जाता है.’’

हाइकोर्ट में दायर एक जनहित याचिका के अनुसार राष्ट्रमंडल खेलों के अलग-अलग निर्माण स्थलों में लगभग 4.15 लाख दिहाड़ी मजदूर काम कर रहे हैं. यहां मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी दी जा रही है. कुलमिलाकर ऐसी तमाम गंभीर स्थितियों का सबसे ज्यादा खामियाजा मजदूरों के बच्चों को भुगतना पड़ रहा है.

यह सब तब हो रहा है जबकि दिल्ली उच्च न्यायालय ने मई में ही कहा था कि आयोजन स्थलों पर काम करने वाले दैनिक मजदूरों को ‘दिल्ली बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स बोर्ड' (डीबीसीडब्ल्यूडब्ल्यूबी) के अंतर्गत पंजीकृत किया जाए ताकि उनके अधिकारों की रक्षा हो सके.

न्यायालय के आदेश को नई दिल्ली नगर निगम (एनडीएमसी), दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) एवं भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) के पास भेज दिया गया था.

क्राई के मुताबिक निर्माण स्थलों पर बच्चों के लिए स्वच्छता की कोई व्यवस्था नहीं है. कहीं-कहीं चलित शौचालय हैं लेकिन उनकी ठीक से सफाई नहीं होती. बच्चों का ध्यान रखने के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई है. इसके लिए निर्माण स्थलों के करीब कोई आंगनबाड़ी भी नहीं है. उनके रहने के स्थानों की हालत दयनीय है. उन्हें प्लास्टिक शीट से बनी झोपड़ियों में रखा गया है.

योगिता वर्मा के मुताबिक ‘‘बच्चों की तरफ हमारे कई संवैधानिक दायित्व हैं, कामनवेल्थ गेम्स को विश्वस्तरीय बनाने की कोशिश में इन संवैधानिक दायित्वों को अनदेखा नहीं किया जा सकता है.’’ संस्था के मुताबिक दिल्ली में जो कामनवेल्थ गेम्स की तैयारी चल रही है, उसमें भारत सरकार अपने देश के बच्चों के लिए संवैधानिक दायित्व और अंतराष्ट्रीय मानवीय अधिकार वचनबद्धताओं को सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रावधान बनाए. इसी तरह निर्माण कार्यो से जुड़े मजदूरों और उनके बच्चों के लिए आवास, स्वच्छता, गुणवत्तापूर्ण भोजन, स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य और स्कूली शिक्षा जैसे बुनियादी अधिकार बहाल किये जाएं. शिक्षा के अधिकार कानून को लागू करने को लेकर सरकार अगर वाकई गंभीर है तो उसे स्कूल से होने वाली ड्राप-आउट की इस समस्या को रोकने की पहल करनी होगी. आंगनबाड़ी और मिड-डे मिल जैसी योजनाओं को तत्काल प्रभाव में लाया जाए. दिल्ली हाइकोर्ट के आदेश (11 फरवरी, 2010) अनुसार सभी परिवारों का पुनर्वास नागरिक सुविधाओं के साथ किया जाए.

13.9.10

बाल अधिकारों के बीस साल बाद

शिरीष खरे


आज से बीस साल पहले 1989 को सयुंक्त राष्ट्र द्वारा पारित बाल-अधिकारों के कन्वेंशन के जरिए बच्चों के लिए एक बेहतर, स्वस्थ्य और सुरक्षित दुनिया का लक्ष्य रखा गया था. मगर समय के दप दशक गुजर जाने के बाद आज बच्चों की यह दुनिया कहीं बदतर, असुरक्षित और बीमार दिखाई देती है. हालांकि इस दुनिया में उप-सहारीय अफ्रीका और दक्षिण-एशिया के देशों की हालत बहुत पतली है. मगर इन देशों के बीच भारत की हालत और भी खराब दिखाई देती है. मामले चाहे भूख, गरीबी, शोषण, रोग तथा बच्चों के साथ बरते जाने वाले दुर्व्यवहार से जुड़े हों या प्राथमिक स्वास्थ्य और शिक्षण सुविधाओं से ताल्लुक रखने वाले आकड़ों और तथ्यों से हों, कुलमिलाकर भारत की हालत अत्यंत दयनीय बन पड़ी है.

युनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि 5 साल तक की उम्र के बच्चों की मौतों के क्रम में भारत बहुत आगे खड़ा मिलता है. यह रिपोर्ट 5 साल तक की उम्र के बच्चों की मौतों को समग्र विकास का एक निर्णायक पैमाना मानते हुए जाहिर करती है कि इस पैमाने पर भारत का स्थान 49वां है. यह स्थान पड़ौसी देश बांग्लादेश(58वां स्थान) और नेपाल(60वां स्थान) से थोड़ा सा ही अच्छा है. जबकि दक्षिण एशिया में बाल-मृत्यु के पैमाने पर सबसे अच्छी स्थिति श्रीलंका (15वां स्थान) की है.

'द स्टेट ऑव द वर्ल्डस् चिल्ड्रेन' के नाम से जारी होने वाली युनिसेफ की इस रिपोर्ट का मकसद बाल-अधिकारों से जुड़े वैश्विक कंवेंशन का विकास, विस्तार, उपलब्धियों और चुनौतियों को जांचना होता है. इस रिपोर्ट में एक सकारात्मक तथ्य यह है कि साल 1990 के बाद से 5 साल तक की उम्र के बच्चों के बीच औसत से कम वजन वाले बच्चों की संख्या दुनियाभर में कम हुई है. यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है खासकर से तब जबकि 5 साल तक की उम्र के बच्चों के बीच मृत्यु-दर अब भी काफी ऊंची बनी हुई है. उप-सहारीय अफ्रीका तथा दक्षिण-एशिया बाल-विवाह और बाल-मजदूरी के मामले काफी गंभीर और बहुतायत में पाए जाते हैं. रिपोर्ट आगाह करती है कि अगर हम वाकई बाल-अधिकारों से जुड़ी हुईं समस्याओं का समाधान करना चाहते हैं तो इसके लिए हमें नए सिरे से सोचते हुए पुराने तौर-तरीकों को बदलने की जरुरत होगी. संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के मुताबिक बाल-अधिकारों का दायरा भी बढ़ाये जाने की जरुरत है.

भारत में सरकारी आकड़ों के हवाले से देश की 37.2% आबादी गरीबी रेखा के नीचे है. यह दर्शाती है कि देश में गरीबी बहुत तेजी से बढ़ रही है. यही वजह है कि अर्थव्यवस्था से जुड़े तमाम बड़े दावों के बावजूद देश में 5 साल से कम उम्र के 48% बच्चे सामान्य से कमजोर जीवन जीने को मजबूर हो रहे हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया के कुल कुपोषित बच्चों में से 49% भारत में पाये गए हैं. कमरतोड़ मंहगाई के साथ-साथ यहां एक सेकेण्ड के भीतर 5 साल के नीचे का एक बच्चा कुपोषण की चपेट में आ जाता है. भारत में 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 44.5% (करीब आधी) औरतें ऐसी हैं जिनकी शादियां 18 साल के पहले हुईं हैं. इन 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 22% (करीब एक चौथाई) औरतें ऐसी हैं जो 18 साल के पहले मां बनीं हैं. इन कम उम्र की लड़कियों से 73% (सबसे ज्यादा) बच्चे पैदा हुए हैं. फिलहाल इन बच्चों में 67% (आधे से बहुत ज्यादा) कुपोषण के शिकार हैं. देश की 40% बस्तियों में तो स्कूल ही नहीं हैं. 48% बच्चे प्राथमिक स्कूलों से दूर हैं. 6 से 14 साल की कुल लड़कियों में से 50% लड़कियां तो स्कूल से ड्राप-आऊट हो जाती हैं. लड़कियों के लिए सरकार भले ही `सशक्तिकरण के लिए शिक्षा´ जैसे नारे देती रहे मगर नारे देना जितने आसान हैं, लक्ष्य तक पहुंचना उतना ही मुश्किल हो रहा है. क्योंकि आखिरी जनगणना के मुताबिक भी देश की 49.46 करोड़ महिलाओं में से सिर्फ 53.67% साक्षर हैं. मतलब 22.91 करोड़ महिलाएं निरक्षर हैं. एशिया महाद्वीप में भारत की महिला साक्षरता दर सबसे कम है. क्राई के मुताबिक भारत में 5 से 9 साल की 53 फीसदी लड़कियां पढ़ना नहीं जानती. इनमें से ज्यादातर रोटी के चक्कर में घर या बाहर काम करती हैं. इसी तरह जहां पूरी दुनिया में 24.6 करोड़ बाल मजदूर हैं, वहीं केंद्र सरकार के अनुसार अकेले अपने देश में 1.7 करोड़ बाल मजदूर हैं और जिनमें से भी 12 लाख खतरनाक उद्योगों में काम कर रहे हैं.

2.9.10

अब परदेश नहीं जाना

अपने ही देश में कुछ कर गुजरने के जज्बे ने लोहरदगा की मनोरमा एक्का को दोबारा उनकी जमीन से जोड़ दिया है. झारखण्ड की यह लड़की अपने गांवों की लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अमेरिका में अच्छी खासी नौकरी छोड़ कर स्वदेश लौट आई है. जो इनदिनों बाल मजदूरों और ग्रामीण महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने के लिए व्यवस्था से लड़ाई लड़ रही है.



