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28.5.10

जंगल से कटकर सूख गये मालधारी

शिरीष खरे

पोरबंदर/ एशियाई शेरों के सुरक्षित घर कहे जाने वाले गिर अभयारण्य में बरसों पहले मालधारियों का भी घर था. ‘माल’ यानी संपति यानी पशुधन और ‘धारी’ का मतलब ‘संभालने वाले’. इस तरह पशुओं को संभाल कर, पाल कर मालधारी अपनी आजीविका चलाते थे. एक दिन पता चला कि अब इस इलाके में केवल शेर रहेंगे. फिर धीरे-धीरे मालधारियों को उनकी जड़ों से उखाड़कर फेंकने का सिलसिला शुरु हुआ.

आज की तारीख में वन्यजीव अभयारण्य के चलते गिरी के जंगलों से बेदखल हुए मालधारी समुदाय के पास जहां रोजीरोटी एक प्रश्नवाचक चिन्ह की तरह हो गया है, वहीं बुनियादी सुविधायें भी सिरे से लापता हैं. अपनी सामाजिक पहचान बनाने की जद्दोजहद के बीच उनके सामने शिक्षा और सेहत जैसे कई सवाल हैं, जिसका जवाब कोई नहीं देना चाहता.

मालधारियों का घर

गुजरात में शुष्क पर्णपाती जंगल, नम पर्णपाती जंगल, घास के बड़े-बड़े मैदान, समुद्र के लंबे-लंबे किनारे और बहुत सारे दलदली इलाके हैं. यहां 4 राष्ट्रीय उद्यान और 20 अभयारण्य हैं, जो 13 विकासखण्डों की 24 जगहों पर बसे हैं. प्रदेश के 4 राष्ट्रीय उद्यान जहां कुल 47,967 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में हैं, वहीं 20 अभयारण्य कुल 16,74,224 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैले हैं.

इन्हीं में एक गिर का अभयारण्य भी है, जो एशियाई शेरों का सुरक्षित घर कहलाता है. यह 1424 वर्ग किलोमीटर में फैला सघन जंगल, देश के सबसे बड़े शुष्क पर्णपाती जंगलों में से एक है. यही वह फैलाव है, जिसके आसपास मालधारी समुदाय का जीवन अपना विस्तार पाता था.

आरक्षित जंगल वाले इस इलाके को 70 के दशक में वन्य अभयारण्य के तौर पर अधिसूचित किया गया था. सबसे पहले 1972 में, सरकार ने यहां के 845 मालधारी परिवारों में से 580 परिवारों को जंगल से बाहर करने की कवायद शुरु की और देखते ही देखते 129 बस्तियों से तकरीबन 5000 आबादी को जंगल से उजाड़ दिया गया. तब से अब तक, यहां वन्य संरक्षण के नाम पर मालधारियों का शिकार बाकायदा जारी है.

बरदा एक ऐसा ही इलाका है, जो विस्थापन की सूची से फिलहाल तो छूटा हुआ है लेकिन वन विभाग का जंगल राज जब तब यह अहसास कराता रहता है कि मालधारियों की कोई औकात नहीं है और वन विभाग जब चाहे मालधारियों को जानवरों की तरह हकाल सकता है.

बरदा के जेसिंगभाई, हरिसिंग भाई, रामगुलाब, चंदाभामा जैसे लोगों से अगर आप बात करें तो सब के पास अब केवल पुराने दिनों की यादें शेष हैं. एक-एक आदमी के पास अपने-अपने किस्से हैं. वन-विभाग के आने के पहले तक उनका जीवन कितना मस्त, आजाद, आत्मनिर्भर, सरल, व्यवस्थित और हरा भरा था. लेकिन पिछले 40 सालों में सरकार ने मालधारियों को उनकी जड़ों से ऐसा काटा कि उनका जीवन सूख ही गया.

