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8.11.10

प्राइवेट स्कूलों का कारोबार 5000 करोड़ रुपये के पार



प्राथमिक शिक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद मुंबई और उपनगरीय इलाकों में बच्चे बीएमसी स्कूलों से मुंह मोड़कर निजी स्कूलों की तरफ जा रहे हैं.

बीएमसी स्कूल में जहां मुफ्त में शिक्षा दी जाती है वहीं निजी स्कूलों में औसतन साल भर में एक बच्चे पर तकरीबन 25-30 हजार रुपये खर्च आता हैं. लाख कोशिशों के बावजूद निजी स्कूलों में डोनेशन प्रथा खत्म होने के बजाए और मजबूत होती जा रही है.

बच्चे को स्कूल में प्रवेश दिलाने के लिए औसतन 25 हजार रुपये बतौर डोनेशन देने पड़ते हैं. समाज सेवा के नाम पर चलाए जा रहे निजी स्कूलों का कारोबार हर साल करीबन 20 फीसदी की दर से बढ़ रहा है. आज शिक्षा कारोबार सालाना लगभग 5000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा का हो चुका है जिसकी सही-सही जानकारी किसी के पास नहीं है.

सरकार साल दर साल बीएमसी स्कूलों में बच्चों को अच्छी शिक्षा और सुविधा देने के लिए बजट बढ़ाती जा रही है, लेकिन बच्चों की संख्या हर साल कम होती जा रही है. बीएमसी ने स्कूल शिक्षा को मजबूत बनाने के लिए 2007-08 में 1,051 करोड़ रुपये और 2008-09 में 1,350 करोड़ रुपये का प्रवाधान किया था, जबकि इस साल (2009-10) बीएमसी शिक्षा पर 1,651 करोड़ रुपये खर्च करेगी.

बीएमसी के अलावा केन्द्र और राज्य सरकार भी स्कूली शिक्षा में भारी भरकम रकम खर्च करती है. बीएमसी स्कूलों में शिक्षा पूरी तरह से मुफ्त दी जाती है. बच्चों की फीस, कॉपी-किताबें, स्कूल यूनिफॉर्म के साथ मिड-डे मिल के तहत खिचड़ी और दोपहर में दूध भी बच्चों को मुफ्त में मिलता है. इसके बावजूद हर साल तकरीबन 30 हजार बच्चे बीएमसी स्कूलों से तौबा कर रहे हैं.

इन स्कूलों में बच्चों का आंकड़ा वर्ष 1999 में 7.5 लाख था, जबकि बीते शिक्षण सत्र में बीएमसी के कुल 1,144 स्कूल में 4.50 लाख ही बच्चों ने दाखिला लिया. इस सप्ताह से शुरू हो रहे नए शिक्षण सत्र में यह संख्या और कम होने की आशंका जताई जा रही है.

बृहन्मुंबई महानगरपालिका शिक्षक सभा के महासचिव एवं ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ टीचर्स ऑर्गनाइजेशन के निदेशक रमेश जोशी का का कहना है, 'बीएमसी स्कूलों में साल दर साल बच्चों की कम होती संख्या की मुख्य वजह लोगों की बदलती सोच है.'

उनके मुताबिक आज लोग सोचते हैं कि सिर्फ अंग्रेजी माध्यम में उनका बच्चा जाएगा तो ही उसका भविष्य संवर सकेगा. बीएमसी स्कूल तो गरीबों का स्कूल है, वहां बच्चा जाएगा तो समाज के लोग क्या कहेंगे? जबकि हमारे सरकारी स्कूलों में जो शिक्षक है वह निजी स्कूल के शिक्षकों के मुकाबले अधिक शिक्षित और प्रशिक्षित हैं.

मुंबई और आसपास के इलाकों में करीबन 2,000 निजी स्कूल हैं. जिनमें करीब-करीब 20 लाख बच्चे पढ़ते हैं और यह आंकड़ा सालाना करीबन 15 फीसदी की रफ्तार से बढ़ता जा रहा है. स्कूली शिक्षा आज सबसे सफल कारोबार बन गया है। निजी स्कूलों में फीस और दूसरे खर्च तय नहीं है.

