26.8.09

अकाल के बीच सुकाल का टांका

पश्चिमी राजस्थान के थार में बीते सालों के मुकाबले इस साल सूखे की छाया ज्यादा काली है। इसके बावजूद गीले रहने की परंपरागत कलाओं से तरबतर कुछ गांवों में पानी की कुल मांग में से 40 प्रतिशत तक फसल उगाने की जुगत जारी है। बायतु, बाड़मेर से सुखद समाचार लेकर लौटे शिरीष खरे की रिपोर्ट -
अगर आप पाकिस्तान की सीमा से कंधा मिलाने वाले जिला बाड़मेर का नक्शा देखें तो बायतु ब्लाक अच्छी-खासी जगह घेरता दिखता है। बायतु से लगा ज्यादातर इलाका हरे रंग से रंगा है जो थार का खाली स्थान बतलाता है। दूसरी तरफ का मामूली-सा हिस्सा पीले रंग में है वो प्रशासनिक क्षेत्र का संकेत देता है। बायतु ब्लाक की 47 में से 42 पंचायतों का पानी ऐसा खारा (फ्लोराइट-8 पीपीएम) है कि गले नहीं उतरता। मीठे पानी का इकलौता जरिया है भी तो 60 किलोमीटर दूर शिव ब्लाक के उण्डू में। उधर की पाइपलाइन से आने वाला मीठा पानी 42 किलोमीटर की यात्रा करके खानजी का बेटा गांव से दो धाराओं में फूटता है। एक का रास्ता 18 किलोमीटर दूर पनावड़ा की तरफ जाता है, दूसरा इतनी ही दूरी के बाद बायतु से होकर गिरा तक गिरता है। लेकिन अब यह पूरी पाइपलाइन बहुत पुरानी और खस्ताहाल है, कचरा जमा होने के अलावा इसके कनेक्शन भी जगह-जगह से खुले मिलते हैं। इसकी लंबाई के चलते पानी की आपूर्ति महीने में 5 रोज और उसमें भी मुश्किल से 2 घण्टे हो पाती है। यह पानी घर-घर पहुंचने की बजाय सामुदायिक होदी तक ही पहुंचता है, यही से मटके लेकर खड़ी औरतों की लंबी लाइन लग जाती है। नए दोस्तों के हवाले से- यह दृश्य तो कुछ भी नहीं, 9 साल पहले आया होता तो संकट के बादल और भी घनघोर देखने को मिलतें।
9 साल पहले2000 को ‘लोक कल्याण संस्थान’ ने बायतु ब्लाक के 12 गांवों में पीने, बर्तन, कपड़े, पशु, निर्माण और तीज-त्यौहार में खर्च होने वाले पानी की कुल मांग का हिसाब लगाने के लिए अध्ययन किया। इससे पता लगा कि यहां तो कुल जरूरत का 10 प्रतिशत पानी ही पूरा हो पाता है। ऐसे में पानी की कुल मांग का 90 प्रतिशत अंतर पाटना एक बड़ा सवाल था। जबावदारी के नजरिए से सरकार टैंकरों से 10 प्रतिशत तक की हिस्सेदारी निभा रही थी, इसके बाद जनता 200 से 250 फीट जमीन के नीचे से 20 प्रतिशत तक खारा पानी निकालकर उसे मीठे पानी में मिलाकर पीने को मजबूर होती। फिर भी तो पानी की कुल मांग का 70 प्रतिशत अंतर बना रहता, जिसे भरने के लिए बड़े पैमाने पर निजी टांके बनाने की पहल हुई। बरसात की बूंदों को सहेजने वाली इस पंरपरागत शैली को मुहिम का रंग-रुप देने से यहां 40 प्रतिशत तक पानी की जरूरत का इंतजाम करने की भूमिका बंधी। वैसे पानी की कुल मांग का 30 प्रतिशत अंतर अब भी कम नहीं कहलाता। इसीलिए तो यहां मटके लेकर खड़ी औरतों की लंबी लाइन वाले दृश्य (संकट के कम बादलों के साथ) जहां-तहां बिखरे पड़े हैं। ‘लोक कल्याण संस्थान’ के भंवरलाल चौधरी कहते हैं- ‘‘यहां के 100 सालों में से 80 तो अकाल के नाम रहे। बाकी के 10 साल सुकाल और 10 साल ‘फिफ्टी-फिफ्टी’ भरा मामला रहा। इसके अलावा हमने बरसात और जमीन के जल स्तरों की थाह भी मापी। यह गुणा-भाग लगाया कि कितने टांके से कितनी पानी की मांग पूरी हो सकती है।’’ भंवर भाई और उनके दोस्तों को सबसे पहले 34 घरों वाले भीलों की बस्ती में 40 टांके बनाने की बात समझ में आई। यहां के लोगों की मदद से 40 टांके बनाये भी गए। फिर तो एक के बाद एक टांके बनाने वाले दर्जनों गांवों के नाम जुड़ते गए- पनावड़ा, कोल्हू, अकड़दरा, बायतु (भोपजी), शहर, पूनियो, कतरा, चिड़िया, केसुमला, भाटियान, कबरस, चैकल्दरा, खेतिया का तला, नगाना, छीतर के पार, जानवा.......
....... अगर आकड़ों के ऊंट पर सवार हुआ जाए तो 2000 से 2008 तक इलाके भर में कुल 1200 टांके बने। 2008 को संस्थान ने टांके बनाने के काम को नरेगा याने सरकारी स्तर पर जोड़ने की जन-वकालत छेड़ी और जीती। आज की तारीख तक नरेगा के जरिए जिले भर में ज्यादा नहीं तो कम-से-कम 50,000 टांके बनाए जा रहे हैं। कार्यकर्ताओं के मुताबिक नरेगा में टांके बनाने के काम सबसे पहले यही से शुरू हुए। यह कहते हैं आज बाड़मेर, जोधपुर और जेसलमेर जिलों सहित पश्चिमी राजस्थन भर में नरेगा का ज्यादातर पैसा टांके बनाने में ही खर्च हो रहा है।
यहां की जनता तो पानी इकट्ठा करने की तरकीब को ही टांका कहने लगी है। कनौड़ के मुरली चौधरी कहते हैं- ‘‘टांका धरती के भीतर बना ऐसा छोटा-सा टैंक है जो आपको ज्यादातर घरों के आंगन में दिखलाई देगा।’’ ‘‘यहां की धरती के लिहाज से गोलाकार टांके मुनासिब होते हैं’’: ऐसी बातें फतेहपुर से आए खियारामजी से पता पड़ी- ‘‘गोलाकार टांके में पानी का दबाव दीवार पर इस तरह से बन जाता है कि संतुलन बराबर रहता है। इससे दीवार ढ़हने का खतरा कम हो जाता है।’’ आमतौर से यहां 12 गुणा 12 वर्ग फीट वाले टांके दिखाई पड़ते हैं। इसमें 30 फीट का आगोर (केंचमेंट) रहता है। अकड़दरा की सीतामणी बताती हैं- ‘‘इसे (आगोर) पहले कच्चा बनाते हैं, फिर चिकनी माटी डालकर कूट-कूटकर सख्त और चिकना करते हैं। इससे बरसात का पानी जमीन के आजू-बाजू न फैलकर सीधा टांके में ही भरता है।’’ इस तरह की साइज और डिजाइन वाला टांका मानो यहां सफल माडल के तौर पर अपना लिया गया है। मनावड़ी के ठाकराराम कहते हैं- ‘‘सरकार ने जो माडल बनाए थे वो सफल नहीं रहे। एक तो स्थानीय हालातों के लिहाज से उनके साइज (20 गुणा 20 फीट) ठीक नहीं थे, दूसरा वो सार्वजनिक टांके थे सो दलितों को पानी के लेने में खासी परेशानी होती।’’
12 गुणा 12 वर्ग फीट वाले टांके बनाने के कुल खर्च को अकड़दरा के हनुमानजी पहले ही जोड़कर बैठे हैं- ‘‘यही कोई 30,000 से 40,000 रूपए। इसमें मटेरियल याने सीमेंट, क्रांकीट, पत्थर में 25,000 रूपए और बाकी का खर्चा मजदूरी में जोड़ लो।’’ यहां जमीन से पानी की फसल लेने का चलन है। क्योंकि पक्के छत वाले मकान कम ही हैं इसलिए छत से पानी उतारने के जतन न के बराबर दिखाई पड़ते हैं। रेतीली जमीन पर पानी नहीं ठहरने से यहां तालाब नहीं दिखते, कोई बड़ी नदी भी नहीं है, नहर आने की संभावना तो दूर-दूर तक नहीं है, इंदिरा सागर नहर की दूरी यहां से 250 किलोमीटर है। पनावड़ा के करणरामजी की सुने तो- ‘‘जिसमें बरसात का पानी आए वो नदी कहलाती है, जिसमें बारह महीने पानी रहे वो नहर।’’ उनके साथ बैठे कुंवरलाल चौधरी कहते हैं- ‘‘दुर्ग या किले में कुएं या बाबड़ियों को देखकर बाबड़ियां बनाने की योजनाएं भी बनी थीं। लेकिन यहां की गरीबी को देखकर संस्थान ने ऐसी योजनाओं को बहुत महंगा बताया। सार यह है कि यहां इसी तरीके के टांके बरसाती पानी को भरने के एकमात्र उपाय हैं।’’
बिन पानी सब....
‘बिन या कम पानी’ के बावजूद यहां ‘सब सूना’ नहीं है। यहां की आवो-हवाओं में ही पानी उगाने से लेकर उसे बचाने की फितरतें जो घुलीमिली हैं। कई मामूली बातें हैं, जैसे यहां के घरों में देखने को मिला कि गिलास को जुबान में लगाने की बजाय ऊपर से पानी पिया जाता है, इससे धोने में खर्च होने वाला पानी बचता है। इसी तरह यहां के लोग नहाते समय लोहे के बड़े कुण्ड में बैठते हैं। यह खारे पानी से नहाकर बचे हुए पानी से कुण्ड में ही कपड़ा धोते हैं। यहां डिचरजेण्ट की बजाय चिकनी माटी इस्तेमाल में लाते हैं। इससे मैल और माटी की परत जब कुण्ड के नीचे जमती है तो ऊपर का पानी ऊंट के पीने के काम आता है। यहां दिन या महीने की बजाय कुछ घण्टे ही बादल बरसने को बरसात मानते है। तब घण्टेभर में ही सालभर के लिए मीठे पानी बचाने की कोशिश रहती है। यहां के लोगों की माने तो बादल से पानी नहीं राहत बरसती है। ‘लोक कल्याण संस्थान’ के दफ्तर से जाते वक्त भंवर भाई, हनुमानजी, करणरामजी, भंवरी, ठाकरारामजी, रामलालजी, मुरलीजी जैसे दोस्तों ने कहा कि आबादी और पानी की बढ़ती जरूरत को देखते हुए टांके बनाने की प्रक्रिया लगातार चलती रहनी चाहिए।
जब रिपोर्ट लिखी जा रही थी तब धरती पूरी तरह से भीगी न थी, टांकों में सिर्फ 6 फीट पानी ही भरा था। यहां टांके में 6 फीट खाली होने का मतलब है साल के 6 महीनों का खाली होना। फिलहाल जितनी बरसात हो जाना चाहिए थी, उसकी आधी बूंदे भी नहीं बरसीं। इसलिए मानसून के बचे हिस्से से आखिरी आस अटकी है। अगर ऐसा न हुआ तो टांकों से पानी की फसल चौपट हो जाएगी, तब मांग पूरा करने का प्रतिशत 40 से गिरकर 20 तक पर लुढ़क जाएगा। अगर यह लुढ़का तो यहां की कई जिंदगियों को खारे पानी का इस्तेमाल 20 से 40 प्रतिशत तक बढ़ाना पड़ेगा।
बीच सफर में देश के 604 जिलों में से 177 जिलों में सूखे के हालात बन गए हैं, इससे देश में अर्थव्यवस्था की कमर टूट सकती है। मंदी की जो रफ़्तार ग्रामीण अर्थव्यवस्था की वजह से थोड़ी सुस्त है उसमें तेजी आ सकती है। सूखे के चलते 1 जून से अबतक रोजमर्रा की चीजो की खुदरा कीमतें 32 प्रतिशत तक ऊपर गई हैं। जो हालात बन रहे हैं उससे विकास दर 2 प्रतिशत कम होने के आसार हैं।