जानवरों के नाम पर

70 के दशक में विभाग ने यहां सर्वे किया, जंगलों को नापा और जमीनों की हदबंधी की. देखते ही देखते, उसने जंगल की जमीनों को राजस्व की जमीनों में बदलना चालू किया. इसके बाद विभाग ने पानी से लेकर कंदमूल और पेड़ की टहनियों, यहां तक कि जिन पत्थरों और गीली माटी से मालधारियों ने अपने घर बनाए , उनके इस्तेमाल तक पर पाबंदी लगा दी.

सरकार को जंगल के जीवों की देखभाल का तो ख्याल आता रहा, मगर पालतू पशुओं की चराई पर लगी रोक को हटाने का ख्याल एक बार भी नहीं आया. जबकि मालधारियों के पास तो बड़ी संख्या में गिर की मशहूर गाएं थीं, जो अब तेजी से घट रही हैं और जिनके घटने के सवाल पर सरकार भी अब चिंता प्रकट कर रही है.

यहां के लोगों पर चौतरफा मार पड़ी है. सरकार ने जहां उनके काम, धंधे और संसाधनों को उनसे छीना है, वहीं उनकी दुनिया में आए अभावों की ओर पलटकर भी नहीं देखा है. इन मालधारियों का जीवन जंगल पर ही निर्भर था और जब वे जंगल से बेदखल किये गये तो जैसे जिंदगी से ही बेदखल कर दिये गये. सरकार ने विस्थापन से पहले कई वायदे किये लेकिन एक बार जंगल से विस्थापित होने के बाद सरकारी महकमे ने इनकी ओर पलट कर नहीं देखा.

बरदा की पहाड़ियां, पोरबंदर से 15 किलोमीटर दूर हैं. अरब सागर के चेहरे को मानो चूमता सा यह इलाका पोरबंदर और जामनगर जिलों से जुड़ा हुआ है. यहां का जंगल कभी राणावाव और जामनगर के राजाओं के अधीन था, सो अभी भी यह पहाड़ियां राणाबरदा और जामबरदा के नाम से ही जानी जाती है.

पत्थर जैसे जिंदगी

राणाबर्दा और जामबर्दा पहाड़ियों पर कुल 61 बस्तियां बची हैं, जो एक-दूसरे से बहुत दूर-दूर और ऊंची नीची पथरीली जगहों पर हैं. यहां 1154 परिवारों के 6372 लोग रहते हैं, उनमें 14 साल तक के 2774 बच्चे हैं. अब दोनों पहाड़ियों की 61 बस्तियों के इतने बच्चों के सामने जो 14 प्राथमिक स्कूल हैं भी तो उनमें से 7 के भवन नहीं हैं. बाकी 7 प्राथमिक स्कूलों के भवन हैं, मगर उनमें भी छोटे-छोटे 15 कमरे ही हैं. मतलब यहां के सारे बच्चों को ध्यान में रखा जाए तो औसतन 185 बच्चों पर केवल एक कमरा ठहरता है.

दूसरी तरफ, राणाबर्दा के प्राथमिक स्कूलों में तो शिक्षकों की संख्या फिर भी ठीक है, मगर जामबर्दा के 1077 बच्चों के सामने जो 5 प्राथमिक स्कूल हैं, उनमें शिक्षकों की संख्या 6 हैं. मतलब यहां औसतन 180 बच्चों पर केवल एक शिक्षक ठहरते हैं. इन्हीं सबके चलते यहां 14 साल तक के 2774 बच्चों में से केवल 728 बच्चों के नाम स्कूली फाइलों में भरे जा सके हैं. बीते 1 अप्रेल से, केन्द्र सरकार ने देश भर के सारे बच्चों के लिए शिक्षा के अधिकार का कानून लागू किया है, मगर यहां के 2046 बच्चों के लिये तो कम से कम यह कानून नाकाफी है.