इसे मनोरमा की मेहनत का ही नतीजा कहेंगे कि बदला नवाटोली की फूलमनी और शोभा ही नहीं दर्जनों ऐसी महिलाएं हैं जो आज आत्मनिर्भर बनी हैं और दूसरे को आत्मनिर्भर बनाने में भी जुटी हैं. ये वही महिलाएं हैं जो दो जून की रोटी के लिए दूसरे राज्यों में जाती थीं और ढ़ेर सारी परेशानियां सिर पर झेलती थीं. अब यही महिलाएं गांव में स्वयं सहायता समूह से जुड़ स्वावलंबी बनी हुई हैं. मनोरमा ने 12 गांवों में जागरूकता अभियान चलाकर लगभग डेढ़ सौ बच्चों को स्कूल से जोड़ने का काम किया है. यह बच्चे कभी बाल मजदूर थे.

मनोरमा रांची से पीजी डिप्लोमा इन रूरल डेवलपमेंट की शिक्षा ग्रहण कर अमेरिका चली गई. अमेरिका में उन्होंने जनवरी 2001 तक पढ़ाई के साथ-साथ प्री स्कूल में नौकरी भी की. 2001 के अंतिम महीने में वह अमेरिका से भारत लौट आई. इसके बाद यह फिर से 2005 में सोशल व‌र्क्स की शिक्षा के लिए अमेरिका चली गई. मगर अमेरिका की चमक-दमक भी उसे ज्यादा  देर नहीं रोक सकी और 2007 में वह वापस भारत आकर उरांव आदिवासी महिला के नेतृत्व पर शोध करने लगी. इसी दौरान जब मनोरमा ने महिलाओं और बच्चों की स्थितियों को करीब से देखा तो यही रहकर महिलाओं और बच्चों को अधिकार दिलाने का निर्णय लिया.

जब मनोरमा ने लोहरदगा में महिला और बाल अधिकार को लेकर व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई शुरू की तो पहली बार उसका हकीकत से वास्ता पड़ा. बहुत से राजनैतिक और सामाजिक पेचेदियां सामने आईं मगर वह उन्हें अपने अभ्यास का एक हिस्सा मानती रहीं. यहां तक कि जब यह बाल अधिकार से जुड़े मामलों को लेकर गांव में जाती थी तो गाँव वाले इसे कोई साजिश के तौर पर देखते-समझते थे. इस तरह अपने पहले पड़ाव में मनोरमा को आदिवासी समुदाय का ही पूरा समर्थन नहीं मिल पाया था. मगर अब धीरे-धीरे स्थितियां बहुत हद तक बदल चुकी हैं. बदल रही हैं.

बाल अधिकार पर कार्य करने वाली संस्था क्राई के सहयोग ने मनोरमा के हौसले को बुलंद किया है. मनोरमा ने होप संस्था की स्थापना कर महिला व अधिकार को अपना उद्देश्य बनाया है.

मनोरमा कहती है कि उसने अपनी जिंदगी को समाज में फैली गैर बराबरी मिटाने के नाम कर दी है. वह अपनी भूमिका को बच्चों और महिलाओं तक उनके अधिकार बताने और बेहतर समाज बनाने के रूप में देख रही है.

31.8.10

कितने असुरक्षित सुरक्षित देश के बच्चे

शिरीष खरे

क्या आप जानते हैं कि भारत के ग्रामीण इलाकों में तीन साल से कम उम्र के 40% बच्चों का वजन औसत से कम है, जबकि 45% का विकास सही तरीके से नहीं हो पाता है. बच्चों को पोषणयुक्त भोजन मुहैया कराने के मामले में भारत अपने पड़ोसी देश बांग्लादेश और नेपाल से भी पीछे है. बच्चों को पोषणयुक्त भोजन मुहैया कराने के मामले में 51 देशों के बीच भारत का स्थान 22वां है.

सरकारी आकड़ों के लिहाज से देश की 37.2% आबादी गरीबी रेखा के नीचे है. जो दर्शाती है कि देश में गरीबी बहुत तेजी से बढ़ रही है. यानी जितना हम सोचते हैं उससे कहीं ज्यादा बच्चे गरीबी में जीने को मजबूर हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के कुल कुपोषित बच्चों में से 49% भारत में हैं. अर्थव्यवस्था से जुड़े तमाम बड़े बड़े दावों के बावजूद भारत में बच्चों की कुपोषण से होने वाली मौतें बढ़ती ही जा रही हैं. देश में एक सेकेण्ड के भीतर 5 साल के नीचे का एक बच्चा कुपोषण के कब्जे में आ जाता है.

इसी तरह देश के 3.5 करोड़ बच्चे बेघर हैं जिनमें से 35000 बच्चों को ही आश्रय मिल सके हैं. इन आश्रयों में से भी बहुत सारे गैर सरकारी संगठनों द्वारा चलाये जा रहे हैं. मानवाधिकार संगठन के मुताबिक फुटपाथ पर रात बिताने वाले करीब 1 करोड़ बच्चों में से ज्यादातर को यौन-शोषण और सामूहिक हिंसा झेलनी पड़ती हैं. दिल्ली में जून 2008 से लेकर जनवरी 2009 तक 2210 बच्चे लापता हुए हैं. दिल्ली में एक दिन में औसतन 17 बच्चे गायब हो रहे हैं. गैर-सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में हर साल 72 लाख बच्चे गुलामी का शिकार हो रहे हैं. इनमें से एक तिहाई दक्षिण एशियाई देशों के होते हैं. गैर-सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर साल 45 हजार बच्चे गायब हो रहे हैं. अध्ययन कहते हैं कि गायब हुए बच्चों से मजदूरी कराई जाती है, या उन्हें सेक्स वर्कर बना दिया जाता है.

हालांकि केंद्र सरकार उन राज्य सरकारों के प्रति नाराजगी जताती रही है है जो केंद्र की समेकित बाल संरक्षण योजना पर हस्ताक्षर तो चुके हैं मगर उसके बाद से अपने यहां बाल संरक्षण आयोग का गठन तक नहीं कर सके हैं. कुपोषण, असुरक्षा जैसी तमाम समस्याओं की मार झेलते भारतीय बच्चों की एक बड़ी समस्या अनेक कारणों से की जाने वाली मजदूरी भी है. बाल अधिकारों से जुड़ी अनेक अंतरराष्ट्रीय संधियों का हस्ताक्षरकर्त्ता होने के बावजूद भारत बाल मजदूरों का गढ़ बन चुका है. पूरी दुनिया में 24.6 करोड़ बाल मजदूर हैं, जबकि केंद्र सरकार के अनुसार देश में 1.7 करोड़ बाल मजदूर हैं जिनमें से 12 लाख खतरनाक उघोगों में काम करते हैं. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के बाल मजदूरी से जुड़े आकड़ों के मुताबिक सेक्स इंडस्ट्री में खासतौर से लड़कियों की तस्करी विभिन्न यौन गतिविधियों के लिए हो रही है. इसी तरह घरेलू मजदूरी में भी लड़कियों की संख्या सबसे ज्यादा होती है.

तस्करी और लापता बच्चों के बीच गहरे रिश्ते का खुलासा एनएचआरसी की रिसर्च रिपोर्ट (2004) भी करती है जिसमें कहा गया है कि भारत में हर साल 30 हजार से ज्यादा बच्चों के लापता होने के मामले दर्ज होते हैं. इनमें से एक-तिहाई का पता नहीं चलता है. दक्षिण एशिया में दुनिया के किसी अन्य हिस्से के मुकाबले सर्वाधिक बाल-विवाह भारत में होते हैं. भारत में 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 44.5% (करीब आधी) औरतें ऐसी हैं जिनकी शादियां 18 साल के पहले हुईं हैं. इन 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 22% (करीब एक चौथाई) औरतें ऐसी हैं जो 18 साल के पहले मां बनीं हैं. इन कम उम्र की लड़कियों से 73% (सबसे ज्यादा) बच्चे पैदा हुए हैं. फिलहाल इन बच्चों में 67% (आधे से बहुत ज्यादा) कुपोषण के शिकार हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक बाल-विवाह बच्चियों का जीवन बर्बाद कर रहा है. देश में बच्चों का लिंग अनुपात 976:1000 है, जो कुल लिंग अनुपात 992:1000 के मुकाबले बहुत कम है.

शिक्षा के लिहाज से तो बच्चों की हालात कुछ ज्य़ादा ही पतली है. देश की 40% बस्तियों में तो स्कूल ही नहीं हैं. 48% बच्चे प्राथमिक स्कूलों से दूर हैं. 6 से 14 साल की कुल लड़कियों में से 50% लड़कियां तो स्कूल से ड्राप-आऊट हो जाती हैं.

इन सबके बाबजूद पिछले बजट में बच्चों के हकों से जुड़े कई शब्दों से लेकर ‘सर्व शिक्षा अभियान’ और ‘मिड डे मिल’ जैसे योजनाओं को अपेक्षित जगह नहीं दी गई. कुल बजट में 25% की बढ़ोतरी तो की गई है मगर बच्चों की शिक्षा पर महज 10% की ही बढ़ोतरी हुई. यानी आमतौर पर बढ़ोतरी दर में से बच्चों की शिक्षा में 15% की कमी हुई.

जहां बाल-कल्याण की विभिन्न योजनाएं असफल होती दिख रही हैं, वहीं बच्चों के कल्याण के लिए बजट (2009-10) में राशि का प्रावधान अपेक्षित अनुपात में घोषित नहीं किया जाता है. जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा को अनदेखा किया गया है. अमेरिका, इंग्लैंड और फ्रांस में कुल बजट का 6-7% हिस्सा सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है, मगर भारत में कुल बजट का मात्र 3% शिक्षा और सिर्फ 1% स्वास्थ्य पर खर्च होता है. अगर भारत सरकार यह दावा करती है कि वह बाल कल्याण और सुरक्षा के लिए प्रयासरत है तो उसे इस सवाल का जवाब भी देना होगा कि आखिर स्वास्थ्य की दृष्टि से भारत अपने से भी गरीब कहे जाने वाले पिछड़े देशों से भी पीछे क्यों खड़ा है ?