17.8.09

उद्रेश भैयाणी बाड़ी में लालबहादुरजी की सरकार

शिरीष खरे
इस कहानी के किसी चरित्र या घटना का किसी शहर, मोहल्ले, व्यक्ति या वस्तु से कोई सम्बन्ध पाया जाता है तो इसे मात्न संयोग नहीं माना जाए। क्योंकि जहां सरकार कमजोर होती है, वहां माफिया की सरकारे खड़ी हो ही जाती हैं। यूं तो गुजरात सरकार बहुत मजबूत कही जाती है लेकिन सूरत महापालिका के सामानान्तर, माफिया राज के कई पाकेट संस्करण बस्ती की जमीन को अपनी कहते हैं, और घरों में रहने का भाड़ा भी वसूलते हैं। जैसे कि उद्रेश भैयाणी बाड़ी में लालबहादुरजी का राज है। बस्ती के लोग टेक्स के बदले जब सरकार से बिजली, पानी और नाली की उम्मीद करते हैं तो सरकारी कार्यालयों में बैठे बड़े से बड़े बाबू भी एक मर्तबा लालबहादुरजी से पूछ लेने की नसीहत देते हैं।
सहारा दरवाजे के ऊपर, खुले पुल पर धड़धड़ाती रेल के नीचे से राज्य परिवहन डिपो की चौड़ी सड़क है। यही से धागों जैसी अनगिनत गलियां उलझी पड़ी हैं। बारिश है, इसलिए गली को नाली कह लीजिए, या नाली को गली। दोनों के वजूद ने खुल-मिलकर संड़ाध को अजीब बना डाला है। बस्ती की सघनता का जाल देखिए, हर चौथे कदम पर एक घर पड़ रहा है। कोई घर लकड़ी का, कोई माटी का तो कोई पक्का खड़ा है, कोई बांस, पन्नी, ईटों से मिल-जुलकर आड़ा पड़ा है। घुमावदार मोड़ों पर आवाजाही की आहटों से लोग, बकरियां, रेडियो, मुर्गियां, गाएं, साइकिले, मोटरसाइकिले आपस में टकराने से पहले बच लेते हैं। इस तरह गांधीनगर, विकासनगर, अम्बा बाड़ी से गुजरते हुए उद्रेश भैयाणी बाड़ी में श्री फरनी माता जी के मंदिर पहुंचते हैं, मंदिर में बनने का साल दर्ज है-1966। चबूतरे पर हैं इनायत खान, अज्जू मियां, राधा बेन, रामसुंदर वर्मा, मंगू वर्मा, भालेराम शर्मा और उनके बहुत सारे साथी।
‘‘अब यहां से लौटना, लखनऊ की भूल-भुलैया से कम नहीं होगा’’- ऐसा सुनते ही इनायात भाई बोले- ‘‘गलियों से सकरे तो यहां के घर हैं, यहां से तो फिर भी निकल जाइयेगा, बस्ती की पेचिदियों से नहीं निकल पाइयेगा।’’ पुरूषोतम महापात्र ने जोड़ा- ‘‘यह 100 साल पुरानी बस्ती है, इतना वक्त बीतने के बावजूद सरकारी चश्मे से यह नाजायज ही है। अगर यह जायज नहीं है तो टेक्स और बिजली के बिल वगैरह क्यों आते हैं ?’’ अज्जू मियां बोले- ‘‘वार्ड नंबर 18 में नल, नाली, पानी, बिजली जैसे सवालों पर सूरत महापालिका का एक ही जबाव है- ‘पहले लालबहादुरजी से तो पूछ लो।’ जब हम सूरत महापालिका को टेक्स देते हैं, फिर लालबहादुरजी से क्यों पूछे ?’’ लेकिन इस सवाल के आगे यह सवाल भी है कि प्राइवेट से छुटकारा दिलाने की बजाय सूरत महापालिका ऐसा कह क्यों रहा है ? ?
राकेश भाई बताते हैं- ‘‘100 साल पहले यहां की जमीन पर खेत हुआ करते थे। लेकिन महापालिका ने कागजों में सैकड़ों खेतीहरो के नामो की बजाय यहां के रखवाले का नाम ही चढ़ाया। लालबहादुरजी रखवाली करने वाले उसी परिवार की पीढ़ी से है। इन दिनों सत्ता में उनकी अच्छी पूछ-परख है, उनका दावा भी है कि यह उन्हीं की खानदानी जमीन है, इसलिए वह 40 सालों से जबरन भाड़ा लेते हैं। महीने के 50 रूपए के बदले 4-5 सालों से कोई रसीद भी नहीं देते हैं, ताकि किराएदार कहे जाने वालों के हाथों में रहने का सबूत न जाए।’’ लालबहादुरजी की अच्छी पूछ-परख को लेकर राधा बेन ने थोडा और जोड़ा- "....वो बस्ती में आने वाली सुविधाओं को सरकारी फाइलों में ही दफन कर देते हैं। इसके बाद जो-जो काम सरकार को करना चाहिए, वो-वो काम पैसे के बदले माफिया के लोग करते हैं।"
अगले दिन इनायत, पुरूषोतम, अज्जू, राकेश भाई और राधा बेन के सवालों के साथ सूरत महापालिका के दफ्तर में दाखिल हुआ। यहां आने का कोई खास फायदा नहीं निकला, लेकिन एक अहम जानकारी हाथ जरूर लगी कि राज्य सरकार ‘जमीन गणोत धारा, 1960’ को रद्द करके ‘गुजरात जमीन मेसूल कायदा’ लाने का मन बना चुकी है। ‘जमीन गणोत धारा, 1960’ में जो परिवार खेती करके जिस जमीन पर रहते आए हैं उन्हें जमीनों का हक दिया गया है। लेकिन ‘गुजरात जमीन मेसूल कायदा’ में कोई कितने साल से भी खेती करे या रहे, उससे वह जमीन सरकार कभी भी ले सकती है। याने खेती करने या रहने में समय के महत्व को ही महत्वहीन बना दिया जाएगा। अब तक हक और न्याय का आखिरी रास्ता कचहरी की तरफ जाता रहा है, आगे से इसे भी बंद करने की तैयारी कर ली गई है।
हालांकि बस्ती के वाशिंदे सुरेश भाई बोरसे को इसमें हेरत जैसी कोई बात नजर नहीं आती, उनके मुताबिक- ‘‘सूरत के झोपड़ों में रहने वालों को बगैर किसी कसूर के सजा सुनाई जा चुकी है। सूली पर लटकाने की तारीखें अलग-अलग हैं, हमारी तो तारीख भी घोषित नहीं हुई है।’’ सूरत महापालिका की जमीन से हटाने वालों को तो एक बार फिर भी पुर्नवास या मुआवजे की उम्मीद है लेकिन उद्रेश भैयाणी बाड़ी वालों के हिस्से में तो यह भी नहीं। ऐसे में यहां के लोगों की मांग इतनी भर ही है कि यहां की जमीन को सूरत महापालिका में मिला लो। फिर क्या करना है, बाद की बात है।
हीरा बेन जैसी औरतों की अपनी परेशानियां हैं, वह घर से बाहर आकर बोली- ‘‘देखिए एक भी स्ट्रीट लाईट नहीं है, और जिसे आप गली या नाली समझ बैठे हैं, वह तो खुली गटर है। 500 घरों पर 1 नल है, गांधीनगर के भी 4 में से 3 नल तो गटर में डूबे हैं। टायलेट के नाम पर कईयों के लिए सुलभ शौचालय ही एकमात्र सहारा है। पानी के लिए प्राइवेट टेंकर है, स्कूल के लिए भी प्राइवेट का ही आसरा है।’’
‘‘सूरत कारर्पोरेशन के चुनाव नजदीक है, चुनाव के वक्त आप ऐसे मुद्दे क्यों नहीं उठाते ?’’ इसके जबाव में मजहर खान ने जो सुनाया वो आज के चुनाव-ए-हाल की पोल खोलने के लिए काफी है- ‘‘वार्ड नंबर 18 में ज्यादातर मुस्लिम मत हैं इसलिए यहां के 30 प्रतिशत मतों को वार्ड नंबर 17 में डालकर मत-विभाजन कर दिया गया है। वार्ड नंबर 17 में तो हिन्दुओं की तादाद ज्यादा है ही, वार्ड नंबर 18 में भी हिन्दुओं की संख्या भारी पड़ जाती है।’’ इस तरह बटवारे का राजनैतिक हथकंडा अपनाते हुए मुस्लिम मतों के दबाव से छुटकारा पा लिया गया है। वैसे भी वार्ड नंबर 17 झोपड़पट्टी नहीं है, इसलिए वार्ड नंबर 18 में झोपड़पट्टी वाले मतों के दबाव से भी निजात पा लिया गया है। मजहर खान भारतीय चुनाव का दूसरा पेंच भी खोलते हैं- ‘‘उलमाड़ विधानसभा की मतसूची से मुस्लिम मत लगातार घट और हिन्दू मत लगातार बढ़ रहे हैं। रामपुरा में कम से कम 3,000 मुस्लिम मत कटे, सैय्यदपुरा और झापा बाजार जैसे इलाकों का भी यही हाल है। मैं खुद 2007 में विधानसभा (उत्तर) से उम्मीदवार था, लेकिन 2009 में लोकसभा की सूची से मेरा नाम ही हटा दिया गया।’’ सारांश यह है कि कोई एक पार्टी सालों तक सत्ता में यूं ही नहीं रहती।
निरंजन भाई महापात्र ने मंदिर की गोल-गोल गली में घूमाते हुए बताया- ‘‘इधर 10 गुणा 12 वर्ग फीट से बड़े घर मिलेंगे ही नहीं, 1 घर में 1 से ज्यादा परिवार हैं, 1 घर में कम से कम 7 लोग तो जोड़कर चलिए ही। इस तरह 500 घर में यही कोई 3000 लोग रहते हैं। आधे से ज्यादा तो यूपी से आए मुस्लिम हैं, कुछ मराठी, उड़िया और गुजराती हैं। सारे के सारे मजदूर हैं, कोई टेक्सटाइल मार्केट में है, कोई पावरलूम्स में, कोई ड्राइंग पेंटिंग में। कई लोग पुराना कपड़ा लाकर, उसे रिप्येर करके, बड़िया धोकर, प्रेस करके बेचते हैं।’’
लौटते वक़्त ओमप्रकाश बोरसे उलझी गलियों से सुलझते हुए चलते हैं, वह कहते हैं- ‘‘यहां रोजाना की हाजरी के हिसाब से मजदूरी मिलती है, एक दिन की मजदूरी 70 से 120 रूपए है, ज्यादा से ज्यादा 3,000 रूपए महीना भी जोड़ो तो गुजरात के सबसे मंहगे शहर में कम पड़ते है। सूरत में अनाज, तेल, सब्जी और दूसरी चीजें बाहर से आती हैं। इतने में ही दवा, पानी, घर-खर्च चलाना है। इतने में ही गांव भी पैसा भेजना है।’’ बातों ही बातों में हम सहारा दरवाजे के धड़धड़ाते पुल के नीचे आ गए। ‘‘आपको हर शाम के शाम मजदूरी मिलती होगी ?’’ ओमप्रकाश बोरसे कहते हैं- ‘‘मजदूरी मिलने की कोई तारीख पक्की नहीं, सेठ लोगों की भी राजनीति है, वो 2 महीनों का एडवांस रखते हैं, ताकि मजदूर को अच्छा काम मिले तो भी भाग न सके। सही समय पर पैसा नहीं मिलेगा तो लोग कर्ज लेंगे ही।’’ हमने पटरियों को पार कर लिया, अब ओमप्रकाश के साथ आए कई साथियों को पटरियों के उस तरफ ही लौटना होगा। जिनके सिर, पीठ और कंधों पर बोझ ही बोझ लटका दिख रहा है, दूर से देखने पर उनकी दुनिया छोटी-बड़ी (नाजायज-जायज) सरकारों के जाल में फसी लाचार मक्खी जैसी दिखती है। वक़्त का तकाजा यह है कि जो लोग सिर्फ अपनी घर-गृहस्थी ही चलाना चाहते हैं, उनके सामने घर-गृहस्थी को बचाने का सवाल खड़ा है।

15.8.09

भू-माफिया को हराने के बावजूद हार गये विठ्ठल भाई

शिरीष खरे
सहारा दरवाजे वाले छोर से गांधीनगर, विकासनगर, अम्बा बाड़ी, उद्रेश भैयाणी बाड़ी के बाद कुछ तंग गलियों का रास्ता पाटीचाल की तरफ भी खुलता है। आपको याद होगा कि पिछले किस्सा उद्रेश भैयाणी बाड़ी में लालबहादुरजी की सरकार के नाम रहा। आपको बता दे कि 25 साल पहले पाटीचाल में भी लालबहादुरजी का ही राज था। लेकिन यहां विठ्ठल भाई पाटिल ने उसके फैलते साम्राज्य के खिलाफ दीवानी अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
3 साल की जद्दोजहद के बाद यह जमीन सूरत महापालिका की बतलायी गई। आज की तारीख में यहां न कोई झोपड़े के बदले मकान बनाने से रोकता है, न रहने का भाड़ा वसूलता है, न ही बुनियादी सुविधाओं के सवाल पर कोई बाबू एक मर्तबा लालबहादुरजी से पूछ लेने की नसीहत देता है। लेकिन इन राहतों के बीच अब शीघ्रातिशीघ्र पाटीचाल को भी तोड़े जाने का फैसला हो चुका है। ऐसे में यहां के लोगों की आखिरी उम्मीद घर और जमीन के बदले राहत रुपी नाम पर आकर अटक गई है।
यूं तो 100-50 कदमों के फासले पर दो दुनिया मिलती हैं, लेकिन कुछ मायनों में एक-दूसरे से एकदम अलग-अलग, कुछ मायनों में बिल्कुल एक जैसी। विठ्ठल भाई पाटिल के 18 गुणा 20 वर्ग फीट वाले मकान के पहले कमरे में उनके साथ दशरथ भाई, भरत भाई और अल्फ्रेड भाई बैठे हैं। लंबी खामोशी को तोड़ते हुए विठ्ठल भाई बोले- ‘‘ऐसे 700 घरों को लालबहादुर के कब्जे से निकल लाए, लेकिन बाजू में जो मंगू भाई वाली गली है, वहां से अभी भी लालबहादुर का राज कायम है। अगर वहां के लोग भी कचहरी के रास्ते जाए तो वहां की दुनिया भी बदल जाए। झोपड़े तो उनके भी टूटने हैं लेकिन कम से कम राहत का आसरा तो रहेगा।’’ इसके बाद भरत भाई ने 3 अगस्त 2008 को अखबारों में छपी खबर का हवाला देते हुए पूछा- ‘‘सूरत महापालिका ने कहीं-कहीं ‘माडल बसाहट’ बनाने की बात कही थी, ‘पाटीचाल’ का नाम उनमें है या नहीं ?’’ विठ्ठल भाई अखबारों की उन कतरनों के अलावा सूचना के अधिकार से मिले कागजातों को लाकर बोले- ‘‘हमने एसएमसी के पास कुछ सवाल भेजे थे। उनसे पूछा था कि क्या आप वाकई माडल बसाहट बनाने वाले हैं, अगर हां तो उसमें पाटीचाल, गांधीनगर, विकासनगर, अंबा बाड़ी, उद्रेश भैयाणी बाड़ी और नवी बसाहट के नाम शामिल हैं ? एसएमसी का जबाव ‘न’ में आया। असल में सूरत की बाकी जमीनों के मुकाबले यहां की जमीन बहुत मंहगी हो चुकी है, इसलिए अब कई बिल्डरों की निगाह यहां जम चुकी है, इसलिए एसएमसी कार्यालय की विस्थापित सूची में यहां के झोपड़े भी दर्ज हो चुके हैं।’’
लेकिन ‘बिल्डरों की निगाह’ और ‘एसएमसी कार्यालय की विस्थापित सूची’ का आपस में क्या मेल-जोल है ? बहुत समय से झोपड़पट्टियों में ही काम कर रहे अल्फ्रेड भाई जबाव देते हैं- ‘‘भरी-पूरी बस्ती को शहर से बहुत दूर किसी बहुमंजिला इमारत में भेजने की कवायद चल रही है, इसके बाद खाली हुई जमीनों को कारर्पोरेट के हवाले कर दिया जाना है। सूरत महापालिका कई जगह कारर्पोरेट को आगे (घोषित एजेंडा) करके, कई जगह कारर्पोरेट को पीछे करके (अघोषित एजेंडा) बढ रही है।’’ शोध और सामाजिक गतिविधियों से जुड़े भरत भाई मानते हैं- ‘‘सूरत को 2009 के अंत तक 0 स्लम बनाने की कोई स्पष्ट योजना या रणनीति तो होनी चाहिए थी। किनका विस्थापन होना है, कब तक होना है, कुछ जाहिर नहीं है। पुनर्वास का पात्र कौन होगा, अगर होगा भी तो किन शर्तों पर और कहां भेजा जाएगा, अभी तक यही समझ नहीं आ रहा है। एसएमसी के पास तो हर सवाल का यही जबाव है कि ‘कोसाठ में 42 हजार घर बन रहे हैं।’ जबकि सूरत के झोपड़पट्टियों में रहने वालों की आबादी 6 लाख से ऊपर है।’’
बस्ती के रहवासी दशरथ भाई कहते हैं- ‘‘हर आदमी अच्छे मकान और उसमें बेहतरीन चीजों का सपना देखता है। यहां कोई चाहकर भी अच्छा मकान नहीं बनाएगा, न ही अपने मकान में सुंदर या सुविधाओं की चीजों को सजाना चाहेगा। कल क्या होना है, पता नहीं। फासी देने की तारीख भी पता होती है, लेकिन हमारे टूटने की कोई तारीख नहीं बतलाई गई है, ऐसे में रातों की नींद तो अभी से तोड़ी जा चुकी है।’’ उन्होंने विठ्ठल भाई को देखते हुए कहा- ‘‘बेकार ही गए आप!!’’ भू-माफिया का अंत करने के लिए कचहरी का दरवाजा घटघटाने वाले विठ्ठल भाई चुप हैं, ऐसे लोग अब कहां जाएंगे ?

10.8.09

ऐसे सूरत की कैसी सूरत?