सभी निजी स्कूलों की दरें अलग-अलग हैं. प्रवेश के समय इमारत या स्कूल के विकास के नाम पर लिये जाने वाली डोनेशन फीस इन स्कूल की आय का एकमुश्त सबसे बड़ा साधन है. तीन-चार साल के बच्चे के एडमिशन के लिए स्कूल प्रबंधन की ओर से मुंबई में 5 हजार रुपये से एक लाख रुपये तक बतौर डोनेशन फीस वसूली जाती है, जिसकी कोई लिखित जानकारी नहीं दी जाती है.

इसके अलावा प्रवेश शुल्क, साल में होने वाली दो परीक्षाओं के अलावा हर महीने टेस्ट फीस, टर्म फीस (पिकनिक और कल्चरल्स प्रोग्राम) को मिलाकर सालभर में एक छात्र से औसतन सालभर में 30 हजार रुपये तक ले लिये जाते हैं. ड्रेस और किताबें स्कूल की बताई हुई दुकानों से ही लेनी पड़ती हैं जो अपेक्षाकृत 20 फीसदी तक महंगी ही होती हैं.

मंहगी होती शिक्षा के बावजूद निजी स्कूलों की तरफ बढ़ते रुझान पर राहुल ग्रुप ऐंड स्कूल कॉलेज के चेयरमैन लल्लन तिवारी कहते हैं, 'लोग अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना चाहते हैं इसीलिए वह अच्छे स्कूल में बच्चे को भेजना चाहते हैं, जिसके लिए पैसा मायने नहीं रखता है.'

महंगे से महंगे स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे को भी कोचिंग का सहारा लेना पड़ रहा है. इस पर महेश टयूटोरियल कोचिंग के प्रबंध निदेशक महेश शेट्टी कहते हैं कि स्कूल में क्या पढ़ाया जाता है, हमे इससे कोई मतलब नहीं है। हमारा लक्ष्य होता है कि बच्चे परीक्षा में अधिक से अधिक नंबर ला पाए.

इसके लिए कोचिंग में नई तकनीक और रिसर्च के आधार पर बच्चों को शिक्षा दी जाती है. यही वजह है कि हर साल बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है, जबकि मंदी के बावजूद कोचिंग फीस में करीबन 15-20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.

लगातार हो रहे शिक्षा के निजीकरण को लेकर बच्चों की शिक्षा पर काम करने वाले स्वयंसेवी संस्था क्राई की निदेशक योगिता वर्मा का कहना है, 'संविधान में शिक्षा को मूलभूत आवश्यकता बताया गया है. इसलिए सबको शिक्षा देना सरकार का कर्तव्य बनता है. शिक्षा के निजीकरण को बंद करना चाहिए. अमेरिका और इंगलैड में सरकारी शिक्षा ही सही मानी जाती है.'

क्राई का मानना है कि सबको मुफ्त और एक जैसी शिक्षा दी जानी चाहिए. वैसे भी सरकारी स्कूलों के अध्यापक निजी स्कूल के अध्यापकों के मुकाबले ज्यादा योग्य होते हैं.

13.11.09

सबको शिक्षा समान शिक्षा के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियान

शिरीष खरे









मुंबई। बालदिवस के मौके पर क्राई ने एक 'सबको शिक्षा समान शिक्षा' नाम से राष्ट्रव्यापी अभियान छेड़ा है जिसमें सभी लोगों को एक घोषणापत्र में हस्ताक्षर करने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है। इसके बाद घोषणपत्र को सरकार के सामने रखा जाएगा और बच्चों की निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 में 3 संशोधनों के लिए कहा जाएगा।


