25.2.09

बीमार विदर्भ पर फोकस

शि‍रीष खरे

एक तरफ बिजली से रोशन शहर का भारत है दूसरी तरफ खेती के खस्ताहाल से ढ़का देहाती भारत है. एक भारत को दूसरे भारत के बारे में कम ही पता है. फिल्म ‘समर 2007’ शहर और देहात के बीच की इसी खाई को भरने का काम करती है. यह पांच डॉक्टरों को विदर्भ में किसानों की समस्याओं से जोड़ती है.

इन दिनों बालीबुड से गांव गायब हो गए हैं. ऐसे में एक फिल्म देश के मौजूदा संकट को मुख्यधारा के करीब लाती है. लेकिन अब तक किसानों को सरकार की ठोस पहल का इंतजार है और फिल्म को दर्शकों के जरिए प्रचार का. यह फिल्म पूरे देश में नहीं दिखायी जा सकी है और बाहर भी कुल 338 शोज ही हुए.

पी साईनाथ का एक लेख विदर्भ में स्वास्थ्य सेवाओं की गिरावट को बयान करता है. इसी लेख से प्रभावित होकर ब्रजेश जयराजन ने एक कहानी लिखी जिसे निर्देशक सुहैल तातारी और निर्माता अतुल पांडेय ने रूपहले परदे पर साकार किया. इसमें पांच डॉक्टर बने हैं सिंकदर, गुल, पनाग, युविका चैधरी, अर्जुन बाबा और अलेख सेंगल. इसके अलावा विक्रम गोखले, सचिन खेडेकर, आशुतोष राणा, स्वेता मेनन और नीतू चंद्रा ने भी सहज भूमिकाएं निभायी हैं.

पटकथा में विदर्भ का संकट बड़ी खबर बनने से असमंजस, अविश्वास और निराशाएं पनपती हैं. इसलिए मेडिकल छात्रों को अनिवार्य तौर से गांवों में भेजने की बातें चलती है . इन बातों से बेपरवाह पांच दोस्तों का एक ग्रुप है. यह लाखों रूपए देकर मेडिकल की पढ़ाई पूरी करते हैं. सभी अमीर घरों के होने से हर ऐशो-आराम भोग रहे हैं. इनकी जिदंगी की बड़ी उलझनों में प्यार, परीक्षा, गर्लफ्रेड, सेक्स और तकरार हैं. हरेक उलझन खुल-मिलकर रंगीन दुनिया भी बनाती हैं. पांचों हवाओं के रूख में बहे जा रहे हैं. इन्हें समाज के बदलाव से कोई लेना-देना नहीं. लेकिन कॉलेज के चुनाव में प्रकाश नाम का लीडर उन्हें पहली बार सच से रु-ब-रु कराता है. यह लीडर उन्हें चुनाव के लिए उकसाता है. पोलिटिक्स से उकताकर यह पांचों दोस्त कैंपस छोड़ देते हैं. फिर सभी मूड बदलने के लिए एक गांव के ‘प्राइमरी हेल्थ सेंटर’ पहुंचते हैं.

लेकिन बदलाव का रास्ता यही से खुलता है. यहां आकर यह मेडिकल छात्र भारत की असली तस्वीर देखते हैं. उनके सामने घनघोर गरीबी में फंसा पूरा गांव है. यह पांचों दोस्त किसानों की आत्महत्या के मूक दर्शक भी बनते हैं. जिसे कभी नहीं सुना उसे होते देखना बेहद तकलीफ देता है. इससे उनके भीतर भय, दुख और शर्म पैदा होती है. कर्ज से डूबे किसानों का संसार उन्हें ‘मदर इण्डिया’ के रूपहले पर्दे जैसा ही रंगहीन नजर आता है. यहां की सामंती ताकतें नए रुप में हाजिर होती हैं.

ऐसे में स्वास्थ्य व्यवस्था संभालना और लोगों को जीवन की थकान से उभारना मुश्किल होता है. पांचों की अंदरूनी आवाजों ने मिलकर सवाल बनाने शुरू कर दिए. जो देश की तरक्की, गरीबों की आमदनी, आम जनता के हक और राजनैतिक उदासीनता से उभरे. कॉलेज से भागे इन दोस्तों का दिल किसानों की जंग से जुड़ गया. आखिरकार यह पांचों एक उबलते हुए बिन्दु पर पहुंच गए. जहां उन्हें हिंसक समाधान नजर आया.

दरअसल यह पूरी फिल्म अहिंसक समाधान की संभावनाएं ढ़ूढ़ती है. सभी किरदारों की प्रतिक्रियाएं अलग-अलग देखी गई. कभी उन्होंने हकीकत से समझौता करना चाहा, कभी उसे बदलना चाहा, कभी उनका दिल कड़वा हुआ, कभी प्यार से भर गया और कभी दुख से. दृश्यों के सहारे सामाजिक कोणों का स्वाभिक ताना-बाना बुना गया है. जहां कुछ भी रुखा और थोपा हुआ नहीं लगता.

जिस साल यह फिल्म बन रही थी उस साल 784 किसानों ने आत्महत्याएं की थी. प्रधानमंत्री द्वारा 40 अरब रूपए के पैकेज बावजूद यह आकड़ा 1648 तक पहुंच चुका था. तब भारत के ‘नियंत्रक और महालेखा परीक्षक’ की रिपोर्ट ने भी स्वीकारा था कि- ‘‘राहत योजनाओं को लागू करने में गंभीर खामियां हुई हैं.’’ फिल्म निर्माण के दौरान ही देश के कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा था कि- ‘‘आत्महत्याएं अब कम हो रही हैं.’’ लेकिन जिस रोज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आए उस रोज ही अकोला के राकेश बंसल सहित 5 किसानों ने आत्महत्याएं कर ली. "

मौजूदा हाल तो और भी बुरा है. बीते 5 महीनों में यावतमाल, बुलदाना, अकोला, अमरावत, वासीम और वर्धा जिले के 401 किसानों ने आत्महत्याएं की है. इसी प्रकार बीते 5 साल में यहां आत्महत्या करने वाले किसानों की कुल तादाद 5157 है. ‘राष्ट्रीय सेमपल सर्वेक्षण’ के 59वें आकड़ों के मुताबिक- ‘‘यहां के किसान खेती पर खर्च करने के लिए 60 फीसदी कर्ज लेते है ’’ मतलब फसल खराब होने से समस्याएं और बढ़ जाती है."

20 साल पहले यहां 1 क्विंटल कपास 12 ग्राम सोने के बराबर होता था. आज 1 क्विंटल कपास के बदले सिर्फ 1750 रूपए का समर्थन मूल्य मिलता है. बीते दशक से खेती में रासायनिकों का प्रचलन बढ़ा और वह 6 गुना तक महँगी हुई लेकिन कपास की कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई. उधर ‘विश्व व्यापार संगठन’ में हुए समझौते के कारण कपास पर आयात-शुल्क सिर्फ 10 फीसदी ही रह गया. अमेरिका में किसान की 1 किलो कपास की लागत करीब 1.70 डॉलर होती है. वहां की सरकार 1 किलो कपास पर 2 डालर की सब्सिडी भी देती है. इसलिए अमेरिका का किसान लागत से बेहद कम कीमत पर कपास निर्यात कर देता है. विदर्भ का किसान यही मात खा जाता है.

‘समर 2007’ जिन आकड़ों के साथ खत्म होती है उनमें भूमण्डलीकरण के खतरों का विश्लेषण तो नहीं लेकिन इशारा जरूर मिलता है. फिल्म कोई नया सवाल खड़ा नही करतीं. यह पुराने सवालों में ही असर पैदा करती है.

19.2.09

Playing Hangman


There's A Better Way To Pass T i m e
Put your fingers to better use by playing hangman and ensuring child rights at the same time

18.2.09

विवादों का विशालकाय सरोवर

शि‍रीष खरे
इन दिनों सरदार सरोवर परियोजना और डूब प्रभावितों के लिए किये जा रहे पुनर्वास कार्य में भ्रष्ट्राचार कुछ इस प्रकार व्याप्त है कि अनियमितताओं का सिलसिलेवार ब्यौरा जुटाना और उसके आधार पर लगातार कार्यवाहि‍यों की रणनीतियां तैयार करना कठिन हो चुका है. इस विशालकाय बांध की तरह ही इससे प्राप्त होनेवाले लाभों, लागतों और पुनर्वास संबंधित तमाम फर्जीवाड़ों की लम्बी सूचियां विवादों की मोटी गठरी बन चुकी है.
सरदार सरोवर परियोजना 1979 में शुरू हुई थी और यह साल 2025 में पूरी होगी. इससे लगभग दो लाख लोग विस्थापित होंगे. 1993 में विश्व बैंक ने इस परियोजना से अपना हाथ पीछे खींच लिया था. इसी साल “केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय” के विशेषज्ञ दल ने भी अपनी रिपोर्ट में बांध के काम के दौरान पर्यावरण की भारी अनदेखी और लापरवाही पर सभी का ध्‍यान खींचा था. अनेक पर्यावरणविदों की राय में यह योजना पर्यावरण के प्रतिकूल है. इतने बड़े पैमाने पर काम होगा तो पर्यावरण के साथ खिलवाड़ भी उसी अनुपात में होना है. इसके बावजूद कुल 1200 किलोमीटर लंबी नर्मदा पर 3200 बाँध बनाना भी तय हुआ है. मतलब नर्मदा की घाटी में असंतुलित विकास, विस्थापन और अनियमतताओं का अतीत खत्म नहीं होने दिया जाएगा.
लाभ और लागत‘नर्मदा बचाओं आंदोलन’ ने समाज में विकास की परिभाषा और उसके मापदण्डों पर लगातार विचार करने की प्रक्रिया को प्राथमिकता दी है. इसी तर्क को आधार मानकर परियोजना के कुल लाभ और हानियों का हमेशा आकलन चलता रहा है. हर बार यह लागत बढ़ती जा रही है. सरकार के अनुसार पूरी लागत गुजरात के सिंचाई बजट का 80 प्रतिशत हिस्सा है. लेकिन इससे कच्छ के लगभग 2 प्रतिशत और सौराष्ट्र के 9 प्रतिशत भाग में ही पानी पहुंचाया जा सकेगा. मेधा पाटकर के अनुसार- “विगत 20 सालों में यह परियोजना 4200 हजार करोड़ से बढ़कर 4500 हजार करोड़ हो चुकी है. इसमें से अब तक 25 हजार करोड़ खर्च हो भी चुके हैं. अनुमान है कि आने वाले समय में यह लागत 70 हजार करोड़ तक पहुंचेगी. इसके बावजूद अकेले गुजरात में ही पानी का लाभ 10 प्रतिशत से भी कम हासिल है. महाराष्ट्र और राजस्थान को मिलने वाला लाभ नजर नहीं आता जबकि मध्यप्रदेश को भी अनुमान से कम बिजली मिलने वाली है.” कुछ तकनी‍की विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस पूरी योजना को वैकल्पिक तरीक़े से लागू किया जाए और इसे छोटी-छोटी, आत्मनिर्भर तथा पर्यावरण के अनुकूल परियोजनाओं में बांट दिया जाए तो ज़्यादा लाभ हो सकता है.
विस्थापन यहां के आदिवासी लोगों की प्रमुख मांग जमीन के बदले जमीन की है. परंतु सरकार जमीन जुटाने में अपनी असमर्थता व्यक्त करती रही है. कुछ लोगों को पुनर्वास की जो जमीन दी गई है उनमें से ज्यादातर की शिकायत है कि वह जमीन उनकी असली जमीन से कम उपजाउ है. काम की जमीन को पानी में डूबोकर बदले में उन्हें बेकार जमीन दी जा रहीं है. जमीन बिखरे टुकड़ों में दी जा रही है. बहुत बड़ी तादाद में पुनर्वासित लोगों का कहना है कि आज नर्मदा की नहर उनकी दी गई ज़मीन से निकल रही है पर उन्हें ही नर्मदा के पानी से वंचित रखा जा रहा है. पुनर्वास कार्य में अनियमतताओं के गंभीर आरोप बढ़ते ही जाते हैं. उधर ‘नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण’ द्वारा जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया कि ‍‍‍सरदार सरोवर परियोजना से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास कार्य में कथित अनियमितताओं के आरोप गलत हैं. तथ्य यह है कि- “वि‍गत वर्ष मानसून सत्र के दौरान परियोजना प्रभावितों के लिए विक‍‍‍‍सित 88 पुनर्वास स्थलों में 22438 परिवारों को निशुल्क भूखण्डव आंवटित किये गए. जो परिवार भूखण्ड लेना नहीं चाहतें, उन्हें 50 हजार नकद राशि देने का विकल्प रखा गया और 806 परिवारों ने स्वेच्छा से नकद राशि लेने का विकल्प चुना.” लेकिन सरकार के भीतर ही एनवीडीए की कार्यप्रणाली को लेकर अंतर्विरोध के स्वर उभरते रहे हैं. वि‍गत वर्ष मानसून सत्र के दौरान मुख्य सचिव द्वारा नि‍र्माण विभागों की मानिटरिंग के दौरान एनवीडीए अधिकारियों की जमकर क्लास लेने की खबर अखबारों की प्रमुख सुर्खी बनी थी. तब श्री साहनी ने कहा कि "बार-बार निर्देश के बावजूद एनवीडीए में न तो पैसों का सही उपयोग हो पा रहा है और न ही समय सीमा में कार्य हो पा रहा है. बड़े अधि‍कारी स्थल पर जाकर कामकाज की सही समीक्षा करें."
भ्रष्टाचार ‘नर्मदा बचाओं आंदोलन' वैकल्पिक वनीकरण, जल संरक्षण क्षेत्र विकास और पुनर्वास योजनाओं से संबंधित सरकारी दावों और आकड़ो को झूठा तथा विरोधाभाषी बताता है और कहता है कि इसके जवाब में हम मैदानी और कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे। आंदोलन पुनर्वास कार्य में राहत और विस्थापन सहित कई क्षतिपूर्ति योजनाओं में भारी भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं. ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन, बड़वानी’ से मिली जानकारी के अनुसार प्रदेश सरकार ने 13 जिलों के कलेक्टबर और भू-अधिग्रहण अधिकारी को उनके यहां हुईं रजिस्‍ट्रियों की जांच करने के लिए कहा है. कुल 4190 रजिस्ट्रियों में से 2818 रजिस्ट्रियों की जांच की गई, जिनमें से अभी तक कुल 758 फर्जी रजिस्ट्रियों की बात सरकार मान चुकी है मगर आंदोलन के मुताबिक दुर्भाग्य से यह संख्या् उससे कहीं अधिक है. ‘नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण’ के अधिकारियों द्वारा जहां अनेक बैठकों में फर्जी रजिस्ट्री जांच में किसी प्रकार की आंच न आने की बात दोहराई जा रही है वहीं कुछ लोगों का मत है कि मौजूदा अधिकारियों के होते हुए निष्पैक्ष जांच संभव ही नहीं है। आंदोलन के कार्यकर्ता आशीष मंडलोई बताते हैं कि- "एनवीडीए के अधिकारियों द्वारा दोषी अधिकारियों को बचाने और महज विस्थापितों के फसाने का खेल चल रहा है। इस संबंध में जब प्रकरण न्यायालय में है तो ऐसे में निर्णय न्यायालय को लेना है, अधिकारि‍यों द्वारा निर्णय लेना अवैध ही माना जाएगा." उन्होंने इस पूरे प्रकरण पर सीबीआई जांच की मांग की है.