2.8.10

कामनवेल्थ खेलों से उजड़ रहा बचपन

दिल्ली/ भारत में बाल अधिकारों के लिए सक्रिय संस्था क्राई ने कहा है कि कामनवेल्थ गेम्स के निर्माण स्थलों पर रहने वाले मजदूर परिवारों के बच्चे कई बुनियादी अधिकारों जैसे आवास, स्वच्छता, गुणवत्तापूर्ण भोजन, स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य और स्कूली शिक्षा से बेदखल हो गए हैं। क्राई ने अपने अवलोकन में पाया है कि निर्माण कार्यों से जुड़े मजदूर परिवारों के बच्चों को कई गंभीर स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।

यह अवलोकन ध्यानचंद्र नेशनल स्टेडियम, आरके खन्ना स्टेडियम, तालकटोरा स्टेडियम, निजामुद्दीन नाला, नेहरू रोड, जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम का दौरा करके क्राई द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट और सिरी फोर्ट निर्माण स्थल से किये गए एक सेम्पल सर्वे के आधार पर किया गया है। क्राई की डायरेक्टर योगिता वर्मा कहती है कि ‘‘निर्माण कार्यो में लगे मजदूरों के बच्चे जिन अस्थायी शिविरों में रह रहे हैं, वहां हमने पाया कि उनके लिए न तो अच्छा भोजन है, न पीने का साफ पानी, न साफ-सफाई, न बारिश या धूप से बचने की सहूलियत, और न ही स्कूली शिक्षा या स्वास्थ्य जैसी बुनियादी अधिकार ही हैं।’’ उन्होंने आगे बताया कि ‘‘गरीबी के चलते बहुत सारे मजदूर परिवारों को अपनी-अपनी जगहों से पलायन करके दिल्ली के निर्माण स्थलों तक आना पड़ा है, नतीजन बड़ी संख्या में उनके बच्चे स्कूलों से ड्राप आउट हो गए हैं।’’

हाइकोर्ट में दायर एक जनहित याचिका के अनुसार, राष्ट्रमंडल खेलों के अलग-अलग निर्माण स्थलों में लगभग 4.15 लाख दिहाड़ी मजदूर काम कर रहे हैं। यहां मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी दी जा रही है। कुलमिलाकर, ऐसी तमाम गंभीर स्थितियों का सबसे ज्यादा खामियाजा मजदूरों के बच्चों को भुगतना पड़ रहा है।

योगिता वर्मा के मुताबिक ‘‘बच्चों की तरफ हमारे कई संवैधानिक दायित्व हैं, कामनवेल्थ गेम्स को विश्वस्तरीय बनाने की कोशिश में इन संवैधानिक दायित्वों को अनदेखा नहीं किया जा सकता है।’’ संस्था के मुताबिक दिल्ली में जो कामनवेल्थ गेम्स की तैयारी चल रही है, उसमें भारत सरकार अपने देश के बच्चों के लिए संवैधानिक दायित्व और अंतराष्ट्रीय मानवीय अधिकार वचनबद्धताओं को सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रावधान बनाएं। इसी तरह :

 निर्माण कार्यो से जुड़े मजदूरों और उनके बच्चों के लिए आवास, स्वच्छता, गुणवत्तापूर्ण भोजन, स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य और स्कूली शिक्षा जैसे बुनियादी अधिकार बहाल किये जाए।

 शिक्षा के अधिकार कानून को लागू करने को लेकर सरकार अगर वाकई गंभीर है तो उसे स्कूल से होने वाली ड्राप-आउट की इस समस्या को रोकने की पहल करनी होगी। आंगनबाड़ी और मिड डे मिल जैसी योजनाओं को तत्काल प्रभाव में लाया जाए।


 दिल्ली हाइकोर्ट के आदेश (11 फरवरी, 2010) अनुसार, सभी परिवारों का पुनर्वास नागरिक सुविधाओं के साथ किया जाए।

सिरी फोर्ट निर्माण स्थल से सेम्पल स्टडी के निष्कर्ष :

 इस निर्माण स्थल के बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। (भारत में 6 से 14 साल तक के 80,43,889 बच्चे स्कूल से बाहर हैं।)

 इस निर्माण स्थल में या इसके आसपास चाईल्डकेयर यानी बच्चे की देखभाल जैसे आंगनबाड़ी वगैरह की कोई सुविधा नहीं है।


 यहां आवास की स्थितियां बहुत खराब हैं। आवासीय सामग्री के तौर पर टीन और प्लास्टिक की चादरों को उपयोग में लाया जा रहा है, जो कि सुरक्षा के लिहाज से कतई ठीक नहीं कही जा सकती हैं। आश्रय के नाम पर मजदूर परिवारों के हिस्से में 7X7 फीट की टीन की चादरों का घेरा है। परिवार में चाहे कितने भी लोग हों, उनके हिस्से में एक ही सकरा घेरा है।

 यहां प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध नहीं है। शौचालय की सेवा भी लगभग न के बराबर हैं, कुछ जगहों पर मोबाइल शौचालय जरूर देखें गए हैं, जो कि साफ-सुथरे नहीं हैं।

 यहां 96% मजदूर गरीबी रेखा से नीचे हैं। 36% मजदूरो को अपनी-अपनी जगहों से खेती की विफलताओं के चलते दिल्ली की ओर पलायन करना पड़ा है।

 यहां 84% मजदूरों को 203 रूपए/प्रति दिन की न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी दी जा रही है।

निर्माण कार्यों से जुड़े यह मजदूर बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाके से दिल्ली आए हुए हैं। इनमें से ज्यादातर भूमिहीन मजदूर और सीमांत किसान हैं। कृषि क्षेत्र में आए संकट के चलते जिन परिवारों को पलायन करना पड़ा है, उनमें से ज्यादातर अनाज पैदा करने के लिए अप्रत्याशित वर्षा पर निर्भर रहते हैं। कई सालों से अपेक्षित वर्षा न होने से इनके सामने आजीविका का संकट गहराया है। निर्माण कार्यों से जुड़े यह मजदूर जिन गांवों से आए हैं, उनके उन गांवों के मुकाबले दिल्ली के निर्माण स्थलों में काम करने और रहने की स्थितियां बेहद खराब हैं। यहां कानूनी सुरक्षा से लेकर मजदूरों और उनके बच्चों के अधिकारों तक का उल्लंघन खुलेआम चल रहा है।  

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20.6.10

खेतों में काम करना बाल मजदूरी क्यों नहीं ?

शिरीष खरे


बाल अधिकारों से जुड़ी लगभग सभी संधियों पर दस्तखत करने के बावजूद भारत बाल मजदूरों का सबसे बड़ा घर क्यों बन चुका है, और इसी से जुड़ा यह सवाल भी सोचने लायक है कि बाल श्रम निषेध एवं नियंत्रण कानून, 1986 के बावजूद हर बार जनगणना में बाल मजदूरों की तादाद पहले से कहीं बहुत ज्यादा क्यों निकल आया करती है ?

मगर हकीकत इससे कहीं भयानक है। दरअसल बाल मजदूरी में फसे केवल 15% बच्चे ही कानून के सुरक्षा घेरे में हैं। जबकि देश के 1.7 करोड़ बाल मजदूरों में से 70% बच्चे खेती के कामों से जुड़े हैं, जो कानून के सुरक्षा घेरे से बाहर ही रहते हैं। इसलिए जब तक खेती से जुड़े कामों को भी बाल मजदूरी मानकर उन पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाएगा, तब तक बाल मजदूरी को जड़ सहित उखाड़ फेंकना संभव नहीं हो पाएगा।

आजादी से 39 साल बाद और अबसे 24 साल पहले, बाल श्रम निषेध एवं नियंत्रण कानून, 1986 के जरिए भारतीय बच्चों को खतरनाक कामों से बाहर निकालने के लिए वैधानिक कार्रवाई शुरू हुई थी। इसके बाद, 2006 को इसी कानून में बाल मजदूरी के कई क्षेत्रों और घरेलू कामों को प्रतिबंधित किया गया। कुलमिलाकर, तब 16 व्यवसायों और 65 प्रक्रियाओं को भी खतरनाक कामों की सूची में शामिल किया गया। मगर इस सूची से खेती से जुड़े कई खतरनाक काम छूट ही गए।

खेत-खलिहानों में काम करने या पशुओं को चराने वाले बच्चों के पास अगर पढ़ने लायक समय भी नहीं बचेगा, तो जाहिर है उनके आने वाले समय को अंधकार ले डूबेगा। खासतौर से लड़कियों के साथ तो मुसीबतें ज्यादा हैं, क्योंकि उन्हें खेती के कामों के साथ-साथ घर और छोटे बच्चों को भी संभालना पड़ता है। इन बच्चों की हालत भी बाकी क्षेत्रों के बाल मजदूरों जैसी ही है। इसके बावजूद इन्हें बाल मजदूर क्यों नहीं कहा जा सकता है ?