सरकारी दावे और उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के उलट यहां की 61 बस्तियों के भीतर 6 साल से नीचे के कुल 1354 बच्चे हैं. लेकिन उनकी देखभाल के लिए एक भी आंगनबाड़ी केन्द्र यहां नहीं है. इसी तरह 192 वर्ग मीटर तक फैली इन दो पहाड़ियों के बीच एक भी जगह ऐसी नहीं है, जहां सरकार ने स्वास्थ्य की कोई सेवा उपलब्ध करायी हो. इसलिए तबीयत बिगड़ जाने पर मरीजों को 25 किलोमीटर तक की दूरी तय करनी पड़ती है. कच्ची और खराब सड़क के कारण गंभीर बीमारी या दुर्घटना झेलने वाले बहुत सारे मरीजों और गर्भवती महिलाओं को दुर्गम रास्तों के बीच ही अपनी जान गंवानी पड़ती है.

केन्द्र सरकार ने मातृ मृत्यु-दर और शिशु मृत्यु-दर घटाने के लिए एनएचआरएम यानि ‘राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन’ चलाया है. इसी तर्ज पर गुजरात सरकार ने भी एसएचआरएम यानि ‘राज्य ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन’ छेडा हुआ है. मगर यहां से ऐसा लगता है जैसे न केवल स्वास्थ्य सेवा बल्कि बुनियादी सहूलियत से जुड़ी हर एक नीति, योजना और कार्यक्रम से मालधारियों का यह बरदा इलाका छूटा हुआ है. कुछ ऐसे, जैसे 21वी शताब्दी के 10 साल गुजरने के बाद भी यह इलाका 1970 के जमाने में ही छूट गया हो.

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संपर्क : shirish2410@gmail.com