8.2.09

खबर नहीं बना विस्फोट



शिरीष खरे



26 जनवरी के 2 दिनों बाद मतलब 28 तारीख की दोपहर एक विस्फोट से बीड़ जिले का नेकनूर गांव दहल गया. वैसे तो इससे पूरा राष्ट्र और महाराष्ट्र दहलना चाहिए था लेकिन ऐसा हुआ नहीं. यह हादसा किसी आतंकवादी संगठन की साजिश नहीं बल्कि पटाखा फेक्ट्री मालिक की लापरवाही से हुआ. रात 10 बजते-बजते 10 जाने चली. तब तक एक चौंकाने वाला तथ्य यह निकला कि मरने वालों में 5 दलित और 2 मुस्लिम परिवारों के बाल मजदूर हैं. `चंदन फायर वक्र्स एण्ड माचिस फेक्ट्री´ नाम की इस फेक्ट्री के मालिक शेख सलीम और शेख नूर हैं.
इस धमाके से चारों तरफ आग फैल गई जिसमें 35 मजदूर झुलस गए. रिपोर्ट लिखे जाने तक कई मजदूरों की हालत गंभीर बनी हुई थी. इस हादसे के 96 घण्टे गुजरने के बावजूद जब प्रशासनिक उदासीनता बरकरार रही तो महाराश्ट्र के `बाल हक अभियान´ से जुड़े संगठनों ने मुख्यमंत्री अशोक राव चौहान को ज्ञापन लिखकर कड़ी प्रतिक्रया जतायी. इन्होंने फेक्ट्री कारखाने के मालिकों सहित जिम्मेदार अधिकारियों पर तुरंत कार्यवाही करने, मृतक बच्चे के परिवार को 5 लाख तथा घायलों को 1 लाख रूपए देने और ऐसी फैक्ट्रियों पर प्रतिबंध लगाने की मांग भी की है. `चाईल्ड राईटस एण्ड यू´ से सुधीर सुधल के मुताबिक- ``यह हादसा बताता है कि बाल मजदूरी के पीछे गरीबी और बेकारी किस तरह से काम कर रही हैं. साथ ही बाल मजदूरी पर सरकार और जिलाधिकारियों की सजगता की भी पोल घुलती है.´´ संस्था मानती है कि जब तक ऐसे बच्चों के परिवारों को रोजगार और आर्थिक स्थिरता नहीं मिलती तब तक यह समस्या खत्म नहीं होगी. इसलिए उपयोगी और आजीविका पर आधारित शिक्षा व्यवस्था पर जोर दिया जाए. इसके अलावा बाल-श्रम कानून, 1986´ के तहत बाल मजदूरों की कुल संख्या का सिर्फ 15 फीसदी हिस्सा ही लिया जाता है. इसलिए सभी उद्योगों में बाल मजदूरी पर रोक लगाना जरूरी है.
संस्था के विभिन्न शोध बताते हैं कि पूरी दुनिया में 24.6 करोड़ बाल मजदूर हैं जिसमें से सबसे ज्यादा 1.7 करोड भारत में ही हैं. इसमें से 10 फीसदी घेरलू और 85 फीसदी अंसगठित क्षेत्रों से हैं. बहुत सारे बच्चे खेत, खदान और पत्थरों का काम करते हैं. `अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन´ की रिपार्ट में देश भर के करीब 71 फीसदी बाल मजदूर स्कूल नहीं जाते. सबसे ज्यादा बाल मजदूर आंध्र-प्रदेश (14.5 फीसदी) में हैं. इस हिसाब से महाराष्ट्र का नम्बर चौथा (9.5 फीसदी) है. कहते हैं देश का सच्चा धन बैंको में नही बल्कि स्कूलों में होता हैं लेकिन शिक्षा और रोजगार की अनियमितताओं से कानून भी बेअसर हो जाते हैं. संविधान की `धारा-24´ में 14 साल से छोटे बच्चों को फैक्ट्री या खदान के कामों की मनाही है. वह अन्य खतरनाक कामों में भी शामिल नहीं हो सकते. `धारा-39 ई´ के अनुसार राज्य अपनी नीतियां इस तरह बनाए कि बच्चों का शोशण न हो पाए. `धारा-39 एफ´ बच्चों को नैतिक और भौतिक दुरूपयोग से बचाता है.
`फैक्ट्री कानून-48´ के मुताबिक 15 से 18 साल तक के किशोर किसी फेक्ट्री में तभी काम कर सकते हैं जब उन्हें मेडीकल-फिटनेस प्राप्त हो. यह कानून 14 से 18 साल के बच्चों को सिर्फ 4 घण्टे काम कराने की इजाजत देता है. 1986 के `बाल-श्रम कानून´ ने पटाखा, बीड़ी, कालीन, सीमेंट, कपड़ा, छपाई, दियासलाई, चमड़ा, साबुन और भवन निर्माण से जुड़ी फैक्ट्रियों में बच्चों के काम करने को खतरनाक माना. 1996 को सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को खतरनाक पेशों में लिप्त बच्चों की पहचान करने, उन्हें काम से हटाने और बेहतर शिक्षा देने के निर्देश दिए थे. 2006 को कानून में 14 साल से कम उम्र के बच्चों को घर, होटल या मंनोरंजन केन्द्रों तक में काम करने पर रोक लगा दी गई. साथ ही कानून न मानने वालों पर 3-10 महीने की जेल या 10-20 हजार रूपए जुर्माने का प्रावधान भी रखा. जाहिर है 1938 से अब तक बाल-श्रम कानून को कई तरह से जांचा-परखा और बदला गया. फिर भी संवैधानिक कानून और अदालती आदेशों की धज्जियां ही उड़ाई जाती रही.
बाल मजदूरों के विकास के लिए सरकारी बजट का मामूली हिस्सा ही खर्च होता है। इस दिशा में मार्च 2008 को मात्र 156 करोड़ रूपए आंवटित किए। जो पिछले साल के मुकाबले महज 3 करोड़ ही ज्यादा है. इस तरह एक बाल मजदूर को मात्र 10 रूपए महीना मिलेगा. यह रकम देश के 250 जिलों में चल रही करीब 9 हजार परियोजनाओं के लिए होगी. इसमें 9-14 साल तक के 4.5 लाख बच्चे हैं. ऐसे बच्चों के लिए श्रम मंत्रालय आवासीय स्कूल योजना बनाना चाहता है जो फिलहाल ठंडे बस्ते में है. हमारे तंत्र में बच्चों की जिम्मेदारी की ठीक-ठाक रूपरेखा तक नहीं. 6 साल तक के बच्चे `महिला एवं बाल विकास´ की जिम्मेदारी हैं. 6-14 साल तक के बच्चे 'शिक्षा विभाग´ के हवाले हैं. लेकिन 14-18 साल तक के बच्चों का रखवाला कोई नहीं. इसलिए ऐसे हादसों के बाद विभिन्न विभाग हालातों का सही जायजा लेने की बजाय एक-दूसरे की तरफ देखते हैं. नेकनूर गांव का विस्फोट ने यह भी बताया कि सस्ती मजदूरी से बाल-मजदूरी को बढ़ावा मिलता है. इस फेक्ट्री के मालिक अधिक काम के बदले बच्चों को कम पैसे देते थे. इस तरह वह अधिक काम का अतिरिक्त वेतन देने से भी बच जाते थे. देखा जाए तो 14 साल तक के बच्चों को 8 घण्टे के बदले अधिकतम 40 रूपए की ही मजदूरी मिल पाती है. इससे कई बच्चे 14 की उम्र तक आते-आते बीमार हो जाते हैं. सबसे ज्यादा बाल-मजदूर 12-15 साल के होते हैं. मतलब देश के भविश्य को समय से पहले ही बूढ़ा बनाया जा रहा है.

22.1.09

पत्थरों के रास्ते बदलाव


















शिरीष खरे


बीड़ से लौटकर

जिन दलितों से रोजाना रोटी की उलझन नहीं सुलझती थी अब वही पत्थरों के रास्ते बदलाव की तरकीब सुझा रहे हैं। जानवर चराने वाली पहाड़ियों पर ज्वार पैदा करने की सूझ अतिशेक्ति अंलकार जैसी लगती है. मराठवाड़ा में बीड़ जिले के दलितों ने `जमीन हक अभियान´ से जुड़कर जमीन का मतलब जाना और समाज का ताना-बाना पलटकर रख दिया. इन दिनों 69 गांवों की करीब 2000 एकड़ पहाड़ियां दलित-संघर्ष के बीज से हरी-भरी हैं. इस संघर्ष में औरतों ने भी बराबरी से हिस्सेदारी निभायी. इसलिए उन्हें जमीन का आधा हिस्सा मिला. इस तरह खेतीहीन से किसान हुए कुल 1420 नामों में से 710 औरत हैं.


साल पहले तक यह लोग पहाड़ों के चरवाहे कहलाते थे। यह तथ्य महाराष्ट्र के `जमीन गायरन कानून´ से मेल खाता है. इस कानून के मुताबिक 14 अप्रैल 1991 के पहले से जो परिवार ऐसी जमीन का इस्तेमाल करते हैं उन्हें वह जमीन दे दी जाए. लेकिन कानून बनने के एक दशक बाद भी लोग अनजान रहे. यह `जमीन वालों´ के असर से डरकर अपनी जमीन को `अपनी´ नहीं कह सकते थे. इसलिए `चाईल्ड राईटस एण्ड यू´ और `राजार्षि शाहू ग्रामीण विकास´ ने जब गांव-गांव तक इस कानून का संदेश पहुंचाया तो सभी ने उसे अनसुना कर दिया. लेकिन 2002 की एक मामूली प्रतिक्रिया ने बड़े संघर्ष को जन्म दे दिया. शिराल गांव के 2-3 दलित एक सुबह संगठन के आफिस आए और बोले कि हमने जबसे अपनी जमीन पर खेती की बात छेड़ी तब से सवर्ण धमकियां देते हैं. वह अपनी ताकत से हमें दबाते हैं. इसलिए संगठन आगे आए. कार्यकर्ताओं ने उन्हें समझाया कि संगठन चार रोज तुम्हारे साथ रहेगा. तुम्हें वही रहना है इसलिए वह जमीन और उसकी लड़ाई तुम्हारी ही है. उससे जो भी नफा-नुकसान होगा वह भी तुम्हारा ही होगा. सबकुछ तो सवर्णों का है इसलिए डरना तो उन्हें चाहिए. तुम्हारे पास जीने के लिए केवल एक जिंदगी है. कम से कम उस जिंदगी को तो निडर होकर जीओ. ऐसा सुनकर वह दलित अपने खेतों को आजाद कराने की बात कहकर चले गए.