हालांकि यह एक अजीब स्थिति है, मगर कहीं न कहीं एक सच भी है कि खेती के क्षेत्र में बाल मजदूरों की भारी संख्या के चलते ही इन्हें बाल मजदूर कहने या मानने में परहेज किया जा रहा है। बाल मजदूरों की इतनी भारी संख्या का दबाव कहीं न कहीं कानून और नीति बनाने वाले के ऊपर भी रहता है। यह एक असमंजस से भरा सवाल बना हुआ है कि ‘‘अगर बच्चों ने खेतों में काम करना बंद कर दिया तो फिर क्या होगा ?’’

यह भी एक कड़वा सच है कि परिवार वालों के पास उपयुक्त रोजगार का जरिया और पर्याप्त आमदनी नहीं होने के चलते वह अपने बच्चों को काम पर भेजते हैं। एक तबके के मुताबिक इसमें हर्ज भी नहीं है। मगर इसके आगे यह भी गौर करना जरूरी होगा कि अगर बाजारों में हमेशा से बच्चों की मांग बनी भी रहती है तो इसलिए कि उनकी मजदूरी बहुत अधिक सस्ती होती है। जबकि गरीब और बंधुआ परिवार वाले तो बाजारों की मांग के आगे हमेशा से झुके रहे हैं। यह परिवार वाले अपने बच्चों को दूर इलाकों में अच्छा पैसा दिलवाने की उम्मीद पर जिन ठेकेदारों के हाथों ‘‘बेचते’’ हैं, वह उन्हें शोषण के रास्ते पर ही धकेल रहे हैं।

कुछ महीने पहले राजस्थान के श्रम विभाग ने केन्द्र सरकार के श्रम मंत्रालय को बाकायदा एक पत्र लिखकर यह सिफारिश की थी कि बाल मजदूरी पर कारगर तरीके से पाबंदी लगाने के लिए श्रम निषेध एवं नियंत्रण कानून में खेती से जुड़े कार्यों को भी जोड़ा जाए। असल में राजस्थान से बहुत सारे बाल मजदूर गुजरात की तरफ पलायन करते हैं। मगर श्रम निषेध एवं नियंत्रण कानून में खेती से जुड़े कार्यों को शामिल नहीं किए जाने के चलते प्रदेश का श्रम विभाग यह मान रहा है कि जहां बाल मजदूरी को बढ़ावा देने वाली प्रवृतियों को कानूनी आड़ मिल रही है, वहीं वह कोई कार्रवाई नहीं कर सकता है। बीते साल केवल अगस्त महीने का हाल यह रहा कि उत्तरी गुजरात में कपास की खेती से जुड़े एक दर्जन से भी ज्यादा बाल मजदूर मारे गए। तब इन हादसों के पीछे बीटी कपास में जंतुनाशक दवा के रियेक्शन की आशंका जतलायी गई थी।

आमतौर पर यह भी कहने सुनने में आता है कि अगर काम खतरनाक नहीं है तो बच्चों से काम करवाने में कोई हर्ज नहीं है, जैसे कि खेती। मगर बच्चों के मामले में कौन-सा काम खतरनाक है या नहीं है, यह तो उन बच्चों को देने वाले काम पर ही निर्भर करता है। हमें यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि खेती से जुड़े काम मुश्किलों से भरे होते ही नहीं हैं। जबकि खेतों में भी तो खतरनाक मशीनों, औजारों, उपकरणों के इस्तेमाल से लेकर भारी-भरकम चीजों को उठाने और लाने-ले जाने तक के काम होते हैं। खेतों में भी तो स्वास्थ्य के लिए प्रतिकूल माहौल में काम करना होता है, जिसमें खतरनाक पदार्थों के मामले, दलाल या मालिकों के काम करने का तरीके, मौसम या तापमान और हिंसा के स्तर भी शामिल हैं। खेती में भी तो जटिल परिस्थितियों में काम के लिए रातदिनों और घंटों का समय तय नहीं होता है। एक बच्चे को खेत में एक दिन के कम-से-कम 10 से घंटे तो बिताने ही पड़ते हैं। फसल बुहाई और कटाई के मौसम में तो काम का कोई हिसाब-किताब भी नहीं रहता है।

बीड़ जिले की रूपल माने (13 साल) बताती है कि उसे सुबह 9 से शाम के 7 बजे तक खेतों में ही काम करना पड़ता है। इसी तरह, लातूर जिले के सुभाष तौर (14 साल) कहता है कि वह 12-13 घंटे खेतों में रहता है, और कई-कई हफ्तों तक ढंग से आराम नहीं कर पाता है। यहां तक कि महीनों-महीनों तक घर लौटने की इजाजत भी नहीं मिलती है। गौर करने वाला तथ्य यह भी है कि देशभर में 5 से 14 साल तक के 42% बच्चे इसी तरह के कामों में लगे हुए हैं। जब तक इस मामले में किसी नतीजे तक नहीं पहुंचा जाता है, तब तक ऐसे बच्चों से इसी तरह के काम करवाने वालों को खुली छूट मिलती रहेगी।

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14.4.10

सुभागलाल का सपना सच हो गया

शिरीष खरे


वैसे तो देश के असंख्य सुभागलालों का सपना सच नहीं होता है। मगर घोरवाल के सुभागलाल का सपना सच हो गया। उसके गांव के सारे बच्चे अब स्कूल जाते हैं। जब वह छोटा था तब ऐसा कतई नहीं था।

ग्राम घोरवाल, उत्तरप्रदेश के सोनभद्र जिले में हैं, जहां बेहतरीन कलीनों को बनाने का काम चलता है। यहां के सुभागलाल जब बच्चे थे तो अपने जैसे बहुत सारे आदिवासी बच्चों की तरह बुनाई के फंदो में उलझे थे। उन दिनों सुभागलाल अपने बचपन को बहुत सस्ते दामों में बेचते थे। गरीबी के चलते, उनके जैसे बहुत सारे बच्चे मानो अपने पिताओं का कर्ज चुकाने के लिए पैदा हुए हो। कारखानों में स्थाई भाव से काम करते रहना मानो उनकी नियति में हो। बकौल सुभागलाल तब से अब में अंतर है, अब इसी घोरवाल में पहली से पांचवीं तक के 98 बच्चे हैं, सारे के सारे स्कूल जाते हैं। यही बच्चे आसपास के 12 गांवों के प्राथमिक स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था को भी तंदुरूस्त बनाए रखना चाहते हैं।

सुभागलाल ग्रेजुएट हैं और घोरवाल गांव के प्रधान भी चुने गए हैं। इलाके में पहली बार ऐसा हुआ है कि जो कभी बंधुआ मजदूर था, वो आज ग्रामप्रधान है। यकीकन बंधुआ मजदूर से (वाया ग्रेजुएशन) ग्रामप्रधान बनने तक की उनकी यह कहानी अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। मगर उससे भी महत्वपूर्ण उनका वह सपना है, जो सच में बदल गया है।

सुभागलाल ने आज अपने आसपास के 12 गांवों के बच्चों को इकट्ठा करके इतना ताकतवर बना दिया है कि यहां के बच्चे जब-तब अपने हकों के लिए इकट्ठा होते हैं, आपस में बतियाते हैं और कई सवाल खड़े किया करते हैं। यह स्लेट, कापी, पेन, पट्टी, ब्लेकबोर्ड, साईकिल, होमवर्क से लेकर मास्टर साहब की छोटी-बड़ी बातों का पूरा ख्याल रखते हैं। यह हिन्दी और अंग्रेजी भी पढ़ते हैं और अपने-अपने, अलग-अलग सपनों का पीछा भी किया करते हैं।

जैसे कि यहां की उर्मिला कुमारी जब आठवीं की ओपेन स्कूल परीक्षा में बैठी तो उसकी बड़ी उम्र उसके सामने बड़ी बाधा थी। उसके लिए पास होना एक चमत्कार जैसा था। मगर उर्मिला ने यह चमत्कार कर दिखाया है। ग्यारह साल पहले, उर्मिला भी और लड़कियों के तरह कालीन कारखाने को जाती थी। तब उसकी बंधी बंधाई जिंदगी के आगे भी अगर आशा की जरा सी भी लौ बची थी तो वह उसकी पढ़ाई में ही थी। आज यह अपनी भलाई के बहुत सारे अध्याय खुलके पढ़ती है। एक गरीब घर की बेटी अपने खुले-खुले से दिनों के पीछे अपनी, माता-पिता और बाल कल्याण समिति की मेहनत को खास बताती है। असल में यह खासियत सालों की लगन, धीरज, दिलचस्पी और जूनून का मिलाजुला असर है।

बाल कल्याण समिति, क्राई के सहयोग से स्थानीय स्तर पर संचालित एक गैर-सरकारी संस्था है। यह संस्था कालीन कारखानों में काम करने वाले बच्चों की पहचान करती है, उनकी मजदूरी के पीछे छिपी मजबूरी को समझती है, फिर उनकी मजदूरी को दूर करने के हरसंभव उपाय ढ़ूढ़ती है। इस तरह से यह संस्था कालीन कारखानों के बाल-मजदूरों को शिक्षा के रास्ते पर ले जाने का काम करती है। जब यह संस्था नहीं थी तब यहां स्कूल का भवन तो था, नहीं था तो बच्चों में स्कूल जाने का जज्बा।

यह बच्चे भी अपने माता-पिताओं की तरह बंधुआ मजदूर जो थे। बंधुआ इसलिए क्योंकि खेती के लिए उनके पास खुद के खेत नहीं थे और न रोजगार के कोई स्थायी साधन ही। तभी तो उनके घर की गृहस्थी चलाने के लिए उनके बच्चे कारखानों की ओर जाया करते थे।