शिरीष खरे, सूरत से लौटकर
थेम्स नदी से लगे लंदन वाली तस्वीर के हू-ब-हू सूरत को लंदन जैसा बनाने की कवायद जोर पकड़ चुकी है। इसलिए ताप्ती के किनारे से हजारों झापड़ियों को साफ किया जा रहा है। सरकार के मुताबिक इसके बाद सूरत आबाद हो जाएगा। क्या सचमुच सूरत आबाद हो पाएगा? सूरत में स्लम एरिया हटाने के लिए केन्द्र (यूपीए) और राज्य (बीजेपी) सरकारों ने मिलकर 2,157 करोड़ की रणनीति बना ली है। दोनों (यूपीए-भाजपा) इन दिनों एक साथ 1 लाख से ज्यादा झोपड़ियां तोड़ रहे हैं। सूरत महापालिका का काम जमीने खाली करवाना और बिल्डरों को सस्ते दामों में बेचना है।
हालांकि शहर में ‘रहने’ और ‘रोजी-रोटी’ के कई सवाल गहरा गए हैं, जबाव हैं कि मिलतें नहीं। मिलतें हैं तो उन टूटी बस्तियों के बेरहम किस्से, जो सूरत के नए नक्शे से गायब हैं। आपके सामने है कतारगाम इलाके से गायब एक ऐसी ही बस्ती का किस्सा, वैसे यह व्यवस्था के गायब होने का किस्सा भी है : चंद्रकांत भाई रोज की तरह काम पर गए थे, शाम को लौटे तो पूरी बस्ती ही लापता थी। फिर उन्होंने पता किया कि बाकी लोग शहर से बाहर कोसाठ नाम की जगह पर गए हैं। घरवालों से मिलने के लिए उन्हें रिक्शा करके फौरन कोसाठ जाना पड़ा।
15 जून 04’ का यह किस्सा अकेले चंद्रकांत भाई का नहीं है, तब सूरत के बीचो बीच कतारगाम बस्ती के 155 घर शहर की खूबसूरती की भेंट चढे़ थे। बाकी के 55 कच्चे घरों का टूटना भी पक्का है, बस तारीख फाईनल नहीं हुई है। यहां की 2 एकड़ जमीन पर कभी 2,50 घरों की 2,000 आबादी बसती थी। 90 साल पुरानी इस बस्ती की जमीन ने करोड़ों का भाव पार किया तो यहां के असली मालिकों को सस्ते घरों समेत उखाड़ फेंका गया। गायत्री बेन बताती हैं- ‘‘न सूचना दी, न सुनवाई की। वैसे भनक लग गई थी कि खूबसूरती के लिए तालाब फैलेगा, हमारी जगह पिकनिक स्पाट में बदलेगी, पार्किंग और गार्डन को जगह मिलेगी, सुबह-शाम टहलने वालों का ‘स्पेशल-रुट’ बनेगा, बिल्डरों की दुकाने खुलेगी, बस्ती की बजाय मार्केट होगा।...आप तो वहीं से आ रहे हैं, हमारी बातें सच साबित हुईं ना!’’
कोसाठ, जहां हम खड़े हैं, यह कतारगाम से उजड़े रहवासियों का अगला ठिकाना बना। यह कतारगाम से ‘12 किलोमीटर’ दूर, शहर के उत्तरी तरफ का ‘आऊटसाइड’ और नक्शे के हिसाब से ‘बाढ़ प्रभावित’ इलाका है। कौशिक भाई बताते हैं- ‘‘यहां बसाए जाने का विरोध सुनकर महापालिका का अफसर बड़े ठण्डे दिमाग से बोला कि तुम्हें बस्ती बनाने की बजाय ऊंची मंजिलों में रहना चाहिए। बारिश का पानी भरे भी तो दूसरी, नहीं तो तीसरी मंजिल में चढ़ जाना।’’ तारीखे गवाह हैं कि 2004 की बाढ़ से सूरत के 30,000 लोग प्रभावित हुए थे। तब इन्हें न मंजिल नसीब हुई, न जमीन। एक साल बाद महापालिका से जगह (12 गुणा 35 वर्ग फीट/2 लाख) के बदले जगह (माटी के दाम जैसी) तो मिली लेकिन घर के बदले घर नहीं। न ही तोड़े गए लाखों के घरों और हजारों की गृहस्थियों का मुआवजा। एक साथ इनसे बिजली, पानी, नालियां, टायलेट, रास्ते, मैदान, बाजार, आंगनबाड़ी, स्कूल, राशनकार्ड, वोटरलिस्ट के नाम ऐसे छूटे कि अभी तक नहीं लौटे। इनके बगैर भी काम चल जाता, जब काम की छूट गए तो जिंदगी कैसे चले ?
काम छूट गए
‘‘जमीन, घर, गृहस्थी का नुकसान तो सबने देखा। लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान तो बेकारी से हुआ।’’ ऐसा कहना है नरोत्तम महापात्र का, कोसाठ में उनकी तरह ही दर्जन भर औरत-मर्द अपने-अपने ठिकानों के बाहर बैठे हैं। बातों ही बातों में मालूम पड़ता है कि पहले इन्हें ‘कतारगाम इण्डस्ट्रियल एरिया’ के ‘पावरलूम्स’ में दिहाड़ी मजदूरी मिल जाती थी। एक दिन में 1,50 और महीने भर में 3,500 से 4,000 रूपए तो बनते ही थे। कुछ लोग मजदूरों की छोटी-छोटी जरूरतों जैसे चाय, नाश्ता या खाने-पीने के धंधों से जुड़े थे। औरते, घरेलू काम के लिए आसपास की सोसाइटियों में जातीं और महीने भर में 6,00 रूपए कमाती थीं। इस तरह हर घर का हाल-चाल बहुत अच्छा तो नहीं, फिर भी चल रहा था। यहां आकर तो इनकी दुनिया ठहर ही गई है।
अज्जू मियां बताते हैं- ‘‘कतारगाम आओ-जाओ तो 40 रूपए अकेले आटो के। इसके बाद मजदूरी न मिले तो आफत। तब कारखानों के आसपास थे, मजदूरी मिलती ही थी। अब आसपास के दूसरे लोगों को ही रख लेते हैं।’’ यही हाल औरतों का है, घरों में काम करने से जितना (6,00 रूपए) मिलेगा उससे दोगुना तो अब भाड़े (12,00 रूपए) में जाएगा। रक्षा बेन बोली- ‘‘मालकिनों से जरूरत की चीजे और उधार के पैसे तो मिलते थे। यहां तो ऊंचे ब्याज-दर पर पैसे उठाने पड़ते हैं।’’ महीना भर पहले ही हेमंत भाई की बीबी टीबी के चलते खत्म हुईं हैं, उन्होंने ईलाज के लिए 12 रूपए/महीने के हिसाब से 10,000 उठाए थे। एक तो आमदनी नहीं, ऊपर से कर्ज का बढ़ता बोझ। यहां हरके कम से कम 25,000 रूपए का कर्जदार तो बना ही रहता है। इनमें से ज्यादातर ने घर बनाने के लिए कर्ज लिया था, जिसका ब्याज अब तक नहीं छूट रहा है।
राजेश भाई रिक्शा चलाते हैं। उन्होंने अधूरे खड़े घरों का इतिहास बताने के लिए 4 साल पुरानी बात छेड़ी- ‘‘तब 29 दिनों तक तो ऐसे ही पड़े रहे। बीच में जोर की बारिश हुई तो सबने चंदा करके यहां एक टेंट लगवाया। कईयों ने अपने टूटे घरों की लकड़ी, पनी और बांस से अस्थायी घर बनाए, जो भारी बाढ़ में बह गए। मेरी 90 साल की नानी और एक पैर से कमजोर मौसी ने जो तकलीफ झेली उसे कैसे सुनाऊं, बीबी टीबी की मरीज थी, उसे बच्ची को लेकर मायके जाना पड़ा।’’ यहां की हालत देखकर तो लगता है कि कच्चे-पक्के आशियाने एक बार बनने के बाद खड़े नहीं रहते, हर साल की बाढ़ से टूटते, फूटते, गिरते या बहते ही हैं। इस तरह मानसून के साथ आशियाने बनाने और सामान खरीदने की जद्दोजहद जारी रहती है। इस साल भी भारी बूंदों के साथ तबाही के बादल बरसने लगे हैं।
एसएमसी का (स्व)राज
सूरत महापालिका (प्र)शासन तरीके को टीना बेन के किस्से से समझते हैं। 1992 को टीना बेन 14 साल की थी, तब उन्हें घर के सामने खड़ा करके एक स्लेट पर उनका नाम, एनके परिवार वालों का नाम लिखवाकर फोटो ले लिया गया। 2005 को याने ठीक 12 साल बाद जब वह दो बच्चों की मां बनी तो भी उन्हें 1992 की फोटो के हिसाब से घर का मुआवजा मिला। समय के इतने बड़े अंतराल में घर तो क्या बस्ती की पूरी दुनिया ही बदल जाती है, लेकिन नहीं बदलती है तो सूरत महापालिका की मानसिकता।
कतारगाम में किसी का घर 30 तो किसी का 60 फीट की जगह पर था, लेकिन कोसाठ में सभी को 12 गुणा 35 वर्ग फीट के फार्मूले से जगह बांटी गई। अब आप ही बताइए 12 गुणा 35 वर्ग फीट में कोई क्या बनाएगा, जो बनेगा उसे चाहे तो किचन कह लो, नहीं तो टायलेट, बाथरूम, बेडरूम, हाल या गेलरी, कुछ भी कह लो। ऐसी बस्तियों में लम्बे समय से काम करने वाले अल्फ्रेड भाई बताते हैं- ‘‘महापालिका जिन मकानों को तोड़ने की ठान लेती है उनसे टेक्स वसूलना बंद कर देती है। जिससे टेक्स नहीं लिया जाता वह डर जाता है, अगला नम्बर उसका भी हो सकता है! बुलडोजर आने से पहले पुलिस के पास बस्ती में कड़ा विरोध करने वालों की वाकायदा एक लिस्ट होती है। उन्हें डेमोलेशन से पहले ही धर दबोचा जाता है। कुल मिलाकर सूरत में तोड़-फोड़ की ज्यादातर कार्यवाहियों को तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण भरे माहौल में निपटा लिया जाता है।’’
लौटते वक्त नानदीप मिला। इतनी बड़ी बसाहट में अकेला यही लड़का पढ़ने जाता है, वह भी 2 किलोमीटर दूर के एक मंहगे प्राइवेट स्कूल में। 9 वीं में पढ़ने वाले नानदीप ने बताया- ‘‘जिन महीनों में स्कूल की फीस और टेम्पो का पैसा रहता है, उन्हीं महीनों में ही स्कूल जाता हूं। कतारगाम वाले स्कूल (महापालिका) में इतने हाई-फाई बच्चे नहीं थे। लेकिन यहां के बच्चों के साथ बैठने, पढ़ने में अच्छा नहीं लगता। क्लास 6 में वहां मेरी ‘बी’ ग्रेड थी, और यहां ‘सी’।’’ यह है एसएमसी और प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा और सभ्यता के बीच की खाई। नानदीप जैसे बच्चों से खाई भरने की उम्मीद पालना नाइंसाफी होगी।
काहे के कायदे, वायदे
डेमोलेशन की कानूनी लड़ाईयों में उलझने वाले भरत भाई से यह मालूम हुआ कि इस दौरान ‘यूनाईटेड नेशन’ की गाईडलाईन निभानी जरूरी थी। यहां डेमोलेशन के पहले और बाद में ‘मानव-अधिकारों’’ का खुला अपमान हुआ। जिन्हें उखाड़ना था, उनके साथ बैठकर पुनर्वास और राहत की बातें की जानी थी। गाईडलाईन कहती है कि विकलांग, बुजुर्ग और एसटी-एससी को उनके रोजगार के मुताबिक और पुराने झोपड़े के पास ही बसाया जाए। पीड़ित आदमी को पहले पुनर्वास वाली जगह दिखाई जाए, इसके बाद अगर वह मांग करता है तो उसे कोर्ट में जाने का हक भी है। इसके लिए कम से कम 90 दिनों का समय भी दिया जाए। लेकिन सूरत महापालिका ने तो एक भी कायदा नहीं निभाया।
मावजी भाई, 62 साल के दलित नेता है। कतारगाम बस्ती में डेमोलेशन (2004) के वक्त वहीं थे, पुलिस ने उन्हें भी खूब पीटा, दो दिनों तक जेल में भी रखा। मावजी भाई बताते हैं- ‘‘हमारे नामों को अभी तक वोटरलिस्ट में नहीं लाना, संयोग नहीं, एक साजिश है। महापालिका के चुनाव फिर आ गए, ऐसे में हर एक का राजनैतिक वजूद भी तोड़ा गया है।’’ डेमोलेशन के वक्त आप लोग कारर्पोरेटर (महापालिका का मेम्बर) के पास गए थे ?’ मेरे इस औपचारिक भरे सवाल पर ममता आपा अपनी हंसी नहीं रोक सकीं, वह बोलीं- ‘‘गए थे, वह बोला कि बहुत तेज बुखार आया है, उठने में महीना भर तो लगेगा। 5 साल होने को हैं, न उसका बुखार उतरा, न ही कोई विधायक, मंत्री, सांसद इस तरफ आया।
जैसा कि सब जानते हैं महात्मा गांधी को ‘कालेपन’ की वजह से एक रात साऊथ-अफ्रीका में चलती ट्रेन से फेंका गया था। उन्हीं महात्मा को अपना बताने वाले गुजरात के सूरत में हजारों भारतीयों को ‘झोपड़पट्टी-वाला’ होने की वजह से 25 किलोमीटर दूर फेंका गया है। 120 साल पहले हुए अन्याय का किस्सा इतिहास नहीं वर्तमान है, जो भविष्य में भी बार-बार दोहराया जाएगा। हां यह और बात हैं कि कल कतारगाम जैसी बस्तियों का उल्लेख खोजने से भी नहीं मिलेगा। लेकिन शायद कातरगाम के निवासी नहीं जानते हैं कि सूरत चमकाने के लिए कोई न कोई कीमत अदा करता ही है. यहां, इस शहर में यह कीमत उनसे वसूली जा रही है.

30.7.09

मुंबई मेट्रो क्या करेगा ?

शिरीष खरे, मुंबई से
“हमारे शहर रहने लायक होने चाहिए, जहाँ आम आदमी गुज़र-बसर कर सके." ये शब्द प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के थे.
21 जून 2006 को मुंबई मेट्रो रेल का शिलान्यास करते हुए जब मनमोहन सिंह ने ये बातें कही थीं तो लगा था कि मुंबई में मेट्रो रेल सच में मुंबई की नई जीवन-रेखा होगी. लेकिन यह सिक्के का एक पहलू था. आज तीन साल बाद भी इसका दूसरा पहलू सवाल बन कर खड़ा है कि आखिर मेट्रो से किन ताकतों का कैसा हित जुड़ा है ? इस मेट्रो रेल से तरक्की के मुकाबले कितनी तबाही होगी ? आखिर मेट्रो से शहर की यातायात व्यवस्था किस हद तक बेहतर होगी ? और ये भी कि मुंबई मेट्रो क्या करेगा ?
सवाल यूं ही नहीं हैं. हर सवाल के साथ कई तरह की आशंकाएं और उलझनें जुड़ी हुई हैं और इन सब से बढ़ कर भ्रष्टाचार के नमूने, जिसने मेट्रो रेलवे को संदिग्ध बना दिया है.
प्रोजेक्ट के नोटिफिकेशन को ही देखें तो इसमें डेवेलपर्स को यह छूट दी गई है कि वह “कंस्ट्रक्शन खत्म होने के बाद बची हुई जमीनों को अपने मुनाफे के लिए बेच ” सकते हैं. इसके अलावा उन्हें “सेंट्रल लाइन के दोनो तरफ आरक्षित 50 मीटर जमीनों को दोबारा विकसित” करने की भी छूट मिलेगी. इससे कारर्पोरेट ताकतों को शहर की “सबसे कीमती जमीनों को हथियाने और यहां से व्यापारिक गतिविधियां चलाने” की छूट खुद-ब-खुद मिल जाएगी.
पैसा-पैसा और पैसा
मुंबई मेट्रो पूरी तरह से सरकारी प्रोजेक्ट नहीं है. इसमें प्राइवेट कंपनी सबसे ज्यादा निवेश करेगी. जाहिर है सबसे ज्यादा मुनाफा भी कंपनी ही कमाएगी, न कि सरकार. दूसरा, नोटिफिकेशन के हिसाब से शहर का खास भू-भाग कंपनी की पकड़ में आ जाएगा. यहां से उसे अपना कारोबारी एजेण्डा पूरा करने में सहूलियत होगी. याने मेट्रो से मुनाफा भी कमाओ, मेट्रो से निकलने वाली जमीन से कारोबार भी फैलाओ. इसे कहते है एक तीर से दो शिकार!!
इन दिनों कई कंपनियां रियल इस्टेट, आईटी और रेल के विकास के नाम पर शहर की जमीनों को हथियाना चाहती हैं. हाल ही में बदनाम हुई 'सत्यम' और उसकी सहयोगी कंपनी 'मेटास' ने हैदराबाद के आसपास की हजारों एकड़ जमीन हथिया ली थी.
‘मेटास’ तो 1,200 करोड़ रूपए की हैदराबाद मेट्रो रेल में भी शामिल थी. लेकिन ‘सत्यम’ में 7,800 करोड़ रूपए के घोटाले के बाद ‘मेटास’ को जांच एजेंसियों के हवाले कर दिया गया. ‘मेटास’ के आऊट होने के बाद अनिल अंबानी की ‘रिलायंस- इंफ्रास्ट्रक्चर' अब हैदराबाद मेट्रो में भी बोली लगाने को बेताब है. वैसे भी ‘रिलायंस- इंफ्रास्ट्रक्चर' मुंबई के साथ-साथ दिल्ली मेट्रो का काम तो कर ही रही है.
अगर दाल में कुछ भी काला नहीं है तो सरकार मेट्रो से जुड़े अहम तथ्यों से पर्दा हटाए। लेकिन धरातल पर ऐसा करना शायद सरकार के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है. यही कारण है कि “सूचना के अधिकार” के तहत कुछ सामान्य-सी सूचनाएं मांगने पर उसने तुरूप का इक्का फेंका- “इस किस्म की सूचनाएं साझा करने से राष्ट्र को खतरा हो सकता है.”
कगार की आग
पिछले महीने 11 मई को शहर की झोपड़ियों से हजारों लोग निकले और यशवंत राव चौहान सेंटर पहुंचे. यहां ‘शहरी विकास विभाग’ ने मेट्रो फेस-2 के लिए दो दिनों की जनसुनवाई रखी थी. लोगों की भारी संख्या को देखकर बड़े अधिकारी चौंक खड़े हुए. न केवल संख्या बल्कि लोगों के कई सवालों ने भी उन्हें घेर लिया. जनसुनवाई में 19 बातों का पालन करना होता है, लेकिन प्रशासन ने चुप्पी साधी, फिर थोड़ी-सी जगह निकाली और निकल भागा.
इसी तरह नवंबर, 2008 में भी प्रदेश सरकार ने प्रोजेक्ट से जुड़ी आपत्तियां मांगी थीं. इसके बाद उसे आपत्तियों से भरे 15,000 पत्र मिले. 8,000 लोग मेट्रो के विरोध में सड़क पर उतरे. तब भी सरकार ने लोगों के विरोध को नजरअंदाज कर दिया था. ऐसे में शहर के बीचों बीच विरोध का एक नारा सुनाई देने लगा- “मेट्रो रेल क्या करेगा, सबका सत्यानाश करेगा !!”
आंकड़ों की मानें तो मेट्रो से 15,000 से ज्यादा परिवार उजड़ेंगे. इससे लाखों लोग बेकार हो जाएंगे. अकेले ‘कार सेड डिपो’ बनाने में ही 140 एकड़ से भी ज्यादा जमीन जाएगी. इससे जनता कालोनी, संजय नगर, एकता नगर, आजाद कम्पाउण्ड, गांधी नगर, केडी कम्पाउण्ड और लालजीपाड़ा जैसी बस्तियों के नाम नए नक्शे से मिट जाएंगे. तब यहां के हर मोड़ से गुजरने वाले सुस्त कदम रस्ते और तेज कदम राहें हमेशा के लिए रुक जाएंगे.
आज इन इलाकों से हजारों हाथों को काम मिलता है. कल इन हाथों के थम जाने से रोजगार का संकट गहरा जाएगा. कई रहवासी तो 40-45 साल से यही रहते आ रहे हैं. इन्होंने रोजमर्रा के मामूली धंधों से एक बड़ा बाजार तैयार किया है. उत्पादन के नजरिए से देखा जाए तो धारावी के मुकाबले यहां का बाजार काफी बड़ा है. इस बाजार से 10,000 लोगों की घर-गृहस्थियां आबाद हैं. यह इलाका कई सुंदर आभूषण और सजावटी चीजों को बनाने के लिए मशहूर है. यहां से कई चीजों को दुनिया भर में भेजा जाता है. इन चीजों को बनाने और भेजने में 15,000 महिलाएं शामिल हैं.
इस इलाके में बड़ी संख्या में लोग बेकरी और फुटकर सामान बेचने से भी जुड़े हैं. कुल मिलाकर शहर का यह हिस्सा सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों का मजबूत ताना-बाना है. अगर यह टूटा तो रहने और जीने के कई तार टूट जाएंगे. शहर की रफ्तार बढ़ाने वाले बहुत सारे पंख बिखर जाएंगे.
‘कार सेड डिपो’ बनने से पोईसर नदी भी अपना वजूद खो देगी. साथ ही इससे लगा नेशनल पार्क प्रभावित होगा. अभी तक “पर्यावरण पर होने वाले असर का मूल्यांकन ” भी नहीं हो सका है. ‘पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986’ के तहत ऐसा होना जरूरी है. यह कब होगा, तारीख कोई नहीं जानता.
ऐसी है योजना
मुंबई में मेट्रो रेल का पहला चरण 62.68 किलोमीटर का है जिसमें वरसोवा-अंधेरी-घाटकोपर, कोलाबा-बांद्रा-चारकोप और भांडुप-कुर्ला-मानखुर्द को जोड़ा जाएगा. इसके लिए 2011 की समय सीमा तय की गई है. दूसरे चरण को 2011-2016 के बीच खत्म करने का लक्ष्य रख कर 19.5 किलोमीटर तक मेट्रो की रेलवे पटरियों और अन्य सुविधाओं का विस्तार किया जाएगा. तीसरे चरण में 40 किलोमीटर तक निर्माण लक्ष्य रखा गया है, जिसे 2016 से 2021 के बीच पूरा करना है.
शहर का ट्रांसपोर्ट सिस्टम
कुछ ऐसी रिपोर्ट जारी हुई हैं, जो ट्रांसपोर्ट के नजरिए से मेट्रो को ठीक नहीं मानतीं. आईआईटी, दिल्ली के ट्रांसपोर्ट जानकारों ने एक अध्ययन में पाया कि मुंबई में 47 प्रतिशत रहवासी या तो पैदल चलते हैं, या साइकिल से.
इसी तरह 11 प्रतिशत रहवासी कार या मोटर साइकिल चलाते हैं. इसके बाद बस और रिक्शा से चलने वाले लोगों का प्रतिशत घटा दें तो ट्रेन से चलने वाले कुल 21 प्रतिशत ही बचते हैं. लेकिन ट्रांसपोर्ट के बजट का आधे से ज्यादा हिस्सा मेट्रो के लिए खर्च किया जा रहा है. जहां तक लंबी दूरी की बात है तो मेट्रो बेहद मंहगा प्रोजेक्ट हैं. इसमें घनी आबादी वाली बस्तियों के विस्थापन से होने वाले नुकसान को भी जोड़ दिया जाए तो पूरा प्रोजेक्ट बेहद खर्चीला हो जाता है.
ट्रांसपोर्ट के जानकार सुधीर बदानी के मुताबिक-“ मुंबई में ट्रेन के पुराने सिस्टम को दुरूस्त बनाने और बस-ट्रांसपोर्ट को विकसित करने से राहत मिलेगी. जहां मेट्रो के पूरे प्रोजेक्ट में 65,000 करोड़ रूपए खर्च होंगे, वहीं 2,00 किलोमीटर बस-ट्रांसपोर्ट तैयार करने में सिर्फ 3,000 करोड़. इसलिए बस का रास्ता सस्ता, बेहतर और व्यवहारिक है. यह पर्यावरण और रहवासियों के अनुकूल भी है.”
स्लमडाग मिलेनियेर को ‘गोल्डन ग्लोब’ और ‘आस्कर’ आवार्ड मिलने के बाद मुंबई को तीसरी दुनिया के सबसे दिलचस्प शहरों में से एक कहा जा रहा है. यहां एक तरफ ‘अंधेरी’ की उमंग में डूबी रातें हैं तो दूसरी तरफ 'धारावी' जैसा कस्बाई इलाका है. एक तरफ बेहतरीन रेस्टोरेंट, बार और नाइट-क्लब हैं तो दूसरी तरफ खुली झोपड़ियां, कच्ची-पक्की गलियां और टूटी-फूटी नालियां हैं.
इतनी विविधता वाले शहर की योजनाएं जितनी ज्यादा असंतुलित होगी, नुकसान भी उसी अनुपात में होगा. मुंबई मेट्रो में एक हिस्से को फायदा पहुंचाने के लिए दूसरे हिस्से से कीमत वसूली जाएगी. इस मेट्रो से कुछ लोगों के लिए सफर आसान हो जाएगा लेकिन यह कोई नहीं कहना चाहता कि इसी मेट्रो के कारण हज़ारों परिवार की घर-गृहस्थी की गाड़ी रुक जाएगी.