इसके आगे का सिरा महेन्द्र जगतप ने जोड़ा- ``हम लोग गांवों में मिट्टी डालने और पत्थर हटाने लगे तो सवर्णों ने अचानक हमला बोल दिया. इसमें 5 लोग बुरी तरह घायल हो गए. संगठन के साथ मिलकर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज की. पुलिस कार्यवाही में 15 हमलावरों को 18 दिन जेल हुई. यह मामला कचहरी के मार्फत सुलझा.´´ इसके बाद संगठन ने शिराल गांव में जो बैठक बुलायी उसमें 2 हजार लोग इकट्ठा हुए. इसमें दलितों के साथ पारधी, भील, धनगढ़, सुतार, कुम्हार, बड़ई और लोहार समुदाय मिलकर एक हो गए. उन्होंने ``मार खाने को तैयार, जमीन छोड़ने को नहीं´´ जैसे नारे लगाकर यहां खेत बनाए और उसमें बीज डाले. वह एक-दूसरे को सुनते और उसमें गुणा-भाग लगाकर जगह-जगह लड़ने की तैयारियां करते. 8 दिन रूककर बाहरी लोग शिराल गांव से विदा हुए. तब फसल की रखवाली के लिए 35 दलित झोपड़ियां 120 एकड़ खेतों के इर्द-गिर्द बस गई. दामोदर धोरात ने बताया- ``जब पहली बार ज्वार की फसल आई तो हमारे अंदर इज्जत से जीने का सपना जागा. बढ़िया जीने की चाहत नई ऊंचाईयां छूने लगी. खेत मालिक बनने का सपना दूर-दूर तक फैल गया.´´

शिराल की लड़ाई रंग लायी और करंजी गांव के 15 दलितों ने 51 एकड़ पथरीली जमीन पर बीज रोपे. इस बार सवर्ण चुप रहे. मगर यह चुप्पी तूफान के पहले की थी. इसके बाद जहां-जहां दलितों ने खेत मालिक बनना चाहा वहां-वहां सर्वणों का अत्याचार कहर बनकर टूटा. पाठसरा में घर की कुण्डी लगायी और ऊपर की छत निकालकर मारा. भातुड़ी में सामाजिक बाहिश्कार करते हुए दाना-पानी बंद किया. धामनगांव में चोरी के झूठे मामलों के बहाने फंसाया गया. करेहबाड़ी में बस्ती और आसपास के जंगल को आग के हवाले किया. िशडाला में खेत का धान जला दिया. बेलगांव में खड़ी फसल को जानवरों के लिए छोड़ दिया. पारोडी में गेहूं की फसल काट ली और देवीगांव में खेत सहित जंगल जला डाला.

उस समय एक तरफ सवर्ण हमला करते दूसरी तरफ संगठन से जुड़े दलित पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज कराते। इस तरह पाठसरा से 250, भातुड़ी से 70, धामनगांव से 45, करेहबाड़ी से 70, शिडाला से 150, बेलगांव से 9, पारोड़ी से 70 और देवीगांव से 9 हमलावरों को गिरफ्तार किया गया। जैसे-जैसे गिरफ्तारियां बढ़ी वैसे-वैस दलितों पर हमले कम हुए. 2005 तक जातीय-संघर्ष का यह दौर पूरी तरह थम चुका था.

शिडाला के दादासाहेब बाग्मारे ने बताया- ``जब दलितों की अपनी जमीन हुई तो मजदूरों की कमी पड़ गई. ऐसे में बड़े किसानों ने मजदूरी बढ़ायी और काम के घण्टे तय किए. इससे हम छोटे किसानों को फायदा हुआ. हम अपनी खेतीबाड़ी से फुर्सत होते ही उनके खेतों के काम निपटाते. लेकिन बंधुआ मजदूर बनकर नहीं बल्कि अपनी मेहनत का सही मेहनताना लेकर. प्रभाकर सावले ने कहा- ``हम खेतों से साल भर का अनाज बचाते हैं और चारा बेचकर कुछ पैसा भी. इस तरह कई बकरियां खरीदी हैं. हम बहुत अमीर नहीं हुए लेकिन गृहस्थी की हालत पहले से ठीक है.´´ पाठसरा गांव की बैठक में सैकड़ों लोगों के साथ हम भी मौजूद हैं. यहां `संगठन´ के मतलब और मकसद पर गर्मागम चर्चा चल रही है. नमनदेव काले ने कहा- ``संगठन याने आप. अगर आपके अंदर की ताकत बढ़ती है तो संगठन खुद-ब-खुद ताकतवर होगा.´´ अप्पा बालेकर बोला- ``एक-एक से पूरा गांव और ऐसे कई गांवों से जुड़कर संगठन बनता है. संगठन के आगे आने का मतलब लोगों के आगे आने से होना चाहिए. एक के पीछे एक होने या किसी के हटने से संगठन नहीं रूकता.´´ चागदेव सांग्ले बोला- ``दूसरों के भरोसे जिया भी नहीं जा सकता. जो अपने आप चलता है वहीं संगठन है. हमें नेता नहीं, कार्यकर्ताओं चाहिए.´´ जनाबाई गरजी- ``अगर किसी गांव का संगठन पावरफुल है तो समझो वह आसपास के इलाके का पावरहाउस है.´´

करंजी गांव के मंदिर में दलितों का घुसना मना था लेकिन उर्मिला निकालजे आज वहीं की सरपंच हैं। उन्होंने बताया- ``जमीन-हक को लेकर निकलने वाली रैलियों में 10-15 हजार लोग जमा होते हैं। उन रैलियों को औरतें संभालती हैं। हम पुलिस हो या तहसीलदार, मिनिस्टर हो या कलेक्टर सबसे बतियाते हैं. अब हमारा अभियान सामुदायिक खेती के बारे में सोच रहा है. शिराल गांव की राहीबाई खंडागले ने बताया- ``ऐसी खेती में सारे खेतों की हदों को तोड़ दिया जाएगा। तब हर गांव का एक खेत होगा. इससे कम लागत और मेहनत में ज्यादा पैदावार होगी. जो फसल आएगी उसे बराबर हिस्सों में बांट दिया जाएगा. सवर्ण की सुने तो ऐसा मुश्किल है. जब हमने जमीन की लड़ाई शुरू की थी तब भी वह ऐसा ही कहते थे. हमने मिलकर 22 गांव के खेतों के लिए बाबड़ियां बनायी हैं. इसलिए सब मिलकर खेती भी कर सकते हैं.´´ पोखड़ी गांव की जनाबाई ने बताया- ``खेतों के बिना भी हमारी जिंदगी थी मगर बंधी हुई. ऊंची जाति के घरों से गुजारा चलता था. वह जैसा कहते वैसा करते. हम उनकी गंदगी उठाते. हमारे बच्चे उनके जानवरों के पीछे भागते. हमारे मर्द उनके खेतों में रात-दिन काम करते. इसके बदले साल में एक बार अनाज, उतरन के कपड़े और रोजाना बचा हुआ खाना मिलता. बारिश में जब झोपड़ियां बहती तो उनकी छतों का बाहरी हिस्सा हमारा आसरा बनता.´´ भातुड़ी गांव की अभिधाबाई धेवड़े ने कहा-``पहले बैठकों में हमें बुलाया नहीं जाता था और अब हम पंचायत का फैसला सुनाते हैं.´´

एक सदी पहले महात्मा फुले ने कहा था- ``शिक्षा बिना मति गई, मति बिना गति गई, गति बिना अर्थ गया और अर्थ बिना शूद्र बर्बाद हुए।´´ हमारी पंरपराओं ने दलितों को धन रखने की आजादी नहीं दी जिससे वह लाचार हुए. इसलिए वह सवर्णों पर निर्भर हो गए. यह निर्भरता आज तक बरकरार है. सामाजिक कार्यकर्ता बाल्मिक निकालजे ने इस स्थिति को उल्टने की बात कहते है- अगर दलितों को आत्मनिर्भर बनाना है तो उन्हें जीने के संसाधन देने होंगे। फिलहाल जमीन से बेहतर दूसरा विकल्प नजर नहीं आता. जमीन मिलते ही लोग मालिक बन जाते हैं. इसलिए बीड़ जिले के दलित आज किसी से कुछ नहीं मांगते. जमीन की यह लड़ाई स्वाभिमान से भी जुड़ी है.

जो पत्थर घास को रास्ता नहीं देता था आज वहां ख्वाहिशों की फसल है. यहां के धरतीपुत्रों ने धरती को आजाद किया और उससे जीना सीख लिया. इस तरह उन्होंने अपनी दुनिया को `सुजलाम सुभलाम मलयज शीतलाम´ बना डाला. लेकिन कानून के मद्देनजर उन्हें जमीन का पट्टा मिलना बाकी है. मतलब 15 साल गुजरने के बावजूद जमीन की लड़ाई यहां आज तक जारी है. जब तक लड़ाई पूरी नहीं होती तब तक यह कहानी भी अधूरी ही रहेगी.

10.1.09

गांव-गांव टूटकर, ठांव-ठांव बन गए













मेलघाट टाइगर रिर्जव एरिया से

इस साल ज्यों ही टाइगर रिजर्व बना कोरकू जनजाति का जीवन दो टुकड़ों में बट गया. एक विस्थापन और दूसरा पुनर्वास. ऊंट के आकार में उठ आये विस्थापन के सामने पुनर्वास जीरे से भी कम था. पुराने घाव भरने की बजाय एक के बाद एक प्रहारों ने जैसे पूरी जमात को ही काट डाला. अब इसी कड़ी में 27 गांव के 16 हजार लोगों को निकालने का फरमान जारी हुआ है. अफसर कहते हैं बेफिक्र रहिए, कागज में जैसा पुनर्वास लिखा है ठीक वैसा मिलेगा. जबाव में लोग पुनर्वास के कागजी किस्से सुनाते हैं. और आने वाले कल की फिक्र में डूब जाते हैं.


10 तक का पहाड़ा न आने के बावजूद 1974 यहां के बड़े-बूढ़ों की जुबान पर रखा रहता है. 1974 को `वन्य जीव संरक्षण कानून´ बना और `मेलघाट टाइगर रिजर्व´ वजूद में आया. कुल भू-भाग का 73 फीसदी हिस्सा कई तरह की जंगली पहाड़ियों से भरा है. बाकी जिस 27 फीसदी जमीन पर खेती की जाती है वह भी बारिश के भरोसे है. इस तरह आजीविका का मुख्य साधन खेती नहीं बल्कि जंगल ही है. इस 1677.93 वर्ग किलोमीटर इलाके को तीन हिस्सों में बांटा गया है- (पहला) 361.28 वर्ग किलोमीटर में फैला गुगामल नेशनल पार्क, (दूसरा) 768.28 वर्ग किलोमीटर में फैला बफर एरिया और (तीसरा) 1597.23 वर्ग किलोमीटर में फैला मल्टीपल यूजेज एरिया. तब के दस्तावेजों के मुताबिक सरकार ने माना था कि इससे कुल 62 गांव प्रभावित होंगे.

विराट गांव के ठाकुजी खड़के ने बताया कि- ``परियोजना को लेकर हम लोगों से कभी कोई जिक्र नहीं किया गया. 1974 में तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और प्रदेश के वनमंत्री रामू पटेल अपने काफिले के साथ यहां आए और कोलखास रेस्टहाउस में ठहर गए. उस वक्त रामू पटेल ने आसपास के खास लोगों को बुलाकर इतना भर कहा था कि सरकार शेरों को बचाना चाहती है इसलिए यहां शेर के चमड़ा बराबर जगह दे दो.´´ लेकिन यह चमड़ा चौड़ा होते-होते अब पूरे मेलघाट को ही ढ़कने लगा है. ऐसी स्थिति में `चाईल्ड राईटस एण्ड यू´ और `प्रेम´ संस्थाएं कोरकू जनजाति के साथ कदम से कदम मिलाकर संघर्ष कर रही हैं. `चाईल्ड राईटस एण्ड यू´ के महाप्रंबधक कुमार नीलेन्दु के मुताबिक- ``सरकार जनता के हितों के लिए काम करती है. मगर यहां तो स्थिति एकदम उल्टी है. कभी संरक्षण तो कभी विकास के नाम पर जनजातियों का ही विनाश जारी है. ऐसी योजना में न तो लोगों को शामिल किया जाता है और न ही खुली नीति को अपनाया जाता है. इसलिए व्यवस्था में घुल-मिल गई कई खामियां अब पकड़ से दूर होती जा रही हैं. सरकार हल ढ़ूढ़ने की बजाय हमेशा नई उलझनों में डाल देती है.´´

इस दिशा में पहला काम 1974 को बाघों की संख्या खोजने के लिए सर्वे से शुरू हुआ. 6 सालों तक तमाम कागजी कार्यवाहियों का दौर चलता रहा जिसमें सारी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई. 1980 से `वन्य जीव संरक्षण कानून´ व्यवहारिक अगड़ाईयां लेने लगा. पसतलई गांव के तुकाराम सनवारे कहते हैं- ``जब बाबू लोग फाइलों को लेकर इधर-उधर टहलते तब हमने नहीं जाना था कि वह एक दिन जंगलों को इस तरह बांट देंगे. वह जीपों में सवार होकर आते और हर बस्ती की हदबंधी करके चले जाते. साथ ही हमसे खेती के लिए जमीन देने की बातें कहते. हमें अचरज होता कि जो जमीन हमारी ही है उसे क्या लेना. उनकी यह कागजी लिखा-पढ़ी 6 महीने से ज्यादा नहीं चली.´´ सेतुकर डांडेकर ने बताया- इतने कम वक्त में उन्होंने कई परिवारों को खेती के लिए पट्टे बांट देने की बात कर डाली. लेकिन उस वक्त कई परिवार पंजीयन से छूट गए. ऐसा लोगों के पलायन करने और सर्वे में गड़बड़ियों के चलते हुआ. इस तरह उन्होंने हमारी बहुत सारी जमीन को अपनी बताया. हमने भी जमीनों को छोड़ दिया. वन-विभाग ने ऐसी जमीनों पर पेड़ लगाकर उन्हें अपने कब्जे में ले लिया. हमारी सुनवाई एक बार भी नहीं हुई.´´ इस तरह किसानों की एक बड़ी आबादी को मजदूरों में बदल डाला. रोजगार गांरटी योजना के तहत अब तक 45780 मजदूरों के नाम जोड़े जा चुके हैं.