ऐसे में उन्हें स्कूल की ओर मोड़ना चुनौतियों से भरा काम था। इसलिए सबसे पहले तो यहां सुभागलाल जैसे कामकाजी बच्चों के लिए अनौपरिक शिक्षण केन्द्र खोले गए। इसकी कक्षाओं को कामकाजी बच्चों के समय और सहूलियतों के मुताबिक लगाया जाता। इससे यहां के बच्चों को पहली बार पढ़ाई-लिखाई से जुड़ने का मौका मिला। पहले-पहल बच्चे ऊंघते रहते। मगर धीरे-धीरे जब उनका रूझान पढ़ाई की तरफ बढ़ा तो इधर-उधर भागने की बजाय कई-कई घण्टे पढ़ते-पढ़ाते, हँसते और खेलते।

इसी के सामानांतर, कामकाजी बच्चों के माता-पिताओं की आमदनी में बढ़ोतरी के लिए कई स्तरों पर प्रयास शुरू किये गए। पहला तो यह कि, इसके लिए गांव के आसपास की सार्वजनिक जमीनों पर स्थानीय लोगों के कब्जों को पहचाना गया और फिर इन कब्जों को हटाने की मुहिम चालू हुई। जहां-जहां से कब्जे हटाये गए, वहां-वहां की जमीनों पर सामूहिक खेती को बढ़ावा दिया गया। हालांकि इन बंजर जमीनों से अनाज उगाना कोई आसान काम नहीं था। मगर सबके अपने-अपने समय, धन, ज्ञान और मेहनत के बराबर लगने से जो बड़ी कठिनाई थी वो भी कई हिस्सों में टूटकर हल हो गई। इसके बाद खेतों में जो पैदावार लहलहाई उसे भी सामूहिक तौर से बाजारों में लाया गया और बेचा गया। आखिरी में जो नफा हुआ वो बराबर हिस्सों में बट गया। इस तरह आजीविका का स्थाई हल मिलने से उनकी आमदनी में पहले से सुधार आया। दूसरा यह कि, यहां के ऐसे परिवारों को नरेगा जैसे योजनाओं का फायदा पहुंचाने के लिए जागरूकता अभियान चलाया गया। तीसरा यह कि, उनकी रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतों का ख्याल रखते हुए उन्हें ग्राम-सभा और पंचायत की गतिविधियों में हिस्सेदार बनाया गया। चौथा यह कि, उनके बीच पहले तो महिलाओं के स्वयं-सहायता समूह बनाए गए और उसके बाद लघु ऋण समितियां गठित हुईं। इन सबसे यहां की आर्थिक-सामाजिक स्थितियां जैसे-जैसे पलटने लगीं, वैसे-वैसे उनके बच्चों के कंधों से काम के बोझ भी हटने लगे। इसीलिए तो जिस पुरानी पीढ़ी ने पढ़ने-लिखने की कभी नहीं सोची थी, वो आज की पीढ़ी को पढ़ाने-लिखाने के बारे में सोचती है। आलम यह है कि बच्चे तो बच्चे बड़े-बुर्जग भी वर्णमाला के आकार, प्रकार और मायने बाखूबी जान रहे हैं। बड़े गर्व की बात है कि यह अपने बच्चों की अच्छी शिक्षा से ही अपनी बेहाली को काट देना चाहते हैं। जहां यह कहते हैं कि काफी कुछ बदला है, वहीं सुभागलाल कहते हैं ‘‘अभी काफी कुछ बदलना बाकी है। शिक्षा का स्तर अपने लड़कपन में है, जिसे अपने समय पर जवान भी तो होना है।’’


चलते-चलते

इसी तरह से क्राई देश के 6,700 गांवों और मलिन बस्तियों के साथ मिलकर काम कर रहा है। क्राई मानता है कि हर समुदाय के बच्चों को जो अधिकार देने जरूरी हैं, उनमें खास हैं - जीने के अधिकार, विकास के अधिकार, विभिन्न शोषणों के खिलाफ सुरक्षा के अधिकार और उनके भविष्य को प्रभावित करने वाली गतिविधियों में भागीदारी होने और फैसले लेने के अधिकार।


क्राई का असर (2008-09)


  • 1,376 सरकारी प्राथमिक स्कूलों को दोबारा चालू किया जा सका है।

  • 38,169 वंचित समुदाय के बच्चों को सरकारी प्राथमिक स्कूलों में दाखिल किया जा सका है।

  • 558 सरकारी प्राथमिक स्कूलों में छात्र उपस्थिति को शत-प्रतिशत तक बनाया जा सका है।

  • 80 पंचायतों की ग्राम शिक्षण समितियों को सक्रिय बनाया जा सका है।

  • 762 पंचायतों की ग्राम स्वास्थ्य समितियों को सक्रिय बनाया जा सका है।

  • 481 गांवों में एक भी बाल मजदूर नहीं है।

  • 1,641 बाल समूह बनाये गए हैं।

  • 76,1167 भारतीय बच्चे विभिन्न गतिविधियों के भागीदार बने हैं।

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16.3.10

पुष्पा के साथ स्कूल जा रहे हैं

शिरीष खरे

``मैं रात को ये सोचके जल्दी सो जाती हूं कि सुबह जल्दी उठूंगी, और एक और दिन स्कूल जाने को मिलेगा।´´- ऐसा कहना है पुष्पा का, 10 साल की पुष्पा उड़ीसा के कुमियापल्ली गांव से है। हम पुष्पा के साथ स्कूल जा रहे हैं और वह बता रही है- ``हमारी मेडम हमें ऐसी ऐसी बातें बताती हैं, जो हमें पता तक नहीं होती हैं। वो हर रोज नई खिड़की खोलती है, और उसमें से बाहर देखने को बोलती है। हम रात को जो बातें सोचके सोते हैं, दिन को वो पूरा-पूरा बता देती है। हम सोचते है कि यह तो इतना आसान है तो..... ´´

कुछ महीने पहले तक, पुष्पा इतनी खुशी-खुशी स्कूल नहीं जाती थी, न तो उसके दिन इतने महकते थे, न ही रात इतनी चमकती थी। अपने गांव की बहुत सारी लड़कियों की तरह वह तो घर के ढ़ेर सारे कामों से बंधी थी। मां के साथ हाथ बंटाने से लेकर छोटी बहन को सम्भालने तक, कई बड़े सवालों को अपने नन्हे कंधों पर लदे फिरती थी। जहां तक उसके स्कूल का सवाल है तो वहां का हाल यह था कि भवन तो अपनी जगह सही सलामत था, मगर कक्षा में न तो बच्चे हाजिर रहते थे और न ही टीचर। इसलिए हर साल 50 में से 15-20 बच्चे स्कूल छोड़ देते थे। पुष्पा बता रही है- ``मुझे तो इतना तक समझ नहीं आता था कि वहां पढ़ाया क्या जा रहा है, तभी तो मैंने स्कूल जाना छोड़ दिया था।´´ दोपहर के भोजन की बात सुनते ही उसने कहा `बहुत गन्दा था`।

और आज न केवल पुष्पा हमारे साथ स्कूल जा रही है, बल्कि उसके कुछ अरमान भी हैं जैसे आगे बहुत पढ़ना, लिखना, सीखना, समझना, कुछ कर गुजरना इत्यादि। जो उसे पहली बार देखता है वो उसके भीतर आए बदलाव को नहीं जान पाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि वो उसे पहली बार जो देख रहा होता है, जबकि उसे क्या पता कि इससे पहले तक यह लड़की क्या थी, उसे तो यह लड़की भी कक्षा की दूसरी लड़कियों जैसी ही हिन्दी-अंग्रेजी पढ़ती नज़र आती है। पर जो उसे शुरू से जानता है वो पुष्पा की वैसी से ऐसी दुनिया में आए अन्तर को भी जानता है। वो जानता है कि पुष्पा आर्थिक-सामाजिक तौर पर कभी न टूटने वाले बंधनों को कैसे तोड़कर आई है। तभी तो पुष्पा की यह कहानी मानो तो एक बड़े अन्तर की कहानी लगती भी है, और न मानों तो नहीं भी लगती है।

पुष्पा को शुरू से जानने वालों के नज़रिए से उसके घर से स्कूल के बीच का अन्तर अब कुछ भी नहीं बचा है और ऐसा `क्राई´ के सहयोग से काम करने वाली संस्था `आधार´ की हौंसलाअफ्जाई से सम्भव हुआ है। गांव के स्कूल की पढ़ाई-लिखाई दुरूस्त हो- गांव का हर आदमी यही तो चाहता था। फिर भी सबकी अपनी-अपनी और रोज-रोज जीने की जद्दोजहद ने इस ओर कुछ करने से रोके रखा था। `आधार´ के कार्यकर्ताओं ने पूरे गांव भर को इस ओर एक तारीख और एक चौपाल पर लाकर मिला भर दिया था। जहां पूरा गांव इस बिन्दु पर एकमत हुआ था कि जब तक स्कूल में कोई टीचर नहीं आएगा तब तक बच्चों की पढ़ाई-लिखाई सुधरने वाली नहीं है। सभी ने फैसला लिया कि जिले के अधिकारियों के सामने जाकर नए टीचरों के लिए मांग की जाएगी। उन्होंने ऐसा किया भी, जिसके चलते गांव के स्कूल में एक पढ़ी-लिखी लड़की मेडम(टीचर) बनकर आई। यहीं से गांव की शिक्षा व्यवस्था के रात-दिन दुरूस्त होने लगे। `आधार´ द्वारा मेडम के जरिए बच्चों के लिए सहभागिता पर आधारित शिक्षण की कई विधियां प्रयोग में लायी गईं। इसके सामानान्तर ज्यादातर परिवारों को शिक्षा के मायने बताने और उनके बच्चों से मित्रता की गांठे पिरोने का क्रम भी चलता रहा। नतीजा यह रहा कि यहां से पढ़ने-पढ़ाने के ऐसे पाठ शुरू हुए कि कुमियापल्ली के इतिहास में अब एक `आदर्श स्कूल´ का अध्याय जुड़ चुका है।

