27.5.09

पीछे छूट गए स्कूल

शिरीष खरे
उस्मानाबाद। हर साल हजारों मजदूर सीमावर्ती इलाकों में गन्ना काटने के लिए जाते हैं। नंवबर से जून के बीच बच्चे भी बड़ों के साथ पलायन करते हैं। यही समय स्कूल की पढ़ाई के लिए खास होता है। लेकिन इसी समय गांव के गांव खाली हो जाने से स्कूल भी खाली पड़ जाते हैं। ऐसे में चीनी पट्टी के नाम से मशहूर मराठवाड़ा के कई बच्चे आगे नहीं पढ़ पाते हैं।
चाईल्ड राईट्स एण्ड यू’ और ‘लोकहित सामाजिक विकास संस्था’ ने कलंब तहसील के 19 गांवों में सर्वे किया और पाया कि 6-14 साल के कुल 1,555 बच्चों में से 342 स्कूल नहीं जाते। इसमें 193 लड़कियां हैं। इसके अलावा ड्रापआउट बच्चों की संख्या 213 है। इसमें से भी 89 लड़कियां हैं। यहां एक साल में 19 बाल-विवाह के मामले भी उजागर हुए हैं। इन संस्थाओं ने 19 गांवों के बच्चों को पढ़ाई से जोड़ने की रुपरेखा तैयार की है। इससे एक छोटे से हिस्से में बदलाव की आशा बंधी है। लेकिन पलायन के इस संकट ने पूरे मराठवाड़ा को घेर रखा है।
‘लोकहित सामाजिक विकास संस्था’ के बजरंग टाटे ने बताया- ‘‘पलायन करने वाले मजदूरों में ज्यादातर दलित और बंजारा जनजाति से होते हैं। इनके पास रोजगार के स्थायी साधन नहीं होते। इसलिए जब यह लोग बाहर निकलते हैं तो पंचायत की कई योजनाओं से छूट जाते हैं। सबसे ज्यादा नुकसान तो स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का होता है। खेतों में जाने वाले इन बच्चों का खूब शोषण होता है।’’
महादेव बस्ती की शिक्षिका प्रतिभा दीक्षित ने बताया कि- ‘‘परीक्षा की तारीख नजदीक आते-आते तो ज्यादातर आदिवासियों के घरों में ताले लटकने लगते हैं। इससे पूरे इलाके में शिक्षा का स्तर बहुत नीचे चला जाता है। बच्चों की अनुपस्थिति के कारण शिक्षकों को कोर्स पूरा करने में मुश्किल होती है। जंगली क्षेत्र के कम-से-कम 75 स्कूलों में तो बच्चों का अकाल पड़ जाता है। परीक्षा के दिन तक 100 में से कम-से-कम 40 बच्चे गायब हो जाते हैं।’’ मजदूरों के साथ यह बच्चे 200 से 700 किलोमीटर दूर याने नगर, पुणे, कोल्हापर और कर्नाटक के बिदर, आलूमटी तथा बेड़गांव के इलाकों तक जाते हैं। यह परिवार गन्ने के खेतों में ही अस्थायी बस्ती बनाकर रहते हैं। काम के मुताबिक यह अपने ठिकाने बदलते रहते हैं।
धाराशिव चीनी मिल, चैरारूवली’ के लिए गन्ना काटने वाले मजदूरों की एक बस्ती को देखने का मौका मिला। पन्नी, कपड़ा और लकड़ियों की मदद से कुल 12 घर खड़े हैं। सभी घर एक-दूसरे से अलग-थलग हैं। 13 साल की नीरा शिंदे ने बताया- ‘‘घर में एक ही कमरा है। इस कमरे में पैर पसारने भर की जगह है। धूप के दिनों में पन्नी के गर्म होने से बहुत गर्मी लगती है। यह घर हमें ठण्ड और पानी से भी नहीं बचा पाते। बरसात में तो पूरा खेत कीचड़ से भर जाता है।’’ 12 साल के रामदास गायकबाड़ ने बताया- ‘‘इस उबड़-खाबड खेत में न कोई गली है, न खेलने का मैदान। पीने का पानी भी हम 2 किलोमीटर दूर से लाते हैं। सभी खुले में नहाते हैं। रात को लाइट नहीं रहने से घुप्प अंधेरा छा जाता है। हम सुबह का इंतजार करते हैं।’’ चीनी मिलों से ट्रालियों का आना-जाना देर रात तक चलता रहता है। इस दौरान कई बच्चे गन्नों को बांधने और उन्हें ट्रालियों में भरने के कामों में शामिल हो जाते हैं।
14 साल की अंगुरी मेहतो ने कहा- ‘‘मुझे अपने 3 छोटे भाईयों को संभालने में बहुत मुश्किल होती है। कंधों पर रखे-रखे शरीर दुखने लगता है। सुबह से शाम तक घर के काम भी करती हूं।’’ यहां 6 से 14 साल के बच्चे-बच्चियां घरों में खाना बनाने और सफाई का काम करते हैं। ऐसी ही दूसरी बच्ची इशाका गोरे ने बताया कि- ‘‘मैं अभी तीसरी में । दूसरी में पहले नम्बर पर आई थी। यहां से जाने के बाद परीक्षा देना है। फिर चौथी बैठूंगी।’’ उसे नहीं मालूम कि अब स्कूल की परीक्षाएं खत्म हो चुकी हैं। उसका परिवार सागली जिले के कराठ गांव से आया है। इशाका के पिता याविक गोरे का मानना है कि- ‘‘यह पढ़े तो ठीक, नहीं तो 4-5 साल में शादी करनी ही है। फिर अपने पति के साथ जोड़ा बनाकर काम करेगी।’’ यहां ज्यादातर लोग अपने बच्चों की शादियां कम उम्र में ही कर देते हैं। इन्हें लगता है कि परिवार में जितने अधिक जोड़े रहेंगे, आमदनी उतनी ही अधिक होगी। ज्यादातर रिश्तेदारियां भी काम की जगहों पर हो जाती हैं। इस तरह बाल-विवाह की प्रथा यहां नए रुप में सामने आती है। इस तरह बाल-विवाह की प्रथा यहां नए रुप में सामने आती है।
दूसरी बस्तियों में भी बच्चों से जुड़ी कई दिक्कते एक समान पायी गई, जैसे- 1) बढ़ते बच्चों को पर्याप्त और समय पर भोजन नहीं मिलता। इससे कुपोषण के मामलों में बढ़ोतरी होती है। 2) खेतों में बच्चे सबसे ज्यादा सर्दी के मौसम में बीमार होते हैं। 3) गन्ना काटते वक्त कोयना जैसे धारदार हथियार लगने, सांप काटने और बावड़ियों में गिरने की घटनाएं होती रहती हैं। 4) ऐसे खेतों से ‘प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र’ करीब 15-20 किलोमीटर दूर होते हैं। इसलिए इमरजेंसी के दौरान अनहोनी की आशंकाएं बढ़ जाती हैं।
‘शंभु महाराज चीनी मिल, हवरगांव’ के लिए गन्ना काटने वाली शोभायनी कस्बे ने बताया- ‘‘हमारे बच्चे हमारे साथ होकर भी दूर हैं। यह कभी चिड़चिड़ाते हैं, कभी चुपचाप हो जाते हैं। ऐसे माहौल में बच्चों का दिमाग बिगड़ जाता है। यह खेलने-पढ़ने के दिनों में भी बहुत काम करते हैं। इन्हें पढ़ाई का कोई तनाव नहीं है। यह तो भूख की मजबूरी से स्कूल नहीं जा पाते।’’
केन्द्र सरकार 2010 तक देश के सभी बच्चों को स्कूल ले जाना चाहती है। लेकिन 11वीं योजना में साफ तौर से कहा गया है कि 7 प्रतिशत बच्चों को स्कूल से जोड़ना मुश्किल हैं। यह बच्चे सामाजिक और आर्थिक कारणों से सरकार की पहुंच से दूर हैं। यूनेस्को ने भी ‘एजुकेशन फार आल मानिटिरिंग, 2007 की रिपोर्ट में कहा है कि भारत, पाकिस्तान और नाईजीरिया में दुनिया के 27 प्रतिशत बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। दुनिया के 101 देशों की तरह भारत भी पूर्ण साक्षरता की दौड़ से बाहर है। यूनेस्को के मुताबिक भारत के 70 लाख बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं। दुनिया के 17 देशों की तरह भारत में प्राइमरी स्कूलों से लड़कियों का पलायन ज्यादा हो रहा है। आखिरी जनगणना के हिसाब से 49.46 करोड़ महिलाओं में से 22.96 करोड़ महिलाएं निरक्षर हैं। ‘चाईल्ड राईटस् एण्ड यू’ मानता है कि भारत में 5 से 9 साल की 53 प्रतिशत लड़कियां पढ़ नहीं पाती।
भारत-सरकार ने 600 में से 597 जिलों को पूर्ण साक्षरता अभियान का हिस्सा बनाया है। उसके पास कई योजनाएं भी हैं जैसे- घरों के पास स्कूल खोलना, स्कालरशिप देना, मिड-डे-मिल चलाना और ब्रिज कोर्स तैयार करना। बीते 3 सालों में प्राइमरी स्तर पर 2,000 से भी अधिक आवासीय स्कूल खोले गए। लड़कियों के लिए 31,000 आदर्श स्कूल भी बने। लेकिन मराठवाड़ा जैसे इलाकों से पलायन करने वाले बच्चे शिक्षा की मुख्यधारा से नहीं जुड़ सके।
पलायन, समाज की भीतरी परतों से जुड़ा है। विकास की असंतुलित रतार के कारण यह समस्या विकराल हो चुकी है। इसे रोजगार के स्थायी साधन और भूमि सुधार की नीतियों की मदद से रोकना होगा। जब तक इंसान की मूलभूत जरूरत पूरी नहीं होगी तब तक बच्चों के भविष्य पर संकट के बादल मडराते रहेंगे।

26.5.09

एक बस्ती का नाम था वटवा

शिरीष खरे

अहमदाबाद। नहीं, यह कोई पहली बार नहीं हो रहा है.

लेकिन वटवा की सुल्ताना बानो के मन में एक ही सवाल बार-बार उमड़ता घुमड़ता है कि आखिर छोटी-छोटी खुशियों और सपनों का कत्ल कर के ही शॉपिंग मॉल्स, कॉपलेक्स, अण्डरब्रिज, ओवरब्रिज और सड़कों का जाल क्यों फैलाया जाता है ?
इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है. अब अहमदाबाद मेगासिटी बनने वाला है और मेगासिटी की चमक की सोच-सोच कर अभी से लोगों की आंखें चुंधिया रही हैं लेकिन मेगासिटी की इस चमक ने अपने पीछे एक ऐसा अंधेरा छोड़ना शुरु किया है, जिसमें हज़ारों लोगों की जिंदगी प्रश्नवाचक चिन्ह की तरह गुम हो रही हैं.
अहमदाबाद अपने ठिकाने पर है. लेकिन इसमें रहने वालों को ठिकानों की तलाश हैं. टाऊन प्लानिंग के नक्शे के मुताबिक शहर की तंग गलियों को मुख्य सड़कों से जोड़ने के लिए चौड़ा किया जाएगा. उन गलियों को भी, जहां इसकी जरुरत नहीं है. और अब इसके लिए गरीबों के घर निशाने पर हैं.
वटवा की एक सड़क को 64 फीट चौड़ा करने का फरमान जारी हुआ है. यहां की घनी बस्ती देखने के बाद तो यह फैसला और भी अजीब लगता है. वैसे भी यह सड़क आगे जाकर रेल्वे-स्टेशन पर खत्म हो जाएगी. यहां से स्टेशन आधा घण्टे का रास्ता है. स्टेशन से ही नवापुरा के 84 घर लगे है. सड़क को चौड़ा करने के लिए स्टेशन तो टूटेगा नहीं. इसलिए यह काम स्टेशन तक जाकर रूकेगा और सिर्फ गरीबों के घर ही टूटेंगे. 28 घर टूट चुके है. कुछ घरों में लाल निशान लगे हैं.
टूटने वाले घरों का कुल आंकड़ा कोई नहीं जानता.
2001 की जनगणना के मुताबिक अहमदाबाद में 6 लाख 92 हजार 257 घरों में कुल 49 लाख 70 हजार 200 लोग रहते हैं. इसमें से 8 लाख 714 गरीब हैं. यानी यह कुल आबादी का 26 फीसदी हिस्सा हुआ. शहर के दक्षिण की ओर वार्ड-42 के नाम से दर्ज वटवा में 26,630 घर हैं, जिसमें 1 लाख 21 हजार 725 लोग रहते हैं. 2001 की जनगणना के हवाले से शहर में 10 लाख 71 हजार 11 कामगार हैं जिसमें से 37 हजार 410 वटवा में हैं. शहर में जहां 53 हजार 497 मार्जिनल वकर्स हैं वहीं वटवा में यह संख्या 1 हजार 794 है. इसी तरह शहर के 23 लाख 95 हजार 577 नॉन-वकर्स में से 82 हजार 493 वटवा में हैं.
‘सहयोग’संस्था की शीतल बहन कहती हैं- “ गरीबों के घर एक साथ न तोड़कर धीरे-धीरे तोड़े जा रहे हैं. भारी विरोध से बचने के लिए सरकार ऐसा कर रही है. उसे योजना के बारे में लोगों को बताना चाहिए था. लेकिन वह ऐन वक्त पर अपने पत्ते खोलती है. इस शिकायत को लेकर जब हम चीफ सिटी प्लॉनर के यहां गए तो उन्होंने इस्टेट डिपार्टमेन्ट के पास भेज दिया. इसके बाद इस्टेट डिपार्टमेन्ट ने चीफ सिटी प्लॉनर का पता बता दिया.”
‘चाईल्ड राईटस् एण्ड यू’के प्रवीण सिंह के अनुसार वटवा के विस्थापितों को लेकर असमंजस की स्थिति है. सरकार कहती है कि जिनके पास 1976 से रहने के सबूत हैं उन्हें ही वैकिल्पक व्यवस्था मिलेगी. लेकिन ज्यादातर गरीबों के पास 33 साल पुराने सबूत नहीं हैं.
आग जल रही है
वटवा में ज्यादातर ऐसे परिवार रहते हैं, जिन्हें 2002 के दंगों में अपने घर खोने पड़े थे. इन दंगों का सबसे ज्यादा हर्जाना अल्पसंख्यकों ने चुकाया था. इन्होंने किसी तरह अपनी जान तो बचा ली थी लेकिन दंगाइयों द्वारा लगाई गई आग से अपना घर और उसमें रखा सामान नहीं बचा पाए थे. यह आग उनके पहचान के जरूरी कागजात भी जला गई थी.
घरों में लगी आग तो बुझ गई लेकिन नफरत की एक आग उस दंगे के बाद से आज तक भड़क रही है. 2002 से ही वटवा के लोगों को “भारतीय” होने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. उन्हें “गद्दार”, “खतरनाक” और “पराए” जैसे विशेषण दे दिए गए हैं. यहां की हर गली, चौराहा और बाजार अब बदनाम है. यही कारण है कि अघोषित तौर पर वटवा विकास योजनाओं से बेदखल ही रहा है.
जब सबकी नजरों से वटवा उतरा तब बिल्डरों की आंखों में यह चढ़ा. उन्होंने यहां नाजायाज तौर पर मकान बनाए और यही के अल्पसंख्यकों को बेच दिए. पूरा कंस्ट्रेक्शन अवैध तरीके से हुआ, इसलिए यहां के लोगों ने जो मकान खरीदे वह उनके नाम पर नहीं हुए. इन्हें अपने मकान से कभी भी निकाला जा सकता है. इसके बदले में कोई राहत भी नहीं मिलेगी. क्योंकि अवैध मकानों में पानी और बिजली मुहैया कराना सरकार का काम नहीं होता इसलिए यह काम भी बिल्डर ही पूरा करते हैं. जाहिर है, आधा तीतर-आधा बटेर की तरह बिल्डर ने घर बनाए लेकिन उनमें न नाली बनाई, न पानी की कोई व्यवस्था की.
सपनों का कत्ल
वटवा की सुल्ताना बानो ने अपनी उम्र के 50 में से 20 साल यहीं गुजरे हैं. 12वीं कक्षा तक पढ़ी-लिखी सुल्ताना बानो आंगनबाड़ी चलाती हैं. लेकिन 4 सदस्यों वाले उनके परिवार की मासिक आमदनी 4,000 से ज्यादा नहीं है. ऊपर से वटवा में अतिक्रमण के नाम पर मची तोड़फोड़ ने उनकी नींद उड़ा दी है. वे कहती हैं- “ हम अपने घर का टैक्स देते रहे हैं. आज उसे छोड़ने के लिए कहा जा रहा है. लेकिन नई जगह जाने के पहले हमारी तरक्की माटी में मिल जाएगी.”
अफसाना बानो के भी 38 में से 18 साल यहीं गुजरे. वह सातवीं कक्षा तक पढ़-लिखकर भी नहीं जानती कि उनका परिवार कुल कितना कमाता है. लेकिन 6 महीने पहले उसने एक अफसर से लाल निशान लगाए जाने की वजह जाननी चाही थी. अफसर ने कुछ नहीं कहा.
अफसाना को आज तक एक भी जबावदार अफसर नहीं मिला. उसके शौहर मोहम्मद शेख ने कहा- “अगर गरीब से उसका आशियाना छीनकर तरक्की आएगी तो वह हमें मंजूर नहीं. कही दूसरा ठिकाना मिल भी जाए तो हमारा नुकसान कम नहीं होगा. फिर भी हम हर रोज नए ठिकाने की फ्रिक में डूबे रहते हैं.”
कुल 32.82 वर्ग किलोमीटर में फैले वटवा के कई परिवार 20-25 साल से यहां रहते आए हैं. लेकिन कई लोग हैं, जिनके पास निवास प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं है. हालत ये है कि इनमें से कई लोग यह सबूत जुटाने की कोशिश भी नहीं करते. इन्हें डर है कि ऑफिस में बैठे लोग उनकी नागरिकता पर ही शक न करने लगें!
नवापुरा में अब तक 15 परिवारों को नोटिस मिले हैं. 35 साल के संतोष कुमार यहीं पले-बढ़े हैं. अगर उसकी रोज की मेहनत को महीने में जोड़ा जाए तो वह 5,000 पहुंचती है. इसी से उनका 8 सदस्यों वाला परिवार चलता है. लेकिन अक्टूबर में उसके घर पर भी लाल निशान लग गया.
संतोष के हिस्से अब भविष्य की चिंताएं हैं- “अचानक मिली इस खबर ने जिंदगी अस्त-व्यस्त कर डाली. कुछ लोग तो दहशत के मारे अपने-अपने घर तोड़ने भी लगे हैं. उन्हें लगता हैं कि वक्त रहते ऐसा नहीं किया तो बाद में ज्यादा नुकसान होगा.”
इन घरों के साथ उन स्मृतियों पर भी हथौड़े चलेंगे, जिन्हें एक पीढ़ी ने जाने कब से अपने पास संजो कर रखा था. किसी घर की दीवार सालगिरह पर बनी थी तो किसी की छत शादी पर पक्की हुई थी. अब दीवारों से जुड़ी छतों का कोई भरोसा नही रहा. भीड़ वाली गलियां कभी भी गुम हो सकती हैं.
हालांकि लोगों ने उम्मीद नहीं छोड़ी है. बस्ती को इस बदहाली से बचाने के लिए लोगों ने ‘नवजीवन महिला मंच’ बनाया है. मंच की अध्यक्ष शहजाद बहन का हौसला देखते ही बनता है- “ हम लोगों की पहचान साबित करने के लिए रिकार्ड जमा कर रहे हैं. इसके लिए वटवा में 28 पॉकेट के 4,868 परिवारों का स्लम नेटवर्क तैयार हुआ है. इस नेटवर्क से अब 13 पॉकेट के 3,834 परिवार और जुड़ेगे.”
घर अब प्रापर्टी है
अहमदाबाद भी मंदी की चपेट में हैं. यहां जमीन और घरों की कीमत घटी है. लेकिन झुग्गियों को तोड़कर निर्माण कार्य जारी है. एक तरफ गरीबों को जमीनों से हटाया जा रहा है और दूसरी तरफ अमीरों को फ्लैट देने के लिए बिल्डर अपने ब्रोशर में 10-15 फीसदी की कमी कर रहे हैं.
प्रहलाद नगर में जिस फ्लैट की कीमत 2,800 रूपए वर्ग फीट थी, वही अब 2,300 रूपए वर्ग फीट में मिल रहा है. चांदखेडा में यह गिरावट 2,000 से 1,600, बोडकदेव में 3,400 से 2,800 और वेजलपुर में 3,500 से 3,000 रूपए वर्ग फीट तक आ गई है. फिर बिल्डरों के लुभावने नारे तो हैं ही.
चमचमाती गाड़ियों में घुमने वाले बिल्डरशाही को ही शहरी विकास का नाम दे रहे हैं. घर उनके लिए ‘रहने’की जगह नहीं बल्कि अब ‘प्रापर्टी’ है. गरीबों के तबाही की वजह भी यही से शुरू होती है.
दूसरी तरफ मेगासिटी में अपना मुनाफा देखने वाला तबका विस्थापितों के विरोध को ठीक नहीं मानता. वह कहता है कि इससे शहर की शांति और व्यवस्था भंग होती है. सरकार झुग्गी बस्तियां तोड़ने के लिए पुलिस को आगे करती है और कारपोरेट की ताकतें ऐसी खबर को बेखबर बनाती हैं. लोकतंत्र में गरीबी हटायी जाती है और बाजार गरीबों को.
साभार : रविवार.कॉम से
लिंक :
http://raviwar.com/news/161_vatva-encroachment-shirish-khare.shtml