9.7.09

आम आदमी के बजट से बच्चे गायब

क्राई के मुताबिक 40 करोड़ बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा को अनदेखा किया गया।

मुंबई: 10 जुलाई, 2009। ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ ने केन्द्रीय-बजट 2009-10 को बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिहाज से असंतोषजनक बताया है। उसके मुताबिक आम आदमी के लिए खास बताए जाने वाले इस बजट में बच्चों की तीन बातों को दरकिनार किया गया है :

 हर साल स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या को देखते हुए स्कूली शिक्षा पर उम्मीद से बेहद कम खर्च हुआ है।

 प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम को ध्यान में रखते हुए अलग से पैसा नहीं रखा गया है। इस तरह बच्चों के लिए भोजन की सुरक्षा की गारंटी को अनसुना किया गया है।

 लंबे समय से आईसीडीएस को ‘सर्वभौमिक’ याने सभी जगह लागू करना का वादा, वादा बनकर ही रह गया है। आईसीडीएस के लिए जो 6,705 करोड़ रूपए बढ़ाये भी गए हैं वह उसके स्वरूप के मुकाबले कम है।
देखा जाए तो बच्चों पर खर्च के लिए कुल 5,100 करोड़ रूपए बढ़ाये गए हैं। यह बढ़ोत्तरी, हर साल बच्चों की बढ़ती संख्या के हिसाब से कम है। जहां स्कूली शिक्षा पर होने वाले खर्च को पिछली साल की तरह ही रखा गया है, वहीं स्वास्थ्य और भोजन की सुरक्षा पर होने वाले खर्च को भी बढा़या नहीं गया है। जैसे कि केन्द्रीय बजट में ‘सर्व शिक्षा अभियान’ के लिए 13,100 करोड़ रूपए और मिड-डे-मिल के लिए 8,000 करोड़ रूपए रखे गए हैं।
जैसे कि अमेरिका, इंग्लैण्ड और फ्रांस में कुल बजट का 6-7 प्रतिशत हिस्सा सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है। लेकिन भारत में कुल बजट का सिर्फ 3 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा पर और सिर्फ 1 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है। वैसे तो हम दुनिया के बड़े देशों की अर्थव्यवस्थाओं से मुकाबले की बातें करते हैं, लेकिन देश के 70 प्रतिशत गरीबों को नजरअंदाज करके आर्थिक दर बढ़ाने की बातों का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।’’ बातचीत के दौरान उन्होंने यह भी बताया कि- ‘‘एक तरफ प्रगति पर बढ़ते भारत को दर्शाया जा रहा है, दूसरी तरफ 1999-2000 से शिक्षा और स्वास्थ्य में होने वाले खर्च पर लगातार कटौती हो रही है, जो कि देश की विरोधाभाषी स्थिति को बयान करती है।’’

‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ के नजरिए से भारत जैसे देश में ‘सकल घरेलू उत्पाद’ याने जीडीपी का कम-से-कम 10 प्रतिशत हिस्सा स्कूली शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च किया जाना जरूरी है। सार्वजनिक खर्च के रुप में बुनियादी हकों पर सार्वजनिक खर्चो में कटौतियां करना कोई अच्छी नीति नही है, यह अर्थव्यवस्था के लिए भी नुकसानदायक है। शिक्षित और स्वास्थ्य भारत के बिना एक मजबूत अर्थव्यवस्था का सपना देखना बेकार है।

दीपांकर मजूमदार के मुताबिक- ‘‘यूपीए जिस बजट को जनता के अनुकूल बता रहा है, उसमें ‘राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी’ से जुड़े कई बड़े सवालों को उपेक्षित रखा गया है। इसी तरह देश की कुल आबादी में से बच्चों की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत है, लेकिन केन्द्र सरकार ने अपने बजट का सिर्फ 5.09 प्रतिशत ही बच्चों पर खर्च किया है। जो उनकी संख्या और जरूरतों के लिहाज से प्र्याप्त नहीं है।’’

अगर यह आम आदमी का बजट है तो आम आदमी की जरूरतों के हिसाब से उसे खर्च का हिस्सा क्यों नहीं मिला ? ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ यह भी कहता है कि :

 ‘नियंत्रक व महालेख परीक्षक’ याने सीएजी के मुताबिक सरकार ने 2009 के पहले तक ‘सर्व शिक्षा अभियान’ में होने वाले खर्च को सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया। अगर खर्च को सही तरीके से इस्तेमाल किया जाता तो सरकार के कुछ वादे और नारे पूरे हो जाते।

 सिर्फ नई आंगनबाड़ियां खोलना काफी नहीं है। पिछले कई सालों से आंगनबाड़ियों के बेहतर संचालन के लिए न तो कोई कारगर व्यवस्था बनी और न ही प्रशिक्षित कर्मचारियों पर ध्यान दिया गया है। यहां तक कि विकसित कहे जाने वाले राज्यों जैसे गुजरात और महाराष्ट्र में भी जिन आंगनबाड़ियों को मंजूरी मिली है वह ठीक तरह से काम नहीं कर पा रही हैं।

सूरत जाकर देखें, 50,000 बच्चे काम पर है....

शिरीष खरे, सूरत से लौटकर

सूरत। यह सच है, लेकिन अधूरा कि देश की टेक्स्टाइल इंडस्ट्री में सूरत ‘रीढ़ की हड्डी’ है। यह सच इस तथ्य के साथ पूरा होगा कि देश के अलग-अलग कोनों से आये ‘बाल-मज़दूरों की बदौलत’ टेक्स्टाइल इंडस्ट्री में सूरत ‘रीढ़ की हड्डी’ है। इसमें गुजरात के ही एक-चौथाई से ज्यादा बाल-मज़दूर काम करते हैं। सरकारी आंकडों के हिसाब से सूरत में 5,000 बाल-मजदूर हैं, जबकि गैर-सरकारी आंकडों को देखे तो यह संख्या 50,000 से भी ऊपर है। इसमें 15 से 18 साल के 68 प्रतिशत बाल-मजदूर हैं। ‘राष्ट्रीय बाल-अधिकार संरक्षण आयोग’ भी यह मानता है कि गुजरात के सूरत, भावनगर और बनासकंथा जिलों में बाल मज़दूरी के मामले सबसे ज्यादा उजागर हुए हैं। इन जिलों के कुल मजदूरों में से 28.51 प्रतिशत बच्चे हैं। इसे देखते हुए 2010 तक गुजरात को बाल-मजदूरी से मुक्त करने का ‘राज्य-सरकारी संकल्प’ एक ‘मजाक’ नहीं तो और क्या है ?

सूरत के साउथ-ईस्ट जोन से बिजली की मशीनों वाली ‘खट-खट’ भरी आवाजे यूं ही नहीं आती हैं। 2001 की जनगणना के आकड़े बताते हैं कि यहां 4 लाख 50 हजार से ज्यादा पावरलूम हैं। 1951 के जमाने की रिपोर्ट में यह संख्या सिर्फ 2 हजार 2 सौ 82 ही थी। 1970 की रिपोर्ट में भी 19 हजार 25 की संख्या कोई खास नजर नहीं आती। लेकिन 1980 से 90 के बीच ऐसा क्या हुआ कि पावरलूम की संख्या 2 लाख के ऊपर पहुंच गयी और बीते एक दशक में तो यह संख्या दोगुनी से भी ज्यादा!! असल में बात यह है कि 70 के दशक से 1998 आते-आते यहां की 5 बड़ी टेक्स्टाइल मिलों में ‘एक के बाद एक’ ताला लगता गया, उनकी जगह पावरलूम की कई छोटी-छोटी इकाईयों ने ले ली। बड़ी-बड़ी मिलों के मजदूर-यूनियन एक तो मजबूत और संगठित होते थे, दूसरा उन्हें मोबीलाइजेशन में भी कोई परेशानी नहीं थी। लेकिन बड़ी मिलों में ताला लगने के हादसों ने मजदूरों की ऐसी कमर तोड़ी कि वह अपने-अपने यूनियनों के साथ दोबारा खड़े नहीं हो सके। वैसे तो सूरत में आज भी 1,60 यूनियन हैं, लेकिन कहने भर को। गली-गली में बिखरी पावरलूम फेक्ट्रियों के लगने से मजदूर एकता भी बिखर गई, उनसे उनके कानूनी हक और सुविधाएं छीन लिए गए, दिन-ब-दिन मजदूरों के शोषण में भी इजाफा हुआ। मालिकों ने मुनाफे के चक्कर में सस्ते और अकुशल मजदूरों के रूप में बच्चों की बड़ी तादाद को काम पर लगवाया। वह मजबूत यूनियनों की गैर मौजूदगी का फायदा उठाते हुए बाल-मजदूरी को लगातार पनाह देते गए। इन दिनों पावरलूम फेक्ट्रियों के मालिक पतले-पतले हजारों हाथों की मदद से 5 करोड़/रोज का टर्नओवर करते हैं, वह हर रोज 35 हजार से 1 लाख तक साड़िया बनवाते हैं। यह है एक खुशहाल उद्योग की खुशहाल कहानी, जो बदहाल बाल-मजदूरों की बदहाल तस्वीरों के बगैर पूरी नहीं होगी।
सूरत की टेक्स्टाइल इण्डस्ट्री के बाल-मजदूर 3 सेक्टर में बंटे हुए हैं। पहला, पावरलूम फेक्ट्री जहां कच्चा कपड़ा बनाया जाता है। यह कतारगाम, लिम्बायत, पाण्डेयसराय, उदना, फालसाबाड़ी, मफतनगर के आसपास के इलाके में ज्यादा हैं। पावरलूम फेक्ट्री के बच्चे मशीन में तेल डालने के अलावा मशीन ओपरेटर के हेल्पर बनते हैं। दूसरा सेक्टर है डाईंग फेक्ट्री। यहां कच्चे कपड़े को कलर किया जाता है। इसे खतरनाक इण्डस्ट्री इसलिए कहते है, क्योंकि इसमें नुकसानदायक केमीकल होते हैं, स्टीम के इस्तेमाल की वजह से आग लगने का डर रहता है और इसी से सूरत की ताप्ती नदी मटमैली हुई है। ताप्ती के किनारे-किनारे और पाण्डेयसराय के एक बड़े इलाके में 5,00 से ज्यादा डाईंग फेक्ट्री लगी हैं। डाईंग फेक्ट्री के बच्चे कपड़ा रंगने के बाद पक्के कहे जाने वाले कपड़े के भारी बण्डलों को उठाते हैं। डाईंग फेक्ट्री में किसी नए आदमी को घुसने नहीं दिया जाता। तीसरा सेक्टर है टेक्स्टाइल मार्केट। सूरत में टेक्स्टाइल मार्केट की 60 हजार से भी ज्यादा दुकाने हैं। यहां से देश-विदेश में कपड़ा बेचा जाता है। टेक्स्टाइल की ज्यादातर दुकाने बाम्बे मार्केट और न्यू बाम्बे मार्केट में हैं। इस मार्केट के बच्चे साड़ियों की कटिंग, धागों की बुनावट, पेकिंग, बोझा उठाना, उसे दो मंजिल ऊपर तक लाने-ले जाने के काम में लगे रहते हैं।
31 प्रतिशत बच्चे अकेले टेक्स्टाइल मार्केट में हैं, क्योंकि यहां उसे रोजाना 50 से 80 रूपए तक मिलते हैं जो पावरलूम फेक्ट्री के 20 से 25 रूपए से कहीं ज्यादा हैं। टेक्स्टाइल मार्केट में महीने के पूरे 30 दिन काम मिलता हैं और शिफ्ट बदलने की झंझट भी नहीं। दूसरी तरफ पावरलूम फेक्ट्री में कुशलता वाले मजदूर ही चाहिए, ऐसे में सस्ते हेल्पर बनकर रह जाने का डर हैं। टेक्स्टाइल मार्केट वाली पट्टी सूरत के रिंग-रोड़ के साथ-साथ बढ़ती चलती है, इधर काम करने वाले बच्चे 2 से 5 किलोमीटर दूर के इलाकों जैसे लिम्बायत, मीठी खाड़ी, संगम टेकरी, मफत-नगर और अंबेडकर-नगर से आते हैं। ऐसे बच्चे 2-3 किलोमीटर तक तो पैदल चलते हैं लेकिन 5 किलोमीटर के लिए रिक्शा शेयर करते हैं। ये बच्चे यहां सुबह 9 से रात को 10 तक काम करते हैं। टेक्स्टाइल मार्केट में राजस्थानी मारवाड़ियों का दबदबा है जो राजस्थान के गरीब परिवारों से कान्ट्रेक्ट करके उनके बच्चों को यहां ले आते हैं। ऐसे बच्चे बस्ती में नहीं, दुकान के आसपास ही ठिकाना बनाकर रहते हैं। इसलिए उन्हें काम के घण्टों का कोई अता-पता नहीं रहता।
टेक्सटाइल मार्केट के कामों से कई बच्चियां भी जुड़ी हुई हैं। उन्हें एक साड़ी में स्टोन लगाने और धागा काटने के बदले सिर्फ 50 पैसे मिलते हैं। अगर 4-5 बच्चियां मिलकर पूरा दिन भी काम करें तो भी हरेक के हिस्से में 10-12 रूपए ही आते हैं। इस किस्म के काम में ज्यादातर हरपति जनजाति की लड़कियां लगी हुई हैं।
कतारगाम की कई पावरलूम फेक्ट्रियों में देखा गया कि वहां बुनियादी सहूलियतों जैसे टायलेट, पानी की टंकी, वेंटीलेशन और पंखे नहीं हैं। फेक्ट्री में दाखिल होते ही चारों तरफ हल्का अंधियारा और फर्श पर तेल की मोटी परते दिखाई देती हैं। फेक्ट्री के बाहर कुछ मजदूरों से बातचीत में मालूम हुआ कि यहां जरूरत से ज्यादा काम और कम पैसे को लेकर चुप्पी साध ली जाती है। कई फेक्ट्रियों के मालिक रजिस्ट्रेशन नहीं करवाते, इससे उन्हे टेक्स से बचने का मौका तो मिलता ही है, मजदूरों को सुविधाएं देने से भी बच जाते हैं। रजिस्ट्रेशन न होने से फेक्ट्रियों की सही संख्या और काम करने वाले कुल मजदूरों का पता तक नहीं चलता। मजदूरों को न पहचान-पत्र मिलता है, न पीएफ, न ईएसआई। यहां तक कि किसी मजदूर की दुघर्टना होने पर उसे मुआवजा देने का सवाल भी नहीं उठता। यहां एक मजदूर पुरानी मशीनों से काम तो चलाता ही है, वह 4 से 6 मशीनों पर एक साथ काम भी करता है। यहां ज्यादातर मजदूरों की मांग है कि कपड़े के हर मीटर पर 1.25 रूपए मिले जबकि उन्हें हर मीटर पर मिलता है 1 रूपए। उन्हें मासिक वेतन की बजाय पीस रेट के हिसाब से मेहनताना दिया जाता है। यह बड़े मजदूरों का हाल है, बच्चों की हालत तो बदत्तर है।
लिम्बायत और मीठी खाड़ी के कई घरों में उत्तर-प्रदेश और बिहार के मुस्लिम बच्चे साड़ी पर जरी का काम करते हैं। ये बच्चे मुंबई के गोवण्डी से यहां लाये गए हैं। उधर लेवर कमीश्नर का जब दबाव बढ़ जाता है तो ऐसे बच्चों को इधर भेज दिया जाता है। जरी के काम में कई छोटे-छोटे बच्चे, खासकर बच्चियों को 1 खटिया के इर्द-गिर्द बैठाते हैं। 1 हाल में 10-15 बच्चे या बच्चियों के लिए ज्यादा से ज्यादा 4-5 खटियां लगाते हैं। यहां काम करने वाले सारे बच्चे 25 रूपए में 8 से 10 घण्टे तक एक ही जगह बैठे, आंखे गड़ाए और हाथ चलाते नजर आते हैं। यह काम घर पर ही होता है इसलिए बगैर सांस लिए रात और दिन चलता रहता है।
सूरत टेक्स्टाइल इण्डस्ट्री को कभी रीढ़ की हड्डी’ तो कभी ‘लम्बी मीनार’ की तरह देखा जाता है। हमेशा ऊपर देखने वालों को ध्यान उस नींव की तरफ नहीं जाता जिसमें अब तक असंख्य ‘नन्हे भविष्य’ दफन हो चुके हैं। यही वजह है कि यहां टेक्स्टाइल इण्डस्ट्री से जुड़े हर आकड़े का हिसाब-किताब और उसका पूरा ब्यौरा तो मिलता है, नहीं मिलता है तो बच्चों को प्यार भरे सपने देखने, चांद छूने जैसी ख्वाहिशे पालने, चार किताबे पढ़ने और हम जैसे बनने से रोके जाने का आकड़ा।

2.7.09

सरकारी स्कूलों की वकालत जरूरी है

'चाईल्ड राईट्स एण्ड यू’ में ‘विकास सहयोग’ विभाग के महाप्रबंधक कुमार नीलेन्दु से शिरीष खरे की बातचीत।