आज पुष्पा के स्कूल में दो टीचर हैं। इसलिए आज पुष्पा की सभी सहेलियां भी स्कूल जा रही है, इसी साल 85 बच्चों को भी स्कूल में दाखिल किया गया है। देश में 14 साल तक के बच्चों के लिए पढ़ने का कानून बन चुका है और कुमियापल्ली गांव में 14 साल तक का एक भी बच्ची-बच्चा ऐसा नहीं है जो स्कूल के रास्ते पर न चलता हो। उन सबके लिए ये रास्ते ये पल इतने हसीन हैं कि उनमें पूरी एक सदी और जिन्दगी की नरम उम्मीदें छिपी हैं। उसके ऊपर ताजा खबर यह है कि अगले साल उसके स्कूल की दो नई कक्षाओं को बनाये जाने और सामुदायिक टीचर चुने जाने को मंजूरी मिल चुकी है।

पुष्पा रोजाना स्कूल जाने वाली उन लड़कियों में से एक है जो अपनी कक्षा में बढ़चढ़कर हिस्सा लेती हैं। जो अपने पाठ्यक्रम की किताबों से जहां बहुत प्यार करती है वहीं खेलकूद में भी गहरी दिलचस्पी रखती है। तभी तो उसने सरकार द्वारा आयोजित कई क्षेत्रीय खेल प्रतियोगिताओं में बहुत से पुरस्कार जीते हैं। हमेशा पढ़ते रहने की बात पर वह कहती है- ``मैं पढ़ते-पढ़ते जब बड़ी हो जाऊंगी तो मेडम जैसे ही छोटे बच्चों को पढ़ाऊंगी।´´ तो सुना आपने चौथी में पढ़ने वाली यह बच्ची बड़े गर्व से मेडम (टीचर) बनने का ऐलान कर रही है।
भले ही पुष्पा इतनी ऊंचाई पर नहीं पहुंची हो कि स्कूल की दीवारे उसे नज़रें उठाके देखें। मगर उसके समय से रात के अंधेरे ढ़ल चुके हैं और उसके परिवार ने भी यह जान लिया है कि स्कूल की दुनिया बहुत प्यारी और खुशियों से भरी होती है। इसीलिए तो इस रफ़्तार से पुष्पा स्कूल जा रही है कि उसके परिवार की आर्थिक तंगी में उसे रोक नहीं पा रही है। कुमियापल्ली गांव में बहुत सारे समूह हैं जो समुदाय में लिंग, जाति और वर्ग से जुड़ी बाधाओं को दूर करने के लिए सक्रिय हैं। जो पुष्पा जैसी बच्चियों के परिवार वालों की आर्थिक तंगी दूर करने के लिए उन्हें मनरेगा और पंचायत की दूसरी योजनाओं से जोड़ रहे हैं। तो कुछ इस तरह से यहां के समूह कुमियापल्ली के सभी बच्चों के लिए समान अवसर जुटाने में तत्पर नज़र आ रहे हैं।

सवाल यह नहीं है कि कुमियापल्ली गांव उड़ीसा के किस जिले के किस प्रखण्ड में है, यह तो भारत के अनगिनत गांवों की तरह अंधेरे में डूबा एक ऐसा गांव है जहां सूरज के गर्म होते ही कुछ खाने के लिए कुछ करने का सवाल गर्म होने लगता है। यहां से सबक यह भर है कि कुमियापल्ली गांव में जिस तरीके से समुदाय के नजरिए और विचारों को बदलकर पुष्पा जैसी लड़कियों को स्कूल भेजा जा रहा है, तो उसी तरह के तरीकों से देश की बाकी लड़कियों को भी स्कूल भेजा जा सकता है।

चलते-चलते
पुष्पा के साथ स्कूल जाने वाली कहानियां हमारी आंखों में उम्मीद के दीये जलाती हैं, मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उसके पड़ोस के गांव सहित देश की 50% से भी अधिक स्कूल पुष्पाओं के नाम तक स्कूलों में दर्ज नहीं हो सके हैं। इनमें से कइयों को 12 साल की उम्र तक आते-आते स्कूल से ड्रापआऊट हो जाना पड़ता है। 2001 की जनगणना के मुताबिक 49.46 करोड़ महिलाओं में से 22.91 करोड़ महिलाएं (53.67%) अनपढ़ हैं। एशिया में अपने देश की महिला साक्षरता दर सबसे कम है। असल बात तो यह है कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था में `लड़कियों की शिक्षा´ को खास स्थान दिए बगैर उनकी स्थितियों में सामान्य बदलाव लाना तक मुमकिन नहीं होगा।

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12.3.10

अंधेरी गलियों के रौशन सितारे

शिरीष खरे

शहरी झोपड़पट्टियों में रहने वाले बच्चों की जिंदगी को बोझिल, बेबस और हताश जानकर अक्सर उनसे मुंह फेर लिया जाता है. मगर एक सूझबूझ भरे प्रयास के चलते उसी दुनिया की कुछ लड़कियां आज न केवल सामाजिक अनदेखियों और तमाम बाधाओं से आगे निकल रही हैं, बल्कि खेलने-कूदने और पढ़ने-लिखने के रास्तों से उजाला भी दिखा रही हैं. चेन्नई से शक्ति और दिल्ली से अस्मिना वंचित समुदाय की ऐसी ही लड़कियां हैं जो इस बदलाव को सिर्फ महसूस ही नहीं कर रही हैं बल्कि दूसरों के लिए प्रेरणा भी बन रही हैं.



शक्ति बदलाव की

दक्षिण भारत के सबसे तेज बढ़ते शहर चेन्नई का एक चेहरा यहां की अनगिनत झोपड़पट्टियां भी हैं, जिन्हें बदनुमा दाग समझा जाता है. मगर तमाम बाधाओं के बीच यहां सपने देखने का हौसला भी है और उसे हकीकत में बदलने का जज्बा भी. शहर के उत्तरी हिस्से की ऐसी ही एक गुमनाम-सी झोपड़पट्टी में शक्ति नाम की लड़की इसी बदलाव की इबारत लिख रही है.

उसकी हमउम्र दूसरी लड़कियां जहां तीन साल की उम्र में नर्सरी स्कूल जाने लगी थीं, वहीं 6 साल की उम्र में शक्ति मछली बेचने की एक दुकान पर काम करने लगी थी. मछलियां छांटते और नंगे हाथों से बर्फ फोड़ते हुए उसने जाना कि उसके लिए तमाम खेल सपने की तरह हैं फिर वह फुटबाल ही क्यों न हो जो कि उसे बेहद पसंद था.


छह घंटे के काम के बदले उसे रोजाना महज 15 रु. मिलते थे. काम से छुट्टी मिलते ही वह घर की तरफ दौड़ पड़ती और स्कूल जाने को मचल पड़ती. इसकी एक वजह यह भी थी कि उसे वहां के मैदान पर फुटबाल खेलने को जो मिलता था. वैसे तो उसके जैसी कुछ और लड़कियां भी फुटबाल खेलती थीं, मगर गरीबी उसे स्कूल की दूसरी लड़कियों से अलग कर देती थी. इसी गरीबी के चलते एक रोज उसे पढ़ाई, फुटबाल और दोस्तों को छोड़ना पड़ा था. इसके बाद वह 12 घंटे काम करके रोजाना 30 रू. कमाने लगी. शक्ति के पिता को रोज-रोज काम नहीं मिलता था, लिहाजा घर चलाने के लिए उसकी मां को दूसरों के घरों में काम करना पड़ता था.


बदली ज़िंदगी
शक्ति से फुटबाल का खेल क्या छूटा उसकी जिंदगी से खुशियां ही गायब हो गईं. मानो उसका बचपन ही उजड़ गया. मगर उसके चेहरे पर खुशियां तब लौट आई जब वह एससीएसटीईडीएस यानी `स्लम चिल्ड्रन स्पोर्ट्स टेलेंट एजुकेशन डेवल्पमेंट सोसाइटी´ से जुड़ गई.

एससीएसटीईडीएस एक सामुदायिक संस्था है जो वहां की झोपड़पट्टियों के बच्चों को इकट्ठा करती है और नगर-निगम के मैदान पर फुटबाल खेलने के लिए प्रेरित करती है. दरअसल यह बच्चों के व्यवहार को जानने का पहला कदम होता है. यहीं से स्कूल छोड़ने वाले बच्चों के बारे में भी पता चलता है और उन्हें स्कूल से जोड़ा जाता है. शक्ति भी कुछ इसी तरीके से जुड़ी और यहां से उसे एक स्टॉर फुटबाल खिलाड़ी के तौर पर जाने जाना लगा.

एससीएसटीईडीएस के थंगराज कहते हैं "जब शक्ति स्कूल जाती थी तो उसके टीचर उसे मछुआरा समुदाय की होने की वजह से अक्सर अपमानित करते थे." संस्था ने उसे हौसला दिया और शक्ति के माता-पिता को इस बात के लिए राजी किया कि वह अपनी बेटी को एक बार फिर से नगर-निगम के स्कूल में भेजे.