15.5.09

कच्ची उम्र के खट्टे-मीठे अनुभव



फिल्म : कैरी
अवधि : 96 मिनिट
निर्देशक : अमोल पालेकर
कलाकार : योगिता देशमुख, शिल्पा नवलकर, मोहन गोखले और लीना भागवत
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यह फिल्म इंसानी रिश्तों का मार्मिक ताना-बाना है. जो सीधी-साधी कहानी को सहज ढ़ंग से कहती है. इसमें संगीत और कैमरे के जरिए दृश्यों को खूबसूरत रंग-रुप दिया गया है. हर दृश्य बीती यादों का फ्रेम दिखता है. हर कलाकार आसपास का आदमी लगता है. इसलिए फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शक कुछ देर के लिए कुछ सोचता है. वह कुर्सी से तुरंत नहीं उठता पाता.
यह तानी मौसी और उसकी नन्ही भांजी की कहानी है. इस कहानी में 10 साल की बच्ची अपने मां-बाप के मरने पर श्रीपू मामा के साथ तानी मौसी के घर आती है. तानी की कोई संतान नहीं है. वह बच्ची को हर खुशी देने का भरोसा देती है. लेकिन वह खुद खुशियों से दूर है. तानी के पति भाऊराव को उसकी जरा भी फ्रिक नहीं. भाऊराव और घर की नौकरानी तुलसा का नाजायज रिश्ता है. तुलसा भी भाऊराव की आड़ से मालकिन को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं चूकती. इन हालातों से परेशान तानी जिदंगी को अपने हाल पर छोड़ देती है. लेकिन भांजी के आने के बाद वह फिर से जीना चाहती है.
यह मराठी के लोकप्रिय लेखक जी. ए. कुलकर्णी की कहानी है. इसे अमोल पालेकर ने फिल्म ‘कैरी’ में पेश किया. यहां ‘कैरी’ का मतलब एक बच्ची के बड़े बनने के अनुभवों से है. इसमें एक औरत के जीने की तमन्ना को भी पंख लगे हुए हैं. तानी एक घरेलू औरत है. वह घर की चार दीवारी के हर सुख और दुख से खुश है. तानी अपनी भांजी को सुरक्षा और ममता का ऐसा आंचल देना चाहती है जिससे उसका बचपन बचा रहे. तानी अपने बचपन की उम्मीदों को ताजा करना चाहती है. वह प्यार के इस एहसास को संवारना चाहती है. वह पूरे जोश से मासूम बच्ची की एक-एक चाहत को बचाना चाहती है. तानी ने अपनी जिंदगी पर होने वाले अत्याचारों पर चुप्पी साध ली है. लेकिन वह बच्ची को लेकर उठने वाली छोटी अंगुली को बर्दाश्त नहीं कर सकती. ऐसी किसी आशंका की आहट सुनते ही वह समाज के तयशुदा पैमानों के खिलाफ बोलने लगती है. उस वक्त एक औरत के अंदर की ताकत का पता चलता है.
लेकिन तानी अपने पति की मार से टूट जाती है. बच्ची के मन पर बिखरते हुए घर का असर न पड़े इसलिए तानी उसे श्रीपू मामा को लौटा देती है. विदाई के समय तानी मौसी अपनी भांजी से आसपास देखने, पूछने और जानने की बातें कहती हैं. कहते हैं कच्ची उम्र की खट्टी-मीठी घटनाओं का असर उम्र भर रहता है. बच्ची ने तानी मौसी की आंखों में एक सुंदर कल की झलक देखी थी. उसने तानी मौसी की गर्म गोद से हौसला पाया था. उसके मन में तानी मौसी के होने का एहसास बना रहा. उसने तानी मौसी की नर्म अंगुलियों से मर्दों की दुनिया में आगे बढ़ने का रास्ता ढ़ूढ़ लिया. आखिरकार तानी मौसी के व्यक्तित्व के असर ने उस बच्ची को बड़ी लेखिका बना दिया.
इस फिल्म को एक कहानी की तरह ज्यों का त्यों रख दिया गया है. इससे एक पाठक की तरह दर्शक को भी अपनी तरह से सोचने और समझने का मौका मिलता है. अंत में संदेश देने की औपचारिकता से फिल्म अपना असर खो सकती थी.

10.5.09

कोई सूरत नजर नहीं आती

शिरीष खरे
सूरत। इस पहेली से मुझे बचपन की पहेलियां याद आ गईं। उन पहेलियों के आखिरी में लिखा होता था- ‘‘बूझो तो जानें.’’ सारी पहेलियां इतनी सीधी लगती थीं कि बार-बार धोखा खाता और उल्टा जबाव दे देता. आज की पहेली वैसी ही है. वह दिखती जितनी सीधी है, है उतनी ही उल्टी. पहेली शुरू होती है ‘सूरत नगर-निगम’ के एक ख्याल से. निगम ने कहा था कि शहर में एक भी झुग्गी नहीं दिखेगी.
ऐसा ‘जेएनएनयूआरएम’ योजना के जरिए होना था. निगम ने अमरौली के पास बनी राजीवनगर झोपड़पट्टी के लोगों के लिए कोसड में 42,000 फ्लेट बनाए. लेकिन अब यह लोग वह फ्लेट नहीं ले सकते. चलिए पहेली को समझने के लिए उसकी परतों में चलते हैं.
निगम के अफसरों की सुने तो पहेली सीधी ही है. इसे राजीवनगर झोपड़पट्टी के लोग चुटकी में सुलझा सकते हैं. लेकिन राजीवनगर झोपड़पट्टी के लोग कहते हैं कि अफसरों की जिद के आगे सभी नतमस्तक हैं. निगम ने इनके लिए फ्लेट बनवाए और अब यही लोग कागजों की भूल-भुलैया में गोते खा रहे हैं. आप कहेंगे कि कागजात देकर बाहर निकला जा सकता है. लेकिन यह इतना आसान नहीं है. आमतौर पर ऐसी बस्तियों के लोग नहीं जानते कि एक दिन उनके घर टूटेंगे. एक दिन उनसे यहां रहने के सबूत मांगे जाएंगे. इसलिए वह कागजों को इकट्ठा नहीं कर पाते. ऐसी बस्तियों के लोग किस कागज के टुकड़े का क्या मतलब है, यह भी नहीं जानते. राजीवनगर का भी यही हाल है. अफसरों को जो कागज चाहिए उनमें से कुछ कागज यहां के ज्यादातर रहवासियों के पास नहीं हैं. यह रहवासी अफसरों को अपनी झुग्गी दिखाना चाहते हैं. लेकिन अफसरों को तो झुग्गी में रहने का कागज ही देखना है. फिलहाल लोगों के घर का हक निगम की फाइलों से काफी दूर है. इस तरह पूरी योजना आफिस-आफिस के खेल में उलझ चुकी है.
राजीवनगर के 1200 में से सिर्फ 94 परिवार ही रहने के सबूत दिखा सकते हैं. इसलिए 1106 परिवार कोसड में बने फ्लेट का सपना नहीं देख सकते. सामाजिक कार्यकर्ता माया वालेचा के मुताबिक- ‘‘फ्लेट आंवटन से जुड़े सर्वेक्षणों में भारी अनियमितताएं हुई हैं. कुछ बस्तियों में तीन-तीन बार सर्वेक्षण हुए हैं. कुछ बस्तियों में मुश्किल से एक बार. राजीवनगर में ज्यादातर बाहर से आए मजदूर हैं. यह सूरत में 6-8 महीनों के लिए काम करते हैं. इसके बाद यह अपने गांवों को लौट जाते हैं. इनमें से कई 15-20 सालों से यही रहते हैं.’’ बस्ती के ऐसे ही रहवासी संतोष ठाकुर ने बताया- ‘‘बिजली, पानी और संपत्ति के बिल तो मकान-मालिक के पास होते हैं. हमें स्थानीय निकायों से एक सर्टिफिकेट मिलता है. लेकिन अफसर उसे सबूत ही नहीं मानते. कहते हैं कोई दूसरा कागज लाओ.’’ इसी बस्ती के रहवासी रंजन तिवारी ने बताया- ‘‘हमें हमेशा काम नहीं मिलता. इसलिए काम की तलाश में सुबह जल्दी निकलना होता है. सर्वे ऐसे समय हुआ जब हम बस्ती से दूर थे. हमें कुछ मालूम ही नहीं था. इसलिए हमारे नाम सर्वे से नहीं जुड़ सके.’’
नगर-निगम के डिप्टी कमिशनर महेश सिंह के अनुसार- ‘‘’झुग्गीवासियों को फ्लेट आवंटित करने के लिए एक कमेटी बनी हुई है. अगर किसी को लगता है कि उसके सबूत जायज हैं तो कमेटी के पास जाए.’’ नगर-निगम में स्लम अप-ग्रेडेशन सेल के मुखिया मानते हैं कि सर्वें में कई किरायेदारों के नाम छूट गए हैं. उनकी जगह मकान-मालिकों के नाम जुड़ गए हैं. लेकिन यह मुद्दा तो उसी समय उठाना चाहिए था. स्लम अप-ग्रेडेशन सेल किसी भी गड़बड़ी को रोकने के लिए दो तरह से सर्वे करता है. पहला सर्वे लोकेशेन के आधार पर होता है और दूसरा नामांकन के आधार पर. इसलिए स्लम अप-ग्रेडेशन सेल यह मानता है कि अगर लोकेशन वाली सूची से किराएदार का नाम है. साथ ही उसके पास 2005 के पहले से रहने का सबूत भी है तो उसे फ्लेट मिल जाएगा. अब यह किराएदार की जिम्मेदारी है कि वह कहीं से सबूत लाए.
बस्ती के सेवाजी केवट ने कहा- ‘‘मैंने 8 महीने पहले फ्लेट के लिए आवेदन भरा था. लेकिन अफसरों ने अभी तक चुप्पी साध रखी है. उन्होंने यह नहीं बताया कि मैं फ्लेट के योग्य हूं या नहीं और नहीं हूं तो क्यों ? मैंने पार्षद को भी अपने निवास का सर्टिफिकेट और एप्लीकेशन दिया है. लेकिन मुझसे और कागजातों की मांग की जा रही है. वैसे मेरा नाम बायोमेट्रिक सर्वे से भी जुड़ा है. लेकिन सरकार के ही अलग-अलग सर्वे एक-दूसरे से मेल नहीं खा रहे हैं.’’ इससे कई आशंकाएं पनप रही हैं.
यूं तो घर का मतलब रहने की एक जगह से होना चाहिए. लेकिन बाजार में बदलते शहरों के लिए वह प्रापर्टी भर है. सूरत भी इसी दौर से गुजर रहा है. यहां भी 40 प्रतिशत आबादी के विकास के लिए 60 प्रतिशत आबादी को नजरअंदाज किया जा रहा है. यहां भी पहले घर तोड़ो फिर घर बनाओ की बात हो रही है. लेकिन सवाल तो बस्ती के बदले बस्ती देने का है. घर के आजू-बाजू रास्ते, बत्ती, बालबाड़ी, नल और नालियों से जुड़कर एक बस्ती बनती है. उन्हें खोकर सिर्फ घर पाना नुकसानदायक है. इसलिए घर के आसपास की सुविधाओं का हक भी देना होगा.
सूरत की तरह हर शहर को ‘जीरो स्लम’ बनाने का मतलब भी समझना होगा. सरकार मजदूरों से उनकी बस्तियां उजाड़कर उन्हें बहुमंजिला इमारतों में भेजना चाहती है. इसका मतलब यह हुआ कि वह उन्हें घर के बदले घर दे रही है लेकिन जमीन के बदले जमीन नहीं. वह गरीबों से छीनी इन सारी जमीनों को बिल्डरों में बांट देगी. मतलब यह कि गरीबों को फ्लेट उनकी जमीनों के बदले मिल सकता है. मतलब यह कि गरीबों को मिलने वाला फ्लेट मुफ्त का नहीं होगा. लेकिन बिल्डरों को तो मुफ्त में जमीन मिल जाएगी. यही वजह है कि बिल्डर केवल फ्लेट बनाने पर जोर ही देते हैं. उनके दिल और दिमाग में बालबाड़ी या स्कूल बनाने का ख्याल नहीं आता. जाहिर है बात सिर्फ मुनाफा कमाने की है.
शहर के विकास में शहरवासियों को बराबरी का हिस्सा मिलना जरूरी है. इससे नगर-निगम को शहर की समस्याएं सुलझाने में मदद मिलेगी. लेकिन ऐसा नहीं चलता. दूसरी तरफ शहरी इलाकों में नागरिक संगठनों का सीमित दायरा है. शहर के गरीबों की भागीदारी को उनकी आर्थिक स्थिति के कारण रोका जा रहा है. विकास में सबका हिस्सा नहीं मिलने से गरीबी का फासला बढ़ेगा. एक तरफ गरीबी हटाने की बजाय गरीबों की बस्तियां तोड़ी जा रही हैं. दूसरी तरफ उन्हें नुकसान के अनुपात में बहुत कम राहत मिल पा रही है. तीसरी तरफ मिलने वाली ऐसी राहतों को कागजी औपचारिकताओं में उलझाया जा रहा है. कुल मिलाकर चौतरफा उलझे सूरतवासियों को उम्मीद की कोई सूरत नजर नहीं आती. आज यह घर से निकलकर काम पर जाते है. कल यह काम से लौटकर कहां जाएंगे ?