1980 के खत्म होते ही जंगल और आदिवासी के आपसी रिश्तों पर होने वाला असर साफ-साफ दिखने लगा. एक-एक करके उन्हें जंगली चीजों के इस्तेमाल से पूरी तरह बेदखल कर दिया गया. उन्हें भी लगने लगा जंगल हमारा नहीं, पराया है. इस पराएपन के एहसास के बीच उन पर जंगल खाली करने का दबाव डाला गया. `मेलघाट टाइगर रिजर्व´ से सबसे पहले तीन गांव कोहा, कुण्ड और बोरी के 1200 घरों को विस्थापित होना पड़ा था. पुनर्वास के तौर पर उन्हें यहां से करीब 120 किलोमीटर दूर अकोला जिले के अकोठ तहसील भेज दिया गया. कुण्ड पुनर्वास स्थल में मानु डाण्डेकर ने बताया कि- ``सर्वे में तब जो गड़बड़ियां हुई थी उन्हें हम अब भुगत रहे हैं. जैसे 6 परिवारों को यहां आकर मालूम चला कि उन्हें खेती के लिए दी गई जमीन तो तालाब के नीचे पड़ती है. अब आप ही बताए पानी में कौन-सी फसल उगाए? जो जानवर हमारी गुजर-बसर का आसरा हुआ करते थे इधर आते ही उन्हें बेचना पड़ा. क्योंकि चराने के लिए यहां जमीन नहीं थी इसलिए सड़क के किनारे-किनारे चराते. इस पर आसपास के लोग झगड़ा करते और कहते कि हमारे जानवर कहां चरेंगे ? हम आदमी के मरने पर उसे जमीन के नीचे दफनाते हैं. लेकिन यहां कहां दफनाए ?´´

पुनर्वास-नीति के कागजों में दर्ज हर सुंदर कल्पना यहां आकर दम तोड़ देती है. इन पुनर्वास की जगहों पर दौरा करने के बाद मूलभूत सुविधाओं का अकाल नजर आया. तीनों गांवों के बीचोबीच जो स्कूल खोला गया उसकी दूरी हर गांव से 2 किलोमीटर दूर पड़ती हैं. इस तरह गांव की बसाहट एक-दूसरे से बहुत दूर-दूर हो गई है. आंगनबाड़ी यहां से 5 किलोमीटर दूर अस्तापुर में हैं. प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के लिए 10 किलामीटर दूर रूईखेड़ा जाना होता है. इन्हें जिन इलाकों में जगह मिली है वह आदिवासी आरक्षित क्षेत्र से बाहर है इसलिए यह सरकार की विशेष सुविधाओं से भी बाहर हो गए हैं. जैसे पहले इन्हें राशन की दुकान पर अन्तोदय योजना से 3 रूपए किलो में 15 किलो चावल और 2 रूपए किलो में 20 किलो गेहूं मिल जाता था. वह अब नहीं मिलता. और तो और यहां बीपीएल में केवल 3 परिवारों के नाम ही जुड़ सके हैं. लगता है बाकी के हजारों परिवार इस सूची से भी विस्थापित हो गए हैं. 2002 में शासन ने बिजली, पानी और निकास के इंतजाम का वादा किया गया था. बीते 6 सालों में यह वादा एक सपने में तब्दील हो गया.

यहां से 4 किलोमीटर दूर कुण्ड गांव से विस्थापित नत्थू बेलसरे की सुनिए- ``6 साल पहले खेती के लिए मिली जमीन कागज पर तो दिखती है मगर यहां ढ़ूढ़ने पर भी नहीं मिलती. इसके लिए अमरावती से लेकर नागपुर तक कई कार्यालयों के चक्कर लगाए लेकिन जमीन का कोई अता-पता नहीं. इस पर बाबू लोग हैरान और हम परेशान हैं.´´ यहां से 4 किलोमीटर दूर कोहा पुनर्वास स्थल में हरिजंड बेलसरे और हीरा मावस्कर ने खेती के लिए जमीन नहीं मिलने की बात बताई. कुण्ड पुनर्वास स्थल पर तो 11 परिवारों को घर के लिए न तो पैसा मिला और न ही जमीन. लोगों ने कहा कि वह आज भी इधर-उधर गुजर-बसर कर रहे हैं. लेकिन कहां हैं, यह कोई नहीं जानता.

बोरी पुनर्वास स्थल में सुखदेव एवले ने बताया कि- ``हमारी पुश्तैनी बस्तियों को हटाए जाने के पहले इसकी कोई कागजी खबर और तारीख देना भी मुनासिब नहीं समझा गया। अफसर आते और कह जाते बस अब इतने दिन और बचे, फिर तुम्हें जाना होगा। उनका बस्ती हटाने का तरीका भी अजीब है. जिस बस्ती के इर्द-गिर्द 8-15 दिन पहले से ट्रक के ट्रक घूमने लगे, समझो घर-गृहस्थी बांधने का समय आ गया. कर्मचारियों के झुण्ड के झुण्ड चाय-पान की दुकानों पर जमा होकर तोड़ने-फोड़ने की बातें करते हैं. कहते हैं दिल्ली से चला आर्डर तीर की तरह होता है, आज तक वापिस नहीं लौटा. अगर समय रहते हट गए तो कुछ मिल भी जाएगा. नहीं तो घर की एक लकड़ी ले जाना मुश्किल हो जाएगा. ऐसी बातों से घबराकर जब कुछ लोग अपने घर की लकड़ियां और घपड़े उतारने लगते हैं तो वह बस्ती को तुड़वाने में हमारी मदद करते हैं. हमारे लड़को को शाबाशी देते हैं. देखते ही देखते पूरी बस्ती के घर टूट जाते हैं.´´

इसी तरह वैराट, पसतलई और चुरनी जैसे गांवों के घर भी टूटने वाले हैं. पुनर्वास के लिए शासन को 1 करोड़ 9 लाख रूपए दिये गए हैं. अधिकारियों को यह रकम बहुत कम लगी इसलिए उन्होंने और 2 करोड़ रूपए की मांग की है. ऐसे अधिकारी जंगल और जमीन के बदले नकद मुआवजों पर जोर देते हैं. जानकारों की राय में नकद मुआवजा बांटने से भष्ट्राचार की आशंकाएं पनपती हैं. जैसे सरदार सरोवर डूब प्रभावितों को नकद मुआवजा बांटने की आड़ में भष्ट्राचार का बांध खड़ा हो गया. जिसमें अब कई अधिकारी और दलालों के नाम उजागर हो रहे हैं. यहां भी कोरकू जनजाति का रिश्ता जिन कुदरती चीजों से जुड़ा है उसे रूपए-पैसों में तौला जा रहा हैं. लेकिन जनजातियों को रूपए-पैसों के इस्तेमाल की आदत नहीं होती. इसके पहले भी विस्थापित हुए लोगों के पास न तो जंगल ही रहा और न ही नकद. आखिरी में उसकी पीठ पर बस मुसीबतों का पहाड़ रह जाता है. वैराट गांव की मनकी सनवारे कहती है-``यहां से गए लोगों की हालत देखकर हम अपना जंगल नहीं छोड़ना चाहते. सरकार के लोग बस निकलने की बात करते हैं लेकिन अगले ठिकानों के बारे में कोई नहीं बोलता.´´

`प्रेम´ संस्था के संजय इंग्ले मानते हैं- ``शासन के पास दर्जनों गांवों को विस्थापित करने के बाद उन्हें एक जगह बसाने की व्यवस्था नहीं हैं. जिस अनुपात में विस्थापन हो रहा है उसी अनुपात में राहत मुहैया कराना बेहद मुश्किल होगा. पुराने तजुर्बों से भी ऐसा जाहिर होता है इसलिए अब और विस्थापन सहन नहीं होगा´´ उनके साथ वैराट, पसतलई और चुरनी गांवों से तुकाराम सनवारे, तेजुजी सनवारे, फकीरजी हेकड़े, किशनजी हेकड़े, शांता सनवारे, सुले खड़के, फुलाबाई खड़के और गोदाबाई सनवारे जैसी हजारो आवाजों ने विस्थापन के विरोध में एक आवाज बुलंद की है. क्या उनकी यह गूंज जंगल से बाहर भी सुनी जाएगी ?

हाल ही में इस डिवीजन के वनाधिकारी रवीन्द्र बानखेड़े ने सरकार को टाइगर रिजर्व की सीमा 444.14 वर्ग किलोमीटर बढ़ाने के लिए प्रस्ताव भेजा है. जब तक यह रिर्पोट प्रकाशित होगी तब तक हो सकता है उसे मंजूरी मिल जाए. फिलहाल एक और विस्थापन की इबारत लिखकर भेजी जा चुकी है. इसका मतलब दर्जनों गांवों के हजारों लोगों को उनकी दुनिया से बेदखल कर दिया जाएगा. इंसान और जानवर सालों से साथ रहते आये हैं इस सरकारी संरक्षण (उत्पीड़न) के बाद जानवर और इंसान सालों तक नहीं समझ पायेंगे कि उनके साथ क्या किया गया और क्यों?

3.1.09

लड़ाई-पढ़ाई साथ-साथ

शिरीष खरे

सरदार सरोवर बांध से नफा और नुकसान। पिछले दो दशकों से जारी इस बहस ने हमारे दिलो-दिमाग पर दो चित्र उभारे हैं। पहला चित्र बिजली, पानी और विकास की गंगा के रूप में तो दूसरा हजारों लागों के विस्थापन का दर्द लिए खड़ा है। नर्मदा घाटी के बाहर इस आंदोलन को जानने की उत्सुकता बनी रहती है। आंदोलन की दो रेखाएं सामानान्तर चल रही हैं। एक अहिंसा पर आधारित लड़ाई को जारी रखती है तो दूसरी रचनात्मकता का रास्ता दिखाती है।

बांध से प्रभावित आदिवासियों ने अपने बच्चों के लिए जीवनशाला नाम से कई स्कूल तैयार किए है। लोगों के मुताबिक `लड़ाई-पढ़ाई साथ-साथ´ होना चाहिए। विंध्यांचल और सतपुड़ा पर्वतमालाओं की ओट में यहां कई छोटे और सुंदर गांव हैं। यह गांव अपने जिला मुख्यालय से बेहद दूर और घनघोर जंगलों के बीच हैं। इन स्थानों में स्कूल भवन बनने और शिक्षक आने की राह तकना नियति का खेल समझा जाता था। ऐसा नहीं कि बांध विस्थापितों ने बच्चों की शिक्षा के लिये कभी गुहार नही लगाई हो। हर बार केवल आश्वासन मिलें और स्थिति जस के तस बनी रही। आखिरकार, आदिवासियों ने खुद बदलाव की यह पहल की। 1991-92 में, चिमलखेड़ी और नीमगांव में जीवनशालाएं शुरू हुई। काम नया और कुछ मालूम नहीं होने से चुनौती पहाड की तरह खड़ी थी। फिर भी जीवनशाला का आधार स्बावलंबी रखा गया। शुरूआत से ही सीमित साधन, संसाधन और समुदायिक क्षमता के अनुरुप बेहतर शिक्षा की बात पर बल दिया गया। इन जीवनशालओं का मकसद महज सरकारी स्कूलों की शून्यता भरना नहीं था बल्कि आदिवासी जीवनशैली को कायम रखना भी था। फिलहाल करीब 13 गांव में जीवनशालाएं संचालित है जो आसपास के 1500 से अधिक बच्चों को जिन्दगी की बारहखड़ी सिखाती हैं।