थंगराज याद करते हैं, "इस बार शक्ति के माता-पिता ने उसकी पढ़ाई की कमियों को देखा और उसके आने वाले कल में संभावनाएं तलाशी. अब वह अपनी बेटी की पढ़ाई फिर से शुरू करवाने को उत्सुक थे." इसी विश्वास के साथ शक्ति के बड़े और छोटे भाईयों को भी स्कूल में भर्ती कराया गया. उनके भीतर पढ़ाई से लेकर खेल जैसी तमाम प्रतिभाओं का मूल्यांकन किया गया और उसके मुताबिक सबको मौका दिया गया.


शानदार गोल
एससीएसटीईडीएस ने शक्ति की मजबूरियों और जरूरतों को ध्यान में रखकर कदम बढ़ाया. मसलन, स्कूल जाने के लिए बस का किराया, यूनीफार्म, दिन का खाना और फुटबाल खेलने से जुड़ी जरूरतें. शक्ति की खेल प्रतिभा को देखकर एससीएसटीईडीएस ने उसके नियमित तौर पर फुटबाल के अभ्यास की व्यवस्था की. धीरे-धीरे उसके भीतर छिपी खेल प्रतिभा उभरकर सामने आने लगी और उसके भीतर से स्कूल को लेकर पैदा हुए सारे डर भी दूर हो गए. कुछ टीचर तो शक्ति के प्रशंसक और सहयोगी तक बन गए.

उसे नियमित प्रशिक्षण मिला जिसके चलते शक्ति ने अंडर-14 की राज्य स्तरीय फुटबाल टीम में अपनी जगह बनाई. बीते 4 सालों में उसने जिला और राज्य स्तर के कई मैच खेले हैं.

अब वह 18 साल की हो चुकी है. पांच साल पहले कालेज जाना उसके लिए सपना ही था जो अब हकीकत में बदल रहा है. उसका बड़ा भाई अब नौकरी करता है और उसने अपनी छोटी बहन को कालेज भेजने का फैसला लिया है. शक्ति अब भारत की महिला फुटबाल टीम में शामिल होकर अंतरराष्ट्रीय स्तर के मैच खेलना चाहती है. वाकई उसने अपनी जिदंगी में मिले मौकों को शानदार गोल में बदला है.
 
 
 
अस्मिना ने ऐसा सोचा न था
 
दो साल की छोटी-सी उम्र में अस्मिना को अपने माता-पिता के साथ बिहार के पूर्णिया जिले से पलायन करना पड़ा था. उसका परिवार काम की तलाश में दिल्ली आया और यहां-वहां की जद्दोजहद के बाद रंगपुरी कबाड़ी बस्ती में बस गया. यह जगह कूड़ा बीनने वाले बच्चों की झोपड़पट्टी के तौर पर जानी जाती है. अस्मिना भी अपने पिता के साथ इसी धंधे में हाथ बटाते हुए बड़ी होने लगी. पता ही नहीं चला कि कैसे उसके दिन गलियों और नुक्कड़ों पर पड़े घूरे के ढ़ेरों को साफ करते हुए बीत रहे हैं. इन ढेरों से वह प्लास्टिक और रद्दी की ऐसी चीजें बीनती जिन्हें फिर से तैयार किया जा सके.


गरीबी की वजह से अस्मिना सहित उसके पांचों भाई-बहन कूड़ा बीनने का काम करने को मजबूर थे. हर सुबह काम पर जाते वक्त वह देखती कि उसकी उम्र के दूसरे बच्चे उजले कपड़े पहनकर स्कूल जाते हैं. उसके लिए स्कूल की बात मानो किसी और दुनिया की बात थी, एक ऐसी दुनिया जो कचरे से भरी उसकी मलिन दुनिया से बिल्कुल जुदा थी. उसकी दुनिया में स्लेट पेंसिल की जगह कांच के टुकड़े और जंग लगी धातु जैसी चीजें थीं जिससे वह कभी-कभी जख्मी भी हो जाती थी. अस्मिना जैसे बहुत से बच्चे ऐसे ही कूड़ों की वजह से त्वचा और आंख से जुड़ी कई गंभीर संक्रमित बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं. उनके आसपास अपनी सुरक्षा के मुनासिब बंदोबस्त की बात तो छोड़िए उनके पैरों में जूते तक नहीं होते.

एक सामुदायिक संस्था बाल विकास धारा ने जब अस्मिना और उसके दोस्तों के लिए काम शुरू किया तो सबसे पहले यहां गैर औपचारिक केंद्र खोला. यह ऐसे बच्चों को स्कूल से जोड़ने वाला पुल साबित हुआ जो गरीबी और मजबूरी के चलते स्कूल नहीं जा पाते. इससे जुड़ने वाले बच्चों को पहली बार कहने-सुनने-समझने और सीखने को मिला. अस्मिना को यहां एक सुरक्षित और सुविधायुक्त दुनिया नजर आई.

इतना-सा ख्वाब है
दरअसल पढ़ाई की दुनिया से जुड़ने के बाद अब उसके पास आगे बढ़ने के लिए खुद को समर्थ बनाने का रास्ता था. उसकी छोटी बहन भी उसके साथ पढ़ने आने लगी. संस्था के सभी साथियों की मदद से अस्मिना और उसके बहुत सारे दोस्तों को स्थानीय नगर-निगम के स्कूल में भर्ती करवाया गया. गौर करने वाली बात यह है कि उसकी उम्र और लगन को देखते हुए उसे दूसरी कक्षा में दाखिला दिलवाया गया.

अस्मिना जैसी बहुत-सी लड़कियों में पढ़ने-लिखने की चाहत को लगातार बढ़ावा देने के लिए बाल विकास धारा ने भरपूर साथ दिया है. यहां पर बच्चों में बदलाव लाने के लिए उनकी पसंद- नापसंद, ताकत-कमजोरियों और सहूलियतों के बारे में जानकारियां जुटाई जाती हैं. बच्चे, उनके माता-पिता और टीचर आपस में बैठकर उनकी उलझनों को सुलझाते हैं और फिर बच्चों को नगर-निगम के स्कूल में भर्ती करवाने की मुहिम छेड़ी जाती है.

आज अस्मिना पांचवी कक्षा में है और पढ़ने में उसकी खासी दिलचस्पी है. बदलाव का पहाड़ा पढ़ते-पढ़ते अब वह मोटी-मोटी किताबों तक आ पहुंची है. उसका परिवार यह देखकर बहुत खुश होता है कि वह कूड़ा बीनने के बजाय स्कूल में पढ़ने जाती है. अस्मिना अब कहती है "मैं जो कुछ पढ़ रही हूं वह दूसरों को भी पढ़ाऊंगी." उसकी ऐसी बातों से परिवार वालों को लगता है कि वह टीचर बनना चाहती है. वाकई वह जो भी बनना चाहती हो मगर इतना तो तय है कि अस्मिना अब एक ऐसी दुनिया में दाखिल है, जहां सपने देखना मुमकिन हो गया है.


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10.2.10

पत्थरों की खदानों से लौटा बचपन

कभी बाल मजदूरी करने वाला महेन्द्र अब बच्चों के अधिकारों से जुड़ी कई लड़ाईयों का नायक है। महेन्द्र के कामों से जाहिर होता है कि छोटी सी उम्र में मिला एक छोटा सा मौका भी किसी बच्चे की जिंदगी को किस हद तक बदल सकता है।

महेन्द्र रजक, इलाहाबाद जिले के गीन्ज गांव से है- जहां की भंयकर गरीबी अक्सर ऐसे बच्चों को पत्थरों की खदानों की तरफ धकेलती है। महेन्द्र रजक भी अपनी उम्र से कुछ ज्यादा ही बड़ा हो चुका था। इतना बड़ा कि 6 साल की दहलीज पार करके उसने खदानों में जाने का मतलब का जाना था। इतना बड़ा कि 6 दूनी 12, 12 दूनी 24, 24 दूनी 48 जानने की बजाय उसने हमउम्र बच्चों के साथ पत्थर तोड़ने का पहाड़ा जाना था।

‘‘....तब कुछ बच्चों को स्कूल जाते देखते तो लगता कि वो हमारे जैसे नहीं हैं, वो हमसे कहीं अच्छे हैं।’’- अपने बचपने को इस तरह याद करने वाला महेन्द्र अब 16 की उम्र छूने को है। वह बताता है ‘‘मेरे लिए पत्थर तोड़ना तो बहुत मेहनत का काम था। सुबह 7 से शाम के 5 तक, तोड़ते रहो, खाने के लिए घंटेभर की छुट्टी भी नहीं मिलती थी। ठेकेदार आराम नहीं करने देता था, बार-बार पैसे काटने की धमकी अलग देता था।’’ इस तरह महेन्द्र को घर, मैदान और स्कूल से दूर, 9 घंटे के काम के बदले 70 रूपए/रोज मिलते थे।

संचेतना, जो कि क्राई के सहयोग से चलने वाली एक गैर-सरकारी संस्था है, ने जब महेन्द्र के गांव में अनौपचारिक शिक्षण केन्द्र खोला तो जैसे-तैसे करके महेन्द्र के पिता उसे पढ़ाने-लिखाने को राजी हुए। वैसे तो यहां एक प्राइवेट नर्सरी स्कूल भी था, जो बहुत मंहगा होने के चलते महेन्द्र जैसे ज्यादातर पिताओं की पहुंच से बहुत दूर था।

क्राई के पंकज मेहता बीते दिनों को कुछ ताजा करते हैं ‘‘हमारे सामने पत्थर तोड़ने वाले बहुत सारे बच्चे थे, उनके बचपन को बचाने के लिए हमने बस्तियों के पास सरकारी स्कूल खोले जाने का अभियान चलाया। इसके लिए राज्य की शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई बड़े अधिकारियों से मिले-जुले, उनके साथ बैठे-उठे, उनके सामने बार-बार अपनी जरूरतें दोहराते रहे। आखिरकार, 2002 को गीन्ज गांव में भी एक प्राथमिक स्कूल खोला जा सका।’’