29.4.09

किसकी मुंबई ?

शिरीष
खरे
मुंबई मेहनतकश मजदूरों की बदौलत चलती है. जिस रोज उन्होंने अपना हाथ रोका, यह शहर भी रूक जाएगा. इतनी अहम हिस्सेदारी होने के बावजूद उनकी जिंदगी मलिन बस्तियों में गुजरती है. क्योंकि देश की पूरी तरक्की खास शहरों को केन्द्र में रखकर हुई इसलिए कई दलित, आदिवासी, मछुआरा, कामगार और कारीगर अपने माहल्लों से उजड़कर यहां आए.
लेकिन अमीर खानदान उन्हें `अतिक्रमणदार´ कहते हैं. ऐसा कहते वक्त गंदगी का एहसास उनके चेहरे पर आकर सिकुड़ जाता है. जबकि सच यह है कि आखा मुंबई पर बिल्डर, ठेकेदार और माफिया के गठजोड़ का राज है.जिन्होंने समुंदर के किनारों और रास्तों को गैरकानूनी तरीके से हथिया लिया है. 10/12 की लाखों झुग्गियां तोड़ने वाली सत्ता का ध्यान इस तरफ नहीं जाता. महाराष्ट्र या बाकी राज्यों से आए गरीब लोग मुंबई के दुश्मन नहीं होते. जिन लोगों की वजह से मुंबई अस्त-व्यस्त आता हैं उनके काले कारनामों पर रोशनी डाली जानी चाहिए.
अट्रीया शापिंग माल महापालिका की जमीन पर बना है. यह 3 एकड़ जमीन 1885 बेघरों को घर और बच्चों को एक स्कूल देने के लिए आवंटित थी. लेकिन बिल्डर ने गरीबों का हक मारकर अपना कारोबार तो खड़ा किया ही कई कानूनों को भी तोड़ा. इसी तर्ज पर हिरानंदानी गार्डन मुंबई में घोटाला का गार्डन बन चुका है. इस केस में शहर के बड़े व्यपारियों को 40 पैसे एकड़ की दर पर 230 एकड़ जमीन को 80 साल के लिए लीज पर दिया गया. ऐसा ही एक और इकरारनामा ओशिवरा की 160 एकड़ जमीन के साथ भी हुआ. इसके अलावा दो और घटनाओं पर गौर कीजिए. पहले जमीन सीलिंग कानून का रद्द होना और उसके बाद कुछ अमीरों का 3000 एकड़ जमीन पर राज चलना. यह दोनों बातें एक-दूसरे से अलग-थलग नहीं बल्कि काफी घुली-मिली लगती हैं.
मुंबई सेन्ट्रल में तैयार हो रहा 60 मंजिला टावर देश का सबसे ऊंचा टावर होगा. जो आप नहीं जानते वह है इससे जुड़ा घोटाला. यह टावर से भी ऊंचा है. सूचना के हक से मिली जानकारी के मुताबिक यहां की जमीन 12.2 मीटर डीपी मार्ग के लिए आरक्षित है. यह काम झोपड़पट्टी पुर्नवास योजना के तहत होना है. साफ है कि टावर के बहाने शहर के अमीर लोगों ने करोड़ रूपए की जमीन घेर ली है. लेकिन इससे भी ज्यादा हेरतअंगेज मामला यह है कि सड़क के ऊपर हुआ इतना बड़ा अतिक्रमण किसी को नजर नहीं आता.
1976 में सरकार ने शहर की खाली जमीन को बचाने और समुदाय की भलाई के लिए `शहरी जमीन कानून´ बनाया था. लेकिन यह कानून मौलिक तौर पर कभी अमल में नहीं लाया गया. लगता है शहरी जमीनदारों ने ही इसका फायदा उठाया है. इसलिए तो कुछ खानदानों ने ऐसी करीब 15000 एकड़ से अधिक जमीन को अपना बना लिया. इसी तरह सार्वजनिक जमीनों का निजी इस्तेमाल भी हो रहा है. जैसा कि नगर योजना विभाग लिखता है कि `मुंबई की जमीन का इस्तेमाल विकास योजना के तहत जाना और माना गया है.´ इसलिए विकास योजना मे उन्हें हर बार गरीब का झोपड़ा ही बाधक लगता है. बार-बार ऐसी बस्तियां ही टूटती हैं.
सूचना के हक से मिले कागजात दर्शाते हैं कि पिछले दो सालों में, महाराष्ट्र शासन ने 60 जगहों के आरक्षण या तो बदलें या काटे. और उनमें से कई प्राइवेट बिल्डरों को ऊंची इमारत बनाने के लिए दिए. पिछले 15 सालों में स्कूल, अस्पताल, गार्डन और ग्राउण्ड के लिए रखी कुल जमीन में से एक-तिहाई ही प्राप्त की है. इसी प्रकार 281 जगहों में से महज 3 सार्वजनिक आवास के लिए, 925 जगहों में से 48 स्कूलों के लिए और 379 जगहों में से केवल 1 अस्पताल के लिए रखी है. बाकी की जमीनों का जिक्र नहीं मिलता है.
सूचना के हक से मिली जानकारी के आधार पर यह जाहिर होता है कि- ``मंडल ने मुंबई की सैकड़ों एकड़ जमीन कुछ गिने-चुने लोगों को सौंपी है. दूसरी तरफ पिछले कई सालों से गरीब के भाड़े की जमीन रूकवाई है. कुछ असरदार लोगों ने भाड़े की नई जगहों को लिया है. उन्होंने पुराने भाड़ों के इकरारनामों को या तो नया बनवाया या बढ़वाया है. मंडल ने करीब 10,000 वर्ग मीटर जगह भाड़े से दी हैं. इसका बाजार भाव सलाना 1700 रूपए प्रति वर्ग मीटर है लेकिन मंडल ने 106 रूपए प्रति वर्ग मीटर से भाड़ा लगाया. इससे उसे कुल 48 करोड़ रूपए का घाटा हुआ.
मुंबई के लोगों ने कपड़ा मीलों को बंद होते देखा है. इस बेकारी के बीच मिलों की जमीनों को बेचा गया. इसमें एक के बाद एक घपले हुए. उनमें से एक घपला 2005 का है जिसमें एनटीसी ने ज्युटीपर मिल को 11 एकड़ जमीन बेची. एनटीसी ने जब जमीन बेचने के लिए भाव मंगवाए तब टेण्डर में घोषित किया था कि एमएसआय करीब 6.4 लाख वर्ग फिट रहेगा. इस आधार पर इण्डियाबुल्स ने 276 करोड़ रूपए लगाए. लेकिन मिल की जमीन लेने पर एमएसआय दुगुना हुआ. कानून के हिसाब से देखा जाए तो `शहरी जमीन कानून की धारा 26´ के मुताबिक जमीन बेचने से पहले मंडल से इजाजत लेनी जरूरी थी. लेकिन यह जमीन बिना इजाजत बेची गई. ऐसे ही घपले कर शहर के बीचोंबीच करीब 600 एकड़ जमीन पर माल, शापिंग काम्लेक्स, बंग्ले और प्राइवेट आफिस बनाए जा रहे हैं. उन्होंने मीठी नदी को भी नहीं छोड़ा. 90 के दशक में व्यापारिक केन्द्र के रूप में बांद्रा-कुर्ला काम्प्लेक्स तैयार हुआ था. यह मंगरू मार्शेस पर बनाया था जो माहिम खाड़ी के पास इस नदी के मुंह पर फैला है. यहां 1992 से 1996 के बीच कई नियमों की अनदेखी करके 730 एकड़ जमीन बनाई गई. आज काम्पलेक्स की जगह लाखों वर्ग फिट से अधिक फैली हैं जिनमें कई प्राइवेट बैंक और शापिंग माल्स बस गए हैं. इन बिल्डरों ने फेरीवालों की जमीनों पर कब्जा किया. मलबार हिल की जो जगह महापालिका थोक बाजार के लिए आरक्षित थी उसे छोटे व्यपारियों से छीन लिया गया है.

28.4.09

कहां है पारधी ?

शिरीष खरे
पारधी
एक बंजारा जमात का नाम है. उसके माथे पर जन्मजात गुनहगार होने का कलंक लगा है. उसे अपनी पहचान बदलने के लिए मौका चाहिए. देश चुनाव से बनता है. लोग वोट से अपनी किस्मत बदलते है. फिलहाल चुनाव-2009 की हवा है. लेकिन पारधी जैसे बंजारा लोग नहीं दिखते. वह मराठवाड़ा के जंगलों में भटक रहे हैं. यहां कुल वोटर में से करीब 3 प्रतिशत बंजारा है. लेकिन आजादी के 62 सालों के बाद भी कई बंजारों के नाम वोटरलिस्ट से नहीं जुड़ सके हैं. इसलिए कोई भी पार्टी या नेता उनके पास क्यों जाएगा ?
पारधी याने मिथ, इतिहास और परंपराओं में जकड़ी एक ऐसी जमात जिसे अंग्रेजों ने ‘अपराधिक जनजाति अधिनियम 1871’ के तहत सूचीबद्ध किया था. अंग्रेज चले गए लेकिन धारणाएं नहीं गईं. तभी तो पारधी लोग गांव से बेदखल हैं. इसलिए उन्हें अपने बुनियादी हक नहीं मिल सके हैं. इसीलिए उनके हिस्से में घर, बिजली, पानी, राशन, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं हैं.
पारधी पारध शब्द से बना. पारध का मतलब शिकार से हुआ. इस तरह पारधी याने शिकार करने वाला. पारधी भी कई तरह के होते हैं. जैसे राज, बाघरी, गाय, हिरन शिकारी और गांव पारधी. राजा के पास जो शिकार करने वाला विशेषज्ञ था वह राज पारधी कहलाया. जब राजा बोलता कि मुझे बाघ पर सवार होना है तो बाघरी पारधी बाघ पकड़ता और उसे पालतू बनाता. एक तो बाघ को जिंदा पकड़ना और उसे लाकर पालतू बनाना बहुत मुश्किल काम होता है.
गाय पारधी का मुख्य वाहन गाय है. आज भी हर परिवार के पास एक गाय होना जरूरी है. यह गाय प्रशिक्षित होती है. यह पारधी के शिकार के धंधे की मां होती है. इसलिए पारधी गाय का मांस नहीं खाता. एक पारधी के लिए हिरन के पीछे दौड़कर मारना मुश्किल होता है. इसमें वह गाय की मदद लेता है. वह ऐसी गाय बाजार से खरीदने की बजाय अपनी ही गाय से पाता है. हिरन के शिकार के वक्त जब गाय चरती हुई आगे बढ़ती है तब उसके पीछे पारधी छिपा आता है. हिरन के पास आते ही पारधी उसके ऊपर अचानक छलांग मारता है. पारधी की गाय शिकार की सारी शैलियां जानती है.
उसकी गाय इतनी सीखी होती है कि शरीर के जिस हिस्से में हाथ रखो तो वह समझ जाती है क्या करना है. कहते हैं कि पारधी पंछियों की बोली भी खूब जानता है. जैसे पारधी के तीतर जब दूसरे तीतरों को गाली देते हैं तब जंगल के कई तीतर लड़ने के लिए आते हैं. लेकिन वह बीच में लगे जाल में फंस जाते हैं. इस तरह शिकार के और भी कई ढ़ंग हैं.
पारधी शिकार के बारे में सबसे ज्यादा जानकारी रखने वाली जमात है. वह दुनिया की सबसे ईमानदार जमातों में से एक है. इसलिए वह राजा के सुरक्षा सलाहकार भी बनते थे. जिसे आज की जुबान में एनएसजी कमाण्डो कह सकते हैं. आज भी एक पारधी गांव के 25 से 50 खेतों की रखवाली करता है. सारे पारधी मिलकर एक-दूसरे के खेतों में नहीं जाने का उसूल बनाते हैं. किसी के खेत में चोरी हुई तो उस खेत का पारधी नुकसान की भरपाई करता है. वह अपने खुफिया नेटवर्क से चोरी का पता लगा लेता है. इस मामले को जाति पंचायत में उठाता है.
गांव के पारधी को रखवाली के बदले सलाना अनाज मिलता है. इस लिहाज से पारधी गांव की अर्थव्यवस्था में अहम कड़ी है. पारधी का रहन-सहन उसके धंधे के मुताबिक होता है. वह कमर में छोटी और कसी हुई धोती पहनता है. उसकी छाती पर कई पाकेट वाली बण्डी और सिर पर रंग-बिरंगी पगड़ी होती है. इनका पहनावा ऐसा होता है कि दौड़-भाग करने पर आवाज नहीं आए.
क्योंकि पारधी जमात नागरिकों की रखवाली का काम करती है. इसलिए उसने गुलामी के खिलाफ पहली उग्र प्रतिक्रिया भी दी थी. मराठवाड़ा के पारधियों ने पहले निजाम और फिर अंग्रेजों से कई लड़ाईयां लड़ी. पारधियों की वीरता के हिस्से स्थानीय जनता की जुबान पर हैं. अंग्रेज जब पारधियों की छापामार और बार-बार के हमलों से परेशान हो गए तो उन्होंने इस जमात को ‘गुनहगार’ घोषित कर दिया. उन्होंने ‘अपराधिक जनजाति अधिनियम 1871’ के तहत सभी पारधियों को गुनहगार कह डाला. 1947 को आजादी आयी और अपनी सरकार का पुलिस विभाग बना. लेकिन तरीका अंग्रेजों के जमाने का ही चला.
1924 को देश में 52 गुनहगार बसाहट बनाये गए थे. महाराष्ट्र के शोलापुर में सबसे बड़ी गुनहगार बसाहट बनी. इसमें तार के भीतर कैदियों को रखा जाता था. 1949 को बाल साहेब खेर और उनके साथियों ने शोलापुर सेटलमेंट का तार तोड़ डाला. 1952 को डा. बी. आर. अंबेडकर ने गुनहगार घोषित करने वाले कानून को रद्द किया. 1960 को जवाहरलाल नेहरू ने शोलापुर दौरा किया. लेकिन यहां आज भी चोरी हुई तो पुलिस सबसे पहले पारधी को ही पकड़ती है. इसलिए यहां सबसे पहला सवाल उनकी पहचान को लेकर हाजिर है.
देखा जाए तो पारधी चोर नहीं इंसान है. अगर वह चोर है भी तो उन्हें चोरी के दलदल से बाहर निकालना होगा. इसमें समाज और पुलिस की भूमिका अहम हो सकती है. लेकिन समाज और पुलिस की व्यवस्था उसे चोर से ज्यादा कुछ नहीं मानती. पहली जरूरत उनके भीतर के डर को खत्म करना है. इसके लिए आपसी एकता, कानून और वोट को हथियार बनाना होगा. तभी जमीन और आजीविका का हक मिलेगा.
एक शिक्षित और जागरूक समाज ही व्यवस्था की खामियों के खिलाफ लड़ सकता है. इसलिए पारधी जमात के बच्चों को एक सपना देना होगा कि पुलिस या समाज तुम्हारे पीछे नहीं है. वह तुम्हारे साथ-साथ है. ऐसा सपना देखने वाले बच्चों को स्कूलों में तैयार करना होगा. उनकी खेल, सांस्कृतिक और बौद्धिक प्रतिभाओं को मौका देना होगा. दरअसल पारधी जमात की पहचान उन्हें कुशल बनाकर ही बदली जा सकती है.
चुनाव सबकी भागीदारी का संदेश देता है. लेकिन कई बंजारों को वोट डालने की इजाजत नहीं देता. सत्ता के विकेन्द्रीकरण और पुलिस सुधारों की बातें तो होती है. लेकिन पारधियों के ऊपर होने वाली बर्बरताएं नहीं गूंजती. चुनाव के बाद बहुत सारे मुद्दों को भुला दिया जाता है. लेकिन पारधियों की परेशानियों को तो चुनाव में भी याद नहीं किया जाता. इसलिए चुनने की आजादी का हक पाए बगैर पारधियों की हर लड़ाई अधूरी ही रहेगी.
साभार : विस्फोट.कॉम
लिंक : http://www.visfot.com/index.php/story_of_india/875.html