क्राई की तीन मांगों में से पहली यह है कि 6 साल से नीचे और 15 से 18 साल तक के बच्चों को भी मुख्य प्रावधान में लाया जाए। दूसरी, हर बस्ती से 1 किलोमीटर के भीतर योग्य शिक्षक और सुविधायुक्त स्कूल हों। तीसरी, सकल घरेलू उत्पाद का 10 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च किया जाए।

क्राई के मुताबिक इस अधिनियम में ऐसी बहुत सारी कमियां हैं जो बच्चों को उनके बुनियादी हकों से बेदखल करती हैं और उनके बीच की असमानताएं बढ़ाती हैं। इसलिए संस्था ने तय किया है कि वह शिक्षा अधिनियम में संशोधन के लिए जनता का समर्थन लेगी और इस तरह से सरकार का ध्यान खीचेगी। यह घोषणापत्र राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केन्द्र सरकार के मंत्रियों और सभी राज्यों के महत्वपूर्ण अधिकारियों के सामने पेश किया जाएगा।

क्राई की डायरेक्टर योगिता वर्मा सहगल ने इस अभियान के बारे में बताया है कि ‘‘आगामी शीतकालीन सत्र हमें सरकार से यह कहने का एक मौका देता है कि अधिनियम और उसके प्रावधानों में संशोधन किए बगैर देश के हर बच्चे तक उसके अधिकार नहीं पहुंच सकते हैं। इसे देखते हुए क्राई ने 18 राज्यों के अपने 200 से भी ज्यादा ग्रासरूट एनजीओ को साथ लिया है और 6700 बस्तियों मे यह हस्ताक्षर अभियान शुरू किया है। हम देश के कई हिस्सों में बहुत से कार्यक्रम करेंगे और नागरिकों को इस अधिनियम में मौजूद कमियों के बारे में बताएंगे। हम उनसे कहेंगे कि वह इस अभियान में भाग लेकर बच्चों के अधिकारों के लिए सरकार पर दबाव बनाएं। हमें उम्मीद है कि इस घोषणापत्र पर देश भर से 5 लाख से ज्यादा नागरिक हस्ताक्षर करेंगे।’’

क्राई ने शिक्षा अधिनियम में संशोधन की जरूरत को बतलाने के लिए 500 से ज्यादा गांवों और 22 से ज्यादा शहरों में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करने का फैसला लिया है। उत्तरप्रदेश के इलाहाबाद और बनारस के कई झुग्गी बस्तियों में बच्चों के ऐसे कार्यक्रम हो भी चुके हैं।

11 दिसम्बर को यह अभियान पूरा होगा। 11 दिसम्बर की तारीख बच्चों के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन की सालगिरह के चलते खास मानी जाती है। देशभर से नागरिकों के हस्ताक्षर करने के बाद इस घोषणापत्र को एक प्रतीकात्मक पुस्तिका के तौर पर राष्ट्रपति के हाथों में सौपा जाएगा।

20.9.09

इसलिए सूरत में 50,000 बच्चे काम पर जाते है

शिरीष खरेसूरत: शहर में जो 262 प्राइमरी स्कूल हैं, उनमें महापालिका के स्कूलों की संख्या दो है। दूसरे हैरतअंगेज आंकड़ें के मुताबिक, महापालिका के सेकेण्डरी स्कूलों की संख्या है चार। 112.27 वर्ग किलोमीटर में फैले सूरत की 29 लाख आबादी में से 6 लाख गरीब हैं। एक तो प्राइमरी स्कूलों और गरीबों के बच्चों के बीच का फासला बेहद ज्यादा है, ऐसे में जो थोड़े से बच्चे किसी तरह स्कूल जाते हैं, उनमें से भी 10 प्रतिशत बच्चे सेकेण्डरी स्कूलों तक नहीं पहुंच पाते। सवाल है कि जो बच्चे स्कूल नहीं जाते वो क्या करेंगे ? जवाब मिलता है- आज नहीं तो कल काम पर ही जाएंगे।