इस बार भी बोर्ड के नतीजे सबके सामने हैं। इस बार भी प्राइवेट स्कूलों के बच्चे आगे रहे। फिर भी ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ जैसी संस्थाए सरकारी स्कूलों की वकालत करती हैं। क्यों ?
प्राइवेट स्कूलों के लिए बोर्ड के नतीजे बढ़िया रहे क्योंकि वहाँ बच्चों को एडमिशन देने के पहले चुना जाता है। अब कठिन परीक्षाओं को पास करके आने वाले बच्चे तो बढ़िया नतीजे ही देंगे। फिर प्राइवेट स्कूल में अमीर बच्चों को ही लिया जाता है। उनके माँ-बाप को जरूरी लगा तो ट्यूशन भी लगवा लेते हैं। अगर इन सारी चीजों को हटा लिया जाए तो प्राइवेट स्कूलों के नतीजे भी दूसरे स्कूलों जैसे रहेंगे। एक बात यह भी है कि स्कूल की गुणवत्ता का मतलब महंगी बिल्डिंग, अंगेजी माध्यम और पढ़ाई के लिए काम आने वाली चीजों से लगाया जाता है। लेकिन बहुत कम सरकारी स्कूलों में ऐसी व्यवस्थाएँ मौजूद हैं। इसलिए प्राइवेट स्कूलों से मुकाबले की बातों का कोई मतलब नही।
सरकारी शिक्षक सही ढ़ंग से अपनी डयूटी निभा पाते तो नजीते इतने बुरे नहीं आते।
उनके हिस्से में बच्चों को पढ़ाने के अलावा भी बहुत-सी ‘नेशनल डयूटी’ हैं। प्राइवेट के शिक्षक चुनाव, जनगणना, पशुओं की गणना या ऐसे ही दूसरे कामों से बचे रहते हैं। यह कहने में कैसी झिझक कि एक सरकारी शिक्षक के ऊपर काम का बोझ बढ़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि स्कूल की पढ़ाई के दिनों में सरकारी शिक्षकों को चुनाव की डयूटी में न लगाया जाए। लेकिन अभी भी उन्हें लगाया जाता है। बुरे नतीजों के पीछे सरकारी शिक्षक और बच्चों के बीच का असंतुलित अनुपात भी जिम्मेदार है। आप सरकारी स्कूलों में बच्चों की भारी संख्या को देखिए, उसके मुकाबले आपको शिक्षकों की संख्या कुछ भी नहीं लगेगी।
एक ऐसा परिवार जो अपने बच्चों की मंहगी पढ़ाई का बोझ उठा सकता है, उसके सामने ‘सबकी शिक्षा एक समान’ जैसी बातों का क्या मतलब ? उसे तो ऐसी बातें स्कूल चुनने की आजादी को रोकने जैसी लगेगी ?
यही सवाल थोड़ा यूं भी तो देखिए कि अमीर को स्कूल चुनने की आजादी है, गरीब को नहीं। आजादी का अर्थ तो गरीब से गरीब को शिक्षा पाने का हक देता है। एक गरीब का बच्चा अपनी गरीबी की वजह से बराबरी और बेहतर शिक्षा से बेदखल क्यों रहे ? खासतौर पर प्राइमरी स्कूल से। अब तो प्राइमरी तक की पढ़ाई को मौलिक हक के रुप में अपना लिया गया है। फिर भी देश के 100 में से 60 बच्चे प्राइमरी स्कूल नहीं जाते। सीधी बात है, शिक्षा में असमानताएँ हैं। एक तरफ शिक्षा में असमानताएँ हैं, दूसरी तरफ निजीकरण की रफ़्तार के साथ सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक दूरियां बढ़ रही हैं। ऐसे में अलग-अलग तबको के बच्चों के हितों को देखना होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो प्राइवेट सेक्टर का कारोबार तो फलेगा-फूलेगा लेकिन सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक असमानताएँ दिन-ब-दिन बढ़ती जाएगी।
जब सभी बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे तो उनके बीच की असमानताओं के चलते दिक्कते नहीं आएँगी ?
यह बात लोकतंत्र के नजरिए से फिट नहीं बैठती। अब तो दुनिया भर की किताबों में समाज और स्कूल की विविधताओं को न केवल स्वीकार किया जा रहा है, उनका सम्मान भी किया जा रहा है। कई देशों जैसे अमेरिका या इंग्लैण्ड में अलग-अलग तबको से आने वाले बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। वहाँ अलग-अलग योग्यता रखने वाले बच्चे एक साथ बैठते-उठते हैं, सभी बराबरी के साथ बेहतर मौके तलाशते हैं। वहाँ की शिक्षा पब्लिक के हाथों में है। वहाँ के स्कूलों से ऊंच-नीच की सारी असमानताओं को हटा दिया गया है। वहाँ के स्कूलों में प्रवेश के पहले चुना जाना जरूरी नहीं है।
...और भारत में ?
यहाँ प्राइवेट स्कूलों पर ज्यादा भरोसा किया जाता है। इससे प्राइवेट सेक्टर से जुड़े लोगों को मनमाने तरीके से मुनाफा कमाने का मौका मिलता है। दूसरी तरफ कहने को सरकार की कई योजनाएँ हैं। लेकिन सबके अर्थ अलग-अलग हैं। जैसे कुछ योजनाएँ शिक्षा के लिए तो कुछ महज साक्षरता को बढ़ाने के लिए चल रही हैं। इसकी जगह सरकार को एक ऐसे स्कूल की योजना बनानी चाहिए जो सारे अंतरों का लिहाज किए बगैर सारे बच्चों के लिए खुली हो।
इसी तरह सरकारी स्कूलों में भी तो असमानताएँ हैं ?
बिल्कुल, जैसे केन्द्रीय कर्मचारियों के बच्चों के लिए केन्द्रीय स्कूल, सैनिकों के बच्चों के लिए सैनिक स्कूल, मेरिट लिस्ट के बच्चों के लिए नवोदय स्कूल। बात साफ है कि सभी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ताएँ अलग-अलग हैं। इसी तरह शिक्षक को चुने जाने के लिए भी अलग-अलग स्कूलों में योग्यता के अलग-अलग पैमाने रखे गए हैं।
लेकिन समाज की असमानता का क्या किया जाए ?
समाज में जो भेदभाव है, वही तो स्कूल की चारदीवारी में हैं। इसलिए समाज से स्कूल में घुसने वाले उन कारणों को तलाशना होगा जो ऊंच-नीच की भावना बढ़ाते हैं। अगर समाज में समानता लानी ही है तो सबसे अच्छा तो यही रहेगा कि इसकी शुरूआत शिक्षा और बच्चों से ही की जाए।
सबके लिए एक समान स्कूल की बात इतनी सीधी है ?
जब पानी से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य तक की चीजों को बाजार में घसीटा जा रहा हो तो यह बात बेतुकी लग सकती है। लेकिन शिक्षा की जर्जर हालत को देखते हुए तो यह बात बड़े तुक की लगती है। कोठारी आयोग (1964-66) ऐसा पहला आयोग था जिसने सामाजिक बदलावों के लिए बहुत अच्छे सुझाव दिए। उसने देश भर के लिए एक ऐसी व्यवस्था बनाने की बात कही जिसमें हर तबके के बच्चे एक साथ पढ़े-बढ़े। उसने यह भी कहा था कि सबके लिए एक समान शिक्षा नहीं रही तो समाज के ताकतवर लोग सरकारी स्कूलों को छोड देंगे और प्राइवेट की शरण में जाएँगे। इसके बाद हम देखते हैं कि 1970 के बाद से सरकारी स्कूलों की हालात बद से बदत्तर होतक चले गए। सरकार का ध्यान इस तरफ कभी नहीं गया ? वह 1968, 1986 और 1992 की शिक्षा नीतियों में समान स्कूल व्यवस्था की बात तो करती है लेकिन उसे लागू नहीं करती। 2001 में संसद ने शिक्षा का मौलिक हक तो दिया लेकिन देश में शिक्षा की दोहरी नीति को भी जारी रखा।
विकलांग बच्चों के एडमिशन को लेकर प्राइवेट स्कूल कानून से बंधे नहीं होते। जबकि पीडब्ल्यूडी एक्ट के तहत सरकारी स्कूलों में ऐसे बच्चों को लेना जरूरी है। यह भी तो शिक्षा की दोहरी नीति ही है।
हाँ, वैसे इस किस्म के सभी बच्चों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समावेशी शिक्षा आंदोलन चल रहा है। यह शिक्षा या स्कूलों में फैली छोटी-बड़ी गड़बड़ियों को ढ़ूढ़ने और उनसे निजात पाने का शुरूआती कदम है। दूसरा, यह आंदोलन हमारे आसपास की ऐसी कई विविधताओं का पता लगा रहा है जो असमानताएँ फैलाती है। यहाँ समावेशी शिक्षा का मतलब केवल विकलांग बच्चों की शिक्षा से ही नहीं है। इसका मतलब तो सभी किस्म की विविधताओं को सभी पहलुओं से देखने, समझने और उसे शामिल करना भी है।

30.6.09

हरीबत्ती के इंतजार में



शिरीष खरे
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मुंबई के फुटपाथों पर न जाने कितनी बार लालबत्ती हरीबत्ती में बदलती है और हरीबत्ती लालबत्ती में. पर इनके नीचे खड़ी लाखों औरतों को आज भी अपनी जिंदगी में एक हरीबत्ती का इंतजार हैं


‘मुझ जैसी कईयों को अपना शरीर बार-बार बेचना पड़ता है.’ एक औरत की मुंह से पहली बार ऐसा सुन कोई भी झिझक सकता है. सपना ने बेझिझक आगे कहा, ‘पेट की खातिर करना पड़ता है. इज्जत के मारे घर बैठ सकती हूं लेकिन...’ उसके बाद वह चुपचाप एक गली में गई और ओझल हो गई.
देश के कोने-कोने से हजारों मजदूर सपनों के शहर मुंबई आते हैं. इनमें से अधिकतर असंगठित क्षेत्र से हैं. यह शहर के उठने का वक्त है. मुंबई सेंट्रल से बोरीबली आने वाली लोकल के ठहरने के बीच का यह वक्त हजारों लोगों के दौड़ने का भी वक्त है. ठीक इसी वक्त नाकों पर मजदूर औरतें भी खासी संख्या में दिखाई देती हैं. इनमें से कइयों को काम नहीं मिलता और इसलिए कइयों को ‘सपना’ बन जाना पड़ता है. तो क्या पलायन के रास्ते ये बेकारी से होते हुए सीधे देह-व्यापार को जा रही हैं?

मुंबई के उत्तरी तरफ, बोरावली में संजय गांधी नेशनल पार्क के पास दिहाड़ी मजदूरों की एक बस्ती है. यहां पीने के पानी के बाद अब रोजीरोटी के लिए दिन कि शुरुआत एक लंबी लाइन के साथ शुरु हो चुकी है. बुनियादी योजनाओं यहां से होकर नहीं गुजरतीं. इन्होंने अपने हाथों से कई आकाश चूमती इमारतें बनायी हैं. खास तौर से नवी मुंबई को बनाने में कम अवधि के ठेकों पर अंगूठे लगाए हैं. इन्होंने ही कई गिरती इमारतों को दुबारा खड़ा भी किया है. यहां आमतौर पर औरत को 120 और मर्द को 180 रूपये दिन के हिसाब से मजदूरी मिलती है. ठेकेदार और मजदूरों के आपसी रिश्तों से भी मजदूरी तय होती है. एक मजदूर का 3,500 रूपये महीने से कम में गुजारा नहीं होता. मतलब एक दिन के लिए सौ रूपये चाहिए ही चाहिए. इतनी आमदनी पाने के लिए परिवार की औरत भी मजदूरी को जाती है. उसे महीने में कम से कम पंद्रह दिन काम चाहिए. मगर उसे हर दिन काम मिले ही तो यह जरुरी नहीं. कुल मिलाकर, एक औरत के लिए 1,800 रुपए महीना कमाना भी मुश्किल हो जाता है.

यह मलाड नाके का दृश्य है. सड़क किनारे और मेडिकल स्टोर के ठीक सामने मजदूरों के दर्जनों समूह हैं. यहां औरत-मर्द एक-दूसरे के आजू-बाजू बैठे बतियाते हैं. यह काम पाने की सूचनाओं का अहम अड्डा है. यहां सुबह ग्यारह बजे तक भीड़ रहती है. और उसके बाद जिन्हें काम मिलता है वे काम पर जाते हैं और जिन्हें काम नहीं मिलता वे घर लौट आते हैं. पर सेवंती खाली नहीं लौट सकती. इसलिए उसकी सुबह देर रात में बदल जाती है. और उसे नाके से लगी गलियों में पहुंचकर देह के ग्राहक ढूंढने पड़ते हैं.

रविवार होने के बावजूद उसे तीन घंटे से कोई ग्राहक नहीं मिला. इस व्यापार में दलाल कुल कमाई का बड़ा हिस्सा निगल जाता है इसलिए सेवंती दलाल की मदद नहीं लेना चाहती. सेवंती जैसी दूसरी औरतों को भी ग्राहक के एक इशारे का इंतजार है. इनकी उम्र चौदह से पैंतीस है. यह अस्सी से 150 रुपये में सौदा पक्का कर सकती हैं. अगले 24 घंटों में चार ग्राहक भी मिल गये तो बहुत हैं. ये अपने ग्राहकों से दोहरे अर्थो वाली भाषा में बात करती हैं. ऐसा शायद पुलिस और रहवासियों से बचने के लिए कर रही हैं. ये अपने असली नाम भी नहीं बतातीं. जाहिर है इन्हें यहां सुरक्षा का एहसास नहीं है. शारारिक और मानसिक यातनाओं का डर सता रहा है. यहां से किसी को गर्भवती तो किसी को गंभीर बीमारी के शिकार बनने का डर भी सता रहा है.

देह कारोबार से जुड़ी तारा बताती है कि इस कारोबार में सौ में सत्तर 30 साल से कम की है. इसमें से भी पच्चीस बामुश्किल अठारह की हैं. इनदिनों कम उम्र की लड़कियों की संख्या बढ़ रही है. पैंतीस तक आते-आते औरत की आमदनी कम होने लगती है. एक औरत अपने को बीस साल से ज्यादा नहीं बेच पाती. आधे से अधिक औरतें पैसों की कमी के चलते इन गलियों में आती हैं. पीछे खड़ी कुसुम कहती है कि मुझे तो बच्चे और घर-बार भी संभालना होता है. यहां अधिकतर की अंतहीन कहानियां हैं. मसलन, माधुरी का पिता उसे मजदूरी के लिए भेजता है लेकिन वह मजदूरी के साथ अपने शरीर से भी पैसे कमा लाती है. गिरिजा अपने भाई की बेकारी के दिनों का बरकत है. सुब्बा ने पति के एक्सीडेंट के बाद गृहस्थी का बोझ संभाल लिया है. जोया ने छोटी बहिन की शादी के लिए थोड़ा-थोड़ा पैसा बचाना शुरू कर दिया है. पर अब उसकी बहन पढ़ाई के लिए मुंबई आना चाहती है. जोया अपनी सच्चाई छिपाना चाहती है. उसे अपनी इज्जत के तार-तार होने का आशंका है. नगमा पैंतालीस पार हो चुकी है और अब उसकी चौदह साल की बेटी बड़की कमाती है. बड़की बाल यौन-शोषण का जीता जागता रूप है.

और यहां कदम-कदम पर ‘बड़कियां’ खड़ी हैं. ये चोरी-छिपे इस कारोबार में लगी हैं लिहाजा कुल लड़कियों का असली आकड़ा कोई नहीं जानता. कोई बंगाल से है तो कोई नेपाल से तो कोई महाराष्ट्र से. पर इनके दुख-दुविधाओं में अधिक अंतर नहीं दिखता. इन्होंने अपनी चिंताओं को मेकअप की गहरी परतों से ढंक लिया है. मोनी ने बताया कि इस पेशे से हमारा शरीर जुड़ता है, मन नहीं. हम पैसों के लिए अलग-अलग मर्दों को अपना शरीर बेचते हैं लेकिन कई मर्द ऐसे भी हैं जो जिस्मफरोशी के लिए बार-बार ठिकाने बदलते हैं. अगर हमें गलत समझा जाता है तो उन्हें क्यों नही? मोनी का सवाल देह कारोबार के उन अनछुएं पहलुओं पर शिनाख्त करने की मांग करता है जिन्हें समाज की तरह सरकार ने भी अनदेखा किया हुआ है और जब तब ये उठते भी हैं तो इन्हें नैतिकता, अपराध या स्वास्थ्य के दायरों से बांध दिया जाता है. इस क्षेत्र से जुड़े एक वर्ग का मानना है कि यौनकर्मी बनने की बहुत सारी बातें पारिवारिक हिंसा, दुत्कार, अपराध, बलात्कार और खरीद-फरोख्त से भी जुड़ी होती हैं. मगर बाजार की फितरत के चलते यहां भी शोषण के लिए अधिकतर उन्हीं लड़कियों को चुन लिया जाता है जो पिछड़े और गरीब तबके से आती हैं. उनकी मजबूरियों के विरूद्ध उनके सारे सपने बहुत सस्ते और थोक में जो बिक जाते हैं. जाहिर है देह कारोबार का ताल्लुक गरीबी-बेकारी-पलायन जैसी कडि़यों से है. मगर इन कडि़यों के आपसी गठजोड़ की ओर ध्यान नहीं जाता.

भारत में देह कारोबार की रोकथाम के लिए ‘भारतीय दंडविधान, 1860’ से लेकर ‘वेश्यावृत्ति उन्मूलन विधेयक, 1956’ बनाये गये. फिलहाल कानून के फेरबदल पर भी विचार चल रहा है. मगर इस स्थिति की जड़ें तो समाज की भीतरी परतों में छिपी हैं. मुंबई से सांसद प्रिय दत्त के मुताबिक, 'इनकी जिंदगी में फेरबदल तो गरीबी, बेकारी या पलायन में से किसी एक समस्या को हल करने से होगा. इस व्यापार से जुड़ी औरतें दो वक्त की रोटी के लिए लड़ रही हैं. इसलिए ऐसी नीतियां हों जिनमें इन औरतों के जीवन-स्तर को उठाने की बजाय इन्हें जीने के सही मौके दिये जाने को वरीयता दी जाए.'
देखा जाए तो सरकार ने पलायन रोकने के लिए मनरेगा चलाई है जिसके तहत देश के दो सौ जिलों में साल में सौ दिनों के लिए 'हर हाथ को काम और पूरा दाम' का प्रावधान है. मगर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने खुलासा किया है कि यह योजना फ्लॉप साबित हुई है. वहीं 365 दिनों के काम की तलाश में मजदूरों का मुंबई जैसे महानगरों की तरफ पलायन जारी है. दूरदर्शन के कार्यक्रम के बीच ‘रुकावट के लिए खेद’ जैसा संदेश चर्चा का विषय रहा है. मुंबई जैसी महानगरी में कमाठीपुरा जैसी गलियों के भीतर बढ़ते देह के सौदागरों को देखते हुए क्या 'हर हाथ को काम और पूरा दाम' के आगे भी यही संदेश नहीं चिपका देना चाहिए?