22.4.09

आपका वोट और बच्चों की जीत

शिरीष खरे
यह चुनाव का वक्त है और हर पार्टी का उम्मीदवार वोटर को अपनी तरफ खींचना चाहता है. लेकिन बच्चों से जुड़ा एक भी नारा नहीं गूंजता. ऐसे में चाईल्ड राईटस् एण्ड यू याने क्राई ने बच्चों के हक को मुद्दा बनाया है. क्राई ने बच्चों के हक के लिए चार्टर तैयार किया है. इस चार्टर में बच्चों की शिक्षा पर जीडीपी का 10 प्रतिशत और स्वास्थ्य पर 7 प्रतिशत हिस्सा खर्च करने की मांग हुई है.
लोकतंत्र है तो चुनाव है और चुनाव है तो वोट. किसी पार्टी की ताकत उसका वोट-बैलेंस है. हर पार्टी का एजेंडा उसके वोट-बैलेंस के घटने-बढ़ने में खास भूमिका निभाता है. लेकिन बच्चे 18 साल के नहीं होते इसलिए वोट नहीं देते. इसलिए एक भी पार्टी को इस 40 करोड़ आबादी की फ्रिक नहीं रहती. इस बार क्राई ने आपके वोट से बच्चों के जीत की उम्मीद जतायी है. संस्था की इला डी हुक्कू ने बताया- ‘‘हम और हमारे सहयोगी चुनाव के उम्मीदवारों से सीधा संपर्क कर रहे हैं. हम उन्हें इस चार्टर के बारे में बता रहे हैं. हम यह भी देख रहे हैं कि उम्मीदवारों के पास बच्चों के मुद्दे हैं भी या नहीं.’’
क्राई के ही दीपांकर मजूमदार ने कहा- ‘‘हम चाहे उम्मीदवार बने या मतदाता, हमारी जिम्मेदारी है कि हम देश की एक चौथाई आबादी के मुद्दों को पोलिटिकल एजेंडों में शामिल करें. इस तरह बच्चों को उनके बचपन से जुड़े सभी हक मिल सकेंगे.’’
क्राई मानता है कि हर साल 1,000 शिशुओं में से 70 की मौत हो जाती है. 5 साल से कम उम्र का हर दूसरा बच्चा कुपोषण का शिकार बन रहा है. 52 प्रतिशत बच्चों के नाम स्कूलों से गायब हैं. बच्चों के हितों का प्रतिनिधित्व बच्चों की बजाय बड़ों के हाथों में होता है. इसलिए आपका वोट बच्चों की आवाज बुलंद कर सकता है. आपका एक फैसला बच्चों को स्कूलों का रास्ता दिखा सकता है. वह अपनी पढ़ाई पूरी कर सकते हैं. उन्हें सम्मान से जीने का वादा मिल सकता है. उन्हें श्रम, शोषण और तस्करी से छुटकारा मिल सकता है. इस तरह आप बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, सुरक्षा, भोजन और खेलने का हक पाने में मददगार बन सकते हैं.
बाल हक चार्टर में
बच्चा होने की एक ही परिभाषा हो. इसमें 18 साल से कम उम्र के सभी लोगों को बच्चा माना जाए. इससे बच्चों पर असर डालने वाली सभी नीतियों और कानूनों में असंतुलन नहीं रहेगा. बच्चों की शिक्षा पर जीडीपी का 10 प्रतिशत और स्वास्थ्य पर 7 प्रतिशत हिस्सा खर्च हो. 6 से 18 साल तक के बच्चों को पड़ोस के स्कूलों में दाखिला मिले. 6 साल से कम उम्र के बच्चों को आंगनवाडी की सुविधा हो. बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का हक देने वाले बिल में जरूरी फेरबदल हो. इससे बच्चों की शिक्षा की मूल भावना साकार हो सकेगी. शिक्षा में निजीकरण बंद हो. सभी प्राइमरी स्कूलों में बेहतर गुणवत्ता का मिड-डे-मिल दिया जाए. इसमें स्कूल न जाने वाले बच्चों को भी जोड़ना होगा. इसे पूरे साल चलाया जाए.
कृषि सहित सभी क्षेत्रों में हर प्रकार की बाल-मजदूरी को पूरी तरह रोका जाए. बाल-मजदूरों और कामकाजी बच्चों को औपचारिक शिक्षा में लाया जाए. घरों में काम-काज और बच्चों की देखभाल करने वाली लड़कियों पर खास ध्यान दिया जाए. नेशनल चाईल्ड पोलिसी (1974) की दोबारा समीक्षा की जाए. संविधान और संयुक्त राष्ट्र के बाल हक कन्वेंशन के मुताबिक इसका दायरा बढ़ाया जाए. भोजन की सुरक्षा और उसके अधिकारों की बात करने वाली नीति लागू हो. ऐसे कानून बनाए जाएं जिससे कोई बच्चा कुपोषण का शिकार न बने. गरीबी रेखा को तय करने वाले पैमानों पर दोबारा सोचा जाए. पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम में गरीबों को अनाज देने वाले पैमानों पर भी दोबारा सोचा जाए. बच्चों के यौन शोषण और उनकी तस्करी रोकने के लिए असरदार कानून हो. विकलांग बच्चों को भी बराबरी से जीने के मौके मिलें.
बाल हक से जुड़े मुद्दे
विस्थापन बच्चों के विकास को रोकता है। इससे शोषण की आशंकाएं पनपती हैं. इसलिए कमजोर तबकों का विस्थापन और असंतुलित विकास को रोका जाए. कमजोर तबकों की जमीन बचाने के लिए सेज एक्ट-2005 में बदलाव हो. पुनर्वास की बेहतर नीति बनायी जाए. शहरी गरीबों के लिए आवास का हक कारगर ढ़ंग से लागू करने के लिए जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन का फिर से गठन किया जाए. इसमें निजीकरण पर जोर देने की बजाए सरकार को विकास की जबावदारी खुद लेनी होगी.
भूमि सुधार की ऐसी नीतियां अपनायी जाएं जिससे माईग्रेशन रूके. इससे बच्चों को अपने समुदाय और क्षेत्रों में ही विकास के मौके मिलेंगे. तटीय इलाकों के रहवासियों के पंरपरागत हकों को बचाने के लिए कोस्टल जोन मैनेजमेंट-2006 को हटाया जाए. इसके बदले कोस्टल जोन रेगूलेशन-1991 को अपनाया जाए. जनजातियों को वनों के इस्तेमाल का हक देने के लिए वनवासी एक्ट-2006 को लागू किया जाए. पेट्रोलियम, केमीकल एण्ड पेट्रोकेमीकल इन्वेस्ट एरिया एक्ट-2003 को हटाया जाए. हरेक के लिए घर, रोजगार और समान वेतन तय हो. इससे बच्चों के हक सुरक्षित होंगे. गरीब किसानों के लिए कृषि-नीति पर दोबारा सोचा जाए. असंगठित मजदूरों सहित सभी को सामाजिक सुरक्षा दी जाए. सांप्रदायिकता का विरोध हो और हर हाल में मानवीय हकों को बचाया जाए.
क्राई का नेटवर्क
क्राई का एक बड़ा नेटवर्क होने से इस केम्पेन को बढ़ावा मिल रहा है. क्राई पिछले 30 सालों से गरीब बच्चों और उनके समुदाय से जुड़ा रहा है. यह 18 राज्यों के 5,000 गांव और झुग्गियों में काम कर रहा है. यह लिंग, जाति, आजीविका और विस्थापन की तह तक जाता है. यह भूख, गरीबी, बेकारी, शोषण और अत्याचार से लड़ता है.
क्राई ने 2006-07 को 5,250 गांवो और बस्तियों के 4,97,343 बच्चों के साथ काम किया. क्राई ने समुदाय के साथ बंद पड़े 143 प्राइमरी स्कूलों को दोबारा चालू किया. क्राई ने शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए लगातार जोर दिया. इसका नतीजा है कि 192 प्राइमरी स्कूलों में 1 भी बच्चा ड्रापआउट नहीं हो सका. क्राई ने 317 पंचायत शिक्षा समितियों को सक्रिय बनाया. 22,736 बच्चों को प्राइमरी स्कूलों तक लाकर शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा. इसलिए अबकि चुनाव में बच्चों के हक को मुद्दा बनाते ही क्राई को भरपूर समर्थन मिलने लगा है.

20.4.09

बाल हक के लिए फोटोग्राफी मंच

मुंबई। ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ ने फोटो और उसके पीछे छिपी कहानियों को बाल-हक अभियान से जोड़ने के लिए फोटोग्राफी मंच बनाया है जिसमें इस क्षेत्र के पेशेवर और शौकिया फोटोग्राफर शामिल होंगे. इस दिशा में दिलचस्पी रखने वाले हर फोटोग्राफर को कार्यशाला में आने का मौका मिलेगा. हर चुनिंदा फोटोग्राफ मीडिया सामग्री के लिहाज से अहम होगा. फोटोग्राफी के आधार पर लेख, फीचर और कविताएं लिखे जा सकते हैं. इस तरह फोटोग्राफी को प्रचार योजनाओं का हिस्सा मानकर ज्यादा से ज्यादा असरदार बनाया जा सकेगा.

‘वालिन्टियर विभाग’ की हावोवी वाडिया ने बताया कि- ‘‘हम ऐसे समूह बना रहे हैं जहां लोग अपने फोटाग्राफी के हुनर को बच्चों की स्थिति दर्शाने में इस्तेमाल करें. इसी कोशिश के तहत एक ऑनलाइन फोरम भी बनाया जाएगा. इसमें फोटो और उससे जुड़ी आलोचना, टिप्पणी, शूटिंग के अनुभव और मुद्दों पर बातचीत की जाएगी.’’

फिलहाल देश के 6 पेशेवर फोटोग्राफर सैमित्र भट्टाचार्य, सौमिक कर, राहुल चिटेल्ला, फ्रेडरिकनोरोन्हा, अतुल लोके, विद्या कुलकर्णी और निवेदन मंगलेश ने जरूरी संसाधन जुटाने की जिम्मेदारी ली है. सैमित्र भट्टाचार्य ने बताया कि- ‘‘मैं इस क्षेत्र में काफी वक्त से काम कर रहा हूं लेकिन इस तरह की पहल को कभी होते नहीं देखा. यह मंच शौकिया फोटोग्राफर को भी जगह दे रहा है. इससे जुड़ना सभी के लिए नया अनुभव होगा. जल्दी ही अच्छे नतीजे मिलेंगे. ’’

सौमिक कर के मुताबिक- ‘‘जो बात एक तस्वीर कहती है वह हजार शब्द नहीं कह पाते. कैमरा लोगो के जज्बात को ज्यों का त्यों कैद करता है. वह जन-जन तक पहुंचने का आसान रास्ता भी है. मीडिया के इस हथियार को अलग-अलग ढ़ंग से इस्तेमाल किया जाता है. कई फोटोग्राफर अपने हुनर से अंधियारी सच्चाईयों को रोशन करते हैं. इनमें से कुछ फोटोग्राफर बच्चों की बेहतर दुनिया बनाने में भरोसा रखते होंगे. हमें ऐसे ही दोस्तों की तलाश है.’’

बच्चियों के हक के लिए माइक्रोसाइट


‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ ने बच्चियों के साथ भेदभाव के खिलाफ जागरूकता लाने के लिए cry4girls.cry.org नाम से एक माइक्रो साइट जारी की है. इसके तहत बच्चियों की अपनी पहचान न उभर पाने के पीछे छिपे असली कारणों को सामने लाया जाएगा.




यह साइट बच्चियों को बहन, बेटी, पत्नी या मां के दायरों से बाहर निकलकर उन्हें सामाजिक भागीदारिता के लिए प्रोत्साहित करेगी. इसमें आम लागों के लिए चार्टर तक पहुँचने और ब्लाग पर अपनी कहानी भेजने की सुविधा होगी. साथ ही लेख, कार्यक्रम, अभियान और अन्य गतिविधियों के जरिए अहम जानकारियो भी दी जाएगी.





यह माइक्रोसाइट लिंग-अनुपात में असंतुलन की वजह और बच्चियों के प्रति सामाजिक धारणा को समझने में मदद करेगी. भारत में 6-14 साल तक के सभी बच्चों को निःशुल्क शिक्षा प्राप्त है. इसके बावजदू 51 प्रतिशत लड़िकयां आठवीं कक्षा तक पहुचंते-पहचुंते स्कूल जाना बंद कर देती हैं.




सर्वेक्षणों से निकले ज्यादातर तथ्यों में भी लडक़ों के मुकाबले लड़िकयों की हालत बदतर पायी गई है। ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ से संगीता कपिला ने बताया कि- ‘‘इस गैरबराबरी को बच्चियों की कमी नही बल्कि उनके खिलाफ मौजदू स्थितियों के तौर पर देखा जाना चाहिए. अगर लडक़ी है तो उसे ऐसा ही होने चाहिए, इस प्रकार की बातें उसके सुधार की राह में बाधाएं बनती हैं. यदि हर कोई अपनी लडक़ी को मनमर्जी से जीने की आजादी दे तो उसके जीवन में स्थायी बदलाव लाया जा सकेगा.’’




‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ की उपलब्धियां -




संस्था 2006-07 में 5250 गांवो और बस्तियों के 497,343 बच्चों के साथ जुडी. इस दौरान संस्था ने लोगों के साथ मिलकर बंद पड़े 143 शासकीय प्राइमरी स्कूलों को दोबारा चालू किया. संस्था ने शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए लगातार जोर दिया. इसका नतीजा ही है कि 192 शासकीय प्राइमरी स्कूलों में 1 भी बच्चा ड्रापआउट नहीं हो सका. संस्था ने 317 गांवों की पंचायत शिक्षा समितियों को सक्रिय बनाया और 22,736 बच्चों को प्राइमरी स्कूलों तक लाकर शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा.