गुजरात के महत्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र के अलावा सूरत सबसे मंहगे शहरों में से भी एक है। यहां साग-सब्जी, अनाज और रोजमर्रा की जरूरी चीजें बाहर से आने से बहुत मंहगी मिलती हैं। ऐसे में 4 सदस्यों वाले एक परिवार को यहां रहने के लिए कम से कम 5,000 रूपए तो चाहिए ही। इसलिए, घर की गृहस्थी चलाने में बच्चों को मददगार माना जाता है।
सूरत से मुंबई की तरफ जाने वाली ट्रेन की रफ़्तार तेज होते ही अंबेडकरनगर की घनी झुग्गियां बहुत पीछे छूटने लगती हैं। ऐसे में शायद ही किसी का ध्यान '''स्मीमेल हॉस्पीटल' की उस दीवार पर जाए, जिसके सहारे से करीब 100 झुग्गियां सट गई हैं। पटरियों के आसपास बिखरी गंदगी की सल्तनत से हवा में दूर तक कई किस्म की बदबुएं घुल-मिल गई हैं।
यहां रहने वाले संजू बाघेला, 3 भाईयों में सबसे बड़े हैं। 14 साल की उम्र कोई बड़ी उम्र नहीं कहलाती, फिर भी वह 6 महीनों से टेक्सटाइल मार्केट की गोदाम में लगा है। उसकी 10 गुणा 12 वर्ग फीट की एक झुग्गी ही कई चीजों जैसे डबल-बेड की लकड़ियों, बांस की बल्लियों, कच्ची मिट्टी, पत्थरों, पत्तों और पन्नियों से मिलकर बनी है। उसके मां-बाप रेलवे के खुले पुल के नीचे से गुजरने वाली रोड पर ठेला लगाकर सब्जियां बेचते हैं। सब कुछ ठीक रहा, तो वह रोज का 100 रूपए बचा लेते हैं। इस तरह महीने के 30 दिनों में 3000 रूपए भी जोड़ें, तो सूरत जैसी जगह के लिए बहुत थोड़े पड़ते हैं। ऐसे में संजू एक उम्मीद की तरह है, एक रोज जब वह लायक हो जाएगा तो महीने में 1,000 रूपए तो कमायेगा ही।
मालिक की नजर में संजू अभी लायक नहीं हुआ, इसलिए मेहनताने के नाम पर कुछ नहीं मिलता। यह पहली नौकरी है, इसलिए संजू हर सुबह 7 के पहले-पहले मान दरवाजे की साड़ी-गोदाम को निकलता है। 14 किलोमीटर आने-जाने में उसके कुछ दोस्त रिक्शा शेयर करते हैं। संजू का 10 रूपए रोज भाड़े में ही जाता है। लौटना रात 10 के पहले-पहले नहीं होता। वह सुबह 5 बजे उठने के लिए आते ही सो जाता है। अंधेरा छंटने के पहले उसे पटरी को पार करके खुले में शौच करना पड़ता है, घर का पानी भर लेना पड़ता है। वैसे घर के ज्यादातर काम छोटे भाई मुकेश के हिस्से में हैं। लेकिन, 12 साल के होते ही उसे भी ट्रेनिंग में भेजा जाने वाला है। इन बच्चों की मां दक्षा बेन ने बताया कि सब्जी खरीदने के लिए रोजाना 500 से 600 रूपए चाहिए। इन दिनों आजू-बाजू की बस्ती टूटने से ग्राहकी कम हो गई है। दूसरे किस्म के कामों में अनाड़ी हैं, भूखा सोने से बच्चों को काम पर भेजना अच्छा है।