पलायन की रफ्तार के बराबर मुंबई का देह कारोबार भी तेजी से फल-फूल रहा है. बात चाहे आजादी के पहले की हो या बाद की. यह किस्सा चाहे कलकत्ता का हो या मुंबई का. मुंबई में सड़क चाहे ग्रांट रोड की हो या मीरा रोड की. चौराहे पर मूर्ति चाहे अंबेडकर की लगी हो या गांधी की. यहां आपको रूकमणी (हिन्दू) भी मिलेगी और रूहाना (मुसलमान) भी. मगर जिन्हें अपने धर्म, क्षेत्र, जुबान या जाति पर नाज है, वे कहीं नहीं दिखते. यहां के लालबत्ती पर रुकी औरतों की जिंदगी बदलाव चाहती है. तस्करी के तारों से जुड़ने के पहले इन्हें एक हरीबत्ती का इंतजार है.
स्टोरी में देह-व्यापार के लिए मजबूर औरतों की पहचान छिपाने के लिए उनके नाम बदल दिये गए हैं.

21.6.09

देश के 7 करोड़ 20 लाख बच्चे कहां हैं ?

शिरीष खरे
2001 की जनगणना के आकड़ों के जोड़-घटाने से यह सवाल उभरा है। पहले आकड़े के मुताबिक 8 करोड़ 50 लाख बच्चे स्कूल नहीं जाते। दूसरे आकड़े में 5 से 14 साल के 1 करोड़ 30 लाख बच्चे मजदूर हैं। अगर 8 करोड़ 50 लाख में से 1 करोड़ 30 लाख घटा दो तो 7 करोड़ 20 लाख बचते हैं। यह उन बच्चों की संख्या है जो न छात्र हैं, न ही मजदूर। तो फिर यह क्या हैं, कहां हैं और कैसे हैं- इसका हिसाब भी किसी किताब या रिकार्ड में नहीं मिलता।
इस 7 करोड़ 20 लाख के आकड़े में 14 से 18 साल तक के बच्चे नहीं जोड़े गए हैं। अगर इन्हें भी जोड़ दो तो देश के बच्चों की हालत बेहद दुबली नजर आएगी। देखा जाए तो भारत में बच्चों की उम्र को लेकर अलग-अलग परिभाषाएं हैं। संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में बच्चों की उम्र 0 से 18 साल रखी गई है। भारत में बच्चों के उम्र की सीमा 14 साल ही है। लेकिन अलग-अलग अधिनियमों के मुताबिक बच्चों की उम्र बदलती जाती है। जैसे किशोर-न्याय अधिनियम, 2000 में 18 साल, बाल-श्रम अधिनियम, 1886 में 14 साल, बाल-विवाह अधिनियम में लड़के के लिए 21 साल और लड़की के लिए 18 साल की उम्र तय की गई है। खदानों में काम करने की उम्र 15 और वोट देने की उम्र 18 साल है। इसी तरह शिक्षा के अधिकार बिल, 2008 में बच्चों की उम्र 6 से 14 साल रखी गई है। इससे 6 से कम और 14 से अधिक उम्र वालों के लिए शिक्षा का बुनियादी हक नहीं मिल सकेगा।
इस तथ्य को 2001 की जनगणना के उस आकड़े से जोड़कर देखना चाहिए जिसमें 5 साल से कम उम्र के 6 लाख बच्चे घरेलू कामकाज में उलझे हुए हैं। कानून के ऐसे भेदभाव से अशिक्षा और बाल मजदूरी की समस्याएं उलझती जाती हैं। सरकारी नीति और योजनाओं में भी बच्चों की उम्र को लेकर उदासीनता दिखाई देती है। 14 साल तक के बच्चे ‘युवा-कल्याण’ मंत्रालय के अधीन रहते हैं। लेकिन 14 से 18 साल वाले बच्चे की सुरक्षा और विकास के सवाल पर चुप्पी साध ली जाती है। किशोर बच्चों की हालत भी बहुत खराब है। 2001 की जनगणना में किशोर बच्चों की संख्या 22 करोड़ 50 लाख है। यह कुल जनसंख्या का 22 प्रतिशत हिस्सा है। इसमें भी 53 प्रतिशत लड़के और 47 प्रतिशत लड़कियां हैं। यह सिर्फ संख्या का अंतर नहीं है, असमानता और लैंगिक-भेदभाव का भी अंतर है।
2001 की जनगणना में 0 से 5 साल की उम्र वालों का लिंग-अनुपात 1000:879 है। जबकि 15 से 19 साल वालों में यह 1000:858 है। जिस उम्र में लिंग-अनुपात सबसे खराब है उसके लिए अलग से कोई रणनीति बननी थी। लेकिन उम्र की जरूरत और समस्याओं को अनदेखा किया जा रहा है। बात साफ है कि बच्चियां जैसे-जैसे किशोरियां बन रही हैं, उनकी हालत बद से बदतर हो रही है। देखा जाए तो बालिका शिशु बाल-विभाग, महिला व बाल-विकास के अधीन आता है। लेकिन एक किशोरी न तो बच्ची है न ही औरत। इसलिए उसके लिए कोई विभाग या मंत्रालय जिम्मेदार नहीं होता। इसलिए देश की किशोरियों को सबसे ज्यादा उपेक्षा सहनी पड़ती है।
एक किशोरी की पहचान न उभर पाने के पीछे उसकी कमजोरी नहीं बल्कि समाज में मौजूद धारणाएं हैं। लड़की के जन्म के बाद ही उसे बहिन, पत्नी और मां के दायरों से बांध दिया जाता हैं। उसे शुरूआत से ही ‘समझौते’ की शिक्षा दी जाने लगती है। किशोरियों को घरेलू काम, कम उम्र में शादी और मां बनने की जिम्मेदारियां निभानी होती हैं। इसलिए 6 से 14 साल के सभी बच्चों को निशुल्क शिक्षा दी जाने के बावजूद 51 प्रतिशत लड़कियां आठवीं तक पढ़ाई छोड़ देती हैं। ‘लड़की है तो उसे ऐसा ही होना चाहिए’- इस तरह की बातें उसके जीने, सुरक्षा, विकास और भागीदारिता की राह में बाधा पैदा करती हैं। इस उपेक्षित समूह को उनकी मनमर्जी से जीने की आजादी का इंतजार है। इससे उनके जीवन में स्थायी बदलाव आ सकेगा। फिलहाल ऐसे लक्षण दूर-दूर तक दिखाई नहीं देते।
उपेक्षित समूहों के साथ होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए दोहरे मापदण्डों से बचना होगा। इसके लिए शिक्षा के अधिकार बिल, 2008 में बच्चों की परिभाषा 0 से 18 साल तक की जाए। हरेक बच्चे के लिए निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का हक मिले। सरकार को बच्चों के स्वास्थ्य की जवाबदारी भी लेनी होगी। इसके लिए वह बच्चों की शिक्षा पर जीडीपी का 10 प्रतिशत और स्वास्थ्य पर 7 प्रतिशत खर्च करे। संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के मुताबिक बाल अधिकारों का दायरा बढ़ाया जाए। बाल-मजदूरी अधिनियम, 1986 को संशोधित करते हुए बच्चों को खतरनाक और गैर-खतरनाक कामों से रोकना होगा। योजनाएं बनाते समय बच्चों की उम्र, लिंग और वर्ग का ध्यान भी रखा जाए। राष्ट्रीय नीति के बुनियादी सिद्धांत में बराबरी की गांरटी हो। बच्चों और महिलाओं के लिए अलग से बनाये गए मंत्रालयों के पास काम की स्पष्ट रुपरेखा हो।

12.6.09

बाल मजदूरी की मजबूरी

शिरीष खरे 12 जून बाल-मजदूरी के खिलाफ विश्व दिवस के तौर पर जाना जाता है। भारत में बाल-मजदूरी पर प्रतिबंध लगे 23 साल गुजर गए। इसके बावजूद सबसे ज्यादा बाल-मजदूर भारत में ही हैं। एक अनुमान के मुताबिक देशभर में 1 करोड़ 70 लाख बाल-मजदूर हैं। इसमें से 80 प्रतिशत खेतों और कारखानों में काम करते हैं। बाकी खदानों, चाय बगानों, दुकानों और घरेलू कामों में हैं। इसमें से सबसे ज्यादा बच्चे शिक्षा से दूर और खतरनाक स्थितियों में काम करते हैं। देश के 1 करोड़ 70 लाख बाल-मजदूरों में से सिर्फ 15 प्रतिशत को ही मजदूरी से मुक्ति मिल पायी है। कई तरह के कानून और योजनाओं के बाद भी स्थिति नहीं बदलती, आखिर क्यों ?
ऐसा इसलिए क्योंकि कानून बाल-मजबूरी के पीछे की मजबूरियों को नहीं जानता। हर जनगणना में देश के हर हिस्से से बाल-मजदूरों की बड़ी संख्या सामने आ जाती है। इसे हम गरीबी में होने बढ़ोतरी के साथ जोड़कर देख सकते हैं। जिस देश में उन बेसहारा परिवारों की संख्या बढ़ रही हो जिन्हें जीने के लिए रोजाना संघर्ष करना पड़ रहा है, उस देश में बाल-मजदूरों की संख्या कम होना बहुत मुश्किल है। सरकार को बाल-मजदूरी के असली कारणों को जानने के लिए गरीबी की जड़ों में जाना होगा।
बच्चों के अधिकारों को लेकर काम करने वाली संस्था ‘चाईल्ड राईटस् एण्ड यू के निदेशक दीपांकर मजूमदार ने कहा- ‘‘सरकार के उस निर्णय से कुछ उम्मीद बंधी है जिसमें उसने घरेलू क्षेत्रों में भी बाल-मजदूरी पर रोक लगा दी है। लेकिन जो हालत हैं उसकी तुलना में तमाम सरकारी कार्यवाहियां सीमित नजर आती हैं। बाल-मजदूरी को जड़ से मिटाना संभव है बशर्ते सरकार उसके असली कारणों को जानने के लिए गरीबी की जड़ों तक जाए।’’
चाईल्ड राईटस् एण्ड यू’ ने सरकार से यह मांग की है कि वह हर बच्चे को काम की बजाय स्कूल भेजने के लिए मंत्रालय और विभागों पर दबाव बनाए। वह ऐसा माहौल तैयार किया जाए जिससे सभी बच्चों को मुफ्त और बेहतर शिक्षा मिल सके। सभी कानूनों में बचपन की उम्र की सीमा 18 साल तक कर दी जाए। बाल मजदूरी से लड़ने के लिए हर परिवार को कम से कम रोजगार, भोजन और स्वास्थ्य का बुनियादी हक हासिल हो। ऐसे परिवारों को जायज मजदूरी, उचित मूल्य पर रोजमर्रा की जरूरी वस्तुएं और आसानी से ऋण भी मुहैया करायें जाए। साथ ही बाल-मजदूरी से जुड़े सभी कानून और सामाजिक-कल्याण की योजनाएं कारगर ढ़ंग से लागू हो।

3.6.09

आतंक के बादल बरसने से पहले

शिरीष खरे
मुंबई में मानसून के बादल दस्तक दे चुके हैं लेकिन नेताजी-नगर के लोग नए आशियानों की खोज में घूम रहे हैं। 29 मई की सुबह, ईस्टर्न एक्सप्रेस हाइवे के पास वाली इस झोपड़पट्टी के करीब 250 कच्चे घर तोड़ दिये गए। मुंबई नगर-निगम की इस कार्यवाही से करीब 2,000 गरीब लोग प्रभावित हुए। पुलिस ने झोपड़पट्टी हिंसक कार्यवाही में 10 महिलाओं सहित कुल 17 लोगों को गिरफ्तार किया। कई महिलाएं पुलिस की लाठी-चार्ज से घायल भी हुईं। मुंबई में बादलों के पहले यह सरकार का आंतक है जो मनमानी तरीके से एक बार फिर गरीबों पर बेतहाशा बरस रहा है।
पुलिस की इस बर्बरता को देखते हुए ‘घर बचाओ घर बनाओ आंदोलन’ ने ‘महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग’ को तुरंत एक पत्र भेजा और पूरे मामले के बारे में बताया। आंदोलन ने इसे मानव अधिकारों का घोर उल्लंघन माना और आयोग से हस्तक्षेप का आग्रह किया।

29 मई
तारीख नेताजी-नगर के रहवासी हमेशा याद रखेंगे। यह लोग सुबह की चाय पीकर फुर्सत भी नहीं हो पाए कि प्रशासन ने बुलडोजर के साथ बस्ती पर हमला बोल दिया। यह हमला अचानक और बहुत तेज था, इसलिए किसी को संभलने का मौका नहीं मिला। देखते-देखते बस्ती के सैकड़ों घर एक के बाद एक ढ़ह गए। प्रशासन ने बस्ती को मैदान में बदलने की रणनीति पहले ही बना ली थी। इसलिए झोपड़पट्टी तोड़ने वाले दस्ते के साथ पुलिस ने बिखरी गृहस्थियों को आग भी लगाना शुरू कर दिया। इस दौरान प्रेम-सागर सोसाइटी के लोगों ने उनकी हरकतों को कैमरों में कैद कर लिया। यह लोग अब प्रशासनिक अत्याचार के खिलाफ अहम गवाह बन सकते हैं। साथ ही उनके द्वारा खींची गई तस्वीरों को भी सबूत के तौर पर पेश किया जा सकता है।

29 मई को 12 बजते-बजते पूरी बस्ती का वजूद माटी में मिल चुका था। इधर बड़े-बूढ़ों के साथ उनके बच्चे सड़कों पर आए। उधर पंत-नगर पुलिस स्टेशन में बंद महिलाओं को शाम तक एक कप चाय भी नहीं मिली। लाठी-चार्ज में बुरी तरह घायल डोगरीबाई को कुछ महिलाएं घाटकोपर के राजावाड़ी अस्पताल लेकर पहुंचीं थी। लेकिन पुलिस ने उन सभी को गिरतार करके पंत-नगर पुलिस स्टेशन में कैद कर दिया। यहां ईलाज की सही व्यवस्था न होने से डोगरीबाई की हालत गंभीर हो गई। रात होने के पहले भूखे, प्यासे और घायल लोगों के झुण्ड के झुण्ड खाली जगहों के नीचे से अपने घर तलाशने लगे। उन्हें अब भी मलवों के नीचे कुछ बचे होने की उम्मीद थी। लेकिन बेरहम बुलडोजर ने खाने-पीने और जरूरत की सारी चीजों को बर्बाद कर डाला था। थोड़ी देर में ही घोर अंधियारा छा गया। अब बरसात के मौसम में यह लोग सिर ढ़कने के लिए छत, खाने के लिए रोटी और रोटी के लिए चूल्हे का इंतजाम कहां से करेंगे ?
देश का मानसून मुंबई से होकर जाता है। लेकिन मुंबई नगर-निगम, महाराष्ट्र सरकार के लोक-निर्माण विभाग के साथ मिलकर नेताजी-नगर जैसी गरीब बस्तियों को ढ़हा रहा है। प्रदेश-सरकार के मुताबिक जो परिवार कट-आफ की तारीख 1-1-1995 के पहले से जहां रहते हैं, उन्हें वहां रहने दिया जाए। इसके बावजूद नेताजी-नगर के कई पुराने रहवासियों को अपने हक के लिए लड़ना पड़ लड़ना पड़ रहा है
आतंक के बादल
नगर बस्ती नाले के बाजू और मीठी नदी के नजदीक है। शहर के अहम भाग पर बसे होने से यह जगह बहुत कीमती है। इसलिए आसपास के करीब 60 एकड़ इलाके पर बड़े बिल्डरों की नजर टिकी हुई है। भीतरी ताकतों के आपसी गठजोड़, आंतक के सहारे बस्ती खाली करवाना चाहता है। लेकिन प्रशासन को भी बस्ती तोड़ने की इतनी जल्दी थी कि उसने सूचना देना ठीक नहीं समझा। पूरी बस्ती को ऐसे कुचला गया जिससे ज्यादा से ज्यादा नुकसान हो। अगर प्रशासन चाहता तो नुकसान को कम कर सकता था। लेकिन उसने पुलिस को आगे करके लाठी-चार्ज की घटना को अंजाम दिया।
इस बस्ती के रहवासी कानूनी तौर पर मतदाता है। इसलिए उन्हें जीने का अधिकार है। इसमें जमीन और बुनियादी सुविधाओं वाले घर के अधिकार भी शामिल हैं। किसी भी ओपरेशन में पुलिस अकारण हिंसा नहीं कर सकती है। अगर किसी का घर और उसमें रखी चीजों को तोड़ा-फोड़ा जाएगा तो लोग बचाव के लिए आएंगे ही। नेताजी-नगर के रहवासी भी अपने खून-पसीने की कमाई से जोड़ी ज्यादाद बचाने के लिए आए थे। बदले में उन्हें पुलिस की मार और जेल की सजा भुगतनी पड़ी।
‘घर बचाओ घर बनाओ आंदोलन’ के सिंप्रीत सिंह ने ‘महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग’ से आग्रह किया है कि- ‘‘स्लम एक्ट और अन्य दूसरे नियमों के आधार पर इस मामले की जांच की जाए। सरकार पुलिस की लाठियों से घायल महिलाओं का ईलाज करवाए। पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा मिले और दोषी पुलिसकर्मियों पर कड़ी कार्यवाही हो।’’