9.4.09

रोशनी से रु-ब-रु होती पारधी जमात

शिरीष खरे
बीड़। पारधी लोग घनघोर जंगल में रहते थे। उन्हें रोशनी चाहिए थी। लेकिन दिया नहीं रखते थे। एक आहट मिलते ही डरते कि पुलिस तो नहीं। पारधी लोग गाय के ऊपर गृहस्थी का बोझ लटकाते। चोरी-छिपे भटकते। इस तरह उनकी कई पीढ़ियां गुजरी। उन्हें ‘इंसान’ नहीं ‘चोर’ ही कहा जाता रहा। वह ‘चोर’ हैं या नहीं। और हैं भी तो क्यों-यह किसी ने न जाना। एक रोज इन्हें चोर’ नहीं ‘इंसान’ कहा गया। इन्हें भरोसा न हुआ। धीरे-धीरे होने लगा। तब आसमान, धरती और रास्ते तो जहां के तहां रहे. मगर इनकी दुनिया बदलने लगी।
यह मराठवाड़ा का बीड़ जिला है। यहां ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ और ‘राजार्षि शाहु ग्रामीण विकास’ संस्थाएं सक्रिय हैं। इन दोनों ने मिलकर स्कूल और जमीन के रास्तों से बदलाव लाया है। बदलाव का पहला बीज 21 साल पहले ही गिर चुका था।
एक रोज पाथरड़ी तहसील में चोरी हुई। कई महीने बीते लेकिन चोर का पता नहीं लगा। बीड़ से करीब 100 किलोमीटर दूर आष्टी तहसील के चीखली में रहवसिया पारधी का परिवार ठहरा हुआ था। पुलिस ने उसे ही चोरी के केस में अंदर डाल दिया। इधर रहवसिया को दो महीनों की जेल हुई। उधर उसके परिवार को ऊंची जाति वालों ने जगह छोड़ने के लिए धमकाया। रहवसिया ने बताया- ‘‘परिवार के पास पहुंचते ही मुझे अपने 12 साथियों के साथ रस्सी से बांध दिया। हमें बोला गया कि हम गांव के लिए ‘अपशगुन’ हैं। आग लगाने की बात सुनते ही मैं भाग निकला। 4 किलामीटर दौड़ते हुए संगठन के आफिस पहुंचा। वहां से 7 टेम्पों में करीब 300 कार्यकर्ता नारा लगाते हुए यहां आए। तब ऊंची जाति वाले अपने घरों में ताला लगाकर भागे।’’
आप को लग रहा होगा कि पुलिस या ऊंची जाति वाले बिना वजह ऐसा क्यों करेंगे ? इस बारे में राजार्षि शाहु ग्रामीण विकास’ के बाल्मीक निकालजे ने बताया- ‘‘कभी यह जमात शासन और समाज की व्यवस्था में अहम कड़ी मानी जाती थी। तब यह राजा के शिकारी या खुफिया विभाग में होते थे। युद्धों में इनके राजा हार गए। लेकिन पारधियों ने पहले निजाम और फिर अंगेजों से आखिरी तक हार नहीं मानी। यह देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी साबित हुए। यहां के लोग इसकी कथाएं सुनाते हैं। जब अंग्रेज छापामारी युद्धशैली से परेशान हो गए तो उन्होंने ‘जन्मजाति गुनहगार कानून, 1873’ बनाया और पारधी को ‘गुनहगार जमात’ में रख दिया।’’ 60 साल पहले अंग्रेज चले गए लेकिन धारणाएं नहीं गईं। तभी तो पारधी जमात आज तक गुनहगार बनी हुई है।
इसी धारणा की वजह से ही चीखली के ऊंची जाति वालों ने पारधियों को हटाने के लिए पूरी ताकत का इस्तेमाल किया था। वह तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के पास तक चले गए। लेकिन राजीव गांधी ने दो टूक कह दिया कि पारधी देश के नागरिक हैं और उन्हें हटाया नहीं जा सकता। इसके बाद गांव के दबंगों और पारधियों के बीच 5 साल तक संघर्ष चला। इस बीच पारधी बस्ती में 4 बार हमले हुए। लेकिन कोर्ट में केस पहुंचने के बाद हमले बंद भी हो गए।
दूसरी तरफ पुलिस का अत्याचार जारी रहा। 2002 को राजन गांव में वास्तुक काले की पत्नी विमल खेत में काम कर रही थी। तब इंस्पेक्टर ने आकर बताया कि उसने सोने की पट्टी चुराई है इसलिए थाने चलना होगा। विमल के विरोध करने पर इंस्पेक्टर बोला यह औरत तेज लगती है और सोने की पट्टी इसकी साड़ी के पल्लू में है। आखिरकार आज के दु:शासन ने दोपद्री का पल्लू खीच डाला। 2003 को धिरणी के गोकुल को चोरी के शक में पकड़ लिया। वह जिस सुबह छूटा उसी शाम फांसी लगाकर मर गया। इसे पारधी युवकों की मानसिक स्थिति के तौर पर देखा जाना चाहिए।
'राजार्षि शाहु ग्रामीण विकास’ के सतीश गायकवाड़ ने बताया- ‘‘पुलिस थाने से कचहरी तक कई तरह की मानसिक और आर्थिक उलझनों से गुजरना होता है। इन हालातों से आपराधिक प्रवत्तियां पनपती है। मतलब पहले जो ‘इंसान’ था उसे व्यवस्था ‘चोर’ बनाती है। इसलिए अब यह व्यवस्था का ही फर्ज है कि उसे ‘चोर’ से ‘इंसान’ बनाया जाए। इसके लिए संगठन ने ‘जोर का झटका जोर से’ लगाने की रणनीति अपनायी है।’’ इन दिनों संगठन कानूनी हक और योजनाओं का सहारा ले रहा है। कुछ उदाहरण पेश हैं-
जब सोलेवाड़ी गांव में चोरी हुई तब पुलिस ने तवलबाड़ी के हरन्या और उसके 2 लड़कों को पकड़ लिया। पुलिस 17 किलोमीटर दूर चैभानिम गांव में हरन्या की लड़की नचाबाई के घर भी पहुंची। नचाबाई के विरोध करने पर पुलिस ने मारपीट की जिसमें उसका पैर टूट गया। संगठन ने इंस्पेक्टर एम.यू। कुलकर्णी और उसके साथियों के खिलाफ ‘अत्याचार प्रतिबंधक कानून’ के तहत मुकादमा दायर किया। इसके बाद पुलिस ने माफी मांगी। इसी तरह चीखली से 2 किलामीटर दूर पारगांव के राजेश काले ने अपने खेत से 60 बोर मूंगफलियां उगाई। वह अपना अनाज बेचने करीब 50 किलोमीटर दूर अहमदनगर पहुंचा तो पुलिस ने उस पर छापा मारा। पुलिस की मारपीट से छूटकर 3 लोग भागे और 2 पकड़े गए। इसके जबाव में संगठन ने आंदोलन करते हुए सरकारी विभागों के मंत्रियों के सामने आपत्तियां दर्ज की। वकीलों की मदद से पारधियों को रिहा करवाया गया। आखिरकार पुलिस ने कहा कि वह ठोस सबूत के बिना पारधियों को गिरफ्तार नहीं करेगी।
चीखली में आज 29 पारधी घरों में करीब 300 लोग रहते है। इन्होंने 70 वोटों की ताकत बटोरी है। यह पिछले 15 साल से वोट देते आ रहे हैं। इन्होंने अपने बीच से ही उमेश काले को वार्ड मेम्बर बनाया है। उमेश काले ने बताया- ‘‘हमने थोड़ी-थोड़ी जमीन खरीदी। इससे रहवासी होने के सबूत मिल गए और हमारे नाम वोटरलिस्ट से जुड़ गए। इसलिए आज सभी परिवार बीपीएल और राशनकार्ड की लिस्ट में भी हैं। हम हर पार्टी का दबाव रहता है। लेकिन वोट का फैसला जाति पंचायत में करते हैं। हम अपनी पंचायत में कुछ बुर्जुगों को मुखिया बनाते हैं। उनके सामने एक-एक समस्याएं रखते हैं। जो बात पक्की हुई उसे सामूहिक तौर पर मानते हैं।’’
‘राजार्षि शाहु ग्रामीण विकास’ ने 18 साल पहले पारधी बच्चों को स्कूल में दाखिला लेने के लिए अभियान छेड़ा था। इसका नतीजा यह हुआ कि रविवार भोंसले और बालुंज जिला पंचायत में आडिटर हैं। रविवार का चचेरा भाई रवि भोंसल पुलिस में है। रहवसिया का बड़ा बेटा इमारत भी राज्य परिवहन बस में कण्डेक्टर हो चुका है। नवनाथ काले और सर्विस काले कांस्टेबल हैं। कुल मिलाकर 8 सरकारी नौकरियों में हैं जिसमें से 2 महिलाएं हैं। 1998 में ‘चाईलण्ड राईटस एण्ड यू’ की मदद से चीखली के पारधी बच्चों के लिए ‘गैर औपचारिक केन्द्र’ खोला गया। इसके बच्चे अब 8वीं, 9वीं, 10वीं होते हुए कालेज के दरवाजों पर खड़े हैं।
‘चाईलण्ड राईटस एण्ड यू’ के अनिल जेम्स ने बताया- ‘‘हमारा काम बच्चों को सपना देना और उसे पूरा करने में मददगार बनना है। पारधियों में गजब की बौद्धिक, सांस्कृतिक और खेल प्रतिभाएं हैं। उनकी प्रतिभाओं को विकसित करने की कोशिश चल रही है। पारधियों को कुशल बनाकर ही उनकी पहचान बदली जा सकती है।’’
1995 के बाद संगठन के सहयोग से इस इलाके में 1200 से अधिक पारधियों के लिए कास्ट सर्टिफिकेट बनवाए गए। आज वह खुद ही कास्ट सर्टिफिकेट बनवाते लेते हैं। 2006 में सरकार ने इस इलाके के पारधियों को रोजगार देने के लिए 21 लाख रूपए की योजना बनायी है। इससे उन्हें खाद, खेती, पशुपालन और दुकानों के लिए वित्तीय मदद मिलेगी।
चीखली से लौटते वक्त हसीना काले अपने बच्चों के साथ बाहर आई। उन्होंने अपनी अंगुलिया से बदलाव की गिनती भी सुनाई- ‘‘पहले काम की आदत नहीं थी और अब अपने खेतों से फसल उगाते हैं। पहले घर में चूल्हा नहीं जलता था और अब खाना खुद पकाते हैं। सबके साथ बैठते हैं। एक ही जगह पर रहते हैं। घरों में बिजली जलती है। पुलिस से सीधे बतियाते हैं।’’ उनके साथ खड़े पारधी अभिमन्युओं ने कहा- हम पुलिस के पीछे नहीं भागना चाहते। हम पढ़-लिखकर ऐसा करना हैं कि पुलिस खुद हमें सेल्युट मारे।’’
यहां के पारधी अभिमन्यु अब चक्रव्यूह तोड़ने को बेकरार हैं।

7.4.09

तिरंगा फहराने के जिद की जीत



शिरीष खरे
नागपुर । छोटी-छोटी बातों से जिंदगी बनती है और छोटे-छोटे सिरों से कहानी। यह छोटी-सी कहानी भी एक छोटे-से सिरे से शुरू होती है। लेकिन सबको एक बडे जज्बात से जोडती है। नागपुर की गंगानगर बस्ती में कभी तिरंगा नहीं फहराया था।
२६ जनवरी २००८ को लोगों ने तिरंगा फहराने की सोची। एक मामूली लगने वाले काम की अडचनों को देखते हुए टाल दिया। अगली बार फहराने का कहते हुए भूल गए। लेकिन बच्चों को याद रह गया। जो बच्चे आशाओं की नन्ही-नन्ही नसैनियां लगाकर आकाश पर चढते हैं, उन्हीं में से १२ बच्चों ने साल २००९ की उसी तारीख को आखिरी सिरा जोड दिया। ११ से १४ साल के इन बच्चों ने कौन-सा सिरा, कहां से जोडा, यह जानना भी दिलचस्प होगा।
आपने दो सच को एक साथ और अलग-अलग देखा हैं? यहां एक सच था- काम बेहद आसान है। दूसरा था- काम बेहद मुश्किल है। एक सच ’कहने‘ और दूसरा ’करने‘ से जुडा था। इसलिए एक सच ने दूसरे को बहुत दिनों तक दबाए रखा। लेकिन तीसरा सच भी था कि बच्चों का जज्बा किसी जज्बे से कम नहीं था। इस तीसरे सच ने दूसरे सच को अपने पाले में खीच लिया।
पहला सिरा
जनवरी २००८ की २६ तारीख पहला सिरा बना। इस रोज गंगानगर के लोग झण्डा ऊंचा करने के लिए एक हुए। लेकिन जिस खम्बे से तिरंगा फहराना था, वह टूट गया। लोग बिखर गए और बच्चों के दिल भी टूट गए।
१४ साल की हेमलता नेताम ने याद किया- ‘हमारी ’बाल अधिकार समिति‘ के सभी साथी ’बाल अधिकार भवन‘ में मिले। हमने अपनी बस्ती में तिरंगा फहराने की ठानी।’ इस लिहाज से अगली और अहम तारीख थी १५ अगस्त। बच्चों की बैठक से दो बातें निकली। एक- बस्ती के बडों से चर्चा की जाए। दूसरा- अपने पार्षद को एक एप्लीकेशन दी जाए।
आखिरी सिरे के पहले
११ साल की पूजा भराडे ने याद किया- ‘हमने काम को दूसरों पर छोडा और हार गए। हमें बडों के साथ एप्लीकेशन लिखनी और उन्हें लेकर आगे बढना था। लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा था। जब १५ अगस्त नजदीक आया तो लगा कि झण्डा सिर्फ दिलों में ही फहराकर रह जाएगा। सबकी आंखें १५ से हट गईं। हमारे दिल फिर टूट गए।’ लेकिन १५ की तारीख हार और हिम्मत की तारीख बनी। अगर यह नहीं आती तो २६ जनवरी २००९ जीत की तारीख कैसे बनती!

१५ अगस्त को वार्ड-१२ की पार्षद मीनाताई बरडे ने तिरंगा फहराया। उनके भाषणों से बच्चों के दिलों में देशप्रेम की भावनाएं उमडती थीं। बच्चों ने आजादी के नारे लगाए। फिर सबके सामने मीनाताई से २६ जनवरी के पहले खम्बा और उसका चबूतरा बनाने की मांग रखी।

देखते-देखते नए साल का सूरज उग गया। १२ साल की रोशनी ठाकरे ने याद किया- ‘हमें भी अपनी जिद पकडी। ५ जनवरी को सारे फिर बैठे। यहां दो फैसले हुए। यह पिछले फैसलों से अलग थे। एक तो अपने हाथों से एप्लीकेशन बनाई। दूसरा खुद जाकर पार्षद से मिलने की सोची। यह काम हमें ही करने थे इसलिए पूरे हुए।’

१३ साल के अक्षय नागेश्वर ने याद किया- ‘हमने जिम्मेदारियां बांटी। ८ जनवरी को १२ बच्चे पार्षद के आफिस पहुंचे। लेकिन मीनाताई नहीं मिलीं। हम उदास हुए, निराश नहीं।’
पार्षद से मिलने की दूसरी तारीख ११ जनवरी रखी गई। इस तारीख की सुबह ९ बजे बच्चे ऑफिस पहुंचे। मीनाताई फिर नहीं थीं। लेकिन मैनेजर ईश्वर बरडे मिल गए। बच्चों ने एप्लीकेशन उन्हें ही दे दी और उनसे मीनाताई का मोबाइल नंबर ले लिया।

बच्चों के अगले १० दिन भी इंतजार में गुजरे। अब पानी सिर के ऊपर था। २१ जनवरी को ’बाल अधिकार भवन‘ में तीसरी बैठक रखनी पडी। यहां से बच्चे फिर मीनाताई के ऑफिस पहुंचे। इस बार संबंधित अधिकारी अशोक सिंह का नम्बर मिला। बच्चों ने अशोक सिंह से खम्बा और उसका चबूतरा बनाने की अपनी पुरानी जिद दोहरायी। कुल मिलाकर बात आई और गई हो गई।

१४ साल के मनीष सोनावने ने याद किया- ‘२६ जनवरी नजदीक आया। यह परीक्षा की घडी थी। हम फिर मीनाताई के ऑफिस में गए। वह फिर नहीं मिली। इसलिए उनके घर जाना पडा। मीनाताई ने जब हमारी परेशानियाँ सुनी तो सॉरी कहा। उन्होंने २६ जनवरी के पहले तक खम्बा और उसका चबूतरा बनाने का वादा किया।’

सुबह की तस्वीर
मीनाताई की बातों से उत्साहित बच्चे घर लौटे। २६ जनवरी के एक रोज पहले बच्चे आगे आए। उन्होंने रात के पहले तक खम्बा और उसका चबूतरा बना डाला। जो बच्चे आकाश से पंतगें तोडकर अपनी छतों पर लहराना चाहते हैं, उन्हीं में से १२ ने अपनी बस्ती में पहली बार तिंरगा फहराने की ख़ुशी महसूस की थी। ’बाल अधिकार समिति‘ की नंदनी गायकबाड और उनके साथी नींव के खास पत्थर साबित हुए। नंदनी बोली- ‘अगली सुबह तिरंगा आंखों के सामने लहरा उठा। अब यह खम्बा बच्चों के दृढ संकल्प और समपर्ण का प्रतीक है।’

जब कोई बच्चा पहली बार जूते के बंध बांधता है तो उसके चेहरे की ख़ुशी देखती ही बनती है। एक रोज कुछ नन्हें हाथ मिले तो किसी ने न देखा। लेकिन जब छोटी-सी आशा हकीकत में बदली तो पूरे गंगानगर देखता रह गया।

’बाल अधिकार भवन‘ में बडा फासला मिटाने वाले छोटे-छोटे कदम एक साथ खडे है। हेमलता नेताम, पूजा भराडे, अक्षय नागेश्वर, रोशनी ठाकरे और मनीष सोनावने को एक तस्वीर में कैद किया गया है। तकदीर से बनी यह तस्वीर अब इस कहानी का आखिरी सिरा है। हो सकता है यह अगली कहानी का पहला सिरा बन जाए!!