संजू के तीन दोस्त बेअटक किताबे पढ़ते हैं। संजू केवल अपना नाम लिख पाता है। उसे 1,2,3 भी आता है, जोड़ना-घटाना नहीं। वह कुछेक रोज के लिए स्कूल भी गया था, लेकिन पहली के बच्चे के लिए रेल की पटरियां, संगम टेकरी के पहले आने वाले मेन-रोड़ के ट्रेफिक से गुजरते हुए दो किलोमीटर चलना बहुत मुश्किल था। जब से मोटर-साइकिल की टक्कर में दांया पांव खराब हुआ, तब से उसने स्कूल जाने का नाम ही छोड़ दिया।
आज भी रेलवे लाइन के छोटे बच्चे लाचार हैं क्रासिंग करने से। बड़े लाचार हैं उन्हें स्कूल लाने-ले जाने से। 11 फरवरी को जब बुलडोजर चला, तो पता चला कि यहां कुल 156 झुग्गियों के 1125 लोग रहते हैं, लेकिन यहां से एक भी बच्चा स्कूल नहीं जाता।
इस लाइन के अजय ठाकुर, मोगिया, परवीन अहीरे, संजय उखरू और राजा जनार्दन की कहानियां तो और भी उलझी हैं। अजय का पिता दीवाली को दारू के नशे में अपने दो लड़कों और तीन लड़कियों को छोड़कर खत्म हो गया। सोलह साल का अजय टेक्सटाइल मार्केट की बहुमंजिला इमारतों से बोरियां उठाकर नीचे खड़े ट्रको में भरता है। एक बोरी का 2 रूपए, इस तरह वह दिनभर में 25 बोरियों को ठिकाने लगाता है।
मोगिया का पिता भी ऐसे ही खत्म हुआ था। वह अभी 13 का है, और 12 की छोटी बहिन आकू के साथ कचरा बीनता है। 14 की कविता अपनी मां अरूणा के साथ 'स्मीमेल हास्पीटल' के बाथरूमों को साफ करती है। ऐसे सारे बच्चे रविवार को काम नहीं मिलने पर अंजू बेन के टेलीविजन के सामने जमा होते हैं। इस लाइन में एक ही टेलीविजन होने से यह हिस्सा वीडियो थियेटर जैसा लगता है।
यहां के बच्चे इधर-उधर ज्यादा घूम-फिर नहीं सकते, क्योंकि कई बार पुलिस धारा 155 और 109 का इस्तेमाल करके उन्हें अंदर डाल देती है। अगर मां-बाप को मालूम पड़ा, तो 50 रूपए के बदले वह अपने बच्चे को छुड़ा लाते हैं। दूसरी तरफ कानून को अनदेखा करते हुए महापालिका के कांट्रेक्टर छोटे-छोटे बच्चों से काम करवाते हैं। उदाहरण के लिए 12 साल का विनोद अपने कई दोस्तों के साथ सरदार ब्रिज में बिजली के खंभों को रंगता है। किसी विभाग में अगर 18 साल से कम उम्र के बच्चे काम करते हैं, तो उन्हें दण्ड दिया जाता है। इस लिहाज से महापालिका पर भी ऐसा दण्ड लगना चाहिए। सलामती का कोई भी साधन दिए बगैर बच्चों को ऐसे जोखिम भरे कामों में ही चढ़ा दिया जाता है। हमारे दौरे के दौरान ही पिप्लोद के पास के एक खंभे पर चढ़ा इलेक्ट्रिशियन हादसे में मारा गया।