`नर्मदा बचाओं आंदोलन´ से जुड़े आशीष मण्डलोई बताते है कि- ``वैसे तो जीवनशाला का जन्म विस्थापन रोकने की लड़ाई का नतीजा रहा मगर जल्दी ही ऐसे स्थान आंदोलनकारियों के लिये विविध चर्चा, रणनीति और कार्यक्रम आयोजन का मुख्य केन्द्र बन गए। इस प्रकार आन्दोलन और जीवनशाला, दोनों को एक-दूसरे को लाभ पहुंचाने लगे। ऐसे स्थान आदिवासी एकता और भागीदारिता के प्रतीक बन गए।´´जीवनशाला में पढ़ाई-लिखाई का तरीका सहज ही रखा गया है। लोगों के बीच से कुछ लोग निकले और पढ़ाने लगे। इसमें गांव की बोली को वरीयता दी गई। इस दौरान किताबों का प्रकाशन भी पवरी/भिलाली बोलियों में किया गया। पहली बार बच्चों को उनकी बोली की किताबें मिल सकी। शिक्षकों ने ``अमर केन्या´´ (हमारी कथाएं) में कुल 12 आदिवासी कहानियों को समेटा। इसके अलावा सामाजिक विषयों पर ``अम्रो जंगल´´(हमारा जंगल) और ``आदिवासी वियाब´´(आदिवासी विवाह) जैसी किताबों को लिखा गया। केवल सिंह गुरूजी ने ``अम्रो जंगल´´ में यहां की कई जड़ी-बूटियों को बताया। खुमान सिंह गुरूजी ने ``रोज्या नाईक, चीमा नाईक´´ किताब में अंग्रेजी हुकूमत के वक्त संवरिया गांव के संग्राम पर रोशनी डाली। ऐसी किताबों में आदिवासी समाज का ईतिहास, साहित्य, कला, संस्कृति और परंपराओं से लेकर स्थानीय भूगोल, प्रशासन और कानूनी हकों तक की बातें होती हैं।
हर
किताब जैसे कुदरत के साथ दोस्ताना रिश्ता बनाने का संदेश देती है। पढ़ाई को दिलचस्प बनाने के लिये अनेक तरीको को अजमाया गया। ``अक्षर ओलखान´´(अक्षरमाला) में यहां की बोली के मुताबिक अक्षरों की पहचान और जोड़ना सिखाया गया है। इसमें कई आवाजों को निकालकर या आसपास की चीजों से मेल-जोल कराना होता है। नाच-गाना, चित्र और खेलों से पढ़ाई मंनारंजक बन जाती है। लिखने की कई विधियां को भी बार-बार दोहराया जाता है।
जीवनशाला से निकली पहली पीढ़ी अब तैयार हो चुकी है। जो अब शिक्षक बनकर अपने संस्कारों को आगे बढ़ा रहे हैं। लेकिन विकास के नाम पर जंगल काटने और अब घाटी के लोगों को भोजन की कमी महसूस होने लगी है। अपनी जमीन से अलग-थलग यहां का आदिवासी अपने को यकायक बाजार में खड़ा पाता है। उन्हें न आर्थिक सुरक्षा मिल पा रही है और न ही भावनात्मक। इतनी बड़ी निर्दोष आबादी से जहां एक ओर जीने के साधन छीने गए हैं वहीं दूसरी तरफ उन्हें पिछड़ा बताया जा रहा है। विस्थापन का कार्य गति पर है।

विस्थापन, दोबारा या बार-बार बसना, सरकारी योजना का लाभ न उठा पाना, कानूनी हक से बेदखल, मेजबान समुदाय की आनाकानी, नया समायोजन, शोषण, यौन उत्पीड़न, अधिक व्यय, हिंसा, अपराध,अव्यवस्था,संसाधन या जमीन की सीमितता, निर्णय की गतिविधि से कटाव, अस्थायी मजदूरी, मवेशियों का त्याग, प्रदूषण, सुविधा व स्वास्थ्य संकट........ एक तरफ बांध के कारण विस्थापन से विकराल आशंकाओं का इतना भरी बोझ है और दूसरी ओर जीवनशाला के नन्हें बच्चों के हाथों में खुली किताबों-सा खुला आसमान है। हालांकि उन्हें अभी बहुत सी परीक्षा पास करनी हैं मगर किसी के चेहरे पर चिंता की लकीर तक नहीं। बच्चों के हंसते चेहरों को देखकर लाख समस्याओं से लड़ने की मन करता है।

19.12.08

टाईगर रिजर्व में जनजातियों का शिकार

मेलघाट से लौटकर
मेलघाट सतपुड़ा पर्वतमाला की पश्चिमी पहाड़ी है जो महाराष्ट्र के जिला अमरावती की दो तहसील से जुड़कर बनी है. इस 2 लाख 19 हजार हेक्टेयर यानी मुंबई से 4 गुना बड़ी जगह पर कुल 319 गांव मिलते हैं. यहां करीब 3 लाख आबादी में से 80 फीसदी कोरकू जनजाति है. समुद्र तल से 1118 मीटर की ऊंचाई पर बसा यह हरा-भरा भाग `मेलघाट टाइगर रिजर्व´ कहलाता है. 1974 को `एम टी आर´ के नाम से मशहूर इस प्रोजेक्ट से तब 62 गांव प्रभावित हुए. आज भी 27 गांव के करीब 16 हजार लोगों को विस्थापित किया जा रहा है.

1947 से पूरे देश में विभिन्न परियोजनाओं से अब तक 2 करोड़ से अधिक आदिवासियों को विस्थापित किया जा चुका है. सरकार के मुताबिक बाघों को बचाने के लिए यहां विस्थापन जरूरी है लेकिन `राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण´ की रिपोर्ट स्वीकार करती है कि सत्तर के दशक में शुरू हुआ `प्रोजेक्ट टाइगर´ अपने लक्ष्य से काफी दूर रहा. देश में बाघों की संख्या अब तक के सबसे निचले स्तर तक पहुंच चुकी है. 2002 को देश में जहां 3642 बाघ थे वहीं अब 1411 बाघ बचे हैं. राज्यसभा के सांसद ज्ञानप्रकाश पिलानिया के मुताबिक- ``बाघों की संख्या को बढ़ाने के लिए बने रिजर्व एरिया अब उन्हें मारने की मुनासिब जगह बन गए हैं. इसके लिए अवैध िशकार करके उनके अंगों की तश्करी करने वाले व्यापारी जिम्मेदार हैं. बाहरी ताकतों की मिलीभगत से ही इतने बड़े गिरोह पनप सकते हैं.´ दूसरी तरफ विकास की तेज आंधी ने जंगलों का भविष्य खत्म कर दिया है. `भारतीय वन सर्वेक्षण´ की रिपोर्ट बताती है कि 2003 से 2005 के बीच 728 किलोमीटर जंगल कम हुआ. फिलहाल सघन जंगल का हिस्सा महज 1.6 फीसदी ही बचा है. इसी प्रकार 11 रिजर्व एरिया में जंगल घटा है. जाहिर है कि जनजाति को लगातार विस्थापित किए जाने के बावजूद न तो बाघ बच पाए हैं और न जंगल.

मेलघाट में कोरकू जनजाति का अतीत देखा जाए तो 1860-1900 के बीच प्लेग और हैजा से पहाड़ियां खाली हो गई थी. तब ये लोग मध्यप्रदेश के मोवारगढ़, बेतूल, शाहपुरा भवरा और चिंचोली में जाकर बस गए. उसके एक दशक बाद अंग्रेजों की नजर यहां के जंगल पर पड़ी. उन्हें फर्नीचर की खातिर पेड़ काटवाना और उसके लिए पहुंच मार्ग बनवाना था. इसलिए कोरकू जनजाति को वापिस बुलाया गया. आजादी के 25 सालों तक उनका जीवन जंगल से जुड़ा रहा. उन्होंने जंगल से जीवन जीना सीखा था. लेकिन जैसे-जैसे जंगल से जीवन को अलग-थलग किया जाने लगा वैसे-वैसे उनका जीना दूभर होता चला गया.

अनिल जेम्स कहते हैं कि-`बीते 34 सालों से `मेलघाट टाइगर रिजर्व´ में जनजातियों का शिकार जारी है. जैसे जैसे टाईगर रिजर्व सुरक्षित हो रहा है यहां रोटी का संकट गहराता जा रहा है. जनजातीय पंरपराओं का ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो चुका है. यहां सामाजिक ऊथल-पुथल अपने विकराल रुप में हाजिर है. राहत के तौर पर तैयार सरकारी योजनाओं का असर बेअसर ही रहा. हर योजना ने लोगों को कागजों में उलझाए भर रखा और अब लोग भी उलझकर जंगल की मांग ही भूल गए हैं.

बांगलिंगा गांव में 85 साल के झोलेमुक्का धाण्डेकर ने जंगल की बातों के बारे में बताया कि-`पहले हम समूह में रहने के आदी थे. अपनी बस्ती को पंचायत मानते और हर परेशानी को यही सुलझाते. `भवई´ त्यौहार पर साल भर का कामकाज और कायदा बनाते. इन मामलों में औरत भी साथ होती. वह अपना हर फैसला खुद ही लेती. चाहे जिसे दूल्हा चुने और पति से अनबन या उसके मरने पर दूसरी शादी करे. शादी में लेन-देन और बच्ची को मारने जैसी बातें नहीं सुनी थी. संख्या के हिसाब से भी मर्द और औरत बराबर ही बैठते. हमारी बस्ती सागौन, हलदू, साजड़, बेहड़ा, तेंदू, कोसिम, सबय, मोहिम, धावड़ा, तीवस और कोहा के पेड़ों से घिरी थी. जंगल में आग लगती तो हम अपनी बस्तियां बचाने के लिए उसे बुझा देते. तभी तो हमें अंग्रेजों ने जंगलों में ही रहने दिया. वहां से सालगिटी, गालंगा और आरा की भाजियां मिलती. बेचंदी को चावल की तरह उबालकर खाते. कच्चा खाने की चीजों में काला गदालू, बैलकंद, गोगदू और बबरा मिल जाते. ज्वस नाम की बूटी को उबलती सब्जी में मिला दो तो वह तेल का काम करती. इसके अलावा तेंदू, आंवला, महुआ, हिरडा, बेहड़ा, लाख और गोद भी खूब थी. फल, छाल और बीजों की कई किस्मों से दवा-दारू बनाते. खेती के लिए कोदो, कुटकी, जगनी, भल्ली, राठी, बडा़ आमतरी, गड़मल और सुकड़ी के बीज थे. ऐसे बीज बंजर जमीन में भी लहलहाते और साल में दो बार फसल देते. इसलिए अनाज का एक हिस्सा खाने और एक हिस्सा खेती के लिए बचा पाते थे.

यह तब की सरल, खुली और समृद्ध जीवनशैली की झलक भर है. बीते 3 दशकों से भांति-भांति की दखलअंदाजियों ने यहां की दुनिया को बुरी तरह प्रभावित किया. 1974 में सबसे पहले वन-विभाग ने बाघ के पंजों के निशान खोजने और उनकी लंबाई-चौड़ाई तलाशने के लिए सर्वे किया. फिर जमीनों को हदों में बांटा जाने लगा. इस तरह जंगल की जमीन राजस्व की जमीन में बदलने लगी और लोग यहां से बेदखल हुए. 1980 के बाद सरकार ने इन्हें पानी की मछली, जमीन के कंदमूल और पेड़ की पित्तयों के इस्तेमाल से रोका. मगर पूरा जंगल बाजार के लिए खोल दिया गया. जंगल के उत्पाद जब बाजार में बिकने लगे तो यहां की जनजाति भी जंगल की बजाय बाजारों पर निर्भर हो गई. इससे चीजों का लेन-देन बढ़ा और उन्हें रूपए-पैसों में तौला जाने लगा. अनाज के बदले नकद की महिमा बढ़ी. नकदी फसल के रुप में सोयाबीन और कपास पैदा किया जाने लगा. बाजार से खरीदे संकर बीज अधिक से अधिक पानी और रसायन मांगने लगे. समय के साथ खेती मंहगी होती गई. इस बीच नई जरूरतों में इजाफा हुआ और उनके खाने-पीने, रहने और पहनने में अंतर आया. आज कोरकू लोग कई जडियां और उनके उपयोग नहीं जानते.´´

यह तब की सरल, खुली और समृद्ध जीवनशैली की झलक भर है. बीते 3 दशकों से भांति-भांति की दखलअंदाजियों ने यहां की दुनिया को बुरी तरह प्रभावित किया. 1974 में सबसे पहले वन-विभाग ने बाघ के पंजों के निशान खोजने और उनकी लंबाई-चौड़ाई तलाशने के लिए सर्वे किया. फिर जमीनों को हदों में बांटा जाने लगा. इस तरह जंगल की जमीन राजस्व की जमीन में बदलने लगी और लोग यहां से बेदखल हुए. 1980 के बाद सरकार ने इन्हें पानी की मछली, जमीन के कंदमूल और पेड़ की पित्तयों के इस्तेमाल से रोका. मगर पूरा जंगल बाजार के लिए खोल दिया गया. जंगल के उत्पाद जब बाजार में बिकने लगे तो यहां की जनजाति भी जंगल की बजाय बाजारों पर निर्भर हो गई. इससे चीजों का लेन-देन बढ़ा और उन्हें रूपए-पैसों में तौला जाने लगा. अनाज के बदले नकद की महिमा बढ़ी. नकदी फसल के रुप में सोयाबीन और कपास पैदा किया जाने लगा. बाजार से खरीदे संकर बीज अधिक से अधिक पानी और रसायन मांगने लगे. समय के साथ खेती मंहगी होती गई. इस बीच नई जरूरतों में इजाफा हुआ और उनके खाने-पीने, रहने और पहनने में अंतर आया. आज कोरकू लोग कई जडियां और उनके उपयोग नहीं जानते.´´