24.3.09

घर कहां है ?

शिरीष खरे

23 जनवरी 2009 की रात दुनिया के लिये भले एक सामान्य रात रही होगी लेकिन शांतिनगर, मानखुर्द की नूरजहां शेख के लिए नहीं. आखिर इसी रात तो उनके सपनों का कत्ल हुआ था. अपनी सूनी आंखों से खाली जगह को घुरती हुई नूरजहां अभी जहां बैठी हैं, वहां 23 जनवरी से पहले तक 18 गुणा 24 फीट की झोपड़ी थी, जिसमें एक परदा लगा कर कुल दो परिवारों के तेरह लोग रहते थे.

लेकिन एक लोकतांत्रिक देश की याद दिलाने वाले गणतंत्र दिवस के ठीक 3 दिन पहले ही सारे नियम कायदे ताक पर रख कर नूरजहां शेख की बरसों की जमा पूंजी माटी में मिला दी गयी. 26 जनवरी के 3 रोज पहले सरकारी बुलडोजर ने उनकी गृहस्थी को कुचल डाला. अपनी जीवन भर की कमाई को झटके में गंवाने वाली नूरजहां अकेली नहीं थीं. उस रात मानखुर्द की करीब 1800 झुग्गियां उजड़ीं और 5000 लोगों की जमा-पूंजी माटी में मिल गई.

अंबेडकरनगर, भीमनगर, बंजारवाड़ा, इंदिरानगर और शांतिनगर अब केवल नाम भर हैं, जहां कल तक जिंदगी सांस लेती थी. अब इन इलाकों में केवल अपने-अपने घरों की यादें भर शेष हैं, जिनके सहारे जाने कितने सपने देखे गये थे. आज हज़ारों की संख्या में लोग खुले आकाश के नीचे अपनी रात गुजार रहे हैं. यह बच्चों की परीक्षाओं के दिन हैं लेकिन शासन ने पानी के पाइप और बिजली के खम्बों तक को उखाड़ डाला. इस तरह आने वाले कल के कई सपनों की बत्तियां अभी से बुझा दी गईं.

ताक पर कानून

प्रदेश का कानून कहता है कि 1995 से पहले की झुग्गियां नहीं तोड़ी जाए. अनपढ़ नूरजहां शेख के हाथों में अंग्रेजी का लिखा सरकारी सबूत था. उसे पढ़े-लिखे बाबूओं पर पूरा भरोसा भी था. लेकिन शासन ने बिना बताए ही उसके जैसी हजारों झुग्गियां गिरा दी. नूरजहां की पूरी जिदंगी मामूली जरूरतों को पूरा करने में ही गुजरी है. अपनी उम्र के 50 में से 27 साल उसने मुंबई में ही बिताए. वह अपने शौहर युसुफ शेख के साथ कलकत्ता से यहां आई थी. दोनों 9 सालों तक किराए के मकानों को बदल-बदल कर रहते रहे.

नूरजहां अपने शौहर पर इस कदर निर्भर थीं कि उन्हें मकान का किराया तक मालूम नहीं रहता था. 1995 में युसुफ शेख को बंग्लादेशी होने के शक में गिरफ्तार किया गया. जांच के बाद वह भारतीय निकला. पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में उसके इस बस्ती में रहने का उल्लेख किया.

युसुफ शेख जरी कारखाने में काम करते हुए समय के पहले बूढ़ा हुआ और गुजर गया. तब नूरजहां की जिंदगी से किराए का मकान भी छिन गया. कुछ लोग समुद्र की इस दलदली जगह पर बसे थे. 18 साल पहले नूरजहां भी अपने 6 बच्चों के साथ यही आ गईं.

नूरजहां का पहला बेटा शादी करके अलग हुआ मगर दूसरा उसके साथ है. वह जरी का काम करता है और 1500 रूपए महीने में घर चलाने की भारी जिम्मेदारी निभाता है. उससे छोटी 2 बहिनों ने दसवीं तक पढ़कर छोड़ दिया. आर्थिक तंगी से जूझता नूरजहां का परिवार अब बेहतर कल की उम्मीद भूल बैठा है.

मुश्किल भरे दिन

उस रोज जब 1 बुलडोजर के साथ 10 कर्मचारी और 20 पुलिस वाले मीना विश्वकर्मा की झुग्गी तोड़ने आए तब उसका पति ओमप्रकाश विश्वकर्मा घर पर नहीं था. उस वक्त मीना सहित बस्ती की सारी औरतों को पार्क की तरफ खदेड़ा दिया गया. मीना ने कागज निकालकर बताना चाहा कि उसकी झुग्गी गैरकानूनी नहीं है. 2008 को दादर कोर्ट ने अपने फैसले में उसे 1994 से यहां का निवासी माना है. लेकिन वहां उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं था.

बसंती जैसे ही मां बनी, वैसे ही बस्ती टूटने लगी. उसके यहां बिस्तर, दरवाजा, अनाज के डब्बे और टीवी को तोड़ा गया. पीछे से पति हुकुम सिंह ने सामान निकाला लेकिन गर्म कपड़े और खिलौने यहां-वहां बिखर गए. अब बहुत सारे बच्चे खिलौने और किताबें ढ़ूढ़ रहे हैं. हुकुम सिंह सालों पहले आगरा से सपनों के शहर मुंबई आया था जहां 2005 में उसने बसंती से प्रेम-विवाह किया. अब जब उनके जीवन में सबसे सुंदर दिन आने थे, उसी समय जीवन के सबसे मुश्किल दिनों ने दरवाजे पर दस्तक दे दी. अब बसंती भी बाकी औरतों की तरह खुले आसमान में सोती हैं. ओस की बूदों से उसके बच्चे की तबीयत नाजुक है. उसे दोपहर की धूप भी सहन नहीं होती. इन टूटी झुग्गियों के आसपास मकानों के कई नक्शे दबे रह गए. फिलहाल सस्ती तस्वीरों में दर्ज बेशकीमती कारों वाली हसरतें भी हवा हो चुकी हैं.

बस्ती के लोग याद करते हैं कि सरकारी तोड़फोड़ से पहले विधायक यूसुफ अब्राहीम ने इंदिरानगर मस्जिद में खड़े होकर कहा था कि आपकी झुग्गियां सलामत रहेंगी. लेकिन अतिक्रमण दस्ते ने इंदिरानगर की मस्जिद को तो तोड़ा ही बस्ती के कई मंदिरों को भी तोड़ा.

किस्से सैकड़ों हैं

बस्ती तोड़ने का यह अंदाज नया नही है. पहली बार 1993 में शासन ने करीब 500 झुग्गियां तोड़ने की बात मानी थी. मतलब 1995 के पहले यहां कम-से कम 500 परिवार तो थे ही. सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के मुताबिक 1993 से 2008 तक इस बस्ती को 119 बार तोड़ा गया. लेकिन पिछली कार्यवाहियों के मुकाबले इस कार्यवाही से पूरी बस्ती का वजूद हिला गया है.

समुद्र से लगी भीमनगर की जमीन पर बरसों से बिल्डरों की नजर है. लोग बताते हैं कि 1999 के पहले यह जमीन समुद्र में थी जिसे स्थानीय लोगों ने मिट्टी डालकर रहने लायक बनाया. लेकिन 2001 में खालिद नाम के बिल्डर ने दावा किया कि यह जमीन जयसिंह ठक्कर से उसने खरीदी है. वह झुग्गी वालों को यह जमीन बाईज्जत खाली करने की सलाह भी देने लगा. इसी साल उसकी गाड़ी से एक बच्चे की मौत हुई और वह इस केस में उलझ गया. फिर 2008 में बालकृष्ण गावड़े नाम का एक और बिल्डर आया और दावा किया कि जयसिंह ठक्कर के बेटे से उसने यह जमीन खरीदी है. हालांकि मुंबई उपनगर जिला अधिकारी से मिले पत्र में यह जमीन महाराष्ट्र सरकार की संपत्ति के रुप में दर्ज है.

‘समता’ संस्था की संगीता कांबले बताती हैं- “ 1998 में इस बस्ती का रजिस्ट्रेशन हो चुका है. लेकिन वर्ष 2000 का सर्वे महज 2 दिनों में निपटा लिया गया. जबकि इस दौरान यहां के मजदूर काम पर गए थे और कई झुग्गियां खार में फंसे होने के कारण छोड़ दी गईं थीं. उपर से 2005 में आई मुंबई की बाढ़ इन झुग्गियों में रहने वालों के सारे कागजात बहा ले गई. फिर भी यहां के 75 फीसदी लोगों ने साल 2000 के पहले से रहने के सबूत इकट्ठा किए हैं. ऐसे परिवारों को उनकी झोपड़ियों का पट्टा मिलना चाहिए.”

कब्जे की होड़

“ घर बचाओ-घर बनाओ आंदोलन” ने ‘सूचना के अधिकार’ के तहत जो जानकारियां एकत्र की हैं, उसके अनुसार मुंबई में जगह-जगह बिल्डर और ठेकेदारों का कब्जा है. अट्रीया शापिंग माल महापालिका की जमीन पर बना है. यह 3 एकड़ जमीन 1885 बेघरों को घर और बच्चों को एक स्कूल देने के लिए आवंटित थी.

इसी तर्ज पर हिरानंदानी गार्डन शहर में घोटाला का गार्डन बन चुका है. इस केस में बड़े व्यपारियों को 40 पैसे एकड़ की दर पर 230 एकड़ जमीन 80 साल के लिए लीज पर दी गई.

ऐसा ही इकरारनामा ओशिवरा की 160 एकड़ जमीन के साथ भी हुआ. इसी तरह मुंबई सेन्ट्रल में बन रहा 60 मंजिला टावर देश का सबसे ऊंचा टावर होगा. लेकिन यहां की 12.2 मीटर जमीन डीपी मार्ग के लिए है. यह काम झोपड़पट्टी पुनर्वास योजना के तहत होना है. लेकिन टावर के बहाने गरीबों की करोड़ों रूपए की जमीन घेर ली गई है.

90 के दशक में व्यापारिक केन्द्र के रूप में बांद्रा-कुर्ला कांप्लेक्स तैयार हुआ था. यह मंगरू मार्शेस पर बनाया गया जो माहिम खाड़ी के पास इस नदी के मुंह पर फैला है. यहां 1992 से 1996 के बीच कई नियमों की अनदेखी करके 730 एकड़ जमीन हथियाई गई. आज काम्पलेक्स का कैंपस लाखों वर्ग फिट से अधिक जगह पर फैला हैं. इनमें कई प्राइवेट बैंक और शापिंग माल हैं. मलबार हिल की जो जगह महापालिका थोक बाजार के लिए थी, अब उसे भी छोटे व्यापारियों से छीन लिया गया है.

पूरी व्यवस्था कई तरह के विरोधाभासों से भरी हुई है. मानखुर्द जैसी झुग्गियों में रहने वालों को वोट देने का हक तो है लेकिन आवास में रहने का नहीं. मतलब हर पार्टी सत्ता तक पहुंचने के लिए इनका वोट तो चाहती है लेकिन उसके बदले जीने का मौका नहीं देना चाहती.

लोग मानते हैं कि मुंबई को सिंगापुर बनाने का जो सपना देखा जा रहा है, वह मेहनजकश मजदूरों के बिना पूरा नहीं हो सकता फिर भी शहर के मास्टर प्लान में करोड़ों कामगारों के सपनों को जगह नहीं मिली है. एक अघोषित एजेंडा यह है कि शहर की झोपड़पट्टियों को तोड़कर भव्य मॉल और कॉम्पलेक्स बनाए जाएं. लेकिन सवाल है कि इन इमारतों को बनाने वाले कहां जाए ?
साभार : रविवार.कॉम से
लिंक : http://raviwar.com/news/139_where-is-my-home-shirish-khare.shtml