इन दिनों
मुंबई में गरीबों को उनकी जगहों से हटाने की घटनाओं में तेजी आई है। शहर की जमीन पर अवैध कमाई के लिए निवेश किया जा रहा है। शहरी जमींदार ऊंची इमारतों को बनाने के लिए हर स्केवेयर मीटर जमीन का इस्तेमाल करना चाहते हैं। अब यह कारोबार अथाह कमाई का जरिया बन चुका है। इस मंदी के दौर में भी जमीनों की कीमत काफी ऊंची बनी हुई हैं। इसकी वजह सस्ती दरों पर कर्ज किसानों की बजाय कारर्पोरेट को दिया जाना है।
महाराष्ट्र ने अपनी 30 हजार एकड़ जमीन प्राइवेट को दी है। सीलिंग कानून के बावजूद ऐसा हुआ। 1986 को प्रदेश सरकार यह प्रस्ताव पारित कर चुकी थी कि- ‘‘अतिरिक्त जमीन का इस्तेमाल कम लागत के घर बनाने में किया जाएगा। 500 मीटर से ज्यादा जमीन तभी दी जाएगी जब उसका इस्तेमाल 40 से 80 स्केवेयर मीटर के लेट्स बनाने में होगा।’’ लेकिन मुंबई के हिरानंदानी गार्डन में बिल्डर को 300 एकड़ की बेशकीमती जमीन सिर्फ 40 पैसे प्रति एकड़ के हिसाब से दी गई। इस जमीन पर ऐसा ‘स्विटजरलैण्ड’ खड़ा किया गया जिसमें सबसे कम लागत के एक मकान की कीमत सिर्फ 5 करोड़ रूपए है।
साभार : विस्फोट.कॉम
लिंक : http://www.visfot.com/index.php/jan_jeevan/982.html

27.5.09

पीछे छूट गए स्कूल

शिरीष खरे
उस्मानाबाद। हर साल हजारों मजदूर सीमावर्ती इलाकों में गन्ना काटने के लिए जाते हैं। नंवबर से जून के बीच बच्चे भी बड़ों के साथ पलायन करते हैं। यही समय स्कूल की पढ़ाई के लिए खास होता है। लेकिन इसी समय गांव के गांव खाली हो जाने से स्कूल भी खाली पड़ जाते हैं। ऐसे में चीनी पट्टी के नाम से मशहूर मराठवाड़ा के कई बच्चे आगे नहीं पढ़ पाते हैं।
चाईल्ड राईट्स एण्ड यू’ और ‘लोकहित सामाजिक विकास संस्था’ ने कलंब तहसील के 19 गांवों में सर्वे किया और पाया कि 6-14 साल के कुल 1,555 बच्चों में से 342 स्कूल नहीं जाते। इसमें 193 लड़कियां हैं। इसके अलावा ड्रापआउट बच्चों की संख्या 213 है। इसमें से भी 89 लड़कियां हैं। यहां एक साल में 19 बाल-विवाह के मामले भी उजागर हुए हैं। इन संस्थाओं ने 19 गांवों के बच्चों को पढ़ाई से जोड़ने की रुपरेखा तैयार की है। इससे एक छोटे से हिस्से में बदलाव की आशा बंधी है। लेकिन पलायन के इस संकट ने पूरे मराठवाड़ा को घेर रखा है।
‘लोकहित सामाजिक विकास संस्था’ के बजरंग टाटे ने बताया- ‘‘पलायन करने वाले मजदूरों में ज्यादातर दलित और बंजारा जनजाति से होते हैं। इनके पास रोजगार के स्थायी साधन नहीं होते। इसलिए जब यह लोग बाहर निकलते हैं तो पंचायत की कई योजनाओं से छूट जाते हैं। सबसे ज्यादा नुकसान तो स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का होता है। खेतों में जाने वाले इन बच्चों का खूब शोषण होता है।’’
महादेव बस्ती की शिक्षिका प्रतिभा दीक्षित ने बताया कि- ‘‘परीक्षा की तारीख नजदीक आते-आते तो ज्यादातर आदिवासियों के घरों में ताले लटकने लगते हैं। इससे पूरे इलाके में शिक्षा का स्तर बहुत नीचे चला जाता है। बच्चों की अनुपस्थिति के कारण शिक्षकों को कोर्स पूरा करने में मुश्किल होती है। जंगली क्षेत्र के कम-से-कम 75 स्कूलों में तो बच्चों का अकाल पड़ जाता है। परीक्षा के दिन तक 100 में से कम-से-कम 40 बच्चे गायब हो जाते हैं।’’ मजदूरों के साथ यह बच्चे 200 से 700 किलोमीटर दूर याने नगर, पुणे, कोल्हापर और कर्नाटक के बिदर, आलूमटी तथा बेड़गांव के इलाकों तक जाते हैं। यह परिवार गन्ने के खेतों में ही अस्थायी बस्ती बनाकर रहते हैं। काम के मुताबिक यह अपने ठिकाने बदलते रहते हैं।
धाराशिव चीनी मिल, चैरारूवली’ के लिए गन्ना काटने वाले मजदूरों की एक बस्ती को देखने का मौका मिला। पन्नी, कपड़ा और लकड़ियों की मदद से कुल 12 घर खड़े हैं। सभी घर एक-दूसरे से अलग-थलग हैं। 13 साल की नीरा शिंदे ने बताया- ‘‘घर में एक ही कमरा है। इस कमरे में पैर पसारने भर की जगह है। धूप के दिनों में पन्नी के गर्म होने से बहुत गर्मी लगती है। यह घर हमें ठण्ड और पानी से भी नहीं बचा पाते। बरसात में तो पूरा खेत कीचड़ से भर जाता है।’’ 12 साल के रामदास गायकबाड़ ने बताया- ‘‘इस उबड़-खाबड खेत में न कोई गली है, न खेलने का मैदान। पीने का पानी भी हम 2 किलोमीटर दूर से लाते हैं। सभी खुले में नहाते हैं। रात को लाइट नहीं रहने से घुप्प अंधेरा छा जाता है। हम सुबह का इंतजार करते हैं।’’ चीनी मिलों से ट्रालियों का आना-जाना देर रात तक चलता रहता है। इस दौरान कई बच्चे गन्नों को बांधने और उन्हें ट्रालियों में भरने के कामों में शामिल हो जाते हैं।
14 साल की अंगुरी मेहतो ने कहा- ‘‘मुझे अपने 3 छोटे भाईयों को संभालने में बहुत मुश्किल होती है। कंधों पर रखे-रखे शरीर दुखने लगता है। सुबह से शाम तक घर के काम भी करती हूं।’’ यहां 6 से 14 साल के बच्चे-बच्चियां घरों में खाना बनाने और सफाई का काम करते हैं। ऐसी ही दूसरी बच्ची इशाका गोरे ने बताया कि- ‘‘मैं अभी तीसरी में । दूसरी में पहले नम्बर पर आई थी। यहां से जाने के बाद परीक्षा देना है। फिर चौथी बैठूंगी।’’ उसे नहीं मालूम कि अब स्कूल की परीक्षाएं खत्म हो चुकी हैं। उसका परिवार सागली जिले के कराठ गांव से आया है। इशाका के पिता याविक गोरे का मानना है कि- ‘‘यह पढ़े तो ठीक, नहीं तो 4-5 साल में शादी करनी ही है। फिर अपने पति के साथ जोड़ा बनाकर काम करेगी।’’ यहां ज्यादातर लोग अपने बच्चों की शादियां कम उम्र में ही कर देते हैं। इन्हें लगता है कि परिवार में जितने अधिक जोड़े रहेंगे, आमदनी उतनी ही अधिक होगी। ज्यादातर रिश्तेदारियां भी काम की जगहों पर हो जाती हैं। इस तरह बाल-विवाह की प्रथा यहां नए रुप में सामने आती है। इस तरह बाल-विवाह की प्रथा यहां नए रुप में सामने आती है।
दूसरी बस्तियों में भी बच्चों से जुड़ी कई दिक्कते एक समान पायी गई, जैसे- 1) बढ़ते बच्चों को पर्याप्त और समय पर भोजन नहीं मिलता। इससे कुपोषण के मामलों में बढ़ोतरी होती है। 2) खेतों में बच्चे सबसे ज्यादा सर्दी के मौसम में बीमार होते हैं। 3) गन्ना काटते वक्त कोयना जैसे धारदार हथियार लगने, सांप काटने और बावड़ियों में गिरने की घटनाएं होती रहती हैं। 4) ऐसे खेतों से ‘प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र’ करीब 15-20 किलोमीटर दूर होते हैं। इसलिए इमरजेंसी के दौरान अनहोनी की आशंकाएं बढ़ जाती हैं।
‘शंभु महाराज चीनी मिल, हवरगांव’ के लिए गन्ना काटने वाली शोभायनी कस्बे ने बताया- ‘‘हमारे बच्चे हमारे साथ होकर भी दूर हैं। यह कभी चिड़चिड़ाते हैं, कभी चुपचाप हो जाते हैं। ऐसे माहौल में बच्चों का दिमाग बिगड़ जाता है। यह खेलने-पढ़ने के दिनों में भी बहुत काम करते हैं। इन्हें पढ़ाई का कोई तनाव नहीं है। यह तो भूख की मजबूरी से स्कूल नहीं जा पाते।’’
केन्द्र सरकार 2010 तक देश के सभी बच्चों को स्कूल ले जाना चाहती है। लेकिन 11वीं योजना में साफ तौर से कहा गया है कि 7 प्रतिशत बच्चों को स्कूल से जोड़ना मुश्किल हैं। यह बच्चे सामाजिक और आर्थिक कारणों से सरकार की पहुंच से दूर हैं। यूनेस्को ने भी ‘एजुकेशन फार आल मानिटिरिंग, 2007 की रिपोर्ट में कहा है कि भारत, पाकिस्तान और नाईजीरिया में दुनिया के 27 प्रतिशत बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। दुनिया के 101 देशों की तरह भारत भी पूर्ण साक्षरता की दौड़ से बाहर है। यूनेस्को के मुताबिक भारत के 70 लाख बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं। दुनिया के 17 देशों की तरह भारत में प्राइमरी स्कूलों से लड़कियों का पलायन ज्यादा हो रहा है। आखिरी जनगणना के हिसाब से 49.46 करोड़ महिलाओं में से 22.96 करोड़ महिलाएं निरक्षर हैं। ‘चाईल्ड राईटस् एण्ड यू’ मानता है कि भारत में 5 से 9 साल की 53 प्रतिशत लड़कियां पढ़ नहीं पाती।
भारत-सरकार ने 600 में से 597 जिलों को पूर्ण साक्षरता अभियान का हिस्सा बनाया है। उसके पास कई योजनाएं भी हैं जैसे- घरों के पास स्कूल खोलना, स्कालरशिप देना, मिड-डे-मिल चलाना और ब्रिज कोर्स तैयार करना। बीते 3 सालों में प्राइमरी स्तर पर 2,000 से भी अधिक आवासीय स्कूल खोले गए। लड़कियों के लिए 31,000 आदर्श स्कूल भी बने। लेकिन मराठवाड़ा जैसे इलाकों से पलायन करने वाले बच्चे शिक्षा की मुख्यधारा से नहीं जुड़ सके।
पलायन, समाज की भीतरी परतों से जुड़ा है। विकास की असंतुलित रतार के कारण यह समस्या विकराल हो चुकी है। इसे रोजगार के स्थायी साधन और भूमि सुधार की नीतियों की मदद से रोकना होगा। जब तक इंसान की मूलभूत जरूरत पूरी नहीं होगी तब तक बच्चों के भविष्य पर संकट के बादल मडराते रहेंगे।

26.5.09

एक बस्ती का नाम था वटवा

शिरीष खरे

अहमदाबाद। नहीं, यह कोई पहली बार नहीं हो रहा है.

लेकिन वटवा की सुल्ताना बानो के मन में एक ही सवाल बार-बार उमड़ता घुमड़ता है कि आखिर छोटी-छोटी खुशियों और सपनों का कत्ल कर के ही शॉपिंग मॉल्स, कॉपलेक्स, अण्डरब्रिज, ओवरब्रिज और सड़कों का जाल क्यों फैलाया जाता है ?
इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है. अब अहमदाबाद मेगासिटी बनने वाला है और मेगासिटी की चमक की सोच-सोच कर अभी से लोगों की आंखें चुंधिया रही हैं लेकिन मेगासिटी की इस चमक ने अपने पीछे एक ऐसा अंधेरा छोड़ना शुरु किया है, जिसमें हज़ारों लोगों की जिंदगी प्रश्नवाचक चिन्ह की तरह गुम हो रही हैं.
अहमदाबाद अपने ठिकाने पर है. लेकिन इसमें रहने वालों को ठिकानों की तलाश हैं. टाऊन प्लानिंग के नक्शे के मुताबिक शहर की तंग गलियों को मुख्य सड़कों से जोड़ने के लिए चौड़ा किया जाएगा. उन गलियों को भी, जहां इसकी जरुरत नहीं है. और अब इसके लिए गरीबों के घर निशाने पर हैं.
वटवा की एक सड़क को 64 फीट चौड़ा करने का फरमान जारी हुआ है. यहां की घनी बस्ती देखने के बाद तो यह फैसला और भी अजीब लगता है. वैसे भी यह सड़क आगे जाकर रेल्वे-स्टेशन पर खत्म हो जाएगी. यहां से स्टेशन आधा घण्टे का रास्ता है. स्टेशन से ही नवापुरा के 84 घर लगे है. सड़क को चौड़ा करने के लिए स्टेशन तो टूटेगा नहीं. इसलिए यह काम स्टेशन तक जाकर रूकेगा और सिर्फ गरीबों के घर ही टूटेंगे. 28 घर टूट चुके है. कुछ घरों में लाल निशान लगे हैं.
टूटने वाले घरों का कुल आंकड़ा कोई नहीं जानता.
2001 की जनगणना के मुताबिक अहमदाबाद में 6 लाख 92 हजार 257 घरों में कुल 49 लाख 70 हजार 200 लोग रहते हैं. इसमें से 8 लाख 714 गरीब हैं. यानी यह कुल आबादी का 26 फीसदी हिस्सा हुआ. शहर के दक्षिण की ओर वार्ड-42 के नाम से दर्ज वटवा में 26,630 घर हैं, जिसमें 1 लाख 21 हजार 725 लोग रहते हैं. 2001 की जनगणना के हवाले से शहर में 10 लाख 71 हजार 11 कामगार हैं जिसमें से 37 हजार 410 वटवा में हैं. शहर में जहां 53 हजार 497 मार्जिनल वकर्स हैं वहीं वटवा में यह संख्या 1 हजार 794 है. इसी तरह शहर के 23 लाख 95 हजार 577 नॉन-वकर्स में से 82 हजार 493 वटवा में हैं.
‘सहयोग’संस्था की शीतल बहन कहती हैं- “ गरीबों के घर एक साथ न तोड़कर धीरे-धीरे तोड़े जा रहे हैं. भारी विरोध से बचने के लिए सरकार ऐसा कर रही है. उसे योजना के बारे में लोगों को बताना चाहिए था. लेकिन वह ऐन वक्त पर अपने पत्ते खोलती है. इस शिकायत को लेकर जब हम चीफ सिटी प्लॉनर के यहां गए तो उन्होंने इस्टेट डिपार्टमेन्ट के पास भेज दिया. इसके बाद इस्टेट डिपार्टमेन्ट ने चीफ सिटी प्लॉनर का पता बता दिया.”
‘चाईल्ड राईटस् एण्ड यू’के प्रवीण सिंह के अनुसार वटवा के विस्थापितों को लेकर असमंजस की स्थिति है. सरकार कहती है कि जिनके पास 1976 से रहने के सबूत हैं उन्हें ही वैकिल्पक व्यवस्था मिलेगी. लेकिन ज्यादातर गरीबों के पास 33 साल पुराने सबूत नहीं हैं.
आग जल रही है
वटवा में ज्यादातर ऐसे परिवार रहते हैं, जिन्हें 2002 के दंगों में अपने घर खोने पड़े थे. इन दंगों का सबसे ज्यादा हर्जाना अल्पसंख्यकों ने चुकाया था. इन्होंने किसी तरह अपनी जान तो बचा ली थी लेकिन दंगाइयों द्वारा लगाई गई आग से अपना घर और उसमें रखा सामान नहीं बचा पाए थे. यह आग उनके पहचान के जरूरी कागजात भी जला गई थी.
घरों में लगी आग तो बुझ गई लेकिन नफरत की एक आग उस दंगे के बाद से आज तक भड़क रही है. 2002 से ही वटवा के लोगों को “भारतीय” होने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. उन्हें “गद्दार”, “खतरनाक” और “पराए” जैसे विशेषण दे दिए गए हैं. यहां की हर गली, चौराहा और बाजार अब बदनाम है. यही कारण है कि अघोषित तौर पर वटवा विकास योजनाओं से बेदखल ही रहा है.
जब सबकी नजरों से वटवा उतरा तब बिल्डरों की आंखों में यह चढ़ा. उन्होंने यहां नाजायाज तौर पर मकान बनाए और यही के अल्पसंख्यकों को बेच दिए. पूरा कंस्ट्रेक्शन अवैध तरीके से हुआ, इसलिए यहां के लोगों ने जो मकान खरीदे वह उनके नाम पर नहीं हुए. इन्हें अपने मकान से कभी भी निकाला जा सकता है. इसके बदले में कोई राहत भी नहीं मिलेगी. क्योंकि अवैध मकानों में पानी और बिजली मुहैया कराना सरकार का काम नहीं होता इसलिए यह काम भी बिल्डर ही पूरा करते हैं. जाहिर है, आधा तीतर-आधा बटेर की तरह बिल्डर ने घर बनाए लेकिन उनमें न नाली बनाई, न पानी की कोई व्यवस्था की.
सपनों का कत्ल
वटवा की सुल्ताना बानो ने अपनी उम्र के 50 में से 20 साल यहीं गुजरे हैं. 12वीं कक्षा तक पढ़ी-लिखी सुल्ताना बानो आंगनबाड़ी चलाती हैं. लेकिन 4 सदस्यों वाले उनके परिवार की मासिक आमदनी 4,000 से ज्यादा नहीं है. ऊपर से वटवा में अतिक्रमण के नाम पर मची तोड़फोड़ ने उनकी नींद उड़ा दी है. वे कहती हैं- “ हम अपने घर का टैक्स देते रहे हैं. आज उसे छोड़ने के लिए कहा जा रहा है. लेकिन नई जगह जाने के पहले हमारी तरक्की माटी में मिल जाएगी.”
अफसाना बानो के भी 38 में से 18 साल यहीं गुजरे. वह सातवीं कक्षा तक पढ़-लिखकर भी नहीं जानती कि उनका परिवार कुल कितना कमाता है. लेकिन 6 महीने पहले उसने एक अफसर से लाल निशान लगाए जाने की वजह जाननी चाही थी. अफसर ने कुछ नहीं कहा.
अफसाना को आज तक एक भी जबावदार अफसर नहीं मिला. उसके शौहर मोहम्मद शेख ने कहा- “अगर गरीब से उसका आशियाना छीनकर तरक्की आएगी तो वह हमें मंजूर नहीं. कही दूसरा ठिकाना मिल भी जाए तो हमारा नुकसान कम नहीं होगा. फिर भी हम हर रोज नए ठिकाने की फ्रिक में डूबे रहते हैं.”
कुल 32.82 वर्ग किलोमीटर में फैले वटवा के कई परिवार 20-25 साल से यहां रहते आए हैं. लेकिन कई लोग हैं, जिनके पास निवास प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं है. हालत ये है कि इनमें से कई लोग यह सबूत जुटाने की कोशिश भी नहीं करते. इन्हें डर है कि ऑफिस में बैठे लोग उनकी नागरिकता पर ही शक न करने लगें!
नवापुरा में अब तक 15 परिवारों को नोटिस मिले हैं. 35 साल के संतोष कुमार यहीं पले-बढ़े हैं. अगर उसकी रोज की मेहनत को महीने में जोड़ा जाए तो वह 5,000 पहुंचती है. इसी से उनका 8 सदस्यों वाला परिवार चलता है. लेकिन अक्टूबर में उसके घर पर भी लाल निशान लग गया.
संतोष के हिस्से अब भविष्य की चिंताएं हैं- “अचानक मिली इस खबर ने जिंदगी अस्त-व्यस्त कर डाली. कुछ लोग तो दहशत के मारे अपने-अपने घर तोड़ने भी लगे हैं. उन्हें लगता हैं कि वक्त रहते ऐसा नहीं किया तो बाद में ज्यादा नुकसान होगा.”
इन घरों के साथ उन स्मृतियों पर भी हथौड़े चलेंगे, जिन्हें एक पीढ़ी ने जाने कब से अपने पास संजो कर रखा था. किसी घर की दीवार सालगिरह पर बनी थी तो किसी की छत शादी पर पक्की हुई थी. अब दीवारों से जुड़ी छतों का कोई भरोसा नही रहा. भीड़ वाली गलियां कभी भी गुम हो सकती हैं.
हालांकि लोगों ने उम्मीद नहीं छोड़ी है. बस्ती को इस बदहाली से बचाने के लिए लोगों ने ‘नवजीवन महिला मंच’ बनाया है. मंच की अध्यक्ष शहजाद बहन का हौसला देखते ही बनता है- “ हम लोगों की पहचान साबित करने के लिए रिकार्ड जमा कर रहे हैं. इसके लिए वटवा में 28 पॉकेट के 4,868 परिवारों का स्लम नेटवर्क तैयार हुआ है. इस नेटवर्क से अब 13 पॉकेट के 3,834 परिवार और जुड़ेगे.”
घर अब प्रापर्टी है
अहमदाबाद भी मंदी की चपेट में हैं. यहां जमीन और घरों की कीमत घटी है. लेकिन झुग्गियों को तोड़कर निर्माण कार्य जारी है. एक तरफ गरीबों को जमीनों से हटाया जा रहा है और दूसरी तरफ अमीरों को फ्लैट देने के लिए बिल्डर अपने ब्रोशर में 10-15 फीसदी की कमी कर रहे हैं.
प्रहलाद नगर में जिस फ्लैट की कीमत 2,800 रूपए वर्ग फीट थी, वही अब 2,300 रूपए वर्ग फीट में मिल रहा है. चांदखेडा में यह गिरावट 2,000 से 1,600, बोडकदेव में 3,400 से 2,800 और वेजलपुर में 3,500 से 3,000 रूपए वर्ग फीट तक आ गई है. फिर बिल्डरों के लुभावने नारे तो हैं ही.
चमचमाती गाड़ियों में घुमने वाले बिल्डरशाही को ही शहरी विकास का नाम दे रहे हैं. घर उनके लिए ‘रहने’की जगह नहीं बल्कि अब ‘प्रापर्टी’ है. गरीबों के तबाही की वजह भी यही से शुरू होती है.
दूसरी तरफ मेगासिटी में अपना मुनाफा देखने वाला तबका विस्थापितों के विरोध को ठीक नहीं मानता. वह कहता है कि इससे शहर की शांति और व्यवस्था भंग होती है. सरकार झुग्गी बस्तियां तोड़ने के लिए पुलिस को आगे करती है और कारपोरेट की ताकतें ऐसी खबर को बेखबर बनाती हैं. लोकतंत्र में गरीबी हटायी जाती है और बाजार गरीबों को.
साभार : रविवार.कॉम से
लिंक :
http://raviwar.com/news/161_vatva-encroachment-shirish-khare.shtml