पसतलई गांव के एक युवक ने नाम छिपाने की शर्त पर बताया कि- `जंगली जानवरों का शिकार करने वाली कई टोलियां यहां घूम रही हैं. कमला पारधन नाम की औरत इसी धंधे में लिप्त थी. बाद में पुलिस ने उसे धारणी में गिरफ्तार कर लिया.´ यहां जानवरों के हमलों की घटनाएं भी बढ़ रही हैं. कुंड गांव की बूढ़ी औरत मानु डाण्डेकर ने जानवरों से बचने के लिए तब की झोपड़ी को याद किया-`वह लकड़ियों और पत्तों की बनी होती, ऊंचाई हमसे 2-3 हाथ ज्यादा रहती. छत आधी गोल होती जो पूरी झोपड़ी को ढ़क लेती. उसमें घुसने के लिए दरवाजा उठाकर जाते. दरवाजे की हद इतनी छोटी रखते कि रेंगकर घुसा जाए. झोपड़ी के चारों तरफ 2-3 फीट लंबी पत्थरों की दीवार बनाते. रात को झोपड़ी के बाहर आग सुलगाते. पूरी बस्ती प्यार, तकरार, शादी, शिकार, जुदाई और पूजन से जुड़े किस्सों पर गाती-धिरकती. जैसे प्यार के गीत में लड़की से मिलने के लिए रास्ता पूछने, शादी के गीत में दूल्हा-दुल्हन बनकर आपस में बतियाने और जुदाई के गीत में शिकार पर गए पति के न लौटने की चर्चा होती.´´

यह बस्तियां अपनी पंरपरा और आधुनिक मापदण्डों के बीच फसी हैं. घरों की दीवारों पर रोमन केलेण्डर और रात में जलती लालटन लटकती हैं. बाहरियों के आने से इनके भीतर हीनता बस गई.यह खुद को बदलने में जुटे हैं. यहां के मोहल्लों ने कस्बों की नकल करके अपनी शक्लों को बिगाड़ रखा है. अब कोरकू बोली की जगह विदर्भ की हिन्दी का असर बढ़ रहा है. जबकि कार्यालय की भाषा मराठी है. इसलिए कोरकू जुबान फिसलती रहती है. खासकर स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को जानने और बोलने में मुश्किल आती है. कोरकू लोग कहते हैं कि सबकुछ खोने के बाद हमें कुछ नहीं मिला. स्कूल के टीचर और अस्पताल के डॉक्टर मैदानी इलाकों में बने हुए हैं. लेकिन हमारे हिस्से में न मैदान आया, न पहाड़. हम कहां जाए?

16.12.08

चीनी की मिठास में घुलता बचपन

शिरीष खरे

मराठवाड़ा से मुंबई लौटते वक्त, छुकछुक करती ट्रेन के साथ बचपन की कविता भी चल रही है- ``शिकारी आता है/ जाल फैलाता है/ दाने का लोभ दिखाता है/ लेकिन हमें जाल में नहीं फसना चाहिए.´´ लेकिन मराठवाड़ा में शोषण का जाल केवल फैला ही नहीं है, काफी कसा हुआ है इसलिए चिड़िया नहीं जानती कि वो जाल के अंदर है या बाहर. सभी शिकारियों ने हाथ मिला लिया है इसलिए उनका शिकार खुद-व-खुद खेतों तक आ जाता है. सरकारी आकड़ों के हिसाब से यहां गन्ना अधिक होता है. लेकिन ऐसा है नहीं, उससे कहीं अधिक यहां के खेतों में शोषण होता है लेकिन इसकी पैदावार का आकड़ा किसी के पास नहीं मिलता.


सुबह-सुबह एक ट्रेक्टर से जुड़ी दो ट्रालियों में दर्जनभर मजदूर परिवार बैठे हैं. इन्होंने अपने साथ अनाज, कपड़े, बिस्तर और कुछ जरूरी सामान बांध लिया है. बहुत छोटे बच्चे अपनी मांओं के गोद में सोए हैं, उनसे थोड़े बड़े अपनी बहनों के कंधो पर. एक कोने में बकरियों के गले की रस्सियां ढ़ीली करता बुजुर्ग भी है. ट्रालियों से बाहर पैर लटकाए सारे मर्दों के चेहरों पर एक जैसा रुखापन छाया है. उनके पीछे बैठी औरतों ने भी चुप्पी साध रखी है. मैंने पूछा - ``कहां जाना होगा ?´´ उनमें से एक औरत ने तीन टुकड़ों में कहा- ``बहुत दूर... कर्नाटक.... बीदर कारखाने में´´ फिर अगला सवाल-``लौटना कब होगा ?´´ जबाव आया- ``लौटना, बारिश के दिनों तक ही होगा.´´


यह महाराष्ट्र का मराठवाड़ा इलाका है. यहां के गावं को शहरों से जोड़ने वाली सड़कों पर ऐसी कई गाड़िया दौड़ रही हैं. जिला मुख्यालय उस्मानाबाद से करीब 100 किलोमीटर दूर कलंब तहसील की कई बस्तियां भी खाली हो चुकी हैं. मस्सा गांव के एम.ए. पास एक दलित युवक विनायक तौर ने बताया कि- `यहां दीवाली से बारिश तक हजारों मजदूर जोड़े (पति-पत्नी) चीनी कारखानों के लिए गन्ना काटने जाते हैं. इसमें अधिकतर दलित, बंजारा और पारदी जनजाति से होते हैं. इनके पास न तो खेती लायक जमीन है और न ही अपना कोई धंधा. गांव से बाहर रहने से इन्हें पंचायती योजनाओं का फायदा नहीं मिलता. इनकी बस्तियां भी बदलाव से अछूती रह जाती हैं. सबसे ज्यादा हर्जाना तो स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को भुगतना पड़ता है. ये बच्चे गन्नों के जिन खेतों में काम करते हैं, आप वहां जाकर देखिए शोषण की कितनी कहांनिया बिखरी है.´´

'चाईल्ड राईट्स एण्ड यू´ ने स्थानीय संस्था `लोकहित´ के साथ मिलकर कलंब तहसील के 29 गांवों का एक सर्वे किया और पाया कि 6-14 साल के कुल 1555 बच्चों में से 342 स्कूल नहीं जाते जिसमें 193 लड़कियां हैं. इसके अलावा ड्रापआउट बच्चों की संख्या 213 है जिसमें से भी 89 लड़कियां हैं. एक साल में 19 बाल-विवाह के मामले भी सामने आए. यहां 332 परिवार ऐसे हैं जिनके पास खेती के लिए जमीन नहीं. इसी प्रकार 125 परिवारों को राशन कार्ड नहीं मिला. इन दोनों संस्थाओं ने 29 गांवों के बच्चों को पढ़ाई से जोड़ने के लिए मुहिम चलाने का फैसला लिया है. इससे एक छोटे से हिस्से में बदलाव की उम्मीद बंधी है लेकिन पलायन की समस्या ने यहां विकराल रूप धारण कर लिया है. पूरा मराठवाड़ा ही इसकी कैद में नजर आता है.

मराठवाड़ा का यह इलाका चीनी उत्पादन का केन्द्र है. 1982 को सबसे पहले उस्मानाबाद के ढ़ोकी में `तेरणा चीनी कारखाना´ लगा था. सरकारी आकड़ों के मुताबिक आज यहां करीब 30 कारखाने चालू हैं जिसमें 7 उस्मानाबाद जिले में ही है और उनमें से भी 4 कलंब तहसील में. `तेरणा चीनी कारखाना कमेटी´ के एक सदस्य ने नाम छिपाने की शर्त पर कहा- `यहां हर कारखाना 25-50 किलोमीटर तक के खेतों से गन्ना उठाना चाहती है. इसके लिए वह मुकादम को जरिया बनाती है. हर मुकादम 5 से 10 लाख रूपए लेकर कमेटी से करार करता है. वह 12-20 जोड़ों को 6-10 महीनों तक काम करवाने की गारंटी देता है. मुकादम आसपास के कई जोड़ों से संपर्क रखता है. एक कारखाने से करीब 200-250 मुकादम और उनसे 2500-3000 जोड़े जुड़ते हैं.´´

इसके आगे की बात सामाजिक कार्यकर्ता बजरंग टाटे ने कही- ``मुकादम इस इलाके में ऊंची जाति के ताकतवर लोग बनते हैं. वह जोड़ों को 25-30 हजार रूपए देकर 6-10 महीनों तक काम पर जाने के लिए राजी करता है. वह जोड़ों से स्टाम्प पेपर पर दस्तखत या अंगूठा लगावाता है. कई मुकादमों के करार बहुत दूर के कारखानों से होते हैं इसलिए यहां के जोड़े नगर (200 किमी), पुणे (300 किमी), कोल्हापर (500 किमी) और कर्नाटक (700 किमी) के बिदर, आलूमटी तथा बेड़गांव इलाकों तक जाते हैं. इन्हीं करारों के तहत वहां से जोड़े यहां आते हैं.´´ कलंब के बालाजी मुले ने बताया कि- `जब मुकादम को काम की तारीखों की सूचना मिलती है तब जोड़े जमा करने और उन्हें दूसरे इलाकों में ले जाने के लिए बहुत कम समय मिलता है. ऐसे हालात में कोई मुकादम रियायत नहीं बरतना चाहता.' डोराला गांव में माया शिंदे ने इसी साल हुई एक घटना सुनाई- ``भारत सोनटके ने जब 20 हजार रूपए लेकर 6 महीने का करार किया तब नहीं जानता था कि उसे टीबी जैसी बीमारी हो जाएगी. वह पुणे में अपना इलाज करवा रहा है, यह खबर पाते ही मुकादम आया और भारत की पत्नी के साथ 50 साल से अधिक उम्र के मां-बाप को काम पर ले गया. उनके साथ 6 साल से कम उम्र की दो बिच्चयां भी कोल्हापुर के किसी खेत में होगी.´´

नवंबर में हमने देखा कि कारखानों के आसपास कई जोड़े जमा होने लगे हैं. यहां 15-20 दिन रूकने के लिए सभी की बस्तियां बन चुकी हैं. इसके बाद छोटे-छोटे समूहों में बांटकर इन्हें काम की जगहों पर भेजा जाएगा. फिर काम के लिहाज से ही इनकी बस्तियां बदलती रहती हैं. `धाराशिव चीनी कारखाना, चौरारूवली´ से करीब 25 किलोमीटर दूर, खेड़की गांव के खेत में एक ऐसी ही बस्ती में जाना हुआ. यह 12 घरों की एक अस्थायी बस्ती है जिसका हर घर पन्नी, कपड़ा और कुछ लकड़ियों की मदद से खड़ा भर है. क्योंकि सभी घर एक-दूसरे से दूर-दूर हैं इसलिए पूरी बस्ती अव्यवस्थित नजर आती है. घर में सबके लिए एक ही कमरा है. इस कमरे में पैर पसारने भर की जगह है. उबड़-खाबड खेत में न कोई गली है और न ही मैदान. बच्चे पानी के लिए काफी दूर जाते हैं और औरतों को भी खुले में ही नहाना होता है. सबकी रातें अंधेरे में ही कटती हैं. सुबह खेतों में जाते वक्त मजदूरों के हाथों में कोयना होता है. कोयना लोहे का बना वह धारदार हथियार है जिससे गन्ना काटा जाता है. हर मजदूर गन्ने की तरफ झुककर पहले उसकी जड़ों को काटता हैं, फिर उसे दो भागों में बांटकर पीछे फेंकता हैं. उसका जोड़ीदार गन्ने के इन टुकड़ों को बांधता हैं. इस तरह हर जोड़ा 2 टन गन्ना काटकर, फिर उन्हें बांधकर ट्रालियों में भरता है. कारखानों से ट्रालियों का आना-जाना देर रात तक चलता है. कई बार इन कामों में बच्चे भी शामिल हो जाते हैं. 6 से 14 साल के बच्चे-बिच्चयां घरों में खाना बनाने और सफाई का काम करते हैं. ऐसी ही एक बच्ची इशाका गोरे ने कहा कि वह तीसरी में है और यहां से जाने के बाद चौथी में बैठेगी. उसे नहीं मालूम कि जब वह स्कूल पहुंचेगी तो परीक्षा खत्म हो जाएगी. उसका परिवार सागली जिले के कराठ गांव से आया है. इशाका के पिता याविक गोरे का मानना है कि-`यह पढ़े तो ठीक, नहीं तो 4-5 साल में शादी करनी ही है. फिर जोड़ा बनाकर काम करेगी.´ यहां अधिकतर लोग अपने बच्चों की शादियां कम उम्र में ही कर देते हैं. इन्हें लगता है कि परिवार में जितने अधिक जोड़े रहेंगे, आमदनी उतनी ही अधिक होगी. अधिकतर रिश्तेदारियां काम की जगहों पर हो जाती हैं. इस तरह बाल-विवाह की प्रथा यहां नए रुप में उजागर होती है.