9.9.09

वनों से कटे अधिकार

वनाधिकार कानून, 2005 को पारित करते समय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह माना था कि आजादी के 6 दशकों तक आदिवासियों के साथ ऐतहासिक अन्याय होता रहा है और इस कानून के बाद उन्हें न्याय मिल पाएगा। लेकिन दक्षिण राजस्थान के वनों में वनाधिकार का हाल सरकार की दोहरी मानसिकता दर्शाता है। राजस्थान के उदयपुर जिले के गावों का दौरा करके लौटे शिरीष खरे की रिपोर्ट।
‘‘कानून में पटवारी फैसला नहीं लेता है। कानून में तो वह वनाधिकार समिति के साथ मिलकर कितना खसरा, कितना रकबा पर कितना कब्जा है, यह भर सत्यपापित करता है। लेकिन जमीन पर पटवारी ही असली खिलाड़ी है। खसरा, रकबा और कब्जा से जुड़ा अंतिम और सर्वमान्य फैसला उसी का है। यही हाल वन-विभाग के वनपाल का है। उसके हिस्से में वनक्षेत्र के नंबर देने, मेपिंग करने जैसे काम हैं। लेकिन उसका रोल भी मालिक जैसा है। सरकार ने कहा कि जो सत्यापन होगा वह जीपीएस मशीन से होगा, कानून में ऐसा तो कहीं भी नहीं लिखा है। यहां जीपीएस मशीनें बहुत कम हैं, उस पर प्रशिक्षित वनपाल ढ़ूढ़े से नहीं मिलते हैं।’’ - रामलाल खोकरिया और उनके कई सारे साथी, भलाई, उदयपुर।
‘‘ब्लाक स्तर की कमेटी बनी, उसने दावों की फाइलों को तीन भागों में बांटा- (एक) जो 1980 वाली फाइलें हैं, उन्हें पहली वरीयता दी जाए। (दो) इसके बाद 1991 की धारा में जो अतिक्रमित काष्ठकार हैं, उनका नियमन किया जाए। जिनके पास सबूत हैं उन्हीं के बारे में विचार किया जाए। (तीन) आखिरी में बचे लोगों के लिए 11 पेजों वाला आवेदन है। कानून में ऐसी वरीयता नहीं है। लेकिन सरकार ने वन के अधिकार को तीन भागों में बांटकर हमें भम्र के जाल में डाला हुआ है।’’ - हीरालाल बांदर और उनके कई सारे साथी, बावई, उदयपुर।
‘‘कानून कहता है कि जहां व्यक्तिगत दावा नहीं लग सकता वहां सार्वजनिक वनाधिकार का इस्तेमाल कर सकते हैं। दूसरी तरफ सरकार को सामुदायिक वनाधिकार देने में अड़चन है। तभी तो यहां वनाधिकार के आवेदन तक नहीं बने हैं।’’ - छत्तरसिंह चैहान, गड़रवास, उदयपुर।
‘‘आवेदन मंजूरी का अंतिम अधिकार जिला कमेटी को है। जिले भर से आवेदन की फाइलें आती रहती हैं लेकिन निपटारे के लिए कमेटी को बैठने का समय नहीं। याने जब आवेदन ही नहीं होंगे तो अधिकार के सवाल भी नहीं उठेंगे।’’ - शंकर सिंह सिसोदिया, निचला तालाब, उदयपुर।
‘‘दावों का सत्यापन गंभीरता से किया जा रहा है। यह एक लंबी प्रक्रिया है। कमी रहने पर दावे निचले स्तर पर भी लौटाए जा रहे हैं।’’-ओ पी सिंह, अतिरिक्त आयोग, जनजाति विकास विभाग, उदयपुर।
राजस्थान में वनाधिकार कानून, 2005 को 2008 में लागू किया गया। इसके मुकाबले महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्य बहुत आगे रहे। तब कि वसुंधरा राजे सरकार ने आवेदन को बेहद जटिल बना दिया। पहले इसे 3 पेज का बनाया, फिर 11 पेज का। फिर कहा कि इसमें एसडीएम की सील भी जरूरी है। यह आवेदन राज्य सरकार को उपलब्ध कराने थे लेकिन जब बाजारों में आए तो सरकार ने बाजारों के आवेदनों पर रोक लगा दी। सरकार ने वनाधिकार कानून को वनों तक लाने में जरूरत से ज्यादा समय खर्च किया। और जब यह वनों तक आया है तब: जीपीएस मशीन किसी भी व्यक्ति का लोकेशन देखता है तो अक्षांतर और देशांतर को केन्द्र में रखकर। इसमें सभी व्यक्तियों का लोकेशन नहीं देखा गया है। जैसे कि उदयपुर जिले के बबई गांव को अनसेटल्ड एरिया होने के चलते मापा नहीं जा सका है। ऐसे अनगिनत गांवों हैं जहां जीपीएस मशीन के गैरमौजूदगी में आवेदन नहीं भरे जा सके हैं। इसी तरह भाखरा गांव की फाइल रूकी हुई है। यहां के लोगों को वन-विभाग के भौतिक सत्यापन का इंतजार है। बिछीवाड़ा में वन-विभाग के दबाव में लोगों को जमीनों से बेदखल किया गया है। जलपका गांव के लोगों का आरोप है कि पटवारीसाब ‘खर्चापानी’ के चक्कर में फाइलें सत्यापित नहीं करते। पटवारीसाब के पास जीपीएस मशीन न होने का ठोस बहाना जो है।