उठ गये चौसठ हाथ

शिरीष खरे
महाराष्ट्र के जिला बीड़ के मुख्यालय से कोई 110 किलोमीटर दूर है कनाडी गांव. वहां जाने वाली उबड़-खाबड़ सड़क आधे रास्ते पर साथ छोड़ देती है. फिर लोग अपनी सहूलियत से पगडंडियां बनाते चलते हैं. कनाडी से डेढ़ किलोमीटर पहले एक मुहल्ला आता है. एक ऐसा मुहल्ला, जिसके बारे में न तो पहले कभी सुना था, न कभी देखा था. यह तिरूमली मोहल्ला है. कुल 274 लोगों का मोहल्ला.
नंदी बैल पर फटे-पुराने कपड़ों से लिपटी गृहस्थी लटकाना और गाना-बजाना तिरूमली बंजारों की पहचान है. यह दर-दर रोटी मांगकर पेट भरना अपना काम समझते हैं. विभागीय कर्मचारियों के लिए लापता रहने वाले ऐसे नाम मतदाता सूची से नहीं जुड़ते.
तिरूमली बंजारों ने घर, बिजली, पानी, राशन, स्कूल और अस्पताल की बातों पर कभी सोचा ही नहीं. इनकी सुनें तो सोचने से सब मिलता भी नहीं. शासन को नागरिकता का सबूत चाहिए, जो इनके पास है नहीं. इसलिए हक की बात करना नाजायज होगा. गांव वाले इन्हें चार दिन से ज्यादा न तो ठहरते देखते हैं और न ही ठहरने देते. इसलिए इस आबादी का पूरा पता राज्य-सरकार भी नहीं जानती. इस हालत में तिरूमली मोहल्ला होना किसी हेरतअंगेज समाचार जैसा लगता है.
कनाड़ी गांव के तिरूमलियों ने 118 एकड़ बंजर जमीन से बीज उगाए और कानून को पढ़कर पंचायत से कई काम करवाए. यह ऊंची जाति की ज्यादतियों के खिलाफ लम्बे संघर्ष का नतीजा रहा. 1993 में छिड़ी इस लड़ाई को यह लोग आजादी की पहली लड़ाई से कम नहीं मानते. तब 32 जोड़ों के 64 हाथ एक जगह जीने के लिए उठ गए थे.
वोट की राजनीति
यहां घास-फूस से बंधी झोपडियों के मुंह एक-दूसरे से सटे और आमने-सामने है. यह आपसी और घुली-मिली जीवनशैली की ओर इशारा है. इनके पीछे हू-ब-हू वैसी ही झोपड़ियां गाय, कुत्ता और बकरियों के लिए तैयार हैं. इन 15 सालों में तिरूमली परिवारों की संख्या बढ़कर 45 पहुंच चुकी है और हालत ये है कि 9 सदस्यों वाली पंचायत में 3 सदस्य इसी इलाके के हैं.
लेकिन 10 साल पहले स्थिति एकदम उल्टी थी. तब तिरूमलियों का 1 भी वोटर नहीं था, इसलिए उनकी सुनवाई नहीं होती थी. इन दिनों बस्ती के सभी 26 बच्चे पढ़-लिख रहे हैं. 32 परिवारों के हाथ में राशनकार्ड हैं. इनमें से कुछ बीपीएल में भी हैं. अब यह अस्पताल में बीमारियों का इलाज और सहकारी बैंक से लोन ले सकते हैं. बस पास में 50% की छूट भी मिल गई है. लेकिन इन सबसे ऊपर है इज्जत, आत्मनिर्भर और बराबरी की दुनिया में मिलना. कमसे कम ग्राम-सभा का इनकी रजामंदी से चलना यही जाहिर करता है.
'चाईल्ड राईटस एण्ड यू' और 'राजार्षि शाहु ग्रामीण विकास' बीते एक दशक से इस क्षेत्र में तिरूमली, पारधी, भील और सैय्यद मदारी जैसी घुमन्तु जनजातियों के लिए काम कर रही हैं. सामाजिक कार्यकर्ता बाल्मिक निकालजे के मुताबिक- “ दान देने-लेने के रिवाज को कमजोर किए बिना किसी जमात को ताकतवर बनाना नामुमकिन है. इन भटके लोगों को उनका हक देना सरकार का फर्ज है. वोट-बैलेंस की राजनीति से अछूते होने के कारण एक भी पार्टी का ध्यान उनकी तरफ नहीं जाता. तिरूमली जनजाति के लिए हम लड़े. अब वह आगे की लड़ाई खुद लड़ रहे हैं.”
भूरा गायकबाड़ पूरी लड़ाई के मुख्य सूत्रधार हैं. भूरा कहते हैं- “ तब नंदी का खेल दिखा-दिखाकर जिंदगी तमाशा बन चुकी थी. लेकिन हम और हमारी पुरखे कहीं भी जाएं घूम-फिरकर यहीं आते थे. जब कोई गाय-भैंस पेट से होती तो 15 हजार में उसे खरीदकर बड़े बाजार में 25-30 हजार तक में बेच देते. लेकिन बेचने से पहले उन्हें इसी जमीन पर चराते. यहीं से चारे का धंधा भी करते. कोई-न-कोई यहां जरूर बना रहता. मतलब ये कि इस जमीन से हमारा रिश्ता लगातार बना रहा.''
एक नई कहानी
महाराष्ट्र का 'गायरन जमीन कानून' कहता है कि 14 अप्रैल 1991 के पहले तक जो लोग ऐसी जमीनों का इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें इसका पट्टा दिया जाए. तिरूमलियों ने संस्था की मदद से इसकी एक अर्जी कलेक्टर को भेजी.
लेकिन सवाल वही था कि आखिर जमीन का किया क्या जाये. एक रोज पत्थरों को हटाकर खेत बनाने का काम तय किया गया.
बाबू फुलमारी के अनुसार- “पत्थर बीनने में ही हालत खराब हो गई. हमारे पास बीज, हल, बैल, कुदाड़ी और फावड़ा नहीं थे. खेत में फसल रोपना या कुदाल या हल चलाना नया काम था. यह सब पड़ोस के खेतों में जाकर सीखा. संस्था की मुहिम से 32 कुदालियां और 64 क्विंटल ज्वार के बीज इकट्ठा हो गए.”
इस तरह हर हाथ के लिए 1 कुदाली और 2 क्विंटल बीज मिले. कड़ी मेहनत के बाद खेत बने और उनके बीच से कुछ रास्ते. लेकिन मुश्किल तो आनी ही थी.
बकौल बाबू फुलमारी “ जुताई को 15 दिन भी नहीं गुजरे कि एक सुबह ऊंची जाति के 500 लोगों ने हल्ला बोला. उनके हाथों में लाठी, सुलई, कुल्हाड़ी और कोयता थे. 60 साल के बापू गायकवाड़ को रस्सी से बांधकर दूर तक खींचा. सबको इतना मारा कि एक भी उठने लायक नहीं बचा.”
लेकिन उसमें से छोटा बच्चा रवि जगताप नजर बचाकर निकल भागा. अब वह बड़ा हो चुका है. उसने बताया- “ भागते-भागते 5 किलोमीटर दूर के शिराठ गांव पहुंचा. वहां से 20 किलोमीटर दूर संस्था के आफिस फोन लगवाकर इस मारपीट की खबर सुनाई. जब तक कार्यकर्ता पुलिस के साथ यहां पहुंचते तब तक घायलों की हालत गंभीर हो चुकी थी. उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया.”
इसके बाद 'जाति अत्याचार प्रतिबंध कानून' के तहत केस दायर करके सत्याग्रह छेड़ दिया गया. इसमें बाकी जनजातियों के हजारों लोग शामिल हुए. इससे संगठन की ताकत कई गुना बढ़ी. दबाव में पुलिस ने 7 पिंजरा गाड़ी मंगवायी और करीब 150 आरोपियों को हिरासत में लिया. सभी को जिला मजिस्ट्रेट ने रिमाण्ड पर भेजा और 21 दिनों तक जमानत नहीं दी.
अखबारों ने इन खबरों को चारों तरफ फैला दिया. इससे पूरे इलाकों को कानून का पाठ समझ आ गया. शिराठ गांव के कई दलित तिरूमली मोहल्ला आकर रात को रखवाली करने लगे.
आखिरकार आपसी समझौता हुआ, जिसमें सवर्णों ने फिर कभी न सताने का वादा किया, जिस पर आज तक वो कायम हैं.
हौसला, जज्बा और...
साहिबा फुलमाली कहती हैं- “ हम निडर, ताकतवर, पढ़े-लिखे, अपनी बात पर बोलने और दिल्ली-बम्बई तक लड़ने वाले बन गए हैं.”
उनके साथ बैठे संस्था के समन्वयक सतीश गायकवाड़ की चिंता है कि पिछले 15 सालों की लड़ाई के बाद भी इनके हक की जमीन इनके नाम नहीं हो सकी हैं. अब यही लड़ाई लड़नी और जीतनी है.
“ चाईल्ड राईटस एण्ड यू ” ने स्कूली शिक्षा के लिए यहां 'गैर औपचारिक केन्द्र' खोला. वहां अपनी पढ़ाई शुरु करने वाले बच्चे अब कालेज की दहलीज पर खड़े हैं. वह रमेश और रामा मुलवारी से भी आगे जाना चाहते हैं. तब तीसरी में पढ़ने वाला रमेश फुलमारी अब 'विशेष सुरक्षा बल' में है. इसी तरह रामा फुलमारी राज्य परिवहन बस का कण्डेक्टर है.
जिले के बड़े नक्शे पर तिरूमली मोहल्ला नजर नहीं आता. पूरी तिरूमली आबादी का छोटा सा हिस्सा यहां बसा है. असल में यह बदलाव का एक छोटा उदाहरण भर है. ज्यादातर तिरूमली लोग नंदी बैल के सिर पर महादेव-बाबा की मूर्ति, गले में घण्टी और कमर में रंग-बिरंगा कपड़ा बांधने के बावजूद मटमैली जिंदगी जीते हैं.
बिस्मिल्लाह खां ने जिस 'सवई' को बजाकर देश-विदेश नाम कमाया उसे तिरूमली लोग कई पीढ़ियों से बजाते आ रहे हैं. लेकिन इन्हें न नाम मिला न दाम. मांगी रोटियां मिल-बांटकर खाते हैं. खाने के लिए अन्न नहीं पकाते इसलिए बर्तनों को भी नहीं रखते. बरसात में रेल्वे-पुलों के नीचे सोते हैं. उसके बाद यह 500 किलोमीटर दूर पुना, मुम्बई, सोजारी, उस्मानाबाद, भूम, पारण्डा, शोलापुर और बारसी के इलाकों में भटकते हैं. हर रोज कम से कम 20 से 40 किलोमीटर की यात्रा. इनका हर परिवार 10-15 बच्चों से भरा है. जिन्हें यह कमर, कंधों और सिरों पर ढ़ोते हैं. इससे पैरों में होने वाली तकलीफ बढ़ जाती है.
ऐसे अनगिनत पैरों की तकलीफ दूर करने के लिए 'उठ गए चौसठ हाथ' की कहानी जगह-जगह दोहरानी होगी.
साभार : रविवार.कॉम से लिंक : http://raviwar.com/news/125_tirumali-bid-maharashtra-shirish-khare.shtml

8.3.09

मोनालिसा (ओं) की मुसकान

शिरीष खरे
तीसरी में पढ़ने वाली इशाका गोरे का परिवार महाराष्ट्र के सांगली जिले से है जो गन्नों के खेतों में कटाई के लिए 6 महीनों के लिए बाहर जाता है. इशाका का सपना चौथी में आने का है लेकिन उसके पिता याविक गोरे अगले चार सालों में ही उसकी शादी करना चाहते हैं. मराठवाड़ा के ऐसे कई परिवार अपने बच्चों की शादियां कम उम्र में करते हैं.
यहां जोड़ा (पति-पत्नी) बनाकर काम करने का चलन है. इन्हें लगता है कि परिवार में जितने अधिक जोड़ा रहेंगे, आमदनी उतनी ही रहेगी. फिलहाल इशाका गोरे का सपना काम और किताबों के बीच उलझा है.
सरकार ने लड़कियों के हकों की खातिर `सशक्तिकरण के लिए शिक्षा´ का नारा दिया है. लेकिन नारा जितना आसान है, लक्ष्य उतना ही मुश्किल हो रहा है. क्योंकि देश में इशाका जैसी 50 फीसदी लड़कियां स्कूल नहीं जाती. आखिरी जनगणना के अनुसार भारत की 49.46 करोड़ महिलाओं में से सिर्फ 53.67 फीसदी साक्षर हैं. मतलब 22.91 करोड़ महिलाएं निरक्षर हैं. एशिया महाद्वीप में भारत की महिला साक्षरता दर सबसे कम है. क्राई के मुताबिक भारत में 5 से 9 साल की 53 फीसदी लड़कियां पढ़ना नहीं जानती. इनमें से ज्यादातर रोटी के चक्कर में घर या बाहर काम करती हैं. यहां वह यौन-उत्पीड़न या दुर्व्यवहार की शिकार बनती हैं. 4 से 8 साल के बीच 19 फीसदी लड़कियों के साथ बुरा व्यवहार होता है. इसी तरह 8 से 12 साल की 28 फीसदी और 12 से 16 साल की 35 फीसदी लड़कियों के साथ भी ऐसा ही होता हैं. `राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो´ से मालूम हुआ कि बलात्कार, दहेज प्रथा और महिला शोशण से जुड़े मुकदमों की तादाद देश में सलाना 1 लाख से ऊपर है.
देश में महिलाओं की कम होती संख्या मौजूदा संकटों में से एक बड़ा संकट है. समय के साथ महिलाओं की संख्या और उनकी स्थितियां बिगड़ती जा रही हैं. जहां 1960 में 1000 पुरुषों पर 976 महिलाएं थीं वहीं आखिरी जनगणना के मुताबिक यह अनुपात 1000:927 ही रह गया. यह उनके स्वास्थ्य और जीवन-स्तर में गिरावट का अनुपात भी है. कुल मिलाकर सामाजिक और आर्थिक संतुलन गड़बड़ा चुका है.
सरकार ने लड़कियों की शिक्षा के लिए तमाम योजनाएं बनायी है. जैसे- घरों के पास स्कूल खोलना, स्कॉलरिशप देना, मिड-डे-मिल चलाना और समाज में जागरूकता बढ़ाना. इसके अलावा ग्रामीण और गरीब लड़कियों के लिए कई ब्रिज कोर्स चलाए गए हैं. बीते 3 सालों में प्राथमिक स्तर पर 2000 से अधिक आवासीय स्कूल मंजूर हुए हैं. `राष्ट्रीय बालिका शिक्षा कार्यक्रम´ के तहत 31 हजार आदर्श स्कूल खुले जिसमें 2 लाख शिक्षकों को लैंगिक संवेदनशीलता में ट्रेनिंग दी गई. इन सबका मकसद शिक्षा व्यवस्था को लड़कियों के अनुकूल बनाना है.
ऐसी महात्वाकांक्षी योजनाएं सरकारी स्कूलों के भरोसे हैं. लड़कियों की बड़ी संख्या इन्हीं स्कूलों में हैं. इसलिए स्कूली व्यवस्था में सुधार से लड़कियों की स्थितियां बदल सकती हैं. लेकिन समाज का पितृसत्तात्मक रवैया यहां भी रूकावट खड़ी करता है. एक तो क्लासरुम में लड़कियों की संख्या कम रहती है और दूसरा उनके महत्व को भी कम करके आंका जाता है. हर जगह भेदभाव की यही दीवार होती है. चाहे पढ़ाई-लिखाई हो या खेल-कूद, लायब्रेरी हो लेबोरेट्री या अन्य सुविधाओं का मामला. दीवार के इस तरफ खड़ी भारतीय लड़कियां अपनी अलग पहचान के लिए जूझती है. हमारा समाज भी उन्हें बेटी, बहन, पत्नी, अम्मा या अम्मी के दायरों से बाहर निकलकर नहीं देखना चाहता. दरअसल इस गैरबराबरी को लड़कियों की कमी नहीं बल्कि उनके खिलाफ मौजूद हालातों के तौर पर देखना चाहिए. `अगर लड़की है तो उसे ऐसा ही होना चाहिए´ ऐसी सोच उसके बदलाव में बाधाएं बनती हैं.
एक तरफ स्कूल को सशक्तिकरण का माध्यम माना जा रहा है और दूसरी तरफ ज्यादातर स्कूल औरतों के हकों से बेपरवाह हैं. पाठयपुस्तकों में ही लिंग के आधार पर भेदभाव की झलक देखी जा सकती है. ज्यादातर पाठों के विशय, चित्र और चरित्र लड़कों के इर्द-गिर्द ही घूमते हैं. इन चरित्रों में लड़कियों की भूमिकाएं या तो कमजोर होती हैं या सहयोगी. ऐसी बातें घुल-मिलकर बच्चों के दिलो-दिमाग को प्रभावित करती हैं. फिर वह पूरी उम्र परंपरागत पैमानों से अलग नहीं सोच पाते.
कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं जिनकी गली, मोहल्लों और घरों में महिलाओं के साथ मारपीट होती है. इसके कारण उनके दिलो-दिमाग में कई तरह की भावनाएं या जिज्ञासाएं पनपती हैं. लेकिन स्कूलों में उनके सवालों के जबाव नहीं मिलते. जबकि ऐसे मामलों में बच्चों को जागरूक बनाने के लिए स्कूल मददगार बन सकता है. दरअसल हमारी शिक्षा प्रणाली में ही अभद्र भाशा, पिटाई और लैंगिक-भेदभाव मौजूद है. इसलिए स्कूलों के मार्फत समाज को बदलने के पहले स्कूलों को बदलना चाहिए.
उस्मानाबाद जिले के एक हेडमास्टर सतीश बाग्मारे (बदला नाम) ने फरमाया कि- ``लड़कियों की सुरक्षा के लिए चारों तरफ एक दीवार होना जरूरी है.´´ दीवारों को बनने के बाद हो सकता है उन्हें गार्डों की तैनाती जरूरी लगने लगे. हमारा स्कूल उस समाज से घिरा है जहां लड़कियों को सुरक्षा के नाम पर कैद करने का रिवाज है. आज भी ज्यादातर लड़कियों के लिए िशक्षा का मतलब केवल साक्षर बनाने तक ही है. बचपन से ही उनकी शिक्षा का कोई मकसद नहीं होता. लड़कियों को बीए और एमए कराने के बाद भी उनकी शादी करा दी जाती है. इसलिए लड़कियों की शिक्षा को लेकर रचनात्मक ढ़ंग से सोचना जरूरी है.
गांधीजी ने कहा था-``एक महिला को पढ़ाओगे तो पूरा परिवार पढ़ेगा´´ उन्होंने 23 मई, 1929 को `यंग इण्डिया´ में लिखा-``जरूरी यह है कि शिक्षा प्रणाली को दुरूस्त किया जाए. उसे आम जनता को ध्यान में रखकर बनाया जाए.´´ गांधीजी मानते थे-``ऐसी शिक्षा होनी चाहिए जो लड़का-लड़कियों को खुद के प्रति उत्तरदायी और एक-दूसरे के प्रति सम्मान की भावना पैदा करे. लड़कियां के भीतर अनुचित दबावों के खिलाफ विद्रोह पैदा हो. इससे तर्कसंगत प्रतिरोध होगा.´´ इसलिए महिला आंदोलनों को तर्कसंगत प्रतिरोध के लिए अपने एजेण्डा में `लड़कियों की शिक्षा´ को केन्द्रीय स्थान देना चाहिए. महिलाओं की अलग पहचान के लिए भारतीय शिक्षा पद्धति, शिक्षक और पाठयक्रमों की कार्यप्रणाली पर नए सिरे से सोचना भी जरूरी है.