हमने जिन बस्तियों का अध्ययन किया उन बस्तियों में बच्चों से जुड़ी कई दिक्कते एक समान पायी गई, जैसे- बढ़ते बच्चों को पर्याप्त और समय पर भोजन नहीं मिलता जिससे कुपोषण के मामलों में बढ़ोतरी होती है. इन खेतों में बच्चे सर्दी के मौसम में बीमार होते हैं. इसी तरह गन्ना काटते वक्त कोयना लगने, सांप काटने और बावड़ियों में गिरने की घटनाएं होती रहती हैं. ऐसे खेतों से `प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र´ करीब 15-20 किलोमीटर दूर होते हैं इसलिए इमरजेंसी के दौरान अनहोनी का डर रहता है. बीड जिले के राक्षसबाड़ी निवासी सुभाष मोहते ने बताया कि- ``दो साल पहले `येनसाई चीनी कारखाना, राजनी´ के लिए काम करते वक्त जब मेरी बीबी बीमार हुई तो कुछ औरतों ने खेत में ही पर्दा लगाकर गर्भापात कराने की कोशिश की. अचानक उसकी हालत बिगड़ गई और वह मर गई.´´

`शंभु महाराज चीनी कारखाना, हवरगांव´ के लिए गन्ना काटने वाली शोभायनी कस्बे की चिंता अपने बच्चों को लेकर हैं-`हमारे बच्चे पास होकर भी दूर हैं. खेलने-पढ़ने के दिनों में कितना काम करते हैं. यह कभी चिड़चिड़ाते हैं तो कभी चुपचाप हो जाते हैं. गांव के बच्चों से बहुत अलग हैं यहां के बच्चे.´हमारे एक दोस्त ने पूछा-`तो इन्हें घर क्यों नहीं घुमा लाती ?´इसका जबाव मुद्रिका गोरे ने दिया-`जब चुनाव आते हैं तो उम्मीदवार वोट डलवाने के लिए घर ले जाते हैं, उसके बाद वापिस यहीं छोड़ देते हैं. फिर हमारा हाल पूछने कोई नहीं आता और न ही किसी को घर जाने दिया जाता है.´´ अधिकतर जोड़ों ने बताया कि मुकादम उनसे दिये गए रूपए के बदले बहुत काम लेता है. अनबन होने पर मारपीट तक करता है. बाभल गांव के शिवाजी बाग्मारे ने अपने यहां की ऐसी ही घटना का जिक्र किया-`बीते साल यहां गन्ना की पैदावार अधिक हुई थी इसलिए कई मुकादमों ने मियाद खत्म होने के बावजूद काम करवाया. हमारे यहां परवानी जिले के गंगाखेड़े गांव से आए 10 जोड़ों ने इसका विरोध किया और एक रात बिना बताए मिनी टेम्पो से भागना चाहा लेकिन 3 किलोमीटर दूर पहुंचते ही पकड़ा गए. इसके बाद उनके बच्चे और औरतों तक को खूब मारा. मुकादम के आदमियों ने मिनी टेम्पो भी तोड़-फोड़ दिया.´´

सरकार ने गांव में ही `हर हाथ को काम और काम का पूरा दाम´ देने के लिए `महाराष्ट्र ग्रामीण रोजगार गांरटी योजना´ चलाई है. इस योजना का सच जानने के लिए जब विकासखंड कलंब के कार्यालय गए तो कई हेरतअंगेज तथ्य उजागर हुए. `पंचायत विभाग´ के `विस्तार अधिकारी´ बसंत बाग्मारे ने बताया-`योजना को लागू हुए 1 साल बीत गया. इस ब्लॉक के 89 गांवों में से 7 में ही काम चालू है. कुल 35 कामों में से 1 ही पूरा हुआ है, बाकी 34 प्रगति पर हैं. इस ब्लॉक में 50,000 से भी अधिक मजदूर है लेकिन 2500 को ही काम मिल सका. इनमें से भी कईयों का भुगतान नहीं हुआ. इसके लिए जिले से करीब 5 लाख रूपए आने का इंतजार है.´´ जब इस निष्क्रियता के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा-`इस योजना में कागजी औपचारिकता अधिक है.´लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता बजरंग टाटे ने इसका दूसरा कारण बताया- `स्थानीय पंचायतों में ऊंची जातियों का राज है. यह खेती का मौसम है और सवर्णों को अपनी जमीन पर काम करने के लिए मजदूर चाहिए. यदि मजदूरों को ऐसी योजना का पता लग गया तो उनका काम बंद हो जाएगा. इसलिए ऐसी योजनाओं को छिपाया जाता है. सबकी मिलीभगत से यहां शोषण का जाल फैला है.´

21.11.08

अपनी तो पाठशाला

शिरीष खरे
उस्मानाबाद से लौटकर
तीसरी कक्षा में
पढ़ने वाली ललिता, सीमा और वैशाली स्कूल लगने के एक घण्टे पहले ही पहुंच गई हैं और स्कूल की सीढी पर खड़ी ललिता आज का जो पाठ पढ़ा रही है, उसे नीचे बैठी सीमा और वैशाली लिख रही हैं. तीनों अपने-अपने काम में इतनी मगन हैं कि उन्हें अपने अपने आस पास का भी ध्यान नहीं है. लेकिन उनके आस पास के लोग बड़े ध्यान से यह दृश्य देख रहे हैं.

यूं तो यह दृश्य बहुत साधारण लगता है लेकिन ऐसा है नहीं. असल में हम जिस स्कूल की बात कर रहे हैं, वह पारधी जनजाति का स्कूल है. पारधी यानी मिथ, इतिहास, सामाजिक परंपरा और कानून के मकड़जाल में फंसी हुई एक ऐसी जनजाति, जिसके लिए इस तरह के दृश्य सच में दुर्लभ हैं. ऐसे में स्थानीय लोगों के लिए यह स्कूल किसी अचरज से कम नहीं है.अंग्रेजों ने पारधी जनजाति को “ अपराधिक जनजाति अधिनियम, 1871 ” के तहत सूचीबद्ध किया था. अंग्रेज चले गए मगर धारणा बनी रही. इसलिए आज भी पारधी बस्तियां गांव से कोसों दूर जंगलों में होती हैं. कोई रास्ता इन बस्तियों को नहीं जाता. न ही सरकार की कोई योजना यहां आती है. न बिजली, न पानी, न राशन और न ही स्वास्थ्य की सुविधा. इसलिए यहां के लोग कहते हैं कि आजादी के 60 सालों में सरकार ने हमें एक ही चीज दी है, और वह है– महादेव बस्ती का यह स्कूल.
तहसील मुख्यालय क्लब से 15 किलोमीटर दूर, पहाड़ी के नीचे गिनती के 60 घर हैं जिनमें 279 लोग रहते हैं. इनके दिलों से शासन की दहशत कुछ कम तो हुई है लेकिन पूरी तरह से गई नहीं. तभी तो हमारी गाड़ी देखते ही ज्यादातर लोग लापता हो गए. उन्हें लगा कि आसपास कोई वारदात हुई होगी जिसकी छानबीन के लिए पुलिस आई है. कुछ देर बाद ‘ अपनेवाले हैं ’, ऐसा कहकर लोग एक जगह जमा होने लगे. हम जिस जगह मिले वह बस्ती की एकमात्र पक्की बिल्डिंग स्कूल है. बोर्ड पर स्कूल बनने का साल (1998), बच्चों की कुल संख्या (27), लड़कियां (10) और लड़के (17) लिखा है. एक बड़े हॉल से होकर 2 कमरे खुलते हैं जिसमें 1 से 4 तक की कक्षाएं लगती हैं.

स्कूल का कार्यालय और उसके पीछे बाथरूम है. लेकिन 30 गुणा 60 फीट वाले इस स्कूल की पूरी तस्वीर तब बनी जब लोगों से मालूम हुआ कि दो सालों से यहां का परीक्षाफल 100 प्रतिशत रहा है और यह हर नज़र से जिले के बेहतर स्कूलों में गिना जाता है. गांव के सुबराराव शिंदे ने याद करते हुए कहा– “इसके पहले तो पुलिस के छापे ज्यादा लगते थे. इसलिए कोई शिक्षक आने की हिम्मत नहीं करता था. तब स्कूल था, पढ़ाई नहीं. अगर शिक्षक आते भी तो बच्चे नहीं होते. वे इधर उधर खेलते रहते और शिक्षकों को “ओ मास्टर” कहकर चिढ़ाते थे. हमें लगता कि इस स्कूल के बहाने पुलिस बस्ती पर निगाह रखती है.” फिर पहल की एक सामाजिक संस्थान ने. लोकहित सामाजिक विकास संस्था ने जब यहां कदम रखा तो कई मुश्किलों का सामना किया. संस्था के बजरंग टाटे ने बताते हैं- “ ये हमें पुलिस के दोस्त समझते. पूछने पह अपना नाम सलमान या शाहरुख बताते और फोटो तो बिल्कुल नहीं खिंचवाते. सभी साल में कई बार `कारन’ नाम का त्यौहार मनाते. सारा समय बच्चों को स्कूल बुलाने में ही चला जाता. `चाइल्ड राइट्स एंड यू’ के साथ मिलकर हम पारधी जनजाति के बीच काफी समय से काम करते आ रहे हैं इसलिए पुराना तजुर्बा काम आया.”गांव के कल्याण काले के अनुसार संस्था के लोगों ने पहले गांव वालों के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताया. इससे गांव वालों के अंदर का डर दूर होने लगा. बातों ही बातों में गांव के लोगों ने जाना कि पढ़ाई कितनी जरूरी है. तब पढ़ाई में आने वाली अड़चनों पर घंटों बातचीत होती.बजरंग टाटे बताते हैं– “फिर 60 परिवारों के 135 महिला और 149 पुरुषों को लेकर एक सर्वे किया. समाज में शाला का मॉडल बनाया और 2007 को `समाजशाला’ बनी.”
समाजशाला के बारे में शिक्षिका प्रतिभा दीक्षित के अनुसार इस स्कूल का पाठ्यक्रम सरकारी ही है. जिसे पूरा करने के दो शिक्षकों को रखा गया है. बच्चों को पढ़ाई के अलावा दूसरी रोचक गतिविधियों में शामिल करने के लिए एक कार्यकर्ता और दोनों शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया.स्कूल के दूसरे शिक्षक संजय तांबारे बताते हैं- “पहले-पहल बच्चों के साथ खास दिक्कत यह रही कि इन्हें पारदी ही बोलनी आती थी, जो हमें नहीं आती थी. तब एक दूसरे को समझने के लिए खेल, गाने, चित्रों और कई चीज़ों का इस्तेमाल किया गया. धीरे-धीरे बच्चे मराठी, हिंदी और अंग्रेजी के पाठ भी सीखने लगे.” सुनिदि शिंदे से मालूम हुआ कि स्कूल की ताकत उसकी `समिति’ है जिसे बस्ती की औरतें संभालती हैं. यही बच्चों की हाजिरी, उनकी पढ़ाई-लिखाई और दोपहर के भोजन का ध्यान रखती हैं. यहां औरतों का अलग से एक समूह है, जिसमें सभी हर महिने 50 रुपए जमा करती हैं. यह रकम बच्चों पर खर्च होती है.समाजशाला से समनव्यक विठ्ठल खंडागले ने स्कूल में बिजली, शौचालय, मैदान और मैदान पर बने ब्लैकबोर्ड को युवा टोली की मेहनत का नतीजा बताया. इस युवा टोली में अठारह से तीस साल के युवा अगस्त में एक मेला लगाकर अफसरों के अलावा नेताओं को भी बुलाते हैं. इस साल जिला परिषद अध्यक्षा गोदावरे केंद्रे ने बस्ती में बिजली, पानी और पक्की सड़क बनाने का वादा किया है. इसी तरह उपविभागीय पुलिस अधीक्षक विजय महाले ने पारधी समाज के मन में पुलिस के डर को दूर करने के लिए कार्यशाला रखी थी. इसके अलावा प्राइमरी हेल्थ सेंटर, इडकुर' के डॉक्टर हर महीने हेल्थ कैम्प लगाकर बच्चों के साथ-साथ बस्ती के दूसरे लोगों की भी जाँच करने लगे है. हमारी अगली मागों में हैं लडकियों के लिए अलग से बाथरुम, वाचनालय और कैम्पस की दीवार बनवाना.
''5 दिसम्बर 2007 को महादेव बस्ती ने अपनी जाति-पंचायत में जो फैसला लिया उस पर जिले के कई लोगों को यकीन नहीं हुआ. उस दिन पूरी बस्ती एकमत हुई कि अगर हमारा बच्चा, हमारी गलती से स्कूल नहीं जाता तो हम इसका आर्थिक जुर्माना देंगे.जो बस्ती शिक्षा के दीपक से दूर रही थी, उसी बस्ती के बच्चों के लिए उनके माता-पिता ने पढ़ाई-लिखाई का यह मतलब जाना था. तब से स्कूल में बच्चों की 100 प्रतिशत उपस्थिति दर्ज होने लगी और एक भी बच्चा ड्रापआउट नहीं हुआ. प्रधानाध्यापक राम डाहवे ने खुशी जाहिर करते हुए कहा - ''इसकी तारीफ तो कलेक्टर भी करते हैं. समय के साथ शिक्षा भी बदल रही है जैसे अब हर काम कम्प्यटूर पर होने लगा है. वैसे तो इस इलाके के कई स्कूलों में कम्प्यटूर नहीं पहुचें लेकिन 'लोकहित' ने इस साल यहां दो कम्पयूटर दिए हैं बच्चे इन्हें ठीक से चलाने लगे हमारी कोशिश अब यही रहेगी''.