सोमवार को हम संजू से मिलने के बहाने मान दरवाजे की गोदाम में गए। संजू गोदाम का काम तो करता ही है, जरूरत पड़े तो अशिंका-गारमेंट्स के नाम से चलने वाली मालिक की दूसरी दुकान में भी जाता है। शापिंग-काम्पलेक्स की यह गोदाम जमीन के भीतर है। गोदाम की गैलरी इतनी पतली, अंधियारी है कि बड़े-बड़ों की आंखें धुंधली हो जाएं। यहां एक छोटे से गोदाम में 12 से 15 साल तक के 12 बच्चे पतली-पतली उंगलियों से साड़ियों की कटिंग, धागों की बुनावट, पैकिंग और बोझा उठाने से लेकर सामान को दो मंजिला ऊपर तक लाने-ले जाने का काम करते हैं। 12 में से 8 को खांसी और दमा की बीमारी का पता लगते ही हम चौंक गए। वहां न पंखा है, न खिडकियां। गर्मी, एक जगह घंटों बैठने और काम से शरीर टूटता है, लेकिन काम नहीं रूकता। दिनभर भीतर बैठने से मालूम नहीं चलता कि दिन है या रात। आधे घंटे के लंच की खबर सुनते ही बच्चे समझ जाते हैं कि 2 से 3 बजा होगा।
गुजरात में बाल मजदूरी से जुड़े कुछ तथ्‍य:
गुजरात के ही एक-चौथाई से ज्यादा बाल-मजदूर काम करते हैं। सरकारी आंकडों के हिसाब से सूरत में 5,000 बाल-मजदूर हैं, जबकि गैर सरकारी आंकडों को देखें, तो यह संख्या 50,000 को पार कर जाती है।
इसमें 15 से 18 साल के 68 प्रतिशत बाल मजदूर हैं। ‘राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग’ भी यह मानता है कि गुजरात के सूरत, भावनगर और बांसकांठा जिलों में बाल मजदूरी के मामले सबसे ज्यादा सामने आए हैं। इन जिलों के कुल मजदूरों में से 28.51 प्रतिशत बाल मजदूर हैं।
यहां 4 लाख 50 हजार पावरलूम ही हैं। तेजी से बढ़ती पावरलूम इकाइयों ने अधिक, अकुशल और सस्ती मजदूरी के लिए बड़ी संख्या में बच्चों को काम पर लगाया है। टेक्स्टाइल इंडस्ट्री के बाल-मजदूर तीन पावरलूम फैक्ट्री, डाईंग प्रिटिंग और टेक्स्टाइल मार्केट में बटे हैं। यूनियनों की गैर मौजूदगी से भी बाल-मजदूरी में इजाफा हुआ। इन दिनों शहर की सारी पावरलूम इकाइयां मिलकर हर दिन 5 करोड़ का टर्नओवर करती हैं और हर दिन 35 हजार से एक लाख साड़ियां बनाती हैं।
गुजरात सरकार ने 2010 तक प्रदेश को बाल-मजदूरी से मुक्त करने का संकल्प’ ले लिया है।