मानव आश्रिता संस्थान, बावलवाड़ा’ के अजमाल सिंह के मुताबिक- ‘‘असलियत यह है कि यहां जमीन जोतने, लघु वन उपज, पंरपरागत सामुदायिक जंगल और उसकी रक्षा जैसे हकों का आज भी इंतजार है। कानून की लगाम विभागीय कर्मचारियों के हाथों में जो रखी गई है।’’ दक्षिणी राजस्थान के 5 जिलों उदयपुर, डोंगरपुर, बांसवाड़ा, राजसमंद और प्रतापगढ़ की 23 पंचायत समितियों में की कुल आबादी का करीब 75 प्रतिशत हिस्सा जनजातियों का है। इन्होंने 1995 से ‘जंगल जमीन जन आंदोलन’ के बैनर तले वनाधिकार की जो लड़ाई शुरू की थी उसे कानूनी तौर से 2005 में जीती भी। लेकिन कानून को उसी रूप में वनों तक लाने की लड़ाई अबतक चालू है। आंदोलन मानता है कि पहले 10 सालों में काफी कुछ बदला है और काफी कुछ बदलना बाकी है।
जमीन का आंदोलन
एक तरफ 1 जुलाई 1992 का आदेश था कि 01/07/1980 के पहले से जो आदिवासी जहां रहते हैं उनका नियमन राज्य सरकार शीघ्रातिशीघ्र करे। 1995 तक राजस्थान भर में कुल 11 कब्जों की पहचान हुई। दूसरी तरफ वन-विभाग वाले आदिवासियों को जंगल से बेदखली, हफ्तावासूली के साथ-साथ उनकी झोपड़ियों और खड़ी फसलों में आग लगाने जैसी कार्यवाहियां होती रही। 1995 में जनसंगठनों ने कुल 23 पंचायत समितियों में 17000 काष्ठकारों के जंगल में रहने का आकड़ा उजागर किया। 6 अक्टूबर, 1995 को 2000 आदिवासियों ने पहला प्रदर्शन जनजाति आयुक्त कार्यालय, उदयपुर में किया। प्रदर्शन से पहले लोग एक-दूसरे को भले ही नहीं जानते हो लेकिन सबका दर्द एक ही था। नारे क्या लगाने हैं, भाषण कौन देगा जैसी बातें भी उन्होंने टाउनहाल में तय की थीं। जब शहर के बीचोबीच जुलूस में भारी भीड़ उमड़ी तो दफ्तर के लोगों से मंत्रालय तक पता जाकर चला कि यह तो बड़ी समस्या है। आदिवासियों ने मांग रखी कि वन-विभाग की तरफ से बेदखली की कार्यवाही बंद हो। 15 दिसंबर, 1995 को जब राजस्थान के मुख्य सचिव मीठालाल मेहता उदयपुर दौरे पर आए तो जनता ने उन्हें 1992 के आदेश के नियमन की याद दिलायी। मुख्य सचिव ने तिथि आगे बढ़ाने और शीघ्रातिशीघ्र नियमन का आश्वासन दिया।
आश्वासन के अलावा कुछ होता नहीं देख 6 जुलाई, 1996 को उदयपुर तहसील की सभी तहसीलों के साथ बांसवाड़ा, डुंगरपुर और चित्तोड़गढ़ से 3000 आदिवासियों ने टाउनहाल के सामने अनिश्चितकालीन धरने की बात कही। प्रशासन ने सोचा कि यह दम दिखावटी है, रात होते-होते लोग वापस चले जाएंगे। लेकिन शाम होते-होते जब लोग अपने साथ लाए आटा-सामान खोलकर रोटियां बनाने लगे तो प्रशासन समझा। सुबह 10 बजते-बजते संभागीय आयुक्त एस अहमद ने लिखित आश्वासन पढ़कर सुनाया तो पुराने तजुर्बों के चलते लोगों ने भरोसा नहीं किया। काफी चर्चा-बहस के बाद लोग लिखित आश्वासन की सैकड़ों प्रतियां लेकर गांव गए। लिखित आश्वासन में कहा गया था कि लोकसभा के चुनाव के बाद कब्जों की पहचान करायी जाएगी। ऐसा कोई कार्यवाही होते न देख आंदोलन ने सर्वे प्रपत्र खुद बनाने का फैसला लिया। इसमें ग्राम स्तर पर समितियां बनाई गई। 