'चाईल्ड राइटस् एण्ड यू’ के महाप्रबंधक कुमार नीलेन्दु के मुताबिक - ''देशभर में एक समान स्कूल व्यवस्था लागू करने के लिए आंदोलन चल रहा है. यह स्कूल इस दिशा में एक मिसाल है. निशुल्क और बेहतर शिक्षा देने की राह में एक समान स्कूल व्यवस्था सही कदम है. अगर पारधी बस्ती के अदंर एक स्कूल इतना बदलाव कर सकता है तो दूसरी बस्तियों के सरकारी स्कूल क्यों नही.'' लेकिन ये कोशिशें काफी नहीं हैं.इस बस्ती के लोग गांव से बाहर होने के कारण वोटरलिस्ट से छूट जाते हैं. इनके घर की जमीन भी इनकी नहीं होती. 6 से 10 महीनों के लिए गन्ना काटने चले जाते हैं. कुछ मुबंई का रूख करते हैं तो उनके साथ बच्चे भी होते हैं. कई बार बच्चे ट्रेफिक सिग्नलों से होते हुए माफिया की दुनिया में दाखिला लेते हैं. हमें लगा मीडिया में आए दिन इनके जिन करनामों का रहस्योद्घाटन होता है, उनमें सामाजिक परतें दबी की दबी रह जाती है. खबरें खटाखट गुजर जाती हैं. फुलादेवी (बदला नाम) ने बताया कि- ''पुलिस की ज्यादतियां रूकी नही हैं. आसपास कोई चोरी हुई नहीं कि वह यहां आ धमकती है. फिर भी हमारे बच्चे समय के पहले स्कूल पहुचंते हैं.'' हमने उनसे इतना ही कहा ''बदलाव की यह आदत रहनी चाहिए.'' लेकिन क्लास 4 के बाद यह आदत रह पाएगी या नहीं कोई नहीं जानता. क्योंकि क्लास 5 के लिए यहां से 5 किलोमीटर दूर इटकुर जाना होगा. इस बस्ती से दूर जाने से बच्चे तो क्या, बड़े भी डरते हैं. वैसे इस जनजाति ने अपनी कई खूबियों को बचाकर रखा था, जो हमने उनके रहन-सहन और स्कूल में बने लोकचित्रों से जाना. शाम ढल गई लेकिन पारधी गानों की धुन पर बच्चों का थिरकना जारी रहा. चलते वक्त क्लास पहली के कुछ बच्चो ने घेर लिया. उनमें से दीपक शिंदे ने कहा- ''हमारी एक कविता तो सुनते जाओ.”हमने कहा - ''कौन-सी ?'' वह बोला-''सूरज को तोड़ने जाना है''. हमने कहा-''अगली बार, तोड़ कर सुनाना.''

29.10.08

कौन देश के आदमी

- 'Vands' कच्छ में खानाबदोश जनजातियों की बस्ती को कहते है, जिसमें बबूल के पेड़ों के बीचोबीच एक कलस्टर में करीबन 40 अस्त-व्यस्त घर मिलेंगे। इसकी बसाहट, गांव से कोसों दूर होती है। क्योकि इसे गांव का हिस्सा ही नही माना जाता है, इसलिए यहां कानूनी पहचान और मौलिक हकों को पाने की जद्दोजहद आजतक जारी है। ऐसी बस्तियों की संख्या 195 है, जो सरकारी योजनाओं के नक्शो से अक्सर बाहर रहती हैं।
- यहां के लोग, पानी के लिए कई मील पैदल चलते हैं। 'पब्लिक हेल्थ सेंटर', उनकी पहुंच से काफी दूर (10 से 15 किलोमीटर तक) होते हैं। स्कूल हो या हर जरूरी सेवा, वहां के लिए पहुंच मार्ग और बसों का भी अकाल नजर आता है। आलम यह है कि :
87%= घर बिजली से रोशन नही हो पाए
40%= परिवारों के वास्ते राशन-कार्ड नही और
85%= गरीबों को 'गरीबी रेखा-सूची' में शामिल नही किया गया।
- यहां 1000 में से 145 बच्चे मौत के मुंह में चले जाते हैं
लिंग-अनुपात तो और भी चौकाने वाला है, 1000 : 844!
आधे बच्चे ऐसे है, जो स्कूल नहीं जा पाते
और जो जाते हैं, उनमें से भी ज्यादातर अनियमित रह जाते हैं।
- मैदान सूखे, मिट्टी रेतीली और पानी का स्वाद नमकीन होता है। फिर, यहां मौसम की मार भी खूब पड़ी है। बीते 10 सालो में, 6 बार सूखा, 2 बार चक्रवात, 2 बार बाढ़ के साथ ही जनवरी 2001 का भूकंप भारी तबाही बरपा चुका है। अपनी जीविका के लिए कुछ लोग ऊँची जातियों के यहां खेतीबाड़ी का काम करते हैं, तो कुछ पशुओं को चराने का। दलितों के खाते में जमीन का मामूली हिस्सा ही है, वे दैनिक मजदूरी पर निर्भर हैं। इसी प्रकार, 'कोल' जाति के लोग अपना गुजारा चलाने के लिए कोयला तोड़ते हैं। अक्सर, लोग काम की तलाश में दूसरी जगहों की तरफ रूख करते हैं। कुछेक, जब इन बस्तियों से कुछ ज्यादा ही बाहर निकल आते हैं, तब अपनी पहचान के लिए बहुत ज्यादा संघर्ष करते हैं।
आसपास, ऐसे कितने लोग हैं....
जो अपने ही देश के होते हुए, पराए हैं।

20.10.08

समान स्कूल व्यवस्था अपनाए हम

शिरीष खरे
‘स्कूल चले हम’ कहते वक्त, अलग-अलग स्कूलों में पल रही गैरबराबरी पर हमारा ध्यान नहीं जाता। एक ओर जहां क, ख, ग लिखने के लिए ब्लैकबोर्ड तक नही पहुंचे हैं वहीं दूसरी तरफ चंद बच्चे प्राइवेट स्कूलों में मंहगी इमारत, अंग्रेजी माध्यम और शिक्षा की जरूरी व्यवस्थाओं का फायदा उठा रहे हैं।
केन्द्रीय कर्मचारियों के बच्चों के लिए केन्द्रीय विद्यालय, सैनिको के बच्चो के लिए सैनिक स्कूल और गांव में मेरिट लिस्ट के बच्चों के लिए नवोदय स्कूल हैं। पिछड़े परिवार के बच्चों की एक बड़ी संख्या सरकारी स्कूलो में पढ़ाई करती है।
जाहिर है, सभी के लिए शिक्षा कई परतों में बंट चुकी है। निजीकरण के समानांतर यह बंटवारा भी उसी गति से फलफूल रहा है। दिसंबर 2002 को देश के सभी 6-14 साल तक के बच्चों को शिक्षा का मौलिक हक दिया गया लेकिन एक अनुमान के अनुसार 60 फीसदी बच्चे प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं। पांचवी तक पहुंचने वाले बच्चे दो-चार वाक्य लिख भी पाएं, ऐसा जरूरी नहीं। शिक्षा रोजगार से जुड़ा मसला है इसलिए बड़े होकर बहुत से बच्चे आजीविका की लाइन में सबसे पीछे खड़े मिलते हैं। दुनिया के अमीर मुल्क मसलन अमेरिका या इंग्लैण्ड में सरकारी स्कूल ही बेहतरीन शिक्षा व्यवस्था की नींव माने जाते हैं। वहां की शिक्षा व्यवस्था पर आम जनता का शिकंजा होता है। इसके ठीक विपरीत पिछड़े मुल्को में प्राइवेट स्कूलों की शिक्षा पर लोग ज्यादा भरोसा करते हैं। इसी चीज का फायदा प्राइवेट स्कूल के प्रंबधन से जुड़े लोग उठाते हैं और मनमाने तरीके से स्कूल की फीस बढ़ाते हैं। हमारे देश में भी ऐसा ही हो रहा है।
शिक्षाविदों का मानना है कि पूरे देश के हर हिस्से में शिक्षा का एक जैसा ढांचा, पाठयक्रम, योजना और नियमावली बनायी जाए। इससे मापदंड, नीति और सुविधाओं में होने वाले भेदभाव बंद होंगे। शिक्षा के दायरे से सभी परतों को मिटाकर, एक ही परत बनाई जाए। इससे हर बच्चे को अपनी भागीदारी निभाने का समान मौका मिलेगा। कोठारी आयोग (1964-66) देश का ऐसा पहला शिक्षा आयोग था जिसने अपनी रिपार्ट में सामाजिक बदलावों के मद्देनजर कुछ ठोस सुझाव दिए। आयोग के अनुसार समान स्कूल के नियम पर ही एक ऐसी राष्ट्रीय व्यवस्था तैयार हो सकेगी जहां सभी तबके के बच्चे एक साथ पढ़ेंगे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो समाज के ताकतवर लोग सरकारी स्कूल से भागकर प्राइवेट स्कूलों का रुख करेंगे और पूरी प्रणाली ही छिन्न-भिन्न हो जाएगी। 1970 के बाद से सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में तेजी से गिरावट आने लगी। आज स्थिति यह है कि ऐसे स्कूल गरीबो के लिए समझे जाते हैं।
कोठारी आयोग द्वारा जारी सिफारिशो के बाद संसद 1968, 1986 और 1992 की शिक्षा नीतियों में समान स्कूल व्यवस्था की बात तो करती है मगर इसे लागू नहीं करती। सरकार की विभिन्न योजनाओ के अर्थ भी भिन्न-भिन्न हैं जैसे कि कुछ योजनाएं शिक्षा के लिए चल रही हैं तो कुछ महज साक्षरता को बढ़ाने के लिए। इसके बदले सरकार क्यों नहीं एक ऐसे स्कूल की योजना बनाती जो सामाजिक और आर्थिक हैसियत के अंतरों का लिहाज किए बिना सभी बच्चों के लिए खुला रहे। फिर वह चाहे कलेक्टर या मंत्री का बच्चा हो या चपरासी का। सब साथ-साथ पढ़े और फिर देखें कौन कितना होशियार है। दरअसल, समान स्कूल व्यवस्था एक ऐसे स्कूल की कल्पना है जो योग्यता के आधार पर ही शिक्षा हासिल करना सिखाता है। इसकी राह में न दौलत का सहारा है और न शोहरत का। इसमें न टयूशन के लिए कोई फीस होगी और न ही किसी प्रलोभन के लिए स्थान। लेकिन जो भेदभाव स्कूल की चारदीवारियों में हैं वही तो समाज में मौजूद है। इसलिए समाज के उन छिपे हुए कारणो को पकड़ना होगा जो स्कूल के दरवाजों से घुसते हुए ऊंच-नीच की भावना बढ़ाते हैं। इस भावना के होते हुए समान स्कूल व्यवस्था का सपना सच नहीं हो सकता। केवल शिक्षा में ही समानता की बात करना ठीक नहीं होगा बल्कि इस व्यवस्था को व्यापक अर्थ में देखने की जरूरत है।
गोपालकृष्ण गोखले ने 1911 में नि:शुल्क और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा का जो विधेयक पेश किया था उसे सांमती ताकतों ने पारित नहीं होने दिया था। इसके पहले भी महात्मा ज्योतिराव फुले ने अंग्रेजों द्वारा बनाये गए भारतीय शिक्षा आयोग (1882) को दिए अपने ज्ञापन में कहा था कि सरकार का अधिकांश राजस्व तो मेहनत करने वाले मजदूरों से आता है लेकिन इसके बदले दी जाने वाली शिक्षा का पूरा फायदा तो अमीर लोग उठाते हैं। आज देश को आजाद हुए 60 साल हो गए और उनके द्वारा कही इस बात को 127 साल। लेकिन स्थिति जस की तस।
निजीकरण के कारण पूरे देश में एक साथ एक समान स्कूल प्रणाली लागू करना मुश्किल हो चुका है। फिर भी एक जन कल्याणकारी राज में शिक्षा के हक को बहाल करने के लिए मौजूदा परिस्थितियो के खिलाफ अपनी आवाज बढ़ानी ही होगी। इस नजर से शिक्षा के अधिकारो के लिए चलाया जा रहा राष्ट्रीय आंदोलन एक बेहतर मंच साबित हो सकता है। इसके तहत राजनैतिक दलों को यह एहसास दिलाया जाए कि समान स्कूल व्यवस्था अपनानी ही होगी। शिक्षा के मौलिक हकों को लागू करने के लिए यही एकमात्र चारा हैं।