2.7.09

सरकारी स्कूलों की वकालत जरूरी है

'चाईल्ड राईट्स एण्ड यू’ में ‘विकास सहयोग’ विभाग के महाप्रबंधक कुमार नीलेन्दु से शिरीष खरे की बातचीत।

इस बार भी बोर्ड के नतीजे सबके सामने हैं। इस बार भी प्राइवेट स्कूलों के बच्चे आगे रहे। फिर भी ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ जैसी संस्थाए सरकारी स्कूलों की वकालत करती हैं। क्यों ?
प्राइवेट स्कूलों के लिए बोर्ड के नतीजे बढ़िया रहे क्योंकि वहाँ बच्चों को एडमिशन देने के पहले चुना जाता है। अब कठिन परीक्षाओं को पास करके आने वाले बच्चे तो बढ़िया नतीजे ही देंगे। फिर प्राइवेट स्कूल में अमीर बच्चों को ही लिया जाता है। उनके माँ-बाप को जरूरी लगा तो ट्यूशन भी लगवा लेते हैं। अगर इन सारी चीजों को हटा लिया जाए तो प्राइवेट स्कूलों के नतीजे भी दूसरे स्कूलों जैसे रहेंगे। एक बात यह भी है कि स्कूल की गुणवत्ता का मतलब महंगी बिल्डिंग, अंगेजी माध्यम और पढ़ाई के लिए काम आने वाली चीजों से लगाया जाता है। लेकिन बहुत कम सरकारी स्कूलों में ऐसी व्यवस्थाएँ मौजूद हैं। इसलिए प्राइवेट स्कूलों से मुकाबले की बातों का कोई मतलब नही।
सरकारी शिक्षक सही ढ़ंग से अपनी डयूटी निभा पाते तो नजीते इतने बुरे नहीं आते।
उनके हिस्से में बच्चों को पढ़ाने के अलावा भी बहुत-सी ‘नेशनल डयूटी’ हैं। प्राइवेट के शिक्षक चुनाव, जनगणना, पशुओं की गणना या ऐसे ही दूसरे कामों से बचे रहते हैं। यह कहने में कैसी झिझक कि एक सरकारी शिक्षक के ऊपर काम का बोझ बढ़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि स्कूल की पढ़ाई के दिनों में सरकारी शिक्षकों को चुनाव की डयूटी में न लगाया जाए। लेकिन अभी भी उन्हें लगाया जाता है। बुरे नतीजों के पीछे सरकारी शिक्षक और बच्चों के बीच का असंतुलित अनुपात भी जिम्मेदार है। आप सरकारी स्कूलों में बच्चों की भारी संख्या को देखिए, उसके मुकाबले आपको शिक्षकों की संख्या कुछ भी नहीं लगेगी।
एक ऐसा परिवार जो अपने बच्चों की मंहगी पढ़ाई का बोझ उठा सकता है, उसके सामने ‘सबकी शिक्षा एक समान’ जैसी बातों का क्या मतलब ? उसे तो ऐसी बातें स्कूल चुनने की आजादी को रोकने जैसी लगेगी ?
यही सवाल थोड़ा यूं भी तो देखिए कि अमीर को स्कूल चुनने की आजादी है, गरीब को नहीं। आजादी का अर्थ तो गरीब से गरीब को शिक्षा पाने का हक देता है। एक गरीब का बच्चा अपनी गरीबी की वजह से बराबरी और बेहतर शिक्षा से बेदखल क्यों रहे ? खासतौर पर प्राइमरी स्कूल से। अब तो प्राइमरी तक की पढ़ाई को मौलिक हक के रुप में अपना लिया गया है। फिर भी देश के 100 में से 60 बच्चे प्राइमरी स्कूल नहीं जाते। सीधी बात है, शिक्षा में असमानताएँ हैं। एक तरफ शिक्षा में असमानताएँ हैं, दूसरी तरफ निजीकरण की रफ़्तार के साथ सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक दूरियां बढ़ रही हैं। ऐसे में अलग-अलग तबको के बच्चों के हितों को देखना होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो प्राइवेट सेक्टर का कारोबार तो फलेगा-फूलेगा लेकिन सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक असमानताएँ दिन-ब-दिन बढ़ती जाएगी।
जब सभी बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे तो उनके बीच की असमानताओं के चलते दिक्कते नहीं आएँगी ?