25.2.09

बीमार विदर्भ पर फोकस

शि‍रीष खरे

एक तरफ बिजली से रोशन शहर का भारत है दूसरी तरफ खेती के खस्ताहाल से ढ़का देहाती भारत है. एक भारत को दूसरे भारत के बारे में कम ही पता है. फिल्म ‘समर 2007’ शहर और देहात के बीच की इसी खाई को भरने का काम करती है. यह पांच डॉक्टरों को विदर्भ में किसानों की समस्याओं से जोड़ती है.

इन दिनों बालीबुड से गांव गायब हो गए हैं. ऐसे में एक फिल्म देश के मौजूदा संकट को मुख्यधारा के करीब लाती है. लेकिन अब तक किसानों को सरकार की ठोस पहल का इंतजार है और फिल्म को दर्शकों के जरिए प्रचार का. यह फिल्म पूरे देश में नहीं दिखायी जा सकी है और बाहर भी कुल 338 शोज ही हुए.

पी साईनाथ का एक लेख विदर्भ में स्वास्थ्य सेवाओं की गिरावट को बयान करता है. इसी लेख से प्रभावित होकर ब्रजेश जयराजन ने एक कहानी लिखी जिसे निर्देशक सुहैल तातारी और निर्माता अतुल पांडेय ने रूपहले परदे पर साकार किया. इसमें पांच डॉक्टर बने हैं सिंकदर, गुल, पनाग, युविका चैधरी, अर्जुन बाबा और अलेख सेंगल. इसके अलावा विक्रम गोखले, सचिन खेडेकर, आशुतोष राणा, स्वेता मेनन और नीतू चंद्रा ने भी सहज भूमिकाएं निभायी हैं.

पटकथा में विदर्भ का संकट बड़ी खबर बनने से असमंजस, अविश्वास और निराशाएं पनपती हैं. इसलिए मेडिकल छात्रों को अनिवार्य तौर से गांवों में भेजने की बातें चलती है . इन बातों से बेपरवाह पांच दोस्तों का एक ग्रुप है. यह लाखों रूपए देकर मेडिकल की पढ़ाई पूरी करते हैं. सभी अमीर घरों के होने से हर ऐशो-आराम भोग रहे हैं. इनकी जिदंगी की बड़ी उलझनों में प्यार, परीक्षा, गर्लफ्रेड, सेक्स और तकरार हैं. हरेक उलझन खुल-मिलकर रंगीन दुनिया भी बनाती हैं. पांचों हवाओं के रूख में बहे जा रहे हैं. इन्हें समाज के बदलाव से कोई लेना-देना नहीं. लेकिन कॉलेज के चुनाव में प्रकाश नाम का लीडर उन्हें पहली बार सच से रु-ब-रु कराता है. यह लीडर उन्हें चुनाव के लिए उकसाता है. पोलिटिक्स से उकताकर यह पांचों दोस्त कैंपस छोड़ देते हैं. फिर सभी मूड बदलने के लिए एक गांव के ‘प्राइमरी हेल्थ सेंटर’ पहुंचते हैं.

लेकिन बदलाव का रास्ता यही से खुलता है. यहां आकर यह मेडिकल छात्र भारत की असली तस्वीर देखते हैं. उनके सामने घनघोर गरीबी में फंसा पूरा गांव है. यह पांचों दोस्त किसानों की आत्महत्या के मूक दर्शक भी बनते हैं. जिसे कभी नहीं सुना उसे होते देखना बेहद तकलीफ देता है. इससे उनके भीतर भय, दुख और शर्म पैदा होती है. कर्ज से डूबे किसानों का संसार उन्हें ‘मदर इण्डिया’ के रूपहले पर्दे जैसा ही रंगहीन नजर आता है. यहां की सामंती ताकतें नए रुप में हाजिर होती हैं.

ऐसे में स्वास्थ्य व्यवस्था संभालना और लोगों को जीवन की थकान से उभारना मुश्किल होता है. पांचों की अंदरूनी आवाजों ने मिलकर सवाल बनाने शुरू कर दिए. जो देश की तरक्की, गरीबों की आमदनी, आम जनता के हक और राजनैतिक उदासीनता से उभरे. कॉलेज से भागे इन दोस्तों का दिल किसानों की जंग से जुड़ गया. आखिरकार यह पांचों एक उबलते हुए बिन्दु पर पहुंच गए. जहां उन्हें हिंसक समाधान नजर आया.

दरअसल यह पूरी फिल्म अहिंसक समाधान की संभावनाएं ढ़ूढ़ती है. सभी किरदारों की प्रतिक्रियाएं अलग-अलग देखी गई. कभी उन्होंने हकीकत से समझौता करना चाहा, कभी उसे बदलना चाहा, कभी उनका दिल कड़वा हुआ, कभी प्यार से भर गया और कभी दुख से. दृश्यों के सहारे सामाजिक कोणों का स्वाभिक ताना-बाना बुना गया है. जहां कुछ भी रुखा और थोपा हुआ नहीं लगता.

जिस साल यह फिल्म बन रही थी उस साल 784 किसानों ने आत्महत्याएं की थी. प्रधानमंत्री द्वारा 40 अरब रूपए के पैकेज बावजूद यह आकड़ा 1648 तक पहुंच चुका था. तब भारत के ‘नियंत्रक और महालेखा परीक्षक’ की रिपोर्ट ने भी स्वीकारा था कि- ‘‘राहत योजनाओं को लागू करने में गंभीर खामियां हुई हैं.’’ फिल्म निर्माण के दौरान ही देश के कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा था कि- ‘‘आत्महत्याएं अब कम हो रही हैं.’’ लेकिन जिस रोज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आए उस रोज ही अकोला के राकेश बंसल सहित 5 किसानों ने आत्महत्याएं कर ली. "

मौजूदा हाल तो और भी बुरा है. बीते 5 महीनों में यावतमाल, बुलदाना, अकोला, अमरावत, वासीम और वर्धा जिले के 401 किसानों ने आत्महत्याएं की है. इसी प्रकार बीते 5 साल में यहां आत्महत्या करने वाले किसानों की कुल तादाद 5157 है. ‘राष्ट्रीय सेमपल सर्वेक्षण’ के 59वें आकड़ों के मुताबिक- ‘‘यहां के किसान खेती पर खर्च करने के लिए 60 फीसदी कर्ज लेते है ’’ मतलब फसल खराब होने से समस्याएं और बढ़ जाती है."

20 साल पहले यहां 1 क्विंटल कपास 12 ग्राम सोने के बराबर होता था. आज 1 क्विंटल कपास के बदले सिर्फ 1750 रूपए का समर्थन मूल्य मिलता है. बीते दशक से खेती में रासायनिकों का प्रचलन बढ़ा और वह 6 गुना तक महँगी हुई लेकिन कपास की कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई. उधर ‘विश्व व्यापार संगठन’ में हुए समझौते के कारण कपास पर आयात-शुल्क सिर्फ 10 फीसदी ही रह गया. अमेरिका में किसान की 1 किलो कपास की लागत करीब 1.70 डॉलर होती है. वहां की सरकार 1 किलो कपास पर 2 डालर की सब्सिडी भी देती है. इसलिए अमेरिका का किसान लागत से बेहद कम कीमत पर कपास निर्यात कर देता है. विदर्भ का किसान यही मात खा जाता है.

‘समर 2007’ जिन आकड़ों के साथ खत्म होती है उनमें भूमण्डलीकरण के खतरों का विश्लेषण तो नहीं लेकिन इशारा जरूर मिलता है. फिल्म कोई नया सवाल खड़ा नही करतीं. यह पुराने सवालों में ही असर पैदा करती है.

19.2.09

Playing Hangman


There's A Better Way To Pass T i m e
Put your fingers to better use by playing hangman and ensuring child rights at the same time

18.2.09

विवादों का विशालकाय सरोवर

शि‍रीष खरे
इन दिनों सरदार सरोवर परियोजना और डूब प्रभावितों के लिए किये जा रहे पुनर्वास कार्य में भ्रष्ट्राचार कुछ इस प्रकार व्याप्त है कि अनियमितताओं का सिलसिलेवार ब्यौरा जुटाना और उसके आधार पर लगातार कार्यवाहि‍यों की रणनीतियां तैयार करना कठिन हो चुका है. इस विशालकाय बांध की तरह ही इससे प्राप्त होनेवाले लाभों, लागतों और पुनर्वास संबंधित तमाम फर्जीवाड़ों की लम्बी सूचियां विवादों की मोटी गठरी बन चुकी है.
सरदार सरोवर परियोजना 1979 में शुरू हुई थी और यह साल 2025 में पूरी होगी. इससे लगभग दो लाख लोग विस्थापित होंगे. 1993 में विश्व बैंक ने इस परियोजना से अपना हाथ पीछे खींच लिया था. इसी साल “केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय” के विशेषज्ञ दल ने भी अपनी रिपोर्ट में बांध के काम के दौरान पर्यावरण की भारी अनदेखी और लापरवाही पर सभी का ध्‍यान खींचा था. अनेक पर्यावरणविदों की राय में यह योजना पर्यावरण के प्रतिकूल है. इतने बड़े पैमाने पर काम होगा तो पर्यावरण के साथ खिलवाड़ भी उसी अनुपात में होना है. इसके बावजूद कुल 1200 किलोमीटर लंबी नर्मदा पर 3200 बाँध बनाना भी तय हुआ है. मतलब नर्मदा की घाटी में असंतुलित विकास, विस्थापन और अनियमतताओं का अतीत खत्म नहीं होने दिया जाएगा.
लाभ और लागत‘नर्मदा बचाओं आंदोलन’ ने समाज में विकास की परिभाषा और उसके मापदण्डों पर लगातार विचार करने की प्रक्रिया को प्राथमिकता दी है. इसी तर्क को आधार मानकर परियोजना के कुल लाभ और हानियों का हमेशा आकलन चलता रहा है. हर बार यह लागत बढ़ती जा रही है. सरकार के अनुसार पूरी लागत गुजरात के सिंचाई बजट का 80 प्रतिशत हिस्सा है. लेकिन इससे कच्छ के लगभग 2 प्रतिशत और सौराष्ट्र के 9 प्रतिशत भाग में ही पानी पहुंचाया जा सकेगा. मेधा पाटकर के अनुसार- “विगत 20 सालों में यह परियोजना 4200 हजार करोड़ से बढ़कर 4500 हजार करोड़ हो चुकी है. इसमें से अब तक 25 हजार करोड़ खर्च हो भी चुके हैं. अनुमान है कि आने वाले समय में यह लागत 70 हजार करोड़ तक पहुंचेगी. इसके बावजूद अकेले गुजरात में ही पानी का लाभ 10 प्रतिशत से भी कम हासिल है. महाराष्ट्र और राजस्थान को मिलने वाला लाभ नजर नहीं आता जबकि मध्यप्रदेश को भी अनुमान से कम बिजली मिलने वाली है.” कुछ तकनी‍की विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस पूरी योजना को वैकल्पिक तरीक़े से लागू किया जाए और इसे छोटी-छोटी, आत्मनिर्भर तथा पर्यावरण के अनुकूल परियोजनाओं में बांट दिया जाए तो ज़्यादा लाभ हो सकता है.
विस्थापन यहां के आदिवासी लोगों की प्रमुख मांग जमीन के बदले जमीन की है. परंतु सरकार जमीन जुटाने में अपनी असमर्थता व्यक्त करती रही है. कुछ लोगों को पुनर्वास की जो जमीन दी गई है उनमें से ज्यादातर की शिकायत है कि वह जमीन उनकी असली जमीन से कम उपजाउ है. काम की जमीन को पानी में डूबोकर बदले में उन्हें बेकार जमीन दी जा रहीं है. जमीन बिखरे टुकड़ों में दी जा रही है. बहुत बड़ी तादाद में पुनर्वासित लोगों का कहना है कि आज नर्मदा की नहर उनकी दी गई ज़मीन से निकल रही है पर उन्हें ही नर्मदा के पानी से वंचित रखा जा रहा है. पुनर्वास कार्य में अनियमतताओं के गंभीर आरोप बढ़ते ही जाते हैं. उधर ‘नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण’ द्वारा जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया कि ‍‍‍सरदार सरोवर परियोजना से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास कार्य में कथित अनियमितताओं के आरोप गलत हैं. तथ्य यह है कि- “वि‍गत वर्ष मानसून सत्र के दौरान परियोजना प्रभावितों के लिए विक‍‍‍‍सित 88 पुनर्वास स्थलों में 22438 परिवारों को निशुल्क भूखण्डव आंवटित किये गए. जो परिवार भूखण्ड लेना नहीं चाहतें, उन्हें 50 हजार नकद राशि देने का विकल्प रखा गया और 806 परिवारों ने स्वेच्छा से नकद राशि लेने का विकल्प चुना.” लेकिन सरकार के भीतर ही एनवीडीए की कार्यप्रणाली को लेकर अंतर्विरोध के स्वर उभरते रहे हैं. वि‍गत वर्ष मानसून सत्र के दौरान मुख्य सचिव द्वारा नि‍र्माण विभागों की मानिटरिंग के दौरान एनवीडीए अधिकारियों की जमकर क्लास लेने की खबर अखबारों की प्रमुख सुर्खी बनी थी. तब श्री साहनी ने कहा कि "बार-बार निर्देश के बावजूद एनवीडीए में न तो पैसों का सही उपयोग हो पा रहा है और न ही समय सीमा में कार्य हो पा रहा है. बड़े अधि‍कारी स्थल पर जाकर कामकाज की सही समीक्षा करें."
भ्रष्टाचार ‘नर्मदा बचाओं आंदोलन' वैकल्पिक वनीकरण, जल संरक्षण क्षेत्र विकास और पुनर्वास योजनाओं से संबंधित सरकारी दावों और आकड़ो को झूठा तथा विरोधाभाषी बताता है और कहता है कि इसके जवाब में हम मैदानी और कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे। आंदोलन पुनर्वास कार्य में राहत और विस्थापन सहित कई क्षतिपूर्ति योजनाओं में भारी भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं. ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन, बड़वानी’ से मिली जानकारी के अनुसार प्रदेश सरकार ने 13 जिलों के कलेक्टबर और भू-अधिग्रहण अधिकारी को उनके यहां हुईं रजिस्‍ट्रियों की जांच करने के लिए कहा है. कुल 4190 रजिस्ट्रियों में से 2818 रजिस्ट्रियों की जांच की गई, जिनमें से अभी तक कुल 758 फर्जी रजिस्ट्रियों की बात सरकार मान चुकी है मगर आंदोलन के मुताबिक दुर्भाग्य से यह संख्या् उससे कहीं अधिक है. ‘नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण’ के अधिकारियों द्वारा जहां अनेक बैठकों में फर्जी रजिस्ट्री जांच में किसी प्रकार की आंच न आने की बात दोहराई जा रही है वहीं कुछ लोगों का मत है कि मौजूदा अधिकारियों के होते हुए निष्पैक्ष जांच संभव ही नहीं है। आंदोलन के कार्यकर्ता आशीष मंडलोई बताते हैं कि- "एनवीडीए के अधिकारियों द्वारा दोषी अधिकारियों को बचाने और महज विस्थापितों के फसाने का खेल चल रहा है। इस संबंध में जब प्रकरण न्यायालय में है तो ऐसे में निर्णय न्यायालय को लेना है, अधिकारि‍यों द्वारा निर्णय लेना अवैध ही माना जाएगा." उन्होंने इस पूरे प्रकरण पर सीबीआई जांच की मांग की है.