15.5.09

कच्ची उम्र के खट्टे-मीठे अनुभव



फिल्म : कैरी
अवधि : 96 मिनिट
निर्देशक : अमोल पालेकर
कलाकार : योगिता देशमुख, शिल्पा नवलकर, मोहन गोखले और लीना भागवत
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यह फिल्म इंसानी रिश्तों का मार्मिक ताना-बाना है. जो सीधी-साधी कहानी को सहज ढ़ंग से कहती है. इसमें संगीत और कैमरे के जरिए दृश्यों को खूबसूरत रंग-रुप दिया गया है. हर दृश्य बीती यादों का फ्रेम दिखता है. हर कलाकार आसपास का आदमी लगता है. इसलिए फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शक कुछ देर के लिए कुछ सोचता है. वह कुर्सी से तुरंत नहीं उठता पाता.
यह तानी मौसी और उसकी नन्ही भांजी की कहानी है. इस कहानी में 10 साल की बच्ची अपने मां-बाप के मरने पर श्रीपू मामा के साथ तानी मौसी के घर आती है. तानी की कोई संतान नहीं है. वह बच्ची को हर खुशी देने का भरोसा देती है. लेकिन वह खुद खुशियों से दूर है. तानी के पति भाऊराव को उसकी जरा भी फ्रिक नहीं. भाऊराव और घर की नौकरानी तुलसा का नाजायज रिश्ता है. तुलसा भी भाऊराव की आड़ से मालकिन को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं चूकती. इन हालातों से परेशान तानी जिदंगी को अपने हाल पर छोड़ देती है. लेकिन भांजी के आने के बाद वह फिर से जीना चाहती है.
यह मराठी के लोकप्रिय लेखक जी. ए. कुलकर्णी की कहानी है. इसे अमोल पालेकर ने फिल्म ‘कैरी’ में पेश किया. यहां ‘कैरी’ का मतलब एक बच्ची के बड़े बनने के अनुभवों से है. इसमें एक औरत के जीने की तमन्ना को भी पंख लगे हुए हैं. तानी एक घरेलू औरत है. वह घर की चार दीवारी के हर सुख और दुख से खुश है. तानी अपनी भांजी को सुरक्षा और ममता का ऐसा आंचल देना चाहती है जिससे उसका बचपन बचा रहे. तानी अपने बचपन की उम्मीदों को ताजा करना चाहती है. वह प्यार के इस एहसास को संवारना चाहती है. वह पूरे जोश से मासूम बच्ची की एक-एक चाहत को बचाना चाहती है. तानी ने अपनी जिंदगी पर होने वाले अत्याचारों पर चुप्पी साध ली है. लेकिन वह बच्ची को लेकर उठने वाली छोटी अंगुली को बर्दाश्त नहीं कर सकती. ऐसी किसी आशंका की आहट सुनते ही वह समाज के तयशुदा पैमानों के खिलाफ बोलने लगती है. उस वक्त एक औरत के अंदर की ताकत का पता चलता है.
लेकिन तानी अपने पति की मार से टूट जाती है. बच्ची के मन पर बिखरते हुए घर का असर न पड़े इसलिए तानी उसे श्रीपू मामा को लौटा देती है. विदाई के समय तानी मौसी अपनी भांजी से आसपास देखने, पूछने और जानने की बातें कहती हैं. कहते हैं कच्ची उम्र की खट्टी-मीठी घटनाओं का असर उम्र भर रहता है. बच्ची ने तानी मौसी की आंखों में एक सुंदर कल की झलक देखी थी. उसने तानी मौसी की गर्म गोद से हौसला पाया था. उसके मन में तानी मौसी के होने का एहसास बना रहा. उसने तानी मौसी की नर्म अंगुलियों से मर्दों की दुनिया में आगे बढ़ने का रास्ता ढ़ूढ़ लिया. आखिरकार तानी मौसी के व्यक्तित्व के असर ने उस बच्ची को बड़ी लेखिका बना दिया.
इस फिल्म को एक कहानी की तरह ज्यों का त्यों रख दिया गया है. इससे एक पाठक की तरह दर्शक को भी अपनी तरह से सोचने और समझने का मौका मिलता है. अंत में संदेश देने की औपचारिकता से फिल्म अपना असर खो सकती थी.

10.5.09

कोई सूरत नजर नहीं आती

शिरीष खरे
सूरत। इस पहेली से मुझे बचपन की पहेलियां याद आ गईं। उन पहेलियों के आखिरी में लिखा होता था- ‘‘बूझो तो जानें.’’ सारी पहेलियां इतनी सीधी लगती थीं कि बार-बार धोखा खाता और उल्टा जबाव दे देता. आज की पहेली वैसी ही है. वह दिखती जितनी सीधी है, है उतनी ही उल्टी. पहेली शुरू होती है ‘सूरत नगर-निगम’ के एक ख्याल से. निगम ने कहा था कि शहर में एक भी झुग्गी नहीं दिखेगी.
ऐसा ‘जेएनएनयूआरएम’ योजना के जरिए होना था. निगम ने अमरौली के पास बनी राजीवनगर झोपड़पट्टी के लोगों के लिए कोसड में 42,000 फ्लेट बनाए. लेकिन अब यह लोग वह फ्लेट नहीं ले सकते. चलिए पहेली को समझने के लिए उसकी परतों में चलते हैं.
निगम के अफसरों की सुने तो पहेली सीधी ही है. इसे राजीवनगर झोपड़पट्टी के लोग चुटकी में सुलझा सकते हैं. लेकिन राजीवनगर झोपड़पट्टी के लोग कहते हैं कि अफसरों की जिद के आगे सभी नतमस्तक हैं. निगम ने इनके लिए फ्लेट बनवाए और अब यही लोग कागजों की भूल-भुलैया में गोते खा रहे हैं. आप कहेंगे कि कागजात देकर बाहर निकला जा सकता है. लेकिन यह इतना आसान नहीं है. आमतौर पर ऐसी बस्तियों के लोग नहीं जानते कि एक दिन उनके घर टूटेंगे. एक दिन उनसे यहां रहने के सबूत मांगे जाएंगे. इसलिए वह कागजों को इकट्ठा नहीं कर पाते. ऐसी बस्तियों के लोग किस कागज के टुकड़े का क्या मतलब है, यह भी नहीं जानते. राजीवनगर का भी यही हाल है. अफसरों को जो कागज चाहिए उनमें से कुछ कागज यहां के ज्यादातर रहवासियों के पास नहीं हैं. यह रहवासी अफसरों को अपनी झुग्गी दिखाना चाहते हैं. लेकिन अफसरों को तो झुग्गी में रहने का कागज ही देखना है. फिलहाल लोगों के घर का हक निगम की फाइलों से काफी दूर है. इस तरह पूरी योजना आफिस-आफिस के खेल में उलझ चुकी है.
राजीवनगर के 1200 में से सिर्फ 94 परिवार ही रहने के सबूत दिखा सकते हैं. इसलिए 1106 परिवार कोसड में बने फ्लेट का सपना नहीं देख सकते. सामाजिक कार्यकर्ता माया वालेचा के मुताबिक- ‘‘फ्लेट आंवटन से जुड़े सर्वेक्षणों में भारी अनियमितताएं हुई हैं. कुछ बस्तियों में तीन-तीन बार सर्वेक्षण हुए हैं. कुछ बस्तियों में मुश्किल से एक बार. राजीवनगर में ज्यादातर बाहर से आए मजदूर हैं. यह सूरत में 6-8 महीनों के लिए काम करते हैं. इसके बाद यह अपने गांवों को लौट जाते हैं. इनमें से कई 15-20 सालों से यही रहते हैं.’’ बस्ती के ऐसे ही रहवासी संतोष ठाकुर ने बताया- ‘‘बिजली, पानी और संपत्ति के बिल तो मकान-मालिक के पास होते हैं. हमें स्थानीय निकायों से एक सर्टिफिकेट मिलता है. लेकिन अफसर उसे सबूत ही नहीं मानते. कहते हैं कोई दूसरा कागज लाओ.’’ इसी बस्ती के रहवासी रंजन तिवारी ने बताया- ‘‘हमें हमेशा काम नहीं मिलता. इसलिए काम की तलाश में सुबह जल्दी निकलना होता है. सर्वे ऐसे समय हुआ जब हम बस्ती से दूर थे. हमें कुछ मालूम ही नहीं था. इसलिए हमारे नाम सर्वे से नहीं जुड़ सके.’’
नगर-निगम के डिप्टी कमिशनर महेश सिंह के अनुसार- ‘‘’झुग्गीवासियों को फ्लेट आवंटित करने के लिए एक कमेटी बनी हुई है. अगर किसी को लगता है कि उसके सबूत जायज हैं तो कमेटी के पास जाए.’’ नगर-निगम में स्लम अप-ग्रेडेशन सेल के मुखिया मानते हैं कि सर्वें में कई किरायेदारों के नाम छूट गए हैं. उनकी जगह मकान-मालिकों के नाम जुड़ गए हैं. लेकिन यह मुद्दा तो उसी समय उठाना चाहिए था. स्लम अप-ग्रेडेशन सेल किसी भी गड़बड़ी को रोकने के लिए दो तरह से सर्वे करता है. पहला सर्वे लोकेशेन के आधार पर होता है और दूसरा नामांकन के आधार पर. इसलिए स्लम अप-ग्रेडेशन सेल यह मानता है कि अगर लोकेशन वाली सूची से किराएदार का नाम है. साथ ही उसके पास 2005 के पहले से रहने का सबूत भी है तो उसे फ्लेट मिल जाएगा. अब यह किराएदार की जिम्मेदारी है कि वह कहीं से सबूत लाए.
बस्ती के सेवाजी केवट ने कहा- ‘‘मैंने 8 महीने पहले फ्लेट के लिए आवेदन भरा था. लेकिन अफसरों ने अभी तक चुप्पी साध रखी है. उन्होंने यह नहीं बताया कि मैं फ्लेट के योग्य हूं या नहीं और नहीं हूं तो क्यों ? मैंने पार्षद को भी अपने निवास का सर्टिफिकेट और एप्लीकेशन दिया है. लेकिन मुझसे और कागजातों की मांग की जा रही है. वैसे मेरा नाम बायोमेट्रिक सर्वे से भी जुड़ा है. लेकिन सरकार के ही अलग-अलग सर्वे एक-दूसरे से मेल नहीं खा रहे हैं.’’ इससे कई आशंकाएं पनप रही हैं.
यूं तो घर का मतलब रहने की एक जगह से होना चाहिए. लेकिन बाजार में बदलते शहरों के लिए वह प्रापर्टी भर है. सूरत भी इसी दौर से गुजर रहा है. यहां भी 40 प्रतिशत आबादी के विकास के लिए 60 प्रतिशत आबादी को नजरअंदाज किया जा रहा है. यहां भी पहले घर तोड़ो फिर घर बनाओ की बात हो रही है. लेकिन सवाल तो बस्ती के बदले बस्ती देने का है. घर के आजू-बाजू रास्ते, बत्ती, बालबाड़ी, नल और नालियों से जुड़कर एक बस्ती बनती है. उन्हें खोकर सिर्फ घर पाना नुकसानदायक है. इसलिए घर के आसपास की सुविधाओं का हक भी देना होगा.
सूरत की तरह हर शहर को ‘जीरो स्लम’ बनाने का मतलब भी समझना होगा. सरकार मजदूरों से उनकी बस्तियां उजाड़कर उन्हें बहुमंजिला इमारतों में भेजना चाहती है. इसका मतलब यह हुआ कि वह उन्हें घर के बदले घर दे रही है लेकिन जमीन के बदले जमीन नहीं. वह गरीबों से छीनी इन सारी जमीनों को बिल्डरों में बांट देगी. मतलब यह कि गरीबों को फ्लेट उनकी जमीनों के बदले मिल सकता है. मतलब यह कि गरीबों को मिलने वाला फ्लेट मुफ्त का नहीं होगा. लेकिन बिल्डरों को तो मुफ्त में जमीन मिल जाएगी. यही वजह है कि बिल्डर केवल फ्लेट बनाने पर जोर ही देते हैं. उनके दिल और दिमाग में बालबाड़ी या स्कूल बनाने का ख्याल नहीं आता. जाहिर है बात सिर्फ मुनाफा कमाने की है.
शहर के विकास में शहरवासियों को बराबरी का हिस्सा मिलना जरूरी है. इससे नगर-निगम को शहर की समस्याएं सुलझाने में मदद मिलेगी. लेकिन ऐसा नहीं चलता. दूसरी तरफ शहरी इलाकों में नागरिक संगठनों का सीमित दायरा है. शहर के गरीबों की भागीदारी को उनकी आर्थिक स्थिति के कारण रोका जा रहा है. विकास में सबका हिस्सा नहीं मिलने से गरीबी का फासला बढ़ेगा. एक तरफ गरीबी हटाने की बजाय गरीबों की बस्तियां तोड़ी जा रही हैं. दूसरी तरफ उन्हें नुकसान के अनुपात में बहुत कम राहत मिल पा रही है. तीसरी तरफ मिलने वाली ऐसी राहतों को कागजी औपचारिकताओं में उलझाया जा रहा है. कुल मिलाकर चौतरफा उलझे सूरतवासियों को उम्मीद की कोई सूरत नजर नहीं आती. आज यह घर से निकलकर काम पर जाते है. कल यह काम से लौटकर कहां जाएंगे ?