यह बात लोकतंत्र के नजरिए से फिट नहीं बैठती। अब तो दुनिया भर की किताबों में समाज और स्कूल की विविधताओं को न केवल स्वीकार किया जा रहा है, उनका सम्मान भी किया जा रहा है। कई देशों जैसे अमेरिका या इंग्लैण्ड में अलग-अलग तबको से आने वाले बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। वहाँ अलग-अलग योग्यता रखने वाले बच्चे एक साथ बैठते-उठते हैं, सभी बराबरी के साथ बेहतर मौके तलाशते हैं। वहाँ की शिक्षा पब्लिक के हाथों में है। वहाँ के स्कूलों से ऊंच-नीच की सारी असमानताओं को हटा दिया गया है। वहाँ के स्कूलों में प्रवेश के पहले चुना जाना जरूरी नहीं है।
...और भारत में ?
यहाँ प्राइवेट स्कूलों पर ज्यादा भरोसा किया जाता है। इससे प्राइवेट सेक्टर से जुड़े लोगों को मनमाने तरीके से मुनाफा कमाने का मौका मिलता है। दूसरी तरफ कहने को सरकार की कई योजनाएँ हैं। लेकिन सबके अर्थ अलग-अलग हैं। जैसे कुछ योजनाएँ शिक्षा के लिए तो कुछ महज साक्षरता को बढ़ाने के लिए चल रही हैं। इसकी जगह सरकार को एक ऐसे स्कूल की योजना बनानी चाहिए जो सारे अंतरों का लिहाज किए बगैर सारे बच्चों के लिए खुली हो।
इसी तरह सरकारी स्कूलों में भी तो असमानताएँ हैं ?
बिल्कुल, जैसे केन्द्रीय कर्मचारियों के बच्चों के लिए केन्द्रीय स्कूल, सैनिकों के बच्चों के लिए सैनिक स्कूल, मेरिट लिस्ट के बच्चों के लिए नवोदय स्कूल। बात साफ है कि सभी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ताएँ अलग-अलग हैं। इसी तरह शिक्षक को चुने जाने के लिए भी अलग-अलग स्कूलों में योग्यता के अलग-अलग पैमाने रखे गए हैं।
लेकिन समाज की असमानता का क्या किया जाए ?
समाज में जो भेदभाव है, वही तो स्कूल की चारदीवारी में हैं। इसलिए समाज से स्कूल में घुसने वाले उन कारणों को तलाशना होगा जो ऊंच-नीच की भावना बढ़ाते हैं। अगर समाज में समानता लानी ही है तो सबसे अच्छा तो यही रहेगा कि इसकी शुरूआत शिक्षा और बच्चों से ही की जाए।
सबके लिए एक समान स्कूल की बात इतनी सीधी है ?
जब पानी से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य तक की चीजों को बाजार में घसीटा जा रहा हो तो यह बात बेतुकी लग सकती है। लेकिन शिक्षा की जर्जर हालत को देखते हुए तो यह बात बड़े तुक की लगती है। कोठारी आयोग (1964-66) ऐसा पहला आयोग था जिसने सामाजिक बदलावों के लिए बहुत अच्छे सुझाव दिए। उसने देश भर के लिए एक ऐसी व्यवस्था बनाने की बात कही जिसमें हर तबके के बच्चे एक साथ पढ़े-बढ़े। उसने यह भी कहा था कि सबके लिए एक समान शिक्षा नहीं रही तो समाज के ताकतवर लोग सरकारी स्कूलों को छोड देंगे और प्राइवेट की शरण में जाएँगे। इसके बाद हम देखते हैं कि 1970 के बाद से सरकारी स्कूलों की हालात बद से बदत्तर होतक चले गए। सरकार का ध्यान इस तरफ कभी नहीं गया ? वह 1968, 1986 और 1992 की शिक्षा नीतियों में समान स्कूल व्यवस्था की बात तो करती है लेकिन उसे लागू नहीं करती। 2001 में संसद ने शिक्षा का मौलिक हक तो दिया लेकिन देश में शिक्षा की दोहरी नीति को भी जारी रखा।
विकलांग बच्चों के एडमिशन को लेकर प्राइवेट स्कूल कानून से बंधे नहीं होते। जबकि पीडब्ल्यूडी एक्ट के तहत सरकारी स्कूलों में ऐसे बच्चों को लेना जरूरी है। यह भी तो शिक्षा की दोहरी नीति ही है।
हाँ, वैसे इस किस्म के सभी बच्चों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समावेशी शिक्षा आंदोलन चल रहा है। यह शिक्षा या स्कूलों में फैली छोटी-बड़ी गड़बड़ियों को ढ़ूढ़ने और उनसे निजात पाने का शुरूआती कदम है। दूसरा, यह आंदोलन हमारे आसपास की ऐसी कई विविधताओं का पता लगा रहा है जो असमानताएँ फैलाती है। यहाँ समावेशी शिक्षा का मतलब केवल विकलांग बच्चों की शिक्षा से ही नहीं है। इसका मतलब तो सभी किस्म की विविधताओं को सभी पहलुओं से देखने, समझने और उसे शामिल करना भी है।