संचेतना के सामाजिक कार्यकर्ताओं बताते हैं कि स्कूल भवन तो खड़ा कर दिया था, मगर इसी से तो सबकुछ सुलझने वाला नहीं था। असली चुनौती ऐसे बच्चों को स्कूल तक लाने और उनमें शिक्षा की समझ जगाने की थी। यह बहुत दिक्कत वाली बात थी, क्योंकि यहां बच्चों को कमाने वाले सदस्य के तौर पर देखने का चलन जो था। गरीब मां-बाप की जुबान पर यही सवाल होता था कि चलिए आप कहते हैं तो हम अपने बच्चों को आज काम पर नहीं भेजते हैं, अब आप बताइए कल से गृहस्थी की गाड़ी कैसे चलेगी ? इस बुनियादी सवाल से जूझना आसान न था। इसलिए सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनी पूरी ताकत महेन्द्र जैसे बच्चों के परिवार वालों के बीच आपसी समझ बनाने में लगाई थी। उन्होंने स्कूल के रास्ते पर बच्चों को रोकने वाले कारणों को भी समझा और यह भी समझाया कि बच्चों के भविष्य के लिए इतना तो खर्च किया ही जा सकता है!! क्योंकि महेन्द्र का बड़ा भाई भी काम पर जाता था, इसलिए उसके पिता अपने इस छोटे बेटे को काम की बजाय स्कूल भेजने के लिए तैयार हो गए।’’ इस तरह 9 साल की उम्र से महेन्द्र के स्कूल वाले दिन शुरू हुए।

‘‘अब मैं बाल पंचायत का नेता हूं, पंचायत के बच्चों ने मुझे चुनकर यहां तक भेजा है’’- महेन्द्र के लहजे के ये जवाबदारी भरे अंदाज हैं : ‘‘गांव में ऐसा क्या चल रहा है, जो हमें आगे बढ़ने से रोक रहा है, ऐसी बातों पर बतियाते हैं। अगर किसी बात को लेकर, कुछ हो सकता है तो बाल पंचायत उसमें क्या कर सकती हैं, कैसे कर सकती है, ऐसी चर्चाएं चलती हैं, कभी-कभी किसी बात पर हम सारे बच्चे गांव वालों के साथ हो जाते हैं, जरूरत पड़े तो जिले के अधिकारियों से भी मिल आते हैं।’’ बाल पंचायत का कोई औपचारिक ढ़ांचा नहीं है, यह तो अपनी आपसी सहूलियतों को देखते हुए कहीं भी, किसी भी समय लग सकती है। गांव के सारे बच्चे इसके सदस्य हैं, जो अपने अधिकारों से जुड़े अभियानों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

11 दिसम्बर, 2009 को, नई दिल्ली में सबको शिक्षा समान शिक्षा अभियान के मौके पर, जब महेन्द्र ने देशभर से जुटे एक हजार से भी ज्यादा सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच अपने अनुभवों को साझा किया तो सभी ने इस छोटे से नायक के बड़े कामों को जाना और उसकी चौतरफा सरहना की।

गीन्ज गांव में बच्चे-बच्चे को बाल पंचायत बनने का किस्सा मालूम है। हुआ यह कि- तब बहुत सारे बच्चों ने गांव में खेल के मैदान का मुद्दा उठाया था। इसके लिए उन्होंने बाल दिवस पर इलाहाबाद जाने का मन बनाया। यह बच्चे उस रोज इलाहाबाद की मुख्य सड़कों पर पहुंचे और जमकर खेले। ‘‘यह देख वहां के बहुत सारे लोग आ गए, गुस्से से बोले कि यहां के रास्ते क्यों रोक रहे हो ?’’- तब महेन्द्र ने कहा था - ‘‘यह तो पण्डित नेहरू का शहर है, आज तो बाल दिवस है, आज तो हमें यहां खेलने दो।’’ लगे हाथ उसने यह भी कह दिया कि ‘‘हमारे गांव में तो खेल का मैदान भी नहीं है। यहां तो देखो कितनी चौड़ी-चौड़ी सड़के हैं।’’ उस रोज बच्चों ने विरोध की ऐसी गेंदबाजी की थी कि प्रशासन से जुड़े अधिकारियों को क्लीन बोल्ड होना पड़ा था। मैच का नतीजा यह निकला था कि इलाहाबाद जिले से ही गीन्ज गांव के लिए खेल के मैदान का रास्ता साफ हो गया। खेल-खेल से शुरू हुए बच्चों के ऐसे अभियान समय के साथ गंभीर होते चले गए। फिर बच्चों को यह भी लगा कि अगर गांव के बड़े-बूढ़े की पंचायत हो सकती है तो बच्चों की भी अपनी पंचायत हो सकती है। कुछ इस तरह से बाल पंचायत का वजूद खड़ा हुआ। जो गीन्ज जैसे एक साधारण गांव में, गांव भर के सहयोग के चलते अब बहुत खास बन चुकी है।

महेन्द्र और उसके नन्हें दोस्तों के हिस्से में अब ऐसे दर्जनों किस्से हैं, जो बताते हैं कि बड़े कारनामों को अंजाम तक पहुंचाने के लिए, उतनी बड़ी उम्र भी हो तो ऐसा जरूरी नहीं है। जैसे कि पहले गीन्ज गांव में पांचवीं तक ही स्कूल था। लिहाजा महेन्द्र जैसे बच्चों के लिए आगे पढ़ने का मतलब था कि पहले तो एक साईकिल की जुगाड़ करो, उसके बाद उससे रोजाना 6 किलोमीटर दूर के स्कूल आओ-जाओ। तब बाल पंचायत ने जिले के शिक्षा अधिकारियों के साथ बैठक आयोजित की थी। बाल पंचायत ने इन अधिकारियों के सामने अपने गांव में ही एक सेकेण्डरी स्कूल खोले जाने की वकालत की थी। तब महेन्द्र ने कहा था- ‘‘अगर ऐसा हुआ तो यहां के बहुत सारे बच्चे आगे भी पढ़ सकते हैं।’’ आखिरकार, यहां सेकेण्डरी स्कूल भी खोला गया, जहां आज पास वाले गांवों के भी बहुत सारे बच्चे पढ़ने आते हैं। अगर यह कहा जाए कि यहां के बच्चों ने हर परेशानी का हल खोज लिया है तो यह सही नहीं होगा। मगर यह तो है कि उन्होंने अपने हालातों को पहले से कहीं बेहतर बनाया है। यही वजह है कि जो कामकाजी बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं वो संस्थाओं द्वारा खोले गए गैर-औपचारिक शिक्षण केन्द्रों में पढ़ने आते हैं। यहां ऐसे बच्चों की भारी तादाद यह बताती है कि पत्थर तोड़ने के काम से टूट जाने के बावजूद इनके दिलोदिमाग में पढ़ने की ललक कितनी बकाया है। यहां बैठे-उठे कभी पहाड़ा तो कभी बारहखड़ी पढ़ते ये बच्चे दुनिया में जीने की समझ बढ़ाने के लिए यहां आते हैं। दूसरी तरफ यहां सक्रिय गैर-सरकारी संस्थाओं ने ऐसे गरीब परिवारों की आमदनी में सुधार लाने के लिए उन्हें राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के फायदे उठाने के लिए भी संगठित किया है। यह लोग अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए अब पंचायत की दूसरी योजनाओं से भी जुड़ रहे हैं।

यह कोई तीन हजार आबादी वाले गीन्ज से महेन्द्र के छोटे से गांव का हाल है, जहां बेहतर जीने के लिए लड़ने और लड़ने के लिए पढ़ने के महत्व का पता चला है। मगर महेन्द्र का गांव उसी दुनिया का हिस्सा है, जिसमें सबसे ज्यादा बाल मजदूर भारत के हैं। सरकारी आकड़ों के हिसाब से यहां 14 साल तक के 1 करोड़, 70 लाख बाल मजदूर हैं। इसमें भी 80% बाल मजदूर खेती या कारखानों में लगे हैं। बाकी के पत्थरों की खदानों, चाय के बागानों, ढ़ाबों, दुकानों या घरेलू कामों से जुड़े हैं। बच्चों से मजदूरी कराने वाले ऐसे कई गिरोह सक्रिय हैं जो उन्हें या तो सस्ती मजदूरी या फिर तस्करी के चलते काम की जगहों तक लाते हैं।

क्राई अपने 30 सालों के तजुर्बों से यह मानता है कि बच्चों की समस्या के जो तार उनके समुदाय से जुड़े हैं, जब तक उनकी पहचान नहीं की जाएगी, जब तक उनकी रोकधाम के उपाय नहीं ढ़ूढ़े जाएंगे, तब तक बाल मजदूरी के हालातों में स्थायी बदलाव नहीं आएगा। असल बात तो यह है कि बाल मजदूरी की जड़े भूख, गरीबी, शोषण, बेकारी और अत्याचारों से जुड़ी हैं। अगर बाल मजदूरी से लड़ना है तो सबसे पहले बच्चों की शिक्षा और बड़ों की आजीविका से ताल्लुक रखने वाली सरकारी नीतियों को प्रभावित करना होगा। इसके सामानान्तर ऐसी नीतियों को जमीनी हकीकत में साकार करने की जद्दोजहद को भी जारी रखना होगा।

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