31 जनवरी, 1997 तक सूचनाएं जमा हुई, जिसमें कुल 8788 लोगों का 71304 बीघा जमीन पर कब्जा पाया गया। याने 1 परिवार की औसतन 8 बीघा जमीन। 6 फरवरी, 1997 में जनजाति आयुक्त को 1980 से पहले काबिज लोगों की तहसीलवार सूचियां दी गई। 9 सितम्बर, 1997 को दो दिनों तक चले सम्मेलन में तय हुआ कि चार स्तरीय समितियां (ग्राम-पंचायत-तहसील-केन्द्रीय स्तर) बनायी जाए। 1998-99 में सरकार ने मौका सत्यापन के लिए शिविर लगाए। कोरम के अभाव में जो खानापूर्ति बनकर रह गए। 1998 के लोकसभा चुनाव में ‘सवाल हमारे जबाव आपके’ नाम से जो अभियान चलाया गया उसमें उम्मीदवारों से जंगल-जमीन को नियमन करने की बात पर लिखित आश्वासन मांगे गए। अलग-अलग क्षेत्रों से अलग-अलग पार्टी के उम्मीदवार जीते और पुराने आश्वासन भूले। लेकिन 5 सालों तक वनाधिकार की लड़ाई ने आंदोलन का रुप ले लिया था।
15 सितम्बर, 2004 तक वन मंत्री बीना काक ने जब कब्जों का भैतिक सत्यापन करवाने के वायदा नहीं निभाया तो आंदोलन ने विधानसभा का घेराव किया। उस समय दक्षिण राजस्थान के 16 विधायकों के साथ हुई चर्चा हुई। तब कई विधायकों और मंत्रियों का समर्थन मिला। 19 जुलाई को नई दिल्ली में दो दिनों तक चली राष्ट्रीय जनसुनवाई में 13 राज्यों से प्रतिनिधि आए। इसमें फैसला लिया गया कि जिन राज्यों की याचिकाएं ‘केन्द्रीय सशक्त समिति’ में दायर नहीं की गई हैं उन्हें दायर किया जाए। 18 अक्टूबर को तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के साथ हुई बैठक में दो बातें तय हुईं। एक तो आदिवासियों की बेदखली को फौरन रोका जाए। दूसरा फसल को आग लगाने से लेकर पुलिस कार्यवाही की घटनाएं भी बंद हो।
2002 को राजस्थान में लगातार चौथे साल अकाल पड़ने और राहत नहीं मिलने से आदिवासी इलाकों से भारी तादाद में पलायन होने लगा। भुखमरी और पशुओं की मौतों की तादाद में इजाफा बढ़ते देख आंदोलन ने 12 अप्रेल, 2002 को जो धरना दिया उसमें विश्वनाथ प्रताप सिंह और सीताराम येचुरी भी शामिल हुए। लोगों ने नारे लगाए- ‘‘भूखे पेट नहीं चलेगा यह अन्याय।’’ उस समय 60 लाख टन अनाज को सड़ाकर समुद्र में फेंका जा रहा था। लोग जैसे ही एफसीआई की गोदामों की तरफ बढ़े वैसे ही पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। इसके बाद राज्य के लोगों को 2.5 लाख टन अनाज का कोटा मिला और ‘काम के बदले अनाज' की योजना बनी।
7 से 21 मार्च, 2005 को जंतर-मंतर, दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे ‘इज्जत से जीने के अधिकार’ के साथ ‘वनाधिकार विधेयक’ को संसद में पास कराने के लिए 15 दिनों का धरना दिया गया। इसके समर्थन में 41 सांसद व्यक्तिगत तौर से उपस्थिति हुए। इसके बाद 20 सांसदों की एक समिति भी बनी जिसने अपने स्तर पर संसद में काम करना शुरू किया। 16 सितम्बर, 2005 को राष्ट्रीय नेता और दक्षिण राजस्थान से 5000 से ज्यादा आदिवासियों ने ‘संयुक्त संघर्ष मंच’ की उदयपुर रैली में भाग लिया। 15 दिसम्बर को वनाधिकार कानून लोकसभा में और 18 दिसम्बर को राज्यसभा में पारित हुआ।
लेकिन दक्षिणी राजस्थान में वनाधिकार की लड़ाई अभी अधूरी है। प्रशासन ने अपनी सहूलियत के हिसाब से कानून में कई तरह के छेद कर दिए हैं। फिलहाल वनों के लिए बने अधिकार वनों से कटे लगते हैं। इसलिए यहां के आदिवासियों के बीच एक नारा बुलंद हो रहा है- ‘‘हमें जब तक वनाधिकार नहीं। हमारे वोट पर तुम्हारा अधिकार नहीं।।’’